वन और पर्यावरण

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Published / 2022-02-21 15:13:13
2022 में कैसा रहेगा मॉनसून, कितनी होगी बारिश...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। इस साल मॉनसून कैसा रहने वाला है? मॉनसून में इस बार कितनी बारिश होगी? खरीफ की फसलों के लिए मॉनसून ठीक रहेगा या नहीं? मौसम विशेषज्ञों ने मॉनसून 2022 का पूवार्नुमान लगाते हुए इन सब सवालों पर जानकारी दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस साल मॉनसून सामान्य रहने के संकेत कर रहा है। विशेषज्ञों ने संभावना जताई है कि शुरूआती मॉनसून अच्छा रहेगा, जिसमें अच्छी बारिश देखने को मिलेगी। किसानों को इससे फायदा पहुंचेगा। उनकी फसलों के लिए यह बारिश बेहद उपयोगी होगी। मौसम पूवार्नुमान एजेंसी स्काईमेट ने दी जानकारी : निजी मौसम पूवार्नुमान एजेंसी स्काईमेट (रह्य८ेी३) ने साल 2022 के लिए प्रारंभिक मॉनसून पूवार्नुमान मार्गदर्शन को जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि इस साल मॉनसून सामान्य रहेगा। एजेंसी के वॉइस प्रेसीडेंस और मौसम वैज्ञानिक डॉ. पालावत ने एक न्यूज वेबसाइट से कहा कि जलवायु पैटर्न ला नीना नीनो धीरे-धीरे कम हो रहा है और तटस्थ स्थिति में जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि इसका असर मॉनसून पर नेगेटिव नहीं पड़ेगा। पिछले दो मॉनसून अच्छे रहे हैं। उन्होंने बताया कि मॉनसून की शुरूआत में हमें अच्छी बारिश देखने को मिलेगी, हालांकि अगस्त और सितंबर मध्य में कम बारिश देखने को मिल सकती है, लेकिन कुछ मिलाकर मॉनसून सामान्य रहने की संभावना है। मॉनसून को लेकर किसानों के चेहरे में नहीं होगी मायूसी : उन्होंने कहा कि अगर बारिश की शुरूआत समय पर होती है तो यह मॉनसून किसानों और उनकी फसलों के लिए अनुकूल हो सकता है। शुरूआती मॉनसून बेहतर ही रहेगा। ला नीना कमजोर ही रहेगा और फसलों को लेकर किसानों के लिए मायूसी नहीं रहेगी। वह कहते हैं कि स्काईमेट अप्रैल महीने में मॉनसून 2022 की संभावनाओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा। मौसम वैज्ञानिक ने कहा, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान की नकारात्मक स्थितियां कमजोर हो रही हैं। प्रशांत महासागर की यह स्थितियां, खराब मॉनसून की संभावना नहीं बनाती हैं लेकिन तटस्थ सीमाओं के भीतर सामान्य या अधिक वर्षा का कारण नहीं बन सकती है।

Published / 2022-02-04 15:05:52
फल-सब्जियों की खेती कर आय बढ़ा सकते हैं किसान : कृषि वैज्ञानिक

मेदिनीनगर। आजादी के अमृत महोत्सव के तहत कृषि सहकारिता, किसान कल्याण विभाग एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से पाटन प्रखंड के सतउआ गांव में किसान गोष्ठी सह प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया। गोष्ठी की शुरूआत कृषि अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिक प्रमोद कुमार ने की। मौके पर श्री कुमार ने कहा कि पाटन की ज्यादातर भूमि बलुई-दोमट है। यहां अन्य प्रखंडों की तुलना में सिंचाई के लिए आसानी से जल भी उपलब्ध है। यहां के कृषक फल एवं सब्जियों की खेती कर अपनी आय पांच से छह गुणा बढ़ा सकते हैं। किसान गोष्ठी के बाद सभी कृषकों को आत्मा पलामू के द्वारा कृषक के खेतों में लगे चना की फसल का भ्रमण कराया गया। साथ ही उन्हें इसकी खेती की विस्तार पूवर्क जानकारी दी गयी। प्रखंड कृषि पदाधिकारी असफाक अहमद ने जिला में कृषि विभाग की ओर से किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी देते हुए इसका लाभ लेने की बातें कही। पाटन प्रखंड के एटीएम विनय कुमार ने कृषकों की आय बढ़ाने तथा प्रखंड क्षेत्र में स्वीट कॉर्न का प्रत्यक्षण कराने की बातें कही। मौके पर किसान मित्र अजय मेहता, सहित अनिरूद्ध महतो, प्रमोद सिंह, संतोष तिवारी, रामजन्म सिंह, प्रखंड कृषक सलाहकार समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र साहु, जैवित पाण्डेय, मुरारी पाण्डेय, अजय पाण्डेय, अशोक पाण्डेय, बच्चु यादव, देवन्द्र प्रसाद के अलावा गांव के अन्य कृषक उपस्थित थे।

