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सोना खरीद के टॉप-10 देशों में भारत
Published / 2026-04-10 17:31:43
सोना खरीद के टॉप-10 देशों में भारत

दुनिया के केंद्रीय बैंकों में सोना खरीदने की मची होड़: भारत भी टॉप 10 में शामिलएबीएन सेंट्रल डेस्क । ग्लोबल लेवल पर दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने सोने पर अपना भरोसा जताया है। The Kobeissi Letter की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 में केंद्रीय बैंकों ने मिलकर लगभग 19 टन सोना खरीदा। आपको बता दें कि पिछले 23 महीनों से सोने की खरीदारी का यह सिलसिला लगातार जारी है। जनवरी में हुई 6 टन की खरीदारी को मिलाकर, इस साल के शुरुआती दो महीनों में ही कुल 25 टन सोना विभिन्न देशों के रिजर्व में जोड़ा जा चुका है।किन देशों ने सबसे ज्यादा सोना खरीदा? फरवरी महीने में गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की दौड़ में ये देश सबसे आगे रहे:पोलैंड: पोलैंड इस सूची में टॉप पर रहा। उसने अकेले 20 टन सोना खरीदा, जिससे उसका कुल Gold Reserve 570 टन पहुंच गया है। अब पोलैंड के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का 31% हिस्सा सोने के रूप में है।उज्बेकिस्तान: उज्बेकिस्तान के सेंट्रल बैंक ने अपनी होल्डिंग में 8 टन का इजाफा किया। अब उनका कुल रिजर्व 407 टन हो गया है, जो उनके कुल विदेशी मुद्रा भंडार का भारी-भरकम 88% हिस्सा है। किन देशों ने बेचा अपना सोना?जहां दुनिया सोना जमा कर रही है, वहीं कुछ देशों ने अपनी जरूरतों के लिए इसे बेचा भी है:तुर्की: तुर्की ने फरवरी में अपने भंडार से 8 टन सोना कम किया। रिपोर्ट के अनुसार, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और अपनी गिरती करेंसी (Currency) को संभालने के लिए तुर्की ने यह कदम उठाया है।रूस: रूस ने भी अपने भंडार में 6 टन की कमी की है।दुनिया के टॉप 8 Gold King  (Gold Reserves by Country)वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा सोना रखने वाले देशों की सूची इस प्रकार है:-रैंक देश गोल्ड रिजर्व (टन में)अमेरिका 8,133जर्मनी 3,350इटली 2,452फ्रांस 2,437रूस 2,330चीन 2,299स्विट्जरलैंड 1,040भारत 880

इजराइल हर हाल में पूरा करेगा लक्ष्य : नेतन्याहू
Published / 2026-04-09 21:14:02
इजराइल हर हाल में पूरा करेगा लक्ष्य : नेतन्याहू

सीजफायर के बीच नेतन्याहू का ऐलान: समझौता करें या युद्ध एबीएन सेंट्रल डेस्क। मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इजराइल अपने सभी सैन्य और रणनीतिक लक्ष्यों को हर हाल में पूरा करेगा। चाहे वह समझौते के जरिये हो या फिर दोबारा युद्ध शुरू करके। नेतन्याहू ने देश के लोगों की हिम्मत और सेना की बहादुरी की सराहना करते हुए कहा कि इस संघर्ष में इजराइल ने बड़ी जीत हासिल की है। उन्होंने दावा किया कि ईरान अब पहले से कहीं ज्यादा कमजोर हो गया है, जबकि इजराइल पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में है। उन्होंने उन सैनिकों और नागरिकों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने इस संघर्ष में अपनी जान गंवायी। साथ ही, घायल लोगों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की और शोकाकुल परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। इस बयान के बीच जमीनी हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। इजराइल डिफेंस फोर्स ने दावा किया है कि उसने बेरूत में हिज्बुल्लाह के एक बड़े नेता के करीबी सहयोगी अली यूसुफ हर्शी को मार गिराया है। इसके अलावा, दक्षिणी लेबनान में हथियारों के ठिकानों और सप्लाई रूट्स को भी निशाना बनाया गया है। इजराइल का कहना है कि लेबनान में उसकी कार्रवाई जारी रहेगी, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर में लेबनान शामिल नहीं है। इस बात को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी स्पष्ट किया है कि ऐसा कोई वादा नहीं किया गया था। इस बीच, इजराइल की कार्रवाई से लेबनान में हालात और खराब हो गये हैं। लगातार हमलों के कारण वहां भारी जनहानि और तबाही की खबरें सामने आ रही हैं।

क्या सचमुच मिल गये अमेरिका और ईरान!
Published / 2026-04-08 21:16:31
क्या सचमुच मिल गये अमेरिका और ईरान!

