एबीएन सेंट्रल डेस्क। राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि के एक मामले में चाईबासा में दर्ज मानहानि मुकदमे मामले में सोमवार को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस के द्विवेदी की कोर्ट ने राज्य सरकार एवं शिकायतकर्ता भाजपा नेता प्रताप कुमार के आग्रह पर प्रतिशपथ पत्र दाखिल करने के लिए समय दिया। दरअसल पूर्व में कोर्ट ने इस मामले में राहुल गांधी के खिलाफ किसी भी पीड़क कार्रवाई पर रोक लगाई थी। दरअसल, इस 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने संबोधन में कहा था कि कांग्रेस में कोई हत्यारा राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं हो सकता है लेकिन भाजपा में यह संभव है।भाजपा के लोग ही हत्यारे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकते हैं। भाजपा झूठे लोगों की पार्टी है। राहुल गांधी का इशारा भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह की ओर था। मानहानि के केस में गवाही के बाद निचली अदालत ने मामले में संज्ञान लिया था और राहुल गांधी के खिलाफ 7 अप्रैल 2022 में जमानतीय।वारंट जारी किया था। इसके खिलाफ ही मानहानि के मुकदमे को निरस्त करने को लेकर राहुल गांधी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी जिस पर आज सुनवाई हुई। इस मामले में राज्य सरकार और शिकायतकर्ता प्रताप कुमार ने समय की मांग की जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया है। शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता विनोद साहू ने पैरवी की।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सरकार ने घृणा फैलाने तथा सांप्रदायिक सछ्वाव बिगाड़ने वाले 45 यू ट्यूब वीडियो पर प्रतिबंध लगाया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 के तहत अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफार्म यू ट्यूब से 10 यू ट्यूब चैनलों के 45 वीडियों पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। यह निर्देश गत 23 सितम्बर से प्रभावी है। इन वीडियो को सवा करोड़ से अधिक लोगों ने देखा है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने ट्वीट कर बताया कि सूचना प्रसारण मंत्रालय ने 10 यूट्यूब चैनलों को देश के खिलाफ जहर उगलने वाले, भ्रामक खबरों के माध्यम से मित्र देशों के साथ सम्बंधों को खराब करने का प्रयास करने के लिए प्रतिबंध लगा कर उन्हें सस्पेंड कर दिया है। राष्ट्रहित में ये पहले भी किया है, आगे भी करेंगे। मंत्रालय ने कहा है कि इन वीडियो में धार्मिक समुदायों के बीच घृणा फैलाने के उद्देश्य से फर्जी खबरें और ऐसी क्लिपिंग डाली गयी हैं जिनमें फेरबदल किया गया है। इनमें कई फर्जी दावे किये गये हैं जैसे सरकार कुछ समुदायों के धार्मिक अधिकारों को वापस ले रही है और देश में गृह युद्ध का ऐलान हो गया है। सरकार का कहना है कि इस तरह के वीडियो से सांप्रदायिक सद्भावना बिगड़ने और कानून व्यवस्था की स्थिति गड़बड़ाने की आशंका है। कुछ वीडियो में अग्निपथ योजना, सशस्त्र सेनाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र और कश्मीर के बारे में गलत जानकारी फैलायी जा रही है। इनमें दी गयी विषय वस्तु झूठी और सुरक्षा तथा मित्र देशों के साथ संबंधों के मद्देनजर काफी संवेदशील है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का लाइव प्रसारण किया जा रहा है। वहीं आज सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि उसकी कार्यवाही के सीधे-प्रसारण (लाइव स्ट्रीमिंग) के लिए उसका अपना प्लेटफ़ॉर्म होगा और इस उद्देश्य के लिए यूट्यूब का उपयोग अस्थायी है। