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क्रिप्टोकरेंसी को लेकर काफी अटकलें चल रही हैं, जो ठीक बात नहीं हैं: सीतारमण
Published / 2021-12-05 13:58:47
क्रिप्टोकरेंसी को लेकर काफी अटकलें चल रही हैं, जो ठीक बात नहीं हैं: सीतारमण

एबीएन बिजनेस डेस्क। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को कहा कि क्रिप्टोकरेंसी पर कई तरह की अटकलें चल रही हैं और ये अटकलें अच्छी बात नहीं हैं। सरकार द्वारा क्रिप्टोकरेंसी के विनिमयन की तैयारियों के बीच उनका यह बयान आया है। सीतारमण ने एचटी लीडरशिप समिट को संबोधित करते हुए कहा कि अच्छी तरह से विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया विधेयक मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद निश्चित रूप से संसद में आने जा रहा है। एक सवाल के जवाब में वित्त मंत्री ने कहा, बहुत सारी अटकलें चल रही हैं ये बिल्कुल ठीक बात नहीं हैं। क्रिप्टोकरेंसी एवं आधिकारिक डिजिटल मुद्रा का नियमन विधेयक, 2021 को लोकसभा के बुलेटिन-भाग दो में शामिल किया गया है। इसे शीतकालीन सत्र में ही पेश किया जाएगा। बुलेटिन में कहा गया है कि यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी की जाने वाली आधिकारिक डिजिटल मुद्रा के लिए एक सुविधाजनक रूपरेखा तैयार करने से संबंधित है। इसमें देश में सभी निजी क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध का प्रावधान भी है। हालांकि, यह क्रिप्टोकरेंसी में अंतर्निहित तकनीक को बढ़ावा देने और उसके इस्तेमाल के लिए कुछ अपवादों की अनुमति देता है। इस सप्ताह की शुरुआत में राज्यसभा में सीतारमण ने कहा था कि नए विधेयक में वर्चुअल मुद्रा के क्षेत्र में आ रहे बदलावों का ध्यान रखा जाएगा और इसमें पुराने विधेयक की उन चीजों को भी शामिल किया जाएगा जिन्हें पहले नहीं लिया जा सका था। यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार का मीडिया में भ्रामक विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है, उन्होंने कहा कि भारतीय विज्ञापन मानक परिषद के दिशानिर्देशों का अध्ययन किया जा रहा है और उनके नियमनों पर भी गौर किया जा रहा है, ताकि हम जरूरत पड़ने पर किसी तरह का रुख अपना सकें या कोई फैसला ले सकें। उन्होंने कहा कि सरकार और रिजर्व बैंक लोगों को क्रिप्टोकरेंसी से आगाह कर रहे हैं। यह काफी ऊंचे जोखिम वाला क्षेत्र है। आर्थिक मोर्चे पर सीतारमण ने कहा कि इस साल देश के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर का आंकड़ा काफी उत्साहजनक रहेगा। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। खाद्य मुद्रास्फीति पर उन्होंने कहा कि देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ की वजह से आपूर्ति में अड़चनें आ रही हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि जनवरी में उन उत्पादों के दाम नीचे आएंगे जिनकी आपूर्ति अभी कम है। खाद्य तेल के बारे में सीतारमण ने कहा कि और आयात की अनुमति दी गई जिससे कीमतों को नीचे लाने में मदद मिलेगी।

बजट में विदेशी बैंकों को मिल सकती है राहत, 15% तक घटा सकती है टैक्स
Published / 2021-12-04 13:21:56
बजट में विदेशी बैंकों को मिल सकती है राहत, 15% तक घटा सकती है टैक्स