Published / 2022-02-04 10:53:00
सीएम हेमन्त ने शुरू की राज्य के धरोहर बचाने की तैयारी

टीम एबीएन, रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में झारखंड राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक हुई। यह बोर्ड की 14वीं बैठक थी। जिसमें मुख्यमंत्री ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ समीक्षा करते हुए कई महत्त्वपूर्ण दिशा निर्देश दिए। बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों के साथ कुल 9 एजेंडों पर चर्चा की। जिसमें 5 एजेंडे स्वीकार किए गए। स्वीकृत किये गये एजेंडो में साहिबगंज के फॉसिल पार्क को बेहतर बनाना, हाथी कॉरिडोर पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई। बैठक में चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि साहिबगंज में पाए जाने वाले फॉसिल पदार्थ को संरक्षित करें क्योंकि फॉसिल सिर्फ पत्थर नहीं इतिहास के पन्ने हैं। इसका सम्मान करें। वहीं मुख्यमंत्री ने वन्यजीव को सुरक्षित रखने के लिए भी अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि वन विभाग हाथी कॉरिडोर पर विशेष ध्यान दें। हाथियों के कॉरिडोर से गुजरने वाली सड़कों के किनारे दीवार या लोहे का ऊंचा बैरियर लगा दिया जाता है। जिस वजह से हाथियों को आवागमन में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके लिए अंडरपास का निर्माण बेहतर ढंग से करवाया जाए ताकि वन क्षेत्र में हाथी आजादी से विचरण कर सकें। वहीं वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सड़क निर्माण में भी बदलाव लाने का दिशा-निर्देश मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वन विभाग के अधिकारियों को दिया। ताकि जंगल के बगल से गुजरने वाले नेशनल हाईवे या स्टेट हाईवे पर चलने वाले वाहनों से वन्यजीवों को परेशानी ना हो। इस बैठक में मुख्य सचिव सुखदेव सिंह, अपर मुख्य सचिवएल खियांगते, डीजीपी नीरज सिन्हा, वन विभाग के अधिकारी राजीव रंजन, एडीजी प्रशांत कुमार सहित वन विभाग के कई वरिष्ठ पदाधिकारी एवं वन्य जीव संरक्षण के लिए कार्य करने वाले गैर सरकारी संगठन के सदस्य व अन्य मौजूद रहे।

