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Published / 2022-03-05 07:55:55
रूस-यूक्रेन जंग : यूरोप के हजारों यूजर्स का इंटरनेट ठप

एबीएन सेंट्रल डेस्क। रूस और यूक्रेन के बीच चले रही जंग के बीच अब तक के सबसे बड़े साइबर अटैक की खबर है। इस अटैक के बाद यूरोप के कई शहरों के हजारों यूजर्स का इंटरनेट बंद हो गया है। ऑरेंज के मुताबिक पिछले महीने 24 फरवरी को वायसैट पर हुए एक बड़े साइबर अटैक के बाद फ्रांस में इसकी सहायक कंपनी नॉर्डनेट की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा के करीब 9,000 यूजर्स का इंटरनेट कनेक्शन बंद हो गया है। आपको याद दिला दें कि 24 फरवरी को ही रूस ने यूक्रेन के साथ युद्ध की शुरुआत की थई। सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस देने वाली एक अन्य कंपनी bigblu ने भी कंफर्म किया है कि उसके यूरोप, जर्मनी, फ्रांस, ग्रीक, इटली और पोलैंड के करीब 40 हजार यूजर्स में एक तिहाई का इंटरनेट बंद हो गया है। बता दें कि Eutelsat, bigblu की पैरेंट कंपनी है। संदेह है कि ये यूजर्स भी वायसैट पर हुए अटैक से ही प्रभावित हैं। वायसैट ने कहा कि एक साइबर अटैक के बाद से यूरोप में यूक्रेन और अन्य जगहों पर आंशिक नेटवर्क आउटेज बना हुआ है। Viasat ने इस अटैक के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी है। कंपनी का कहना है कि पुलिस और राज्य के साझेदारों का इस संबंध में सूचित किया गया है और वे मामले की जांच कर रहे हैं। फ्रांस के स्पेस कमांड के प्रमुख जनरल मिशेल फ्रिडलिंग ने कहा कि साइबर अटैक हुआ है। Viasat ने अपने एक बयान में कहा कि खासतौर पर यूरोप और यूक्रेन को कवर करने वाले सैटेलाइट नेटवर्क पर अटैक हुआ जिसके बाद सैटेलाइट के हजारों टर्मिनल निष्क्रिय हो गए थे। इस अटैक के कारण जर्मनी और मध्य यूरोप में 11 गीगावाट के करीब 5,800 पवन टर्बाइन भी बंद हो गए हैं। बता दें इससे पहले यूक्रेन की संसद और अन्य सरकारी और बैंकिंग वेबसाइटों पर भी साइबर अटैक हुए हैं। अटैक के बाद हैकर्स ने सरकारी साइट और बैंक के कंप्यूटर में मैलवेयर भी डाले हैं। ईएसईटी रिसर्च लैब्स ने ही इस अटैक की पुष्टि की थी। लैब ने कहा कि उसने यूक्रेन के कंप्यूटर पर डाटा-वाइपिंग मैलवेयर (डाटा को डिलीट करने वाले) का पता लगाया है। लैब का दावा था कि इस अटैक में यूक्रेन की कई बड़ी संस्थाओं को भी निशाना बनाया गया है।

Published / 2022-03-04 15:13:01
भारतीय नोटों पर गांधीजी ही क्यों? दूसरे क्यों नहीं...