एबीएन बिजनेस डेस्क। केंद्र सरकार भारतीय विदेशी बैंकों की स्थानीय शाखाओं को बैंकों के समान कर की पेशकश के प्रस्ताव पर विचार कर सकती है, जिससे उनके लिए कर की दर लगभग 15 फीसदी अंक घटकर 22 फीसदी रह जाएगी। लाइवमिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, दो सरकारी अधिकारियों ने यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक अधिकारी ने कहा, हम इस मुद्दे पर विचार कर रहे हैं। आगामी बजट में इससे संबंधित एक घोषणा हो सकती है। वित्त मंत्रालय कुछ विदेशी लेंडर्स द्वारा दिए गए एक प्रस्तुतीकरण पर विचार कर रहा है। विदेशी बैंक, घरेलू लेंडर्स की तुलना में खासा ज्यादा कर देते हैं क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में कॉरपोरेट टैक्स की दर में की गई कटौती उन पर लागू नहीं होती है। भले ही, यदि वे अपने आॅपरेशन को सब्सिडियरीज में बदल दें तो उन पर कम कर लग सकता है लेकिन इससे जुड़ी जटिलताओं और नियामकीय चुनौतियों को देखते हुए कुछ ने ही यह विकल्प चुना है। बैंकों ने सरकार से उनके साथ भारतीय बैंकों के समान व्यवहार करने के लिए कहा है, क्योंकि उन पर समान नियम और मानदंड लागू होते हैं। साथ ही वे लाभ और कर योग्य आय की गणना के लिए समान तरीका ही उपयोग करते हैं। इस घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने कहा, भले ही घरेलू बैंकों ने कर कानूनों के तहत 22 फीसदी (सरचार्ज और सेस अतिरिक्त) के कम दर वाले विकल्प को चुना है, लेकिन विदेशी कंपनियों को यह विकल्प उपलब्ध नहीं है। इससे खासी असमानता की स्थिति पैदा हो गई है। विदेशी बैंकों की शाखाओं पर कर की 40 प्रतिशत की मूल दर के अलावा सरचार्ज और सेस भी लिया जाता है।

दूसरी तिमाही में जीडीपी 8.4 फीसदी रही, आठ कोर सेक्टर में विकास दर बढ़ी
Published / 2021-11-30 14:52:06
दूसरी तिमाही में जीडीपी 8.4 फीसदी रही, आठ कोर सेक्टर में विकास दर बढ़ी

एबीएन डेस्क। सरकार की ओर से दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े जारी कर दिए गए हैं। इनके मुताबिक, जुलाई सितंबर तिमाही की विकास दर में बढ़ोतरी देखने को मिली है। आंकड़ों के अनुसार, दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी 8.4 फीसदी की दर से बढ़ी है। कोर सेक्टर की अगर बात करें तो आठ कोर सेक्टर में विकास दर में इजाफा हुआ है। इनकी विकास दर अक्तूबर में 7.5 फीसदी की गति से आगे बढ़ी है। बीते वित्त वर्ष -7.4 फीसदी रही थी जीडीपी ग्रोथ : सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा मंगलवार को जारी किए गए आंकड़ों को देखें तो जीडीपी ग्रोथ में एक फीसदी का इजाफा हुआ है। वित्त वर्ष 2020-21 की जुलाई-सितंबर तिमाही में देश की जीडीपी -7.4 फीसदी रही थी। इससे पहले जून तिमाही में भारत की जीडीपी सबसे तेज दर के साथ बढ़ी थी। इस दौरान जीडीपी की 20.1 फीसदी की दर से बढ़ी थी। राजकोषीय घाटा लक्ष्य का 36.3 फीसदी रहा : अप्रैल-अक्तूबर के दौरान राजकोषीय घाटा पूरे साल के लक्ष्य के 36.3 फीसदी पर रहा है। कुल टैक्स रिसिप्ट 10.53 लाख करोड़ रुपये रहा है, जबकि कुल खर्च 18.27 लाख करोड़ रुपये रहा है। बता दें कि सरकार ने इस साल राजकोषीय घाटा 6.8 फीसदी पर रहने का अनुमान लगाया था।

इतिहास का दोहराव है पेटीएम की विफलता : देवाशीष बसु
Published / 2021-11-29 17:29:50
इतिहास का दोहराव है पेटीएम की विफलता : देवाशीष बसु

