रांची जमीन घोटालाटीम एबीएन, रांची। रांची जमीन घोटाले मामले में ईडी ने जमीन माफिया शेखर कुशवाहा सहित तीन पर शनिवार को पीएमएलए की विशेष अदालत में चार्जशीट दायर कर दिया है। शनिवार की दोपहर जमीन घोटाला मामले के अनुसंधानकर्ता ईडी के डिप्टी डायरेक्टर देवव्रत झा ने चार्जशीट दायर किया। आपको बता दें कि जिन तीन लोगों पर चार्जशीट दायर किया गया है उनमें से मात्र शेखर कुशवाहा को एजेंसी के द्वारा गिरफ्तार किया गया है। जानकारी के अनुसार जिन अन्य दो आरोपियों को एजेंसी ने चार्जशीट किया है उनकी गिरफ्तारी अब तक नहीं हो पाई है। आरोप पत्र दायर होने के बाद जल्द ही अदालत तीनों चार्जशीटेड आरोपियों को ऊपर संज्ञान लेगा।4.83 एकड़ जमीन का फर्जी दस्तावेज बनाने में भूमिकाईडी की जांच में यह बात सामने आया था कि शेखर कुशवाहा ने अपने सहयोगी प्रियरंजन सहाय, विपिन सिंह, इरशाद अंसारी, अफसर अली समेत अन्य के साथ मिलकर सरकारी कर्मी भानु प्रताप प्रसाद की मिलीभगत से 1971 का फर्जी डीड बनाया था। ईडी के चार्जशीट में सभी बातों का जिक्र किया गया है साथ ही मौजूद साक्ष्य भी उपलब्ध करवाये गये हैं।ईडी जांच के अनुसार बड़गाईं अंचल के तत्कालीन अंचल राजस्व उपनिरीक्षक भानु प्रताप के साथ मिलकर शेखर ने बरियातू की 4.83 एकड़ की जमीन के रैयत जितुआ भोक्ता का नाम बदल कर समरेंद्र चंद्र घोषाल के नाम की एंट्री कर गैरमजरूआ जमीन को सामान्य खाते की जमीन में बदल दिया था। इसके बाद 22.61 करोड़ की जमीन को 100 करोड़ से अधिक कीमत में बेचने की तैयारी थी। ईडी गिरोह के सभी सदस्यों को पूर्व में ही जेल भेज चुकी है। सबकी अलग-अलग भूमिका ईडी ने अफसर अली समेत सात आरोपियों के यहां 13 अप्रैल 2023 को छापा मारा था। तब सभी को गिरफ्तार किया गया था। वहीं चेशायर होम रोड में जमीन के कागजात तैयार करने को लेकर विपिन सिंह, प्रिय रंजन सहाय और शेखर कुशवाहा, बजरा जमीन को लेकर जमशेदपुर निवासी रवि सिंह भाटिया और श्याम सिंह के यहां 26 अप्रैल को छापेमारी हुई थी। रवि सिंह भाटिया और श्याम सिंह के नाम पर मार्च 2021 में चार रजिस्ट्री डीड के जरिए खाता नंबर 140 की रजिस्ट्री फर्जी डीड पर हुई थी। इस जमीन का 82 सालों का लगान रसीद एक ही दिन में तत्कालीन डीसी छवि रंजन के आदेश पर काटा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो मामलों में सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति संबंधी एनसीपीसीआर के दिशा-निर्देशों को दी मंजूरीसपोर्ट पर्सन की अनिवार्य रूप से नियुक्ति का सुप्रीम कोर्ट का आदेशशीर्ष अदालत ने सभी राज्यों/केंद्रशासित क्षेत्रों से चार हफ्ते में अनुपालन रिपोर्ट सौंपने को कहाबचपन बचाओ आंदोलन की याचिका पर राज्य सरकारों को सपोर्ट पर्सन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया पर अमल के आदेशपॉक्सो के ढाई लाख लंबित मामलों में पीड़ित बच्चों की सहायता करेंगे सपोर्ट पर्सनएबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में सभी राज्य सरकारों/ केंद्रशासित क्षेत्रों को यौन शोषण के पीड़ित बच्चों की मदद के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के दिशानिदेर्शों के अनुसार अनिवार्य रूप सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति करने को कहा है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने सभी राज्य सरकारों/ केंद्रशासित क्षेत्रों को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत लंबित मामलों में पीड़ित बच्चों की सहायता के लिए एनसीपीसीआर के दिशानिदेर्शों के मुताबिक सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति, उनकी योग्यता और जिम्मेदारियां तय करने के आदेश पर अमल के बाबत चार हफ्ते में अनुपालन रिपोर्ट सौंपने को कहा है। शीर्ष अदालत के इस आदेश से देश भर की पॉक्सो अदालतों में लंबित ढाई लाख मामलों में पीड़ित बच्चों को राहत मिलेगी।