टीम एबीएन, पलामू। झारखंड में पलामू की एक अदालत ने हत्या के एक मामले में 12 लोगों को सबूत के अभाव में शुक्रवार को बरी कर दिया। इन 12 लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई थी और उनपर आरोप लगाया था कि 2018 में मनातु थानाक्षेत्र के सरगुजा बाहेरतांड गांव में उन्होंने इंद्रदेव उरांव एवं उसकी पत्नी सुकनी देवी की जादू-टोना करने को लेकर हत्या कर दी थी। अभियोजन पक्ष एवं बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रदीप कुमार चौबे ने इन सभी 12 लोगों को सबूत के अभाव में बरी कर दिया। बचाव पक्ष के वकील राहुल सत्यार्थी ने कहा कि आरोपियों को सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के विरोधाभासी बयानों के मद्देनजर संदेह का लाभ दिया गया। उन्होंने कहा कि गवाहों के बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट एवं इस संबंध में पुलिस द्वारा दाखिल किए गए आरोपपत्र के बीच मिलान नहीं पाया गया।
टीम एबीएन, रांची। राजधानी रांची में 10 जून को हुए हिंसा को लेकर दायर जनहित याचिका पर झारखंड हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने मामले में दोनों पक्षों को सुनने के बाद राज्य सरकार को समय देते हुए 8 जुलाई से पहले हर हाल में जवाब पेश करने को कहा है। अदालत ने पहले भी सरकार को जवाब पेश करने के लिए निर्देश दिया था, लेकिन सरकार ने जवाब पेश नहीं किया था। झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डॉ रवि रंजन और न्यायाधीश एसएन प्रसाद की अदालत में रांची हिंसा मामले पर सुनवाई हुई। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने अदालत को जानकारी दी कि विस्तृत जवाब नहीं पेश किया जा सका है। इसलिए जवाब के लिए समय दिया जाए। अदालत ने राज्य सरकार की आग्रह को स्वीकार करते हुए उन्हें 8 जुलाई से पूर्व अदालत में विस्तृत जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई को होगी। भाजपा प्रवक्ता रही नूपुर शर्मा के द्वारा पैगंबर मोहम्मद पर विवादित टिप्पणी के बाद रांची में 10 जून को जुमे की नमाज के बाद विरोध प्रदर्शन हुआ था। इस प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी। जांच में पाया गया है कि सुनियोजित तरीके से हिंसा फैलाई गई। उसी हिंसा की एनआईए से जांच की मांग को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। पंकज यादव ने जनहित याचिका दायर की है। मामले की उच्च स्तरीय जांच हो, इसलिए इस मामले की एनआईए से जांच की मांग की है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात के संवैधानिक अधिकार को समाप्त कर दिया है। देश की सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात के संवैधानिक अधिकार से जुड़े 50 साल पुराने फैसले को पलट दिया है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका में गर्भपात के अधिकार खत्म हो गए हैं। यह डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वह इस अधिकार की समर्थक रही है। आशंका जताई जा रही है कि इस फैसले से विरोध प्रदर्शन तेज हो सकता है। अमेरिका में पिछले 50 सालों से गर्भपात कानून को लेकर विवाद बना रहा है और अमेरिकी समाज भी गर्भपात करवाने के लिए कानून हो या ने हो इस मुद्दे पर बंटा रहा है। पिछले एक साल से ये मुद्दा सुर्खियों में बना हुआ है। पिछले महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट का इससे जुड़ा एक ड्राफ्ट लीक हो गया था, जिसके बाद पूरे देश में प्रदर्शन होने लगे थे। मीडिया में लीक ड्राफ्ट के मुताबिक, गर्भपात के अधिकार को खत्म करने की तैयारी थी। ड्राफ्ट में यह सुझाव दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने 1973 के रो बनाम वेड के फैसले को पलटने के लिए मतदान किया है। इसके खिलाफ अमेरिका में प्रदर्शन शुरू हो गए। अमेरिकी की एक बड़ी आबादी का मानना है, कि गर्भपात करवाना उनका मौलिक अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट उनसे यह