एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश की दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो ने नया कीर्तिमान रच दिया है। एलएंडटी के इंजीनियरों ने केवल 26 दिन में पहाड़ को चीरकर एक किलोमीटर से ज्यादा लंबी सुरंग बना डाली है। यह सुरंग उत्तराखंड में त्रषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग पर बनायी गयी है।ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट 16,216 करोड़ रुपये का है। इस रेल प्रोजेक्ट के तहत शिवपुरी से ब्यासी तक के बीच की 1 किलोमीटर सुरंग सिर्फ 26 दिन में ही बनकर तैयार हो गई। यह एक नया रिकॉर्ड है। इस बड़ी उपलब्धि के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रेल विकास निगम और एलएंडटी की सराहना की है। उन्होंने कहा कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद एलएंडटी ने यह कीर्तिमान रचा है। 100 किलोमीटर की होगी टनल : 125 किलोमीटर लंबे इस प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने पर देवप्रयाग, टिहरी गढ़वाल और कर्णप्रयाग आपस में रेल लाइन से जुड़ जाएंगे। इसके तहत 100 किलोमीटर रेल लाइन सुरंगों के भीतर से ही गुजरेगी। अब तक 35 किलोमीटर से ज्यादा सुरंगें बनाई जा चुकी हैं। 17 और सुरंगें बनाई जानी हैं। 17 सुरंगों में से 11 सुरंगों की लंबाई 6 किलोमीटर से ज्यादा होगी। इन सुरंगों का व्यास 8 मीटर होगा। इनमें 6 मीटर व्यास की निकासी सुरंग भी शामिल हैं। केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में विकास की गति को बढ़ाते हुए रेल लाइनों के विस्तार पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ यानी चारधाम यात्रा को भी रेलवे लाइन से जोड़ने का काम शुरू हो चुका है।
एबीएन सोशल डेस्क। अमरनाथ तीर्थयात्रा के लिए अब तक 33,000 से ज्यादा लोगों ने पंजीकरण कराया है। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी। श्रद्धालु इस तीर्थयात्रा के लिए निर्धारित बैंक शाखाओं से परमिट पाने की कवायद में जुटे हैं। यह 43 दिवसीय यात्रा कोरोना वायरस महामारी के कारण दो साल बाद 30 जून से शुरू होनी है। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड (एसएएसबी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नितीश्वर कुमार ने बताया, यात्रा के लिए शनिवार तक 33,795 श्रद्धालुओं ने पंजीकरण कराया है। गर्भवती महिलाएं पंजीकरण की पात्र नहीं : तीर्थयात्रा के लिए व्यवस्था की निजी रूप से निगरानी कर रहे कुमार ने कहा कि 22,229 श्रद्धालुओं ने ऑनलाइन माध्यम से तथा 11,566 ने ऑफलाइन माध्यम (बैंकों) से पंजीकरण कराया है। सरकार इस साल तीर्थयात्रियों के कुशलक्षेम के लिए रास्ते में उनकी गतिविधि पर नजर रखने के वास्ते रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) प्रणाली भी शुरू कर रही है। वार्षिक तीर्थयात्रा का प्रबंधन करने वाले एसएएसबी ने तीर्थयात्रियों के पंजीकरण के लिए देशभर में बैंक 566 शाखाओं को निर्धारित किया है। इसके साथ ही इसकी वेबसाइट पर भी पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध है। एसएएसबी के अनुसार, 13 साल से कम या 75 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति और छह सप्ताह से अधिक की गर्भवती महिलाएं पंजीकरण की पात्र नहीं हैं। पहले आओ पहले पाओ - अधिकारियों ने बताया कि तीर्थयात्रियों को