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) उदय उमेश ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह बात उस समय कही जब भाजपा के पूर्व नेता के एन गोविंदाचार्य के वकील ने तर्क दिया कि शीर्ष अदालत की कार्यवाही का कॉपीराइट यूट्यूब जैसे निजी मंच को नहीं सौंपा जा सकता है। वकील विराग गुप्ता ने पीठ को बताया, यूट्यूब ने स्पष्ट रूप से वेबकास्ट के लिये कॉपीराइट की मांग की है। पीठ में न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला भी शामिल हैं। सीजेआई ने कहा, यह शुरुआती चरण है। निश्चित रूप से हमारा अपना मंच होगा... हम इसका (कॉपीराइट मुद्दे का) ध्यान रखेंगे। इसके साथ ही पीठ ने गोविंदाचार्य की अंतरिम याचिका पर सुनवाई के लिये 17 अक्टूबर की तारीख तय की। वकील ने 2018 के एक फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि यह माना गया था कि इस अदालत में दर्ज और प्रसारित सभी सामग्री पर कॉपीराइट केवल इस अदालत के पास होगा। उन्होंने यूट्यूब के उपयोग की शर्तों का भी उल्लेख किया और कहा कि इस निजी मंच को भी कॉपी राइट प्राप्त है। सीजेआई की अध्यक्षता में हाल ही में पूर्ण अदालत की बैठक में लिये गये सर्वसम्मत निर्णय में, शीर्ष अदालत ने 27 सितंबर से सभी संविधान पीठ की सुनवाई की कार्यवाही को सीधे प्रसारित करने का फैसला किया। यह फैसला इस संबंध में 2018 में एक फैसला सुनाए जाने के लगभग चार साल बाद आया। सूत्रों ने कहा था कि शीर्ष अदालत यूट्यूब के माध्यम से कार्यवाही का सीधा प्रसारण कर सकती है और बाद में उन्हें अपने सर्वर पर जारी कर सकती है। लोग उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही को अपने मोबाइल फोन, लैपटॉप और कंप्यूटर पर बिना किसी बाधा के देख सकते हैं। अपनी स्थापना के बाद पहली बार 26 अगस्त को न्यायालय ने एक वेबकास्ट पोर्टल के माध्यम से तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ की कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया। यह एक औपचारिक कार्यवाही थी क्योंकि उस दिन न्यायमूर्ति रमण सेवानिवृत्त हो रहे थे।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए आईएएस अधिकारी और परिवहन सचिव केके सोन के वेतन पर रोक लगा दी। पूरा मामला परिवहन विभाग के कर्मचारियों के वेतन और अन्य भुगतान से जुड़ा हुआ है, जिसको लेकर झारखंड हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने तीन साल पहले ही इस संबंध में अपना आदेश जारी कर दिया था। सुनवाई के दौरान झारखंड हाईकोर्ट ने परिवहन सचिव केके सोन से पूछा कि कोर्ट के आदेश के बावजूद कर्मचारियों को वेतन और अन्य भुगतान क्यों नहीं किया गया। जिस पर परिवहन सचिव केके सोन और राज्य सरकार के अधिवक्ता की ओर से कोर्ट के समक्ष अपना जवाब प्रस्तुत किया गया, लेकिन कोर्ट उनके जवाब से संतुष्ट नजर नहीं आया। हालांकि कोर्ट में सुनवाई के दौरान परिवहन सचिव खुद उपस्थित रहे। कोर्ट ने कहा कि जब तक विभाग के कर्मचारियों का वेतन भुगतान नहीं किया जाता, तब तक विभागीय सचिव का वेतन भी रुका रहेगा। दरअसल, इस मामले में सिंगल बेंच ने तीन साल पहले ही विभागीय कर्मचारियों के पक्ष में आदेश दिया था। लिहाजा शुक्रवार को इस मामले में जस्टिस डॉ एसएन पाठक की कोर्ट में कंटेंप्ट याचिका पर सुनवाई हुई। इस मामले में आदेश का पालन नहीं होने पर कोर्ट ने इसे अवमानना माना और इस पर अपना कड़ा रुख दिखाया। जाहिर है कोर्ट के इस फैसले के बाद विभाग के कर्मचारियों को अपने वेतन और अन्य भुगतान को लेकर एक उम्मीद जगी है। इस मामले में कोर्ट में निहाल खान एवं अन्य की ओर से अवमाननावाद दायर की गई थी।
टीम एबीएन, रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चुनाव आयोग से झटका लगा है। आयोग ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट से जुड़े मामले की कॉपी देने से इनकार कर दिया है। दरअसल, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के वकील वैभव तोमर ने 1 सितंबर और 15 सितंबर को चुनाव आयोग को पत्र भेजा था। उन्होंने सीएम से जुड़े ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में आयोग द्वारा राजभवन को भेजे गये मंतव्य की कॉपी मांगी थी। उसी पत्र का जवाब देते हुए आयोग ने स्पष्ट किया है कि संविधान की धारा 