एबीएन नॉलेज डेस्क। देश को आजादी दिलाने में महात्मा गांधी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके इसी योगदान की वजह से उन्हें राष्ट्र पिता का दर्जा मिला हुआ है। लेकिन भारतीय नोट पर गांधी जी की फोटो कहां से आई, क्या आप इसके बारे में जानते हैं। नहीं तो हम आपको बताते हैं। आपको बता दें कि पिछले दो दशकों में भारतीय नोटों की शक्ल तो बदलती गई, लेकिन सभी में गांधी जी की फोटो हमेशा कॉमन रही है। आइए जानते हैं इसके बारे में... कहां से आई गांधी की फोटो : यह तस्वीर उस समय खींची गई, जब गांधी जी ने तत्कालीन बर्मा (म्यांमार) और भारत में ब्रिटिश सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत फ्रेडरिक पेथिक लॉरेंस के साथ कोलकाता स्थित वायसराय हाउस में मुलाकात की थी। इसी तस्वीर से गांधीजी का चेहरा पोट्रेट के रूप में भारतीय नोटों पर अंकित किया गया। क्या कहते हैं नियम : अब एक और दो रुपये के नोट चलन में नहीं हैं। हालांकि, एक रुपये के नोट की छपाई दोबारा शुरू हो चुकी है। इसे 1994 से बंद कर दिया गया था। इनकी जगह सिक्कों ने ले ली थी। वहीं, जब एक रुपये का नोट चलन में था, तब उस पर रिजर्व बैंक के गवर्नर की जगह फाइनेंस सेक्रेटरी (वित्त सचिव) के हस्ताक्षर अंकित हुआ करते थे। करेंसी आॅफ आॅर्डिनेंस के नियमानुसार एक रुपये का नोट भारत सरकार द्वारा, जबकि दो रुपये से अधिक की करेंसी रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया द्वारा जारी की जाती थी। मौजूदा समय में दो रुपये का उत्पादन बंद है, लेकिन पुराने नोट अभी भी चलन में हैं। नोटों पर कभी छपती थी किंग जॉर्ज की तस्वीर : भारतीय रुपया 1957 तक 16 आनों में रहा। इसके बाद मुद्रा की दशमलव प्रणाली अपनाई गई और एक रुपये का निर्माण 100 पैसों में किया गया। किंग जॉर्ज की फोटो वाला नोट 1949 तक चलन में था। इसके बाद अशोक स्तंभ वाला नोट आया था। महात्मा गांधी वाले कागजी नोटों की शुरूआत 1996 से शुरू हुई, जो अब तक चलन में है। 1996 में हुआ नोटों में परिवर्तन : आज हम भारतीय नोटों पर गांधी जी का चित्र देख रहे हैं, जबकि इससे पहले नोटों पर अशोक स्तंभ अंकित हुआ करता था। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया द्वारा 1996 में नोटों में परिवर्तन करने का फैसला लिया गया। इसके अनुसार अशोक स्तंभ की जगह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का फोटो और अशोक स्तंभ की फोटो नोट के बायीं तरफ निचले हिस्से पर अंकित कर दी गई। 5 रुपये से लेकर 2 हजार तक के नोट में गांधी जी की फोटो दिखाई देती है। इससे पहले 1987 में जब पहली बार 500 का नोट चलन में आया तो उसमें गांधी जी का वॉटरमार्क यूज किया गया था। 1996 के बाद हरेक नोट में गांधीजी का चित्र अंकित हो गया। आरबीआई ने बताई ये खास बात : रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने बताया कि सभी नोटों पर वाटर मार्क एरिया में महात्मा गांधी की फोटो मुद्रित करने की सिफारिश 15 जुलाई 1993 और नोट में दाहिनी तरफ महात्मा गांधी का चित्र मुद्रित करने की सिफारिश 13 जुलाई 1995 को आरबीआई ने केंद्र सरकार से की थी। आरबीआई ने जवाब में कहा कि यह निर्णय केंद्र सरकार ने कब लिया, कब लागू हुआ और किस तारीख से महात्मा गांधी की फोटो भारतीय नोटों पर छापने का कार्य शुरू हुआ। इसकी जानकारी उनके पास उपलब्ध नहीं है।

Published / 2022-03-03 05:18:59
तीन टन चीनी कचरा चांद से टकराने पर बनेगा 20 मीटर गहरा गड्ढा

