एबीएन सेंट्रल डेस्क। अगर आप समझ रहे हैं कि सुवेन्दु अधिकारी के PA की हत्या हुई है तो आपको भी बदला नहीं बदलाव वाले कीड़े ने काट लिया है और आप भी बंगाल के निस्तेज निकम्मे डीजीपी की तरह भोले हैं जो बता रहा है कि मारने वाले की गाड़ी के नम्बर प्लेट नकली थे।
क्या आपको पता है कि यही PA वो शख्स है जिसने भवानीपुर काउंटिंग हाल में ममता बनर्जी के बिना id घुसने पर आपत्ति की थी और बाहर रोक दिया था। तभी से ये हिट लिस्ट में था।
ये सीधे सीधे भावी मुख्यमंत्री पर हमला था।अजय पाल शर्मा को बुलाओ। अभिषेक बनर्जी और जहांगीर खान को उठाओ। नहीं तो जनता में अपना इक़बाल खो दोगे। सत्ता सिर्फ जय श्री राम बोलने के लिए नहीं मिली है। (सेवानिवृत्त अधिकारी निरंतर नारायण के फेसबुक वाल से साभार)
एबीएन सेंट्रल डेस्क। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की जयंती 25 बैसाख (नौ मई) को पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नयी सरकार का शपथग्रहण समारोह हो सकता है।
गौरतलब है कि श्री टैगोर की जयंती हर साल बंगाली महीना 25 गते बैसाख को मनाया जाता है। यह दिन बंगाल के लोगों के लिए काफी अहमियत रखता है। राज्य के लोग नोबेल पुरस्कार विजेता टैगोर की जयंती को काफी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन राज्यभर में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस दिन राज्य में भाजपा की नयी सरकार के गठन के लिए शपथ ग्रहण समारोह का आयोजित हो सकता है। इससे पहले भाजपा के केंद्रीय पर्यवेक्षक एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आठ मई को कोलकाता में पार्टी विधायक दल की बैठक हो सकती है, जिसमें राज्य के नये मुख्यमंत्री का चयन किया जायेगा।
सूत्रों ने बताया कि आठ मई को ही राज्य में पार्टी के नेता के नाम की घोषणा हो सकती है और नौ मई को गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की जयंती के मौके पर शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन किया जा सकता है।
भाजपा ने राज्य में विधायक दल की बैठक के लिए श्री शाह को केंद्रीय पर्यवेक्षक और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को सह पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी नौ मई को नयी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करने का संकेत दिया है।
राज्य में भाजपा ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए पहली बार सरकार बनाने जा रही है।
इसके लिए भाजपा कोलकाता में भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी कर रही है। भाजपा की नयी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन शासित राज्यों के नेताओं के शामिल होने की उम्मीद है। इसके लेकर सुरक्षा एजेंसियां भी चौकस हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। यह जीत केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन आंसुओं की है जिन्होंने सत्ता के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया। संदेशखाली की पीड़ित रेखा पात्रा, आरजी कर मेडिकल कॉलेज की मृतका की मां रत्ना देबनाथ और घरों में चौका-बर्तन करने वाली कलिता मांझी की जीत ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। इन तीनों महिलाओं ने अपनी निजी क्षमता से बेहतर प्रदर्शन किया है।
कहते हैं कि इतिहास सदैव स्याही से नहीं, कभी-कभी उन आंसुओं से भी लिखा जाता है। जो सूखने से पहले ज्वालामुखी बन जाते हैं। बंगाल की तपती माटी ने इस बार एक ऐसी ही महागाथा रची है। यह केवल सत्ता परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि उस ह्यमौनह्ण के मुखर होने की हुंकार है, जिसे व्यवस्था ने कुचलने की पुरजोर कोशिश की थी।
वैसे भारतीय समाज में कहा भी जाता है कि जब सत्ता का दंभ सातवें आसमान पर पहुंच जाए और न्याय की गुहार लगाने वालों पर लाठियां भांजी जाने लगें, तब नियति स्वयं न्याय करती है। पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने आज इसी शाश्वत सत्य पर अपनी मुहर लगा दी है। वास्तव में, यह चुनाव किसी दल या विचारधारा की विजय मात्र नहीं, बल्कि बंगाल की उन माताओं और बेटियों की जीत है, जिन्होंने अपने मताधिकार की शक्ति से खौफ के तथाकथित साम्राज्य को मटियामेट कर दिया है।
