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अब केवल एक्टिव सिम से ही चला सकेंगे व्हाट्सएप
Published / 2025-11-30 21:25:03
अब केवल एक्टिव सिम से ही चला सकेंगे व्हाट्सएप

सरकार का बड़ा फैसलाः अब बिना एक्टिव सिम के नहीं चला सकेंगे WhatsApp, Snapchat और अन्य ऐप्स, जानिए नए नियमएबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत सरकार ने लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्स—WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, ShareChat, JioChat, Arattai और Josh—के लिए बड़े बदलावों की घोषणा की है। दूरसंचार विभाग (DoT) ने आदेश जारी किया है कि अब कोई भी यूज़र सक्रिय SIM कार्ड के बिना इन सेवाओं का उपयोग नहीं कर सकेगा। यह प्रावधान टेलीकम्युनिकेशन Cybersecurity Amendment Rules 2025 के तहत लागू किया गया है, जिसमें पहली बार ऐप-आधारित मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म्स को टेलीकॉम सेवाओं की श्रेणी में रखा गया है।क्या बदला है?सरकार ने इन सभी ऐप्स को Telecommunication Identifier User Entities (TIUEs) की श्रेणी में शामिल किया है।ऐप्स को 90 दिनों के भीतर यह सुनिश्चित करना होगा कि यूज़र की SIM हमेशा उसके ऐप लॉगिन से जुड़ी रहे।वेब ब्राउज़र से लॉगिन करने वालों पर कड़े नियम लागू होंगे—वेब ऐप पर हर 6 घंटे में ऑटो-लॉगआउट अनिवार्य होगा।दोबारा लॉगिन करने के लिए यूज़र को फिर से QR कोड स्कैन करना होगा।सरकार का तर्क है कि इससे ऐसे अपराधियों पर रोक लगेगी जो निष्क्रिय या फर्जी SIM का उपयोग करके धोखाधड़ी और साइबर अपराध करते हैं।क्यों उठाया गया यह कदम?सरकार के अनुसार मौजूदा व्यवस्था में बड़ी खामी यह थी कि एक बार नंबर वेरिफाई होने के बाद मैसेजिंग ऐप्स SIM हट जाने या निष्क्रिय होने पर भी चलते रहते थे। COAI का कहना है कि इंस्टॉलेशन के समय सिर्फ एक बार SIM-बाइंडिंग होती है, लेकिन उसके बाद ऐप SIM की उपस्थिति की जांच नहीं करता।इस ढिलेपन का फायदा साइबर अपराधियों को मिलता था—वे SIM बदलकर या उसे डिसेबल कराकर भी ऐप्स का इस्तेमाल जारी रखते थे, जिससे कॉल रिकॉर्ड, लोकेशन लॉग या कैरियर डेटा के आधार पर उनकी ट्रेसिंग मुश्किल हो जाती थी।सरकार का दावा है कि लगातार SIM-बाइंडिंग से यूज़र, नंबर और डिवाइस के बीच संबंध मजबूत होगा, जिससे स्पैम, फ्रॉड और मैसेजिंग आधारित वित्तीय अपराधों पर प्रभावी रोक लगेगी। सरकार यह भी बताती है कि UPI और बैंकिंग ऐप्स में पहले से ही SIM वेरिफिकेशन अनिवार्य है। SEBI ने भी ट्रेडिंग अकाउंट्स के लिए SIM लिंकिंग और फेस रिकग्निशन का प्रस्ताव रखा था।विशेषज्ञों की मिली-जुली प्रतिक्रियाकुछ साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि SIM-बाइंडिंग से धोखाधड़ी रोकने और यूज़र की पहचान की पुष्टि करने में मदद मिलेगी।वहीं कई विशेषज्ञ इसे सीमित प्रभाव वाला कदम बताते हैं। उनका कहना है कि अपराधी फर्जी दस्तावेज़ों के जरिए आसानी से नई SIM हासिल कर लेते हैं, इसलिए यह नियम पूरी तरह प्रभावी नहीं होगा।टेलीकॉम उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि इस आलोचना से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि भारत में मोबाइल नंबर ही सबसे मजबूत डिजिटल पहचान है, और यह नया नियम सुरक्षा व जवाबदेही को बढ़ाएगा।

राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश से सकते में निकाय चुनाव के कैंडिडेट्स
Published / 2025-11-27 22:42:11
राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश से सकते में निकाय चुनाव के कैंडिडेट्स

झारखंड में नगर निकाय चुनाव लड़ने का सोच रहे हैं तो पहले पढ़ ले ये खबर, राज्य निर्वाचन आयोग ने जारी किये निर्देशटीम एबीएन, रांची। झारखंड में जल्द ही नगर निकाय चुनाव कराये जायेंगे। नगर निकाय चुनाव से पहले राज्य निर्वाचन आयोग ने कई निर्देश जारी किये हैं। जारी निर्देश में कहा गया है कि दो से अधिक संतान और बकाया कर वाले नगर निकाय चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।दो से अधिक संतान वाले नहीं लड़ पाएंगे नगर निकाय चुनावनिर्देश में कहा है कि झारखंड में होने वाले नगर निकाय चुनाव में दो से अधिक संतान वाले वैसे लोग उम्मीदवार नहीं बन पाएंगे, जिनके आखिरी संतान का जन्म 9 फरवरी 2013 के बाद हुआ हो। तीन से अधिक संतान की स्थिति में चुनाव लड़ने की अयोग्यता से संबंधित नियम को लेकर आयोग की ओर से जारी आदेश की प्रति उपायुक्त को भेजकर उन्हें इसका पालन सुनिश्चित कराने को कहा गया है।पत्र में कहा है कि दो से अधिक संतान वाला व्यक्ति भी नगरपालिका के किसी पदधारी का निर्वाचन लड़ने के लिए अयाेग्य होगा। परंतु यदि उसके दो से अधिक संतान 9 फरवरी 2013 तक या उसके पूर्व थे और बाद में उसमें कोई वृद्धि नहीं हुई है तो वह अयोग्य नहीं होगा। इस संबंध में भी यह स्पष्ट किया जाता है कि संतानों की संख्या में गोद लिए गए संतान एवं जुड़वा संतानों को भी सम्मिलित किया जायेगा।

अनिल गोयल के कई दस्तावेज़ और डिजिटल सामग्री ईडी ने किया जब्त
Published / 2025-11-21 21:27:36
अनिल गोयल के कई दस्तावेज़ और डिजिटल सामग्री ईडी ने किया जब्त

अनिल गोयल के कार्यालय पर ED की कार्रवाई, दस्तावेज़ और डिजिटल सामग्री जब्तटीम एबीएन, रांची। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शुक्रवार को कारोबारी अनिल गोयल के कार्यालय पर की गई तलाशी कार्रवाई पूरी कर ली। जांच एजेंसी की टीम कार्यालय से बाहर निकलते समय कई अहम दस्तावेज़ अपने साथ ले गई। ईडी ने चार अलग-अलग कार्टन में भरे हुए कई कागज़ी दस्तावेज़, डिजिटल रिकॉर्ड और विभिन्न प्रकार की फाइलें बरामद की हैं। जब्त सामग्री की प्राथमिक जांच शुरू कर दी गई है, जिसे आगे की पूछताछ और वित्तीय अनियमितताओं की जांच में उपयोग किया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि बरामद दस्तावेज़ मामले की जांच के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

सीजेआई का निर्देश : अदालत बिल मंजूरी की टाइमलाइन तय नहीं कर सकती
Published / 2025-11-20 20:39:58
सीजेआई का निर्देश : अदालत बिल मंजूरी की टाइमलाइन तय नहीं कर सकती

