मंगला और सुमंगला दो सखियों की धार्मिक कथा

 

राजकुमारी पाण्डेय 

एबीएन सोशल डेस्क। एक समय की बात है वृंदावन में एक महाराज जी बड़ी ही सुंदर कथा सुना रहे थे। यमुना नदी के उस पार गांव से दो सखियां वृंदावन में रोज सब्जी बेचने आती थी। उन दोनों में से एक का नाम था मंगला और दूसरी का सुमंगला। मंगला और सुमंगला दोनों सब्जी की टोकरी सिर पर रख आती और रोज वृंदावन में सब्जी बेचती। वह दोनों घर से अचार और रोटी लेकर आती और वापस यमुना के तट पर जाकर पेड़ की छाया में बैठकर अचार-रोटी खाती। यमुना जी का पानी पीती। बड़े ही आनंद के साथ नाव में बैठकर किराया देकर अपने घर चली जाती थी। वह दोनों वृंदावन के पास यमुना नदी के उस पार एक गांव में रहने वाली थी। परंतु कभी उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का नाम नहीं सुना था।  

भक्ति क्या होती है पूजा पाठ क्या होता है उन्होंने कभी नहीं जाना। केवल अपना गुजारा करती और अपना पेट भरना जानती थी। वह दोनों बड़ी सहज थी। झूठ बोलना तो मानो उन्होंने अपने जीवन में जाना ही नहीं था। कपट क्या होता है मंगला और सुमंगला ये नहीं समझती थी। आज तक उन्होंने झूठ नहीं बोला था। उनके अंदर रति भर कपट नहीं था। जैसी ही वह दोनों बाहर से थी वैसे ही भीतर से भी।  

एक दिन दोनों सखियां सब्जी बेचने वृंदावन आयी। उनकी सब्जी जल्दी बिक गयी। सब्जी जल्दी बिकने पर देखा कि जहां वह सब्जी बेचने गयी थी, वहां एक बड़े ही ज्ञान की कथा चल रही थी। मंगला ने कहा- सुनो बहन सुमंगला, सब्जी तो आज जल्दी बिक गयी। हम इतनी जल्दी भी घर जाकर क्या करेंगे? यह महाराज जी कथा सुना रहे हैं, चलो कथा सुन लेते हैं। सुमंगला ने कहा कि बहन मंगला, कथा क्या होती है? मंगला बोली बहन यह तो मुझे भी नहीं मालूम। पर चलो सब लोग कहते हैं कि कथा हो रही है तो चलो आज हम भी सुन ही लेंगे कि कथा क्या होती है? मंगला-सुमंगला दोनों सब्जी की टोकरी एक जगह रख कथा में गयी और सबसे पीछे पंडाल में जाकर बैठ गयी। दोनों ही बड़ी श्रद्धा से कथा सुनने लगी।  

महाराज जी कथा सुना रहे थे। कह रहे थे कि जिसने भगवान से प्रेम नहीं किया, उनका जीवन बेकार है। जिनका प्रेम कृष्ण के चरणों में नहीं हुआ उनका जीवन बेकार है। अरे आपने अगर भगवान को नहीं देखा, तो फिर क्या देखा? भगवान को नहीं पाया तो फिर क्या पाया? महाराज जी बड़े प्यार से भगवान की चर्चा सुना रहे थे। भगवान को प्राप्त कर लेना ही जीव मात्र, मनुष्य मात्र की सार्थकता है। महाराज जी कथा में कह रहे थे आप सबको पता है कि इस धरती पर आपका जन्म क्यों हुआ है? अरे भगवान को पाने के लिए आसे हो, तुम भगवान को खोजने के लिए आये हो। परंतु यहां आप लोग केवल अपना पेट भरने में लगे हो। पैसा इकट्ठा करने में लगे हो। भूल गये कि आने का उद्देश्य क्या था?  

जब महाराज जी ने इस तरह से कथा में समझाया और सुनाया तो मंगला और सुमंगला दोनों सखियां बड़ी प्रभावित हुई। मंगला ने कहा बहन सुमंगला देखो महाराज जी ने क्या कहा है कि श्री कृष्ण चरणों में प्रेम नहीं हुआ तो जीवन बेकार है। तो सुमंगला ने कहा कि बहन मंगला तो क्या हमारा जीवन बेकार हो जायेगा। क्या हमारी जिंदगी बेकार चली गयी? मंगला ने कहा- बहन लगता तो ऐसा ही है। अब कथा चल रही थी। इधर मंगला और सुमंगला को यमुना नदी पार करके वापस अपने गांव जाना था। इसलिए वह दोनों सखियां कथा से उठकर के चली गयी, परंतु दोनों सखियां रास्ते में यही चर्चा करती रही। 

