एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय जीवन दर्शन के अनुसार 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य व्रत का अनुपालन करते हुए विद्या अध्ययन का काल आने वाले दायित्वों के निर्वहन के लिए स्वयं को परिपक्व करने का समय निर्धारित किया गया है। छात्र जीवन का समय ही वह समय होता है जब व्यक्ति के चरित्र का निर्माण, कर्तव्यों के प्रति संस्कार, आत्म सम्मान तथा आत्मविश्वास वाला व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है।
छात्र जीवन में शिक्षा के साथ-साथ व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय हितों में भागीदारी की भावनाएं परिपुष्ट होती है। पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व का बोध पारिवारिक एवं सामाजिक मर्यादाओं के अनुपालन के लिए उत्प्रेरित करते रहता है और परिवार तथा समाज से भटकाव को रोकने का कार्य करता है।
पारिवारिक एवं सामाजिक विरासत का उल्लंघन आज एक सामान्य घटना बन गयी है। विद्यार्थी जीवन कुछ इस प्रकार से निर्धारित हो गए हैं कि परिवार का विद्यार्थी पारिवारिक एवं सामाजिक अनुशासन को भंग करना अपनी आधुनिकता का पहचान समझ लिया है जबकि उसका आने वाला भविष्य उसे परिवार एवं समाज से दूर करते हुए एकाकी बना देता है।
आज शिक्षण संस्थान के वातावरण भी अत्यंत प्रदूषित हो चुके हैं। विद्यार्थी अपनी व्यक्तिगत सफलता को ही सर्वोपरि मान बैठे हैं, और इस व्यक्तिगत स्वार्थ की लपट जब अभिभावकों के पास पहुंचती है तब तक बहुत देर हो चुका होता है, अभिभावक के पास रोने-गाने के सिवा और कुछ नहीं बचता है। वास्तव में विद्यार्थी जीवन ही वह नींव है जिसके ऊपर व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।
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