Published / 2022-02-03 14:43:58
शरीर में गुर्दे के जैसी है धरती के पर्यावरण में नम या आर्द्र भूमि की अहमियत...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (वेंकटेश दत्ता)। भारत रामसर सम्मेलन और जैविक विविधता के सम्मेलन, दोनों का हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन हैरानी की बात यह कि आर्द्र भूमि के संरक्षण के लिए कोई स्पष्ट नियामक ढांचा नहीं है। हालांकि कुछ राज्यों में आर्द्र भूमि विकास प्राधिकरण बनाए तो गए हैं, लेकिन ये भी अन्य परंपरागत कानूनों के अधीन ही हैं। पर्यावरण विज्ञानियों के सामने इस वक्त एक बड़ी चिंता आर्द्र भूमि (वेटलैंड) के संरक्षण को लेकर उभरी है। धरती के पर्यावरण में नम या आर्द्र भूमि की अहमियत वैसे ही है जैसे शरीर में गुर्दे की। नम भूमि ही धरती के भीतर मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आर्द्र भूमि जैव विविधता से लेकर मीठे पानी के जलाशयों, कार्बन अवशोषण और आजीविका का भीबड़ा स्रोत मानी जाती है। ऐसे में यदि आर्द्र भूमि खत्म होती जाएगी तो धरती पर नए तरह का संकट खड़ा हो जाएगा। भारत में आर्द्र भूमि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 4.7 फीसद है। जाहिर है, यह काफी कम है और इसलिए इसका संरक्षण कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। वैसे दुनियाभर में आर्द्र भूमि पर संकट गहराता जा रहा है। इसलिए इसे बचाने के लिए पहली बार दो फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में वैश्विक सम्मेलन बुलाया गया था और दुनियाभर में फैली आर्द्र भूमि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी गई थी। अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की लगभग दो हजार चार सौ आर्द्रभूमियों में से सैंतालीस भारत में हैं और उन्हें रामसर स्थल कहा जाता है। ये विश्व स्तर पर प्रमुख संरक्षित स्थलों में से हैं। ईस्ट कलकत्ता आर्द्र भूमि, पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर के पूर्व में स्थित प्राकृतिक और मानव निर्मित आर्द्र भूमि का एक बड़ा परिसर है जो एक सौ पच्चीस वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहां कृषि क्षेत्र, सीवेज फार्म और कई तालाब हैं। इस आर्द्र भूमि का उपयोग कोलकाता के सीवेज शोधन के लिए भी किया जाता है, और अपशिष्ट जल में निहित पोषक तत्व मछलियों की आबादी और कृषि को बनाए रखता है। इसी तरह नौ रामसर स्थलों के साथ उत्तर प्रदेश देश में ऐसी आर्द्र भूमि वाला दूसरा बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश में गंगा नदी क्षेत्र का एक अद्वितीय और विशाल पारिस्थितिक तंत्र है जो पौधों और जानवरों की समृद्ध विविधता को बरकरार रखता है। इसमें तालाबों, झीलों और आर्द्र भूमि का एक बड़ा क्षेत्र है। मछलियों की जैव विविधता में उत्तर प्रदेश का योगदान 14.11 फीसद का का है, और इनमें से बहुत से इन आर्द्र भूमि से आते हैं। उत्तर प्रदेश में गंगा के बाढ़ के मैदान का लगभग पांच फीसद हिस्सा आर्द्र भूमि से ढका है। बृजघाट से नरोरा तक ऊपरी गंगा नदी भी एक रामसर स्थल है। हैदरपुर आर्द्र भूमि क्षेत्र भारत में सबसे नया रामसर स्थल है जिसे दिसंबर 2021 में ही इस शृखंला में जोड़ा गया था। यह भूमि क्षेत्र मध्य गंगा बैराज के साथ गंगा नदी के बाढ़ के मैदानों पर बिजनौर जिले में 6908 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। इस वर्ष विश्व आर्द्र भूमि दिवस की विषयवस्तु ह्यलोगों और प्रकृति के लिए आर्द्र भूमिह्ण है। यह वैश्विक आह्वान दुनिया भर में आर्द्र भूमि को बचाने के लिए किया गया है। इसरो ने उपग्रह से प्राप्त चित्रों से इसका एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण भी किया है। इसके अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 27181 आर्द्र भूमि क्षेत्र हैं जो लगभग 63,525 हेक्टेयर क्षेत्र बनाते हैं। इनमें से लगभग चालीस फीसद आर्द्र भूमि क्षेत्र सौ हेक्टेयर से अधिक आकार के हैं। अकेले हरदोई जिले में दो हजार से अधिक आर्द्र भूमि क्षेत्र हैं। तटीय इलाकों में नमी क्षेत्र और बैकवाटर मैंग्रोव के जंगलों का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है जहां लोग भोजन, ईंधन, चारा और आवास के लिए इन पर निर्भर हैं। पारंपरिक मछुआरे आज भी अपनी