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: राष्ट्रपति संदर्भ केस में चीफ जस्टिस आफ इंडिया की पीठ एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालत राज्य विधानसभा की तरफ से पास किए गए बिलों को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए समय सीम तय नहीं कर सकते। सीजेआई बीआर गवई की अगुवाई वाली पीठ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की तरफ से भेजे गये 14 सवालों का जवाब देते हुए अपनी राय दी है।सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को राष्ट्रपति के उस संदर्भ पर अपना फैसला सुनाया है, जिसमें पूछा गया था कि क्या कोई सांविधानिक अदालत, राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा तय कर सकती है। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की संविधान पीठ ने 10 दिनों तक दलीलें सुनीं और 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत बिलों को मंजूरी की टाइमलाइन तय नहीं कर सकती सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों पर अनुमोदन देने के लिए न्यायपालिका कोई समयसीमा तय नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने राष्ट्रपति की तरफ से अनुच्छेद 143 के तहत भेजे गये 14 संवैधानिक प्रश्नों पर अपनी राय देते हुए कहा कि यह विषय संवैधानिक पदाधिकारियों के विवेक और संघीय ढांचे की मर्यादा से जुड़ा है। अदालत ने माना कि विधायी प्रक्रिया में राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक कर्तव्य है, पर न्यायिक हस्तक्षेप के जरिए इसकी समय सीमा तय नहीं की जा सकती। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अत्यधिक देरी लोकतांत्रिक शासन की आत्मा को क्षति पहुंचाती है, इसलिए इन पदों से अपेक्षा है कि वे उचित समय के भीतर निर्णय लें। संविधानिक प्रावधान और राष्ट्रपति का कदम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी। उन्होंने पूछा था कि क्या न्यायालय यह तय कर सकता है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को बिलों पर कब तक निर्णय लेना चाहिए। राष्ट्रपति ने अपने पांच पन्नों के संदर्भ पत्र में 14 सवाल रखे हैं, जिनका जवाब सुप्रीम कोर्ट से मांगा गया है। यह सवाल मुख्य रूप से अनुच्छेद 200 और 201 से जुड़े हैं, जिनमें राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों का जिक्र है।राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे ये 14 सवाल राज्यपाल के समक्ष अगर कोई विधेयक पेश किया जाता है तो संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत उनके पास क्या विकल्प हैं? क्या राज्यपाल इन विकल्पों पर विचार करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं? क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा लिए गए फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है? क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 200 के तहत लिए गए फैसलों पर न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह से रोक सकता है? क्या अदालतें राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 200 के तहत लिए गए फैसलों की समयसीमा तय कर सकती हैं, जबकि संविधान में ऐसी कोई समयसीमा तय नहीं की गई है? क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा लिए गए फैसले की समीक्षा हो सकती है? क्या अदालतें अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा फैसला लेने की समयसीमा तय कर सकती हैं? अगर राज्यपाल ने विधेयक को फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया है तो क्या अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट की सलाह लेनी चाहिए? क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा क्रमश: अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिए गए फैसलों पर अदालतें लागू होने से पहले सुनवाई कर सकती हैं।क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों में बदलाव कर सकता है? क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की मंजूरी के बिना राज्य सरकार कानून लागू कर सकती है? क्या सुप्रीम कोर्ट की कोई पीठ अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच को भेजने पर फैसला कर सकती है?  क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसे निर्देश/आदेश दे सकता है जो संविधान या वर्तमान कानूनों मेल न खाता हो? क्या अनुच्छेद 131 के तहत संविधान इसकी इजाजत देता है कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही सुलझा सकता है? तमिलनाडु केस और समय सीमा 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु विधानसभा से पास हुए बिलों पर फैसला देते हुए पहली बार यह कहा था कि राष्ट्रपति को राज्यपाल की तरफ से भेजे गए किसी भी बिल पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। यह फैसला अपने आप में ऐतिहासिक माना गया क्योंकि इससे पहले ऐसी कोई समय सीमा तय नहीं थी।

31 दिसंबर तक राज्य के सभी थानों में लगाएं सीसीटीवी कैमरे : झारखंड हाइकोर्ट
Published / 2025-11-18 23:16:50
31 दिसंबर तक राज्य के सभी थानों में लगाएं सीसीटीवी कैमरे : झारखंड हाइकोर्ट