बताते चलें कि सपोर्ट पर्सन वह व्यक्ति होता है जो यौन शोषण व उत्पीड़न के शिकार बच्चों की भावनात्मक व कानूनी रूप से मदद करते हुए उन्हें पीड़ा से उबरने व समाज की मुख्य धारा में वापस लाने में सहयोग करता है। बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) की ओर से दायर याचिका में उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में 2022 में एक दलित नाबालिग बच्ची के साथ पांच महीने तक सामूहिक बलात्कार और शिकायत करने के लिए थाने जाने पर वहां एक पुलिस अधिकारी द्वारा उससे बलात्कार का मामला उठाते हुए बच्चों के प्रति मित्रवत नीतियों और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े दिशानिदेर्शों पर अमल का आदेश देने की मांग उठायी गयी थी।यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों के कानूनी संघर्षों को आसान बनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का स्वागत करते हुए एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने कहा- यह एक उल्लेखनीय कदम है क्योंकि सपोर्ट पर्संस पर एनसीपीसीआर के दिशानिदेर्शों को शीर्ष अदालत ने मंजूरी दे दी है। अब, एनसीपीसीआर के दिशानिदेर्शों के कार्यान्वयन के संबंध में राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रतिक्रिया अहम है।प्रख्यात बाल अधिकार कार्यकर्ता भुवन ऋभु ने 2022 में एक अर्जी में यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों के लिए अनिवार्य रूप से सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति का सुझाव दिया था। बच्चों के हक में इस आदेश को बदलाव का वाहक बताते हुए भुवन ऋभु ने कहा कि यह ऐतिहासिक आदेश है क्योंकि अब गरीब और अपने अधिकारों से अंजान बच्चे अब अकेले व असुरक्षित नहीं रहेंगे। अब उनके पास कोई है जो उन्हें जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरने में मदद करेगा, उन्हें आवश्यक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करेगा, गवाहों और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा और उनके पुनर्वास और मुआवजे के लिए लड़ेगा। यह उनके लिए बहुत बड़ी जीत है जो पीड़ित से समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की रूपांतरकारी यात्रा पर हैं।सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों व केंद्रशासित क्षेत्रों को एनसीपीसीआर के दिशा-निर्देशों पर अमल का निर्देश दिया है जो योग्यता का एक समान मानक स्थापित करते हैं, जहां नियुक्ति के इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए सामाजिक कार्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान या बाल विकास में स्नातकोत्तर डिग्री अनिवार्य है। वैकल्पिक रूप से, स्नातक डिग्री और बाल शिक्षा, बाल विकास या बाल सुरक्षा के क्षेत्र में न्यूनतम तीन साल का अनुभव वाले उम्मीदवार भी पात्र हैं। एनसीपीसीआर ने एक समग्र दिशा-निर्देश प्रस्तावित किया था जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है। दिशानिदेर्शों में इस बात पर जोर दिया गया है कि एक समान नीति तैयार की जानी चाहिए, जिससे आगे उचित समय पर बच्चों की सहायता में दक्ष व्यक्तियों का एक पैनल तैयार किया जा सके। साथ ही, सपोर्ट पर्सन को उनके कार्य और दायित्वों के अनुरूप उचित पारिश्रमिक का भुगतान किया जाना चाहिए।