एबीएन डेस्क। गत शुक्रवार को पेटीएम ने एक ऐसा इतिहास रचा जिसे वह शायद ही याद रखना चाहे। भारतीय शेयर बाजारों की सबसे बड़ी प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) जिसका मूल्य 2,150 रुपये प्रति शेयर निर्धारित किया गया था, उसकी शुरुआत 9 फीसदी गिरावट के साथ हुई और उसमें आगे चलकर और गिरावट आई। सुबह करीब 11 बजे जोर पकडऩे की नाकाम कोशिश के बाद शेयर बिकवाली के भारी दबाव में आ गया और दिन का अंत लोअर सर्किट लगने के साथ हुआ क्योंकि उसकी कीमत 27.6 फीसदी गिर चुकी थी। तत्काल बाद एक विदेशी ब्रोकरेज फर्म ने 1,200 रुपये की लक्षित कीमत तय की जो पेटीएम की इश्यू कीमत से 44 फीसदी नीचे थी। उसने कहा कि यह कारोबार नकदी की खपत करने वाला है और यह मुनाफा नहीं दे सकता। इसके बावजूद पेटीएम के मुख्य वित्तीय अधिकारी ने दावा किया, हम आईपीओ की कीमत और अधिक रख सकते थे लेकिन हमने ऐसा नहीं करने का निर्णय लिया। हम निवेशकों के लिए मूल्य छोड़ना चाहते थे। भारतीय आईपीओ बाजार में अब तक तेजी का दौर रहा है। वर्ष 2021 के शुरुआती नौ महीनों में भारतीय कंपनियों ने आईपीओ के माध्यम से 74,000 करोड़ रुपये की राशि जुटाई है। बीते दो दशक में यह जनवरी-अक्टूबर में आईपीओ से आई अधिकतम राशि है। संभव है इस वर्ष का अंत आईपीओ के माध्यम से एक लाख करोड़ रुपये जुटा कर हो। इसके बावजूद चार में से तीन बड़े आईपीओ घाटे में चल रही उपभोक्ता टेक कंपनियों के हैं: पेटीएम (18,300 करोड़ रुपये), जोमैटो (9,375 करोड़ रुपये) और पीबी फिनटेक या पॉलिसी बाजार (6,273 करोड़ रुपये)। इन सभी ने आईपीओ के पहले बाजार व्यय कम करने की रणनीति अपनाई ताकि घाटे को कम करके दिखाया जा सके और मुनाफा दर्शाया जा सके। बीते तीन दशक में आईपीओ को लेकर जो बावलापन रहा है उसके साक्षी रहे लोगों के ऐसे दृश्य नए नहीं हैं। मैंने अपनी पुस्तक फेस वैल्यू में ऐसे दो अवसरों का दस्तावेजीकरण किया है। पहला था सन 1993-95 का दौर जब इस बात पर लगभग सहमति बन चुकी थी कि भारत एशिया के अन्य देशों को पीछे छोड़ देगा। सन 1994 में 7.4 फीसदी की गति से विकसित होने के बाद अनुमान जताया जा रहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था आगे 9 फीसदी की दर से विकसित होगी। कंपनियों ने इस महत्त्वाकांक्षी वृद्धि अनुमान को देखते हुए जमकर पूंजी जुटाना शुरू कर दिया। सरकार ने भारतीय कंपनियों को विदेशों से पूंजी जुटाने की अनुमति दे दी। जल्दी ही विदेशी निवेश बैंकर उन कंपनियों को तलाशने लगे जिनके बहीखाते मजबूत हों और जिन पर विदेशों में फंड जुटाने के लिए दबाव बनाया जा सके। इस प्रक्रिया में कंपनियों को वह मान और प्रतिष्ठा मिली जो उन्हें घरेलू बाजार में नहीं मिल पा रही थी। कोर पैरेंटल्स, गार्डन सिल्क मिल्स और फ्लेक्स इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियां जिन्हें भारत में भाव नहीं मिल रहा था वे लंदन जैसी जगहों पर पसंदीदा बन गई थीं। इस तेजी के आखिर तक घरेलू आईपीओ बाजार आसमान छूने लगा। जनवरी 1995 में 145 शेयर सबस्क्रिप्शन के लिए खुले। रिलायंस कैपिटल, एस्सार ऑयल, जिंदल विजयनगर, एमएस शूज और अन्य बड़े शेयर उस वर्ष के शुरुआती दो महीनों में बाजार में पेश किए