स्थायी आजीविका के लिए पूरी तरह से मछली और शंख जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। शहरीकरण, प्रदूषण, अतिक्रमण और गहन कृषि के कारण भू-उपयोग में बदलाव के कारण भारत में आर्द्र जमीन का अस्तित्व खतरे में है। ऐसे कई भू क्षेत्र अपनी पुरानी पहचान खो चुके हैं और उन्हें बदलते परिवेश के अनुसार विकास का दंश झेलना पड़ा है। लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य में उनकी मुख्य भूमिका को बदला नहीं जा सकता है। इसलिए मौजूदा जल निकायों की रक्षा करने और आर्द्र भूमि क्षेत्रों को बचाने के लिए उचित संरक्षण रणनीति और सशक्त प्रबंधन योजना बनाने की जरूरत है। तेजी से हो रहे शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण आर्द्र भूमि का लगातार क्षरण हो रहा है। सिर्फ पिछले एक दशक में हम लगभग तीस फीसद भूमि खो चुके है। उत्तर प्रदेश में ही रायबरेली, हरदोई, लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर और बहराइच जिलों में हजारों एकड़ आर्द्र भूमि है। अकेले रायबरेली ने 1972 से लगभग नवासी फीसद आर्द्र भूमि खो दी है। लखनऊ ने पिछले पांच दशकों में लगभग सत्तर फीसद आर्द्र भूमि खो दी है। गहन सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन आर्द्र भूमि के खत्म होने का कारण बन रहा है। इसके अलावा गन्ना, धान और गेहूं जैसी जल-गहन फसलों के साथ आर्द्र भूमि को कृषि क्षेत्रों में परिवर्तित करना भी है। नहरों और सड़कों के अवैज्ञानिक निर्माण के कारण कई आर्द्र भूमि खंड मानचित्र से गायब हो चुके हैं। आर्द्र भूमि के संरक्षण के लिए भारत में कोई मजबूत नियामक ढांचा नहीं है। इस समस्या को अभी भी अलग-थलग करके देखा जा रहा है। जल संसाधन प्रबंधन और विकास योजनाओं में शायद ही इसका उल्लेख किया जाता है। ऐसे संवेदनशील पारिस्थितिकीय तंत्रों के प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी पर्यावरण और वन मंत्रालय के हाथों में है। हालांकि भारत रामसर सम्मेलन और जैविक विविधता के सम्मेलन दोनों का हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन हैरानी की बात यह कि आर्द्र भूमि के संरक्षण के लिए कोई स्पष्ट नियामक ढांचा नहीं है। हालांकि कुछ राज्यों में आर्द्र भूमि विकास प्राधिकरण बनाए तो गए हैं, लेकिन ये भी अन्य परंपरागत कानूनों के अधीन ही हैं। इस वक्त आर्द्र भूमि को आर्द्र भूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत संरक्षित किया जाता है। आर्द्र भूमि को बचाने की दिशा में पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम इसके भूमि दस्तावेज को सुरक्षित करना है। उपग्रह चित्रों और ड्रोन कैमरों का उपयोग करके इनका दस्तावेज बनाया जाना चाहिए। आर्द्र भूमि का जल-प्रसार क्षेत्र मौसम के अनुसार बदलता रहता है। मानसून के समय जल-प्रसार का मापन कर उसे राजस्व रिकार्ड में दर्ज कर देना चाहिए। मानसून के बाद से ग्रीष्मकाल तक आर्द्रभूमि के जल प्रसार क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी पाई जाती है जिसका फायदा उठा कर लोग अतिक्रमण करते हैं। मानसून के बाद फैले जल का परिसीमन करके भू-राजस्व अभिलेखों को ठीक से बनाए रखा जाना चाहिए। तालाबों, झीलों और आर्द्र भूमि के पुनरुद्धार के लिए कार्य योजना का निर्माण वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, न कि तदर्थ उपायों पर। सिंचाई की बेहतर तकनीकों को अपना कर भूजल पर दबाव कम किया जा सकता है। इसके अलावा किसानों को मोटा अनाज उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है, जिसमें बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। पर्यावरण संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक समग्र वैज्ञानिक, तकनीकी और सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण की जरूरत होती है। इसमें जनभागीदारी और सहयोग जरूरी है। कई मामलों में स्थानीय समुदायों की उपेक्षा भी ऐसे संकट को बढ़ाती है। आर्द्र भूमि के तट पर रहने वाले समुदाय स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हैं क्योंकि अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए वे पारिस्थितिक तंत्रों पर ही निर्भर हैं। ऐसे में पारिस्थितिकी तंत्र का प्रभावी प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है।

