टीम एबीएन, रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है विश्व दुग्ध दिवस प्रत्येक वर्ष 1 जून को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2001 में खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा की गई थी।
इस दिवस का उद्देश्य दूध एवं दुग्ध उत्पादों के पोषणात्मक महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करना तथा डेयरी क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी योगदान को रेखांकित करना है।
दूध को संपूर्ण आहार माना जाता है क्योंकि इसमें कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन-डी, विटामिन-बी12, पोटैशियम तथा अनेकआवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक वृद्धि, युवाओं की कार्यक्षमता तथा बुजुर्गों की हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
संतुलित आहार में दूध और दुग्ध उत्पादों का विशेष स्थान है।विश्व दुग्ध दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगों को दूध के स्वास्थ्य लाभों से अवगत कराना, डेयरी किसानों के योगदान का सम्मान करना तथा दुग्ध उत्पादन और वितरण से जुड़े उद्योगों के महत्व को उजागर करना है।
यह दिवस किसानों, डेयरी उद्यमियों, वैज्ञानिकों और उपभोक्ताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का भी अवसर प्रदान करता है।भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में डेयरी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। लाखों किसान एवं पशुपालक दुग्ध उत्पादन के माध्यम से अपनी आजीविका अर्जित करते हैं।
विशेष रूप से महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में डेयरी व्यवसाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दुग्ध सहकारी समितियों और आधुनिक डेयरी तकनीकों ने ग्रामीण विकास को नई दिशा प्रदान की है। इस दिवस की विशेषता यह है कि इसके माध्यम से पौष्टिक आहार, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण विकास और सतत कृषि के महत्व को भी बढ़ावा दिया जाता है।
विभिन्न संस्थाओं द्वारा जागरूकता अभियान, स्वास्थ्य शिविर, संगोष्ठियां, दुग्ध वितरण कार्यक्रम तथा किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। आज के समय में जब कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां बढ़ रही हैं, तब दूध जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
विश्व दुग्ध दिवस हमें यह संदेश देता है कि स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए संतुलित पोषण, गुणवत्तापूर्ण दुग्ध उत्पादन और किसानों के कल्याण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।विश्व दुग्ध दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि पोषण, स्वास्थ्य, किसान समृद्धि और सतत विकास के प्रति सामूहिक संकल्प का प्रतीक है।
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