झारखंड हाइकोर्ट का बड़ा फैसला, सभी थानों में 31 दिसंबर तक सीसीटीवी लगाने का दिया आदेशटीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रदेश के सभी थानों में सीसीटीवी कैमरा लगाने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि यह कार्यवाही तय समयसीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए, ताकि थानों में होने वाली हर गतिविधि पारदर्शी रहे और किसी भी प्रकार की अवैध कारर्वाई पर रोक लग सके।झारखंड हाईकोर्ट ने मंगलवार को प्रॉपर्टी रिएल्टी प्राइवेट लिमिटेड, शौभिक बनर्जी सहित अन्य की ओर से दाखिल एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। पिछली सुनवाई में अदालत ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और आईटी विभाग की सचिव को सशरीर उपस्थित होने का आदेश दिया था। अदालत के निर्देश पर ये सभी वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित हुए और कोर्ट के समक्ष अब तक की प्रगति रिपोर्ट पेश की।सभी 334 थानों में जल्द से जल्द कैमरे लगाने का आदेशसुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि 31 दिसंबर से पहले सभी जिलों के थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) और टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। इसके बाद राज्य के सभी 334 थानों में जल्द से जल्द कैमरे लगाने का काम आरंभ किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सीसीटीवी कैमरे चालू अवस्था में रहें और उनका डाटा नियमित रूप से संरक्षित किया जाए। साथ ही कोटर् ने 5 जनवरी तक आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट मांगी है। यह मामला पश्चिम बंगाल निवासी शौभिक बनर्जी की याचिका पर आधारित है।याचिकाकर्ता ने बताया कि चेक बाउंस मामले में वह धनबाद कोर्ट में जमानत के लिए आए थे, लेकिन धनबाद पुलिस ने उन्हें दो दिनों तक अवैध रूप से थाना परिसर में रोके रखा और जबरन दबाव बनाकर दूसरे पक्ष का पक्ष लिया। उन्होंने दावा किया कि पूरी घटना बैंक मोड़ थाना में लगे सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हुई थी, किंतु पुलिस ने अदालत को बताया कि केवल दो दिन का ही सीसीटीवी बैकअप उपलब्ध है।अदालत ने इस पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि धनबाद जैसे अपराधग्रस्त शहर में सीसीटीवी डेटा का सही रखरखाव न होना बेहद चिंताजनक है। अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो और सभी थानों में रिकॉडिर्ंग का पर्याप्त स्टोरेज सुनिश्चित किया जाए।

जस्टिस सूर्यकांत की सलाह : अस्पतालों की इमरजेंसी जैसी सेवा दें सभी हाइकोर्ट
Published / 2025-11-15 22:44:13
जस्टिस सूर्यकांत की सलाह : अस्पतालों की इमरजेंसी जैसी सेवा दें सभी हाइकोर्ट