इसके अलावा, एक अखिल भारतीय पोर्टल भी बनाया जाए और यह आम लोगों और बाल संरक्षण की दिशा में कार्य कर रहे किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) और बाल कल्याण समितियों (सीडब्ल्यूसी) के लिए भी सुलभ हो। यह पोर्टल प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित क्षेत्र में उपलब्ध सभी सहायक व्यक्तियों की एक विस्तृत सूची प्रदान करेगा। प्रत्येक राज्य गैरसरकारी संगठनों का एक पैनल भी बनाए रखेगा और ऐसे व्यक्तियों का सहयोग करेगा जिनकी सेवाएं सीडब्ल्यूसी और जेजेबी के लिए उपयोगी हो सकती हैं।इस पहल का उद्देश्य सहायक सेवाओं तक पहुंच को सुव्यवस्थित करना और बाल संरक्षण एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना है। शीर्ष अदालत ने देश के प्रत्येक थाने में अर्धन्यायिक स्वयंसेवियों की नियुक्ति के आदेश पर अमल के बाबत राष्ट्रीय विधिक सेवाएं प्राधिकरण (नालसा) को चार हफ्ते में अनुपालन रिपोर्ट सौंपने का निर्देश भी दिया। इस खबर से संबंधित और भी जानकारी पाने के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क करें।
एक्शन में सीएम हेमंत सोरेन टीम एबीएन, रांची। झारखंड के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के अटेंडेंस और निर्धारित ड्यूटी आवर के दौरान उनकी मौजूदगी पर सरकार की हमेशा निगाह होगी। इसके लिए स्पेशल अटेंडेंस पोर्टल बनाया गया है। इसके जरिए डॉक्टरों और कर्मियों का बायोमीट्रिक अटेंडेंस हर रोज क्रॉस चेक होगा। सीएम हेमंत सोरेन ने सोमवार को इसका उद्घाटन किया। मौके पर स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता, मुख्य सचिव एल। खियांग्ते सहित कई अफसर मौजूद रहे। सीएम ने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्र से लेकर जिला अस्पताल में जो मानव संसाधन उपलब्ध हैं, उसकी शत-प्रतिशत उपयोगिता सुनिश्चित हो। अक्सर शिकायतें मिलती है कि स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों में चिकित्सक ड्यूटी के दौरान भी उपलब्ध नहीं होते हैं। ऐसे में मरीज को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अटेंडेंस पर निगरानी के लिए यह कदम उठाया गया है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य उपकेंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर, अनुमंडलीय अस्पताल, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज एवं अस्पतालों के रखरखाव, मरम्मत, चिकित्सा संसाधन, जांच सुविधाओं और दवाइयां की उपलब्धता की मॉनिटरिंग का भी सिस्टम डेवलप किया जायेगा। निजी अस्पतालों की तरह सरकारी अस्पतालों में हॉस्पिटल मैनेजमेंट सिस्टम, सीसीटीवी और वाई-फाई की व्यवस्था करायी जायेगी। उन्होंने अफसरों से कहा कि राज्य के जिला अस्पतालों को 24 घंटे आपरेशनल बनाने के लिए समुचित कदम उठाए जायें। इन अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ सभी तरह की सर्जरी की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि मरीजों को किसी दूसरे अस्पताल के लिए रेफर करने की नौबत नहीं आये। प्राथमिक स्वास्थ्य उप केंद्रों और स्वास्थ्य केंद्रों का जिला अस्पतालों से 24 घंटे संपर्क स्थापित करने की व्यवस्था बनायें। राज्य के अगर किसी एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में चिकित्सा और चिकित्सा कर्मियों की सेवा लेने की जरूरत हो तो उस दिशा में भी उचित कदम उठाए जाने चाहिए।
