रांची में सड़क जाम और खराब ट्रैफिक पर हाईकोर्ट नाराज, एसपी को किया तलबटीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने रांची में सड़क जाम और ट्रैफिक के खराब सिस्टम पर नाराजगी जाहिर की है। मंगलवार यानी आज (2 अप्रैल) को एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पुलिस और रांची नगर निगम की भूमिका पर सवाल खड़े किये हैं और इस मामले में जवाब देने के लिए रांची के ट्रैफिक एसपी को बुधवार को सशरीर उपस्थित होने को कहा है।शहर में जाम की समस्या क्यों बनी रहती हैअदालत ने रांची नगर निगम के अधिवक्ता से जानना चाहा कि शहर में जाम की समस्या क्यों बनी रहती है? ट्रैफिक सिग्नल खराब क्यों हैं? मेन रोड, कोकर एवं अन्य जगहों पर मल्टी स्टोरी पार्किंग की व्यवस्था अब तक क्यों नहीं की गयी? ट्रैफिक रूल्स का उल्लंघन करने वाले चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस क्यों नहीं सस्पेंड किये जाते हैं?ट्रैफिक रूल्स का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माने की बढ़ायी गयी रकमइस पर रांची नगर निगम की ओर से बताया गया कि पहले की तुलना में ट्रैफिक सिस्टम बेहतर हुआ है और ट्रैफिक रूल्स का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माने की रकम भी बढ़ायी गयी है। शहर में फ्लाईओवर का निर्माण कार्य चल रहा है। इस वजह से जाम की समस्या रहती है। दिसंबर 2024 तक फ्लाईओवर का काम पूरा होने के बाद लोगों को जाम की समस्या से निजात मिलेगी।बुधवार को मांगा एसपी से कोर्ट ने जवाबकोर्ट ने नगर निगम के जवाब पर असंतुष्टि जाहिर की और ट्रैफिक एसपी को इन सवालों पर जवाब बुधवार को देने को कहा है।
लातेहार में कार से 21.95 लाख कैश बरामदवाहन जांच के दौरान पुलिस को मिली सफलताएबीएन न्यूज नेटवर्क, बारियातू (लातेहार)। लोकसभा चुनाव 2024 को निष्पक्ष व भयमुक्त बनाने को लेकर पुलिस प्रशासन संकल्पित है। इसी क्रम में शुक्रवार की सुबह अंतरजिला सीमा क्षेत्र (लातेहार-चतरा) के बारियातू थाना गेट के समीप चेकपोस्ट पर वाहन चेकिंग के दौरान पुलिस ने बड़ी मात्रा में नकदी बरामद की है। ये जांच अभियान बालूमाथ अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी आशुतोष कुमार सत्यम की मॉनिटरिंग में बारियातू थाना प्रभारी राजा दिलावर के नेतृत्व में किया जा रहा है। जांच अभियान के दौरान एक कार (जेएच 02बीएम-3719) से 21 लाख 95 हजार रुपये कैश बरामद किये गये। एसडीपीओ आशुतोष कुमार सत्यम ने जानकारी दी कि लातेहार पुलिस अधीक्षक अंजनी अंजन के निर्देश पर लोकसभा चुनाव-2024 में धनबल व नशे की रोकथाम को लेकर 22 मार्च से लगातार चेकपोस्ट पर जांच अभियान जारी है। शुक्रवार की सुबह सिमरिया से बालूमाथ की ओर जा रही एक कार की तलाशी ली गयी। इसमें रखे काले रंग के बैग से नकद 21 लाख 95 हजार रुपये बरामद किये गये। उन्होंने बताया कि इसे जब्त करते हुए इसकी सूचना वरीय पुलिस पदाधिकारी, अनुवीक्षण कमेटी व आयकर विभाग को दी गयी है। यह पैसा किसका है, किस काम का है। सभी बिंदुओं पर जांच जारी है। अगर किसी व्यक्ति को 50 हजार रुपये से अधिक कैश ले जाना है, तो उसे अपने पहचान पत्र के अलावा पैसे निकालने से संबंधित पर्ची और पैसे कहां इस्तेमाल होंगे। इसका प्रमाण भी रखना होगा। मौके पर निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी सह बीडीओ नंदकुमार राम के अलावा सहायक अवर निरीक्षक द्वारिका नाथ पांडेय व सशस्त्र बल के जवान शामिल थे।एसडीपीओ ने बताया कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद से अब तक लातेहार पुलिस ने कुल 26 लाख 11 हजार रुपये नकद बरामद किये हैं। इसके अलावा करीब तीन करोड़ 60 लाख रुपये मूल्य की अफीम, डोडा, नार्कोटिक्स ड्रग्स व गांजा आदि भी जब्त किया जा चुका है। कुल पांच हथियार (आग्नेयास्त्र) व 19 जिंदा कारतूस भी पुलिस ने बरामद किया है। आचार संहिता के बाद से यह जब्ती पुलिस के लिए बड़ी उपलब्धि है।