एबीएन नॉलेज डेस्क। एक टूटे चीनी रॉकेट का 3 टन वजनी कचरा 9,300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के साथ चांद की सतह से टकराने वाला है। इस दौरान चांद पर इतना बड़ा गड्ढा हो सकता है, जिसमें ट्रैक्टर जितने बड़े कई वाहन समा सकते हैं। चांद की यह सतह ऐसी जगह पर मौजूद है जहां धरती की दूरबीनों की नजर तक नहीं पड़ सकती है। यहां तक कि उपग्रह से लिए गए चित्रों की पुष्टि में भी कई हफ्ते या माह लग सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह रॉकेट करीब एक दशक पहले अंतरिक्ष में छोड़ा गया था और तभी से यह अंतरिक्ष में इधर-उधर भटक रहा है। हालांकि चीनी अधिकारियों ने इस रॉकेट के चीन का होने पर संदेह जताया है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इस टक्कर से चांद की सतह पर 10 से 20 मीटर का गड्ढा हो जाएगा और चांद की धूल उड़कर सतह पर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैल जाएगी। पृथ्वी के पास ही अंतरिक्ष में तैर रहे कचरे पर नजर रखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है। गहरे अंतरिक्ष में भेजी जाने वाली चीजों के किसी दूसरी चीज से टकराने की संभावना भी कम होती है और उन्हें अक्सर जल्दी ही भुला भी दिया जाता है। लेकिन यह रॉकेट चांद की उस दिशा में है जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है। चीन ने इस सतह पर तीन वर्ष पहले एक सैटेलाइट लांच करने में सफलता पाई है। बिल ग्रे ने लगाया इस कचरे का पता : सिर्फ शौकिया तौर पर खगोलीय जासूस की भूमिका निभा रहे मुट्ठी भर अंतरिक्ष पर्यवेक्षक ऐसे कचरे पर नजर रखते हैं। इसी तरह के एक पर्यवेक्षक बिल ग्रे ने जनवरी में इस रॉकेट के चांद से टकराने के मार्ग का पता लगाया। ग्रे एक गणितज्ञ और एक भौतिकशास्त्री हैं। शुरू में उन्होंने स्पेसएक्स को इसका जिम्मेदार माना था, लेकिन बाद में ग्रे ने एक माह बाद बताया कि अब वे जान चुके हैं कि वह रहस्यमयी चीज कुछ और है। चीन बोला- वह रॉकेट जल चुका है : बिल ग्रे ने बताया, संभव है कि वो एक चीनी रॉकेट का तीसरा चरण है जिसने 2014 में चांद पर एक परीक्षण कैप्सूल भेजा था। कैप्सूल वापस आ गया लेकिन रॉकेट उसके बाद भटकता ही रहा। हालांकि चीनी अफसरों ने कहा, वह रॉकेट पृथ्वी के वायुमंडल में लौटने के बाद जल गया था। लेकिन एक जैसे नाम वाले दो चीनी मिशन थे जिनमें एक यह परीक्षण उड़ान थी और दूसरी 2020 का चांद की सतह से पत्थरों के सैंपल लाने वाला मिशन। इस संबंध में धरती के पास अंतरिक्षीय कचरे पर नजर रखने वाले अमेरिकी कमांड ने बुधवार को बताया कि 2014 के मिशन वाला चीनी रॉकेट कभी धरती के वायुमंडल में लौटा ही नहीं।

Published / 2022-03-02 14:09:10
क्या है गूगल का पूरा नाम...

एबीएन डेस्क। गूगल एक शार्ट नाम है, गूगल का पूरा नाम “GLOBAL ORGANIZATION OF ORIENTED GROUP LANGUAGE OF EARTH" है। सर्च इंजन के साथ साथ गूगल एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी है, एडवरटाईजमेंट, Analytics, Cloud Computing, Play Store, अपना खुद का ब्राउज़र यहा तक कि अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम (एंड्राइड) भी है और गूगल इन सभी से पैसा कमाती है। गूगल की शुरुआत : लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन ने शुरुआत में अपने सर्च इंजन का नाम बैकरब रखा था। इस नाम के रखने की वजह ये थी, कि यह सर्च इंजन पिछली कड़ियों के आधार पर किसी साइट की प्रायोरिटी तय करता था, Google.com डोमेन को 15 सितंबर, 1997 को पंजीकृत किया गया था और इसे 4 सितंबर 1988 को शुरू किया गया, Edword kasner और James Newman के द्वारा लिखी गई एक किताब जिसका नाम Mathemetics and Immagination मे लिखे गये एक शब्द गूगल से प्रेरित हो कर रखा था इसका मतलब वह नंबर जिसमें एक के बाद सौ शून्य हों। जिस समय बनाया गया था, उस समय सर्च इंजन का रिजल्ट, पेज की प्रॉयोरिटी पर निर्भर करता था, जो वेब पेज पर की वर्ड की गणना से तय करते थ, लेकिन लैरी और सर्गेई के अनुसार एक बेहतर सर्च सिस्टम वह है, जो वेब पेज के संबंध में पूरी जानकारी दे, इस नए तकनीक को उन्होनें पेजरैंक का नाम दिया।

Published / 2022-03-02 09:46:18
जनवरी में 18.58 लाख भारतीय खातों को व्हाट्सऐप ने किया बैन

एबीएन सेंट्रल डेस्क। व्हाट्सऐप ने जनवरी 2022 के दौरान 18.58 लाख भारतीय खातों को प्रतिबंधित किया है। कंपनी ने मंगलवार को जारी अपनी मासिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी। कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वालों को रोकने और उनका पता लगाने के लिए अपने शिकायत विभाग तथा अपने तंत्र के जरिए उपयोगकर्ताओं से प्राप्त शिकायतों के आधार पर यह कार्रवाई की है। व्हाट्सऐप को 495 भारतीय खातों के खिलाफ शिकायतें मिलीं, जिसमे से 285 खातों को बंद करने की अपील की गई थी और उसमे से 24 को प्रतिबंधित कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार 18.58 लाख खातों में से ज्यादातर को कंपनी ने अपने संसाधनों के जरिये हानिकारक व्यवहार के आधार पर प्रतिबंधित किया है।