बहन तू बता कभी तूने क्या कृष्ण को देखा है? भगवान को देखा है? मंगला बोली- बहन मैं तो हमेशा तेरे साथ रहती हूं। भला मैंने भगवान को कहां देखा है? तो सुमंगला बोली- बहन तो फिर हमें भगवान को देखना चाहिए। महाराज जी ने कहा कि यदि भगवान को नहीं देखा और भगवान से प्रेम नहीं किया तो जीवन बेकार है।  

सुमंगला ने कहा- यह बताओ फिर भगवान मिलेंगे? कहां मिलेंगे? तो मंगला ने कहा- मुझे लगता है भगवान साधु संतों के पास जरूर मिलेंगे। फिर दोनों सखियां बातें करते-करती यमुना नदी के तट पर पहुंच गयी। यमुना नदी के तट पर बैठकर वह दोनों अचार-रोटी खाने लगी और बस यही चर्चा कर रही थी कि हम तो तुच्छ प्राणी हैं। हम दोनों अभागी हैं। हमें कहां भगवान मिलेंगे? उन्होंने कहा साधुओं को भगवान मिलते होंगे। तभी यमुना के किनारे पर एक महाराज आते हैं। महाराज जी आये। उन्होंने अपना कमंडल और झोला यमुना के तट पर रखा और जंगल में शौच के लिए चले गये।  

जैसे ही महाराज जी जंगल में झाड़ियों के बीच जाकर बैठे, तो मंगला और सुमंगला आपस में कहने लगी- सुनो यह महाराज जी हैं और इनका सामान यहां रखा हुआ है। जरूर भगवान यहीं होंगे। महाराज जी तो यहां से बिल्कुल लंगोटी लगाकर के गये हैं। उनके शरीर पर तो कोई कपड़ा था नहीं। भगवान तो उन्होंने कहीं छुपाया नहीं था। जरूर उनके सामान में भगवान होंगे। मंगला बोली चलो फिरजल्दी से उन्होंने अपनी रोटी और अचार को छोड़ दिया और दोनों दौड़ कर गई और महाराज जी का जो सामान था कमंडल खोला तो उसमें कुछ नहीं मिला फिर झोला निकाला तो उसमें उनका पूजा पाठ का सामान था। वह कहने लगे अरे बहन इस झोली में तो भगवान नहीं हैं। देखो। ध्यान से देखो। भगवान तो महाराज जी के पास होते हैं। जरूर भगवान इनके पास होंगे, तुम्हें दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह दोनों सखियां इतनी भोली भाली थी कि उन्हें यह भी नहीं पता कि भगवान कहां है? 

उन्हें तो यह लगा कि भगवान साधुओं के पास होते हैं और साधु का झोला और सामान यहीं रखा हुआ है। अब उन्होंने महाराज जी का झोला पलट दिया पूरे झोले को खाली कर दिया। जब झोले को पूरा खाली कर दिया तो उसमे से एक छोटा सा डिब्बा निकला। अब जैसे ही उस डिब्बे को खोला तो उस डिब्बे के अंदर छोटे से लड्डू गोपाल जी बैठे हुए थे। लड्डू गोपाल जी को देखकर सुमंगला  ने कहा- बहन भगवान मिल गये। देखो यह रहे भगवान। मंगला रोने लगी तो सुमंगला बोली- बहन रोती क्यों हो? 

महाराज जी जरूर आपको डांटते होंगे। मंगला बोली- प्रभु अभी महराज जी नहीं है। महाराज जी अभी जंगल में गये हैं। आप एक काम करो, थोड़ी देर जब तक हम दोनों सखियां यहीं पर हैं आप अपना पांव सीधा कर लो। अब आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है। आपको कोई डांटेगा नहीं। आप ने महाराज जी के डर के कारण पांव टेढ़ा करके रखा है। इतने छोटे से डिब्बे में बैठे हो आप। मेरे साथ चलेंगे तो मैं आपको अपनी टोकरी में बैठाउंगी। मंगला ने कहा- लगता है भगवान ज्यादा ही डरे हैं। सुमंगला ने कहा- लाओ हम पांव सीधा कर देते हैं। भगवान को पकड़ा और लड्डू गोपाल जी का पांव पकड़ कर खींचने लगी। सुमंगला ने जब लड्डू गोपाल जी को पकड़ कर खींचा। उनके पैर को सीधा किया और कहा कि प्रभु अब आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है। 