सहायक पुलिस मामला पर दर्ज एफआईआर देवेन्द्र नाथ महतो मामले पर आज हुई बहसटीम एबीएन, रांची। आज दिनांक 6/08/2024 को रांची लोकसभा प्रत्याशी जेबीकेएसएस केंद्रीय वरीय उपाध्यक्ष सह आंदोलनकारी छात्र नेता जेएसएसयू प्रमुख देवेन्द्र नाथ महतो को जुडिशियल कमिशनर रांची के न्यायालय से लालपुर थाना वाद संख्या 185/2024 एंटी शेफ्टी बेल संख्या 2097/2024 पर एडिशनल जुडिशियल कमिशनर मिथलेश सिंह के न्यायालय में हुआ बहस, अदालत ने लालपुर थाना से केश दैनिकी मांगा है। जिसमें कोर्ट में देवेंद्र नाथ महतो भी उपस्थित हुए। उक्त जानकारी अधिवक्ता षष्टी रंजन महतो ने दी। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उक्त एफआईआर सूचक कार्यपालक दंडाधिकारी रांची सदर के संजय कुमार ने 19 जुलाई 2024 को मुख्यमंत्री आवास घेराव के दौरान लालपुर थाना में लिखित आवेदन के आधार पर एफआईआर दर्ज किया था, जिसमें 15 बीएनएस की धारा लगाया गया है। जिसमें 4 नॉन वेलेबल धारा भी लगाया गया है। जिसमें आपराधिक षड्यंत्र के तहत विधि विरुद्ध कार्य करते हुए सरकारी कार्य में बाधा एवं जान से मारने का प्रयत्न के आरोप के तहत मुख्य रूप से बीएनएस की धारा 61(2), 189(2) 189(3) 189 (4) 223, 121(1), 121(2) 125(ए) 125(बी) 132, 133, 134, 109, 324(4), 324 (5) सहित चार नॉन बेलेबल बीएनएस का धारा लगाया गया।
टीम एबीएन, रांची। राज्य सरकार ने झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारी प्रभात भूषण सिंह को आरोप मुक्त किया है। वहीं कुमुदिनी टुडू को दो वेतन वृद्धि का दंड अधिरोपित किया है। प्रभात भूषण सिंह, झा0प्र0से0 (तृतीय बैच, कोटि क्रमांक-236/20) को आरोप मुक्त किया है। कुमुदिनी टुडू, झा0प्र0से0(कोटि क्रमांक-35/20), तत्कालीन अंचल अधिकारी, नामकुम, राँची के विरूद्ध असंचयात्मक प्रभाव से 02(दो) वेतन वृद्धि पर रोक का दंड अधिरोपित किया जाता है। इस संबंध में कार्मिक प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग में संकल्प जारी किया है।
RBI ने शहरी सहकारी बैंकों के लिए त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई प्रारूप जारी कियाएबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शहरी सहकारी बैंकों के लिए त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) प्रारूप जारी किया। इस पहल का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि उचित समय पर उपयुक्त हस्तक्षेप किया जा सके। प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंकों (यूसीबी) के लिए पीसीए प्रारूप के प्रावधान एक अप्रैल, 2025 से प्रभावी होंगे। पीसीए प्रारूप जारी करने का मतलब है कि संबंधित वित्तीय इकाइयों पर आरबीआई उचित समय पर हस्तक्षेप कर सके। इस प्रारूप का मकसद है कि शहरी सहकारी बैंक समय पर सुधारात्मक कदम उठाएं और उन्हें लागू करें ताकि उनकी वित्तीय सेहत बहाल हो सके। रिजर्व बैंक ने कमजोर शहरी सहकारी बैंकों और वित्तीय दबाव से गुजर रहे यूसीबी में जरूरी सुधारों के लिए प्रारंभिक हस्तक्षेप उपकरण के तौर पर पर्यवेक्षी कार्रवाई ढांचा (एसएएफ) जारी किया था। एसएएफ को आखिरी बार जनवरी 2020 में संशोधित किया गया था। आरबीआई ने एक बयान में कहा, यह पीसीए प्रारूप अब शहरी सहकारी बैंकों के लिए एसएएफ की जगह लेगा। संशोधित ढांचा किसी मामले में जोखिमों के आकलन के आधार पर उस इकाई के लिए विशिष्ट पर्यवेक्षी कार्य योजनाएं तय करने के लिए लचीलापन लाना चाहता है। आरबीआई ने कहा, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए लागू समान ढांचे के साथ पीसीए ढांचे को सुसंगत बनाया गया है। इसमें आनुपातिक महत्व के अंतर्निहित सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए जरूरी संशोधन किये गये हैं। रिजर्व बैंक के मुताबिक, पीसीए ढांचा काफी हद तक सिद्धांत-आधारित है, जिसमें एसएएफ की तुलना में कम मानदंड होने के बावजूद पर्यवेक्षी कठोरता में कोई कमी नहीं है।संशोधित पीसीए ढांचे में पूंजी, परिसंपत्ति गुणवत्ता और लाभप्रदता के बिंदुओं पर विशेष निगरानी रखी जाएगी। यह ढांचा छोटे यूसीबी (टियर 1 यूसीबी) को छोड़कर सभी शहरी सहकारी बैंकों पर लागू होगा। रिजर्व बैंक ने विनियामक उद्देश्यों के लिए शहरी सहकारी बैंकों को चार स्तरों में वर्गीकृत किया हुआ है।
टीम एबीएन, रांची। राज्य सरकार ने बिवेक कुमार सुमन, झा0प्र0से0 (कोटि क्रमांक-399/20), तत्कालीन प्रभारी पदाधिकारी, जिला सामान्य शाखा, गोड्डा एवं प्रभारी जिला आपूर्ति पदाधिकारी, गोड्डा को आरोप मुक्त किया है। इस संबंध में कार्मिक प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग में संकल्प जारी किया है।
मां-बाप की सुध : बच्चों की हैसियत के अनुरूप गुजारा भत्ताएबीएन सेंट्रल डेस्क। यह विडंबना है कि हमारे सामाजिक ताने-बाने में तेजी से आये बदलाव के बीच वृद्ध माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। अदालतों में गुजारा-भत्ते से जुड़े विवाद बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार वृद्ध माता-पिता की देखभाल के लिए बाध्य करने वाले 2007 के कानून में बदलाव लाकर, इसका दायरा बढ़ाने के मकसद से नये कानून लाने की तैयारी में है। माता-पिता और बुजुर्गों की देखभाल से जुड़े वर्षों पुराने कानून को प्रभावी व व्यावहारिक बनाने की कोशिश है। पहले वृद्ध माता-पिता अपनी संतानों से दस हजार रुपये तक का गुजारा भत्ता पाने के हकदार थे। बताया जा रहा है कि नये विधेयक के अनुसार अब माता-पिता का गुजारा भत्ता बच्चों की आर्थिक हैसियत से तय होगा। वहीं बच्चों के साथ कटुता कम करने के प्रयासों में माता-पिता व बुजुर्गों को त्यागने अथवा दुर्व्यवहार पर बच्चों को दी जाने वाली सजा में कमी करने की तैयारी है। सामाजिक संगठनों से विमर्श में यह बात सामने आयी थी कि लंबी सजा से माता-पिता और बच्चों के संबंधों में ज्यादा खटास बढ़ती है। कहा जा रहा है कि सरकार बजट सत्र में इस विधेयक को पेश कर सकती है। दरअसल, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने बुजुर्गों की देखभाल से जुड़े 2007 के कानून में बदलाव की पहल तब की, जब समाज में बुजुर्गों की अनदेखी व दुर्व्यवहार के मामले तेजी से बढ़े हैं। दरअसल, नये विधेयक में इससे जुड़े कानून की व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, मंत्रालय ने कानून में बदलाव की पहल वर्ष 2019 में कर दी थी। इसी साल लोकसभा में एक विधेयक भी पेश किया गया था। इसके व्यापक पहलुओं की पड़ताल के लिए विधेयक को बाद में संसदीय समिति के पास भेज गया था। संसदीय समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने एक बार फिर एक विधेयक को संसद में पेश किया था। लेकिन वह पारित नहीं हो पाया था।