एबीएन सोशल डेस्क। इस साल नोबेल शांति पुरस्कार 2022 एक व्यक्ति और दो संगठनों को दिया गया है। बेलारूस के ह्यूमन राइट्स वकील एलेस बियालियात्स्की को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है। नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में इस पुरस्कार का एलान किया गया। एलेस बियालियात्स्की के अलावा रशियन ह्यमून राइट्स आॅर्गनाइजेशन मेमोरियल और यूक्रेनियन ह्यूमन राइट्स आॅर्गनाइजेशन सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज को ये पुरस्कार मिला है। ये दोनों संस्थान मानवाधिकार के लिए काम करते हैं। कौन हैं आलिस बियालियात्स्की : बियालियात्स्की ने 1980 में बेलारूस की तानाशाही के खिलाफ डेमोक्रेसी मूवमेंट का आगाज किया था। वो आज तक अपने ही देश में सच्चा लोकतंत्र बहाल करने की जंग लड़ रहे हैं। रूस-यूक्रेन जंग में बेलारूस के राष्ट्रपति लुकाशेंको व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े हैं और सख्त तानाशाह माने जाते हैं। बियालियात्स्की ने विसाना नाम का संगठन तैयार किया है। यह संगठन जेल में बंद लोकतंत्र समर्थकों को कानूनी मदद मुहैया कराता है। 2011 से 2014 तक बियालियात्स्की जेल में रहे। 2020 में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और अब तक जेल में हैं। 14 जुलाई, 2021 से वह कथित कर चोरी के आरोप में जेल में बंद है। मानवाधिकार रक्षक इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित मानते हैं। बियालियात्स्की बेलारूसी साहित्य के विद्वान हैं और उन्होंने 1984 में होमील स्टेट यूनिवर्सिटी से रूसी और बेलारूसी भाषाशास्त्र में डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपने छात्र दिनों के दौरान बियालियात्स्की कई लोगों से मिले, जो बाद में प्रसिद्ध लेखक बन गए, जिनमें अनातोल सिस, एडुआर्ड अकुलिन, सियारजुक सिस और अनातोल काजलौ शामिल थे। स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद बियालियात्स्की ने लिजीसी जिला, होमिएन क्षेत्र में एक स्कूली शिक्षक के रूप में काम किया। 1985-1986 में उन्होंने येकातेरिनबर्ग (तब सेवरडलोव्स्क), रूस के पास एक एंटीटैंक आर्टिलरी बैटरी में एक बख्तरबंद वाहन चालक के रूप में सेना में नौकरी की। इन दो संगठनों को मिला शांति पुरस्कार : रूस का ह्यूमन राइट्स आॅर्गनाइजेशन मेमोरियल 1987 में सोवियत संघ के दौर में बना था। इसके फाउंडर मेंबर्स में नोबेल पीस प्राइज विजेता एंद्रेई सखारोव और ह्यूमन राइट्स वकील स्वेतलाना गनुशकिना भी थे। 90 के दशक में सोवियत संघ के 15 हिस्सों में बिखरने के बाद यह रूस का सबसे बड़ा मानवाधिकार संगठन बना। इसने स्टालिन के दौर से अब तक राजनैतिक कैदियों के लिए आवाज उठाई। रूस ने जब चेचेन्या पर हमला किया और 2009 में इस संगठन की नतालिया एस्तेमिरोवा मारी गईं तो इस संगठन ने विश्व स्तर पर आवाज उठाई और चर्चा में रही। रूसी सरकार इसे विदेशी जासूसों का संगठन बताती है। सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज का गठन यूक्रेन की राजधानी कीव में 2007 में हुआ था। इसका मकसद यूक्रेन में लोकतंत्र को मजबूत करना था। इस संगठन का कहना है कि यूक्रेन में अब भी सही मायनों में लोकतंत्र मौजूद नहीं है। इस संगठन की मांग है कि यूक्रेन को इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट का हिस्सा बनना चाहिए। इसी साल फरवरी में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो इस संगठन ने वॉर क्राइम के मामलों की जांच की। अब यह मामले इंटरनेशनल कोर्ट में दायर किए जा रहे हैं। बता दें कि नोबेल वीक तीन अक्टूबर को शुरू हुआ था और 10 अक्टूबर तक चलेगा। सात दिन में कुल छह पुरस्कारों की घोषणी होती है। सबसे आखिर में आर्थिक श्रेणी में नोबेल पुरस्कार का एलान किया जाता है। इस सप्ताह सिर्फ पुरस्कार जीतने वाले व्यक्ति या संस्थान के नामों का ऐलान होगा। दिसंबर में इन्हें पुरस्कार दिए जाएंगे। कोविड-19 की वजह से 2020-21 के विजेता स्टॉकहोम नहीं पहुंच पाए थे। कमेटी ने इस बार इन दो साल के विजेताओं को भी स्टॉकहोम में आमंत्रित किया है।
टीम एबीएन, हजारीबाग। भारतीय नाई समाज की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक जवाहर नेहरू यूथ सेंटर, दिल्ली में आठ और नौ अक्टूबर को होने वाली है। इसमें पूरे भारत से समाज के पदाधिकारी, सक्रिय सदस्य भाग लेंगे। इसी कड़ी में झारखंड प्रदेश अध्यक्ष सुरेश ठाकुर इस बैठक में भाग लेने हजारीबाग से दिल्ली के लिए रवाना हुए। इस बैठक में जननायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग केंद्र सरकार से किया जायेगी। समाज के सभी तपके के लोगों का उत्थान कैसे हो, इस पर विचार विमर्श किया जायेगा। साथ ही समाज को दहेजमुक्त बनाने पर रणनीति बनाई जायेगी। साथ ही समाज में मृत्यु भोज जैसी कुरीतियों को बंद करने पर विचार विमर्श किया जायेगा और इसके साथ पूरे भारत में बिखरे समाज को एक मंच पर लाने पर रणनीति बनाई जायेगी। भारतीय नाई समाज का नीति और सिद्धांत को समाज का जन-जन तक पहुंचे पर दिशा निर्देश जारी होगा। सारे पहलू पर गहन विचार विमर्श कर समाज को एक नई दिशा प्रदान करना है।
