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Published / 2022-03-05 14:26:51
इतना भयानक खुशबू वाला हींग आखिर आता कहां से है?

एबीएन डेस्क। जब भी सब्जी या कोई अन्य डिश बनाई जाती है तो अक्सर उसमें हींग का इस्तेमाल किया जाता है। हींग के इस्तेमाल से आपने खाने का स्वाद बढ़ जाता है और इसकी खुशबू लोगों को काफी पसंद आती है। आपको घरों में पाए जाने वाला हींग मिट्टी की तरह होता है, ऐसा लगता है कि जैसे किसी पत्थर को पीस कर पाउडर बनाया गया हो। वैसे कई घरों में पत्थर के टुकड़ों वाला हींग भी मिलता है, जिसमें काफी ज्यादा खुशबू होती है और हल्का सा हींग ही काफी होता है। हो सकता है आपको भी हर सब्जी में हींग पसंद हो, लेकिन कभी आपने सोचा है आपके खाने की वैल्यू बढ़ाने वाले हींग आखिर ये बनता कैसे है? ये कोई पौधे पर लगता है या पहाड़ों में मिलता है या फिर ये फैक्ट्री में तैयार होता है। अगर आपको इस सवाल का पता नहीं है तो आज हम आपको इस सवाल का जवाब देने वाले हैं कि आखिर हींग कैसे बनाया जाता है और आखिर ये इतना महंगा क्यों होता है। कैसे बनता है हींग : दरअसल, सब्जी में डलने वाला हींग एक पौधे के जरिए बनता है। जी हां, हींग का पौधा होता है और हींग के पौधे से पाउडर वाला हींग बनता है। दरअसल, हींग का पौधा सौंफ वाले पौधों की श्रेणी में आता है, जो करीब एक मीटर तक होता है। इसमें पीले रंग के फूल होते हैं, जो दूर से दिखने में सरसों के पौधे की तरह लगता है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये बनता कैसे है। बता दें कि हींग पौधे पर लगता नहीं है और ना ही इसके कोई फूल होते हैं। खाने वाला हींग इस पौधे की जड़ से बनता है, इसलिए कई लोग इसे गाजर, मूली के पौधे की श्रेणी में भी रखते हैं, क्योंकि यह जड़ से तैयार होता है। वैसे इस पौधे की जड़ हींग नहीं होती है। अब प्रोसेस के जरिए इस जड़ के माध्यम से खाने वाला हींग तैयार किया जाता है। पूरी दुनिया में हींग की करीब 130 किस्में हैं। बीज बोने के बाद चार से पांच साल बाद वास्तविक उपज होती है और एक पौधे से करीब आधा किलो हींग निकलता है और इसमें करीब चार साल लगते हैं। हींग इस पौधे के जड़ से निकाले गए रस से तैयार किया जाता है। एक बार जब जड़ों से रस निकाल लिया जाता है तब हींग बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। खाने लायक गोंद और स्टार्च को मिलाकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में तैयार किया जाता है। इस तरह हींग बनता है। बता दें कि हींग दो तरह का होता है, काबुली सफेद और हींग लाल। सफेद हींग पानी में घुल जाता है जबकि लाल या काला हींग तेल में घुलता है। सफेद व पीला पानी में घुलनशील होता है जबकि गहरे व काले रंग वाला तेल में ही घुलता है, स्टार्च व गोंद मिला कर ईंट के रूप में बेचा जाता है। कहां पैदा होता है हींग : आपको ये जानकर हैरान होगी कि भारत के हर घर में इस्तेमाल होने वाले हींग की खेती भारत में ना के बराबर होती है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह हींग भारत के बाहर से ही मंगाया जाता है और भारत में इस्तेमाल होने वाला हींग ईरान, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से मंगाया जाता है। अफगानिस्तान से काफी मात्रा में हींग आता है। भारत में भी अब हींग की खेती होने लगी है और यह खेती हिमाचल के कुछ पहाडी इलाकों में की जा रही है। क्यों होता है महंगा : हींग भारत में इसलिए महंगा होता है, क्योंकि एक तो इस भारत में पैदावार नहीं है और इसे विदेश से निर्यात करना पड़ता है। इसके अलावा इसे बनाने का प्रोसेस काफी लंबा है, क्योंकि 4 साल तक पौधे को उगाने के बाद इसकी जड़ से हींग प्राप्त होने लगता है। इस वजह से यह काफी महंगा होता है, लेकिन भारत में इसकी डिमांड काफी ज्यादा है।