ट्रंप का नया चौंकाने वाला ऐलान: अमेरिका-ईरान समझौता बेहद करीब, दोनों देश मिलकर करेंगे काम... यूरेनियम संवर्धन मुद्दा भी हल एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच कूटनीति तेजी से आगे बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और एक व्यापक समझौता अब करीब है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि अमेरिका अब ईरान के साथ मिलकर काम करेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान में प्रोडक्टिव रेजीम चेंज हुआ है, जिससे सहयोग का नया रास्ता खुला है। उन्होंने सबसे बड़ा दावा करते हुए कहा कि ईरान अब यूरेनियम संवर्धन  नहीं करेगा। यह मुद्दा लंबे समय से दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद रहा है। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका और ईरान मिलकर उन परमाणु अवशेषों को हटायेंगे, जो पहले हमलों के दौरान जमीन के अंदर दब गये थे। उन्होंने कहा कि पूरी स्थिति की निगरानी यूनाईटेड स्टेट्स सैटेलाइट फोर्स के सैटेलाइट सिस्टम के जरिए की जा रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि हमलों के बाद से परमाणु स्थलों को छेड़ा नहीं गया है और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है।साथ ही ट्रंप ने बताया कि दोनों देशों के बीच टैरिफ और प्रतिबंधों में राहत को लेकर भी बातचीत चल रही है और उनके 15-सूत्रीय प्रस्ताव के कई बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है। सीजफायर और होर्मुज पर समझौता इस बीच अमेरिका और ईरान ने दो हफ्तों के लिए सभी सैन्य हमले रोकने पर सहमति जताई है। यह अस्थायी युद्धविराम मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। सबसे अहम बात यह है कि ईरान ने स्ट्रेट आॅफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने पर सहमति दी है। यह मार्ग वैश्विक तेल सप्लाई का प्रमुख रास्ता है, और इसके खुलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार को राहत मिली है। ईरान का रुख और आगे की चुनौती हालांकि, ईरान ने इस पूरे समझौते को अपनी जीत बताया है। तेहरान का कहना है कि वह अपनी शर्तों पर बातचीत कर रहा है और यह युद्धविराम युद्ध के अंत की गारंटी नहीं है। आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अहम बातचीत प्रस्तावित है, जहां आगे के समाधान पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह सीजफायर सिर्फ अस्थायी राहत है। कई बड़े मुद्दे खासतौर पर परमाणु कार्यक्रम अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं।

वाह रे चीन : चीन ने कोयले से बना ली रसोई गैस...
Published / 2026-04-06 21:18:34
वाह रे चीन : चीन ने कोयले से बना ली रसोई गैस...

