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Published / 2022-03-12 13:35:02
चालीस दिनों तक व्रज में चलने वाला होली महोत्सव शुरू

एबीएन डेस्क (जीवीएस शास्त्री)। चालीस दिनों तक चलने वाला ब्रज होली महोत्सव शुरू हो चुका है। इसी के साथ होली के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए देश और दुनिया से श्रद्धालु मथुरा पहुंचने लगे हैं। ब्रज में बसंत पंचमी पर होली का ढांडा गढ़ने के साथ ही ब्रज के लगभग सभी मंदिरों में होली महोत्सव की शुरूआत हो जाती है। यहां हम आपको पूरे कार्यक्रम के बारे में बता रहे हैं। समाज गायन की परंपरा : देश-विदेश में विख्यात ब्रज की होली में समाज गायन विशेष स्थान रखता है, जिसमें होली गीत और पद गायन की अनूठी परंपरा है। इसमें पारंपरिक अंदाज में ठाकुरजी के समक्ष ब्रजवासी-सेवायत ब्रजभाषा में होली पदों का गायन करते हैं। समाज गायन की शुरूआत भी ब्रज के मंदिरों विशेषरूप से बरसाना स्थित श्रीजी मंदिर में बसंत पंचमी से हो जाती है। गुरुवार को श्रीजी मंदिर में पड़ गायन के बाद सेवायत गोस्वामीजनों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाया। गोकुल स्थित गुरु शरणानंदजी महाराज के महावन रमणरेती आश्रम में हर साल पारंपरिक होली का आयोजन किया जाता है। इसमें टेसूके फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। बरसाना में लड्डू होली : मथुरा के बरसाना में लड्डू होली धूमधाम से मनाई जाती है। यह बरसाना की विश्व विख्यात लठ्ठमार होली से एक दिन पहले लाडली मंदिर में मनाई जाती है। इस बार लड्डू होली का आयोजन 03 मार्च 2020 को किया गया। बरसाना में लट्ठमार होली के अगले दिन नंदगांव में लट्ठमार होली खेली जाती है। इस बार यह आयोजन 05 मार्च को हुआ। श्रीकृष्ण जन्मस्थान में लट्ठमार होली : बरसाना और नंदगांव में लट्ठमार होली के बाद रंगभरनी एकादशी के दिन श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर होली मनाई जाती है। इस दिन ब्रज में देश-विदेशी भक्तों के साथ पूरा मथुरा यहां जुटता है। इस बार यह आयोजन 6 मार्च को हुआ। गोकुल में छड़ीमार होली : भगवान कृष्ण के गांव गोकुल में छड़ीमार होली खेली जाती है। गोकुल में श्रीकृष्ण बाल रूप में रहे थे इसलिए यहां लाठी के बजाए छड़ी होली जाती है, ताकि उन्हें ज्यादा चोट न लगे। इस बार 7 मार्च 2020 को गोकुल में इसका आयोजन किया जाएगा। दाऊजी का हुरंगा : दाऊजी का हुरंगा मथुरा के दाऊजी मंदिर में आयोजित होता है। यह मंदिर प्रसिद्ध बलदेव गांव में स्थित है। इसका आयोजन ब्रज के राजा बलदेव (दाऊजी) के आंगन में किया जाता है। इस बार इसका आयोजन 11 मार्च 2020 को किया जाएगा। लोक मान्यतानुसार बरसाना की लठमार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं की पुनरावृत्ति जैसी है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधारानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे तथा उनके साथ हंसी- ठिठोली करते थे जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गया। यही कारण है कि आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है। नाचते - झूमते गाते गांव में पहुंचने वाले लोगों को औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते भागते हैं। सब मारना पीटना हंसी -खुशी के वातावरण में होता है। औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं, लेकिन शेष आस- पास खड़े लोग बीच -बीच में रंग बरसाते हुए दिखाई देते हैं। बरसाने में टेसू के फूलों के भगोने तैयार रहते हैं। दोपहर तक घमासान लठमार होली का समां बंध चुका होता है। नंदगांव के लोगों के हाथ में पिचकारियां और बरसाने की महिलाओं के हाथ में लाठियां होती हैं और फिर शुरू हो जाती है होली।