Published / 2022-03-02 08:18:53
रूस की सरकारी मीडिया पर शिकंजा कस रहीं गूगल समेत प्रमुख कंपनियां

एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री पर शिकंजा कसते हुए गूगल समेत प्रमुख तकनीकी कंपनियां रूस की सरकारी मीडिया को अपने मंचों का उपयोग करने से रोकने की तरफ कदम बढ़ा रही हैं ताकि वे दुष्प्रचार एवं गलत सूचनाओं को प्रसार नहीं कर सकें। गूगल ने मंगलवार को घोषणा की कि वह यूरोप में ऐसे यूट्यूब चैनल को तत्काल प्रभाव से ब्लॉक कर रहा है। हालांकि, साफ किया कि इसे पूरी तरह प्रभावी होने में थोड़ा समय लगेगा। इसके अलावा, सोशल मीडिया मंचों का संचालन करने वाली अमेरिका की अन्य प्रमुख कंपनियों ने भी क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति कार्यालय) की पहुंच को सीमित करने को लेकर जबरदस्त बदलाव किए हैं। इसके तहत ट्विटर ने इनके द्वारा साझा की गई सामग्री पर एक लेबल लगाया है ताकि लोगों को पता चल सके कि ये सामग्री रूसी सरकार द्वारा प्रसारित है। इससे इतर आर्थिक झटका देते हुए रूसी मीडिया के चैनल की विज्ञापन से होने वाली आय में भी कटौती की जा रही है। फेसबुक की पूर्व जननीति निदेशक केटी हारबथ का कहना है कि अमेरिकी कंपनियों द्वारा उठाए गए ये कदम क्रेमलिन द्वारा कथित तौर पर सोशल मीडिया मंचों का सहारा लेकर दुष्प्रचार करने से रोकना है। फेसबुक और इंस्टाग्राम का संचालन करने वाली कंपनी मेटा ने सोमवार को घोषणा की कि वह यूरोप में रूस की रशिया टुडे (आरटी) और स्पुतनिक सेवाओं की पहुंच को सीमित करेगी। इसके बाद गूगल ने भी मंगलवार को यूरोप में इन दोनों सेवाओं के यूट्यूब चैनल प्रतिबंधित करने का ऐलान किया। हालांकि, आरटी और अन्य रूसी सरकारी मीडिया के फेसबुक पेज अमेरिका में प्रभावित नहीं हुए हैं।

Published / 2022-03-01 17:58:51
विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है, यहां जानें...

एबीएन डेस्क। विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है, इसका जवाब आसान नहीं है; क्योंकि धरती घूम रही है। ऐसे में धरती का कौन सा इलाका सूर्य के सबसे पहले आता है यह बताना काफी मुश्किल है। हालांकि अब मनुष्य ने अपने हिसाब से धरती को अक्षांश, देशांतर के रूप में विभाजित किया है। साथ ही पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण चार दिशाएं भी तय की हैं। दुनिया में जापान का मिनामी तोरीशीमा धुर पूर्व में है। इसलिए वहां सबसे पहले सूर्योदय मान सकते हैं। अभी तक जापान को सबसे पहले सूर्योदय की धरती माना जाता था लेकिन सभी देशों ने GMT (Greenwich Mean Time) के टाइम को मान्यता दे दी है। ऐसे में न्यूज़ीलैंड अपने आप सूर्योदय की धरती बन गयी है। एक तरफ जहां न्यूज़ीलैंड का समय GMT+13 है। वहीं दूसरी तरफ जापान का समय GMT+9 है। जिस वक्त न्यूज़ीलैंड में सुबह के 6 बज रहे होते हैं, उस वक्त जापान में रात के 2 बज रहे होते हैं। इसके अलावा जब भी न्यू इयर यानी नए साल की बात आती है, तो सबसे पहले न्यूज़ीलैंड में न्यू इयर मनाया जाता है। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में मनाया जाता है। ऐसे में नए टाइम जोन के अनुसार दुनिया में सबसे पहले सूरज न्यूज़ीलैंड में निकलता है। तो अब आप जान गए होंगे कि विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है। पुराने जमाने में जापान को सूर्योदय की धरती मानी जाती थी। लेकिन अब नए टाइम जोन GMT के अनुसार न्यूज़ीलैंड वह देश है जहां सबसे पहले सूर्योदय होता है। भारत की बात करें, तो अरुणाचल प्रदेश वह राज्य है जहां सबसे पहले सूरज निकलता है। इस राज्य में डोंग वैली की देवांग घाटी में सबसे पहले सूर्य उगता है। इसे देखने देश विदेश से पर्यटक आते रहते हैं।

Published / 2022-02-27 15:19:15
आखिर टायर का रंग काला ही क्यों होता है...