सुरक्षा की कड़वी सच्चाई: चीन ने कोयले से बनायी गैस और हम बातों में उलझे रहे चीन ने धैर्यपूर्वक कोयले से गैस बनाने में पूंजी, कौशल और तकनीक का निवेश किया। इसके उलट हम कुछ ठोस करने के बजाय जुबानी जमाखर्च में उलझे रहे एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत के आम परिवारों से लेकर सूक्ष्म, लघु और मंझोले उपक्रमों तथा खासतौर पर उर्वरक उत्पादन को एलपीजी और प्राकृतिक गैस की कमी जिस प्रकार प्रभावित कर रही है, उसे देखते हुए यह जानने की मेरी उत्सुकता बढ़ गयी कि भारत से पांच गुना सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वाला देश चीन इतना शांत कैसे नजर आ रहा है। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उसने समझदारी बरती जबकि हम पूरी तरह बेपरवाह रहे। हमारी तरह चीन भी बहुत हद तक तेल और गैस के आयात पर ही निर्भर है लेकिन हमारे उलट वहां घबराहट के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। हमें पता है कि चीन अपनी गैस और कच्चे तेल का बहुत बड़ा हिस्सा रूस से पाइपलाइन से हासिल करता है। क्या वह पर्याप्त है? हमारे यहां तो घबराहट का माहौल है क्योंकि खरीफ की बोआई की तैयारियों के बीच उर्वरक को लेकर अनिश्चितता है जबकि चीन शांत है। वह अपनी जरूरतों को लेकर तो आश्वस्त है ही बल्कि निर्यात प्रतिबद्धता को लेकर भी निश्चिंत है। हम भी चीन से उर्वरक आयात पर निर्भर करते हैं। पूर्वी लद्दाख-गलवान संकट के बाद उर्वरक आपूर्ति रोके जाने की कड़वी स्मृतियां हमारे पास हैं। हालांकि चीन ने फिलहाल अप्रत्याशित स्थिति को कारण बताकर खाद के अपने निर्यात से इनकार नहीं किया है। इसकी वजह तब सामने आई जब मैंने अपने दायरे से बाहर जाकर शोध किया।  वास्तविकता ने मुझे सदमे में डाल दिया। यह सदमा चीन की कामयाबी को लेकर भी था और अपने आम चलताऊ रवैये को लेकर भी था बातें ज्यादा और नतीजा मामूली। कुछ कटु सत्य इस प्रकार हैं। चीन के पास कुछ ही गैस क्षेत्र हैं इसके बावजूद वहां पर्याप्त गैस है। ऐसा इसलिए क्योंकि चीन ने कोयले से गैस बनाने में धैर्यपूर्वक पूंजी, कौशल और तकनीक का निवेश किया। अब वह इसके वैश्विक उत्पादन का आधे से अधिक उत्पादित करता है। भारत और चीन ने इस विचार पर लगभग एक ही समय काम करना शुरू किया था लेकिन चीन के सालाना 8 करोड़ टन का हम केवल 3 से 5 फीसदी ही उत्पादन कर पा रहे हैं।चीन गैस बनाने के लिए सालाना करीब 34 करोड़ टन कोयले का इस्तेमाल करता है जबकि हम इसका केवल 1.4 फीसदी ही इस्तेमाल में लाते हैं। साल 2007 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने कोयला आधारित मीथेन गैस को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कीं और रानीगंज में एक छोटा सा संयंत्र भी लगाया। उसके बाद से यह विचार ठंडे बस्ते में ही पड़ा है। संपग्र के कार्यकाल में कोयले की बदनामी भी हुई। कोविड प्रेरित सुधारों के दौर में 2020 में मोदी सरकार ने एक अति महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन की शुरुआत की। मैं अति महत्त्वाकांक्षी शब्द का इस्तेमाल बहुत सावधानीपूर्वक कर रहा हूं क्योंकि इसके तहत 2030 तक सालाना 10 करोड़ टन कोयला गैसीकरण का लक्ष्य था। इसके लिए 4 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाना था। 10 करोड़ टन सालाना के साथ हमारा कोयला गैस उत्पादन चीन से 25 फीसदी अधिक होता। यह यकीनन जबरदस्त खबर थी।अब इस योजना का छठा साल चल रहा है और कुल उत्पादन बमुश्किल 50 लाख टन सालाना हो सका है। इसमें भी 18 लाख टन जिंदल स्टील ऐंड पॉवर के ओडिशा के अंगुल संयंत्र से आता है। यह नवाचारी आधुनिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करता है और अधिकांशत: आंतरिक खपत में काम आता है। कोयला मंत्रालय और नीति आयोग की वेबसाइट हमें बताती है कि 64,000 करोड़ रुपये के निवेश वाली सात कोयला गैसीकरण परियोजनाएं मंजूर की जा चुकी हैं। इनमें से तकरीबन सभी सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड के साथ संयुक्त उपक्रम में होंगी लेकिन फिलहाल ये नियमन चक्र में फंसी हैं। मैंने झारखंड के जामताड़ा जिले  के कास्टा में ईस्टर्न कोलफील्ड्स (कोल इंडिया की सहायक कंपनी) की भूमिगत कोल गैसीफिकेशन परियोजना के बारे में पढ़ा।