टीम एबीएन विष्णुगढ़ (हजारीबाग)। वन पर्यावरण रक्षा समिति बनासो एवं चानो के उपाध्यक्ष सुरेश राम जो 40% हैंडीकैप्ड है, जो बीते 7 सितंबर को वन पर्यावरण मेला में शरीक होकर 14वीं वर्षगांठ मनायी। लोगों में वन एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु जागरूकता लाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहे है। विदित हो कि दूध मटिया में झारखंड राज्य स्तरीय मेला प्रत्येक वर्ष आयोजित की जाती है। जिसे लेकर हजारीबाग से टाटीझरिया के दूधमटिया साइकिल यात्रा कर पहुंचे। कार्यक्रम में टाटीझरिया के वन प्रेमीयों द्वारा ढोल मजीरे साथ लोक गीत गायन कर कर लोगों को वन के प्रति जागरूक किया। वहीं पत्ते और पुष्प से जल छिड़क कर आगंतुक लोगों को स्वागत किया गाया। कार्यक्रम में दिनेश खंडालवाल, मुरारी सिंह, और सत्य प्रकाश शामिल थे।
एबीएन सोशल डेस्क। साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार का ऐलान कर दिया गया है। फ्रांसीसी लेखक एनी एरनॉक्स को नोबेल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में गुरुवार को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए एनी एरनॉक्स के नाम की घोषणा की गई। नोबेल समिति ने कहा कि एरनॉक्स (82) के नाम की घोषणा, साहस और लाक्षणिक तीक्ष्णता के साथ व्यक्तिगत स्मृति के अंतस, व्यवस्थाओं और सामूहिक बाधाओं को उजागर करने वाली उनकी लेखनी के लिये की जाती है। एनी एरनॉक्स को इससे पहले बुकर प्राइज से भी नवाजा जा चुका है। पुरस्कार के ऐलान से पहले मुंबई में जन्मे लेखक सलमान रुश्दी को साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने के लिए पसंदीदा दावेदारों में से एक बताया जा रहा था। सैटेनिक वर्सेज के लेखक सलमान रुश्दी पर इस साल अगस्त में पश्चिमी न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम में चाकू से हमला किया गया था। एक सितंबर 1940 को जन्मी ऐनी एरनॉक्स एक फ्रांसीसी लेखक और साहित्य की प्रोफेसर हैं। उन्होंने अपने साहित्यिक करियर की शुरुआत 1974 में एक आत्मकथात्मक उपन्यास लेस आर्मोइरेस वाइड्स से की थी। 1984 में, उन्होंने अपनी एक अन्य आत्मकथात्मक रचना ला प्लेस के लिए रेनाडॉट पुरस्कार जीता। यह वो आत्मकथात्मक उपन्यास था जो उनके पिता के साथ उनके संबंधों और फ्रांस के एक छोटे से शहर में बड़े होने के उनके अनुभवों और आगे बढ़ने की उनकी प्रक्रिया पर केंद्रित थी। बता दें, साहित्य में नोबेल पुरस्कार के ऐलान के बादनोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा शुक्रवार को और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में पुरस्कार की घोषणा 10 अक्टूबर को की जायेगी।
एबीएन सोशल डेस्क। दंडवत प्रणाम को सभी प्रकार के प्रणामों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है लेकिन हमारे शास्त्रों में स्त्रियों को दंडवत प्रणाम करने का सर्वथा निषेध है। शास्त्रानुसार स्त्रियों को कभी भी किसी के भी सम्मुख दंडवत प्रणाम नहीं करना चाहिए। आजकल अनेक स्थानों पर देखने में आता है कि स्त्रियां भी मंदिरों, पूजा स्थलों व परिक्रमा आदि में षाष्टांग दंडवत प्रणाम करती हैं, जो शास्त्रानुसार अनुचित है। ऐसा क्यों है इसका समाधान हमें "धर्मसिन्धु" नामक ग्रंथ में मिलता है, जिसमें स्पष्ट निर्देश है- ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्रामं च पुस्तकम्! वसुन्धरा न सहते कामिनी कुच मर्दनं!! - अर्थात् ब्राह्मणों का पृष्ठभाग, शंख, शालिग्राम, धर्मग्रंथ (पुस्तक) एवं स्त्रियों का वक्षस्थल (स्तन) यदि सीधे भूमि (बिना आसन) का स्पर्श करते हैं तो पृथ्वी इस भार को सहन नहीं कर सकती है। इस असहनीय भार को सहने के कारण वह इस भार को डालने वाले से उसकी श्री (अष्ट-लक्ष्मियों) का हरण कर लेती है। ब्राह्मणों का पृष्ठभाग, शंख, शालिग्राम, धर्मग्रंथ (पुस्तक) एवं स्त्रियों के वक्षस्थल को पृथ्वी पर सीधे स्पर्श कराने वाले की अष्ट-लक्ष्मियों क्षय होने लगता है। अत: शास्त्र के इस निर्देशानुसार स्त्रियों को दंडवत प्रणाम कभी नहीं करना चाहिए। स्त्रियों को दंडवत प्रणाम के स्थान पर घुटनों के बल बैठकर अपना मस्तक भूमि से लगाकर ही प्रणाम करना चाहिए एवं ब्राह्मणों, शंख, शालिग्राम भगवान को, धर्मग्रंथ (पुस्तक) को सदैव उनके यथोचित आसन पर ही विराजमान कराना चाहिए।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। जिन लोगों ने दीपावली व छठ पर घर जाने के लिए ट्रेन की टिकट बुक नहीं कराई है या जिन लोगों को टिकट बुक कराने के बाद भी ट्रेन में कन्फर्म सीट नहीं मिल रही है। उन लोगों को परेशान होने की जरुरत नहीं है क्योंकि झारखंड की राजधानी रांची रेल डिवीजन की ओर से दक्षिण-पूर्व रेल मुख्यालय को इन दोनों त्योहारों के लिए पूजा स्पेशल ट्रेन चलाने का प्रस्ताव भेजा गया है। इस प्रस्ताव में 4 रूटों पर पूजा स्पेशल ट्रेन चलाने को कहा गया है, जिसमें रांची जयनगर, रांची-पटना, रांची-भागलपुर व रांची गोरखपुर रूट शामिल हैं। दरअसल, त्योहारों पर ट्रेनों में काफी भीड़ होती है। जो लोग अपने घर से दूर बाहर काम कर रहे हैं वह लोग त्योहारों पर अपने घर जाते हैं तो उन्हें ट्रेन में सीट नहीं मिलती, जिसकी वजह से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। वहीं, अब हटिया व रांची से चलने वाली ट्रेनों में सीटें उपलब्ध नहीं हैं। हटिया-पूर्णिया कोर्ट, हटिया-इस्लामपुर, हटिया-पटना पाटलिपुत्र जैसी ट्रेनों में भी यात्रियों को लंबी वेटिंग मिल रही है। इसे देख रेल डिवीजन की ओर से पूजा स्पेशल ट्रेन चलाई जायेगी, जिसमें रेलयात्री आराम से ट्रेन में बैठकर अपने घर जा सकते हैं। इस मामले में डीआरएम प्रदीप गुप्ता का कहना है कि दीपावली व छठ के मौके पर बड़ी संख्या में लोग झारखंड से बिहार व उत्तर प्रदेश आते-जाते हैं। ऐसे में ट्रेनों की भीड़ को कम करने के लिए 4 रूटों पर स्पेशल ट्रेन चलाने का प्रस्ताव मुख्यालय को भेजा गया है।