Published / 2022-01-18 17:21:40
गंगा-दामोदर-सुवर्णरेखा को जोड़ने की बन रही डीपीआर

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत की नदियों को जोड़ने की परियोजना के तहत गंगा (फरक्का)- दामोदर-सुवर्णरेखा लिंक की व्यवहार्यता रिपोर्ट (एफआर) पूर्ण हो गई है और अब इसकी डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) तैयार की जा रही है। इस परियोजना से तीन राज्यों प.बंगाल, ओडिसा और झारखंड के नदियों को आपस में जोड़ कर इंटर बेसिन जल अंतरण (ट्रांसफर) के द्वारा जल स्रोतों के विकास किया जाएगा। केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे को पत्र भेज कर यह जानकारी दी है। सांसद निशिकांत दुबे ने 22 दिसंबर 2021 को नियम 377 के तहत लोक सभा में यह मामला उठाया था। केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने नदियों को जोड़ने की परियोजना की अब तक की प्रगति की जानकारी देते हुए बताया कि झारखंड से सम्बन्धित पांच इंटर स्टेट लिंक में गंगा (फरक्का) दामोदर सुवर्णरेखा लिंक की व्यवहार्यता रिपोर्ट पूर्ण होने के बाद इसकी डीपीआर बनाने का काम चल रहा है। इस परियोजना से दुमका सहित झारखंड के कई जिलों को फायदा होगा। झारखंड से सम्बन्धित सोन डैम-गंगा लिंक की सहायक नदियों से लिंक, साउथ कोयल -सुवर्णरेखा, शंख -साउथ कोयल और बराकर दामोदर सुवर्णरेखा की पूर्व व्यवहार्यता रिपोर्ट पूर्ण हो गई है।बता दें कि इंटर बेसिन जल अंतरण लिंक के द्वारा जल स्रोतों के विकास के लिए सिंचाई मंत्रालय (अब जल शक्ति मंत्रालय) ने 1980 में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जल संसाधन का प्लान (एनपीपी) तैयार किया था। नदियों को जोड़ने के इस राष्ट्रीय योजना के तहत नेशनल वाटर डेवेलपमेंट एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) ने व्यवहार्यता रिपोर्ट (एफआर) तैयार करने के लिए 30 लिंक को चिन्हि्त किया था। इसमें 16 लिंक प्रायद्वीपीय घटक से थे जबकि 14 लिंक हिमालयन घटक से थे। इसमें गंगा (फरक्का) दामोदर सुवर्णरेखा लिंक हिमालयन घटक के अन्तर्गत है। सांसद निशिकांत दुबे के अनुसार भारत के नदियों को जोड़ने के इंटर स्टेट लिंक के कामों में तेजी आई है। केन्द्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। खुशी की बात है कि गंगा (फरक्का) दामोदर सुवर्णरेखा लिंक की व्यवहार्यता रिपोर्ट (पीएफआर) पूर्ण हो गई है और अब डीपीआर का काम चल रहा है। इस परियोजना से दुमका सहित झारखंड के कई जिलों को फायदा होगा। झारखंड से सम्बन्धित कई इंटर स्टेट लिंक की भी पूर्व व्यवहार्यता रिपोर्ट पूरी हो गई है।

Published / 2022-01-18 14:53:33
कम पानी खर्च कर दोगुना मुनाफा कमा खुशहाल बन रहे उद्यमी किसान

टीम एबीएन, रांची। झारखंड में हमेशा से परंपरागत तरीके से खेती करने वाली रांची के ओरमांझी की रहने वाली महिला किसान सुनीता देवी ने नहीं सोचा था कि सिंचाई के तरीके में बदलाव लाने से उत्पादन में बहुत फर्क आयेगा और पानी की भी समस्या नहीं रहेगी। सुनीता ने सिंचाई की कठिनाई को टपक सिंचाई से दूर करते हुए दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल पेश की है। आज सुनीता ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रमोशन सोसाईटी के तहत झारखंड बागवानी सघनीकरण टपक सिंचाई परियोजना से जुड़कर टपक सिंचाई से खेती शुरू कर अच्छी आमदनी कर रही हैं। सुनीता कहती हैं, टपक सिंचाई योजना से उनकी जिंदगी में काफी बदलाव आ गया। हमारे पास सिंचाई के लिए सिर्फ कुआं था, जो अक्सर सूख जाता था। जिस कारण हम सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर ही आश्रित थे। लेकिन, अब ड्रिप के लग जाने के बाद खेती करना काफी आसान हो गया है। आज एक साथ कई तरह की फसल की खेती कर सालाना 1.5 लाख तक की आमदनी कर लेती हूं। सुनीता की ही तरह झारखण्ड बागवानी सघनीकरण टपक सिंचाई परियोजना ने राज्य की हजारों महिला किसानों के जीवन में बदलाव की नई कहानी लिखी है। पश्चिमी सिंहभूम के तांतनगर प्रखण्ड के चिरची गांव निवासी संकरी परंपरागत तरीके से खेती कर सालाना 20-25 हजार रुपये अर्जित करती थी, अब वह टपक सिंचाई परियोजना से जुड़कर सालाना 80-90 हजार रुपए का मुनाफा कमा रही हैं । राज्य के 9 जिलों के 30 प्रखण्ड में इस परियोजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। अब तक पूरे राज्य में करीब 11800 किसान सूक्ष्म टपक सिंचाई एवं अन्य सुविधाओं को लेकर अच्छे उत्पादन से ज्यादा कमाई कर उद्यमिता के पथ पर हैं। अबतक इस परियोजना से जुड़ने के लिए करीब 23 हजार किसानों का पंजीकरण किया जा चुका है। राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में किसानों को सुविधाओं से लैस करना है, ताकि झारखण्ड के कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी उन्हें सिंचाई समेत किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। इसी कड़ी में राज्य के किसानों को टपक सिंचाई के जरिए कम पानी में बेहतर फसल उपजाने के लिए प्रशिक्षण एवं सुविधा मुहैया करायी जा रही है। जिसका उद्देश्य राज्य के कृषकों को स्थायी एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि के जरिए सब्जी उत्पादन में बढ़ोतरी दर्ज करवाना है। सरकार अपने उद्देश्य में सफल भी हो रही है, जिससे हजारों कृषक जो पहले साल में एक फसल पर निर्भर रहते थे, अब साल में तीन-चार फसल उपजाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं।