एबीएन डेस्क। टायर का रंग काला क्यों होता है लाल, पीला या सफ़ेद क्यों नहीं होता? तो आज हम आपको इसी बारे में बताने जा रहे हैं और इसके पीछे का कारण भी बतायेंगे। टायर की बात करें तो हर आदमी इस चीज से वाकिफ होगा क्योंकि टायर किसी भी वाहन का प्रमुख अंग है। टायर की वजह से ही एक वाहन लम्बा सफ़र तय कर पाते हैं। लेकिन टायर को देखकर भी यही सवाल उठता है कि ये टायर काले क्यों होते हैं और अब तो टेक्नोलॉजी में काफी बदलाव आ गया। अब भी टायरों को किसी दूसरे कलर में क्यों नहीं बनाया जाता है? भारत में लगभग सभी चीजें काफी बाद में आती है। लेकिन जो देश टेक्नोलॉजी में सबसे आगे है वहां के वाहन के टायर अभी भी काले क्यों बनाये जा रहे हैं? तो जानेंगे इसके पीछे की वजह। टायर का इतिहास काफी पुराना है क्योंकि आदिमानव के ज़माने भी टायर बनाये जाते थे। लेकिन उस समय रबर जैसी किसी चीज की खोज नहीं हुई थी। जब रबर की खोज हुई तो इसके टायर भी बनाये गए, जो काफी काम में आने लगे। लेकिन अभी भी इन टायर में कमी थी क्योंकि साधारण रबर के टायर जल्दी घिस जाते थे। इसके बाद थोड़ी और रिसर्च की गयी और पाया गया कि रबर में कार्बन और सल्फर मिलाकर इसे मजबूत किया जा सकता है। वैसे आपको पता होगा कि रबर का प्राकतिक रंग स्लेटी होता है लेकिन जब इसमें कार्बन और सल्फर मिलाया जाता है तो इसका रंग काला हो जाता है। रबर में कार्बन मिलाने से बहुत बड़ा फायदा हुआ है क्योंकि जहां साधारण रबर से बना टायर 10 किलोमीटर चल सकता है वहीं कार्बन और सल्फर युक्त रबर का टायर 1 लाख किलोमीटर से ज्यादा चल सकता है इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि टायर बनाने के लिए रबर में कार्बन और सल्फर मिलाना कितना जरुरी है। चुकीं रबर में कार्बन और सल्फर मिलाते है इसलिए टायर का रंग काला हो जाता है। क्या होगा अगर टायर को किसी दूसरे कलर में बनाया जाए : आपने छोटे बच्चों की साईकिल में लगे रंगीन टायर को देखा होगा इनके रंगीन होने की वजह से ही ये टायर ज्यादा समय तक नहीं चल पाते है। हालांकि ये रंगीन टायर ठोस होते हैं। इनमें किसी भी तरह से हवा नहीं भरी जाती है इसलिए ये टायर थोड़ी टक्कर दे जाते हैं। अब आप भी जानना चाहते होंगे कि क्या होगा अगर टायर को किसी कलर में बनाया जाए। वैसे आपको इस सवाल का जबाव मिल गया होगा। रंगीन टायर ज्यादा देर तक नहीं टिकेंगे क्योंकि जब टायर को रंगीन करने के लिए उसमें रंगीन पदार्थ मिलाया जायेगा, तो टायर में कार्बन और सल्फर की मात्रा पर असर पड़ेगा और हमें पता है कि टायर कार्बन और सल्फर की वजह से ही मजबूत रहते है। हालांकि अभी तक कई कंपनियां रंगीन टायर बना चुकीं है, लेकिन इनका बहुत कम प्रयोग हो रहा है। अब आप जान गए होंगे कि टायर का रंग काला क्यों होता है। आपने कभी टायर को जलते हुए देखा होगा तो उसमें काला धुआं निकलता है वो कार्बन का काला धुआं होता है। अभी कार्बन युक्त टायर काफी अच्छी सर्विस दे रहे हैं। इसलिए इनके कलर में कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहा है। लेकिन जिस तरह से टेक्नोलॉजी में बदलाव देखने मिल रहा है। टायर के कलर बदलने का समाधान भी ढूढ़ लिया जायेगा और भविष्य में आपको सड़क पर चल रहे बड़े वाहनों में भी रंगीन टायर देखने को मिल सकते हैं।

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