गए। फरवरी 1995 में एक महीने में 78 कंपनियां सार्वजनिक हुईं और उस वित्त वर्ष में 1,400 आईपीओ आए। आपको सन 1994-95 का प्रहसन तब समझ आएगा जब आप देखेंगे कि सन 1998 से 2001 के बीच केवल 219 कंपनियों ने सार्वजनिक पूंजी जुटाई। सन 1993 के बाद से वित्तीय तेजी को समर्थन देने वाला कोई गंभीर सुधार नहीं हुआ। उस वक्त भी मैंने इस अखबार के अंग्रेजी संस्करण में लिखा था, कॉर्पोरेट क्षेत्र मौजूदा अपूर्ण व्यवस्था को लेकर आश्वस्त है: इसमें जितनी आसानी से सार्वजनिक पेशकश की जा सकती है और जवाबदेही की बहुत कमी है। इससे समझा जा सकता है कि छोटी-बड़ी कंपनियों में बाजार में प्रवेश को लेकर इतनी हड़बड़ी क्यों है। कल के विजेता इनके बीच से नहीं होंगे...बाजार मूल्य हमेशा प्रदर्शन की भरपाई नहीं करेगा। चुनाव पास आने पर रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दर बढ़ानी शुरू की। सन 1995 के आखिर तक उच्च ब्याज दर के कारण उद्योग परेशान होने लगा, सन 1995 के बाद से भारतीय शेयरों में गिरावट आने लगी। बाजार में अगली बड़ी तेजी सन 1999 के आखिर से 2000 तक रही। इस दौरान पुरानी कंपनियों के शेयर पिछड़े और नई अर्थव्यवस्था के शेयर मसलन इंटरनेट, सॉफ्टवेयर और मनोरंजन कंपनियों के शेयर नई ऊंचाइयों पर पहुंचने लगे। उस वक्त आईपीओ की तेजी नहीं थी बल्कि बड़े पैमाने पर नए फंडों की पेशकश की जा रही थी। इक्विटी म्युचुअल फंडों में तकनीक आधारित फंडों से धन जुटाने की होड़ लगी थी। इन फंडों के बड़े सबस्क्रिप्शन और विप्रो तथा इन्फोसिस जैसी कंपनियों के अमेरिकी बाजार में सूचीबद्धता के साथ 2000 के दशक के शुरुआती दौर का अंत हुआ। अगली तेजी अप्रैल 2003 में आई और 2008 के आरंभ तक चली। 11 फरवरी, 2008 भारतीय शेयर बाजारों के लिए एक अन्य ऐतिहासिक दिन रहा। उस दिन रिलायंस पावर ने अपने मेगा आईपीओ के जरिये 11,563 करोड़ रुपये जुटाए और जबरदस्त ढंग से सूचीबद्ध हुई। इस आईपीओ ने 7 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जुटाई और इसका इश्यू 72 गुना सबस्क्राइब हुआ। हर किसी में इसे खरीदने की होड़ लगी थी। खुदरा निवेशकों के लिए इसकी कीमत 430 रुपये और गैर खुदरा निवेशकों के लिए 450 रुपये रखी गई थी। सूचीबद्धता पर आरपावर के शेयर बढ़कर 538 रुपये तक पहुंचे लेकिन चार मिनट के भीतर वे औंधे मुंह गिरे और 333 रुपये पर आ गए। आखिरकार वे 372.50 रुपये प्रति शेयर पर बंद हुए। इसके बाद यह शेयर कभी अपने जारी मूल्य तक नहीं पहुंचा और आज इसकी कीमत 13.50 रुपये है। पेटीएम का उदाहरण लेते हुए देखें तो बाजार में अतिरंजना के सभी तत्त्व साफ नजर आते हैं: एक लंबा तेजी भरा बाजार और अत्यधिक सफल आईपीओ जिन्होंने निवेशकों में आश्वस्ति का भाव पैदा किया, घाटे में चल रही लेकिन अहंकार से भरी कंपनी ने भारी भरकम आईपीओ बहुत अधिक दाम पर पेश किया, ऐसी ही कई अन्य कंपनियां फंड जुटाने के लिए कतार में लगी हुई हैं और बाहरी माहौल की बात करें तो मुद्रास्फीति अधिक है और दुनिया भर में कीमतों में इजाफा संभावित है। पेटीएम की असफलता अगर तेजी के दौर का अंत नहीं करती तो भी बेलगाम आईपीओ बाजार में कुछ समझदारी आएगी। (लेखक डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं।)