अब तक वहां उत्पादन शुरू हो जाना चाहिए था लेकिन यह कोयला और पर्यावरण मंत्रालयों के बीच विवाद में उलझकर रह गयी। पर्यावरण मंत्रालय का जोर है कि यह परियोजना 300 मीटर गहरी होनी चाहिए। कोयला मंत्रालय इसे 150-160 मीटर रखना चाहता है। परिणाम, वही ढाक के तीन पात। यह जानकर और बुरा लगेगा कि हम अपनी कोयला निकासी को केवल खुले खदान तक सीमित किया है। हमारा सारा भूमिगत कोयला अप्रयुक्त पड़ा है, जबकि चीनी तीन किलोमीटर भूमिगत जा रहे हैं। कोयला मंत्रालय की वेबसाइट पर दो अच्छे लेख निजी क्षेत्र के समूहों यानी अदाणी और जिंदल से आते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि भारत के पास दुनिया में पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है। वे तकनीकी प्रक्रियाओं को फ्लो-चार्ट्स के साथ समझाते हैं, सुधारों और आवश्यक संसाधनों की सूची देते हैं। और यकीनन वे रणनीतिक लाभों का भी उल्लेख करते हैं, जिनमें इस समय का पसंदीदा: ऊर्जा आत्मनिर्भरता शामिल है। यह सब बहुत सलीके से प्रस्तुत किया गया है। चीन की तरह हमारे पास भी दूरदर्शिता की कमी नहीं है लेकिन चीन के उलट हम जुबानी जमा खर्च से आगे बढ़कर अमली जामा नहीं पहना सके। कच्चे तेल की कीमतें कम होने के साथ ही हमारी रुचि कम होने लगती है। हाइड्रोकार्बन के मंदी के दौर में भी चीन ने न तो रुचि गंवायी न ही ध्यान हटाया। उन्होंने कोयले के जरिये ऊर्जा स्वतंत्रता को राष्ट्रीय रणनीतिक लक्ष्य बनाया और हासिल किया। हम हमेशा की तरह राजनीतिक-अफसरशाही-नियामक विश्लेषण में उलझ कर रह गये। हमारे यहां दिक्कत यह है कि लंबी परियोजनाओं के दौरान जैसे ही कीमत कम होती है किसी न किसी भवन में बैठा कोई अफसरशाह उसकी दुहाई देकर काम ठप कर देता है। इससे निजी क्षेत्र का उत्साह भी जाता रहता है। चीन क्यों कामयाब रहा? उसने इसे रणनीतिक योजना के रूप में देखा और ध्यान बनाये रखा। इससे चीन ऊर्जा संबंधी झटकों से बच सका। कोयला ईंधन के रूप में लोकप्रिय नहीं है लेकिन भारत के पास यही है। कोयले से रसायन बनाना भी प्रदूषणकारी गतिविधि है, लेकिन यह बिजली संयंत्रों में इसे जलाने की तुलना में कहीं कम प्रदूषणकारी है। किसी भी स्थिति में, हमारा बिजली उत्पादन अधिकतर नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ रहा है और परमाणु ऊर्जा वापसी के लिए तैयार है।बिजली उत्पादन के लिए कोयला जलाना भले ही बुरा हो, लेकिन इसे गैस में बदलना कहीं कम बुरा है। सल्फर, जो एक महत्त्वपूर्ण उप-उत्पाद है, उद्योग और उर्वरकों दोनों के लिए बड़ी मांग रखता है। यह भी एक ऐसा रसायन है जिसके लिए हम आयात पर निर्भर हैं। मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं के पास राजनीतिक शक्ति होती है और इसलिए हम ईंधन, एलपीजी, डीजल, पेट्रोल की उपलब्धता या कीमतों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। उर्वरक की कमी इससे भी बड़ा खतरा है क्योंकि यह हमारी खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है। बस इतना है कि हमारे टीवी चैनल किसानों को लेकर उत्तेजित नहीं होते। खरीफ का मौसम आने वाला है। युद्ध से पहले ही अधिशेष उत्पादन करने वाले राज्यों ने (मुख्यत: आयातित) यूरिया और डाइअमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की राशनिंग शुरू कर दी थी। इन उर्वरकों का उत्पादन करने के लिए गैस और अमोनिया की भारी मात्रा की आवश्यकता होती है। वास्तव में, भारत द्वारा उत्पादित या आयातित प्राकृतिक गैस का 30 फीसदी उर्वरक संयंत्रों में जाता है। अब, झटका देने के लिए, मैं आपको चीन की कहानी बताता हूं। चीन अपने 90 फीसदी से अधिक अमोनिया का उत्पादन कोयला गैसीकरण से करता है। अमोनिया डीएपी के लिए आवश्यक है। भारत इसका अधिकांश आयात करता है और कमी इतनी गंभीर है कि हताश किसानों द्वारा दंगे या लूटपाट को रोकने के लिए कई राज्य अपनी आपूर्ति पुलिस थानों में रखते हैं और किसानों को उनकी जमीन और आधार-आधारित पंजीकरण के आधार पर आवंटित करते हैं। अब ध्यान दीजिए। चीन कोयले से प्राप्त सिंथेटिक गैस का उपयोग करके दुनिया के कुल यूरिया का 40 फीसदी उत्पादन करता है। यह दुनिया के कुल मेथनॉल का 54 फीसदी भी बनाता है, जिसमें से लगभग 70 फीसदी कोयले से आता है। और हम अपने उर्वरकों के लिए सबसे अधिक आयात-निर्भर हैं। यहां तक कि चीन जब चाहे इस लीवर को खींच सकता है और हमें परेशानी में डाल सकता है। हम खाद्यान्न आत्मनिर्भरता का जश्न मनाते हैं। सच तो यह है कि हम अपने राष्ट्रीय शर्म को छिपाते हैं। खाद के आयात पर हमारी अतिनिर्भरता जहाज से थाली तक वाली हमारी हैसियत को उजागर करती है। खाड़ी में चल रहे युद्ध ने हमारी इन कमजोरियों से हमारा सामना कर दिया है। चीन ने हमें राह दिखाई है कि दरअसल हमें करना क्या है। 