Published / 2022-03-05 03:57:01
होलिका दहन में बरतें ये सावधानी, नहीं होगी परेशानी

एबीएन डेस्क (सन्तोष पांडेय)। होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। होली हिंदुओं का दो दिवसीय त्योहार है और होली की पूर्व संध्या को लोकप्रिय रूप से "होलिका दहन" कहा जाता है। रंग वाली होली 18 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यानी 17 मार्च, गुरुवार को होली दहन किया जाएगा। इस दिन को बुराई पर अच्छाई के जीत के रूप में मनाया जाता है। होली उन त्योहारों में से एक है जो सभी धार्मिक भेदभावों को भूलकर खेला जाता है। यह त्योहार भाईचारे और समानता के संदेश को बढ़ावा देता है। होलिका दहन का बहुत ही विशेष महत्व है। होलिका दहन के दिन लोग विधि- विधान से पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा- पाठ करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन के दिन अर्चना करने से घर में माता लक्ष्मी निवास करती हैं। वैसे तो होलिका दहन पर लोग अलग-अलग उपाय करते हैं परंतु इस खास दिन पर कुछ विशेष काम भूलकर भी नहीं करना चाहिए। आइए जानते हैं क्या हैं वो कार्य- होलिका दहन पर न करें ये कार्य : • होलिका दहन के दिन सफेद रंग के वस्त्र नहीं धारण करने चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार माना जाता है कि होलिका दहन के दिन नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव ज्यादा रहता है इसलिए सफेद रंग के वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए और न ही किसी भी सफेद रंग के खाद्य पदार्थ का सेवन करना चाहिए। • होलिका दहन के दिन किसी को पैसा उधार देने से परहेज करें। यदि आप होलिका दहन वाले दिन किसी को उधर देंगे तो आपको आर्थिक रूप से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। • होलिका दहन के दिन पूजा करते समय भूलकर भी सिर खुला न रखें। फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री। इस दिन सिर ढककर पूजा करने से लाभ मिलता है। • नए विवाहित जोड़ों को होलिका दहन की पूजा भूलकर भी नहीं देखनी चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है तो इसका असर उनके दाम्पत्य जीवन पर पड़ता है। इसके अलावा इस दिन कोई भी शुभ कार्य नहीं होना चाहिए। • होलिका दहन के दिन रास्ते पर किसी भी प्रकार की वस्तु को हाथ नहीं लगाना चाहिए। यह किसी भी प्रकार का टोटका हो सकता है जो आपके छूते ही नकारात्मक प्रभाव लाएगा।

Published / 2022-03-02 14:48:44
पेट की समस्या, ब्लड शुगर समेत कई रोगों का रामबाण इलाज है "भुना हुआ चना"