...फिर आयेंगे अच्छे दिन, सस्ता होगा पेट्रोल-डीजल!
Published / 2021-11-27 13:23:17
...फिर आयेंगे अच्छे दिन, सस्ता होगा पेट्रोल-डीजल!

एबीएन सेंट्रल डेस्क। महंगाई की मार से जूझ रही आम जनता को जल्द ही खुशखबरी मिल सकती हैं। केंद्र सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम में एक बार फिर से कमी कर सकती हैं। पिछले 2 दिन में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 20 प्रतिशत की कमी आई हैं और कच्चा तेल सस्ता होने से तेल कंपनियों की लागत कम हो गई है। सरकार इसका फायदा आम जनता को पहुंचाने के लिए पैट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कमी कर सकती है। इस महीनें 6 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई थी। लेकिन शुक्रवार को बाजार में आई भारी गिरावट के बाद कच्चे तेल की कीमतें 68 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं और इनमें 20 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी हैं। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सबसे बड़ा कारण दक्षिण अप्रीका में मिला कोरोना का नया वेरिएंट हैं। इस वेरिएंट की खबर आने के बाद कई देशों ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रोक दी हैं जिससे कच्चे तेल की खपत पर असर पड़ेगा। लिहाजा कीमतों में गिरावट देखी जा रही हैं। इससे पहले कच्चे तेल की कीमतों पर काबू पाने के लिए भारत-अमेरिका और चीन सहित कुछ देशों ने अपने रिजर्व आॅयल भंडार से तेल रिलीज करने का फैसला किया था, इससे भी कच्चे तेल की कीमतों में दबाव आया है। मोदी सरकार ने इसी महीनें 4 नवंबर को पैट्रोल पर 5 रुपये और डीजल पर 10 प्रति लीटर एक्साइज की कटौती की थी। जिससे पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगी थी अब महंगाई पर काबू पाने के लिए सरकार एक बार फिर से पैट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी कर सकती हैं।

कोरोना के खौफ से दुनिया भर के बाजार लुढ़के, सेंसेक्स 1300 अंक गिरा
Published / 2021-11-26 06:28:06
कोरोना के खौफ से दुनिया भर के बाजार लुढ़के, सेंसेक्स 1300 अंक गिरा

एबीएन सेंट्रल डेस्क। कोरोना के खौफ से दुनिया भर के बाजारों में कोहराम मचा हुआ है। शेयर बाजारों की शुरुआत शुक्रवार को काफी कमजोर हुई। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 705.93 गिरकर 58,089.16 पर आया और वहीं निफ्टी 230.40 अंक गिरकर 17,305.85 पर आया। बता दें कि दुनिया के कई हिस्सों में कोरोना का फिर से बढ़ता प्रकोप है जिसका असर शेयर बाज़ार में देखने को मिला, इसलिए दवा कंपनियों के शेयर ग्रीन जोन में रहे, जबकि ऑटो मोबाइल इंडस्ट्री के शेयरों में बड़ी गिरावट जारी है। शुरुआती कारोबार के दौरान Sensex में जोरदार गिरावट दर्ज की गई। बता दें कि सुबह 10 बजकर 01 मिनट पर सेंसेक्स 1039.29 अंक यानी 1.77 फीसदी की गिरावट के साथ कारोबार कर रहा है।तो वहीं, सुबह 10.42 बजे तक सेंसेक्स 1328.69 अंक गिरकर 57,468.48 के स्तर पर पहुंच गया, वहीं, निफ्टी 395.80 अंक लुढ़ककर 17,140.45 पर पहुंच गया।

इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर नितिन गडकरी ने किया ये बड़ा ऐलान
Published / 2021-11-25 09:53:19
इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर नितिन गडकरी ने किया ये बड़ा ऐलान

