ज्ञान विज्ञान

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Published / 2022-03-23 16:29:40
अंतरिक्ष घूमने जा रहे लोगों का खर्च आखिर कितना होता होगा...

एबीएन नॉलेज डेस्क। ऐसे बहुत कम लोग होंगे, जिन्हें घूमना पसंद नहीं होगा। हर कोई घूमना पसंद करता है। कोई एक शहर से एक शहर तो कोई दूसरे राज्य घूमने जाते हैं। वहीं, जिनका बजट ज्यादा होता है वो दूसरे देशों में घूमने जाते हैं। लेकिन, अब तो लोगों ने स्पेस में जाना शुरू कर दिया है और अंतरिक्ष में घूमने जा रहे हैं। आपने खबरों में पढ़ा होगा कि अब आम लोग भी अंतरिक्ष में घूमने जा रहे हैं। इस खबर के बाद लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर अंतरिक्ष जाने में कितने रुपये खर्च होते हैं। अंतरिक्ष घूमने जा रहे हैं लोग : अब अंतरिक्ष में सैलानियों को ले जाने की बात की जा रही है। कुछ लोग तो हाल ही में अंतरिक्ष में जाकर आ चुके हैं। कुछ दिनों से अंतरिक्ष घूमने का आइडिया काफी जोर पकड़ रहा है। वैसे ये बात दूसरी है कि आपके इस शौक के लिए पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। यानी जब एक बार अंतरिक्ष जाते हैं तो इस ट्रिप में पर्यावरण काफी प्रदूषित होता है। पर्यावरण पर होने वाले नुकसान के बारे में चर्चा करने से पहले आपको बताते हैं कि इसमें कितना खर्चा होना वाला है। कितना होगा खर्चा : बता दें कि रिचर्ड ब्रैंसन, जेफ बेजोस, एलॉन मस्क जैसे अरबपति लोगों को अंतरिक्ष की सैर करवाने में जुटे हैं। रिचर्ड ब्रैंसन की कंपनी ने अब लोगों से बुकिंग भी शुरू कर दी है और इसमें बुकिंग करके अंतरिक्ष में जाया जा सकता है। लेकिन, अगर इसकी कीमत की बात करें तो अंतरिक्ष में जाने की बुकिंग के लिए 4.5 लाख डॉलर की जरूरत है यानी करीब 3 करोड़ 43 लाख रुपये। ये टिकट वो ही बुक करवा सकते हैं, जिन्होंने पहले से करीब डेढ़ लाख डॉलर देकर बुक किया हुआ है। मगर इसकी शुरुआत अभी नहीं की जाएगी और 1000 लोगों की बुकिंग होने के बाद ये ट्रिप शुरु होगी। अभी तक कई फ्लाइट स्पेस में भेजी है। जब स्पेसएक्स ने अपनी फ्लाइट आकाश में भेजी थी तो उन्होंने 4 लोगों को 3 दिन के लिए भेजा था। हालांकि, अभी तक इन कंपनियों ने घोषणा नहीं की है कि अंतरिक्ष घूमाने के लिए उन्होंने कितने रुपये लिए थे। वैसे आपको बता दें कि स्पेस में जाने से पहले से कई टेस्ट और लंबी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। उसके बाद ही इच्छुक लोगों को अंतरिक्ष में भेजा जाता है। पहले कई रिपोर्ट्स में एपी के हवाले से कहा गया है कि स्पेस में जाने वाले लोगों का करीब 55 मिलियन का खर्चा होने वाला है। भारतीय करेंसी में इस कंवर्ट करें तो यह 401,65,48,250 यानी 4 अरब 1 करोड़ 65 लाख 48 हजार 250 रुपये होता है। ऐसे में अगर आपको भी कभी स्पेस में जाने का अवसर मिलता है तो आपके पास कम से कम इतने रुपये होने चाहिए। वहीं, जोफ बेजोस की यात्रा के लिए कहा गया कि बेजोस महज चार मिनट तक अंतरिक्ष में रहे, इसके लिए उन्होंने करीब 5.4 अरब डॉलर (लगभग 4,01,94,76,50,000 रुपये) खर्च किए।

Published / 2022-03-23 15:03:03
ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का भारत ने किया सफल परीक्षण

