एबीएन सेंट्रल डेस्क। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। रांची के डोरंडा कोषागार से अवैध निकासी के मामले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एक और नया केस दर्ज किया है। इससे पहले भी ईडी ने दो मामलों में पीएमएलए एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। डोरंडा कोषागार से निकासी के मामले में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव सहित चारा घोटाले के अन्य सजायाफ्ता के खिलाफ ईडी ने नया केस दर्ज किया है। 139 करोड़ की डोरंडा ट्रेजरी से अवैध निकासी के मामले में लालू प्रसाद सहित अन्य आरोपियों को कोर्ट ने दोषी करार देते हुए पांच साल जेल की सजा सुनाई है। सीबीआई कोर्ट के फैसले के आधार पर ईडी ने इस संबंध में प्रिवेंशन आफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की संगत धाराओं के तहत नया केस दर्ज किया है। सूत्रों ने बताया कि इस मामले में वैसे लोगों को भी जांच के दायरे में रखा गया है, जिनकी मृत्यु ट्रायल के दौरान हो गई थी। जिन आरोपियों की मौत ट्रायल के दौरान हो गई थी, उनके परिजनों की 1990 के बाद अर्जित संपत्ति और आय के स्रोतों की जानकारी ली जाएगी। पिछले माह ईडी ने चारा घोटाला के दो अन्य कांडों में मामला दर्ज किया था। दुमका कोषागार से निकासी के मामले मे लालू प्रसाद सहित 19 लोगों को ईडी ने आरोपी बनाया था। वहीं, दुमका कोषागार से ही निकासी के दूसरे मामले में आरोपियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया गया था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। उच्चतम न्यायालय कक्षाओं में हिजाब पहनने की अनुमति देने से इनकार करने वाले कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर होली के अवकाश के बाद सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि वह होली के बाद इस मामले में सुनवाई की तारीख तय करेगा। इसी के साथ कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े की तत्काल सुनवाई की मांग को खारिज कर दिया। हेगड़े की मांग थी कि, इस मामले की सुनवाई सोमवार को ही की जाए। हालांकि, कोर्ट ने कहा है कि वह होली की छुट्टियों के बाद सुनवाई से जुड़ी याचिकाओं को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगा। उच्चतम न्यायालय में कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई : आपको बतां दे कि उच्चतम न्यायालय में मंगलवार को एक याचिका दायर कर कक्षा के अंदर हिजाब पहनने की अनुमति के लिए याचिकाओं को खारिज करने संबंधी कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि हिजाब पहनना इस्लाम धर्म में आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है और उसने कक्षाओं में हिजाब पहनने की अनुमति देने के लिए मुस्लिम छात्राओं की खाचिकाएं खारिज कर दी। अदालत ने इसके साथ ही राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध बरकरार रखा। उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ एक मुस्लिम छात्रा ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है। उच्च न्यायालय ने कक्षा में हिजाब पहनने की अनुमति देने का अनुरोध करने वाली उडुपी स्थित गवर्नमेंट प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज की मुस्लिम छात्राओं के एक वर्ग की याचिकाएं मंगलवार को खारिज कर दीं। उच्च न्यायालय ने कहा कि स्कूल की वर्दी का नियम एक उचित पाबंदी है और संवैधानिक रूप से स्वीकृत है, जिस पर छात्राएं आपत्ति नहीं उठा सकतीं। उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका में, याचिकाकर्ता ने कहा है कि उच्च न्यायालय ने धर्म और विवेक की स्वतंत्रता के बीच विभेद करके गलती की है और अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला है कि जो एक धर्म का पालन करते हैं, उन्हें यह अधिकार नहीं है। साथ ही याचिका में यह भी कहा गया है कि उच्च न्यायालय इस तथ्य का संज्ञान लेने में विफल रहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हिजाब पहनना निजता के अधिकार के दायरे में आता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। हिजाब विवाद के मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट से निराशा हाथ लगने के बाद अब याचिकार्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दरअसल, हिजाब बैन पर जारी विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की गई है। अर्जी दायर करने वाली याचिकाकर्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है, जिसमें कहा गया है कि हिजाब इस्लाम में एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका एक छात्रा निबा नाज ने दाखिल की है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को अपने फैसले में कहा कि हिजाब पहनना इस्लाम धर्म में जरूरी धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। यह कहते हुए हाईकोर्ट ने कक्षाओं में हिजाब पहनने की अनुमति देने वाली मुस्लिम छात्राओं की याचिकाएं खारिज कर दी। अदालत ने इसके साथ ही राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखा। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि स्कूल की वर्दी का नियम एक उचित पाबंदी है और संवैधानिक रूप से स्वीकृत है, जिस पर छात्राएं सवाल नहीं उठा सकतीं। कर्नाटक सरकार ने हर किसी से आदेश का पालन करने की अपील करते हुए कहा कि एजुकेशन जरूरी है। कक्षा में हिजाब के साथ नहीं मिली थी एंट्री : गौरतलब है कि एक जनवरी को उडुपी में एक कॉलेज की छह छात्राएं कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में शामिल हुई थीं और उन्होंने हिजाब पहनकर कक्षा में प्रवेश करने से रोकने पर कॉलेज प्रशासन के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया था। मुख्य न्यायाधीश ऋतु राज अवस्थी, न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित और न्यायमूर्ति जे एम खाजी की पीठ ने मंगलवार को आदेश का एक अंश पढ़ते हुए कहा, हमारी राय है कि मुस्लिम महिलाओं का हिजाब पहनना इस्लाम धर्म में आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। सरकारी आदेश को अवैध ठहराना गलत : पीठ ने यह भी कहा कि सरकार के पास पांच फरवरी 2022 के सरकारी आदेश को जारी करने का अधिकार है और इसे अवैध ठहराने का कोई मामला नहीं बनता है। इस आदेश में राज्य सरकार ने उन कपड़ों को पहनने पर रोक लगा दी है, जिससे स्कूल और कॉलेज में समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था बाधित होती है। मुस्लिम लड़कियों ने इस आदेश को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने अपने दूतावास को अस्थायी तौर पर यूक्रेन से पोलैंड स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है। यह फैसला युद्धग्रस्त यूक्रेन में बिगड़ते सुरक्षा हालात को देखते हुए लिया गया। हालिया दिनों में यूक्रेन की राजधानी कीव और अन्य प्रमुख शहरों में रूसी हमले तेज होने के मद्देनजर भारत ने अपने दूतावास को पोलैंड ले जाने का फैसला किया। विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, यूक्रेन के पश्चिमी हिस्सों में हमले समेत देश में बेहद तेजी से बिगड़ते हालात के मद्देनजर यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास को अस्थायी तौर पर पोलैंड स्थानांतरित करने का फैसला किया गया है। मंत्रालय ने कहा, आने वाले समय के घटनाक्रम के अनुसार दोबारा हालात की समीक्षा की जाएगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने नौ हजार करोड़ रुपये की बैंक ऋण धोखाधड़ी के आरोपी भगोड़े कारोबारी विजय माल्या के खिलाफ अदालत की अवमानना के मामले में सजा की अवधि पर बृहस्पतिवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित, न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने अवमानना कानून के विभिन्न पहलुओं पर वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्याय मित्र जयदीप गुप्ता की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। पीठ ने पूर्व में माल्या का प्रतिनिधित्व कर चुके वकील को इस मामले में मंगलवार तक लिखित दलीलें पेश करने की अनुमति दी। शीर्ष अदालत ने माल्या को दिये गये लंबे वक्त का हवाला देते हुए 10 फरवरी को सुनवाई की तारीख तय कर दी थी और भगोड़े कारोबारी को व्यक्तिगत तौर पर या अपने वकील के जरिये पेश होने का अंतिम मौका दिया था। माल्या को अवमानना के लिए 2017 में दोषी ठहराया गया था और उनकी प्रस्तावित सजा के निर्धारण के लिए मामले को सूचीबद्ध किया जाना था। शीर्ष अदालत ने 2017 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए माल्या की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका 2020 में खारिज कर दी थी। न्यायालय ने अदालती आदेशों को धता बताकर अपने बच्चों के खातों में चार करोड़ डॉलर अंतरित करने को लेकर उन्हें अवमानना का दोषी माना था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और कांग्रेस महासचिव के प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने 11 सालों में राजस्थान में बेनामी जोत से अपनी आय को 106 करोड़ रुपए से कम बताया। आयकर विभाग ने आरोप लगाया है कि रॉबर्ट वाड्रा ने अपनी असल कमाई को छुपाया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आयकर विभाग ने इस राशि को मूल्यांकन वर्ष 2010-11 से 2020-21 के दौरान उनकी आय में जोड़ने का प्रस्ताव दिया है। आयकर विभाग ने वाड्रा की सात कंपनियों - मैसर्स आर्टेक्स, स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी, स्काईलाइट रियल्टी, ब्लूब्रीज ट्रेडिंग, लंबोदर आर्ट्स, नॉर्थ इंडिया आईटी पार्क्स और रियल अर्थ की आय में लगभग 9 करोड़ रुपए जोड़ने का भी प्रस्ताव किया है जो कि 2010-11 से 2015-16 मूल्यांकन वर्ष के दौरान की हैं। बेनामी लेन-देन (निषेध) अधिनियम के तहत राजस्थान में भूमि सौदों में कथित कर चोरी के लिए वाड्रा के खिलाफ विभाग की जांच के संबंध में आय की कम जानकारी देने की बात सामने आई है। विभाग ने दिसंबर 2021 में वाड्रा की आय (106 करोड़ रुपये) और उनकी सात कंपनियों (लगभग 9 करोड़ रुपए) की कम जानकारी देने को लेकर अपने निष्कर्षों की जानकारी प्रवर्तन निदेशालय (ED) को भी दी थी। वहीं इस पूरे मामले में वाड्रा ने कहा कि पिछले कई सालों की तरह ही एक ही कारण से मेरा नाम उछाला जा रहा है। वाड्रा ने कहा कि दुर्भावनापूर्ण है कि मुझे राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। मेरी कानूनी टीम इस मामले में जवाब देगी। आईटी अधिनियम 1961 की धारा 270 ए के तहत, आयकर चोरी पर आय की कम जानकारी देने के लिए देय कर के 50 प्रतिशत का जुर्माना लगाया जा सकता है। यदि गलत जानकारी देने के कारण कम आय की जानकारी सामने आती है, तो जुर्माना देय कर का 200 प्रतिशत होगा।