Published / 2022-03-11 06:09:11
अप्रैल से शुरू होगा अमरनाथ यात्रा के लिए पंजीकरण

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमरनाथ यात्रा के लिए अप्रैल से तीर्थयात्रियों का ऑनलाइन पंजीकरण शुरू होगा। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड (एसएएसबी) ने बृहस्पतिवार रात यह घोषणा की। श्राइन बोर्ड ने अप्रैल से ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से यात्रा के लिए तीर्थयात्रियों का पंजीकरण शुरू करने की घोषणा करते हुए कहा कि दक्षिण कश्मीर के हिमालयी क्षेत्र के तीर्थस्थल में तीर्थयात्रियों की आवाजाही के लिए आरएफआईडी आधारित ट्रैकिंग की जाएगी। एसएएसबी के अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) राहुल सिंह ने जम्मू संभागीय आयुक्त राघव लैंगर की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान आगामी यात्रा के लिए व्यवस्था की समीक्षा करने के दौरान कहा, अमरनाथ यात्रा के लिए ऑनलाइन पंजीकरण अप्रैल 2022 के महीने में 20,000 पंजीकरण प्रति दिन की सीमा के साथ शुरू होगा। उन्होंने कहा कि यात्रा के दिनों में निर्धारित काउंटर पर ऑन स्पॉट (तत्काल) पंजीकरण भी किए जाएंगे। राहुल सिंह ने कहा कि अमरनाथ तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बोर्ड ने इस साल की तीर्थ यात्रा के दौरान वाहनों और तीर्थयात्रियों की आवाजाही पर नज़र रखने को लेकर रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) का उपयोग करने का निर्णय लिया है।

Published / 2022-03-09 17:49:14
धूम्रपान छोड़ने से भारी परेशानी हो जाती है, जानिए इसका सच...