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने बुधवार को सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया। यह परीक्षण अंडमान और निकोबार में किया गया। रक्षा अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विस्तारित दूरी की मिसाइल ने सटीकता के साथ अपने लक्ष्य को हासिल किया। उन्होंने कहा कि एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने सतह से सतह पर मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के सफल परीक्षण पर बधाई दी। वह परिचालन तैयारियों की समीक्षा करने के लिए अंडमान और निकोबार के द्वीप क्षेत्र में हैं। इससे पहले इसी महीने 13 मार्च को भारत ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। दरअसल, भारत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का एक नया एयर लॉन्च संस्करण विकसित करने की फिराक में है, जो दुश्मन के ठिकानों पर अधिक से अधिक हमला करने में सक्षम होगा। इस मिसाइल से 800 किलोमीटर की दूरी तक हमला किया जा सकता है। इससे पहले Su-30MKI लड़ाकू विमान को लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्य को भेदने की क्षमता थी, जिसे बढ़ाकर 350-400 किया गया था। अब इसके 800 किमी वाले वेरिएंट पर काम किया जा रहा है।

Published / 2022-03-20 12:51:48
...ऐसा कपड़ा, जिसे पहनने वाला सुन सकेगा अपने दिल की धड़कन

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अभी तक आप अपने दिल की धड़कनों, पल्स व अन्य तरह की चीजों की निगरानी के लिए स्मार्टवॉच का ही उपयोग करते थे, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने ऐसा कपड़ा बनाने में सफलता हासिल की है, जिसकी मदद से आप आसानी से दिल और सांसों की निगरानी कर सकेंगे। दरअसल, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) और रोड आइलैंड स्कूल ऑफ डिज़ाइन (आरआईएसडी) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा फैब्रिक (कपड़ा) बनाया है, जिसकी मदद से हम अपनी दिल की धड़कनों और सांसों को आसानी से सुन सकते हैं। इसके अलावा आस-पास की धीमी आवाजों को भी सुना जा सकता है। यह फैब्रिक माइक्रोफ़ोन व स्पीकर दोनों की तरह काम करता है। त्वचा के साथ करता है इंटरफेस : यह शोध एक नेचर जर्नल में प्रकाशित हुई है। प्रमुख वैज्ञानिक एमआईटी के वेई यान कहते हैं कि यह कपड़ा मानव त्वचा के साथ स्पष्ट रूप से इंटरफेस कर सकता है, जिससे पहनने वाला अपने दिल और श्वसन की स्थिति पर निगरानी कर सकता है। वह कहते हैं कि हम इसे और भी ज्यादा अपग्रेड करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह स्पेसफ्लाइट और यहां तक कि बिल्डिंग-क्रैक तक को मॉनीटर कर सके। कैसे सुनाई देती है आवाज : वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिस तरह से एक माइक्रोफोन काम करता है ठीक वैसे ही यह कपड़ा ध्वनि को यांत्रिक कंपन में परिवर्तित करता है। इसके बाद इन कंपन को विद्युत संकेतों में बदल लेता है, जिस तरह से हमारे कान काम करते हैं। एमआईटी के वैज्ञानिक योएल फिंक कहते हैं कि हम मानव शरीर के कान के पर्दे ने इस तरह का कपड़ा बनाने के लिए प्रेरित हुए बाद में यह सामने आया कि कान का पर्दा भी एक तरह के फैब्रिक से ही बना होता है।

Published / 2022-03-19 06:01:14
बादलों में तो पानी भरा होता है… फिर रंग काला क्यों?