इस बंगाल चुनाव में ऐतिहासिक मोड़ की सबसे बड़ी नायिकाएं हैं रत्ना देबनाथ, रेखा पात्रा और कलिता मांझी बनकर उभरी हैं। इन तीन चेहरों ने वह कर दिखाया, जिसे बड़े-बड़े दिग्गज राजनीतिक सूरमा भी नहीं कर पाये थे। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ममता बनर्जी की पराजय की पटकथा उसी क्षण लिख दी गई थी, जब इन महिलाओं ने अपनी अस्मत और अपनों के रक्त का हिसाब मांगने का संकल्प लिया था।
इन चुनावी नतीजों ने देश में यह संदेश दे दिया है कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें आज भी गहरी हैं। यहां कोई राजा सर्वोपरि नहीं, बल्कि जनता की अदालत ही सर्वोच्च है। अपने-अपने हिस्से का असहनीय दर्द सहने के बाद, अब ये तीनों वीरांगनाएं विधायक के रूप में सदन में न्याय की नई लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। तो आइए इन नायिकाओं की कहानी समझते हैं।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा आरजी कर अस्पताल कांड की पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ की हो रही है। रत्ना ने पानीहाटी सीट से टीएमसी के कद्दावर उम्मीदवार को 28,000 से ज्यादा वोटों से शिकस्त दी है। मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, जब टीएमसी सरकार के मंत्री और पुलिस प्रशासन दोषियों को बचाने की कोशिश कर रहे थे, तब रत्ना ने सड़क पर उतरने का फैसला किया था।
उनकी यह जीत उस व्यवस्था को करारा तमाचा है, जिसने एक बेटी के इंसाफ को दबाने की कोशिश की थी। जनता ने रत्ना के आंसुओं को व्यर्थ नहीं जाने दिया और उनके पक्ष में एकतरफा मतदान कर ममता सरकार की विदाई तय कर दी।
संदेशखाली की सड़कों पर जब महिलाएं अपनी इज्जत की सुरक्षा के लिए रो रही थीं, तब सत्ता के गलियारों में सन्नाटा था। लेकिन वहां की पीड़ित रेखा पात्रा ने हिंजलगंज सीट से चुनावी मैदान में उतरकर यह साबित कर दिया कि पीड़ित महिला कमजोर नहीं होती।
रेखा ने टीएमसी प्रत्याशी को 5000 से अधिक वोटों से हराकर विधानसभा का रास्ता तय किया है। यह जीत केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि उन हजारों महिलाओं की आवाज है जिनके साथ सालों तक ज्यादती हुई। रेखा की इस जीत ने टीएमसी के गुंडागर्दी वाले मॉडल की कमर तोड़कर रख दी है।
लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत तस्वीर औसग्राम सीट से सामने आयी है, जहां चार घरों में झाड़ू-पोछा करने वाली कलिता मांझी ने टीएमसी के दिग्गज को 12,000 वोटों से पटखनी दे दी। कलिता को बीजेपी का समर्थन करने के कारण टीएमसी कार्यकर्ताओं ने बार-बार प्रताड़ित किया और अपमानित किया था।
लेकिन एक गरीब मां की हिम्मत नहीं टूटी। कलिता की जीत यह बताती है कि बंगाल के गरीब तबके ने अब डरना छोड़ दिया है। एक मेड से लेकर विधायक बनने तक का उनका यह सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बनेगा कि मेहनत और सच्चाई के आगे सत्ता भी झुकती है।
बीजेपी के लिए ये तीनों महिलाएं ब्रह्मास्त्र साबित हुईं। राजनीति के पंडितों का मानना है कि पार्टी ने इन चेहरों को आगे करके सीधे जनता के दिलों को छुआ। इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, चुनावी प्रचार के दौरान जब भी ये महिलाएं मंच पर आती थीं, तो जनता की आंखों में गुस्सा और सहानुभूति साफ देखी जा सकती थी।
रत्ना देबनाथ के एक-एक शब्द ने ममता बनर्जी के महिला कार्ड को फेल कर दिया। बीजेपी ने यह साबित कर दिया कि बंगाल की राजनीति अब केवल हिंसा से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और न्याय के आधार पर चलेगी।
आज जो लोग भारत में लोकतंत्र के खत्म होने का रोना रोते हैं, उन्हें बंगाल के इन नतीजों को करीब से देखना चाहिए। चुनाव के मैदान में जब एक आम नागरिक सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति को धूल चटा देता है, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र फल-फूल रहा है।