एबीएन सोशल डेस्क। चने खाना सेहत के लिए कई तरह से विशेष लाभदायक माना जाता है। चने में प्रोटीन और फाइबर की पर्याप्त मात्रा होती है, जिसका सेवन करना आपकी सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। पर क्या आप जानते हैं कि भुने हुए चने खाना, सेहत के लिए और भी कई तरह के लाभ दे सकता है? आहार विशेषज्ञों की मानें तो भुने चने पेट की समस्याओं को कम करने से लेकर ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने तक के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। वहीं अगर आप वजन कम करने की कोशिश में लगे हुए तो भी इसका नियमित सेवन आपको लाभ दे सकता है। आयुर्वेद विशेषज्ञ बताते हैं, भुने चने का सेवन गुड़ के साथ करना और भी स्वास्थ्यवर्धक हो सकता है। जिन लोगों को शरीर में आयरन की कमी रहती है, ऐसे लोगों को गुण के साथ भुने चने खाने से फायदा मिलता है। पोषक तत्वों से भरपूर चने शरीर को कई सारी अन्य समस्याओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आइए आगे की स्लाइडों में इस बारे में विस्तार से जानते हैं। शरीर की शक्ति बढ़ाने के लिए खाएं चने : चने में प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है, ऐसे में इसका सेवन करना मांसपेशियों के निर्माण को बढ़ावा देने में फायदेमंद हो सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि शारीरिक क्षमता के विकास में भुने हुए चने का सेवन आपको आश्चर्यजनक लाभ दे सकता है। गुड़ के साथ भुने हुए चने खाने से शरीर में खून की कमी दूर होती, साथ ही प्रोटीन का अच्छा स्रोत होने के कारण यह आपके फिटनेस में भी फायदेमंद माना जाता है। ब्लड शुगर को रखता है कंट्रोल : डायबिटीज रोगियों के लिए अक्सर संतुलित आहार का चयन करना कठिन होता है, ऐसे लोगों के लिए भुने हुए चने खाना अच्छा विकल्प हो सकता है। यह कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला आहार है, ऐसे में इसके सेवन से रक्त शर्करा का स्तर बढ़ता नहीं है। इसके अलावा चूंकि चने में फाइबर की भी अच्छी मात्रा पाई जाती है, ऐसे में यह पेट को ठीक रखने के साथ डायबिटीज से संबंधित अन्य जटिलताओं को कम करने में भी आपके लिए फायदेमंद हो सकता है। पाचन को रखता है दुरुस्त : अगर आप भी पाचन की समस्याओं से परेशान रहते हैं तो आहार में भुने हुए चने को शामिल करके लाभ पा सकते हैं। यह आपको लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस करता है साथ ही इसमें मौजूद फाइबर की मात्रा शौच को आसान बनाती है, जिससे कब्ज और पेट के फूलने जैसी दिक्कतों से छुटकारा पाया जा सकता है। भुने हुए चने पाचन शक्ति को बढ़ाने और शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करने में फायदेमंद हैं।

Published / 2022-03-02 08:27:45
आठ मार्च से महंगे हो सकते हैं पेट्रोल-डीजल समेत घरेलू गैस सिलेंडर

एबीएन सेंट्रल डेस्क। रूस और यूक्रेन के बीच भीषण युद्ध का असर दिखने लगा है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि की है। कामर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में 105 रुपये का इजाफा हुआ है। वहीं, पांच किलो के रसोई गैस सिलेंडर छोटू के दाम भी 27 रुपये बढ़ गए। ऐसे में माना जा रहा है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद घरेलू गैस सिलेंडर के साथ पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ सकते हैं। बता दें आखिरी चरण का चुनाव 7 मार्च को है। एक मार्च से हुई बढ़ोतरी के बाद राजधानी दिल्ली में कामर्शियल सिलेंडर की कीमत 1907 से बढ़कर 2012 रुपये प्रति सिलेंडर हो गई है। वहीं, पांच किलो के छोटे गैस सिलेंडर के दाम 27 रुपये बढ़कर 569.5 रुपये हो गई है। कंपनियों ने घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं है। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत छह अक्तूबर 2021 के बाद स्थिर हैं। ऐसे में चुनाव के बाद दाम बढ़ सकते हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमत भी पिछले कई माह से स्थिर हैं। केंद्र सरकार ने तीन नवंबर 2021 को उत्पाद शुल्क में पेट्रोल पर पांच और डीजल पर दस रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। इसके बाद कई राज्य सरकारों ने भी अपना टैक्स कम किया था। उस वक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम औसतन 82 डॉलर प्रति बैरल थे। रूस और यूक्रेन की लड़ाई में कच्चे तेल 104 डॉलर के पार पहुंच गया है। कच्चे तेल की कीमतों में जल्द कमी के आसार नहीं है। इसका कारण यह है कि अमेरिका के आग्रह के बावजूद सबसे बड़े उत्पादक सऊदी अरब ने अपना उत्पादन नहीं बढ़ाया है। ऐसे में कच्चे तेल के दाम में फिल्हाल कमी की संभावना कम है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी के एक अधिकारी के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से कंपनियां दबाव में हैं। ऐसे में जल्द पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं।

Published / 2022-03-01 09:46:44
आखिर कैलाश पर्वत पर क्यों नहीं चढ़ पाते हैं लोग, जानें कारण...