192 (2) के तहत यह दो संवैधानिक अथॉरिटी के बीच का मामला है। इसलिए इस मसले पर राजभवन का आदेश आने से पहले आयोग द्वारा राजभवन को भेजी गई अपने मंतव्य की कॉपी देना संविधान का उल्लंघन कहलायेगा। आयोग ने इसके लिए एक उदाहरण भी दिया है। डीडी थाइसी बनाम इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया से जुड़े WPC NO.152/2021 मामले में सुप्रीम कोर्ट में पिटीशनर ने चुनाव आयोग द्वारा मणिपुर के गवर्नर को भेजे गये मंतव्य की कॉपी मुहैया कराने की मांग की थी। इस पर आयोग ने दलील दी थी कि दो संवैधानिक ऑथरिटी के बीच हुए कम्युनिकेशन का खुलासा करना संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा। आयोग का पक्ष जानने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिसंबर 2021 को याचिकाकर्ता के पिटिशन को खारिज कर दिया था। आयोग ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के वकील को साल 2016 के उस ऑर्डर की कॉपी भी मुहैया कराई है, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि संविधान की धारा 103 (2) और 192 (2) से जुड़े मामलों की कॉपी राइट टू इनफार्मेशन एक्ट के सेक्शन 8 (1))(e) और 8(1)(h) तब तक नहीं दी जा सकती, जबतक उसपर राष्ट्रपति या गवर्नर का आदेश नहीं दी सकती है। इसको लेकर 2 अगस्त 2022 को भी आयोग की तरफ एक सर्कूलर जारी हो चुका है। इस सर्कुलर की कॉपी भी सीएम हेमंत सोरेन के वकील को मुहैया करायी गयी है। अधिवक्ता वैभव गौरव ने भाजपा बनाम हेमंत सोरेन से जुड़े केस नं. 3(G), 2022 का हवाला देते हुए 1 सितंबर को चुनाव आयोग को पत्र भेजा था। पत्र में उन्होंने जिक्र किया था कि आयोग को नोटिस पर 8 अगस्त और 12 अगस्त को दलील पेश की गई थी। इसके बाद आयोग ने 12 अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद 18 अगस्त को लिखित में पक्ष रखा गया था। हेमंत सोरेन के वकील ने अपने पत्र में लिखा था कि उन्हें मीडिया रिपोर्ट से जानकारी मिली है कि आयोग ने इस मामले पर अपने मंतव्य राजभवन को प्रेषित कर दिया है। उन्होंने रिप्रजेंटेशन ऑफ पिपुल एक्ट, 1951 का धाराओं का हवाला देते हुए कॉपी मुहैया कराने की मांग की थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने महाराष्ट्र के सोलापुर स्थित द लक्ष्मी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड का लाइसेंस रद्द कर दिया है। बैंक के पूंजी कमी और आमदनी की संभावनाएं नहीं होने के मद्देनजर केंद्रीय बैंक ने यह कदम उठाया है। आरबीआई ने बयान में कहा कि को-ऑपरेटिव बैंक द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (डीआईसीजीसी) से 99 प्रतिशत से अधिक जमाकर्ता अपनी जमा की पूरी राशि प्राप्त करने के हकदार हैं। इसमें कहा गया है कि डीआईसीजीसी ने 13 सितंबर, 2022 तक कुल बीमित जमा राशि का 193.68 करोड़ रुपये पहले ही भुगतान कर दिया है। आरबीआई ने बैंक के पास पर्याप्त पूंजी और कमाई की संभावनाएं नहीं हैं। केंद्रीय बैंक ने कहा कि लक्ष्मी को-ऑपरेटिव बैंक बृहस्पतिवार (22 सितंबर, 2022) को कारोबार की समाप्ति से बैंकिंग कारोबार बंद कर देगा। रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि बैंक अपनी मौजूदा वित्तीय स्थिति में जमाकर्ताओं की पूरी राशि का भुगतान करने में समर्थ नहीं है।
एबीएन सेंट्रल सरकार ने दूरसंचार क्षेत्र को और सहूलियत देने के लिए बुधवार को इंडियन टेलीकम्युनिकेशंस बिल 2022 जारी कर दिया है। इसमें टेलीकॉम सेवाओं को और किफायती बनाने और कंपनियों को राहत देने के लिए कई नये नियम शामिल किये गये हैं। दूरसंचार विभाग (डॉट) ने बताया कि नए बिल के तहत दूरसंचार और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को फीस और पेनॉल्टी में छूट दिये जाने का प्रावधान है। इसके अलावा अगर टेलीकॉम या इंटरनेट प्रोवाइडर अपना लाइसेंस सरेंडर करता है तो उसे फीस रिफंड कर दी जायेगी। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ड्राफ्ट बिल का लिंक शेयर करते हुए पूछा कि इस पर लोगों के सुझाव चाहिए और 20 अक्तूबर तक बिल पर पब्लिक अपना सुझाव दे सकती है। इसके बाद इसे अंतिम रूप दिया जायेगा। बिल के रूप में तैयार मसौदे के अनुसार, केंद्र सरकार दूरसंचार और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को फीस में पूरी तरह या आंशिक रूप से छूट दे सकती है। इसमें एंट्री फीस, लाइसेंस फीस, रजिस्ट्रेशन फीस सहित अन्य दूसरी तरह की फीस व चार्जेज शामिल होंगे। इसके अलावा ब्याज, अतिरिक्त चार्ज और पेनॉल्टी पर भी लाइसेंस धारकों और रजिस्टर्ड संस्थाओं को छूट दी जा सकती है। बिल में केंद्र या राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त संवाददाताओं के भारत में प्रकाशित होने वाले प्रेस संदेशों को इंटरसेप्शन से छूट देने का भी प्रस्ताव है। बिल के रूप में तैयार मसौदे के अनुसार, केंद्र सरकार दूरसंचार और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को फीस में पूरी तरह या आंशिक रूप से छूट दे सकती है। इसमें एंट्री फीस, लाइसेंस फीस, रजिस्ट्रेशन फीस सहित अन्य दूसरी तरह की फीस व चार्जेज शामिल होंगे। इसके अलावा ब्याज, अतिरिक्त चार्ज और पेनॉल्टी पर भी लाइसेंस धारकों और रजिस्टर्ड संस्थाओं को छूट दी जा सकती है। बिल में केंद्र या राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त संवाददाताओं के भारत में प्रकाशित होने वाले प्रेस संदेशों को इंटरसेप्शन से छूट देने का भी प्रस्ताव है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) की अध्यक्ष माधवी पुरी बुच ने बुधवार को कहा कि व्यवसाय करने का कोई भी ऐसा तरीका जो ब्लैक बॉक्स पर आधारित है और जिसका न तो लेखा परीक्षण किया जा सकता है और न ही सत्यापन किया जा सके, उसकी इजाजत नहीं दी जायेगी। उन्होंने यह भी कहा कि डेटा सार्वजनिक अवसंरचना है और इसे अपने अधिकार में लेने का किसी भी निजी इकाई या व्यक्ति का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। ब्लैक बॉक्स एक उपकरण या प्रणाली है, जो अपने आतंरिक कामकाज के बारे में कोई खुलासा किए बिना उपयोगी जानकारी देता है। इसके निष्कर्षों के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं रहता है। बुच ने ग्लोबल फिनटेक फेस्ट को संबोधित करते हुए कहा, हम एल्गो (एल्गोरिदम) ट्रेडिंग के समर्थन में या विरोध में नहीं हैं, बशर्ते पर्याप्त पारदर्शिता और खुलासे हों। कारोबारी मॉडल ब्लैक बॉक्स पर आधारित नहीं हो सकते हैं...इसलिए ऐसा कोई भी दावा जिसका लेखा परीक्षण या सत्यापन नहीं हो सके उसकी इजाजत नहीं दी जायेगी। ऐसी खबरें आई थी कि बाजार नियामक एल्गो ट्रेडिंग के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। इस महीने की शुरुआत में पूंजी बाजार नियामक सेबी ने निवेशकों को एल्गो ट्रेडिंग से संबंधित सेवाएं देने वाले ब्रोकरों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। इस पहल का उद्देश्य उच्च रिटर्न का दावा कर शेयर बिक्री पर रोक लगाना है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने पाया कि कुछ शेयर ब्रोकर नियमन के दायरे से बाहर मंचों के जरिये एल्गोरिदम (एल्गो) आधारित कारोबार की सुविधा निवेशकों को दे रहे हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। आईआरसीटी घोटाले को लेकर बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सीबीआई ने तेजस्वी यादव की जमानत को रद्द करने के लिए दिल्ली की अदालत में एक अर्जी लगाई है। इसके बाद कोर्ट ने तेजस्वी यादव को नोटिस भी जारी कर दिया है। इस अर्जी के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने तेजस्वी को समन किया है। सीबीआई का कहना है कि, तेजस्वी ने कथित रूप से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीबीआई के अधिकारियों को धमकी दी थी। तेजस्वी यादव की जमानत रद्द की जाए क्योंकि उन्होंने जमानत का शर्तों का उल्लंघन किया है।
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