एक आवेदन, एसएएसबी द्वारा चयनित अस्पतालों से अनिवार्य स्वास्थ्य प्रमाणपत्र, चार तस्वीरें और 120 रुपये का शुल्क देना होगा। उन्होंने बताया कि जिन लोगों ने पिछले साल यात्रा के लिए पंजीकरण कराया था लेकिन यात्रा नहीं कर पाए थे, उन्हें केवल 20 रुपये का शुल्क देना होगा। अधिकारियों ने कहा कि पंजीकरण और यात्रा परमिट पहले आओ पहले पाओ के आधार पर दिया जाएगा। गौरतलब है कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने के मद्देनजर अमरनाथ यात्रा बीच में ही रोक दी गई थी जबकि कोरोना वायरस महामारी के कारण पिछले दो वर्ष के दौरान केवल सांकेतिक यात्रा हुई है।
एबीएन सोशल डेस्क। अलग-अलग रंगों वाले साबुन का इस्तेमाल तो जरूर किया गया होगा, पर कभी सोचा है कि इनसे जो झाग निकलता है तो सफेद ही क्यों होता है। जो रंग साबुन का होता है, वैसा ही रंग झाग का क्यों नहीं होता। इसके पीछे भी विज्ञान है, जो बताता है कि ऐसे साबुन से हाथ धोने के बाद उसका रंग कहां खो जाता है, जानिए ऐसा क्यों होता है… विज्ञान कहता है कि किसी भी चीज का अपना रंग नहीं होता, चीजों के रंगीन की दिखने की वजह होती है प्रकाश की किरणें। अगर कोई चीज प्रकाश की सभी किरणों को अवशोषित कर लेती है तो वह काली दिखती है। वहीं, जब ये प्रकाश की सभी किरणों को परावर्तित कर देती है तो चीज सफेद दिखाई देती है। झाग के मामले में भी ऐसा होता है। इसके अलावा साबुन में इस्तेमाल होने वाली डाई अधिक प्रभावी नहीं होती। एथेंस साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, साबुन का रंग कोई भी हो जब इसका झाग बनता है तो इसमें पानी, हवा और साबुन होता है। यही गोल आकार लेकर बुलबुलों के रूप में दिखते हैं। जब इन पर प्रकाश की किरणें पड़ती हैं तो परावर्तित हो जाती हैं। ऐसा होने पर ये ट्रांसपेरेंट बुलबुले सफेद नजर आते हैं और सबको लगता है कि साबुन के रंग का असर नहीं दिख रहा है। विज्ञान कहता है कि साबुन के झाग से बनने वाले छोटे-छोटे बुलबुले सतरंगी पारदर्शी फिल्म से बने होते हैं, लेकिन ये ट्रांसपेरेंट होते हैं। यह वजह है कि जब इन पर प्रकाश की किरण पड़ती है तो सभी रंग परावर्तित हो जाते हैं। विज्ञान के मुताबिक, जब ऐसा होता है तो वो चीज सफेद नजर आती है। यही वजह है साबुन के हरे या पीले होने के बावजूद झाग सफेद ही निकलता है। यही नियम समुद्र और नदियों पर भी लागू होता है। अक्सर आपने देखा होगा कि समुद्र या महासागर नीले रंग में रंगे हुए नजर आते हैं, लेकिन जब आप पास जाकर पानी को देखते हैं तो इसका रंग नीला नहीं होता। दरअसल, पानी में सूर्य किरणों को एब्जॉर्ब करने की पावर होती है। दिन के समय जब सूर्य की किरणें पानी पर पड़ती हैं तो प्रकाश से निकलने वाली दूसरे रंग की किरणों को पानी एब्जॉर्ब कर लेता है, लेकिन नीले रंग की किरण को परावर्तित (रिफ्लेक्ट) कर देता है। प्रकाश के इसी परावर्तन के कारण समुद्र का रंग नीला दिखाई तो देता है, लेकिन हकीकत में यह नीला नहीं होता।