अधिकार नहीं छीन सकता है। गर्भपात अमेरिका में हमेशा ही सामाजिक तनाव का मुद्दा रहा है। रिपब्लिकन पार्टी सहित बाकी कंजरवेटिव समूह और ईसाई चर्च महिलाओं को गर्भपात का अधिकार देने के खिलाफ मुहिम चलाते रहे हैं। जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी और अन्य प्रगतिशील खेमे इस अधिकार के समर्थक रहे हैं। अमेरिका में गर्भपात को जायज ठहराने वाला कोई कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के 1973 में दिए एक फैसले के तहत इसे वैध ठहराया गया था। अब लगभग 50 साल बाद इसे पलट दिया है। बीते महीने राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक बयान जारी कर कहा था कि गर्भपात कराने या ना कराने के बारे में फैसला लेना महिलाओं का मूलभूत अधिकार है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट फैसले को पलट देता है, तो फिर गर्भपात के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए कांग्रेस को कानून बनाना चाहिए। बर्नी सैंडर्स सहित कई प्रोग्रेसिव सांसदों ने भी उनका समर्थन किया था। वहीं, दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात कही थी। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गर्भपात के अधिकार के खिलाफ लगातार मुहिम चलाते रहे हैं। राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने कई जज नियुक्त किए। तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे सुप्रीम कोर्ट में ऐसे जज चाहते हैं, जो गर्भपात को संवैधानिक अधिकार घोषित करने के 1973 के निर्णय को पलट दें। ट्रंप ने अपने कार्यकाल के आखिर में एक जज की नियुक्ति कर दी थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कंजर्वेटिव विचारधारा का बहुमत हो गया था, तब ही ये माना जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट में ये फैसला पलटा जा सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रपति बाइडन और दूसरे डेमोक्रेटिक नेता गर्भपात के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए कानून बनाने की बात भले ही करें मगर ऐसा करना आसान नहीं होगा। गर्भपात के लिए कानून पारित होने के लिए 100 सदस्यीय सीनेट में फिलिबस्टर नियम के तहत 60 सदस्यों का समर्थन जरूरी होगा। डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 50 सीनेटर ही हैं। उप-राष्ट्रपति का एक अतिरिक्त वोट उनके पक्ष में है। फिर भी कुल समर्थक सदस्यों की संख्या 51 ही होती है। हालांकि राष्ट्रपति के पास फिलिबस्टर नियम को रद्द करने का अधिकार है, लेकिन जो बाइडन ऐसा करने से हिचकते रहे हैं। अमेरिका में सबसे पहले गर्भपात को लेकर विवाद साल 1973 में शुरू हुआ था, जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय बेंच ने 7-2 के बहुमत गर्भपात कानून के खिलाफ फैसला सुनाया था। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, कि गर्भपात करना महिलाओं का निजी अधिकार है। इसके बाद साल 1992 में भी अमेरिका में इसी तरह का एक मामला आया और उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात कानून के खिलाफ ही फैसला सुनाया था। उस वक्त अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए यहां तक कहा था, कि एक मां गर्भपात करने लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है और इसमें किसी भी तरह की दखलअंदाजी नहीं दी जा सकती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। उच्चतम न्यायालय ने 2002 के गुजरात दंगे मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 64 लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी की याचिका को खारिज कर दिया। जकिया गुजरात में 2002 के दंगों में मारे गए, कांग्रेस के सांसद एहसान जाफरी की पत्नी हैं। न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने एसआईटी की मामले को बंद करने संबंधी रिपोर्ट के खिलाफ दायर जकिया जाफरी की याचिका को खारिज करने के, विशेष मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि जाफरी की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। एहसान जाफरी 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद में गुलबर्ग सोसाइटी में मारे गए 68 लोगों में शामिल थे। इससे एक दिन पहले गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगा दी गई थी, जिसमें 59 लोग मारे गए थे। इन घटनाओं के बाद ही गुजरात में दंगे भड़क गए थे।
