आखिर वर्ल्ड कप आते ही क्यों दौड़ पड़ता है भारतीय शेयर बाजार?

 

  • 36 साल के आंकड़े कर देंगे हैरान 
  • फीफा वर्ल्ड कप के वर्षों में भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन ज्यादातर सकारात्मक रहा है, जिससे 2026 को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं। 

पुनीत वाधवा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन फीफा वर्ल्ड कप के वर्षों में आमतौर पर मजबूत रहा है। पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि वर्ल्ड कप आयोजित होने वाले अधिकांश वर्षों में बीएसई सेंसेक्स ने निवेशकों को सकारात्मक रिटर्न दिया है। 

2006 में मिला सबसे ज्यादा रिटर्न 

आंकड़ों के अनुसार, वर्ल्ड कप वाले वर्षों में सेंसेक्स का रिटर्न 3.5 फीसदी से लेकर 46.7 फीसदी तक रहा है। वर्ष 2002 में जापान और दक्षिण कोरिया की संयुक्त मेजबानी में आयोजित टूर्नामेंट के दौरान सेंसेक्स ने करीब 3.5 फीसदी की बढ़त दर्ज की थी। 

वहीं 2006 में जर्मनी में हुए फीफा वर्ल्ड कप के दौरान भारतीय बाजार ने सबसे शानदार प्रदर्शन किया और सेंसेक्स लगभग 46.7 फीसदी उछल गया। हालांकि इस ट्रेंड में एक बड़ा अपवाद वर्ष 1998 रहा। उस साल सेंसेक्स में करीब 16.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। बाजार पर उस समय कई घरेलू और वैश्विक घटनाओं का असर देखने को मिला था। 

मई 1998 में भारत द्वारा किये गये पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका, जापान सहित कई देशों ने आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगाये थे। इन घटनाओं से निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई और बाजार दबाव में आ गया। बाद में ये प्रतिबंध हटा लिये गये, लेकिन उस वर्ष बाजार पर इसका असर साफ दिखाई दिया। 

राजनीतिक बदलाव भी रहा चर्चा में 

वर्ष 1998 भारतीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का गठन हुआ। राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रमों के बीच शेयर बाजार ने उस वर्ष कमजोर प्रदर्शन किया। 

1998 जैसी राह पर बढ़ रहा बाजार? सेंसेक्स में 13% गिरावट ने बढ़ायी निवेशकों की चिंता 

वर्ष 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन 1998 की याद दिलाता नजर आ रहा है। सेंसेक्स साल की शुरुआत से करीब 13 फीसदी तक टूटकर 73,900 के आसपास पहुंच गया है। बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आयी है जब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को बढ़ा दिया है। 

पश्चिम एशिया संकट का बाजार पर असर 

विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। तेल महंगा होने से भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ा है, वहीं रुपये में कमजोरी भी देखने को मिली है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बाजार की गिरावट को और तेज कर दिया है। 

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर संशय 

बाजार की धारणा पर भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता भी भारी पड़ रही है। निवेशक फिलहाल किसी स्पष्ट दिशा का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी वैश्विक तेजी में भारतीय बाजार में बड़े एआई-आधारित निवेश अवसरों की कमी भी निवेशकों को उत्साहित नहीं कर पा रही है। 

वैश्विक और घरेलू चुनौतियां दोनों चिंता का कारण 

मॉर्गन स्टेनली के प्रबंध निदेशक और मुख्य भारत इक्विटी रणनीतिकार रिधम देसाई तथा नयंत पारेख की सह-लेखित रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक तनावों ने निवेशकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। 

उनका कहना है कि भारत के लिए प्रमुख जोखिम फिलहाल बाहरी कारकों से जुड़े हैं, जिनमें वैश्विक तनाव और दुनिया की धीमी आर्थिक वृद्धि शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि घरेलू स्तर पर कृषि क्षेत्र की कम उत्पादकता और एम्बॉडीड एआई जैसी उभरती तकनीकों का श्रम बाजार पर संभावित प्रभाव भविष्य की प्रमुख चिंताओं में शामिल है। 