एबीएन सोशल डेस्क। क्या स्मोकिंग छोड़ने के बाद वजन इतना बढ़ जाता है कि चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है, क्या इंसान डिप्रेशन से जूझने लगता है या परमानेंट खांसी की समस्या हो जाती है? स्मोकिंग छोड़ने को लेकर ऐसे कई भ्रम प्रचलित हैं, लेकिन इसका सच कुछ और ही है। आज नो-स्मोकिंग डे है। हर साल मार्च के दूसरे बुधवार को यह दिन सेलिब्रेट किया जाता है। इसे मनाने का लक्ष्य धूम्रपान रोकने के लिए लोगों को जागरुक करना है। इस मौके पर जानिए स्मोकिंग छोड़ने को लेकर सबसे ज्यादा प्रचलित भ्रम और उनकी सच्चाई… भ्रम : क्या स्मोकिंग छोड़ने के बाद वजन बढ़ने से चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है? सच : यह सबसे कॉमन भ्रम है। इस पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ का कहना है, स्मोकिंग छोड़ने के बाद थोड़ा वजन बढ़ता है, लेकिन इसे कंट्रोल भी किया जाता है। वजन इतना नहीं बढ़ता है कि चलने-फिरने में दिक्कत हो। एवरीडे हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, धूम्रपान छोड़ने के बाद जो वजन बढ़ता है वो स्मोकिंग के असर के मुकाबले बुरा बिल्कुल नहीं है। भ्रम : धूम्रपान छोड़ने के बाद इंसान लम्बे समय के लिए डिप्रेशन में चला जाता है। सच : सायकोसोशल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर रॉबर्ट गार्डनर का कहना है, कुछ लोगों को लगता है कि स्मोकिंग छोड़ने के बाद मूड स्विंग की प्रॉब्लम होती है जो डिप्रेशन में बदल सकती है। रॉबर्ट का कहना है, अगर कोई इंसान पहले से ही डिप्रेशन से जूझ रहा है और स्मोकिंग छोड़ता है तब यह बढ़ सकता है। हालांकि इसका इलाज किया जाता है। सभी मामलों में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं। भ्रम : धूम्रपान छोड़ने पर अनियंत्रित खांसी की समस्या हो जाती है। सच : विशेषज्ञ कहते हैं, यह भी लोगों के बीच एक प्रचलित भ्रम है। वो मानते हैं कि स्मोकिंग छोड़ने पर उन्हें लगातार खांसी की समस्या से जूझना पड़ेगा। लेकिन इसमें बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है। भ्रम : सिगरेट छोड़कर ई-सिगरेट पीना सुरक्षित है। सच : विशेषज्ञ कहते हैं, ज्यादातर लोगों को यही लगता है, लेकिन इस बात में बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है। अमेरिकी डॉक्टर्स ने यह पाया है कि ई-सिगरेट में ऐसे केमिकल और हैवी मेटल पाए जाते हैं जो सीधे फेफड़े तक पहुंचते हैं और इन्हें डैमेज करते हैं। इसलिए इसे सिगरेट छोड़ने का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। भ्रम : अलग तरह के फिल्टर स्मोकिंग के खतरे से बचा सकते हैं। सच : कई ऐसी सिगरेट हैं, जिन्हें लाइट सिगरेट की कैटेगरी में रखा जाता है। दावा किया जाता है कि इनमें फिल्टर, पेपर और ऐसी तम्बाकू का इस्तेमाल किया गया है जो फेफड़ों पर पड़ने वाले खतरों को कम करते हैं। इस तरह की लाइट सिगरेट पर रिसर्च की गई। रिसर्च में सामने आया कि ये बिल्कुल भी हेल्दी नहीं हैं और न ही खतरे को कम करती हैं।

Published / 2022-03-08 06:45:03
भारत के 80 फीसदी परिवार निजी मेडिकल की पढ़ाई में अक्षम