एबीएन सोशल डेस्क। देश में सरकार के अधीन मंदिरों को हिंदू संगठनों और समाज को सौपने के लिये एक आंदोलन चलाया जा रहा है। इस बीच तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु सरकार के हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने चेन्नई के टी नगर स्थित अयोध्या मंडपम को अपने नियंत्रण में ले लिया है, जिसको लेकर राज्य में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। अयोध्या मंडपम के देखभाल और रख-रखाव का जिम्मा श्रीराम समाज के पास रहा है। इसे सरकार के नियंत्रण में लाने का आदेश दिसंबर 2013 में तत्कालीन जे जयललिता सरकार द्वारा जारी किया गया था। वहीं, 64 वर्ष पुराने इस स्थल को हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने जैसे ही अपने नियंत्रण में लिया, इसका जमकर विरोध होने लगा। इस मुद्दे को लेकर राज्य की भाजपा यूनिट ने एमके स्टालिन सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। मंदिर का रखरखाव करने वाले श्रीराम समाज ने तर्क दिया है कि अयोध्या मंडपम न तो यह मंदिर है और न ही जनता के पैसे से बनाया गया है और न ही जनता ने पूजा नहीं की। समाज की तरफ से कहा गया है कि यहां पर कोई भी मूर्ति नहीं है। 2013 के सरकारी आदेश में कहा गया था कि हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट 1959 के सेक्शन (6) 20 के मुताबिक, श्रीराम समाज एक सार्वजनिक मंदिर है। जबकि, हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स के एक अधिकारी का कहना था, यहां पर मूर्तियां हैं और नियमित पूजा की जाती हैं। मंदिर में पूजा के लिए लोगों का आना-जाना लगा रहता है। वे हुंडियाल (कलेक्शन बॉक्स) के जरिए एक बड़ी राशि बटोर रहे हैं अधिकारी का कहना है कि समाज के कुछ सदस्यों ने मंदिर और धन के कुप्रबंधन की शिकायतों के बाद 2013 में एक आदेश जारी किया था। तमिलनाडु सरकार का ये विभाग हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट 1959 के अनुसार, राज्य में 35,000 से अधिक मंदिरों की देखभाल करता है। इसके अंतर्गत ऐतिहासिक संरचनाओं का रखरखाव, जीर्णोद्धार करना, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करना आदि शामिल हैं। समाज द्वारा मद्रास हाई कोर्ट में दायर एक रिट याचिका को 31 मार्च को खारिज कर दिया गया था। वहीं, सरकार के नियंत्रण में लिए जाने के बाद एक नई याचिका पर अदालत ने 12 अप्रैल को तुरंत दखल देने से इनकार कर दिया और सरकार से इस मामले में 21 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने को कहा है। पूरे मामले पर सीएम एमके स्टालिन ने भाजपा पर इस मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया और कहा वे इसमें सफल नहीं होंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। गर्मी में अब फ्रीज राहत देने का काम कर रहा हैं। जब इस भयानक गर्मी में फ्रीज में रखा ठंडा पानी गले से उतरता है तो काफी सुकून मिलता है। लेकिन, कहीं आप पानी ठंडा करने के लिए कोल्ड ड्रिंक या पुरानी वाटर बोतल का इस्तेमाल करते हैं? दरअसल, कई लोग कोल्ड ड्रिंक की बोतल को या फिर मिनरल वॉटर की बोतल को कई दिन तक पानी भरकर रखने के लिए इस्तेमाल करते हैं। क्या आप जानते हैं ऐसा करना हानिकारक है और ये बोतल किस तरह से आपको नुकसान पहुंचाती है... जब इन बोतलों में लंबे समय तक इस्तेमाल करते हैं इनमें fluoride और arsenic जैसे तत्व पैदा हो जाते हैं और ये शरीर के लिए काफी नुकसान दायक होते हैं। कहा जाता है कि ये शरीर में स्लो पॉइजन के रूप में काम करते हैं। कई रिपोर्ट में सामने आया है कि प्लास्टिक की बोतल में रखे पानी से आपके इम्यून सिस्टम पर बी काफी असर पड़ता है। इससे पैदा होने वाले कैमिकल आपके शरीर पर गहरा असर डालते हैं। प्लास्टिक में फैथलेट्स