महाराज जी नहीं है आप अपना पांव सीधा कर लो थोड़ी देर आपको अच्छा लगेगा पांव सीधा करके। जब सुमंगला ने पांव सीधा किया, तो भगवान उसकी सहजता और उसकी सरलता पर रिझ गये। न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रिझ जाते हैं। भगवान उस मंगला और सुमंगला ने जब पांव पकड़ कर खींचा, तो श्याम सुंदर ने अपना पांव सीधा कर लिया। एक पांव नहीं, एक पांव मंगला ने खींचा तो सीधा हो गया और दूसरा पांव सुमंगला ने खींचा तो वह भी सीधा हो गया। अब तो भगवान बड़े हो गये। अभी टेढ़े पांव थे तो छोटे पांव सीधे हो गये। मंगला और सुमंगला ने ठाकुर जी को खड़ा किया। उनकी जो अचार रोटी बची हुई थी खाने के बाद उन्होंने कहा- प्रभु हमको लगता है आप भूखे हैं? आप खाना खा लीजिये। 

तो भगवान उनके प्रेम में रिझ कर उनकी बासी रोटी और अचार खाने लगे लड्डू गोपाल जी का मुंह खुला और वह भगवान को खिलाने लगी। भगवान उनकी तरफ देख कर मंद मंद मुस्कुराते जा रहे थे। मंगला और सुमंगला खिलाती जा रही थी। तब तक महराज जी जंगल के झाड़ियों से निकल कर आ गये और जब आये तो महराज जी ने देखा की हमारी झोली के पास दो महिलाएं खड़ी है। महराज जी तुरंत बोले अरे कौन हो चोर हो क्या? क्या चुराने आयी हो? महाराज जी दौड़े। कहने लगे पकड़ो, पकड़ो। अब मंगला और सुमंगला बोली- बहन भागो। फिर दोनों सखियां भगवान से कहने लगी- प्रभु फिर मिलेंगे हम। आपसे दोबारा आपके कब दर्शन होंगे? ऐसा कह कर भगवान को वहीं छोड़कर मंगला और सुमंगला भागी और अपनी टोकरी उठाकर तुरंत भाग गयी। अब महाराज जी बड़े गुस्से में आये और देखा तो पूरा सामान नीचे पड़ा हुआ था। 

झोली दूर पड़ी हुई थी। अब झोली को उठाया महराज जी ने अपना सामान रखा लड्डू गोपाल जी का डिब्बा देखा तो डिब्बा खुला हुआ था। देखा अरे डिब्बा खुला है। भगवान कहां हैं? यहां वहां देखा तो भगवान पड़े थे बालू रेत में। अब जैसे ही महाराज जी ने अपने भगवान जी को डिब्बे में रखा तो भगवान डिब्बे में आये ही नहीं। अब डिब्बे से पांव बाहर निकल रहे थे। भगवान डिब्बे में नहीं आ रहे थे। फिर जब महाराज जी ने ध्यान से देखा तो भगवान के दोनों पांव सीधे थे। यह देख कर महाराज जी लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे- प्रभु यह क्या लीला है? तब मंगला ने आवाज लगायी। महाराज जी भगवान को इतना डराना मत, आपने इन्हें डरा करके रखा था।

यह टेढ़ा पांव करके बैठे थे। हम दोनों सखियों ने इनका पांव सीधा किया है। अब उनके पांव टेढ़ा न करवाना। मंगला यह कह कर चली गयी और वह साधु बस एक नजर से मंगला और सुमंगला को देखते रहे। कहने लगे- रुक जाओ, रुक जाओ। मुझे अपने चरणों की धूल ले लेने दो। लेकिन मंगल और सुमंगला नहीं रुकी। वह दोनों सखियां चली गयी। उन्हें लग रहा था कि महाराज जी कहीं हमें पकड़ कर मार लगायेंगे। फिर महाराज जी बोले- हे नाथ मेरी सारी जिंदगी निकल गयी आपकी सेवा करते-करते। 

परंतु आपका पांव मैं सीधा नहीं कर पाया। और यह दोनों गांव की स्त्रियां, इन्होंने आपको अचार और रोटी का भोग लगाया और उनके कहने से आप ने भोग ग्रहण कर लिया। उनके कहने से अपना पांव सीधा कर लिया। वह महाराज जी भगवान के चरणों में गिरकर प्रणाम करते हुए कहने लगे- हे नाथ मैं अभागा हूं। मैंने सिर्फ आपको अपनी झोली में रखकर केवल वजन ढोया है। जैसा प्रेम उन दोनों ने कर लिया आपसे, जितनी सहजता और सरलता मेरे भीतर नहीं आयी। जिसके कारण आपने मुझे कभी दर्शन नहीं दिये।

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