एबीएन सेंट्रल डेस्क (लखनऊ)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश आज देश में इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित विकास का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। कभी पिछड़ेपन और विकास की धीमी रफ्तार के लिए पहचाने जाने वाला यूपी आज एक्सप्रेसवे स्टेट के रूप में नयी पहचान बना चुका है। गत 09 वर्षों में यूपी में एक्सप्रेस-वे नेटवर्क 1900 किलोमीटर से अधिक हो गया है।
यह आर्थिक बदलाव की नई कहानी को दर्शा रहा है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे और निर्माणाधीन गंगा एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स ने प्रदेश की तस्वीर बदल दी है। गाजीपुर से दिल्ली तक का सफर अब लगभग 10 घंटे में सिमट गया है। मेरठ से प्रयागराज तक गंगा एक्सप्रेसवे ने यात्रा समय को लगभग आधा कर दिया है।
योगी सरकार ने खुद को केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एक्सप्रेसवे के साथ औद्योगिक विकास का मजबूत मॉडल तैयार किया है। सरकार सिक्योरिटी, स्टेबिलिटी और स्पीड के ट्रिपल-एस मॉडल के तहत एक्सप्रेसवे के किनारे विभिन्न औद्योगिक पार्क और क्लस्टर विकसित कर रही है।
जो आने वाले समय में प्रदेश में औद्योगिक विकास की नयी इबारत लिखेंगे, जिससे लाखों नये रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे आज डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की रीढ़ बन चुका है। झांसी और चित्रकूट जैसे क्षेत्रों में रक्षा उत्पादन इकाइयों की स्थापना से रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। वहीं वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट योजना को भी इन एक्सप्रेसवे का बड़ा लाभ मिला है। कन्नौज का इत्र, कानपुर का चर्म उद्योग और पूर्वांचल के हस्तशिल्प अब तेज परिवहन व्यवस्था के जरिए राष्ट्रीय और वैश्विक बाजारों तक आसानी से पहुंच रहे हैं।
राज्य सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि योगी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह मानी जा रही है कि एक्सप्रेसवे का लाभ केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा। संपर्क मार्गों और ग्रामीण सड़कों के जरिए छोटे कस्बों और गांवों को भी इससे जोड़ा गया है।
किसान अब अपने कृषि और दुग्ध उत्पाद कम समय में शहरों तक पहुंचा पा रहे हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो रही है। प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद करीब 36 लाख करोड़ रुपये हो गया है। लगभग 50 लाख करोड़ रुपये के संभावित निवेश प्रस्ताव यूपी को देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करने की दिशा में मजबूत आधार तैयार कर रहे हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अभी तक आपने ट्रक, एंबुलेंस और लग्जरी गाड़ियों में छिपाकर शराब की तस्करी करने की खबरें देखीं, पढ़ीं और सुनी होंगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक्सप्रेस ट्रेनों के एसी कोच में भी सीक्रेट बंकर बनाकर शराब बिहार तक पहुंचाई जा रही है? ऐसे ही एक शातिर नेटवर्क की खेप को धनबाद आरपीएफ ने रंगे हाथों पकड़ा है, जिसे गंगा-दामोदर एक्सप्रेस ट्रेन के एसी कोच में बाथरूम की छत के भीतर छिपाया गया था।
शुक्रवार को गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए जब आरपीएफ की टीम ने एसी बोगी में चढ़कर बाथरूम की छत को खोला तो उसमें से बीयर कैन की एक-दो नहीं, बल्कि तीन पेटियां बरामद हुईं, जिसे तुरंत जब्त कर लिया गया। तस्करी का यह तरीका अधिकारियों को भी हैरान कर रहा था।
इस जब्ती के बाद आरपीएफ ने रेलवे चार्ट, यात्रा रिकॉर्ड और स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज खंगालने शुरू किए, जिसमें महत्वपूर्ण जानकारी सामने आयी। पता चला कि इस तस्करी के पीछे तीन राज्यों का एक मजबूत सिंडिकेट सक्रिय है। शराब की ये खेपें पश्चिम बंगाल के कुल्टी व सीतारामपुर, उत्तर प्रदेश के बलिया व बनारस और झारखंड के धनबाद व हजारीबाग से ट्रेनों में लोड की जाती हैं, जो बाद में बिहार तक पहुंचती हैं।
आरपीएफ ने बताया कि इनके स्थानीय एजेंटों का नेटवर्क इतना मजबूत है कि उन्हें रेलवे की चेकिंग टाइमिंग और रूट्स की सटीक जानकारी होती है, जिससे वे आम दिनों में बच निकलते हैं। फिलहाल, धनबाद आरपीएफ ने बरामद शराब को जब्त कर मामला दर्ज कर लिया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देशभर में महंगाई ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बीते 48 घंटों में सोना-चांदी, दूध, पेट्रोल-डीजल और सीएनजी जैसी जरूरी चीजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जिससे जनता पर महंगाई का चौतरफा अटैक देखने को मिल रहा है।