जैसे केमिकल की मौजूदगी की वजह से लिवर कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है। लंबे वक्त तक इन बोतलों में पानी रखने से बीपीए का निर्माण होता है, जिसका मतलब है Biphenyl A। यह एक तरह का केमिकल होता है जो आपके शरीर में मोटापा, डायबिटीज आदि बीमारियों का कारण बनता है। इसके अलावा जब इन बोतल में रखा पानी गर्म होता है या फिर सूरज की रोशनी के संपर्क में आता है तो इससे टोक्सिन पैदा होने लगते हैं, जो कई लोगों के कैंसर का कारण भी बनते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। जहां एक तरफ दो साल बाद जोरों-शोरों से अमरनाथ यात्रा की तैयारियां चल रही हैं वहीं दक्षिण कश्मीर में आतंकी हमले तेज होने की चेतावनी दी जा रही है। जिससे अब अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा चिंता का कारण बनती जा रही है। खुफिया अधिकारियों द्वारा मिली जानकारी के बाद सेना का अब सारा जोर दक्षिण कश्मीर में होगा जहां अमरनाथ यात्रा में शामिल होने वाले लाखों श्रद्धालु आएंगें और चिंता की बात यह है कि ताजा आतंकी हमलों, आतंकी गतिविधियों तथा पत्थरबाजों का गढ़ भी हमेशा दक्षिण कश्मीर ही रहा है। रक्षा सूत्रों का कहना है कि 30 जून से आरंभ होने जा रही अमरनाथ यात्रा को सुरक्षित बनाने हजारों सैनिकों को दक्षिण कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में व्याप्क तलाशी अभियान आरंभ करने की तैयारी करने को कहा गया है। इन अभियानों का लक्ष्य तलाश करो और मार डालो ही होगा। अभी तक यही होता आया था कि सेना अमरनाथ यात्रा की शुरूआत से पहले आतंकियों को क्षेत्र से भगाने का अभियान छेड़ती थी लेकिन अब रणनीति को बदल दिया गया है। वैसे अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा की खातिर सेना की तैनाती आधिकारिक तौर पर नहीं होगी। सेनाधिकारी का कहना है कि उनके पास यात्रा के बाहरी इलाकों की सुरक्षा का भार हमेशा की तरह रहेगा। आधिकारिक तौर पर 50 हजार से अधिक अर्द्ध सैनिक बलों को अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा की खातिर तैनात किया जाएगा। इनकी तैनाती लखनपुर के प्रवेश द्वार से लेकर अमरनाथ गुफा तक के रास्तों पर होगी।
एबीएन सोशल डेस्क। डेयरी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी अमूल का मानना है कि आगे जाकर बिजली, लॉजिस्टिक्स और पैकेजिंग लागत के बढ़ते दबाव के कारण दूध कीमतों में मजबूती बनी रहेगी। दूध की कीमतों के बारे में दृष्टिकोण को लेकर पूछे जाने पर अमूल के प्रबंध निदेशक (एमडी) आर एस सोढ़ी ने कहा, कीमतें मजबूत रहेंगी, मैं यह नहीं कह सकता कि कितनी। वे यहां से घट नहीं सकतीं, केवल ऊपर जा सकती हैं। सोढ़ी ने कहा कि अमूल सहकारी कंपनी ने पिछले दो वर्षों में कीमतों में आठ प्रतिशत की बढ़ोतरी की है, जिसमें पिछले महीने दूध की कीमतों में प्रति लीटर दो रुपए की वृद्धि भी शामिल है। मुख्य मुद्रास्फीति बड़ी चिंता का विषय है, जिससे नीति निमार्ता जूझ रहे हैं। बिजली, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग सब हुआ महंगा : सोढ़ी ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि उनके उद्योग में मुद्रास्फीति चिंता का कारण नहीं है, किसान को उनके उत्पाद के लिए उच्च कीमतों के माध्यम से लाभ मिल रहा है। उन्होंने कहा कि अमूल और व्यापक डेयरी क्षेत्र द्वारा की गई बढ़ोतरी दूसरों