उच्च न्यायालयों को अस्पतालों के आपातकालीन वार्डों की तरह त्वरित और सटीक प्रतिक्रिया के साथ काम करना चाहिए : जस्टिस सूर्यकांतटीम एबीएन, रांची। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 15 नवंबर शनिवार को कहा कि उच्च न्यायालयों को ऐसे संस्थानों के रूप में विकसित होना चाहिए जो अन्याय का सामना अस्पताल के आपातकालीन वार्ड की तरह तत्परता और कुशलता से करें। रांची में झारखंड उच्च न्यायालय के रजत जयंती समारोह में बोलते हुए, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने जोर देकर कहा कि अदालतों को संकट के क्षण में ही त्वरित, सटीक और समन्वित राहत प्रदान करने के लिए सुसज्जित होना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे आपातकालीन विभाग जीवन के खतरे में देरी बर्दाश्त नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि उच्च न्यायालयों को अपने संस्थागत विकास की कल्पना उसी तरह करनी चाहिए जैसे एक आधुनिक अस्पताल अपनी आपातकालीन सेवाओं को डिजाइन करता है। ऐसी संरचनाओं के साथ जो संकट के समय तुरंत, निर्णायक और सटीक प्रतिक्रिया देने में सक्षम हों। जिस तरह एक आपातकालीन वार्ड देरी बर्दाश्त नहीं कर सकता, उसी तरह हमारे न्यायालयों को भी उसी स्तर की तैयारी, दक्षता और समन्वित प्रतिक्रिया की आकांक्षा रखनी चाहिए। इसका अर्थ है तकनीकी क्षमता को मजबूत करना, प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना, विशिष्ट विशेषज्ञता का निर्माण करना और यह सुनिश्चित करना कि न्यायिक प्रक्रियाएं उभरती परिस्थितियों के अनुसार तुरंत अनुकूलित हो सकें। केवल ऐसी दूरदर्शिता से ही न्यायपालिका समय पर और प्रभावी समाधान प्रदान करना जारी रख सकती है और हर चुनौती का उस गति और स्पष्टता के साथ सामना कर सकती है जिसकी एक संवैधानिक लोकतंत्र मांग करता है। ये केवल प्रशासनिक विचार नहीं हैं; ये न्याय तक पहुँच के विकास में अगला कदम हैं।केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने क्या कहारांची में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय कानून राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने झारखंड हाई कोर्ट में तेजी से अपनाई जा रही आधुनिक तकनीक की सराहना की। उन्होंने कहा कि नये भवन को उन्नत सुविधाओं से सुसज्जित किया गया है, जिसमें सोलर पैनल, ऊर्जा-संरक्षण व्यवस्था और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि न्यायपालिका में तकनीकी हस्तक्षेप समय की मांग है और वर्तमान में एआई तकनीक का उपयोग न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी एवं सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अर्जुन राम मेघवाल ने ई-कोर्ट, ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई जैसी प्रणालियों के व्यापक उपयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक न केवल अदालतों की दक्षता बढ़ाती है, बल्कि न्याय तक पहुंच को भी आसान बनाती है। कार्यक्रम के दौरान राज्य में केंद्रीय न्यायाधिकरण की बेंच स्थापित करने की मांग भी उठायी गयी, जिस पर उन्होंने सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया। मंत्री के इस बयान से राज्य में न्यायिक ढांचे को और मजबूत बनाने की संभावनाओं को बल मिला है।सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि उच्च न्यायालयों में सामाजिक सुधारों के इंजन के रूप में कार्य करने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि उनकी संवैधानिक स्थिति, व्यापक अधिकार क्षेत्र और जनता से निकटता उन्हें कानूनी विकास को आकार देने और सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए अद्वितीय रूप से सक्षम बनाती है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय वे स्थान हैं जहां न्याय के सर्वोच्च सिद्धांत आम नागरिकों की वास्तविकताओं से मिलते हैं। इसलिए, उच्च न्यायालय कानूनी विकास और सामाजिक सुधार के लिए महत्वपूर्ण इंजन हो सकते हैं।न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए, अपने पहले मामले, दो छोटे बच्चों से जुड़े सीमा पार हिरासत विवाद, का एक किस्सा साझा किया। उन्होंने कहा कि जो बात उनके जेहन में रही, वह कानूनी पेचीदगियां नहीं, बल्कि सीमाओं और अदालतों के बीच फंसे बच्चों की खामोश व्यथा थी। उस पल ने उन्हें एहसास दिलाया कि न्याय करना केवल कानूनी सिद्धांतों का प्रयोग नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की एक गहरी जिम्मेदारी है कि कानून का संरक्षण सबसे कमजोर लोगों तक पहुंचे।