सबसे पहले सरकार द्वारा सोने-चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाए जाने के बाद इनके दामों में तेज उछाल आया। बाजार में सोना करीब 11,000 रुपए और चांदी 22,000 रुपए तक महंगी हो गई। इससे ज्वेलरी खरीदने वालों को बड़ा झटका लगा।
इसके बाद दूध कंपनियों ने भी कीमतों में इजाफा कर दिया। अमूल और मदर डेयरी ने पैकेज्ड दूध के दाम 2 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ा दिए हैं। नई दरें 14 मई से लागू हो चुकी हैं।
इसी बीच तेल कंपनियों ने भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी कर दी।
नई कीमतें 15 मई से लागू हुई हैं। बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल 97.77 रुपए प्रति लीटर और डीजल 90.67 रुपए प्रति लीटर पहुंच गया है। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई समेत अन्य बड़े शहरों में भी ईंधन की कीमतों में इजाफा हुआ है।
महंगाई का असर सीएनजी पर भी पड़ा है। दिल्ली और मुंबई में सीएनजी की कीमतें 2 रुपए प्रति किलो तक बढ़ा दी गई हैं। दिल्ली में अब सीएनजी 79.09 रुपए प्रति किलो, जबकि मुंबई में 84 रुपए प्रति किलो के भाव पर बिक रही है।
लगातार बढ़ती कीमतों ने आम आदमी के घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा दिया है और आने वाले दिनों में महंगाई को लेकर चिंता और गहरा सकती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पश्चिम एशिया संकट के बीच पीएम मोदी की यूएई यात्रा ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है। 5 अरब डॉलर के निवेश और नये तेल समझौतों के साथ भारत ने न सिर्फ अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है, बल्कि भविष्य के लिए ईंधन की निर्बाध आपूर्ति भी सुनिश्चित की है।
दुनिया भर में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यात्रा भारत के लिए बहुत राहत भरी साबित हुई है।
आपको बता दें कि अपनी पांच देशों की यात्रा के दौरान अबू धाबी पहुंचे पीएम मोदी का भव्य स्वागत किया गया। इस दौरे का सबसे बड़ा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच तेल और निवेश को लेकर कई बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं।
पीएम मोदी और यूएई के राष्ट्रपति के बीच हुई बातचीत में भारत की तेल जरूरतों को पूरा करने पर खास जोर दिया गया। दोनों देशों ने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (एसपीआर) और एलपीजी की सप्लाई को लेकर एक बड़ा समझौता किया है।
इसके अलावा भारत की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए एक डिफेंस पार्टनरशिप फ्रेमवर्क भी तैयार किया गया है। समुद्री व्यापार को बढ़ावा देने के लिए वाडीनार में एक शिप रिपेयर क्लस्टर बनाने पर भी सहमति बनी है, जिससे जहाजों की मरम्मत भारत में ही हो सकेगी।
इस यात्रा की एक और बड़ी उपलब्धि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और बैंकिंग सेक्टर में होने वाला निवेश है। यूएई ने भारतीय प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ आरबीएल बैंक और सम्मान कैपिटल में 5 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की है।
ये भारी राशि भारत के विकास कार्यों को तेजी देगी। साथ ही इसी साल जनवरी में हुआ 3 अरब डॉलर का एलपीजी सौदा भी भारत की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल विदेशों से मंगवाता है। तेल मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भरोसा दिलाया है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है। उन्होंने बताया कि घरेलू एलपीजी उत्पादन को बढ़ाकर 54,000 टन प्रतिदिन कर दिया गया है।
वर्तमान में भारत के पास 69 दिनों का कच्चा तेल और 45 दिनों का एलपीजी स्टॉक मौजूद है। पीएम मोदी ने जनता से भी अपील की है कि वे संकट के इस समय में गैर-जरूरी खर्चों से बचें और ईंधन का उपयोग समझदारी से करें।
एबीएन सोशल डेस्क। सरकार, प्रशासन व नागरिक समाज संगठनों की छापे की एक साझा कार्रवाई में ट्रैफिकिंग के जरिये लाये गये और सूरत की एक कपड़ा फैक्टरी में मामूली पैसों पर खटाये जा रहे 91 बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया। मुक्त कराये गये इन बच्चों की उम्र सात से 14 के बीच है।
हालांकि भनक लगते ही सभी ट्रैफिकर और फैक्टरी मालिक मौके से फरार हो गये। मुक्त कराये गये बच्चों में से ज्यादातर राजस्थान के जनजातीय इलाकों के हैं जबकि तीन उत्तर प्रदेश के और एक-एक बच्चे झारखंड व बिहार के हैं। इन सभी को बाल कल्याण समिति, सूरत के समक्ष पेश किया गया और कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