जून 2027 तक सेंसेक्स 89,000 के स्तर पर पहुंचने का अनुमान 

विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत में व्यापक आर्थिक स्थिरता बनी रहती है, निजी निवेश में तेजी आती है और आर्थिक वृद्धि दर ब्याज दरों की तुलना में मजबूत बनी रहती है, तो बीएसई सेंसेक्स जून 2027 तक 89,000 अंक के स्तर तक पहुंच सकता है। यह अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद और कॉरपोरेट आय में संभावित सुधार को ध्यान में रखकर लगाया गया है। 

पश्चिम एशिया तनाव से अगले छह महीने चुनौतीपूर्ण 

अल्फानिटी फिनटेक के सह-संस्थापक और निदेशक व यू आर भट्ट का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जल्द नहीं सुलझता है, तो अगले छह महीनों तक भारतीय बाजार सीमित दायरे में कारोबार कर सकते हैं। उनके अनुसार निफ्टी 22,800 से 23,400 अंकों के बीच घूमता रह सकता है। 

भट ने कहा कि मौजूदा समय में कई ऐसे कारक हैं जो बाजार की दिशा तय करेंगे। ऐसे में वर्ष के अंत तक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है और उनके आधारभूत अनुमान के अनुसार 2026 के आखिर तक सूचकांक मौजूदा स्तरों के आसपास ही रह सकते हैं। 

युद्ध खत्म होने और कच्चे तेल में गिरावट से बन सकता है नया रिकॉर्ड 

यू. आर. भट के मुताबिक यदि अगले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया का संघर्ष समाप्त हो जाता है और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो भारतीय शेयर बाजार नए रिकॉर्ड स्तर छू सकते हैं। तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक मानी जाती है, जिससे निवेशकों का भरोसा और मजबूत हो सकता है। 

वैश्विक ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने वर्ष के अंत तक निफ्टी के 26,000 अंक तक पहुंचने का अनुमान बरकरार रखा है। यह मौजूदा स्तरों की तुलना में करीब 12 प्रतिशत की संभावित बढ़त दर्शाता है। हालांकि फर्म का अनुमान है कि 2026 के अंत तक कुल रिटर्न लगभग स्थिर रह सकता है। 

बर्नस्टीन के प्रबंध निदेशक वेणुगोपाल गैरे का कहना है कि मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका क्षेत्र में तनाव कम होने से बाजार में राहत की तेजी देखने को मिल सकती है, लेकिन यह लंबे समय तक टिकने वाली नहीं होगी। उनका मानना है कि कमजोर व्यापक आर्थिक संकेतक और इक्विटी इश्यूंस में संभावित बढ़ोतरी बाजार की तेजी को सीमित कर सकती है। इसी वजह से उन्होंने निफ्टी के लिए 26,000 का लक्ष्य बनाए रखते हुए अपनी न्यूट्रल रेटिंग बरकरार रखी है। 

फीफा वर्ल्ड कप और आर्थिक उथल-पुथल का पुराना संबंध 

दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में शामिल फीफा वर्ल्ड कप कई बार ऐसे दौर में आयोजित हुआ है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था किसी न किसी बड़े संकट से गुजर रही थी। बैंक आॅफ अमेरिका सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में इस दिलचस्प पैटर्न की ओर ध्यान दिलाया गया है। 

मेक्सिको में वर्ल्ड कप और कर्ज संकट का दौर 

रिपोर्ट के मुताबिक, 1986 में मेक्सिको में आयोजित फीफा वर्ल्ड कप का समय लैटिन अमेरिकी कर्ज संकट के दौर से मेल खाता था। 1980 के दशक में कई लैटिन अमेरिकी देशों को भारी ऋण और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा था, जिसका असर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर लंबे समय तक देखने को मिला। 

जापान को मेजबानी मिलने के बाद आया एशियाई वित्तीय संकट 

इसी तरह, 2002 फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी जापान को देने की घोषणा मई 1996 में की गई थी। इसके कुछ ही समय बाद 1997-98 के दौरान एशियाई वित्तीय संकट ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया। इस संकट का असर दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया समेत पूरे एशिया पर पड़ा था। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा में होना है। हालांकि, टूर्नामेंट से पहले ही वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे दुनियाभर के शेयर बाजारों में बिकवाली देखने को मिली है। 

भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल की कीमतें लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गयी हैं। वहीं सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती अनिश्चितता और ऊर्जा कीमतों में उछाल वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।

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