अब रूस करेगा भारत में कच्चे तेल की कमी की भरपाई
Published / 2026-04-03 21:26:15
अब रूस करेगा भारत में कच्चे तेल की कमी की भरपाई

रूस ने भारत को कच्चा तेल, एलएनजी की आपूर्ति बढ़ाने की पेशकश की एबीएन सेंट्रल डेस्क। रूस ने पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता के बीच भारत को कच्चे तेल एवं प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बढ़ाने की पेशकश की है। इसके अलावा दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने पर भी सहमति जतायी है। घटनाक्रम से परिचित सूत्रों ने कहा कि रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव ने बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बैठकों में ऊर्जा सहयोग पर विशेष रूप से चर्चा की। मंतुरोव ने इसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से भी मुलाकात की। बृहस्पतिवार शाम वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी मिले। रूस की तरफ से जारी बयान के मुताबिक, नई दिल्ली में हुई इन बैठकों में तेल एवं गैस क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग पर विशेष ध्यान दिया गया। बयान में कहा गया, डेनिस मंतुरोव ने पुष्टि की कि रूसी कंपनियों के पास भारतीय बाजार को तेल एवं तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति लगातार बढ़ाने की क्षमता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान युद्ध के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल एवं गैस की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण पश्चिम एशिया संकट वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव डाल रहा है। जलडमरूमध्य के रास्ते आवागमन लगभग अवरुद्ध हो जाने के बाद वैश्विक तेल और गैस कीमतों में तेज वृद्धि हुई है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी के परिवहन को संभालता है। पश्चिम एशिया भारत के लिए भी ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत रहा है। दोनों देशों के बीच भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की बैठक में भी द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। इस बैठक की सह अध्यक्षता मंतुरोव और जयशंकर ने की। रूस के बयान के अनुसार, परस्पर लाभकारी व्यापार, निवेश एवं औद्योगिक सहयोग का विस्तार बैठक के प्रमुख एजेंडा में शामिल था। मंतुरोव ने कहा कि 2025 के अंत तक रूस ने भारत को उर्वरकों की आपूर्ति में 40 प्रतिशत वृद्धि की है और वह आगे भी भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने व्यापार, उद्योग, ऊर्जा, उर्वरक, संपर्क एवं परिवहन के अलावा प्रौद्योगिकी, नवाचार तथा महत्वपूर्ण खनिजों में नये अवसरों पर भी व्यापक चर्चा की। दोनों पक्षों ने पिछले वर्ष दिसंबर में आयोजित 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान लिए गए विभिन्न निर्णयों के क्रियान्वयन की भी समीक्षा की। उस शिखर सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आए थे। प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन के बीच हुई वार्ता के बाद दोनों देशों ने मजबूत आर्थिक साझेदारी के लिए पांच वर्षीय खाका जारी किया था और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। विदेश मंत्रालय के अनुसार, जयशंकर और मंटुरोव ने पश्चिम एशिया संघर्ष सहित क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया। रूसी बयान में असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग का भी उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया कि रूस इस क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग को और गहरा करने की महत्वपूर्ण संभावनाएं देखता है।

नेपाल से इंडोनेशिया तक हिली धरती
Published / 2026-04-01 20:52:40
नेपाल से इंडोनेशिया तक हिली धरती