Published / 2022-01-11 17:20:52
कचरा उत्पादन पूरी तरह खत्म करना ही बचाव और जमीनी हकीकत

एबीएन डेस्क (सुनीता नारायण)। भारत अपने यहां कचरे से निपटने के लिए तेजी से नीतियां तैयार कर रहा है। कचरा यानी घरों, संस्थानों और कारखानों में चीजों के इस्तेमाल से निकलने वाला अवशिष्ट। अब इसका प्रभाव हमारी गतिविधियों पर भी नजर आना चाहिए। हमारे कचरे को ऐसा संसाधन बनना चाहिए जिस पर दोबारा काम हो, दोबारा इस्तेमाल हो और जिसका पुनर्चक्रण हो सके। ऐसा करने से हमारी दुनिया में वस्तुओं का इस्तेमाल कम हो सकेगा और पर्यावरण को पहुंचने वाले नुकसान पर भी नियंत्रण किया जा सकेगा। यह उपाय सबके लिए लाभदायक है। हमें पता है कि जैसे-जैसे हमारे समाज अमीर और शहरी होते जाते हैं वैसे-वैसे ठोस कचरे की प्रकृति भी बदलती जाती है। जैविक अपघटन लायक कचरे के बजाय आम परिवार प्लास्टिक, कागज, धातु तथा अन्य ऐसे कचरे ज्यादा निकालते हैं जो पर्यावरण के अनुकूल नहीं होते। प्रति व्यक्ति आधार पर उत्पादित कचरे की मात्रा भी बढ़ती है। देश के शहरी इलाकों में से कई में पहले ही कचरे का उत्पादन बहुत अधिक बढ़ चुका है। सन 2000 में जब पहली बार नगर निकायों के लिए ठोस कचरे से संबंधित नियम अधिसूचित किए गए तब वे इस विचार पर आधारित थे कि कचरे को संग्रहीत किया जाए, वाहन से ले जाया जाए और किसी दूरवर्ती सुरक्षित जगह पर निपटाया जाए। इसका लक्ष्य यह था कि हम कचरे को अपने आसपास से हटाकर अपने शहरों को साफ रखें। परंतु यह नीति व्यावहारिक स्तर पर नाकाम रही और हमारे शहरों में कचरे का ढेर एकत्रित होता गया। नगर निकायों की क्षमता में कमी की वजह से जो कचरा इकठ्ठा करके दूर नहीं ले जाया जा सका वह हमारे घरों के आसपास एकत्रित होता रहा। जो कचरा संग्रहित किया गया उसे भी कहीं फेंका जाता और यह कचरा आज शर्मिंदा करने वाले कचरे के पहाड़ों में बदल चुका है। बीते कुछ वर्षों के दौरान देश में कचरा प्रबंधन की रणनीति में काफी बदलाव आया है। मौजूदा नीति की बात करें तो केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) 2.0 में कचरे को अलग-अलग करने, सूखे और गीले कचरे का प्रसंस्करण करने और कचरा फेंकने के लिए निर्धारित लैंडफिल साइट पर भेजे जाने वाले कचरे को न्यूनतम करने का प्रावधान किया गया। एसबीएम 2.0 के दिशा-निर्देशों के अनुसार जैव अपघटन के लिए अनुपयुक्त कचरा जिसे किसी भी तरह उपचारित नहीं किया जा सकता उसे किसी भी हालत में कुल कचरे के 20 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए और केवल इसे ही लैंडफिल की जगहों पर भेजा जाना चाहिए। इस हिसाब से दिशानिर्देशों में कहा गया है कि शहरों में कचरा फेंकना पूरी तरह बंद होना चाहिए। उन्हें अपने पूरे कचरे का भलीभांति प्रसंस्करण करना चाहिए। दिशा-निर्देशों में जोर दिया गया है कि कचरे से ऊर्जा तैयार करने की परियोजनाएं वित्तीय और परिचालन के मामले में तभी व्यवहार्य हो सकती हैं जब उन्हें रोजाना 150 से 200 टन उच्च कैलोरिफिक वैल्यू वाला ऐसा कचरा मिले जो छांटा हुआ तथा सूखा हुआ हो और जिसका पुनर्चक्रण संभव न हो। हमने यह भी सीखा है कि ऐसे संयंत्र कोई जादू की छड़ी नहीं होते। इनके ऊर्जा उत्पादन करने के लिए यह आवश्यक है कि इन्हें