एबीएन सेंट्रल डेस्क। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। यह जीत केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन आंसुओं की है जिन्होंने सत्ता के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया। संदेशखाली की पीड़ित रेखा पात्रा, आरजी कर मेडिकल कॉलेज की मृतका की मां रत्ना देबनाथ और घरों में चौका-बर्तन करने वाली कलिता मांझी की जीत ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। इन तीनों महिलाओं ने अपनी निजी क्षमता से बेहतर प्रदर्शन किया है।
कहते हैं कि इतिहास सदैव स्याही से नहीं, कभी-कभी उन आंसुओं से भी लिखा जाता है। जो सूखने से पहले ज्वालामुखी बन जाते हैं। बंगाल की तपती माटी ने इस बार एक ऐसी ही महागाथा रची है। यह केवल सत्ता परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि उस ह्यमौनह्ण के मुखर होने की हुंकार है, जिसे व्यवस्था ने कुचलने की पुरजोर कोशिश की थी।
वैसे भारतीय समाज में कहा भी जाता है कि जब सत्ता का दंभ सातवें आसमान पर पहुंच जाए और न्याय की गुहार लगाने वालों पर लाठियां भांजी जाने लगें, तब नियति स्वयं न्याय करती है। पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने आज इसी शाश्वत सत्य पर अपनी मुहर लगा दी है। वास्तव में, यह चुनाव किसी दल या विचारधारा की विजय मात्र नहीं, बल्कि बंगाल की उन माताओं और बेटियों की जीत है, जिन्होंने अपने मताधिकार की शक्ति से खौफ के तथाकथित साम्राज्य को मटियामेट कर दिया है।
इस बंगाल चुनाव में ऐतिहासिक मोड़ की सबसे बड़ी नायिकाएं हैं रत्ना देबनाथ, रेखा पात्रा और कलिता मांझी बनकर उभरी हैं। इन तीन चेहरों ने वह कर दिखाया, जिसे बड़े-बड़े दिग्गज राजनीतिक सूरमा भी नहीं कर पाये थे। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ममता बनर्जी की पराजय की पटकथा उसी क्षण लिख दी गई थी, जब इन महिलाओं ने अपनी अस्मत और अपनों के रक्त का हिसाब मांगने का संकल्प लिया था।
इन चुनावी नतीजों ने देश में यह संदेश दे दिया है कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें आज भी गहरी हैं। यहां कोई राजा सर्वोपरि नहीं, बल्कि जनता की अदालत ही सर्वोच्च है। अपने-अपने हिस्से का असहनीय दर्द सहने के बाद, अब ये तीनों वीरांगनाएं विधायक के रूप में सदन में न्याय की नई लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। तो आइए इन नायिकाओं की कहानी समझते हैं।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा आरजी कर अस्पताल कांड की पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ की हो रही है। रत्ना ने पानीहाटी सीट से टीएमसी के कद्दावर उम्मीदवार को 28,000 से ज्यादा वोटों से शिकस्त दी है। मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, जब टीएमसी सरकार के मंत्री और पुलिस प्रशासन दोषियों को बचाने की कोशिश कर रहे थे, तब रत्ना ने सड़क पर उतरने का फैसला किया था।
उनकी यह जीत उस व्यवस्था को करारा तमाचा है, जिसने एक बेटी के इंसाफ को दबाने की कोशिश की थी। जनता ने रत्ना के आंसुओं को व्यर्थ नहीं जाने दिया और उनके पक्ष में एकतरफा मतदान कर ममता सरकार की विदाई तय कर दी।
संदेशखाली की सड़कों पर जब महिलाएं अपनी इज्जत की सुरक्षा के लिए रो रही थीं, तब सत्ता के गलियारों में सन्नाटा था। लेकिन वहां की पीड़ित रेखा पात्रा ने हिंजलगंज सीट से चुनावी मैदान में उतरकर यह साबित कर दिया कि पीड़ित महिला कमजोर नहीं होती।