गायत्री सेवा संस्थान (जीएसएस) की छानबीन के आधार पर हुई छापे की इस कार्रवाई में जीएसएस सहित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर), एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, राजस्थान के 22 पुलिस अफसरों, सूरत के पूना थाने के अफसरों के साथ नागरिक समाज संगठन एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन (एवीए) भी शामिल था। एवीए और जीएसएस देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के काम कर रहे 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी हैं।
गायत्री सेवा संस्थान महीने भर से सूरत की इस कपड़ा फैक्टरी की निगरानी कर रहा था और छानबीन में यहां बड़ी संख्या में बाल मजदूरों की मौजूदगी की पुष्टि के बाद उसने एनसीपीसीआर को इसकी जानकारी दी। मुक्त कराए बच्चों ने फिर पुलिस को सुराग दिए और उन्हें उन जगहों का पता बताया जहां बाल मजदूरी करायी जा रही थी।
गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने बताया, ह्लबच्चे हमें एक इमारत के पास ले गये जो बाहर से बंद थी। लेकिन उन्होंने बताया कि अंदर बच्चे काम कर रहे हैं। हम जब अंदर गये तो पाया कि वहां सात साल तक के बच्चों से काम कराया जा रहा था। सभी बच्चे घबराए हुए और बदहवासी की हालत में थे और 12 घंटे की शिफ्ट में काम करने के बाद थके हुए थे।
डॉ. पंड्या ने बताया कि अंदर जाने के बाद वे बच्चों की बदहाली देखकर दंग रह गये। आठ साल के एक बच्चे के पास पहनने को शर्ट तक नहीं थी। वह दूसरे बच्चों के पीछे छिप गया और उनसे पूछ रहा था कि क्या कोई थोड़ी देर के लिए अपनी शर्ट उसे दे सकता है। उन्होंने पुलिस की तारीफ करते हुए कहा कि पुलिस और सभी हितधारकों की त्वरित कार्रवाई और मामले को गंभीरता से लेने के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को मुक्त करा पाना संभव हो पाया।
प्रारंभिक जांच से पता चला है कि इन बाल दुव्यार्पारियों और फैक्टरी मालिकों ने संदेह से बचने के लिए तमाम तरीके अपना रखे थे। छोटे बच्चों को बिल्कुल सुबह यहां लाया जाता था और फिर इमारत के दरवाजे बाहर से बंद कर दिये जाते थे। शाम को सात बजे काम की शिफ्ट खत्म हो जाने के बाद ही दरवाजे खोले जाते थे।
इन सभी बच्चों को आस-पास की कालोनियों में बहुत ही दयनीय और अमानवीय हालत में रखा जाता था। एक छोटे से कमरे में 10 से 12 बच्चे रहते थे जहां बुनियादी सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। पूछताछ के दौरान कुछ बच्चों ने बताया कि उनके माता-पिता को पता था कि उन्हें मजदूरी के लिए यहां लाया गया है।
उधर, ज्यादातर छोटे बच्चों ने बताया कि उन्हें घुमाने के नाम पर यहां लाया गया था और उन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि यहां उनसे मजदूरी करायी जायेगी। यह भी पता चला कि कुछ बच्चे इन कपड़ा इकाइयों में तीन-चार साल से काम कर रहे थे जबकि बाकियों को हाल ही में यहां लाया गया था। मुक्त कराये गये बच्चों में आठ और दस साल के दो भाई भी थे जिन्हें राजस्थान के उदयपुर जिले से लाया गया था।
ट्रैफिकिंग गिरोहों और बाल मजदूरी के तार मजबूती से जुड़े होने को रेखांकित करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, इस छापे से यह तथ्य स्थापित हो जाता है कि ट्रैफिकिंग गिरोह कितने संगठित हैं और उनकी जड़ें कितनी गहरी हैं। खास तौर से जनजातीय इलाकों और संवेदनशील परिवारों के बच्चों को झूठे वादों के जाल में फंसा कर ऐसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेल दिया जाता है जहां वे बाहरी दुनिया से कट जाते हैं और अपना बचपन खो बैठते हैं।
यह मामला एक बार फिर अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत बनाने, बाल मजदूरी की मांग व आपूर्ति पर नजर बनाये रखने, बच्चों का शोषण करने वाले नियोक्ताओं और शोषण में शामिल सभी बिचौलियों की धरपकड़ और उनकी जवाबदेही तय करने की तत्काल जरूरत को साबित करता है। इस खबर से संबंधित और अधिक जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क करें।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनावों का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। ज्यूरिख में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और स्विस नेशनल बैंक की ओर से आयोजित 12वें उच्च-स्तरीय सम्मेलन में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने एक अहम बयान दिया है।