एबीएन सोशल डेस्क। यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद भारत में मेडिकल शिक्षा प्रणाली को लेकर सवाल उठने लगे हैं। खास कर निजी मेडिकल कॉलेजों को लेकर बहस छिड़ी हुई है, देश के निजी मेडकल कॉलेजों के द्वारा छात्रों से एमबीबीएस के कोर्स के लिए 80 लाख से एक करोड़ रुपए तक वसूल लिए जाते हैं, जिसकी वजह से बच्चे मेडिकल पढ़ाई के लिए रूस, यूक्रेन, बांग्लादेश, नेपाल, स्पेन, जर्मनी जैसे देशों की ओर रुख करते हैं। जहां महज 20 से 25 लाख रुपए तक में ही मेडिकल की पढ़ाई की जा सकती है। यूक्रेन में पढ़ाई करने गए छात्रों के युद्ध में फंसने के बाद अब इसी बहस के बीच देश में एमबीबीए को लेकर कई खुलासे हो रहे हैं। मेडिकल शिक्षा पर चढ़ी परतें अब एक -एक करके खुलने लगी हैं। एक मीडिया रिपार्ट में कहा गया है कि सरकारी कॉलेज में सीमित सीटों के कारण करीब देश के 80 फीसदी से अधिक परिवार ऐसे हैं जो अपने बच्चों की मेडिकल पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते हैं। एनआरआई सीटों से 5 हजार करोड़ फीस : रिपोर्ट के अनुसार देश में एमबीबीएस की कुल 90800 सीटों में सिर्फ आधी सीटों का लोग खर्च उठा सकते हैं। इसकी वजह है कि ये सीटों सरकारी मेडिकल कॉलेज में हैं। यदि निजी एमबीबीएस कॉलेजों में सरकारी कोटे की बात करें तो इनमें 200 ही ऐसी सीटें हैं ऐसी है जिसका खर्च लोग उठा सकते हैं, जबकि दूसरी ओर कॉलेज प्रबंधन एनआरआई सीटों से सालाना लगभग 5,000 करोड़ रुपये जुटाते हैं। रिपोर्ट में देश के 605 मेडिकल कॉलेजों में 568 कॉलेज में उपलब्ध कुल 90 हजार 800 सीटों में से 86340 सीटों की ट्यूशन फीस का विश्लेषण किया गया है। इस विश्लेषण में सामने आया कि देश के ग्रामीण इलाके जहां डॉक्टरों की बहुत अधिक कमी हैं, वहां सिर्फ एमबीबीएस की सिर्फ 40 फीसदी सीटें हैं। इनमें से अधिकतर सरकारी कॉलेजों में हैं। कुल खर्च का आधा मेडिकल पढ़ाई पर : राष्ट्रीय सांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार हम प्रति व्यक्ति सालाना खर्च को देखते हैं। देश में करीब 90 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इसमें देश की 80 फीसदी आबादी के सालाना खर्च और एमबीबीएस की सालाना फीस की तुलना की गई। इसमें परिवार के सालाना खर्च के आधी रकम को अफोर्डेबल फीस माना गया। हालांकि, यह कहना थोड़ा वास्तविकता से हटकर होगा की एक परिवार अपने कुल खर्च का आधा हिस्सा बच्चे की मेडिकल पढ़ाई पर लगा सकता है। हालांकि, ट्यूशन फीस के अलावा हॉस्टल चार्ज, मेस खर्च, एग्जाम फीस, यूनिवर्सिटी डेवलपमेंट फीस भी शामिल हैं। यह एक लाख से 3 लाख तक सालाना अधिक हो सकता है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में सस्ती व्यवस्था : महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में, निजी कॉलेजों में आरक्षित श्रेणी के छात्रों के लिए या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए निजी कॉलेजों में फीस का भुगतान आंशिक रूप से या पूरी तरह से सरकार द्वारा किया जाता है, जिससे इन सीटों का एक निश्चित अनुपात कुछ वर्गों के लिए सस्ता हो जाता है। इन उपायों के बिना निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस सीटें अनिवार्य रूप से भारत की 20 फीसदी से कम आबादी के लिए आरक्षित हैं। और निजी डीम्ड यूनिवर्सिटी सिटी मेडिकल कॉलेजों में सीटें, जो लगभग 8,500 सीटों या कुल सीटों का लगभग 10 फीसदी है। सबसे महंगे हैं गुजरात के सरकारी मेडिकल कॉलेज : गुजरात सरकारी कॉलेजों में सबसे महंगी एमबीबीएस सीटों वाला राज्य है। यहां अहमदाबाद और सूरत में ज्यादातर सरकारी-समाज संचालित कॉलेज नगर निगमों द्वारा चलाए जा रहे हैं। निजी कॉलेजों की तरह इनमें भी मैनेजमेंट और एनआरआई की सीटें हैं। इन कॉलेजों में सरकारी सीटों की सालाना फीस 3 लाख रुपये से लेकर 7.6 लाख रुपये तक है। गुजरात में 80 फीसदी से अधिक शहरी परिवारों का वार्षिक खर्च 3 लाख रुपये से कम है। पंजाब, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में सालाना फीस क्रमश: 1.8 लाख रुपये, 1.4 लाख रुपये और 1.1 लाख रुपये है। एम्स और उसके बाद बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे केंद्र सरकार के संस्थानों में फीस सबसे कम है। अधिकांश सरकारी कॉलेजों में वार्षिक शुल्क 6,500 रुपये से 9,000 रुपये तक है।

Published / 2022-03-07 17:43:10
महिला दिवस : अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में 200 महिलाओं ने दिखाई "शक्ति"