एबीएन सेंट्रल डेस्क। पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती कीमतों के बीच देश भर में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की धूम है। वहीं इस बीच केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि अगले दो साल में इलेक्ट्रिक और पेट्रोल गाड़ियों की कीमत एक हो जाएगी। गडकरी ने कहा कि जल्द ही इस क्षेत्र में क्रांति आने वाली है। गडकरी ने इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स और FY21 एजीएम के सालाना सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि दो साल के अंदर, इलेक्ट्रिक व्हीकल की लागत उस स्तर पर आ जाएगी जो उनके पेट्रोल वेरिएंट के बराबर होगी। गडकरी ने आगे कहा कि हम 2023 तक प्रमुख राजमार्गों पर 600 ईवी चार्जिंग पॉइंट स्थापित कर रहे हैं। गडकरी ने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहनों पर जीएसटी केवल 5% है और लिथियम-आयन बैटरी की लागत भी घट रही है। गडकरी का मानना है कि सस्ती प्रति किलोमीटर लागत के कारण भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की काफी बिक्री होगी। गडकरी ने कहा कि पेट्रोल से चलने वाली कार की कीमत प्रति किलोमीटर 10 रुपए, डीजल की कीमत 7 रुपए प्रति किलोमीटर और बिजली की कीमत सिर्फ 1 रुपये प्रति किलोमीटर है।

पेटीएम का शेयर 13 प्रतिशत टूटा, 1,360 रुपये पर हुआ बंद
Published / 2021-11-23 15:00:31
पेटीएम का शेयर 13 प्रतिशत टूटा, 1,360 रुपये पर हुआ बंद

एबीएन बिजनेस डेस्क। पेटीएम का शेयर 13 फीसदी टूट गया और इस तरह से दो दिन की गिरावट 37 फीसदी पर पहुंच गई, जो इसे किसी देसी कंपनी व अहम वैश्विक तकनीकी कंपनी का एक्सचेंजों पर सबसे खराब आगाज में से एक करार देता है। अलीबाबा की एंट फाइनैंशियल और सॉफ्टबैंक समर्थित कंपनी का बाजार मूल्यांकन अब घटकर 12 अरब डॉलर (88,185 करोड़ रुपये) रह गया जबकि आईपीओ में उसे 18.7 अरब डॉलर (1.39 लाख करोड़ रुपये) का मूल्यांकन हासिल हुआ था। आगाज पर इस शेयर के अंजाम को देखते हुए सवाल उठता है कि आखिर कंपनी और उसके निवेश बैंकर 18,300 करोड़ रुपये के आईपीओ के लिए कंपनी के मूल्यांकन पर पहुंचे, जो देसी बाजार का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ है। पेटीएम का शेयर 1,271 रुपये तक टूटने के बाद अंत में यह 1,360 रुपये पर बंद हुआ, जो इश्यू प्राइस 2,150 रुपये से काफी नीचे है। कीमत में 37 फीसदी की गिरावट ब्लैकरॉक व कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड जैसे निवेशकों को झटका देगा, जिन्होंने आईपीओ के लिए बड़े चेक पर हस्ताक्षर किए हैं। यह करीब 10 लाख खुदरा निवेशकों को भी झटका देगा, जिन्होंने करीब 2,100 करोड़ रुपये के शेयर के लिए आवेदन किया। जियोजित फाइनैंशियल सर्विसेज के शोध प्रमुख विनोद नायर ने कहा, सूचीबद्धता पर सुस्ती और लगातार इस शेयर की हो रही कमजोर ट्रेडिंग देसी बाजार के लिए बड़ी अवधारणात्मक चोट है, जो मजबूत प्राथमिक बाजार पर सवार है। यह खुदरा श्रेणी से बाजार में निवेश पर असर डालेगा, जो साल के दौरान अहम किरदार रहे हैं। पेटीएम ने रविवार को अक्टूबर के प्रदर्शन के बारे में खुलासा किया। कंपनी का सकल मर्केंडाइज वैल्यू (जीएमवी) 2.31 गुना बढ़कर 83,200 करोड़ रुपये रहा। कर्ज वितरण 5 गुना से ज्यादा बढ़कर 627 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। साल दर साल के हिसाब से बढ़त हालांकि विश्लेषकों को उत्साहित नहीं कर पाया। मैक्वेरी के विश्लेषकों सुरेश गणपति और परम सुब्रमण्यन ने एक रिपोर्ट में कहा है, जहां जीएमवी सालाना आधार पर 112 प्रतिशत बढ़ी है, वहीं इस पर यूपीआई (हमारे अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 में 66 प्रतिशत) का दबदबा है, जिसमें पेटीएम जीरो-एमडीआर कमाती है। हमारा मानना है कि यूपीआई योगदान वित्त वर्ष 2026ई तक बढ़कर 85 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। इसलिए हमें मजबूत जीएमवी वृद्घि से मुनाफा और नुकसान के आंकड़े ज्यादा प्रभावित होने का अनुमान नहीं है। पेटीएम ने अपने आरएचपी में पहली तिमाही के दौरान 890 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया और हमने पेटीएम के लिए वित्त वर्ष 2022ई का राजस्व अनुमान 4,500 करोड़ रुपये पर बरकरार रखा है। इसके अलावा, हम अक्टूबर 2021 के आंकड़ों में भी बदलाव नहीं करेंगे, क्योंकि वे मजबूत त्योहारी बिक्री पर आधारित थे। एमडीआर मर्चेंट डिस्काउंट रेट है। यह ऐसा शुल्क है जो कंपनी भुगतान संबंधित ट्रांजेक्शन की प्रोसेसिंग के लिए वसूलती है। गुरुवार को पेटीएम की सूचीबद्धता से पहले, मैक्वायरी ने अंडरपरफॉर्म रेटिंग और 1200 रुपये के कीमत लक्ष्य के साथ इस शेयर पर कवरेज शुरू किया। मैक्वेरी के विश्लेषकों ने अपनी शुरूआती रिपोर्ट में कहा था, पेटीएम के मजबूत कैश-बर्निंग बिजनेस मॉडल को देखते हुए मुनाफे के लिए कोई स्पष्ट राह नहीं दिखने से व्यवसाय और कॉरपोरेट प्रशासन के लिए बड़े नियामकीय जोखिम पर विचार करते हुए हमारा मानना है कि कंपनी की वैल्यू 2,150 रुपये के कीमत दायरे के अपर ऐंड पर ज्यादा है। सोमवार को पेटीएम में करीब 3,700 करोड़ रुपये मूल्य के शेयरों में अदला-बदली हुई। सूचीबद्धता के दिन, इस शेयर में ट्रेडिंग कारोबार करीब 4,000 करोड़ रुपये था।

देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बड़ी गिरावट की ओर कदम बढ़ा रही भारत सरकार
Published / 2021-11-23 14:58:38
देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बड़ी गिरावट की ओर कदम बढ़ा रही भारत सरकार

एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें और नीचे आ सकती हैं। भारत कच्चे तेल की कीमतों में कमी लाने के लिए अपने रणनीतिक तेल भंडार से 50 लाख बैरल कच्चा तेल निकालने की योजना बना रहा है। इसके लिए अमेरिका, चीन, जापान से बातचीत करनी होगी। हफ्ते-दस दिन में यह प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। भारत के रणनीतिक भंडार से निकाले जाने वाले कच्चे तेल को मंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड को बेचा जाएगा। ये दोनों सरकारी तेल शोधन इकाइयां रणनीतिक तेल भंडार से पाइपलाइन के जरिये जुड़ी हुई हैं। इस अधिकारी ने कहा कि इस बारे में औपचारिक घोषणा जल्द ही की जाएगी। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर भारत अपने रणनीतिक भंडार से और कच्चे तेल की निकासी का भी फैसला ले सकता है। भारत ने कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में जारी तेजी के बीच अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर अपने आपातकालीन तेल भंडार से निकासी का मन बनाया है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने का आधार तैयार होगा। भारत ने अपने पश्चिमी एवं पूर्वी दोनों तटों पर रणनीतिक तेल भंडार बनाए हुए हैं। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और कर्नाटक के मंगलूरु एवं पदुर में ये भूमिगत तेल भंडार बनाए गए हैं। इनकी सम्मिलित भंडारण क्षमता करीब 3.8 करोड़ बैरल की है। भारत ने यह कदम तेल उत्पादक देशों की तरफ से कीमतों में कमी लाने के लिए उत्पादन बढ़ाने से इनकार करने के बाद उठाने का मन बनाया है। भारत दुनिया का तीसरा बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने पिछले हफ्ते दुबई में कहा था कि तेल कीमतें बढ़ने का असर वैश्विक आर्थिक पुनरुद्धार पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 78 डॉलर प्रति बैरल पर हैं। पिछले महीने यह 86 डॉलर प्रति बैरल से भी ज्यादा हो गया था लेकिन यूरोप के कुछ देशों में फिर से लॉकडाउन लगने और प्रमुख उपभोक्ता देशों के मिलकर सुरक्षित तेल जारी करने की धमकियों से इसमें गिरावट आई है।

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