एबीएन डेस्क। हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत का बहुत महत्व है; क्योंकि यह भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। लेकिन इसमें सोचने वाली बात ये है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को अभी तक 7000 से ज्यादा लोग फतह कर चुके हैं, जिसकी ऊंचाई 8848 मीटर है। लेकिन कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया, जबकि इसकी ऊंचाई एवरेस्ट से लगभग 2000 मीटर कम यानी 6638 मीटर है। यह अब तक रहस्य ही बना हुआ है। कैलाश पर्वत पर कभी किसी के नहीं चढ़ पाने के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कैलाश पर्वत पर शिव जी निवास करते हैं और इसीलिए कोई जीवित इंसान वहां ऊपर नहीं पहुंच सकता। मरने के बाद या वह जिसने कभी कोई पाप न किया हो, केवल वही कैलाश फतह कर सकता है। ऐसा भी माना जाता है कि कैलाश पर्वत पर थोड़ा सा ऊपर चढ़ते ही व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है। चूंकि बिना दिशा के चढ़ाई करना मतलब मौत को दावत देना है। इसीलिए कोई भी इंसान आज तक कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पर्वतारोही ने अपनी किताब में लिखा था कि उसने कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर्वत पर रहना असंभव था। क्योंकि वहां शरीर के बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव भी है। इसके अलावा कहते हैं कि कैलाश पर्वत का स्लोप (कोण) भी 65 डिग्री से ज्यादा है, जबकि माउंट एवरेस्ट में यह 40-60 तक है, जो इसकी चढ़ाई को और मुश्किल बनाता है। ये भी एक वजह है कि पर्वतारोही एवरेस्ट पर तो चढ़ जाते हैं, लेकिन कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाते। रूस के एक पर्वतारोही, सरगे सिस्टियाकोव ने बताया कि जब मैं कैलाश पर्वत के बिल्कुल पास पहुंच गया तो मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। मैं उस पर्वत के बिल्कुल सामने था, जिस पर आज तक कोई नहीं चढ़ सका, लेकिन अचानक मुझे बहुत कमजोरी महसूस होने लगी और मन में ये ख्याल आने लगा कि मुझे यहां और नहीं रुकना चाहिए। उसके बाद जैसे-जैसे मैं नीचे आते गया, मेरा मन हल्का होता गया। कैलाश पर्वत पर चढ़ने की आखिरी कोशिश लगभग 18 साल पहले यानी साल 2001 में की गई थी। जब चीन ने स्पेन की एक टीम को कैलाश पर्वत पर चढ़ने की अनुमति दी थी। फिलहाल कैलाश पर्वत की चढ़ाई पर पूरी तरह से रोक लगी हुई है, क्योंकि भारत और तिब्बत समेत दुनियाभर के लोगों का मानना है कि यह पर्वत एक पवित्र स्थान है, इसलिए इस पर किसी को भी चढ़ाई नहीं करने देना चाहिए। हालांकि कहते हैं कि 92 साल पहले यानी साल 1928 में एक बौद्ध भिक्षु मिलारेपा ही कैलाश पर्वत की तलहटी में जाने और उस पर चढ़ने में सफल रहे थे। वह इस पवित्र और रहस्यमयी पर्वत पर जाकर जिंदा वापस लौटने वाले दुनिया के पहले इंसान थे। इसका उल्लेख पौराणिक साहित्यों में भी मिलता है।

Published / 2022-03-01 09:34:10
अध्ययन : वुहान के बाजार में जानवरों में हुई थी कोरोना की उत्पत्ति