एबीएन डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय शोध एवं विकास सृजन संस्थान अमेरिका- भारत, टाईम्स इंडिया टीवी डाॅट काॅम एवं भारत माता अभिनंदन संगठन के तत्वावधान में रविवार को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन जूम पटल पर किया गया जिसमें 200 से अधिक विशिष्ट महिलाओं की भागीदारी रही। आई आई यू टी वी एवम यूनिवर्सिटी तथा आयोजन के सूत्रधार भारत माता अभिनंदन संगठन के डाॅ विजय कुमार सालवीय जो भारत माता संगठन के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक हैं ने देश विदेश से जुड़े प्रबुद्ध और अपने क्षेत्र में अग्रणी महिलाओं का स्वागत करते हुए कहा कि जहां महिलाओं को देवी स्वरूप में पूजा जाता है वहीं देवताओं का निवास होता है। आस्ट्रेलिया से जुड़ी शिक्षाविद डाॅ टेस मार्टिन ने कहा कि भारत की महिलाओं में एक दैवी शक्ति है, वो हर क्षेत्र में भारत का नेतृत्व कर रही हैं। डाॅ पुरुषोत्तम दास मित्तल जिन्होंने भारत माता संगठन को स्थापित किया ने भारत की उन सभी महिलाओं जो कि किसी ना माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं का विवरण दिया। उन्होंने डाॅ विजय कुमार सालवीय के प्रयास को सराहनीय बताते हुए कहा कि महिलाओं को एक अंतर्राष्ट्रीय मंच देकर उन्होंने महिला की सहभागिता को बनाया है। कार्यक्रम में नीरज कुमार, संजय ताम्रकार, रवि यादव आदि उपस्थित थे। सम्मान समारोह का संचालन का डाॅ माधवी वोरसे ने अपने अद्भुत वक्तृत्व कला से किया, जो कि एक शिक्षक तथा स्पोकन इंग्लिश इंस्टीट्यूट की स्थापित करता है। उन्होंने सर्वप्रथम रितु गर्ग जो कि भारत माता अभिनंदन संगठन के नेशनल इंचार्ज हैं को आमंत्रित किया, जिन्होंने महिलाओं को जागृत करते हुए यह बताया कि 2018 से वह भारत माता संगठन से जुड़ी और पहले जिला स्तर पर फिर राज्य स्तर पर तथा आज राष्ट्र स्तर पर वह पहुंची हैं। वर्तमान समय में वह उत्कृष्ट लेखिका है। कार्यक्रम में पद्म जैन भक्तामर, डॉ तनुजा तनु, अदिति नेगी, मोनिका चोपड़ा, आशा पाण्डेय, कल्पना दीक्षित, झारखंड से श्वेता श्रीवास्तव, डायटिशीयन सुप्रिया रानी एवं शिक्षाविद देवेश कुमार देव, डाॅ शैली बिष्ट, रचना वेवेल, अंशु तिवारी, इंजीनियर सोनेशा भारद्वाज, वीणा आडवाणी, भावना तिवारी, डाॅ पल्लवी वसुधा विश्वास समेत कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, पोलेंड, आस्ट्रेलिया जैसे अनेक देशों से विद्वतजन एवं विशेष रूप से महिलाऐं जुड़ी और अपने - अपने विचार साझा किए। डाॅ सालवीय ने देवेश कुमार देव को गिरिडीह जिले को सर्वोत्कृष्ट शिक्षक का सम्मान मिलने पर बधाई दी और भारत माता अभिनंदन सम्मान का सही हकदार बताया। कार्यक्रम की समाप्ति करते हुए डाॅ विजय कुमार सालवीय ने आशा व्यक्त की कि हम सभी मिलकर महिलाओं को सशक्त बनाएंगे।

Published / 2022-03-07 17:03:06
व्हिस्की का रंग गोल्डन ही क्यों? क्या ये नैचुरल है...

