मोहिनी एकादशी पापों का नाश, सौभाग्य और मोक्ष प्रदान करने वाला पावन व्रत : संजय सर्राफ

 

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। वर्ष भर आने वाली सभी एकादशियों में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आने वाली मोहिनी एकादशी अत्यंत पुण्यदायी और कल्याणकारी मानी जाती है। 

इस वर्ष मोहिनी एकादशी 27 अप्रैल को मनाई जायेगी। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और श्रद्धा-भक्ति से रखने पर समस्त पापों का नाश, सुख-समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत कलश को लेकर विवाद हुआ, तब भगवान विष्णु ने अत्यंत सुंदर मोहिनी रूप धारण किया। इस रूप से उन्होंने असुरों को मोहित कर देवताओं को अमृत पान कराया। 

भगवान विष्णु के इसी मोहिनी स्वरूप की स्मृति में यह एकादशी मनायी जाती है। इसलिए इसे मोहिनी एकादशी कहा जाता है। यह व्रत मनुष्य के भीतर की आसक्ति, मोह, लोभ और पाप प्रवृत्तियों को दूर कर धर्म, संयम और भक्ति का मार्ग दिखाता है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि मोहिनी एकादशी का व्रत करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत मानसिक शांति, पारिवारिक सुख, आर्थिक उन्नति और आत्मिक बल प्रदान करता है। 

जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए यह व्रत करता है, उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति मोह-माया के बंधनों से मुक्त होकर सद्कर्मों की ओर अग्रसर होता है। इसलिए यह एकादशी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का भी श्रेष्ठ माध्यम है। मोहिनी एकादशी का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को बुराइयों से दूर कर सत्य, संयम और सदाचार की प्रेरणा देना है। 

इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा, कथा श्रवण, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य किया जाता है। इस व्रत की विशेषता यह है कि यह व्यक्ति के मन में छिपे नकारात्मक विचारों को दूर कर जीवन में नई ऊर्जा और आशा का संचार करता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना गया है जो मानसिक तनाव, बाधाओं या पारिवारिक परेशानियों से गुजर रहे हों। 

प्राचीन कथा के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नामक नगरी में द्युतिमान नामक राजा राज्य करता था। उसके पुत्र धृष्टबुद्धि अत्यंत दुराचारी थे। पाप कर्मों के कारण उन्हें घर से निकाल दिया गया। वन में भटकते हुए वे महर्षि कौंडिन्य के आश्रम पहुंचे। वहां ऋषि ने उन्हें मोहिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। 

धृष्टबुद्धि ने श्रद्धा से व्रत किया, जिससे उनके सारे पाप नष्ट हो गये और उन्हें उत्तम लोक की प्राप्ति हुई। मोहिनी एकादशी आत्मसंयम, भक्ति और जीवन सुधार का पावन पर्व है। यह व्रत केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत जीवन में सुख, शांति और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।

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