जो लोग आज भी हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे, वे शायद उन चाटुकारों की श्रेणी में हैं जो जनता की नब्ज नहीं पहचान पाए। बंगाल ने बता दिया है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अगर वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है, तो उसे कुर्सी छोड़नी ही होगी।
टीएमसी की इस हार का सबसे बड़ा कारण उनका वह कैडर रहा, जिसने गांव-गांव में लोगों को डराना अपना पेशा बना लिया था। कलिता मांझी जैसी महिला को परेशान करना टीएमसी को भारी पड़ गया। जब जनता ने देखा कि उन्हीं के बीच की एक महिला को बीजेपी के झंडे के कारण सताया जा रहा है, तो लोगों ने चुपचाप ईवीएम पर चोट की।
संदेशखाली से शुरू हुई वह आग देखते ही देखते पूरे बंगाल में फैल गई और ममता बनर्जी के शासन को जलाकर राख कर दिया। यह चुनाव शांतिपूर्ण नहीं था, लेकिन जनता का इरादा पत्थर की तरह मजबूत था।
ममता बनर्जी की हार और भाजा की इस बंपर जीत के बाद अब जिम्मेदारी काफी बढ़ गयी है। रत्ना, रेखा और कलिता जैसे चेहरों ने जिस भरोसे के साथ लोगों का वोट लिया है, उसे पूरा करना एक बड़ी चुनौती होगी।
बंगाल की जनता ने भ्रष्टाचार और हिंसा के खिलाफ जनादेश दिया है। अब देखना यह है कि नई सरकार इन महिलाओं के सम्मान और प्रदेश की सुरक्षा को लेकर क्या कदम उठाती है। फिलहाल, बंगाल की हवाओं में न्याय की खुशबू है और यह जीत उन करोड़ों लोगों की है जिन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना नहीं छोड़ा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पश्चिम बंगाल चुनाव में TMC की हार के बाद आज सीएम ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेस की। इस दौरान ममता ने EC पर तीखा प्रहार करते हुए चुनाव परिणामों को जनादेश की लूट करार देते हुए जीत की नैतिकता पर सवाल उठाए।
इसी के साथ ममता ने इसे एक सोची- समझी साजिश बताते हुए कहा कि मतदाताओं की सूची से करीब 90 लाख वोट हटाए गए। साथ ही यह भी दावा किया कि BJP ने लोकतांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि 100 से अधिक सीटों की लूट करके यह जीत हासिल की है।
इसी के साथ ममता ने पीएम मोदी और अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि केंद्रीय मशीनरी और हर संभव हथकंडे अपनाकर उन्हें हराया गया है।ममता ने कहा है कि वे इस लड़ाई में अकेली नहीं हैं। विपक्ष उनके साथ एकजुट है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होती हुई नजर आ रही है। ऐसी उम्मीद जतायी जा रही है कि बीजेपी के सत्ता संभालते ही राज्य में केंद्र सरकार की कई रुकी हुई योजनाएं होंगी। बीजेपी ने अपने घोषणापत्र (संकल्प पत्र) में वादा किया था कि अगर राज्य में उनकी सरकार बनती है तो वे ममता सरकार द्वारा रोकी गई जनकल्याणकारी योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर घर-घर पहुंचायेंगे। आइये जानते हैं कि अगर बीजेपी राज्य की सत्ता संभालती है तो कौन सी योजनाएं लागू होंगी-
एबीएन सेंट्रल डेस्क। आम आदमी को एक बार फिर मंहगाई की मार झेलनी पड़ सकती है। सरकारी सूत्रों के अनुसार जल्द ही पेट्रोल-डीजलों की कीमतें बढ़ने की संभावना है। पिछले चार वर्षों से स्थिर बनी हुई ईंधन कीमतें अब उपभोक्ताओं के बजट पर असर डाल सकती हैं।
प्राइवेट तेल कंपनियों का कहना है कि उन्हें लगातार घाटा झेलना पड़ रहा है। कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 20 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 100 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। कच्चे तेल की औसत कीमत, जो पिछले वर्ष 70 डॉलर प्रति बैरल थी, अब 114 डॉलर के पार पहुंच चुकी है।
न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार मिडिल ईस्ट जंग के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय तेल की करीब 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो पिछले चार वर्षों का उच्चतम स्तर है। अब पुरी दुनिया की स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर टिकी हैं।
एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि बुद्ध पूर्णिमा जिसे वैशाख पूर्णिमा भी कहा जाता है, हिंदू और बौद्ध धर्म का अत्यंत पवित्र एवं प्रेरणादायक पर्व है। इस वर्ष बुद्ध पूर्णिमा 1 मई दिन शुक्रवार को मनायी जायेगी। यह पर्व वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को आता है और मानवता, शांति, करुणा तथा ज्ञान का संदेश देता है।