टीम एबीएन, रांची। बच्चों की खुशी के आगे विवाह विच्छेद का मुकदमा लड़े रहे पति-पत्नी को झुकना पड़ा। अधिवक्ता मध्यस्थ नीलम शेखर एवं पीसी उरांव के प्रयास से विवाह विच्छेद का मुकदमा लड़े रहे पति-पत्नी अब एक साथ रहकर नयी जिंदगी शुरू करने पर राजी हो गये। वहीं दो वर्षीय बेटी को मां के साथ अब पिता का प्यार मिलेगा। बेटी मां-पिता को एक साथ पाकर लिपट कर खुशी का इजहार मध्यस्थता केंद्र में किया। जी हां मंगलवार को पांच दिवसीय विशेष मध्यस्थता अभियान के दूसरे दिन 14 मुकदमों में सुलह कराया गया। जिसमें चार मुकदमें बच्चों की खुशी से जुड़े हुए थे। केस नंबर 1. रांची निवासी विजय कुमार प्रजापति एवं नवादा निवासी पत्नी प्रियंका के बीच मामूली मतभेद को लेकर आगे की जिंदगी अलग रहकर बीतने को लेकर पति ने विवाह विच्छेद का मुकदमा किया था। जबकि पत्नी ने भरण-पोषण को लेकर मुकदमा किया था। फैमिली कोर्ट जज ने मामले में सुलह को लेकर मध्यस्थता केंद्र भेज दिया था। साथ ही मध्यस्थ नीलम शेखर को नामित किया गया। दोनों की शादी अप्रैल 2018 में हुई थी। दोनों को एक बेटी है। सुलह के बाद पुराने वाद-विवाद पर विराम लगाते हुए बेटी के साथ खुशनुमा जीवन व्यतीत करने पर राजी हुए। दोनों अपनी बेटी का भविष्य को साथ मिलकर संभालेंगे। बेटी की हर जरूरत को पूरा करेंगे। सभी तरह की कड़वाहट अब नहीं रखेंगे। सुलह में दोनों पक्ष के अधिवक्ताओं की भी भूमिका अहम रही। केस नंबर 2. मध्यस्थ प्रकाश चंद्र उरांव ने तीनों बच्चों को माता-पिता का प्यार एक साथ दिलाने में सफल रहे। सुलह के माध्यम से उन्होंने पुनिया उरांव एवं सूरज उरांव को एक किया। दोनों पति-पत्नी विवाह विच्छेद का मुकदमा लड़ रहे थे। दोनों को तीन बच्चे हैं। आपसी मनमुटाव के कारण दोनों पति-पत्नी पिछले एक साल से अलग-अलग रह रहे थे। सुलह के बाद अब एक साथ रहेंगे। साथ ही पुनिया उरांव को सूरज पांच हजार रुपये प्रति माह खर्च भी देगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। विश्लेषण के मुताबिक, 2019-20 में केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों को 1.29 करोड़ आरटीआई आवेदन प्राप्त हुए, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 2.48% कम था। सीआईसी के अनुसार, इस दौरान देश में 1 करोड़ 33 लाख आरटीआई आवेदन प्राप्त हुए। देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फळक आवेदन खारिज किए जा रहे हैं। इस बीच एक विश्लेषण से पता चला है कि 2020-21 के दौरान केंद्र सरकार के मंत्रालयों द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर सूचना के अधिकार (आरटीआई) के आवेदनों के रिजेक्शन में 83 फीसदी की वृद्धि हुई थी। ओवरआॅल रिजेक्शन रेट 2.95 प्रतिशत तक कम हो गया था। मानवाधिकार अभियान निकाय, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) के वेंकटेश नायक ने केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत आने वाले 2,182 से अधिक विभागों में आरटीआई आवेदनों को खारिज करने के कारणों का विश्लेषण किया। बता दें कि प्रत्येक मंत्रालय को केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) को दायर आरटीआई आवेदनों पर वार्षिक स्थिति प्रस्तुत करनी होती है। विश्लेषण के मुताबिक, 2019-20 में केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों को 1.29 करोड़ आरटीआई आवेदन प्राप्त हुए, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 2.48% कम था। सीआईसी के अनुसार, इस दौरान देश में 1 करोड़ 33 लाख आरटीआई आवेदन प्राप्त हुए। आरटीआई आवेदनों में सर्वाधिक वृद्धि स्वास्थ्य और इस्पात मंत्रालयों को प्राप्त हुई। खारिज किए गए 53,537 आवेदनों में से 1,024 आरटीआई आवेदन राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर थे, जबकि पिछले वर्ष 557 आवेदन थे। सरकार ने तेजी से किया आरटीआई के क्लाउज 8 (1) का उपयोग : नायक ने कहा कि हालांकि कुल अस्वीकृति दर गिर गई है, सरकार ने आरटीआई आवेदनों को अस्वीकार करने के लिए आरटीआई अधिनियम (राष्ट्रीय सुरक्षा को बाधित करने वाली जानकारी प्रदान करने की छूट) के खंड 8 (1) का तेजी से उपयोग किया। उन्होंने इसे एक परेशान करने वाली प्रवृत्ति करार