उन्होंने स्पष्ट किया है कि पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जो भारी उछाल आया है, उसका बोझ अब तक सरकार उठा रही है। लेकिन, अगर यह वैश्विक व्यवधान लंबे समय तक खिंचता है, तो आम उपभोक्ताओं को ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि के बावजूद, भारत सरकार ने अब तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखा है। इसके लिए सरकार ने अपनी तरफ से ड्यूटी कम करने और गैस जैसी कुछ नियंत्रित कीमतों में मामूली वृद्धि करने जैसे कदम उठाए हैं।
आरबीआई गवर्नर के अनुसार, पिछले 75 दिनों से अधिक समय से जारी इस संकट के कारण मौजूदा स्थिति को अनिश्चित काल तक बनाए रखना संभव नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह केवल समय की बात है कि सरकार इन बढ़ी हुई कीमतों का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल देगी।
हालांकि, उन्होंने इस बात की भी सराहना की कि महामारी के दौरान 9.2 प्रतिशत तक पहुंच चुके राजकोषीय घाटे को सरकार ने राजकोषीय विवेक का पालन करते हुए करीब 4.3 प्रतिशत तक सफलतापूर्वक कम कर लिया है।
पश्चिम एशिया का क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। आरबीआई गवर्नर ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत के कुल आयात और निर्यात का छठा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है।
इसके अलावा, भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रकम) का 40 प्रतिशत, उर्वरक आयात का 40 प्रतिशत और गैस आपूर्ति का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर है।
इस उच्च निर्भरता के कारण, मध्य पूर्व में किसी भी तरह का तनाव या भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत की आपूर्ति श्रृंखला और अर्थव्यवस्था के लिए सीधे तौर पर एक बड़ा जोखिम पैदा करती है।
आपूर्ति शृंखला में आने वाले इन झटकों का सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ता है। भारत के लिए यह जोखिम इसलिए भी अधिक है क्योंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) बास्केट में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 40 प्रतिशत है। गवर्नर ने यह स्वीकार किया कि आपूर्ति पक्ष के बड़े झटकों से निपटने के लिए केवल मौद्रिक नीति पर्याप्त नहीं हो सकती है।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नीति निर्माताओं को मजबूत और सतर्क रवैया अपनाना चाहिए। यदि आपूर्ति में व्यवधान का असर अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में फैलने लगता है और महंगाई व्यापक रूप लेने लगती है, तो नीति निर्माताओं को अनिवार्य रूप से हस्तक्षेप करना होगा।
आरबीआई गवर्नर का यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक संकटों से भारत पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। सरकार ने अब तक आम जनता को महंगाई की सीधी मार से बचाने का प्रयास किया है।
लेकिन पश्चिम एशिया की अनिश्चितता लंबी खिंचने पर घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में वृद्धि एक अपरिहार्य कदम बन सकता है। ऐसे जटिल माहौल में, आरबीआई को घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार अपनी मौद्रिक नीति को बेहद लचीला और चुस्त बनाए रखने की आवश्यकता होगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनावों का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। ज्यूरिख में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और स्विस नेशनल बैंक की ओर से आयोजित 12वें उच्च-स्तरीय सम्मेलन में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने एक अहम बयान दिया है।
उन्होंने स्पष्ट किया है कि पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जो भारी उछाल आया है, उसका बोझ अब तक सरकार उठा रही है। लेकिन, अगर यह वैश्विक व्यवधान लंबे समय तक खिंचता है, तो आम उपभोक्ताओं को ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि के बावजूद, भारत सरकार ने अब तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखा है। इसके लिए सरकार ने अपनी तरफ से ड्यूटी कम करने और गैस जैसी कुछ नियंत्रित कीमतों में मामूली वृद्धि करने जैसे कदम उठाए हैं।
आरबीआई गवर्नर के अनुसार, पिछले 75 दिनों से अधिक समय से जारी इस संकट के कारण मौजूदा स्थिति को अनिश्चित काल तक बनाए रखना संभव नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह केवल समय की बात है कि सरकार इन बढ़ी हुई कीमतों का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल देगी।
हालांकि, उन्होंने इस बात की भी सराहना की कि महामारी के दौरान 9.2 प्रतिशत तक पहुंच चुके राजकोषीय घाटे को सरकार ने राजकोषीय विवेक का पालन करते हुए करीब 4.3 प्रतिशत तक सफलतापूर्वक कम कर लिया है।