भारत सहित नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड, जापान, चीन और अनेक देशों में यह पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा मुख्य रूप से भगवान गौतम बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ी मानी जाती है-उनका जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण। मान्यता है कि इन तीनों घटनाओं का संबंध वैशाख पूर्णिमा से है, इसलिए यह दिन विशेष पावन माना जाता है।
भगवान बुद्ध का जन्म लुंबिनी (नेपाल) में राजा शुद्धोधन और माता महामाया के घर हुआ था। उनका बाल्यकाल नाम सिद्धार्थ गौतम था।राजमहल में सुख-सुविधाओं के बीच पले सिद्धार्थ ने जब संसार में दुख, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु देखी, तो उनके मन में जीवन के सत्य को जानने की जिज्ञासा जागी। उन्होंने राजपाट त्यागकर कठोर तपस्या और ध्यान किया।
बाद में बिहार के बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए, जिसका अर्थ है-जागृत पुरुष।बुद्ध पूर्णिमा की महत्ता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय भी है। भगवान बुद्ध ने संसार को सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम, करुणा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। उनका उपदेश था कि मनुष्य अपने कर्मों से महान बनता है, जन्म से नहीं।
आज के तनावपूर्ण और हिंसक वातावरण में बुद्ध के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। इस दिन बौद्ध विहारों, मंदिरों और घरों में भगवान बुद्ध की प्रतिमा का पूजन किया जाता है। दीप जलाए जाते हैं, धम्मपद और त्रिपिटक का पाठ होता है, ध्यान लगाया जाता है तथा शांति प्रार्थनाएं की जाती हैं। लोग गरीबों को भोजन, वस्त्र और दान देकर पुण्य कमाते हैं।
कई स्थानों पर शोभायात्राएं, प्रवचन और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। हिंदू मान्यता में भी वैशाख पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन स्नान, दान, जप, तप और व्रत करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गंगा स्नान, पीपल पूजा और सत्संग का भी विशेष फल माना गया है। बुद्ध पूर्णिमा का उद्देश्य मानव जीवन को सही दिशा देना है।
यह पर्व सिखाता है कि क्रोध का उत्तर प्रेम से, घृणा का उत्तर करुणा से और अज्ञान का उत्तर ज्ञान से दिया जा सकता है।भगवान बुद्ध का संदेश है-अप्प दीपो भव अर्थात् स्वयं अपने दीपक बनो,आज जब संसार अशांति, तनाव और संघर्ष से जूझ रहा है, तब बुद्ध पूर्णिमा हमें आत्मचिंतन, संयम और सद्भाव का मार्ग दिखाती है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि मानवता के उत्थान का संदेश देने वाला प्रेरणा पर्व है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आॅपरेशन सिंदूर को आतंकवाद के खिलाफ भारत के दृढ़ संकल्प का प्रतीक बताते हुए आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद जैसी बुराइयों.से निपटने के लिए आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों को समाप्त करने और किसी भी राजनीतिक अपवाद को अस्वीकार करते हुए एकजुट मोर्चा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
श्री सिंह ने मंगलवार को किर्गिजस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के रक्षा मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि आॅपरेशन सिंदूर भारत के उस दृढ़ संकल्प का प्रतीक है कि आतंकवाद के गढ़ अब न्यायोचित दंड से अछूते नहीं रहेंगे।
उन्होंने आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद जैसी बुराइयों से निपटने के लिए सुरक्षित ठिकानों को समाप्त करने और किसी भी राजनीतिक अपवाद को अस्वीकार करते हुए एकजुट मोर्चा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि देश द्वारा प्रायोजित सीमा-पार आतंकवाद, जो किसी राष्ट्र की संप्रभुता पर हमला करता है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि दोहरे मापदंडों के लिए कोई स्थान नहीं है।
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