न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि संविधान ने न्याय प्रदान करने की एक ऐसी प्रणाली बनायी है जो तीन स्तंभों पर आधारित है, जिनमें से प्रत्येक का एक विशिष्ट लेकिन पूरक उद्देश्य है। जिला न्यायालय रोजमर्रा की शिकायतों का जमीनी स्तर पर समाधान करते हैं और व्यवस्था में जनता का विश्वास बढ़ाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक सीमाओं के अंतिम राष्ट्रीय संरक्षक के रूप में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि इन दोनों के बीच उच्च न्यायालय स्थित हैं, जो नागरिकों और संविधान के बीच सेतु का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत उनकी शक्तियां अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से भी व्यापक हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य सभी कानूनी अधिकारों की भी रक्षा कर सकते हैं। यह व्यापक अधिकार, उनकी सुलभता के साथ मिलकर, उच्च न्यायालयों को यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक बनाता है कि सुरक्षा और निवारण दूर या विलंबित न हों।न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने उन्हें संवैधानिक न्याय की रीढ़ बताते हुए कहा कि उच्च न्यायालय अमूर्त अधिकारों को सार्थक राहत में बदल देते हैं। उनके फैसले अक्सर स्थानीय वास्तविकताओं, सांस्कृतिक संदर्भों और क्षेत्रीय चुनौतियों को प्रतिबिंबित करते हैं, जिससे न्याय को एक मानवीय स्पर्श और स्थानीय धड़कन मिलती है। उन्होंने आगे कहा कि चूंकि प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने परिवेश के साथ संवाद करते हुए विकसित होता है, इसलिए उनमें सामाजिक परिवर्तन लाने की क्षमता होती है जो समावेशी होने के साथ-साथ जीवंत अनुभवों पर आधारित भी होता है। झारखंड उच्च न्यायालय की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने इसकी पच्चीस वर्षों की यात्रा को लचीलेपन, नवाचार और संवैधानिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता से परिपूर्ण बताया। उन्होंने आदिवासी अधिकारों, श्रमिकों के सम्मान, पर्यावरणीय संसाधनों और खनिज निष्कर्षण में अंतर-पीढ़ीगत समता के सिद्धांतों की रक्षा करने वाले न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों पर प्रकाश डाला। अपने प्रारंभिक वर्षों से ही, जब इसकी संस्थागत नींव अभी भी बन रही थी, न्यायालय ने हर चुनौती को कानून के शासन को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा।न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने उच्च न्यायालय द्वारा तकनीकी सुधार पर दिये जा रहे जोर की सराहना करते हुए इसे न्याय तक पहुंच में सुधार के लिए जरूरी बताया। ई-फाइलिंग, रियल टाइम केस ट्रैकिंग, खोज योग्य डिजिटल डेटाबेस और दृष्टिबाधित वादियों के लिए उपकरणों में निवेश के साथ, न्यायालय ने अपनी प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी, कुशल और नागरिक-अनुकूल बनाया है। उन्होंने कहा कि तकनीक अब अदालतों के लिए वैकल्पिक नहीं, बल्कि आधुनिक न्यायिक प्रशासन का एक प्रमुख घटक है।उन्होंने न्यायालय की मानवीय पहुुंच के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और कानूनी साक्षरता तथा न्याय तक पहुंच कार्यक्रमों को डिजाइन करने में मदद करते हैं। यह तालमेल न्यायालय को न केवल न्यायालय के भीतर संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम बनाता है, बल्कि सबसे गरीब और सबसे हाशिए पर पड़े समुदायों को न्याय दिलाने वाली पहलों का मार्गदर्शन भी प्रदान करता है। भविष्य की ओर देखते हुए, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि उच्च न्यायालयों को उन उभरती चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा जो अगले कई दशकों को परिभाषित करेंगी। तेजी से बदलते तकनीकी बदलाव, जलवायु परिवर्तन, जनसांख्यिकीय बदलाव, साइबर अपराध, डिजिटल साक्ष्य और संसाधन संघर्षों के लिए नये कौशल, वैज्ञानिक समझ और विशिष्ट न्यायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। बढ़ते मुकदमों का बोझ और प्रक्रियात्मक देरी संस्थागत क्षमता की परीक्षा लेती रहेंगी, जब तक कि अदालतें पारंपरिक प्रथाओं पर पुनर्विचार न करें और अधिक लचीले मॉडल न अपनायें। झारखंड उच्च न्यायालय के पच्चीसवें वर्ष के अवसर पर, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपने भाषण का समापन मुख्य न्यायाधीशों, न्यायाधीशों, अधिकारियों और वकीलों के योगदान को स्वीकार करते हुए किया, जिन्होंने इस संस्था को आकार दिया है। उन्होंने कहा कि उनके संयुक्त प्रयासों ने न्याय की धुन में गहराई और सामंजस्य जोड़ा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि न्यायालय की विरासत न केवल अगली चौथाई सदी तक, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भी कायम रहेगी।