कालांतर 17वीं लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने के कारण विधेयक निष्प्रभावी हो गया था। जिसके बाद अब सरकार नये सिरे से इस विधेयक को संसद में लाने की तैयारी में है। उल्लेखनीय है कि इस विधेयक में कई नये प्रावधानों को जोड़ा गया है। एक ओर जहां गुजारा भत्ते के सीमित दायरे को खत्म किए जाने का प्रावधान है, वहीं विगत में आए बच्चों की सजा बढ़ाने के प्रस्ताव को टाला गया है। अब इसे सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर ही रखा जायेगा। वहीं गुजारा भत्ता देने की जवाबदेही का विस्तार करते हुए अब पात्र बच्चों के दायरे में दामाद, पुत्रवधु,नाती-पोते, पोती-नातिन व अल्पवयस्क बच्चों के विधिक अभिभावकों को भी शामिल किया गया है। अब तक इस जवाबदेही के दायरे में बेटा-बेटी व दत्तक बेटा-बेटी ही शामिल थे। इसके अलावा विधेयक में प्रत्येक जिले में बुजुर्गों की गणना, मेडिकल सुविधाओं से लैस वृद्ध आश्रम व जिला स्तर पर एक सेल गठित करने जैसे प्रावधान हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। माफिया अतीक अहमद की अपराध से अर्जित करीब 50 करोड़ रुपये मूल्य की कुर्क की गई बेनामी संपत्ति को न्यायालय (गैंगस्टर) ने राज्य सरकार के पक्ष में निहित कर दिया है। जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) गुलाब चंद्र अग्रहरि ने बताया कि अतीक अहमद ने अपराध की कमाई से यह संपत्ति लालापुर के राजमिस्त्री हूबलाल ने नाम पर खरीदी थी।लगभग 2.377 हेक्टेयर भूमि की उस समय कीमत 12.42 करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर थी। उन्होंने बताया कि हूबलाल के नाम पर जमीन का बैनामा करते समय अतीक अहमद द्वारा कहा गया था कि जरूरत पड़ने पर इस जमीन का बैनामा वह अपने नाम करा लेगा। अग्रहरि ने कहा कि पुलिस आयुक्त न्यायालय द्वारा इस संपत्ति को गैंगस्टर एक्ट की धारा 14 (1) के तहत कुर्क किया गया और जवाब दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया। लेकिन इस तीन महीने के भीतर संबंधित पक्ष ने जमीन के पक्ष में कोई साक्ष्य नहीं पेश किया।उन्होंने बताया कि इसके बाद पुलिस आयुक्त न्यायालय ने इस मामले में पत्रावली को न्यायालय (गैंगस्टर) के पास भेज दिया। मंगलवार को न्यायाधीश विनोद कुमार चौरसिया ने पुलिस आयुक्त की कार्यवाही को उचित और न्यायसंगत माना और अपराध से अर्जित इस बेनामी संपत्ति को राज्य सरकार के पक्ष में निहित कर दिया। पुलिस के मुताबिक, अतीक के खिलाफ गैंगस्टर कानून के तहत दर्ज मुकदमे की विवेचना के दौरान पता चला कि एयरपोर्ट थाना क्षेत्र में हूबलाल के नाम पर अतीक की संपत्ति है। पूछताछ में हूबलाल ने बताया कि अतीक ने वर्ष 2015 में धमकाकर उसके नाम पर यह जमीन लिखवाई थी। पुलिस ने नवंबर, 2023 में इस जमीन को कुर्क कर दिया था।उल्लेखनीय है कि उमेश पाल हत्याकांड सहित 100 से अधिक आपराधिक मामलों में नामजद अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की पिछले वर्ष 15 अप्रैल को प्रयागराज के काल्विन अस्पताल में गोली मारकर हत्या कर दी गयीथी। वहीं अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन, गुड्डू मुस्लिम, अशरफ की पत्नी जैनब सहित कई अभियुक्त अब भी फरार हैं।
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