टीम एबीएन, रांची। पहाड़ी मंदिर विकास समिति की ओर से आज आयोजित प्रेस वार्ता में मंदिर से संबंधित वित्तीय अनियमितताओं, आॅडिट रिपोर्ट में सामने आये तथ्यों तथा झारखंड राज्य हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाये गये।
समिति ने कहा कि हाल ही में उपलब्ध आॅडिट रिपोर्ट में कई ऐसे वित्तीय लेन-देन सामने आये हैं, जिनका कोई स्पष्ट हिसाब, व्यय रसीद अथवा वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया है। आॅडिट रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि कई ट्रांजैक्शन ऐसे हैं जिनके उद्देश्य एवं प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं हो सकी है।
समिति ने स्पष्ट किया कि इन लेन-देन से संबंधित विस्तृत जानकारी वर्तमान रांची पहाड़ी मंदिर विकास समिति के पास उपलब्ध नहीं है, क्योंकि ये सभी ट्रांजैक्शन उस अवधि के हैं जब मंदिर का नियंत्रण एवं संचालन झारखंड राज्य हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा पूर्व में गठित समिति के पास था।
समिति ने कहा कि ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार कई राशि Loans and Advances के रूप में दर्शाई गई है, लेकिन संबंधित पक्षों का पूरा विवरण, खर्च का आधार एवं दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया। यह अत्यंत गंभीर वित्तीय अनियमितता का विषय है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार निम्नलिखित प्रमुख ट्रांजैक्शन सामने आये हैं :
तथा अन्य कई लेन-देन, जिनके समर्थन में कोई स्पष्ट दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया। समिति ने विशेष रूप से कहा कि ऑडिट रिपोर्ट में जिन कई ट्रांजैक्शनों का उल्लेख है, उनमें से अनेक राशि राँची पहाड़ी मंदिर समिति के पूर्व सचिव के नाम अथवा उनसे संबंधित रूप में दर्शाई गई हैं, जो अत्यंत गंभीर एवं जांच का विषय है।
समिति ने सवाल उठाया कि जब मंदिर का प्रबंधन एवं वित्तीय संचालन न्यास बोर्ड द्वारा गठित समिति के हाथों में था, तब इन पैसों का उपयोग किस उद्देश्य से किया गया तथा उसका पूरा हिसाब अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।
समिति ने कहा कि यदि न्यास बोर्ड पारदर्शिता एवं जवाबदेही की बात करता है, तो उसे सबसे पहले अपने द्वारा गठित समिति के कार्यकाल के दौरान हुए इन सभी वित्तीय लेन-देन की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच करवानी चाहिए।
समिति ने यह भी कहा कि जिन लोगों पर आज अनियमितता के आरोप लगाए जा रहे हैं, उन्हीं लोगों एवं समिति को पूर्व में न्यास बोर्ड द्वारा मान्यता भी दी गई थी। ऐसे में बिना निष्पक्ष जांच के एकतरफा कार्रवाई करना दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होता है।
समिति ने कहा कि माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में यह स्पष्ट कहा था कि किसी भी कार्रवाई से पूर्व वैधानिक प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय एवं उचित सुनवाई अनिवार्य है। इसके बावजूद न्यास बोर्ड द्वारा मनमानी तरीके से नई अधिसूचना जारी करना कई गंभीर कानूनी प्रश्न खड़े करता है।
समिति ने कहा कि भारत एक संविधान सर्वोच्च मानने वाला लोकतांत्रिक देश है तथा कोई भी बोर्ड, संस्था अथवा प्राधिकरण संविधान एवं न्यायालय से ऊपर नहीं हो सकता।
समिति ने यह भी जानकारी दी कि झारखंड राज्य हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड की नवीन अधिसूचना एवं उससे संबंधित कार्रवाई को चुनौती देते हुए माननीय झारखंड उच्च न्यायालय में W.P.(C) No. 5123/2026 दायर किया गया है, जो वर्तमान में विचाराधीन है।
समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी कि जब तक मामला माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, तब तक यदि किसी भी पक्ष द्वारा जबरन मंदिर का प्रभार लेने अथवा नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया, तो समिति एवं श्रद्धालुओं द्वारा उसका लोकतांत्रिक एवं पुरजोर विरोध किया जाएगा।
समिति ने मीडिया के माध्यम से माननीय मुख्यमंत्री, झारखंड सरकार एवं महामहिम राज्यपाल से आग्रह किया है कि वे इस पूरे मामले में हस्तक्षेप कर मंदिर से जुड़े सभी वित्तीय लेन-देन की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें तथा झारखंड राज्य हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा जारी विवादित अधिसूचना को तत्काल रद्द करने हेतु आवश्यक कदम उठाएँ।
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