एबीएन सोशल डेस्क। भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में शक्ति पीठों का बहुत महत्व है। निम्नलिखित लेख में, हमने भारत में और उसके आसपास के शक्ति पीठों से संबंधित सभी उचित जानकारियां प्राप्त करने की कोशिश की है। हमने शक्तिपीठों, उनके स्थान और वहां पहुंचने के बारे में सभी उपलब्ध जानकारी को संगठित करने का प्रयास किया है। शक्तिपीठों से जुड़ी कहानी : यह माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने देवी आदि शक्ति और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ किया था। देवी आदि शक्ति प्रकट हुईं और शिव से अलग होकर ब्रह्मा को ब्रह्मांड के निर्माण में मदद की। ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुए और देवी आदि शक्ति को शिव को पुन: सौपने का निर्णय किया। इसलिए उनके पुत्र दक्ष ने माता सती को अपनी बेटी के रूप में प्राप्त करने के लिए यज्ञ किया था। भगवान शिव से विवाह करने के संकल्प से माता सती को इस ब्रह्मांड में लाया गया था, और दक्ष का यह यज्ञ सफल रहा। भगवान शिव के अभिशाप में भगवान ब्रह्मा ने अपने पांचवें सिर को शिव के सामने अपने झूठ के कारण खो दिया था। दक्ष को इसी वजह से भगवान शिव से द्वेष था और भगवान शिव और माता सती की शादी नहीं कराने का निर्णय लिया था। हालांकि, माता सती भगवान शिव की ओर आकर्षित हो गईं और कठोर तपस्या कर अंत में एक दिन, शिव और माता सती का विवाह हुआ। भगवान शिव पर प्रतिशोध लेने की इच्छा के साथ दक्ष ने यज्ञ किया। दक्ष ने भगवान शिव और अपनी पुत्री माता सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया। माता सती ने यज्ञ में उपस्थित होने की अपनी इच्छा शिव के सामने व्यक्त की। उन्होंने माता को रोकने के लिए अपनी पूरी कोशिश की परंतु माता सती यज्ञ में चली गईं। यज्ञ में पहुंचने के पश्चात माता सती का स्वागत नहीं किया गया। इसके अलावा, दक्ष ने शिव का अपमान किया। माता सती अपने पिता द्वारा अपमान को झेलने में असमर्थ थी, इसलिए उन्होंने अपने शरीर का बलिदान दे दिया। अपमान और चोट से क्रोधित भगवान शिव ने तांडव किया और शिव के वीरभद्र अवतार ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और उसका सिर काट दिया। सभी मौजूद देवताओं से अनुरोध के बाद दक्ष को वापस जीवित किया गया और मनुष्य के सर की जगह एक बकरी का सिर लगाया। दुख में डूबे शिव ने माता सती के शरीर को उठाकर, विनाश का दिव्य नृत्य किया। अन्य देवताओं ने विष्णु को इस विनाश को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। जिस पर विष्णु ने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल करते हुए माता सती के देह के 51 टुकड़े कर दिए। शरीर के विभिन्न हिस्से भारतीय उपमहाद्वीप के कई स्थानों पर गिरे और वह शक्ति पीठों के रूप में स्थापित हुए। गुरुदेव से किसी ने पूछा कि यदि शिव एक व्यक्ति नहीं हैं और केवल एक तत्त्व हैं तो माता सती के शरीर के हिस्सों से इतने शक्ति पीठ (ऊर्जा के स्थान) क्यों बने हैं? गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी ने कहा कि शक्ति पीठ का अर्थ है - ऊर्जा की एक सीट। शक्ति पीठ वह जगह है जहां लोगों ने लंबे समय तक ध्यान किया है और वहां ऊर्जा पाई गई है। जब आप ध्यान करते और गाते हैं तो उस स्थान पर ऊर्जा इकट्ठा हो जाती है। जब आप सकारात्मक स्थिति में होते हैं, न केवल आप, यहां तक कि खंभे, पेड़ और पत्थर सकारात्मक कंपनों को अवशोषित करते हैं। इसी प्रकार शक्ति पीठ का निर्माण हुआ। शक्तिपीठ सिर्फ कोई एक स्थान नहीं है, गुरुदेव श्रीश्री रवि शंकर जी के अनुसार, यह दैवीय शक्ति से ओत-प्रोत एक जगह है जहां पर ध्यान किया जा सकता है। देवी पुराण के अनुसार 51 शक्तिपीठों की स्थापना की गयी है और यह सभी शक्तिपीठ बहुत पावन तीर्थ माने जाते हैं। वर्तमान में यह 51 शक्तिपीठ पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश, के कई हिस्सों में स्थित हैं। कुछ महान धार्मिक ग्रंथ जैसे शिव पुराण, देवी भागवत, कल्कि पुराण और अष्टशक्ति के अनुसार चार प्रमुख शक्ति पीठों को पहचाना गया है, जो निम्नलिखित हैं :- 1. कालीपीठ (कालिका) : कोलकाता के कालीघाट में माता के बायें पैर का अंगूठा गिरा था। यह पीठ स्थान हुगली नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन हावड़ा है और निकटतम मेट्रो स्टेशन कालीघाट है। मंदिर का दौरा करने का सबसे अच्छा समय सुबह या दोपहर है। 2. कामगिरि - कामाख्या : असम के गुवाहाटी जिले में स्?थित नीलांचल पर्वत के कामाख्या स्थान पर माता का योनि भाग गिरा था। गुवाहाटी, असम की राजधानी है और सभी प्रकार की यात्रा सुविधाओं से लेस है। यदि हम ट्रेन से जाते हैं और सीधे मंदिर पहुंचना चाहते हैं तो हमें नीलांचल स्टेशन पर उतरना होगा। वहां से पहाड़ी पर चढ़ने के लिए दो मार्ग हैं एक पैदल मार्ग (लगभग 600 कदम) और एक बस मार्ग (कामाख्या द्वार के माध्यम से, लगभग 3 किलोमीटर)। 