टीम एबीएन, रांची। 10 जून को रांची में हई भारी हिंसा को लेकर दायर जनहित याचिका पर झारखंड हाई कोर्ट में आज सुनवाई होगी। चीफ जस्टिस डॉ रवि रंजन और जस्टिस एसएन प्रसाद की खंडपीठ में सुनवाई के लिए ये मामला सूचीबद्ध है। पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रांची हिंसा पर नाराजगी जताते हुए सरकार से विजिलेंस रिपोर्ट तलब की थी। प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता राजीव कुमार ने न्यायालय के समक्ष मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच एनआईए से कराने का आग्रह किया था। इससे पहले 17 जून को हुई सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार को एक हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई के लिए 24 जून यानि आज की तिथि निर्धारित की थी। कोर्ट ने सरकार से इस मामले में खुफिया रिपोर्ट की भी मांग की थी। हाई कोर्ट ने कहा था इंटेलिजेंस को हिंसा की जानकारी थी या नहीं, सरकार इसकी जानकारी कोर्ट को दे। दरअसल 10 जून को बीजेपी प्रवक्ता नुपूर शर्मा के एक बयान को लेकर जुमे की नमाज के बाद उग्र भीड़ ने रांची के मेन रोड में जमकर हिंसा की थी। आगजनी, तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की घटना में जहां 2 लोगों की मौत हो गई थी वहीं कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गए थे। इसी हिंसा के बाद हाई कोर्ट में याचिका दायर पूरे मामले की एनआईए से जांच कराने की मांग की गई है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अगर आप भी सरकारी और गैर सरकारी संगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को जल्द ही अच्छी खबर मिल सकती है। सरकार बहुत जल्द देश के करीब 6 करोड़ से ज्यादा कर्मचारियों के पीएफ खातों में वित्त वर्ष 2022 का ब्याज ट्रांसफर करने वाली है। पीएफ काटने वाली संस्था ईपीएफओ कर्मचारियों के खाते में 30 जून तक ब्याज का पैसा ट्रांसफर कर सकती है। केंद्र सरकार पीएफ 8.1 फीसदी ब्याज देती है। हालांकि, खातों में ब्याज ट्रांसफर करने के बारे में ईपीएफओ ने अभी कुछ नहीं कहा है। EPFO ने वित्त वर्ष 2021-2022 के लिए ब्याज दर 8.1% तय की है। यह पिछले 10 साल में सबसे कम ब्याज दर है। ईपीएफओ सब्सक्राइबर्स को उम्मीद थी कि सरकार इस बार ज्यादा ब्याज देने की घोषणा करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकार के इस फैसले से EPFO के करीब 6 करोड़ सब्सक्राइबर्स को झटका लगा है। पिछले वित्त वर्ष में PF पर 8.5% ब्याज मिल रहा था। लगातार घट रहा है ब्याज : EPFO ने वित्त वर्ष 2019-2020 में 8.5% ब्याज दिया था। 2020-2021 में भी 8.5% की दर से ब्याज मिला था, जबकि वित्त वर्ष 2018-19 में 8.65%, 2017-18 में 8.55%, 2016-17 में 8.65% और वित्त वर्ष 2015-16 में 8.8% ब्याज सब्सक्राइबर्स को मिला था। ऑनलाइन देखें बैलेंस : अपने पीएफ खाते का बैलेंस जानने के लिए आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। आप ईपीएफओ की आधिकारिक वेबसाइट epfindia.gov.in पर जाकर अपना बैलेंस जान सकते हैं। इस साइट पर जाने के बाद ई-पासबुक पर क्लिक करें। इस पर क्लिक करने के बाद आपको अपना UAN नंबर, पासवर्ड और कैप्चा भरना होगा। ऐसा करने पर आपको पीएफ खाते से जुड़ी जानकारियां दिखने लगेंगी।।यहां आपको मेंबर आईडी दिखेगी। इसे सेलेक्ट करेंगे तो आपको E-Passbook पर अपना पीएफ बैलेंस दिखने लगेगा।