भूकंप के झटकों से दहले दोनों देशों के लोग एबीएन सेंट्रल डेस्क। नेपाल और इंडोनेशिया में बुधवार को भूकंप के झटके महसूस किये गये, जिससे लोगों में कुछ समय के लिए दहशत फैल गयी। हालांकि दोनों ही जगह किसी बड़े नुकसान की खबर सामने नहीं आयी है। नेपाल के कर्णाली प्रांत के मुगु जिले में तड़के 2:22 बजे भूकंप आया, जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 4.0 मापी गयी। भूकंप का केंद्र धैनाकोट क्षेत्र में था। इसके झटके हुम्ला, जुम्ला और कालिकोट जैसे आसपास के जिलों में भी महसूस किये गये। वहीं दूसरी ओर, इंडोनेशिया के सुलावेसी क्षेत्र में दोपहर 1:01 बजे के करीब 4.6 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। इसका केंद्र मियांगस के पास बताया गया है और इसकी गहराई लगभग 58 किलोमीटर थी, जिसे मध्यम गहराई का भूकंप माना जाता है। भूकंप की तीव्रता को लेकर अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में थोड़ा अंतर देखने को मिला। कुछ संस्थानों ने इसे 4.6 बताया, जबकि इसकी तीव्रता 3.3 दर्ज की। दोनों देशों में फिलहाल किसी बड़े जानमाल के नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन प्रशासन सतर्क है और स्थिति पर नजर रखे हुए है।

विश्व की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालता ईरान-इजराइल और अमेरिका युद्ध
Published / 2026-03-30 21:22:02
विश्व की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालता ईरान-इजराइल और अमेरिका युद्ध

ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध का दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर असर पश्चिम एशिया युद्ध के कारण होर्मुज और लाल सागर में व्यापार ठप होने से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच युद्ध को एक महीना पूरा हो चुका है। अभी तक इसके समाप्त होने के आसार नहीं नजर आते। दोनों पक्षों ने ऐसी शर्तें रखी हैं जिन्हें पूरा करना उन दोनों के लिए लगभग नामुमकिन ही है। अमेरिका की 15 बिंदुओं वाली योजना में ईरान से ऐसी गारंटी मांगी गयी है जो उसे शत्रुतापूर्ण क्षेत्र में भविष्य के हमलों से बचाव करने में असमर्थ बना देगी। इसके जवाब में ईरान ने भी शर्तें रखीं, जैसे प्रतिबंध हटाना, नेतृत्व करने वालों की हत्याओं को रोकना और भविष्य में अमेरिकी आक्रामकता के खिलाफ गारंटी देना। पाकिस्तान, मिस्र, तुर्किये और सऊदी अरब द्वारा समझौता कराने के प्रयासों के बावजूद दोनों पक्षों का अड़ियल रवैया वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी आर्थिक बोझ डालने वाला है। पहले से ही एशियाई देश, जो पश्चिम एशियाई जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर हैं, मुद्रास्फीति के प्रभाव और ईंधन की कमी से उत्पन्न कठिनाइयों को नियंत्रित करने के लिए जूझ रहे हैं, जिसका उनकी अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्त पर दीर्घकालिक प्रतिकूल असर पड़ेगा। उदाहरण के लिए, तेल विपणन कंपनियों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को 10 रुपये प्रति लीटर कम करना, भारतीय सरकारी राजस्व को वार्षिक आधार पर 1.2 लाख करोड़ रुपये से 1.7 लाख करोड़ रुपये तक घटा सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए और अधिक कठिनाई सामने है, क्योंकि प्रतिशोधी हमलों की दोबारा शुरूआत और यमन के हूतियों द्वारा इजरायल के खिलाफ अप्रत्याशित आक्रामकता ने एक नया मोर्चा खोल दिया है। यह नया मोर्चा स्वेज नहर और लाल सागर होकर चलने वाले एक अन्य प्रमुख वैश्विक व्यापार मार्ग को खतरे में डाल सकता है। होर्मुज स्ट्रेट से समुद्री तेल और गैस व्यापार का एक चौथाई हिस्सा होता है और यह पश्चिम एशियाई जीवाश्म ईंधन उत्पादकों का मुख्य मार्ग है। अब तक ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट में खनन और नाकेबंदी ने तेल की कीमतों को 73 डॉलर प्रति बैरल (बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड) से बढ़ाकर 110-119 डॉलर तक पहुंचा दिया है, साथ ही इसकी भारी कमी भी पैदा की है। पूर्वी एशिया पर इसका विशेष रूप से गंभीर असर पड़ा है क्योंकि 80 से 90 फीसदी कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से आते हैं।सऊदी अरब ने नाकेबंदी का सामना करने के लिए अपने पूर्व-पश्चिम स्थलीय पाइपलाइन से लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक तेल प्रवाह बढ़ाने की कोशिश की, जिससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हुआ। लेकिन अब वह मार्ग भी खतरे में है। स्वेज नहर/लाल सागर दुनिया के कंटेनर यातायात का एक-तिहाई हिस्सा संभालता है, और दुनिया पहले ही 2023 और 2024 में हूती व्यवधानों का असर देख चुकी है। जहाजों को अफ्रीका के पश्चिमी तट से नीचे और केप आफ गुड होप के चारों ओर लंबा मार्ग लेना पड़ा, जिससे शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम सहित, तेजी से बढ़ गई और वैश्विक मुद्रास्फीति दबाव तथा आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और गहरा गया। यह लगातार स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की प्रतिक्रियाओं और क्षमताओं का गंभीर रूप से गलत आकलन किया है। ईरान के राजनीतिक और सुरक्षा नेतृत्व की हत्या ने भी उसे आत्मसमर्पण करने के लिए प्रेरित नहीं किया। इसके विपरीत, उसने बार-बार अपने विरोधियों को चकमा देने वाले विभिन्न हथियारों का इस्तेमाल किया है। दुनिया के सबसे उन्नत हथियारों से एक महीने तक ईरान पर हमले करने के बावजूद, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का अनुमान है कि उसके मिसाइल भंडार और ड्रोन क्षमता का केवल लगभग एक-तिहाई ही नष्ट हुआ है। बाकी की स्थिति को लेकर वे अनिश्चित हैं। एक ऐसा देश जिसने ठीक इसी परिस्थिति के लिए योजना बनायी है और जिसे लंबे युद्ध और कठिनाइयों का अनुभव है, उसके लिए लंबा, असमान और थकाऊ युद्ध कोई नुकसान नहीं माना जाता। लेकिन अमेरिका और इजरायल के लिए सम्मानजनक निकास का रास्ता न मिलने से पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की संभावना लगातार दूर होती जा रही है।