एबीएन सोशल डेस्क। आपने देखा होगा कि व्हिस्की, वोडका या बीयर अलग अलग तरीके की शराब होती है। यहां तक कि इनका रंग भी अलग होता है। जैस वोडका क्रिस्टल कलर की होती है तो व्हिस्की गोल्डन रंग की होती है। तो आज बात करते हैं व्हिस्की की। क्या आप जानते हैं व्हिस्की किस रंग की होती है और व्हिस्की के गोल्डन रंग के होने के बीच क्या कारण है और ये नैचुरल कलर होता है या फिर इसमें कलर मिलाया जाता है। जानते हैं इन सवालों के जवाब... व्हिस्की के गोल्डन कलर होने की एक अहम वजह है वुडन बैरल। यानी लकड़ी का एक ड्रम। जब भी व्हिस्की को बनाया जाता है तो यह पहले क्रिस्टल कलर यानी पानी जैसी होती है। लेकिन, इसे कई सालों तक इस वुडन बैरल में रखा जाता है, जिस वजह से इसका रंग बदल जाता है। इसी वजह से इसका रंग हल्की पीला होने लगता है. ऐसे में यह नैचुरल होता है। दरअसल, होता क्या है कि वुडन बैरल बनाते वक्त इसे हल्का टोस्ट किया जाता है, जिससे यह सॉफ्ट हो जाता है। ऐसे में जब सूरज की रोशनी इस पर पड़ती है तो लिकर इससे बाहर निकलने की कोशिश करती है और यह लकड़ी के अंदर घुस जाती है। इसके बाद रात में यह इससे बाहर निकलती है, जिससे टोस्ट की गई लकड़ी से लिकर का रंग गोल्डन होने लगता है। ऐसे में इसकी ज्यादा एज होती है, उतना ही लिकर का रंग ज्यादा गोल्डन होने लग जाता है। हालांकि, कई बार व्हिस्की के कलर के लिए केरेमल कलर का इस्तेमाल किया जाता है। कलर का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है, क्योंकि यह पूरी शराब के रंग को एक जैसा करने के लिए किया जाता है।

Published / 2022-03-06 17:05:35
साइकिल चलाकर महिलाओं ने दिया फिट रहने का संदेश

एबीएन सोशल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य पर ट्राईसिटी में साइकिलिंग कल्चर को प्रोत्साहन में देने जुटे साईकिलगिरी ग्रुप ने रविवार को महिलाओं के लिए फ्लोरल राइड का आयोजन किया। राइड के आयोजक डॉ सुनैना बंसल, अंकिता मदान और अक्षित पासी ने बताया कि इस अनूठी राइड को आयोजित करने का उद्देश्य ट्राईसिटी की महिलाओं को एक प्लेटफार्म पर लाकर न केवल उनके आत्मविश्वास को जागृत करना था। बल्कि उनमें साइकिलिंग के प्रति लगाव बढ़ाकर फिटनैस के लिए भी प्रेरित करना था। मेयर ने भी साइकिलिंग के मौके पर बतौर मुख्य अतिथि पहुंची मेयर सर्वजीत कौर ने आयोजकों के प्रयासों की सराहना की और उन्हें शहर में साइकिलिंग कल्चर को बढ़ावा देने के लिए नगर निगम द्वारा हर संभव सहायता देने का आश्वासन भी दिया। मेयर ने इस अवसर पर अन्य महिला साइकिल सवारों के साथ साइकिलिंग भी की। कार्यक्रम के दौरान जुम्बा डांस और भंगड़ा भी किया गया। चंडीगढ़ पुलिस ने अपनी महिलाकर्मी स्टाफ द्वारा सैल्फ डिफैंस पर एक सत्र का भी आयोजन किया जिसमें महिलाओं में आत्म सुरक्षा के गुर सीखे। अक्षित पासी ने बताया कि इस आयोजन से एकत्रित हुई राशि सोहाना स्थित अपने फाऊंडेशन के अनाथ बच्चों के लिए स्पोर्ट्स किट में खर्च किए जाएंगे।

Published / 2022-03-06 10:47:14
ताजमहल में मुगल बादशाह शाहजहां ने मकराना का "सफेद मार्बल" ही क्यों लगवाया...