हेमंत सोरेन ने सुप्रीम कोर्ट में HC के इस फैसले को दी चुनौती1 अप्रैल को होगी सुनवाईटीम एबीएन, रांची। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विधानसभा सत्र की कार्यवाही में शामिल नहीं होने पर हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। वहीं, इसके लिए सुनवाई 1 अप्रैल को होगी। जानकारी के मुताबिक हेमंत सोरेन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि जेल में बंद जनप्रतिनिधियों को सत्र के दौरान शामिल होने की अनुमति मिलती है। हाई कोर्ट और ईडी कोर्ट में इससे संबंधित अदालतों के आदेश को पेश भी किया गया था, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार नहीं की और खारिज कर दी। याचिका में हेमंत सोरेन ने मांग करते हुए कहा, आने वाले दिनों में आहूत होने वाले विधानसभा के सत्र में उन्हें शामिल होने की अनुमति दी जाए। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट से हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करने का आग्रह किया है। बता दें कि फरवरी में झारखंड विधानसभा सत्र के दौरान हेमंत सोरेन ने ईडी कोर्ट से सदन में शामिल होने के लिए कहा था, लेकिन ईडी कोर्ट ने अनुमति नहीं दी, जिसके बाद हेमंत सोरेन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट से भी पूर्व सीएम को सदन में शामिल होने की अनुमति नहीं मिल पायी थी।
टीम एबीएन, रांची। मनी लॉन्ड्रिंग केस में पूर्व सीएम हेमंत सोरेन की न्यायिक हिरासत बढ़ी, चार अप्रैल तक जेल में रहेंगे। मनी लॉन्ड्रिंग केस में पूर्व सीएम हेमंत सोरेन की न्यायिक हिरासत बढ़ी, चार अप्रैल तक जेल में रहेंगे।इससे पहले, 15 फरवरी को पीएमएलए कोर्ट ने सोरेन को 22 फरवरी तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। बाद में उनकी न्यायिक हिरासत 21 मार्च तक बढ़ा दी थी। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के तुरंत बाद 31 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सोरेन का गिरफ्तार कर लिया था। तब से सोरेन रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय जेल में बंद हैं। ईडी ने सोरेन को 31 जनवरी को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कथित भूमि घोटाला मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया था। इससे पहले उन्होंने ईडी की हिरासत में झारखंड के राज्यपाल को सीएम पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया था। ईडी ने इससे पहले हेमंत सोरेन के ठिकानों पर छापा मारा था और दावा किया था कि उसने झामुमो प्रमुख के कब्जे से 36 लाख रुपये से अधिक की नकदी बरामद की है। साथ ही कथित तौर पर धोखाधड़ी से हासिल की गयी भूमि से जुड़े दस्तावेज भी बरामद किए हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी का कहना है कि पूर्व सीएम ने कथित तौर पर 8.5 एकड़ जमीन आपराधिक आय से हासिल की थी।
सुप्रीम कोर्ट में स्टेट बैंक के चेयरमैन दिनेश कुमार खारा ने दिया हलफनामाएबीएन सेंट्रल डेस्क। स्टेट बैंक आफ इंडिया के चेयरमैन ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक इलेक्टोरल बांड से जुड़ी सारी जानकारी आज चुनाव आयोग को उपलब्ध करा दी गयी है। स्टेट बैंक के चेयरमैन दिनेश कुमार खारा ने कहा कि इस जानकारी में इलेक्टोरल बांड का नंबर, इलेक्टोरल बांड की कीमत, पार्टी का नाम, पार्टी के बैक अकाउंट की आखिरी चार डिजिट नंबर, भुनाए गए बांड की कीमत और नंबर शामिल है। स्टेट बैंक ने हलफनामे में कहा है कि साइबर सुरक्षा के मद्देनजर राजनीतिक पार्टी का पूरा बैंक खाता नंबर, पार्टी और बांड खरीदने वाले की केवाईसी डिटेल्स सार्वजनिक नहीं की गयी है। इस जानकारी के अलावा कोई और जानकारी स्टेट बैंक ने अपने पास नहीं रखी है। सुप्रीम कोर्ट ने 18 मार्च को स्टेट बैंक को खरीदे गये और कैश कराये गये बांड नंबरों का पूरा ब्यौरा चुनाव आयोग को देने और चुनाव आयोग को उसे प्रकाशित करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बैंक के चेयरमैन से कहा था कि भविष्य में किसी विवाद की गुंजाइश को खत्म करने के लिए वो 21 मार्च को 5 बजे तक कोर्ट में हलफनामा दायर कर साफ करें कि उनके पास उपलब्ध सारी जानकारी चुनाव आयोग को दे दी गयी है। निर्वाचन आयोग स्टेट बैंक से जानकारी मिलते ही उसे तुरंत अपनी वेबसाइट पर डालेगा। इससे पहले 16 मार्च को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने इलेक्टोरल बांड मामले में सीलबंद डाटा निर्वाचन आयोग को सौंप दिया था। इस डाटा में 2019 और नवंबर, 2023 में दिए गए इलेक्टोरल बांड का ब्योरा है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि वो 2019 और नवंबर 2023 के डाटा की कॉपी कर उसकी मूल प्रति निर्वाचन आयोग को सौंप दे। कोर्ट ने 15 मार्च को निर्वाचन आयोग की अर्जी पर सुनवाई करते हुए सवाल उठाया था कि स्टेट बैंक की ओर से निर्वाचन आयोग को दिये गये आंकड़ों में बांड नंबर का उल्लेख नहीं किया गया है, जबकि इसका साफ आदेश था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने स्टेट बैंक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