पश्चिम एशिया का क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। आरबीआई गवर्नर ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत के कुल आयात और निर्यात का छठा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है।
इसके अलावा, भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रकम) का 40 प्रतिशत, उर्वरक आयात का 40 प्रतिशत और गैस आपूर्ति का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर है।
इस उच्च निर्भरता के कारण, मध्य पूर्व में किसी भी तरह का तनाव या भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत की आपूर्ति श्रृंखला और अर्थव्यवस्था के लिए सीधे तौर पर एक बड़ा जोखिम पैदा करती है।
आपूर्ति शृंखला में आने वाले इन झटकों का सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ता है। भारत के लिए यह जोखिम इसलिए भी अधिक है क्योंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) बास्केट में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 40 प्रतिशत है। गवर्नर ने यह स्वीकार किया कि आपूर्ति पक्ष के बड़े झटकों से निपटने के लिए केवल मौद्रिक नीति पर्याप्त नहीं हो सकती है।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नीति निर्माताओं को मजबूत और सतर्क रवैया अपनाना चाहिए। यदि आपूर्ति में व्यवधान का असर अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में फैलने लगता है और महंगाई व्यापक रूप लेने लगती है, तो नीति निर्माताओं को अनिवार्य रूप से हस्तक्षेप करना होगा।
आरबीआई गवर्नर का यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक संकटों से भारत पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। सरकार ने अब तक आम जनता को महंगाई की सीधी मार से बचाने का प्रयास किया है।
लेकिन पश्चिम एशिया की अनिश्चितता लंबी खिंचने पर घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में वृद्धि एक अपरिहार्य कदम बन सकता है। ऐसे जटिल माहौल में, आरबीआई को घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार अपनी मौद्रिक नीति को बेहद लचीला और चुस्त बनाए रखने की आवश्यकता होगी।
एबीएन बिजनेस डेस्क। भारत में आम आदमी को महंगाई के मोर्चे पर हल्का झटका लगा है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल महीने में खुदरा महंगाई दर में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गयी है और यह बढ़कर 3.48 प्रतिशत पर पहुंच गयी है। इससे पिछले महीने यानी मार्च में यह आंकड़ा 3.4 प्रतिशत पर था।
इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह खाने-पीने की चीजों, विशेषकर रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों की कीमतों में आया उछाल है। हालांकि, अर्थव्यवस्था के लिए राहत की बात यह है कि समग्र महंगाई दर अब भी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के चार प्रतिशत के लक्ष्य के काफी नीचे है।
अर्थव्यवस्था के इन आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि लोगों के रसोई का बजट मुख्य रूप से बिगड़ा है। खाद्य महंगाई दर मार्च के 3.87 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल में 4.20 प्रतिशत पर पहुंच गयी है। इसमें ग्रामीण इलाकों की खाद्य महंगाई दर शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ी है।
महंगाई का असर केवल राशन तक सीमित नहीं है। अप्रैल महीने में सबसे ज्यादा महंगाई पर्सनल केयर और विविध वस्तुओं की श्रेणी में देखी गयी, जिसने 17.66 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज की। इसके विपरीत, ईंधन से जुड़ी कीमतों में नरमी के कारण ट्रांसपोर्ट से जुड़ी महंगाई दर -0.01 प्रतिशत पर लगभग सपाट रही, जिससे माल ढुलाई और यात्रा लागत में कोई विशेष बढ़ोतरी नहीं हुई।
महंगाई दर में मामूली वृद्धि हुई है, फिर भी सरकार और आरबीआई के लिए स्थिति नियंत्रण में है। भारत ने 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक के पांच वर्षों के लिए अपनी खुदरा महंगाई दर का लक्ष्य 4 प्रतिशत (2% से 6% के दायरे में) पर बरकरार रखा है।
एक सर्वे में खुदरा महंगाई के 3.8 प्रतिशत तक जाने का अनुमान जताया गया था, ऐसे में मौजूदा 3.48 प्रतिशत का आंकड़ा अनुमानों से काफी बेहतर है। हालांकि, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण भविष्य में ऊर्जा और खाद्य लागत बढ़ने का जो जोखिम पैदा हुआ है, उस पर आगामी मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक की पैनी नजर रहेगी।
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