एबीएन एडिटोरियल डेस्क । अब भारतीय संस्कृति को न सिर्फ देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय बनाने और इस सॉफ्ट पावर को कथित रूप से आॅरेंज इकोनॉमी के रूप में आगे बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। यह सच है कि किसी देश के सांस्कृतिक विकास की तस्वीर को अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र के योगदान के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन, कड़वा सच यह भी है कि सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पहले जिंदगी की बुनियादी जरूरतों का पूरा होना आवश्यक है। इसीलिए कबीरदास की यह पंक्ति प्रचलित है भूखे भजन न होइ गोपाला, यह लो अपनी कंठी माला। सुविधा संपन्न लोग ही कला-साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का रस ले पाते हैं।
आजादी के 75 साल में देश की बुनियादी जरूरतें काफी हद तक पूरी होने के बाद, अब भारतीय संस्कृति को न सिर्फ देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय बनाने और इस सॉफ्ट पावर को कथित रूप से आॅरेंज इकोनॉमी के रूप में आगे बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। संतोषजनक पक्ष यह है कि इस सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का फायदा दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रहा है और जयपुर, इंदौर, कोच्चि, लखनऊ, पटना और चंडीगढ़ जैसे शहरों को इसका ज्यादा लाभ हो रहा है।
भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को सिर्फ आर्थिक और सामरिक विकास से ही पूरा नहीं किया जा सकता। हार्ड पावर का असर कुछ समय तक जबकि सॉफ्ट पावर का दीर्घकालिक रहता है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले कलकत्ता का कला-साहित्य और सिनेमा में देशव्यापी प्रभाव महसूस किया जाता है। फ्रांस की प्राचीन संस्कृति यूरोप को मुरीद बनाए हुए है।
हाल ही ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय की अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पर यह टिप्पणी चर्चा में रही कि हम न होते तो आप फ्रेंच बोल रहे होते। लेकिन इतिहास को कुछ और पहले ले जायें, तो यह भी कहा जा सकता है कि रोम न होता तो आज ब्रिटेन भी ऐसा नहीं होता। पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली ग्रीको-रोमन संस्कृति विकसित ही नहीं होती यदि यूनान को पराजित करने वाले रोमन योद्धा ग्रीक संस्कृति के कायल नहीं हो जाते।
रोमन कवि होरेस ने ठीक ही कहा था, रोम की सेना ने यूनान को जीत लिया लेकिन ग्रीक संस्कृति ने रोम पर कब्जा कर लिया।
आज अमरीकी संस्कृति दुनिया जीत रही है, क्योंकि वह पहले नंबर की अर्थव्यवस्था बनी हुई है। भारत का वैश्विक कद बढ़ाने के लिए भारतीय संस्कृति का डंका पूरी दुनिया में बजाया जाना जरूरी है। अच्छी बात यह है कि छोटे शहर, महानगरों की नकल की बजाय सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं।
हमें ग्रामीण स्तर पर देश की सांस्कृतिक विरासत को संभालना और स्थानीय कलाकारों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ा होगा। एक अनुमान के अनुसार, यह क्षेत्र फिलहाल 45 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है। करीब 60 लाख लोग पारंपरिक कला उद्योग से जुड़े हुए हैं। इनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी तो और भी लोग इसके लिए आगे आएंगे। देश में सांस्कृतिक-आध्यात्मिक पर्यटन के विकास की काफी गुंजाइश है। इसके विकास के लिए हमें कुछ और गंभीर कदम उठाने होंगे।
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