हाईकोर्ट ने कहा- वर्ष 2003 का संकल्प अब झारखंड में प्रभावी नहींटीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ दायर एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण झारखंड सरकार आज से नहीं दे सकती है। जब तक की झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट के जरनैल सिंह जजमेंट 1, 2 एवं एम नागराज के केस में जो दिए गए दिशा-निर्देश के आलोक में नयी नियमावली नहीं बनाती। हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस एस चंद्रशेखर और जस्टिस नवनीत कुमार की खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा गया था कि झारखंड सरकार का 31 मार्च 2003 का संकल्प गलत है। क्योंकि इसमें सुप्रीम कोर्ट के एम नागराज जजमेंट एवं जरनैल सिंह जजमेंट में जो गाइडलाइन दिया गया था उसका पालन नहीं किया गया है। अदालत ने 2003 से लंबित इस याचिका को मंगलवार को निष्पादित कर दिया। अपने फैसले में अदालत ने कहा है कि झारखंड सरकार का 31 मार्च 2003 का संकल्प अब प्रभावी नहीं होगा। जब तक नियमावली, गाइडलाइन, एग्जिक्यूटिव इंस्ट्रक्शन सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट एम नागराज एवं जनरैल सिंह जजमेंट 1 व 2 के आलोक में नहीं लाए जाते। दरअसल वर्ष 2003 में राज्य सरकार ने सड़क निर्माण विभाग में पदस्थापित एसटी-एसटी कैटगरी के जूनियर इंजीनियर को असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन दिया था। जबकि सामान्य जाति को इसका लाभ नहीं मिला था। सरकार के इस आरक्षण -प्रमोशन के विरोध में झारखंड हाईकोर्ट में रघुवंश प्रसाद सिंह, जय किशोर दत्ता, गणेश प्रसाद समेत 37 से अधिक लोगों ने अगल-अलग समय में रिट याचिका दाखिल की थी।
शराब घोटाला मामले में दिल्ली कोर्ट ने सीएम अरविंद केजरीवाल को दी जमानत ईडी ने मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष दो शिकायतें दायर की थीं, जिसमें मामले में उन्हें जारी किए गए कई समन को नजरअंदाज करने के लिए केजरीवाल के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गयी थी एबीएन सेंट्रल डेस्क। दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने शनिवार को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में 15,000 रुपये के जमानत बांड और 1 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दे दी। मामले पर ईडी की दो शिकायतों के आधार पर अदालत द्वारा उन्हें जारी किये गये समन के बाद केजरीवाल अदालत में पेश हुए थे। ईडी ने मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष दो शिकायतें दायर की थीं, जिसमें मामले में उन्हें जारी किए गए कई समन को नजरअंदाज करने के लिए केजरीवाल के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई थी। ताजा शिकायत आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक द्वारा समन संख्या का सम्मान नहीं करने से संबंधित है। ईडी ने इससे पहले मजिस्ट्रियल अदालत में याचिका दायर कर केजरीवाल पर मुकदमा चलाने की मांग की थी, क्योंकि वह अब खत्म हो चुकी दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें जारी किए गए पहले तीन समन में शामिल नहीं हुए थे।एसीएमएम मल्होत्रा की अदालत ने मामले को (समन संख्या 1 से 3 के संबंध में) अन्य शिकायत के साथ 16 मार्च को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था। बता दें कि आज दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राउज एवेन्यू कोर्ट में पेशी हुई। इसी के चलते उनके आवास के बाहर भी काफी सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। करीब 10 बजे अरविंद केजरीवाल अपने आवास से कोर्ट के लिए रवाना हुए थे, जिसके चलते दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट के बाहर भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गये थे। बता दें, केजरीवाल अब तक एजेंसी द्वारा जारी किये गये आठ समन को छोड़ चुके हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। बाल पोर्नोग्राफी