क्या सचमुच नॉर्मल हो रहे हैं ट्रंप!
Published / 2026-03-23 23:33:33
क्या सचमुच नॉर्मल हो रहे हैं ट्रंप!

क्या सचमुच नॉर्मल हो रहे हैं ट्रंप!ट्रंप की एक पोस्ट और पलट गयी यूएस बाजार की तस्वीरक्या भारतीय बाजार में सोमवार को होगी तेज शुरुआतएबीएन सेंट्रल डेस्क। तीन हफ्ते की तबाही के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथसोशल अकाउंट पर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान को कम करने के संकेत दिये हैं। बस इतना ही काफी था और अमेरिकी शेयर बाजार के बेंचमार्क इंडेक्स के मार्केट कैपिटलाइजेशन में लगभग 900 बिलियन डॉलर की वृद्धि हुई। ग्लोबल बाजारों में भी हलचल मच गयी। अब भारतीय बाजार के एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोमवार को एशियाई और भारतीय बाजार फ्लैट से गैप-अप ओपनिंग दे सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राहत टिकाऊ है या फिर ट्रंप का एक और व-टर्न बाजार को वापस पटखनी दे देगा?

दावों के बीच बढ़ती ही जा रही खाड़ी देशों की जंग
Published / 2026-03-21 21:04:34
दावों के बीच बढ़ती ही जा रही खाड़ी देशों की जंग

ईरान के नतांज परमाणु केंद्र पर फिर बड़ा हमला, मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर नतांज परमाणु केंद्र शुरू से ही ईरान के दुश्मनों के निशाने पर रहा है। युद्ध के पहले हफ्ते में भी यहां हमला हुआ था, जिसमें कई इमारतों को नुकसान पहुंचा था एबीएन सेंट्रल डेस्क। मध्य पूर्व में चल रही जंग अब अपने चौथे हफ्ते में पहुंच चुकी है और हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। शनिवार को ईरान के सबसे अहम परमाणु संवर्धन केंद्र नतांज पर एक बार फिर हवाई हमला किया गया। इस हमले की पुष्टि ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी मिजान ने की है। एजेंसी के मुताबिक, राहत की बात यह है कि इस हमले के बाद किसी भी तरह के रेडिएशन (विकिरण) के रिसाव की कोई खबर नहीं है। नतांज परमाणु केंद्र शुरू से ही ईरान के दुश्मनों के निशाने पर रहा है। युद्ध के पहले हफ्ते में भी यहां हमला हुआ था, जिसमें कई इमारतों को नुकसान पहुंचा था। तब संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था ने कहा था कि रेडियोलॉजिकल खतरों की आशंका नहीं है। बता दें कि तेहरान से लगभग 220 किलोमीटर दूर स्थित यह वही जगह है जिसे जून 2025 में ईरान और इजरायल के बीच हुए 12 दिनों के युद्ध के दौरान भी इजरायली और अमेरिकी हमलों का सामना करना पड़ा था। ट्रंप के विरोधाभासी दावे और सैन्य घेराबंदी एक तरफ जहां युद्ध के मैदान में बारूद बरस रहा है, वहीं अमेरिका से मिल रहे संदेशों ने दुनिया को उलझन में डाल दिया है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि अमेरिका अपने लक्ष्यों को पूरा करने के करीब है और वह मध्य पूर्व में सैन्य अभियानों को समेटने (वाइंडिंग डाउन) पर विचार कर रहे हैं। लेकिन जमीन पर हकीकत ट्रंप के दावों के उलट नजर आ रही है। अमेरिका एक तरफ कह रहा है कि वो मध्य पूर्व में अपने सैन्य अभियान कम करने पर सोच रहा है, लेकिन दूसरी तरफ वहां अपनी ताकत लगातार बढ़ा भी रहा है।खबरों के मुताबिक, अमेरिका तीन नए युद्धपोत और करीब 2,500 अतिरिक्त मरीन सैनिक इलाके में भेज रहा है। इससे पहले भी इतनी ही संख्या में सैनिक प्रशांत क्षेत्र से यहां लाये जा चुके हैं, जिससे अब मध्य पूर्व में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 50,000 से ज्यादा हो गयी है। इसके साथ ही, ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस से इस युद्ध के लिए 200 अरब डॉलर का अतिरिक्त बजट भी मांगा है। इससे साफ है कि फिलहाल यह लड़ाई जल्दी खत्म होती नहीं दिख रही। दुनिया भर के पर्यटन स्थलों पर हमले की धमकी ईरान ने अब इस लड़ाई को मध्य पूर्व से बाहर ले जाने के संकेत दिए हैं। ईरान के सैन्य प्रवक्ता जनरल अबुल फजल शेकरची ने चेतावनी दी है कि अब दुनिया भर में ईरान के दुश्मनों के लिए पार्क, पिकनिक स्पॉट और पर्यटन स्थल सुरक्षित नहीं रहेंगे। इस धमकी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है कि ईरान अब दबाव बनाने के लिए विदेशों में उग्रवादी हमलों का सहारा ले सकता है। ईरान के भीतर की स्थिति भी काफी धुंधली है।सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई ने नौरोज (फारसी नववर्ष) के मौके पर एक लिखित संदेश जारी कर जनता के साहस की तारीफ की, लेकिन वे खुद लंबे समय से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिये हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की इजरायली हमले में मौत के बाद वे खुद भी घायल हुए थे। ईरान में भारी सेंसरशिप की वजह से यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि वहां के परमाणु और सैन्य ठिकानों को असल में कितना नुकसान हुआ है और सत्ता की कमान इस वक्त किसके हाथ में है। महंगे तेल का संकट और पाबंदियों में ढील तीन हफ्तों से चल रही इस जंग ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमतें जो युद्ध से पहले 70 डॉलर प्रति बैरल थीं, अब 106 डॉलर के पार पहुंच गयी हैं। अमेरिका में शेयर बाजार गोता लगा रहे हैं और महंगाई आसमान छू रही है। इसी दबाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए उन ईरानी तेल जहाजों से प्रतिबंध हटा लिये हैं, जिन पर शुक्रवार तक तेल लोड हो चुका था। यह छूट 19 अप्रैल तक रहेगी। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इस कदम से तेल की सप्लाई में कोई खास बढ़ोतरी नहीं होगी क्योंकि ईरान पहले से ही चोरी-छिपे तेल बेचता रहा है। इससे पहले अमेरिका ने रूस के तेल पर भी इसी तरह की अस्थायी छूट दी थी, जिसकी काफी आलोचना हुई थी। फिलहाल, युद्ध का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं है; सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों पर भी लगातार ड्रोन हमले हो रहे हैं, जिससे पूरी दुनिया में ईंधन और खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ रहे हैं। लेबनान में भी इजरायली हमले जारी हैं, जहां अब तक 1,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।

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