दिया। नायक ने कहा, ह्ययहां तक कि उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा छूट को लागू करने वाले महामारी वर्ष में 401 आवेदनों को खारिज कर दिया। श्रम और रोजगार मंत्रालय ने आरटीआई आवेदनों को खारिज करने के लिए खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के बारे में जानकारी मांगने से संबंधित एक अन्य प्रावधान का इस्तेमाल किया। यह मंत्रालय के दायरे में कोई सुरक्षा या खुफिया एजेंसी नहीं आने के बावजूद था। आरटीआई अधिनियम की धारा 24 में प्रावधान है कि कानून की अनुसूची के तहत सूचीबद्ध सुरक्षा अधिकारियों से भ्रष्टाचार से संबंधित जानकारी को छोड़कर जानकारी नहीं मांगी जा सकती है। नायक ने कहा, ह्यस्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय उल्लेखनीय मंत्रालय हैं, जिन्होंने महामारी वर्ष के दौरान सैकड़ों मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा छूट का आह्वान किया है ताकि सूचना से इनकार किया जा सके। 2019-20 में करीब 12,000 आवेदन खारिज किए गए : हालांकि पिछले साल की तरह, आरटीआई आवेदनों को अस्वीकार करने का सबसे बड़ा कारण धारा 8 (1) जे रहा, जो व्यक्तिगत जानकारी प्रदान करने पर रोक लगाता है। इस आधार पर 2019-20 में करीब 12,000 आवेदन खारिज किए गए। आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने कहा, ह्यइस तरह के अधिकांश आवेदन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ सेवा और जांच के बारे में जानकारी से संबंधित हैं। आरटीआई अधिनियम के अनुसार, एक बार आरटीआई आवेदन खारिज होने के बाद, आवेदक प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील दायर कर सकता है, जो मंत्रालय या विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी है, जहां आवेदन दायर किया गया है। प्रथम अपीलीय आदेश से संतुष्ट न होने की स्थिति में पारदर्शिता प्रहरी सीआईसी के पास द्वितीय अपील दायर की जा सकती है।
टीम एबीएन, पटना। चारा घोटाला से जुड़े डोरंडा ट्रेजरी मामले में आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव को 5 साल की सजा सुनाई गई है, जिसके बाद से वह जेल में हैं। हालांकि स्वास्थ्य कारणों से रिम्स के पेइंग वार्ड में भर्ती हैं। इस बीच उनकी ओर से झारखंड हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की गई थी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया है। लालू के वकील देवार्षी मंडल ने जमानत याचिका को कोर्ट से विशेष श्रेणी में शामिल कर जल्द सुनवाई करने का आग्रह किया था। इस याचिका में उनकी उम्र और बीमारियों का हवाला दिया गया है। शुक्रवार यानी 4 मार्च को उनकी अर्जी पर सुनवाई होगी। आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव की जमानत याचिका में उनके अधिवक्ता की ओर से उनकी बढ़ती उम्र (73 साल), 17 बीमारियों का हवाला देने के साथ-साथ चारा घोटाले के मामले में आधी से अधिक सजा जेल में काट लेने को आधार बनाया गया है। लालू के परिवार और पार्टी के लोगों को उम्मीद है कि 4 तारीख को उनको बेल मिल जाएगी और वे घर में होली मना पाएंगे। 30 सितंबर 2013 को सभी 45 आरोपियों को दोषी ठहराया था। लालू समेत इन आरोपियों पर चाईबासा ट्रेजरी से 37.70 करोड़ रुपये अवैध तरीके से निकालने का दोषी पाया गया था। इस मामले में 3 अक्टूबर 2013 को कोर्ट ने सजा सुनाई थी। लालू प्रसाद को 5 साल की सजा हुई थी। देवघर ट्रेजरी से फर्जी तरीके से 84.5 लाख रुपये अवैध निकासी मामले में लालू प्रसाद को 23 दिसंबर 2017 को दोषी ठहराया गया था और 6 जनवरी को साढ़े तीन साल कैद की सजा सुनाई गई थी। साथ ही उनपर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
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