3. तारा तेरणी : तारा तेरणी मंदिर को सबसे अधिक सम्मानित शक्ति पीठ और हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थान केंद्रों में से एक माना जाता है। यह माना जाता है कि देवी माता सती का स्तन कुमारी पहाड़ियों पर गिरा जहां तारा तेरणी पीठ स्थित है। ब्रह्मपुर मंदिर से 35 किमी, भुवनेश्वर (165 किमी) और पुरी (220 किमी) स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन हार्हाह-चेन्नई लाईन पर दक्षिण-पूर्व रेलवे पर बेरहमपुर है। 165 किमी दूर स्थित, भुवनेश्वर निकटतम हवाई अड्डा है, जहां से दिल्ली और कलकत्ता जैसे प्रमुख शहरों के लिए उड़ानें ली जा सकती हैं। 4. विमला शक्तिपीठ : विमला मंदिर एक हिंदू मंदिर है जो देवी विमला को समर्पित है, जो भारत के उड़ीसा राज्य में पुरी में जगन्नाथ मंदिर परिसर के भीतर स्थित है। यह एक शक्ति पीठ के रूप में माना जाता है। कहा जाता है कि यहां देवी माता सती के पैर गिरे थे। राज्य परिवहन विभाग द्वारा चलाए जा रहे मिनी बसों से भुवनेश्वर तक पहुंचा जा सकता है। पुरी का अपना रेलवे स्टेशन है जो इसे कोलकाता, नई दिल्ली, अहमदाबाद और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में जोड़ता है, जबकि भुवनेश्वर भी ज्यादातर प्रमुख भारतीय शहरों से जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर में स्थित है जो 56 किमी की दूरी पर है। अन्य प्रमुख शक्तिपीठों की सूची इस प्रकार है :- 1. किरीट - विमला : पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिला के किरीटकोण ग्राम के पास माता का मुकुट गिरा था। मुर्शिदाबाद कोलकाता से 239 किलोमीटर की दूरी पर है और यहां पहुंचने में लगभग 6 घंटे लगते हैं। 2. वृंदावन - उमा : उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के वृंदावन तहसील में माता के बाल के गुच्छे गिरे थे। वृंदावन, आगरा से 50 किलोमीटर और दिल्ली से 150 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा, 12 किमी की दूरी पर है। 3. करवीरपुर या शिवहरकर : महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित यह शक्तिपीठ है, जहां माता की आंखें गिरी थीं। यहां की शक्ति महिषासुरमर्दिनी तथा भैरव हैं। उल्लेख है कि वर्तमान कोल्हापुर ही पुराणों में प्रसिद्ध करवीर क्षेत्र है। ऐसा उल्लेख देवीगीता में मिलता है। कोल्हापुर सड़क, रेलवे और वायु मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। निकटतम बस स्टैंड कोल्हापुर में है। हैदराबाद, मुम्बई आदि जैसे विभिन्न शहरों से कई सीधी बसें हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन कोल्हापुर में है। 4. श्रीपर्वत - श्रीसुंदरी : कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के पर्वत पर माता के दायें पैर की पायल गिरी थी। जुलाई से सितंबर तक सड़क से जाने के लिए सबसे अच्छा समय माना जाता है। नजदीकी रेलवे स्टेशन जम्मूतवी है जो लद्दाख से 700 किमी दूर है। निकटतम हवाई अड्डा लेह में है। 5. वाराणसी - विशालाक्षी : उत्तरप्रदेश के काशी में मणिकर्णिक घाट पर माता के कान की बाली गिरी थी। वाराणसी के दो प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं: शहर के केंद्र में वाराणसी जंक्शन और मुगल सराय जंक्शन। शहर लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। वाराणसी हवाई अड्डा शहर के केंद्र से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। 6. सवेर्शेल या गोदावरीतीर : आंध्रप्रदेश के राजामुंद्री क्षेत्र स्थित गोदावरी नदी के तट पर कोटिलिंगेश्वर पर माता का बायां गाल गिरा था। निकटतम रेलवे स्टेशन भी बहुत कम दूरी पर है। लोग रेलवे स्टेशन से स्थानीय बस सेवा का प्रयोग कर सकते हैं। राजमुंदरी रेलवे स्टेशन, आंध्र प्रदेश के सबसे बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है। इस मंदिर के निकट प्रमुख शहरों में हवाई अड्डे की सेवाएं उपलब्ध हैं। राजमुंदरी हवाई अड्डा मधुरपाड़ी के पास स्थित है। वह शहर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर है। 7. विरजा - विरजा क्षेत्र : यह शक्ति पीठ उड़ीसा के उत्कल में स्थित है। यहां पर माता सती की नाभि गिरी थी। कटक, भुवनेश्वर, कोलकाता और ओड़िशा के अन्य छोटे शहरों से बस का लाभ लेने से पर्यटक स्थल पर पहुंच सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन जाजपुर केंझार रोड, रेलवे स्टेशन है। निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर है। 8. मानसा - दाक्षायणी : तिब्बत में स्थित मानसरोवर के पास माता का यह शक्तिपीठ स्थापित है। इसी जगह पर माता सती का दायां हाथ गिरा था। भारतीय श्रद्धालुओं की एक सीमित संख्या को कैलाश मानसरोवर हर साल यात्रा करने की अनुमति है। भारतीय पक्ष से कैलाश पर्वत तक पहुंचने के लिए दो मार्ग हैं। उनका उल्लेख नीचे दिया गया है: मार्ग 1: लिपुलख पास मार्ग, दिल्ली में 3-4 दिन के प्रवास के साथ शुरू होता है। मार्ग 2: नाथु ला पास मार्ग यात्रा, दिल्ली से 3-4 दिन के प्रवास के साथ शुरू होती है। 9. नेपाल - महामाया : नेपाल के पशुपतिनाथ में स्थित इस शक्तिपीठ में मां सती के दोनों घुटने गिरे थे। यहां पहुंचने के कई साधन हैं। श्रद्धालु बस, ट्रेन और हवाई रास्ते द्वारा काठमांडू पहुंच सकते हैं। 