एबीएन सेंट्रल डेस्क। दो नए अध्ययनों से यह संकेत मिलते हैं कि कोविड-19 का कारक सार्स-सीओवी-2 वायरस की उत्पत्ति वुहान के हुआनान सीफूड मार्केट में जानवरों में हुई और 2019 के अंत में इसका प्रसार इंसानों में हुआ। पहला अध्ययन में यह दिखाने के लिए स्थानिक विश्लेषण का उपयोग किया गया कि दिसंबर 2019 में सबसे शुरू में कोविड-19 के जिन मामलों का उपचार किया गया वे वुहान के बाजार पर केंद्रित थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि वायरस के लिए सकारात्मक परीक्षण करने वाले पर्यावरणीय नमूने जीवित जानवरों को बेचने वाले विक्रेताओं से दृढ़ता से जुड़े थे। अमेरिका स्थित एरिजोना विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर माइकल वोरोबे ने ट्वीट किया, हमने दिसंबर 2019 में लक्षण की शुरुआत के साथ वुहान से अधिकांश ज्ञात कोविड-19 मामलों के लिए अक्षांश और देशांतर निकालने के लिए सार्स-सीओवी-2 की उत्पत्ति पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) मिशन की रिपोर्ट में मानचित्रों का उपयोग किया। दोनों ही शोध पत्रों के लेखक वोरोबे ने कहा, हमने पाया कि दिसंबर में मामले हुआनान बाजार के करीब और अधिक केंद्रित थे, जितना कि उम्मीद की जा सकती थी ... इसका केंद्र बाजार में था। एक दूसरे अध्ययन में पाया गया कि दो प्रमुख वायरल वंशावली कम से कम दो घटनाओं की परिणाम थीं जिनमें वायरस जानवरों से मनुष्यों में आया। शोधकर्ताओं ने कहा कि पहला संचरण सबसे अधिक नवंबर के अंत या दिसंबर 2019 की शुरुआत में हुआ था, और दूसरी वंशावली संभवतः पहली घटना के हफ्तों के अंदर आ गई। उन्होंने कहा कि ये निष्कर्ष उस छोटे दायरे को परिभाषित करते हैं जब सार्स-सीओवी-2 ने पहली बार मनुष्यों को संक्रमित किया और जब कोविड-19 के पहले मामले सामने आए। लेखकों ने दूसरे शोधपत्र में लिखा, 2002 में सार्स-सीओवी-1 और 2003 में सार्स-सीओवी-2 में उभार संभवत: कई "जूनोटिक" (पशुजन्य) घटनाओं के परिणामस्वरूप हुआ। इन शोधपत्रों की हालांकि अभी विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जानी बाकी है। इनमें यह पहचान स्पष्ट नहीं हुई है कि बाजार में किस जानवर से इस संक्रमण का प्रसार इंसानों में हुआ।

Published / 2022-02-28 15:25:07
दुमका : शिवरात्रि को लेकर बासुकीनाथ मंदिर में कल होगी भव्य पूजा

टीम एबीएन, दुमका। मंगलवार को महाशिवरात्रि है। इसको लेकर झारखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल बासुकीनाथ मंदिर में सारी तैयारियां पूरी कर ली गई है। शिवरात्रि के दिन मंदिर परिसर में भव्य पूजा का आयोजन किया जाएगा। लेकिन सोमवार से ही झारखंड और आसपास के राज्यों से श्रद्धालु मंदिर पहुंचने लगे हैं। परंपरा के अनुसार मंदिर के शिखर पर स्थित पंचशूल को उतारा गया है। इस पंचशूल की विधिवत पूजा अर्चना की जाएगी और शिवरात्रि के दिन पंचशूल को फिर से मंदिर के शीर्ष पर स्थापित किया जाएगा। इसके साथ ही शिव मंदिर और पार्वती मंदिर को गठबंधन के जरिए जोड़ा गया है। इस गठबंधन को भी खोल दिया गया है और शिवरात्रि के दिन पूजा अर्चना कर इस गठबंधन को दोबारा जोड़ा जाएगा। बा की बारात निकलेगी। गौरतलब है कि प्रतिवर्ष हाथी में बाबा की बारात निकलती थी। लेकिन इस साल कोरोना को देखते हुए पालकी में बारात निकाली जाएगी। बासुकीनाथ पंडा धर्मरक्षिणी सभा के महामंत्री संजय झा कहते हैं कि हमलोग काफी उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि परंपरागत और धार्मिक नियमों का पालन करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती की शादी होगी। बासुकीनाथ मंदिर के प्रभारी आशुतोष झा ने बताया कि कोरोना गाइडलाइन के अनुसार बारात निकाली जाए गी। इसके साथ ही सुरक्षा के चाक-चौबंद व्यवस्था की गई है। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि को लेकर मंदिर और आसपास के इलाकों में पुख्ता साफ सफाई की गई है, ताकि आने वाले भक्तों को असुविधा नहीं हो सके।