हमीरपुर : दुष्कर्म के दोषी को 10 साल का कारावास
Published / 2025-11-13 21:06:29
हमीरपुर : दुष्कर्म के दोषी को 10 साल का कारावास

अदालत ने लगाया 10 हजार रुपये का अर्थदंड एबीएन सेंट्रल डेस्क (हमीरपुर)। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में किशोरी से दुष्कर्म के मामले में गुरुवार को विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) कीर्तिमाला ने एक दोषी को 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। उस पर कोर्ट ने 10 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। एडीजीसी रुद्रप्रताप सिंह ने बताया कि 8 साल पूर्व जलालपुर थाना क्षेत्र के एक गांव में किशोरी के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। इस मामले की रिपोर्ट पीड़िता के पिता ने 19 अक्टूबर 2017 को थाने में दर्ज कराई थी। इस मामले की विवेचना तत्कालीन इंस्पेक्टर शिवमूरत यादव ने कर अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। आज इस मुकदमे की सुनवाई विशेष न्यायालय पास्को एक्ट में की गई। अदालत ने दोषी पाए जाने पर पुरैनी गांव निवासी प्रदेश लोधी पुत्र फूल सिंह लोधी को 10 साल की कठोर कारावास के साथ 10 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनायी है।

15 से फास्टटैग नहीं रहने पर लगेगा दोगुना टोल टैक्स
Published / 2025-11-13 18:38:42
15 से फास्टटैग नहीं रहने पर लगेगा दोगुना टोल टैक्स

15 नवंबर से टोल प्लाजा के नियमों में बड़ा बदलाव, बिना फास्ट टैग वालों को देना होगा दोगुना टोल, जानें पूरी डिटेल एबीएन सेंट्रल डेस्क। अगर आप अक्सर हाइवे पर सफर करते हैं तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार ने टोल प्लाजा के नियमों में बड़ा बदलाव किया है, जो 15 नवंबर 2025 से लागू होगा। इस बदलाव के बाद अब टोल का भुगतान करने के तरीके के आधार पर शुल्क तय किया जायेगा यानी नकद भुगतान करने पर ज्यादा टोल, जबकि डिजिटल भुगतान करने पर राहत मिलेगी। नया नियम क्या कहता है? केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क नियम, 2008 में संशोधन किया है। इसके तहत अब अगर कोई वाहन चालक बिना वैध फास्टटैग के टोल प्लाजा में प्रवेश करता है, तो उससे दोगुना शुल्क वसूला जायेगा। लेकिन अगर फास्टटैग फेल हो जाने पर चालक यूपीआई या किसी डिजिटल माध्यम से भुगतान करता है, तो उसे केवल 1.25 गुना टोल शुल्क ही देना होगा। आसान उदाहरण से समझिये मान लीजिये किसी वाहन का सामान्य टोल 100 रुपये है, तो अगर फास्टटैग सही काम कर रहा है, तो ड्राइवर को सिर्फ 100 रुपये देने होंगे। अगर फास्टटैग फेल हो गया और ड्राइवर नकद भुगतान करता है, तो उसे 200 रुपये चुकाने होंगे। लेकिन अगर डिजिटल माध्यम (जैसे यूपीआई, कार्ड या नेटबैंकिंग) से भुगतान किया जाता है, तो केवल 125 रुपये देने होंगे। यानी अब डिजिटल भुगतान करने वालों को सीधी छूट मिलेगी, जबकि नकद लेनदेन पर भारी जुर्माना लगेगा। सरकार का मकसद क्या है? मंत्रालय का कहना है कि यह बदलाव टोल प्लाजा पर पारदर्शिता बढ़ाने, नकद लेनदेन कम करने और डिजिटल इंडिया मिशन को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। इससे टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों में भी कमी आयेगी और यात्रियों को तेज और सुगम यात्रा अनुभव मिलेगा। टोल प्रणाली को और आधुनिक बनाने की तैयारी सरकार आने वाले समय में टोल सिस्टम को पूरी तरह आटोमैटिक और जीपीएस आधारित बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। इसके तहत भविष्य में गाड़ी के सफर की दूरी के हिसाब से टोल काटा जा सकेगा।