10. हिंगलाज : पकिस्तान, करांची से 125 किमी उत्तर पूर्व में हिंगला या हिंगलाज शक्तिपीठ स्थित है। यहां माता सती का सर गिरा था। कराची से वार्षिक तीर्थ यात्रा अप्रैल के महीने में शुरू होती है। यहां वाहन द्वारा पहुंचने में लगभग 4 से 5 घंटे लगते हैं। 11. सुगंधा - सुनंदा : बांग्लादेश के शिकारपुर से 20 किमी दूर सोंध नदी के किनारे स्थित है मां सुगंधा का शक्तिपीठ जहां माता सती की नासिका गिरी थी। भारत से जाने वाले लोगों को इस तीर्थ यात्रा के लिए वीजा प्राप्त करना होगा। श्रद्धालु वायु, समुद्र या सड़क के माध्यम से इस शक्तिपीठ तक पहुंच सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय यात्रियों के लिए, बरीयाल शहर में एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। 12. कश्मीर - महामाया : कश्मीर के पहलगांव जिले के पास माता का कंठ गिरा था। इस सशक्तिपीठ को महामाया के नाम से जाना जाता है। जम्मू और श्रीनगर सड़क के माध्यम से जुड़े हुए हैं। यात्रा के इस भाग के लिए बसें उपलब्ध की जा सकती हैं। जम्मू और श्रीनगर तक पहुंचने के लिए हवाई रास्ते का भी प्रयोग किया जा सकता है। 13. ज्वालामुखी - सिद्धिदा (अंबिका) : हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में माता सती की जीभ गिरी थी। इस शक्तिपीठ को ज्वालाजी स्थान कहते हैं। यह हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी से 30 किमी दक्षिण में स्थित है, धर्मशाला से 60 किमी की दूरी पर है। मनाली, देहरादून और दिल्ली आदि से धर्मशाला के लिए कई निजी बसें उपलब्ध कराई जाती हैं। 14. जालंधर - त्रिपुरमालिनी : पंजाब के जालंधर छावनी के पास देवी तलाब है जहां माता का बायां वक्ष (स्तन) गिरा था। यह निकटतम रेलवे स्टेशन से लगभग 1 किलोमीटर दूर है और शहर के केंद्र में स्थित है। 15. वैद्यनाथ - जयदुर्गा : झारखंड में स्थित वैद्यनाथधाम पर माता का हृदय गिरा था। यहां माता के रूप को जयमाता और भैरव को वैद्यनाथ के रूप से जाना जाता है। निकटतम रेलवे स्टेशन देवघर है, जो 7 किमी की शाखा लाइन का एक टर्मिनल स्टेशन है, जो हावड़ा-दिल्ली मुख्य लाइन पर जसीडिह जंक्शन से शुरू हो रहा है। 16. गंडकी - गंडकी : नेपाल में गंडकी नदी के तट पर पोखरा नामक स्थान पर स्थित मुक्तिनाथ शक्तिपीठ है जहां माता का मस्तक या गंडस्थल गिरा था। काठमांडू से पोखरा और फिर पोखरा से जेमॉम हवाई अड्डे तक जाया जा सकता है। वहां से मुक्तिनाथ शक्तिपीठ तक जीप ली जा सकती है। कांठमांडू में एक हवाई अड्डा है और इस हवाई अड्डे में दोनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का प्रावधान है। 17. बहुला - बहुला (चंडिका) : बंगाल से वर्धमान जिले से 8 किमी दूर अजेय नदी के तट पर स्थित बाहुल शक्तिपीठ स्थापित है जहां माता सती का बायां हाथ गिरा था। देश के अन्य प्रमुख शहरों से कटवा तक कोई नियमित उड़ानें नहीं हैं। निकटतम हवाई अड्डा नेताजी सुभाष चंद्र हवाई अड्डा है। कटवा नियमित ट्रेनों के माध्यम से देश के अन्य प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। 18. उज्जयिनी - मांगल्य चंडिका : बंगाल में वर्धमान जिले के उज्जयिनी नामक स्थान पर माता की दायीं कलाई गिरी थी। निकटतम रेलवे स्टेशन गसकारा स्टेशन है जो मंदिर से लगभग 16 किमी दूर है। निकटतम हवाई अड्डा डमडुम हवाई अड्डा है। वहां से शक्ति पीठ तक पहुंचने के लिए कार या ट्रेन उपलब्ध की जा सकती है। 19. त्रिपुरा - त्रिपुर सुंदरी : त्रिपुरा के उदरपुर के निकट राधा किशोरपुर गांव पर माता का दायां पैर गिरा था। निकटतम हवाई अड्डा अगरतला में है, जहां से आप आसानी से सड़क से मंदिर पहुंच सकते हैं। निकटतम रेल प्रमुख एन ए ई रेलवे पर कुमारघाट है। यह अगरतला से 140 किमी की दूरी पर है। यहां से आप मंदिर तक पहुंचने के लिए बस या टैक्सी चुन सकते हैं। 20. चट्टल - भवानी : बांग्लादेश में चिट्टागौंग (चटगांव) जिला के निकट चंद्रनाथ पर्वत शिखर पर छत्राल (चट्टल या चहल) में माता की दायीं भुजा गिरी थी। रेल गाड़ियां और बसें, चटगांव से, ढाका से (6 घंटे), सिलेहट (6 घंटे) और अन्य शहरों से उपलब्ध हैं। यहां एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा भी है। 21. त्रिस्रोता - भ्रामरी : बंगाल के सालबाढ़ी ग्राम स्?थित त्रिस्रोत स्थान पर माता का बायां पैर गिरा था। हम हवा या रेल द्वारा पंचागढ़ तक नहीं पहुंच सकते। ढाका और पंचगढ़ के बीच सड़क की दूरी 344 कि.मी. है। हिनो-कुर्सी कोच सेवाएं (निजी क्षेत्र), ढाका के गब्तपोली, शेमॉली और मीरपुर रोड बस टर्मिनलों से, पंचागढ़ शहर तक उपलब्ध हैं। यहां पहुंचने में लगभग 8 घंटे लगते हैं। 22. प्रयाग - ललिता : उत्तर प्रदेश के इलाहबाद शहर के संगम तट पर माता की हाथ की उंगली गिरी थी। इस शक्तिपीठ को ललिता के नाम से भी जाना जाता हैं। इलाहाबाद और ललिता देवी मंदिर (शक्ति पीठ) के बीच ड्राइविंग दूरी लगभग 3 किलोमीटर है। 23. जयंती - जयंती : यह शक्तिपीठ आसाम के जयंतिया पहाड़ी पर स्थित है जहां देवी माता सती की बाईं जंघा गिरी थी। यहां देवी माता सती की जयंती और भगवान शिव की कृमाशिश्वर के रूप में पूजा की जाती है। 24. युगाद्या - भूतधात्री : पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले पर माता के दायें पैर का अँगूठा गिरा था। यह शक्ति पीठ पश्चिम बंगाल के वर्धमान से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित है। हमें निगम स्टेशन से बर्दवान-कटोआ रेलवे लेनी चाहिए। 