एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत के महान संत, समाज सुधारक और निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि संत कबीर दास की जयंती पूरे देश में श्रद्धा, आस्था और सम्मान के साथ मनाई जाती है। इस वर्ष संत कबीर दास जयंती 29 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर मनाई जाएगी।
इस दिन देशभर में कबीर पंथी आश्रमों,मंदिरों तथा विभिन्न सामाजिक- सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सत्संग, भजन-कीर्तन, कबीर वाणी का पाठ, प्रवचन,भंडारा एवं सेवा कार्यों का आयोजन किया जाता है।संत कबीर दास के जन्म के संबंध में विभिन्न मत प्रचलित हैं, किंतु व्यापक रूप से माना जाता है कि उनका जन्म वर्ष 1398 ईस्वी में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वाराणसी के निकट लहरतारा क्षेत्र में हुआ था।
लोक परंपरा के अनुसार उनका पालन-पोषण मुस्लिम दंपति किया। इसी कारण उनके जीवन में हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।संत कबीर दास जयंती से जुड़ी कथा के अनुसार कबीर बचपन से हीआध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे।
वे स्वामी रामानंद को अपना गुरु बनाना चाहते थे। कहा जाता है कि एक दिन वे प्रातःकाल उस मार्ग पर लेट गए जहाँ से स्वामी रामानंद गंगा स्नान के लिए जाते थे। अंधेरे में उनका पैर कबीर पर पड़ गया और उनके मुख से अनायास राम-राम शब्द निकला।
कबीर ने इसे ही गुरु-मंत्र मान लिया और आजीवन राम नाम का स्मरण करते हुए प्रेम, भक्ति, सत्य और मानवता का संदेश फैलाया।इस जयंती का मुख्य उद्देश्य संत कबीर की शिक्षाओं, मानवीय मूल्यों और सामाजिक समरसता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाना है।
उन्होंने जाति-पांति, ऊँच-नीच, धार्मिक कट्टरता, पाखंड और बाहरी आडंबर का विरोध किया तथा सच्चे आचरण, ईश्वर-भक्ति, सत्य, प्रेम और सेवा को जीवन का वास्तविक धर्म बताया। उनके दोहे आज भी समाज को सही दिशा प्रदान करते हैं और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
संत कबीर दास जयंती की विशेषता यह है कि यह किसी एक धर्म या समुदाय का पर्व नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेम, समानता औरभाईचारे का उत्सव है। आज के समय में, जब समाज विभाजन, कट्टरता और वैमनस्य जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है,तब कबीर का संदेश-जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान,और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
संत कबीर दास जयंती हमें यह प्रेरणा देती है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप मानव सेवा, सत्य, करुणा और सद्भाव में निहित है। यदि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएँ, तो एक समरस, शांतिपूर्ण और नैतिक समाज की स्थापना का मार्ग और अधिक प्रशस्त हो सकता है।
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