की तुलना में विशेषकर लागत में हुई वृद्धि की तुलना में बहुत कम है। उन्होंने कहा कि बिजली की बढ़ी कीमतें कोल्ड स्टोरेज के खर्च को बढ़ाती हैं, जो लगभग एक-तिहाई से अधिक बढ़ गई हैं। लॉजिस्टिक्स लागत भी बढ़ी है और पैकेजिंग के मामले में भी ऐसा ही है। इन दबावों के कारण दूध कीमत में 1.20 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महामारी के दौरान किसानों की प्रति लीटर आय भी चार रुपए तक बढ़ गई है। यह भी कहा कि अमूल इस तरह के दबावों से बेफिक्र है क्योंकि इस सहकारिता संस्था के लिए मुनाफा मुख्य उद्देश्य नहीं है। सोढ़ी ने कहा कि यूक्रेन में युद्ध जैसे वैश्विक घटनाक्रम भारतीय डेयरी क्षेत्र के लिए अच्छे हैं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, वे भारतीय निर्यात में मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध के बिना भी अकेले महामारी से संबंधित व्यवधानों ने अमूल के निर्यात राजस्व को एक वर्ष में तीन गुना बढ़कर 1,400 करोड़ रुपए से अधिक करने में मदद की है। अमूल जैविक खाद्य व्यवसाय में प्रवेश करने के लिए तैयार है और वर्तमान में उसी का परीक्षण चल रहा है। उन्होंने कहा कि कंपनी हर उस गतिविधि में रुचि रखती है जो खेती और कृषि से संबद्ध है।
एबीएन सोशल डेस्क। रामकथा क्या है... जैसे प्रश्न का उत्तर किताबों से ज्यादा लोक व्यवहारों में खोजा जाना चाहिए। ऐसा मानना है भगवान श्रीराम के जीवन पर शुरू हुए विश्व के पहले वर्चुअल विद्यालय स्कूल आॅफ राम का। स्कूल आॅफ राम, राम कहानी से जीवन प्रबंधन के गुर सिखाएगा। रामकथा का रिश्ता सीधे लोकमानस से है, उसके सुख-दु:ख, आस-निरास से है। रामकथा क्या है जैसे प्रश्न का उत्तर किताबों से ज्यादा लोक व्यवहारों में खोजा जाना चाहिए। ऐसा मानना है भगवान श्रीराम के जीवन पर शुरू हुए विश्व के पहले वर्चुअल विद्यालय स्कूल आॅफ राम का। स्कूल आॅफ राम, राम कहानी से जीवन प्रबंधन के गुर सिखाएगा। स्कूल आॅफ राम के संस्थापक, संयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यनरत, विद्या भारती के पूर्व छात्र प्रिंस तिवाड़ी का कहना है की पहले लोग एक-दूसरे का अभिवादन, प्रणाम और नमस्कार की जगह राम-रामजी या जै रामजी की जय सियाराम कहकर किया करते थे। अभिवादन में जै रामजी और कुशलक्षेम के रूप में अपनी-अपनी राम कहानी का अर्थ समझ आता है। इसका मतलब यह होता है कि राम स्मरणीय है, इस हद तक कि दो जन जब आपस में मिलें या भेंट करें तो उनकी मुलाकात की शुरूआत रामनाम से हो। दूसरा अर्थ यह होता है कि राम की कोई कहानी है- ऐसी कहानी जिससे व्यक्ति की आपबीती का कोई अनोखा रिश्ता है। ऐसा रिश्ता कि राम की कहानी कहने का मतलब किसी से अपनी आपबीती कहना हो जाता है। 16 जनवरी से प्रारंभ होने वाले इस कोर्स में 13 जनवरी तक आवेदन संभव : प्रिंस ने कोर्स के सबंध में बताया कि रामायण की इन्हीं लोककथाओं को जीवन प्रबंधन का आधार बनाकर स्कूल आॅफ राम ने एक कोर्स का प्रारूप तैयार किया है। जिसमें प्रतिदिन रामायण से जुड़ी किसी एक प्रेरणादायक कहानी से जीवन प्रबंधन का एक गुर लोगों को सिखने को मिलेगा। इस कोर्स का हिस्सा कोई भी बन सकता है। कोर्स 16 जनवरी से शुरू होगा, जिसके लिए आवेदन प्रक्रिया 13 जनवरी से शुरू हो रही है। यह कोर्स 101 दिन तक वर्चुअल ही संचालित होगा।
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