25. कन्याश्री - सवार्णी : कन्याश्रम में माता की पीठ गिरी थी। इस शक्तिपीठ को सवार्णी के नाम से जाना जाता है। कन्याश्राम को कालिकशराम या कन्याकुमारी शक्ति पीठ के रूप में भी जाना जाता है। कन्याकुमारी दक्षिण भारत के सभी शहरों से सड़क के मार्ग से जुड़ा हुआ है। कन्याकुमारी ब्रॉड गेज द्वारा त्रिवेंद्रम, दिल्ली और मुंबई से जुड़ा हुआ है। तिरुनेलवेली (85 किमी) अन्य नजदीकी रेलवे जंक्शन है जिससे सड़क मार्ग द्वारा नागरकोइल (19 किमी) तक पहुंचा जा सकता है। निकटतम हवाई अड्डा त्रिवेंद्रम (87 किमी) में स्थित है। 26. कुरुक्षेत्र - सावित्री : हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में माता के टखने गिरे थे। इस शक्तिपीठ को सावित्री के नाम से जाना जाता है। थानेसर यानी पुराना कुरुक्षेत्र, अब कुरुक्षेत्र जिले में ही है एवं दिल्ली से 160 किलोमीटर और चंडीगढ़ से 90 किलोमीटर दूर है। यह पिपली से 6 किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 1 (एक महत्वपूर्ण सड़क जंक्शन) पर है। यह कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर और पिपली बस स्टैंड से 7 किलोमीटर दूर है। 27. मणिदेविक - गायत्री : मनीबंध, अजमेर से 11 किमी उत्तर-पश्चिम में पुष्कर के पास गायत्री पहाड़ के पास स्थित है जहां माता की कलाई गिरी थी। अजमेर से ट्रेन और बस सुविधा उपलब्ध हैं और वहां से हमें पुष्कर पहुंचने के लिए टैक्सी या रिक्शा मिल सकता है। पुष्कर से निकटतम हवाई अड्डा जयपुर में है। 28. श्रीशैल - महालक्ष्मी : बांग्लादेश के सिल्हैट जिले के पास शैल नामक स्थान पर माता का गला (ग्रीवा) गिरा था। बांग्लादेश को दुनिया के किसी भी हिस्से से पहुंचा जा सकता है। राष्ट्रीय हवाई अड्डा ढाका में है, जो शहर से 20 किमी की दूरी पर है। 29. कांची - देवगर्भा : पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में बोलीपुर स्टेशन के 10 किमी उत्तर-पूर्व में कोप्पई नदी के तट पर, देवी स्थानीय रूप से कंकालेश्वरी के रूप में जानी जाती है, जहां माता का श्रोणि (पेट का निचला हिस्सा) गिरा था। 30. पंचसागर - वाराही : पंचासागर शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास स्थित है जहां माता सती के निचले दांत गिरे थे। निकटतम हवाई अड्डा इलाहाबाद में है और यहाँ तक राष्ट्रीय उड़ानें उपलब्ध हैं। अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए, दिल्ली निकटतम हवाई अड्डा है। निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी रेलवे स्टेशन है। दिल्ली, अहमदाबाद, पटना और अन्य प्रमुख शहरों सड़क द्वारा वाराणसी पहुंचा जा सकता है। 31. करतोयातट - अपर्णा : अपर्णा शक्तिपीठ एक ऐसी जगह है जहां देवी माता सती की बाईं पायल गिरी थी। यहां देवी की अपर्णा या अर्पान के रूप में पूजा की जाती है जो कि कुछ भी नहीं खातीं और भगवान शिव को बैराभा का रूप मिला। भवानीपुर गांव करवतया नदी के किनारे पर है, शेरपुर (सेरापुर) से 28 किमी। हम ढाका से भानापुर जामुना ब्रिज तक जा सकते हैं। सिराजगंज जिले में चांदिकोना गुजरने के बाद, हम घोगा बोट-टूला बस स्टॉप पर पहुंचते हैं, जहां से भवानीपुर मंदिर पास है। 32. विभाष - कपालिनी : पश्चिम बंगाल के जिला पूर्वी मेदिनीपुर स्थान पर माता के बाएं टखने गिरे थे। यह कोलकाता से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर है, और बंगाल की खाड़ी के करीब रून्नारयन नदी के तट पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन तमलुक ही है। 33. कालमाधव - देवी काली : मध्यप्रदेश के अमरकंटक के कालमाधव स्थित शोन नदी के पास माता का बायां नितंब गिरा था। शाहडोल, उमरिया, जबलपुर, रीवा, बिलासपुर, अनुपपुर और पेंद्र रोड से अमरकंटक शहर तक बस सुविधा उपलब्ध की जा सकती है। निकटतम हवाई अड्डा, जबलपुर (228 किमी) और रायपुर (230 किमी) हैं। 34. शोणदेश - नर्मदा (शोणाक्षी) : मध्यप्रदेश के अमरकंटक जिले में स्थित नर्मदा के उद्गम पर माता का दायां नितंब गिरा था। शाहडोल, उमरिया, जबलपुर, रीवा, बिलासपुर, अनुपपुर और पेंद्र रोड से अमरकंटक शहर तक बस सुविधा उपलब्ध की जा सकती है। निकटतम हवाई अड्डा, जबलपुर (228 किमी) और रायपुर (230 किमी) हैं। 35. रामगिरि - शिवानी : उत्तर प्रदेश के चित्रकूट के पास रामगिरि स्थान पर माता का दायां स्तन गिरा था। चित्रकूट के लिए निकटतम रेल प्रमुख चित्रकूट धाम (11 किलोमीटर) झांसी-माणिकपुर मुख्य लाइन पर है। चित्रकूट, बांदा, झांसी, महोबा, चित्रकूट धाम, हरपालपुर, सतना और छतरपुर के साथ सड़क से जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डा खजुराहो (175 किमी) में है। मन्दाकिनी नदी के तट पर चित्रकूट के 2 किमी दक्षिण में स्थित जानकी सरोवर नाम का एक पवित्र तालाब, शक्तिपीठ के रूप में माना जाता है। कुछ लोग इसे राजगिरि (आधुनिक राजगीर) कहते हैं। यह एक प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थस्थान है। राजगीर के गिद्ध के पीक (ग्रीधकोटा / ग्राध्रुका) को शक्तिपीठ के रूप में माना जाता है। 