आपूर्ति किया जाने वाला कचरा उच्च गुणवत्ता वाला हो तथा इसे छांटने का काम एकदम प्राथमिक यानी स्रोत के स्तर पर हो। बिना इसके संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएगा और निष्क्रिय हो जाएगा। दिशानिर्देश यह अवसर भी मुहैया कराते हैं कि 3,000 से अधिक लैंडफिल साइट जहां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक करीब 80 करोड़ टन कचरा फेंका जाता है, उसे दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है। इससे न केवल मूल्यवान जमीन मुक्त होगी जिस पर हरियाली लगाई जा सकती है और अन्य उपयुक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, बल्कि पर्यावरण से जुड़ी आपदाओं को भी टाला जा सकता है। इसके लिए खासतौर पर तैयार नीतियों की आवश्यकता है ताकि इन लैंडफिल वाली जगहों से निकलने वाली सामग्री का समुचित इस्तेमाल हो सके। शहरों को भी अब इन जगहों पर नया कचरा डालने से बचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो यहां का कचरा कभी समाप्त नहीं होगा। अच्छी खबर यह है कि देश की ठोस कचरा प्रबंधन नीति को अब इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि ठोस कचरे को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। यह रुख सही मायनों में एक चक्रीय अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है। इस नीति में कचरे को पूरी तरह समाप्त करने और विभिन्न सामग्रियों को पूरी तरह दोबारा इस्तेमाल करने की बात शामिल है। ऐसे में समय के साथ हमें यह भी पता चलेगा कि कौन से पदार्थ दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जा सकते हैं। हम उनका इस्तेमाल कम कर सकते हैं। इससे नीतियां और व्यवहार पर्यावरण के अधिक अनुकूल होंगे। उस दृष्टि से देखें तो नीति बन चुकी है लेकिन हमारे व्यवहार में बदलाव शेष है। सबसे बड़ी समस्या है कचरे को स्रोत के स्तर पर अलग-अलग करना। अगर घरों में कचरे को छांट भी लिया जाए तो इसे अलग-अलग प्रसंंस्करण इकाई पहुंचाना मुश्किल है। वास्तव में प्रसंस्करण इसलिए हो पाता है क्योंकि कुछ लोगों की आजीविका हमारे कचरे पर टिकी है। मसलन कचरा बीनने वाले। शहरों के प्रबंधक कचरे के प्रबंधन के लिए अलग-अलग विकल्पों पर काम कर रहे हैं ताकि इससे राजस्व जुट सके। सबसे बुरी बात यह है कि शहरों में प्लास्टिक कचरा तेजी से बढ़ रहा है। हमें मानना होगा कि हमारे इस्तेमाल वाले प्लास्टिक का पुनर्चक्रण नहीं हो सकता इसलिए इसका इस्तेमाल बंद करना होगा। एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक को लेकर हमारी मौजूदा नीति इस बड़ी समस्या से निपटने के लिए अपर्याप्त है। जरूरत इस बात की है कि कचरा प्रबंधन के नए तरीके सीखे जाएं। इसके लिए सबसे आवश्यक है यह जानना कि क्या कारगर है और क्यों? इसीलिए सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट ने नीति आयोग के साथ मिलकर एक दस्तावेज तैयार किया है, जिससे शहरों के कचरे के अनुसार उनके निपटान के नए सबक सीखे जा सकते हैं। इनको अपनाने की आवश्यकता है। यही बदलाव का सही अवसर है।

Published / 2022-01-10 15:15:26
पर्यावरण आंदोलनकर्मी का नेतृत्व और मार्गदर्शन स्वर्ग से भी करते रहेंगे सुंदरलाल बहुगुणा...