झारखंड : अब कुत्ते-बिल्लियों का आंकड़ा रखना जरूरी
Published / 2025-11-12 22:08:19
झारखंड : अब कुत्ते-बिल्लियों का आंकड़ा रखना जरूरी

झारखंड के शहरी क्षेत्रों में पालतू कुत्ते-बिल्लियों का रजिस्ट्रेशन कंपलसरी, कितनी फीस, क्या लगेंगे डाक्यूमेंट? टीम एबीएन, रांची। झारखंड के शहरी क्षेत्रों में अब पालतू कुत्ते और बिल्लियों का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के स्वत: संज्ञान मामले में दिये गये आदेश के बाद शहरी निकायों ने सूचना जारी कर लोगों से आदेश का पालन करने के लिए कहा है। इसके तहत, लोगों को अपना पालतू कुत्ते और बिल्लियों का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। ऐसा नहीं करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की भी बात कही गयी है। झारखंड में पालतू कुत्ते और बिल्लियों का रजिस्ट्रेशन जरूरी हो गया है। इसके तहत गढ़वा नगर परिषद ने आम सूचना जारी करते हुए लोगों से तय समय में पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करने की अपील की है। राज्य के अन्य नगर निकाय भी इसी तरह की सूचना जारी करने की तैयारी में हैं। नगर निकायों ने स्पष्ट किया है कि बिना पंजीकरण के पालतू जानवर रखने पर झारखंड नगरपालिका अधिनियम-2011 के तहत कार्रवाई की जायेगी। जानें क्या होगी रजिस्ट्रेशन फीस आम लोगों के लिए रजिस्ट्रेशन फीस 100 रुपये जबकि कमर्शियल और ब्रीडिंग के उद्देश्य से पालतू जानवर रखने वालों के लिए 1000 फीस रुपये निर्धारित किया गया है। रजिस्ट्रेशन के दौरान पहचान पत्र, टीकाकरण प्रमाण पत्र और पालतू पशु का फोटो अनिवार्य रूप से देना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ती आवारा कुत्तों की घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। अदालत ने राज्यों को आदेश दिया है कि इंस्टीट्यूशनल साइट्स से आवारा कुत्तों को हटाने की प्रक्रिया तेज की जाए। रांची में 25 हजार पालतू कुत्ते कोर्ट ने इसकी रिपोर्ट मुख्य सचिव न्यायालय को सौंपने का आदेश दिया। रांची नगर निगम क्षेत्र में पालतू कुत्तों का पंजीकरण बेहद कम है। निगम के अनुसार, क्षेत्र में लगभग 25 हजार पालतू कुत्ते हैं, लेकिन केवल एक हजार का ही पंजीकरण हुआ है। 2017 के सर्वे में क्षेत्र में करीब 1.25 लाख कुत्ते पाये गये थे, जबकि 2012 की गणना में यह संख्या 1 लाख 37 हजार से अधिक थी। निगम ने अगस्त 2025 तक 1।33 लाख आवारा कुत्तों की नसबंदी की। एनिमल बर्थ कंट्रोल एक्ट यह अभियान एनिमल बर्थ कंट्रोल एक्ट 2023 के तहत चलाया गया था। पिछले दो सालों में कुल 4166 डॉग्स को एंटी-रेबीज टीका लगाया गया है। पशुपालन विभाग और नगर निगम संयुक्त रूप से कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने और टीकाकरण सुनिश्चित करने पर काम कर रहे हैं।

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