एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हर वर्ष 29 अप्रैल को मनाया जाने वाला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की उस जीवंत परंपरा का स्मरण है, जिसमें देह, मन और आत्मा एकाकार होकर सृजन की पराकाष्ठा को स्पर्श करते हैं। नृत्य मानव की सबसे प्राचीन अभिव्यक्तियों में से एक है। एक ऐसी भाषा, जिसे शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, परंतु जो भावों की सम्पूर्णता को संप्रेषित कर देती है।
नृत्य की उत्पत्ति उतनी ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव सभ्यता। आदिमानव ने जब पहली बार प्रकृति के साथ संवाद स्थापित किया, तब उसके आनंद, भय, विजय और उत्सव के भाव देह की गतियों में प्रकट हुए। गुफा चित्रों, सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तियों विशेषकर नर्तकी की कांस्य प्रतिमा से यह स्पष्ट होता है कि नृत्य का अस्तित्व हजारों वर्ष पूर्व भी था। भारतीय परंपरा में नृत्य को दिव्यता से जोड़ा गया है।
भगवान शिव का नटराज रूप सृष्टि, स्थिति और संहार के चक्र को नृत्य के माध्यम से ही अभिव्यक्त करता है। यही नहीं, वैदिक युग में भी नृत्य यज्ञों और अनुष्ठानों का अभिन्न अंग था। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में नृत्य और नृत के बीच सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण अंतर है नृत शुद्ध शारीरिक गतियों का प्रदर्शन, जिसमें भाव या कथा का अभाव होता है। यह तकनीकी दक्षता और ताल-लय की सटीकता पर आधारित होता है। वहीं नृत्य इसमें भाव, रस और अभिव्यक्ति का समावेश होता है। यह दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करता है।
इसके अतिरिक्त नाट्य में कथा, अभिनय और संवाद का समावेश होता है। यह त्रिविध विभाजन भारतीय नृत्य की वैज्ञानिकता और गहनता को दर्शाता है। भारतीय नृत्य की आधारशिला नाट्यशास्त्र में निहित है, जिसे भरतमुनि ने रचा। इसमें नृत्य के अंग, उपांग, मुद्राएं, रस, भाव और अभिनय के नियमों का विस्तृत वर्णन है। रस सिद्धांत के अनुसार नृत्य का उद्देश्य दर्शकों में भावों का संचार करना है। श्रृंगार, वीर, करुण, रौद्र, हास्य, भयानक, बीभत्स और अद्भुत।
नर्तक की देह, नेत्र, मुखमुद्राएं और हस्तमुद्राएं मिलकर इन भावों को सजीव करती हैं। नृत्य का आध्यात्मिक आयाम भारतीय दृष्टि में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना है। यह योग की तरह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है। भक्ति आंदोलन में मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों ने नृत्य को ईश्वर भक्ति का साधन बनाया। नृत्य में लय और ताल का समन्वय ब्रह्मांड की गति का प्रतीक है। भारत में शास्त्रीय नृत्य की परंपरा हजारों वर्ष पुराना है।
भारत विविधताओं का देश है, और यहां नृत्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। यहां की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियां हैं तमिलनाडु भरतनाट्यम, केरल कथकली, मोहिनीअट्टम, उत्तर प्रदेश कथक, ओडिशा ओडिसी, आंध्र प्रदेश कुचिपुड़ी, मणिपुर मणिपुरी, असम सत्रिया इन सभी नृत्य शैलियों की अपनी विशिष्ट शैली, वेशभूषा, संगीत और कथा परंपरा है, किंतु इनका मूल आधार नाट्यशास्त्र ही है। जनजीवन की धड़कन कहीं जाने वाली जो नृत्य है वह है लोक नृत्य।
यदि शास्त्रीय नृत्य आत्मा की साधना है, तो लोक नृत्य जनजीवन की धड़कन है। भारत के प्रत्येक राज्य में लोक नृत्य की अपनी अलग पहचान है जैसे पंजाब भांगड़ा, गिद्धा, गुजरात गरबा, डांडिया, राजस्थान घूमर, बिहार झूमर, जट-जटिन, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल छऊ, लोक नृत्य समाज के उत्सव, कृषि, विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े होते हैं। इनमें सहजता, सामूहिकता और आनंद की प्रधानता होती है। झारखंड की धरती नृत्य और संगीत की जीवंत प्रयोगशाला है। यहां के जनजातीय समुदायों के जीवन में नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।
झारखण्ड के प्रमुख लोक नृत्य है छऊ नृत्य (सरायकेला) झ्र मुखौटा नृत्य, जिसमें वीरता और पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन होता है। जोहड़ा (झूमर) महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सौंदर्यपूर्ण नृत्य। डोमकच विवाह अवसर का उल्लासपूर्ण नृत्य। करमा नृत्य प्रकृति और वृक्ष पूजा से जुड़ा हुआ। पाइका नृत्य युद्ध कौशल का प्रतीक माना जाता है। इन नृत्यों में प्रकृति के साथ गहरा संबंध दिखाई देता है। जंगल, पहाड़, नदियां और ऋतु परिवर्तन सभी नृत्य के भावों में समाहित हैं।
नृत्य न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन का भी सशक्त साधन है। शिक्षा के क्षेत्र में नृत्य आत्मविश्वास बढ़ाता है, अनुशासन सिखाता है, सांस्कृतिक चेतना विकसित करता है, सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करता है। आज के डिजिटल युग में जहां मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं, वहां नृत्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।
वैश्वीकरण और पाश्चात्य प्रभाव के कारण पारंपरिक नृत्य शैलियां संकट का सामना कर रही हैं। युवा पीढ़ी का झुकाव आधुनिक और फ्यूजन नृत्य की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नृत्य शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, लोक कलाकारों को मंच और सम्मान मिले, डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर परंपराओं को संरक्षित किया जाए।
अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हमें यह याद दिलाता है कि नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की लय है। यह शरीर की गति में आत्मा की अभिव्यक्ति है। झारखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में नृत्य की परंपरा न केवल अतीत की धरोहर है, बल्कि भविष्य की दिशा भी है। आज आवश्यकता है कि हम नृत्य को केवल मंच तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं—ताकि हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारी आत्मा सदैव गतिमान बनी रहे। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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