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सूरत की कपड़ा फैक्टरी से मुक्त कराये गये 91 नन्हें बाल मजदूर, सबसे छोटा महज 7 साल का

सूरत की कपड़ा फैक्टरी से मुक्त कराये गये 91 नन्हें बाल मजदूर, सबसे छोटा महज 7 साल का
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एबीएन सोशल डेस्क। सरकार, प्रशासन व नागरिक समाज संगठनों की छापे की एक साझा कार्रवाई में ट्रैफिकिंग के जरिये लाये गये और सूरत की एक कपड़ा फैक्टरी में मामूली पैसों पर खटाये जा रहे  91 बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया। मुक्त कराये गये इन बच्चों की उम्र सात से 14 के बीच है।

हालांकि भनक लगते ही सभी ट्रैफिकर और फैक्टरी मालिक मौके से फरार हो गये। मुक्त कराये गये बच्चों में से ज्यादातर राजस्थान के जनजातीय इलाकों के हैं जबकि तीन उत्तर प्रदेश के और एक-एक बच्चे झारखंड व बिहार के हैं। इन सभी को बाल कल्याण समिति, सूरत के समक्ष पेश किया गया और कानूनी कार्रवाई की जा रही है।    

गायत्री सेवा संस्थान (जीएसएस) की छानबीन के आधार पर हुई छापे की इस कार्रवाई में जीएसएस सहित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर), एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, राजस्थान के 22 पुलिस अफसरों, सूरत के पूना थाने के अफसरों के साथ नागरिक समाज संगठन एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन (एवीए) भी शामिल था। एवीए और जीएसएस देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के काम कर रहे 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी हैं। 

गायत्री सेवा संस्थान महीने भर से सूरत की इस कपड़ा फैक्टरी की निगरानी कर रहा था और छानबीन में यहां बड़ी संख्या में बाल मजदूरों की मौजूदगी की पुष्टि के बाद उसने एनसीपीसीआर को इसकी जानकारी दी। मुक्त कराए बच्चों ने फिर पुलिस को सुराग दिए और उन्हें उन जगहों का पता बताया जहां बाल मजदूरी करायी जा रही थी। 

गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने बताया, ह्लबच्चे हमें एक इमारत के पास ले गये जो बाहर से बंद थी। लेकिन उन्होंने बताया कि अंदर बच्चे काम कर रहे हैं। हम जब अंदर गये तो पाया कि वहां सात साल तक के बच्चों से काम कराया जा रहा था। सभी बच्चे घबराए हुए और बदहवासी की हालत में थे और 12 घंटे की शिफ्ट में काम करने के बाद थके हुए थे। 

डॉ. पंड्या ने बताया कि अंदर जाने के बाद वे बच्चों की बदहाली देखकर दंग रह गये। आठ साल के एक बच्चे के पास पहनने को शर्ट तक नहीं थी। वह दूसरे बच्चों के पीछे छिप गया और उनसे पूछ रहा था कि क्या कोई थोड़ी देर के लिए अपनी शर्ट उसे दे सकता है। उन्होंने पुलिस की तारीफ करते हुए कहा कि पुलिस और सभी हितधारकों की त्वरित कार्रवाई और मामले को गंभीरता से लेने के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को मुक्त करा पाना संभव हो पाया।  

प्रारंभिक जांच से पता चला है कि इन बाल दुव्यार्पारियों और फैक्टरी मालिकों ने संदेह से बचने के लिए तमाम तरीके अपना रखे थे। छोटे बच्चों को बिल्कुल सुबह यहां लाया जाता था और फिर इमारत के दरवाजे बाहर से बंद कर दिये जाते थे। शाम को सात बजे काम की शिफ्ट खत्म हो जाने के बाद ही दरवाजे खोले जाते थे।  

इन सभी बच्चों को आस-पास की कालोनियों में बहुत ही दयनीय और अमानवीय हालत में रखा जाता था। एक छोटे से कमरे में 10 से 12 बच्चे रहते थे जहां बुनियादी सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। पूछताछ के दौरान कुछ बच्चों ने बताया कि उनके माता-पिता को पता था कि उन्हें मजदूरी के लिए यहां लाया गया है। 

उधर, ज्यादातर छोटे बच्चों ने बताया कि उन्हें घुमाने के नाम पर यहां लाया गया था और उन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि यहां उनसे मजदूरी करायी जायेगी। यह भी पता चला कि कुछ बच्चे इन कपड़ा इकाइयों में तीन-चार साल से काम कर रहे थे जबकि बाकियों को हाल ही में यहां लाया गया था। मुक्त कराये गये बच्चों में आठ और दस साल के दो भाई भी थे जिन्हें राजस्थान के उदयपुर जिले से लाया गया था। 

ट्रैफिकिंग गिरोहों और बाल मजदूरी के तार मजबूती से जुड़े होने को रेखांकित करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, इस छापे से यह तथ्य स्थापित हो जाता है कि ट्रैफिकिंग गिरोह कितने संगठित हैं और उनकी जड़ें कितनी गहरी हैं। खास तौर से जनजातीय इलाकों और संवेदनशील परिवारों के बच्चों को झूठे वादों के जाल में फंसा कर ऐसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेल दिया जाता है जहां वे बाहरी दुनिया से कट जाते हैं और अपना बचपन खो बैठते हैं। 

यह मामला एक बार फिर अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत बनाने, बाल मजदूरी की मांग व आपूर्ति पर नजर बनाये रखने, बच्चों का शोषण करने वाले नियोक्ताओं और शोषण में शामिल सभी बिचौलियों की धरपकड़ और उनकी जवाबदेही तय करने की तत्काल जरूरत को साबित करता है। इस खबर से संबंधित और अधिक जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क करें।

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