Published / 2022-02-28 06:32:31
सभी प्रकार की उपासना हमें जोड़ती है : दिलीप

टीम एबीएन, रांची। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रांची महानगर ने मेट्रो गली रातू रोड गुरुद्वारा में श्री गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश वर्ष मनाया। कार्यक्रम की शुरुआत गुरुवाणी के साथ हुई।सर्वप्रथम मनीष मीढा ने गुरु तेग बहादुर जी के गौरवशाली इतिहास के विषय में बताया कि हमारे देश के शिक्षण संस्थानों में वास्तविक भारतीय इतिहास को नहीं पढ़ा करके षड्यंत्र के तहत अन्य इतिहास पढ़ाया जा रहा है। जिससे हमारी आनेवाली पीढ़ी वीर शिवाजी और गुरु तेग बहादुर जी जैसे धर्म योद्धाओं के इतिहास से परिचित न हो और उनकी तरह वीर ना बन पाये। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के झारखण्ड प्रांत प्रचारक श्रीमान दिलीप जी ने श्री गुरु के गौरवशाली इतिहास को सबके समक्ष रखा। उन्होंने बताया कि भारत देश के अन्यत्र विश्व में कहीं भी अपने धर्म के लिए प्राण देने का इतिहास कहीं नहीं मिलता। जिस प्रकार से सिख धर्म के चार साहबजादों ने बचपन में ही अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान दिया था, वह अतुलनीय है। उन्होंने गीत के माध्यम से सिख धर्म गुरुओं के द्वारा हिंदू समाज के संरक्षण के लिए किए गए अतुलनीय बलिदान का भी स्मरण कराया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भारत पर मुगलों ने हिंदुओं पर अत्याचार किया, जिसकी रक्षा के लिए सिख धर्म के धर्म गुरु उनके समक्ष हिंदू धर्म की ढाल बनकर के खड़े रहे। उन्होंने बताया कि सिख गुरु के बलिदान के समय की स्थिति आज भी प्रासंगिक जान पड़ती है। आज भी समाज में धर्मांतरण के लिए अनेक शक्तियां लगी हुई है। गुरु तेग बहादुर जी ने समाज के लिए कार्य करने की शिक्षा दी थी। उन्होंने कहा कि भारत में जन्मे जितने भी पंत- संप्रदाय हैं वह सभी एक ही ईश्वर की प्राप्ति के लिए उपासना करते हैं। उन्होंने दिल्ली के शीश गंज गुरुद्वारा में सभी को जाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता भारत की दुर्बलता नहीं बल्कि भारत की शक्ति है। यही भारत का सौंदर्य है। अंत में अतिथियों को सराफा देकर सम्मानित किया गया। "जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल" के जयघोष से पूरा कार्यक्रम स्थल गूंज उठा। मौके पर श्री गुरु सिंह सभा से श्री अर्जन जी, श्री गगनदीप सिंह सेठी, श्री मनीष मिढा एवं संघ के क्षेत्र संघचालक श्री देवब्रत पाहन, श्री राकेश लाल, श्री पवन मंत्री, श्री धनन्जय कु सिंह, हरविंदर सिंह वेदी, गुरविंदर सिंह सेठी, राजेन्द्र मिश्र, शालिनी सचदेव, प्रीति सिंह, जिज्ञासा ओझा, डॉ अनुराधा, डॉ सतीश मिढा, पंकज वत्सल, डॉ उमाशंकर, श्रवण कुमार, नवजोत सिंह अलंग सहित इस पावन अवसर पर सैकड़ों हिन्दू सनातन सिख परिवारों की उपस्थिति रही।

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