रेखा ने टीएमसी प्रत्याशी को 5000 से अधिक वोटों से हराकर विधानसभा का रास्ता तय किया है। यह जीत केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि उन हजारों महिलाओं की आवाज है जिनके साथ सालों तक ज्यादती हुई। रेखा की इस जीत ने टीएमसी के गुंडागर्दी वाले मॉडल की कमर तोड़कर रख दी है।
लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत तस्वीर औसग्राम सीट से सामने आयी है, जहां चार घरों में झाड़ू-पोछा करने वाली कलिता मांझी ने टीएमसी के दिग्गज को 12,000 वोटों से पटखनी दे दी। कलिता को बीजेपी का समर्थन करने के कारण टीएमसी कार्यकर्ताओं ने बार-बार प्रताड़ित किया और अपमानित किया था।
लेकिन एक गरीब मां की हिम्मत नहीं टूटी। कलिता की जीत यह बताती है कि बंगाल के गरीब तबके ने अब डरना छोड़ दिया है। एक मेड से लेकर विधायक बनने तक का उनका यह सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बनेगा कि मेहनत और सच्चाई के आगे सत्ता भी झुकती है।
बीजेपी के लिए ये तीनों महिलाएं ब्रह्मास्त्र साबित हुईं। राजनीति के पंडितों का मानना है कि पार्टी ने इन चेहरों को आगे करके सीधे जनता के दिलों को छुआ। इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, चुनावी प्रचार के दौरान जब भी ये महिलाएं मंच पर आती थीं, तो जनता की आंखों में गुस्सा और सहानुभूति साफ देखी जा सकती थी।
रत्ना देबनाथ के एक-एक शब्द ने ममता बनर्जी के महिला कार्ड को फेल कर दिया। बीजेपी ने यह साबित कर दिया कि बंगाल की राजनीति अब केवल हिंसा से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और न्याय के आधार पर चलेगी।
आज जो लोग भारत में लोकतंत्र के खत्म होने का रोना रोते हैं, उन्हें बंगाल के इन नतीजों को करीब से देखना चाहिए। चुनाव के मैदान में जब एक आम नागरिक सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति को धूल चटा देता है, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र फल-फूल रहा है।
जो लोग आज भी हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे, वे शायद उन चाटुकारों की श्रेणी में हैं जो जनता की नब्ज नहीं पहचान पाए। बंगाल ने बता दिया है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अगर वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है, तो उसे कुर्सी छोड़नी ही होगी।
टीएमसी की इस हार का सबसे बड़ा कारण उनका वह कैडर रहा, जिसने गांव-गांव में लोगों को डराना अपना पेशा बना लिया था। कलिता मांझी जैसी महिला को परेशान करना टीएमसी को भारी पड़ गया। जब जनता ने देखा कि उन्हीं के बीच की एक महिला को बीजेपी के झंडे के कारण सताया जा रहा है, तो लोगों ने चुपचाप ईवीएम पर चोट की।
संदेशखाली से शुरू हुई वह आग देखते ही देखते पूरे बंगाल में फैल गई और ममता बनर्जी के शासन को जलाकर राख कर दिया। यह चुनाव शांतिपूर्ण नहीं था, लेकिन जनता का इरादा पत्थर की तरह मजबूत था।
ममता बनर्जी की हार और भाजा की इस बंपर जीत के बाद अब जिम्मेदारी काफी बढ़ गयी है। रत्ना, रेखा और कलिता जैसे चेहरों ने जिस भरोसे के साथ लोगों का वोट लिया है, उसे पूरा करना एक बड़ी चुनौती होगी।
बंगाल की जनता ने भ्रष्टाचार और हिंसा के खिलाफ जनादेश दिया है। अब देखना यह है कि नई सरकार इन महिलाओं के सम्मान और प्रदेश की सुरक्षा को लेकर क्या कदम उठाती है। फिलहाल, बंगाल की हवाओं में न्याय की खुशबू है और यह जीत उन करोड़ों लोगों की है जिन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना नहीं छोड़ा।
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