त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन, मनन एवं दर्शन शास्त्र में एक स्थापित सूत्र है कि मनुष्य का आंतरिक जगत जितनी सुलझी एवं व्यवस्थित होती है उसी के अनुपात में आदमी का बाहरी दुनिया सुलझी एवं व्यवस्थित रहती है।
मनुष्य के द्वारा अविष्कारित विज्ञान के माध्यम से निर्मित उपकरण ने जीवन से संबंधित संसाधन, तेज गति और अधिक से अधिक जानकारी के लिए सरल विधि दिया है; लेकिन आज का जीवनशैली अस्त-व्यस्त एवं भागमभाग की होकर रह गयी है।
अति व्यस्तता तथा सक्रियता ऊर्जा का मापदंड हो सकता है, परंतु असंतुलित और उद्देश्यहीन चंचलता कोई इक्षित परिणाम उत्पन्न नहीं कर पता है।आर्थिक समृद्धि जहां एक और जीवन के लिए आवश्यक है, वहां दूसरी ओर वह सामाजिक मान सम्मान और प्रतिष्ठा का मान्यता प्राप्त मानक हो गया है और यही आकर्षण ने व्यक्ति को एकाकी करते हुए पारिवारिक संवाद, सामाजिक संवाद एवं संबंध से दूर कर दिया है।
व्यक्ति की समस्या और तनाव आजीवन बना रहता है। हद तो यह हो गयी है कि व्यस्तता की दृष्टि रात और दिन में अंतर नहीं रह गया है। बेचैनी एक विकराल समस्या होकर रह गयी है।
सभी जानते हैं कि शांत व्यवस्थित, स्थिर एवं संतुलित मन मस्तिष्क उत्तम सक्रियता एवं परिणाम प्रस्तुत कर सकता है, परंतु इन सद्गुणों के प्रति उदासीनता संकट एवं दु:ख का मुख्य कारण बना हुआ है।