देखने और उसे डाउनलोड करने को अपराध नहीं मानने के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया है। मद्रास हाई कोर्ट ने एक चर्चित आदेश में चेन्नई के 28 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर और आपराधिक कार्रवाई को खारिज करते हुए कहा था कि बाल पोर्नोग्राफी देखना पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधानों के दायरे में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर खुशी जाहिर करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने कहा, यह न्याय का अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में ऐतिहासिक पल है जहां सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि एक आपराधिक मामले में भी कोई तीसरा पक्ष जो कि सीधे इस अपराध से प्रभावित नहीं है, ऊपरी अदालतों का रुख कर सकता है अगर उसे लगता है कि न्याय नहीं हुआ है। पांच गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस, जिसके 120 से ज्यादा सहयोगी हैं, और बचपन बचाओ आंदोलन ने हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी थी। यह गठबंधन पूरे देश में बच्चों के यौन उत्पीड़न, चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बाल दुव्यार्पार और बाल विवाह के खिलाफ काम कर रहा है। हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एलायंस ने याचिका में कहा कि इस फैसले से आम जनता में यह संदेश गया है कि बाल पोर्नोग्राफी देखना और इसके वीडियो अपने पास रखना कोई अपराध नही है। इससे बाल पोर्नोग्राफी से जुड़े वीडियो की मांग और बढ़ेगी और लोगों का इसमें मासूम बच्चों को शामिल करने के लिए हौसला बढ़ेगा। इससे पहले 11 जनवरी को मद्रास हाई कोर्ट ने बाल पोर्नोग्राफी देखने और इसे डाउनलोड करने को अपराध मानने से इनकार करते हुए इस संबंध में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया था। चेन्नई की अंबत्तूर पुलिस ने आरोपी के फोन को जब्त कर छानबीन में पाया कि उसमें बड़ी मात्रा में बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां हैं। इसके बाद उसके खिलाफ आईटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मामले को खारिज कर दिया कि आरोपी ने महज बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां डाउनलोड कर इसे अकेले में देखा, उसने इसे कहीं भी प्रसारित या वितरित नहीं किया। हाई कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला पॉक्सो के दायरे में नहीं आता क्योंकि आरोपी ने बाल पोर्नोग्राफी के लिए किसी बच्चे या बच्चों का इस्तेमाल नहीं किया। लिहाजा इसे ज्यादा से ज्यादा आरोपी का नैतिक पतन कहा जा सकता है। मद्रास हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी करने के लिए आईटी और पॉक्सो एक्ट के तहत दिये गये केरल हाई कोर्ट के एक फैसले का सहारा लिया। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस ने अपनी याचिका में कहा कि इस मामले में केरल हाई कोर्ट के फैसले पर भरोसा करना एक चूक थी। एलायंस ने कहा, ह्लसामग्रियों की विषयवस्तु एवं प्रकृति से स्पष्ट है कि यह पॉक्सो के प्रावधानों के तहत आता है और यह इसे उस मामले से अलग करती है जिस पर केरल हाई कोर्ट ने फैसला दिया था। शीर्ष अदालत के रुख का स्वागत करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संयोजक रवि कांत ने कहा, बच्चों के आॅनलाइन यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में यह एक उल्लेखनीय कदम है। यदि कोई व्यक्ति बाल पोर्नोग्राफी, बाल यौन शोषण से जुड़े वीडियो डाउनलोड करता है तो इसका मतलब है कि किसी बच्चे का बलात्कार हुआ है और आनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटीरियल (सीसैम) की मांग बच्चों से बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देती है। हमारे गणतंत्र के 75 साल पूरे होने के बाद बाल यौन शोषण और बच्चों के खिलाफ हिंसा के उभरते स्वरूपों के खिलाफ लड़ाई को इसी तात्कालिकता और गंभीरता से लेने की जरूरत है जो सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में बाल पोर्नोग्राफी के मामले में तेजी से इजाफा हुआ है। देश में 2018 में जहां 44 मामले दर्ज हुए थे वहीं 2022 में यह बढ़कर 1171 हो गये।