एबीएन डेस्क। पिछली जयंती तक पर्यावरण और पारिस्थितिकी विज्ञानकर्मियों और आंदोलनकारियों का मार्गदर्शन और नेतृत्व करने के लिए स्वयं सुंदरलाल बहुगुणा हमलोग के बीच मौजूद थे, लेकिन कोरोना के दूसरे कहर ने उनको हमसे छीन लिया। आज भौतिक रूप से वह हमारे बीच भले न हों, लेकिन दशकों का उनका अनुभव, ज्ञान, कर्मठता, निष्ठा, समर्पण हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा। वह पलामू भी आए थे, टाउन हॉल के सार्वजनिक आयोजन से उन्होंने पलामूवासियों को उपकृत और कृतार्थ भी किया था। उनकी सादगी, सहजता, सरलता ने मेरी हिम्मत बढ़ाई थी कि जब भी देहरादून जाऊं, उनके सान्निध्य में कुछ पल बिताऊं, उनका आशीर्वाद लूं। 6 मार्च 2020 को सुंदरलाल बहुगुणा के दर्शन करने हेतु मैं शास्त्री नगर, देहरादून स्थित उनके आवास पहुंचा था, वह अपने बेटी-दामाद के यहां रहते थे। मेरे साथ पत्नी शीला श्रीवास्तव और मेरा छोटा पुत्र परिमल परितोष था। 93वर्ष की उम्र में पत्नी विमला बहुगुणाकी तीमारदारी में वह लगे थे। पूछता हूं-कौन-सी बिमारी हैं? बताते हैं-बुढ़ापा अपने आप में सबसे बड़ी बिमारी है। लेकिन, सुंदरलाल बहुगुणा अपनी पीड़ा और दर्द छुपा नहीं पाते। कहने से नहीं चूके-हमारी पूर्व की पीढ़ी ने प्रकृतिका जो खूबसूरत स्वरूप विरासतमें हमें सौंपा था, उसे हमारी पीढ़ी सहेज,संवार कर नहीं रख सकी। जब आज हमारी पीढ़ी दुनिया को अलविदा कह रही है तो दिल में एक कसक तो है ही कि प्रकृति के साथ हमने अन्याय किया। अगली पीढ़ी को हम पहले जैसी खूबसूरत दुनिया सौंपकर नहीं जा रहे हैं। सुंदरलाल बहुगुणा को लोग पर्यावरण गांधी भी कहते हैं। उन्हें पद्मश्री(1981), जमनालाल बजाज पुरस्कार (1985), सरस्वती सम्मान(1987), गांधी सम्मान (1999) और पद्मविभूषण(2001) जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। लेकिन, समाज, राष्ट्र या विश्व उनकी पीड़ा और दर्द का निवारण नहीं करती तो ये सारे सम्मान ढकोसलेबाजी और खानापूर्ति दीखते हैं। (ध्यातव्य है कि 1981में एक तरफ सरकार उनको पद्मश्री से सम्मानित कर रही थी, दूसरी तरफ हिमालय में पेड़ों की कटाई भी जारी थी।यह सरकार का परस्पर विरोधाभासी रवैया था।सुंदरलाल बहुगुणा ने सरकार की इस विरोधाभासी रवैया के खिलाफ पद्मश्री सम्मान लेने से इन्कार कर दिया था।) आज दो वर्ष बाद भी कानों में उनकी आवाज गूंजती है, उनकी पीड़ा मुझे झकझोरती है-विरासत में जितनी खूबसूरत दुनिया हमारी पीढ़ी को मिली थी, उसे सहेज संवार कर हम नहीं रख सके। अपने सार्वजनिक संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी शिरकत से लेकर चिपको आन्दोलन और टिहरी बांध विरोधी आन्दोलन की छोटी से छोटी बात उन्हें याद थी।उनके पास संघर्ष-गाथा के अद्भुत संस्मरणों का जखीरा था।

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