36. शुचि - नारायणी : तमिलनाडु के कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम मार्ग पर शुचितीर्थम शिव मंदिर है, जहां पर माता के ऊपरी दांत (ऊर्ध्वदंत) गिरे थे। कन्याकुमारी तक पहुंचने के लिए रेलवे सबसे सामान्य साधन है। कन्याकुमारी से सुचितंद्र मंदिर तक पहुंचने के लिए स्थानीय परिवहन की आवश्यकता है। निकटतम हवाई अड्डा त्रिवेन्द्रम है। 37. प्रभास - चंद्रभागा : गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। वायुमार्ग के संदर्भ में, दोनों अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय हवाईअड्डे जूनागढ़ के पास स्थित हैं। देश के हर हिस्से से ट्रेनें इस शहर की तरफ आती हैं। कई निजी बस सेवाएं हैं जो विभिन्न शहरों से जूनागढ़ तक आती हैं। 38. भैरवपर्वत - अवंती : मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के पास भैरव पर्वत पर माता के ऊपरी ओष्ठ गिरे थे। उज्जैन भारत के सभी शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है और लोग यहां आने के लिए परिवहन के सभी साधनों का उपयोग कर सकते हैं। निकटतम हवाई अड्डा इंदौर में है और यह 52 किलोमीटर की दूरी पर है। निकटतम रेलवे स्टेशन उज्जैन में ही है। 39. जन्मस्थान - भ्रामरी : महाराष्ट्र के नासिक नगर पर माता की ठोढ़ी गिरी थी। निकटतम रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा नासिक में ही स्थित हैं। 40. रत्नावली - कुमारी : बंगाल के हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णानगर मार्ग पर माता का दायां कंधा गिरा था। रेल और सड़क परिवहन देश के इस हिस्से में आने के सबसे सामान्य साधन हैं। यद्यपि इस भाग के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं है, इसलिए तीर्थयात्रियों को यहां तक पहुंचने के लिए ट्रेन बदलने की जरूरत है। हावड़ा एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है जो खानाकुल से लगभग 81 किलोमीटर की दूरी पर है। निकटतम हवाई अड्डा कोलकाता में है और इस हवाई अड्डे पर दोनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का प्रावधान है। 41. मिथिला - उमा (महादेवी) : भारत-नेपाल की सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के निकट मिथिला में माता का बायां कंधा गिरा था। निकटतम हवाई अड्डा पटना में है। निकटतम रेलवे स्टेशन जनकपुर स्टेशन है। मिथिला - उमा देवी शक्तिपीठ मंदिर तक पहुंचने के लिए कई सार्वजनिक और निजी वाहनों का प्रयोग किया जा सकता है। 42. नालहाटी - कालिका : पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में माता की स्वर रज्जु गिरी थी। निकटतम बस स्टैंड नालहाटी बस स्टैंड है और निकटतम रेलवे स्टेशन नालहाटी जंक्शन है। निकटतम हवाई अड्डा डमडुम, कोलकाता में स्थित है। 43. देवघर - बैद्यनाथ : झारखंड के बैद्यनाथ में जयदुर्गा मंदिर एक ऐसी जगह है जहां माता सती का हृदय गिरा था। मंदिर को स्थानीय रूप से बाबा मंदिर / बाबा धाम कहा जाता है। परिसर के भीतर, जयदुर्गा शक्तिपीठ बैद्यनाथ के मुख्य मंदिर के ठीक सामने मौजूद है। निकटतम रेलवे स्टेशन हावड़ा-पटना-दिल्ली लाइन से जसीडिह (10 किमी) है। निकटतम हवाईअड्डे - रांची, गया, पटना और कोलकाता में हैं। 44. कर्णाट जयादुर्गा : कर्णाट शक्तिपीठ हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित है जहां माता सती के दोनों कान गिरे थे। यहां देवी की जयदुर्गा या जयदुर्ग और भगवान शिव की अबिरू के रूप में पूजा की जाती है। निकटतम हवाई अड्डा गगल हवाई अड्डा है। यह हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित है, जहां से कांगड़ा केवल 18 किलोमीटर है। 45. यशोर - यशोरेश्वरी : यशोर स्थान पर माता के हाथ की हथेली गिरी थी। यह ईश्वरपुर, सातखिरा जिला, बांग्लादेश में स्थित है। निकटतम हवाई अड्डा बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित है और इस हवाई अड्डे पर दोनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का प्रावधान है। दोनों देशों के बीच कोई रेल मार्ग नहीं है, ऐसे में कुछ बसें हैं जो भारत के प्रमुख शहरों से इस पवित्र स्थल तक जाती हैं। 46. अट्टहास - फुल्लरा : पश्चिम बंगाल के अट्टहास स्थान पर माता का निचला ओष्ठ गिरा था। यह कोलकाता से 115 किमी दूर है। अहमपुर कटवा रेलवे स्टेशन से लगभग 12 किमी दूर है। नेताजी सुभाष चंद्र हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा है, जो कि लाहपुर से लगभग 196 किलोमीटर दूर है। 47. नंदीपुर - नंदिनी : पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में माता का गले का हार गिरा था। बीरभूम में विभिन्न स्थानों से शुरू होने वाली कई सीधी बसें हैं। यह शक्तिपीठ स्थानीय रेलवे स्टेशन से केवल 10 मिनट की दूरी पर है। निकटतम अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कोलकाता में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। 48. लंका - इंद्राक्षी : श्रीलंका में संभवत: त्रिंकोमाली में माता की पायल गिरी थी। यह पीठ, नैनातिवि (मणिप्लालम) श्रीलंका के जाफना से 35 किलोमीटर, नल्लूर में है। रावण (श्रीलंका के राजा) और भगवान राम ने भी यहां पूजा की थी। 49. विराट - अंबिका : यह शक्तिपीठ राजस्थान में भरतपुर के विराट नगर में स्थित है जहां माता के बाएं पैर कि उंगलियां गिरी थीं। निकटतम हवाई अड्डा जयपुर है और राष्ट्रीय उड़ानों के साथ-साथ यहां से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी उपलब्ध हैं। भरतपुर रेलवे स्टेशन पर कई सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं। भरतपुर रेलवे स्टेशन से अंबिका शक्तिपीठ तक पहुंचने के लिए स्थानीय ट्रेन से जाना पड़ता है। 