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। बाल पोर्नोग्राफी देखने और उसे डाउनलोड करने को अपराध नहीं मानने के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया है। मद्रास हाई कोर्ट ने एक चर्चित आदेश में चेन्नई के 28 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर और आपराधिक कार्रवाई को खारिज करते हुए कहा था कि बाल पोर्नोग्राफी देखना पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधानों के दायरे में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर खुशी जाहिर करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फूलका ने कहा, यह न्याय का अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में ऐतिहासिक पल है जहां सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि एक आपराधिक मामले में भी कोई तीसरा पक्ष जो कि सीधे इस अपराध से प्रभावित नहीं है, ऊपरी अदालतों का रुख कर सकता है अगर उसे लगता है कि न्याय नहीं हुआ है।पांच गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस, जिसके 120 से ज्यादा सहयोगी हैं, और बचपन बचाओ आंदोलन ने हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी थी। यह गठबंधन पूरे देश में बच्चों के यौन उत्पीड़न, चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बाल दुव्यार्पार और बाल विवाह के खिलाफ काम कर रहा है।हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एलायंस ने याचिका में कहा कि इस फैसले से आम जनता में यह संदेश गया है कि बाल पोर्नोग्राफी देखना और इसके वीडियो अपने पास रखना कोई अपराध नही है। इससे बाल पोर्नोग्राफी से जुड़े वीडियो की मांग और बढ़ेगी और लोगों का इसमें मासूम बच्चों को शामिल करने के लिए हौसला बढ़ेगा।इससे पहले 11 जनवरी को मद्रास हाई कोर्ट ने बाल पोर्नोग्राफी देखने और इसे डाउनलोड करने को अपराध मानने से इनकार करते हुए इस संबंध में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया था। चेन्नई की अंबत्तूर पुलिस ने आरोपी के फोन को जब्त कर छानबीन में पाया कि उसमें बड़ी मात्रा में बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां हैं। इसके बाद उसके खिलाफ आईटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मामले को खारिज कर दिया कि आरोपी ने महज बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां डाउनलोड कर इसे अकेले में देखा, उसने इसे कहीं भी प्रसारित या वितरित नहीं किया। हाई कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला पॉक्सो के दायरे में नहीं आता क्योंकि आरोपी ने बाल पोर्नोग्राफी के लिए किसी बच्चे या बच्चों का इस्तेमाल नहीं किया। लिहाजा इसे ज्यादा से ज्यादा आरोपी का नैतिक पतन कहा जा सकता है। मद्रास हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी करने के लिए आईटी और पॉक्सो एक्ट के तहत दिए गए केरल हाई कोर्ट के एक फैसले का सहारा लिया।जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस ने अपनी याचिका में कहा कि इस मामले में केरल हाई कोर्ट के फैसले पर भरोसा करना एक चूक थी। एलायंस ने कहा कि सामग्रियों की विषयवस्तु एवं प्रकृति से स्पष्ट है कि यह पॉक्सो के प्रावधानों के तहत आता है और यह इसे उस मामले से अलग करती है जिस पर केरल हाई कोर्ट ने फैसला दिया था।शीर्ष अदालत के रुख का स्वागत करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संयोजक रवि कांत ने कहा- बच्चों के आॅनलाइन यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में यह एक उल्लेखनीय कदम है। यदि कोई व्यक्ति बाल पोर्नोग्राफी, बाल यौन शोषण से जुड़े वीडियो डाउनलोड करता है तो इसका मतलब है कि किसी बच्चे का बलात्कार हुआ है और आनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटीरियल (सीसैम) की मांग बच्चों से बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देती है। हमारे गणतंत्र के 75 साल पूरे होने के बाद बाल यौन शोषण और बच्चों के खिलाफ हिंसा के उभरते स्वरूपों के खिलाफ लड़ाई को इसी तात्कालिकता और गंभीरता से लेने की जरूरत है जो सुप्रीम कोर्ट ने दिखायी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में बाल पोर्नोग्राफी के मामले में तेजी से इजाफा हुआ है। देश में 2018 में जहां 44 मामले दर्ज हुए थे वहीं 2022 में यह बढ़कर 1171 हो गये।
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