टीम एबीएन, रांची। पूजा सिंघल प्रकरण में ईडी अपनी कार्रवाई को आगे बढ़ाने की तैयारियों में जुट गई है। मिली जानकारी के अनुसार इसी महीने के अंत तक ईडी मनरेगा घोटाले में चार्जशीट दायर करेगी। जानकारी के अनुसार ईडी के द्वारा निलंबित आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल, सीए सुमन सिंह, पूजा सिंघल के पति अभिषेक झा के साथ साथ डीएमओ रैंक के अफसरों पर भी चार्जशीट की जा सकती है। ईडी सूत्रों के मुताबिक, साल 2009-11 के बीच मनरेगा घोटाले से अर्जित पैसों की मनी लॉन्ड्रिंग हुई। बाद में सरकारी पद पर रहते हुए पूजा सिंघल ने डीएमओ रैंक के अफसरों के मिलीभगत से भी मनी लॉन्ड्रिंग की। जांच में डीएमओ से पैसे लेने की बात का खुलासा हुआ है। ईडी ने राज्य के तकरीबन आधा दर्जन डीएमओ रैंक के अफसरों से अबतक पू्छताछ भी की है। मिल रही खबर के अनुसार मनरेगा घोटाले से अर्जित पैसों के जरिए पल्स डायग्नोसिस सेंटर व पल्स अस्पताल का निर्माण हुआ। अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति की मनी लॉन्ड्रिंग कर पल्स अस्पताल व डायग्नोसिस सेंटर खोला गया। जांच में इससे संबंधित तथ्य भी ईडी को मिले हैं, ऐसे में ईडी अभिषेक झा पर भी चार्जशीट दायर कर सकती है।
टीम एबीएन, रांची। रांची पुलिस ने मंगलवार को 10 तारीख को हुए उपद्रव और पत्थरबाजी मामले में 3 और लोगों को गिरफ्तार किया। जिन्हें आज पहचान के लिए कोतवाली थाने में रखा गया। इसके बाद उन्हें कोविड-19 लिए सदर अस्पताल ले जाया जाएगा न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया जाएगा जिन तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पहली बार रांची में किसी भी गिरफ्तार आरोपी की तस्वीर सामने आई है, हालांकि रांची पुलिस ने तत्काल में इन तीनों का नाम नहीं बताया लेकिन इतना जरूर बताया की पहचान करके सबूत के साथ इन तीनों को गिरफ्तार किया गया है। रांची के एएसपी और एसआईटी के हेड अंशुमन कुमार ने बताया कि जल्दी कुछ और की गिरफ्तारियां होंगी साथ ही उन्होंने यह बताया कि पुलिस सही दिशा में जा रही है।
टीम एबीएन, रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से जुड़े ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में आज (14 जून) सुनवाई होगी। इससे पहले भारत निर्वाचन आयोग ने सीएम हेमंत सोरेन और भारतीय जनता पार्टी को 14 जून को पक्ष रखने का आदेश दिया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के द्वारा 31 मई को उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त करते हुए समय की मांग की गयी थी, जिसके बाद चुनाव आयोग ने नई तारीख 14 जून निर्धारित की। इससे पहले हुए घटनाक्रम में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा इस संबंध में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और भारतीय जनता पार्टी को चिट्ठी उपलब्ध करा दी गयी। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर रांची के अनगड़ा में पत्थर खदान लीज अपने नाम पर लेने का आरोप लगाते हुए ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का आरोप लगाते हुए राज्यपाल से लिखित शिकायत की थी। रांची के अनगड़ा में पत्थर खदान लीज लेने को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला बताते हुए भाजपा ने राज्यपाल से शिकायत की थी। इसी आधार पर चुनाव आयोग ने मुख्यमंत्री से जवाब मांगा था। उन्हें 10 मई तक जवाब देना था लेकिन सीएम ने अपनी माता की तबीयत का हवाला देते हुए अतिरिक्त समय की मांग की थी। इसके बाद उन्हें 20 मई तक जवाब देने का समय मिला था. 20 मई को मुख्यमंत्री की तरफ से जवाब भी दे दिया गया, जिसमें उन्होंने कहा कि उनके पास कोई माइनिंग लीज नहीं है। इसके बाद चुनाव आयोग की ओर से 31 मई को आयोग में पेश होने का आदेश दिया गया था, जिसके बाद सीएम हेमंत सोरेन से चुनाव आयोग से अपील करते हुए अतिरिक्त समय की मांग की थी, जिसे चुनाव आयोग ने मान लिया और आज (14 जून) तक का अतिरिक्त समय दिया।
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