50. सवार्नंदकरी : बिहार के पटना में माता सती की दायीं जांघ गिरी थी। इस शक्तिपीठ को सवार्नंदकरी के नाम से जाना जाता है। निकटतम हवाई अड्डा जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो शक्तिपीठ से 8 किलोमीटर दूर स्थित है। 51. चट्टल : यह मंदिर माता सती के 51 शक्तिपीठों में सूचीबद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि माता सती का दाहिना हाथ यहां गिरा था। चट्टल शक्तिपीठ चटगांव, सताकुंडा स्टेशन, बांग्लादेश में स्थित है। बांग्लादेश में सड़क परिवहन सबसे आम साधन है यद्यपि इस भाग के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं है। इसलिए तीर्थ यात्रियों को चटगांव से यहां तक पहुंचने के लिए ट्रेन बदलने की जरूरत है। निकटतम हवाई अड्डा शाह अमानत अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। इस शक्ति पीठ को देखने के लिए भारतीय तीर्थ यात्रियों को वीजा के लिए आवेदन करना होगा। सुगंध : सुगंध शक्तिपीठ देवी सुनंदा को समर्पित एक मंदिर है। यह बांग्लादेश से, 10 किमी उत्तर बुलिसल के शिखरपुर गांव में स्थित है। यह कहा जाता है कि माता सती की नाक यहां गिरी थी। बरिएसल सिटी में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। झालकाटी रेलवे स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है।
एबीएन सोशल डेस्क। त्योहारी मौसम में आम जनता को झटका लगा है। दरअसल, नैचुरल गैस की कीमत 40 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इसी के साथ अनुमान लगाया जा रहा है कि आम आदमी को महंगाई का एक और झटका लग सकता है। बहुत जल्द सीएनजी और पीएनजी के दाम बढ़ सकते हैं। तेल मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग और एनालिसिस सेल यानी पीपीएसी के आदेश के मुताबिक, ओएनजीसी और ऑयल इंडिया के पुराने क्षेत्रों से गैस का दाम 6.1 से बढ़ाकर 8.57 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू किया गया। इसी दर पर देश में उत्पादित गैस के लगभग दो तिहाई हिस्से की बिक्री होगी। इस आदेश के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उसके भागीदार बीपी पीएलसी द्वारा केजी बेसिन में संचालित डी-6 ब्लॉक जैसे मुश्किल एवं नये क्षेत्रों से निकाली जाने वाली गैस की कीमत 9.92 डॉलर से बढ़ाकर 12.6 डॉलर प्रति इकाई कर दी गई है। नैचुरल गैस फर्टिलाइजर्स बनाने के साथ बिजली पैदा करने के लिए एक प्रमुख कच्चा माल है। इसे सीएनजी में भी परिवर्तित किया जाता है और पीएनजी यानी रसोई गैस के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। दरों में भारी वृद्धि से सीएनजी और पीएनजी की कीमतों में बढोत्तरी होने की आशंका है, जो पहले से ही पिछले एक साल में 70 फीसदी से अधिक बढ़ चुकी हैं। अप्रैल 2019 के बाद से गैस की दरों में यह तीसरी वृद्धि होगी। बेंचमार्क अंतरराष्ट्रीय कीमतों में मजबूती के कारण इनमें तेजी आई है।
टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) इस नवरात्र में समाज व प्रशासन से कुछ विषयों पर आग्रह करती है। पिछले कई वर्षों से एक परंपरा सी बन गई है कि माता के पंडाल का उद्घाटन करने के लिए नेता व अन्य समुदाय को आमंत्रित किया जाता है। हम सनातन धर्म के मानने वाले लोग यह कैसे कर सकते हैं कि माता के मंदिर का उद्घाटन कोई नेता या विधर्मी करे, यह धर्म आचरण नहीं है। अत: पूजा कमेटियों व समाज से विश्व हिंदू परिषद विनम्र आग्रह करती है कि आप अतिथि को जरूर बुलायें, परंतु पंडाल का उद्घाटन फीता काटकर नहीं, बल्कि उनसे माता की आरती और पूजा करवाकर करायें। इससे समाज में बन रही गलत परंपरा खत्म होगी। विहिप प्रशासन से आग्रह करती है कि विसर्जन के दिन जैसे परंपरागत विसर्जन होते आ रहा है उसको सुचारू रूप से चलने दे। नियम व कानून का भय दिखाने से समाज में डर का माहौल बनता है। यह धर्मिक आजादी पर प्रतिबंध की तरह है। जैसे अन्य धर्मावलंबियों के पर्व-त्यौहार पर किसी तरह की कोई बंदिश नहीं होती है। ठीक उसी तरह सनातन धर्म को मानने वालों पर भी कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए। मांस और मदिरा की दुकानों को षष्टी के बाद से विजयादशमी तक बंद किया जाना चाहिए। विश्व हिंदू परिषद इसकी मांग करती है। सभी पूजा समितियों से आग्रह है कि अपनी सनातन परंपरा को ध्यान में रखते हुए पंडाल में किसी तरह का अभद्र गाना या गैरधार्मिक गाना न बजाते हुए केवल और केवल धार्मिक गीत बजाएं ताकि समाज में अपने धर्म के प्रति जागृति पैदा हो और अपने लोग धर्म का मर्म समझ सकेंगे। हमारी इस महान पूजा पर गलत बातें नहीं करेंगे। पूजा समितियां भोग वितरण करने के बजाए पूजा पंडाल में अपने समाज के लोगों को बैठा कर भोग खिलाएंगीं तो बेहतर संदेश जाएगा। सामाजिक समरसता का विचार उत्पन्न होगा। विश्व हिंदू परिषद सभी पूजा समितियों से ऐसा आग्रह करती है। संभव हो तो सभी पूजा समितियां पंडाल में घूमने वाले आगंतुकों का तिलक लगाकर स्वागत करें। उक्त जानकारी विहिप के झारखंड प्रांत प्रमुख संजय कुमार (9835138678) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
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