एबीएन सोशल डेस्क। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल अपनी खास तरह की खूबसूरती के लिए जाना जाता है। ताजमहल में लगे सफेद पत्थर इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। चांद की रोशनी जब ताजमहल पर पड़ती है तो यह चमक उठता है। इसकी खूबसूरती का दीदार करने के लिए दुनियाभर से लोग आगरा पहुंचते हैं। पर आपने कभी सोचा है कि ताजमहल को बनाने के लिए सफेद मार्बल का ही इस्तेमाल क्यों किया गया है। इसे बनाने के लिए मकराना के सफेद मार्बल का इस्तेमाल किया गया है। इसकी भी एक खास वजह है। ताजमहल में सफेद पत्थरों का इस्तेमाल क्यों किया गया है, इसकी क्या खास वजह है, जानिए, इन सवालों के जवाब… हिस्ट्रीहिट की रिपोर्ट कहती है, ताजमहल में इस्तेमाल हुए सफेद मार्बल का खास महत्व है। इसे जिस दौर में बनाया गया है। उस समय सफेद पत्थरों का इस्तेमाल कुछ चुनिंदा जगहों के लिए ही किया जाता था। मुगल काल में निर्माण होने वाली हर चीज की अपनी खासियत होती थी। मुगल काल में सबसे ज्यादा दो तरह के पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता था- लाल और सफेद। लाल पत्थरों का इस्तेमाल महलों या उस दौर की इमारतों को बनाने में किया जाता था, लेकिन सफेद पत्थर का इस्तेमाल चुनिंदा जगहों के लिए ही किया जाता था। ऐसे मार्बल को पवित्र स्थानों के लिए रिजर्व रखा जाता था। इनका इस्तेमाल मकबरा, कब्र, समाधि जैसी जगहों के लिए किया जाता था। इसलिए ताजमहल के लिए सफेद मार्बल का इस्तेमाल किया गया। सुबह गुलाबी, दिन में सफेद और रात में सुनहरा दिखता है। इस मार्बल एक खासियत और भी है। वो है इनका रंग। सफेद होने के बावजूद ये मार्बल ताजमहल को अलग-अलग रंगों में दिखाता है। जैसे- अलसुबह यह गुलाबी नजर आता है। दिनभर यह सफेद दिखता है और रात में चंद्रमा की रोशनी में यह सुनहरा नजर आता है। शाहजहां ने इसलिए बनवाया ताजमहल : यूं तो शाहजहां का नाम कई महिलाओं के साथ जोड़ा गया, लेकिन वो वास्तव में सबसे ज्यादा प्यार मुमताज महल से ही करते थे। जब तक उनकी पत्नी मुमताज महल जीवित रहीं, वो पूरी तरह से उनके प्रति समर्पित थे, यहां तक कि उनकी दूसरी पत्नियों की उनके निजी जीवन में बहुत कम जगह थी। शाहजहां के दरबारी इतिहासकार इनायत खां ने अपनी किताब में लिखा है कि शाहजहां मुमताज के बगैर नहीं रह सकते थे। ताजमहल बनवाने के पीछे वो सपना था जिसे मुमताज ने देखा था। शाहजहां के गद्दी संभालने के 4 साल के अंदर मुमताज का निधन हो गया था। निधन से पहले अंतिम क्षणों में मुमताज ने बादशाह से कहा था कि उन्होंने सपने में एक ऐसा सुंदर महल और बाग देखा वैसा दुनिया में कहीं नहीं है। मेरी आपसे गुजारिश है कि आप मेरी याद में ऐसा ही एक मकबरा बनवाएं। इसके बाद ही ताजमहल की नींव पड़ी थी।

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