एबीएन नॉलेज डेस्क। जब भी बारिश आने वाली होती है तो आसमान में बादल छा जाते हैं और काले बादल आने के साथ ही कुछ देर में बारिश शुरू हो जाती है। आपने भी यह अनुभव किया होगा कि बादल कभी काले तो कभी सफेद रंग के दिखाई देते हैं। तो आज हम आपको इसका कारण बताते हैं कि आखिर बादलों का रंग काला क्यों हो जाता है। बादलों में मौजूद पानी की बूंदें या महीन कणें सूर्य से निकलने वाली किरणों को रिफ्लेक्ट कर देती हैं। आसान शब्दों में कहें तो किरणों को वापस भेज देती हैं और सिर्फ सफेद रंग ही बचता है। बादल सूर्य से निकलने वाली सफेद किरणों को अवशोषित कर लेते हैं। इसलिए हमें बादल का रंग सफेद दिखता है। इसको आप इस तरह से भी समझ सकते हैं। बादलों में बर्फ या पानी की बूंदे होती हैं, वो सूर्य से निकलने वाली किरणों के वेवलेंथ से बड़ी होती हैं और जैसे ही सूर्य की किरणें इन पर पड़ती हैं, वह इन्हें रिफ्लेक्ट कर देती हैं और बादल हमें सफेद दिखने लगता है। ठीक इसके उलट प्रक्रिया होती है तो बादल हमें काले दिखते हैं। मतलब जब बादल में पानी की बूंदें सभी रंगों को अवशोषित कर लेती हैं तो बादलों का रंग काला नजर आता है। जो वस्तु जिस रंग को अवशोषित कर लेती हैं, वह उसी रंग की दिखाई देती है। अगर कोई वस्तु सारे रंग को रिफ्लेक्ट कर देगी तो वह सिर्फ सफेद दिखाई देगी और जो सभी रंगों को अवशोषित कर लेगी, वह काले रंग की दिखने लगेगी। बादलों के काले रंग का दिखने का एक और कारण है। अगर बादल काफी घने और ऊंचाई पर हैं तो वे काले दिखाई देंगे। वहीं, बादलों के काले रंग के होने के पीछे मोटाई भी एक वजह है। अगर बादलों की मोटाई ज्यादा होगी तो तो सूर्य की बहुत ही कम किरणें उससे पास होंगी। इसका असर यह होगा कि बादल गहरे रंगा का या काला दिखाई देगा।

Published / 2022-03-18 14:11:37
इसरो के लिए एचईसी में बने देश के पहले व्हील बोगी सिस्टम का ट्रायल सफल

टीम एबीएन, रांची। एचईसी ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगायी है। रॉकेट के प्रक्षेपण के लिए सबसे संवदेशनील और जटिलतम उकरण व्हील बोगी सिस्टम का निर्माण किया है। गुरुवार को एचएमबीपी में इसरो के विशेषज्ञों की मौजदूगी में इसका ट्रायल किया गया जो शत प्रतिशत सफल रहा है। एचईसी ने इसरो के लिए इसका निर्माण किया है। अधिकारियों के अनुसार व्हील बोगी सिस्टम पीएसएलवी (रॉकेट) एकीकरण प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह रॉकेट को असेंबली बिल्डिंग से लांच पैड तक ले जाता है। रॉकेट के सफल प्रक्षेपण के लिए आवश्यक प्रक्षेपण तक निर्देशित भी करता है। डेडिकेटेड होलर वाहन द्वारा संचालित 1.5 किमी के रेल ट्रैक पर चलता है। इसका वजन 85 टन है और यह लगभग 900 टन परिवहन करने में सक्षम है। इस उपकरण का निर्माण काफी चुनौतीपूर्ण था। इसके निर्माण के लिए लॉ एलॉय स्टील विकसित किया गया। इसकी डिजाइन तैयार की है। जटिलतम वेल्डिंग, मशीनिंग के बाद इसकी असेंबलिंग की गयी है। गुरुवार को एचएमबीपी के 043-044 शॉप में व्हील बॉगी सिस्टम का ट्रायल किया गया जो सफल रहा। ट्रायल के दौरान प्लांट के कामगार, अधिकारी, इसरो के विशेषज्ञ मौजूद थे। इसरो के अधिकारी ने बताया कि यह पहली बार है कि इतनी उच्च क्षमता वाली व्हील बोगी प्रणाली भारत में बनी है। यह इसरो के साथ एचईसी के सहयोग के लिए एक नया रास्ता खोलती है। भविष्य में इस तरह के राष्ट्रीय महत्व के कार्यादेश से एचईसी के लिए नया मार्ग प्रशस्त होगा।

Published / 2022-03-13 18:06:57
अखबार आखिर क्यों पड़ जाता है पीला, जानें इसके पीछे का विज्ञान...

एबीएन डेस्क। अखबार तो रोज पढ़ते होंगे, पर कभी ध्यान दिया है कि जब सुबह आपको न्यूजपेपर मिलता है तो सफेद दिखता है। जैसे-जैसे दिन बीतता है इसके कागज का रंग पीला पड़ने लगता है. सिर्फ अखबार ही नहीं, किताबों के साथ भी ऐसा होता है। जैसे-जैसे महीने और साल बीतते हैं, इनका भी रंग पीला पड़ने लगता है। जानिए ऐसा क्यों होता है… अर्थस्काय की रिपोर्ट के मुताबिक, कागज को लकड़ी से तैयार किया जाता है। लकड़ी में दो तरह के तत्व होते हैं : सेल्यूलोज और लिगनिन। इसलिए लकड़ी से तैयार होने वाले कागज में भी यह दोनों चीजें पाई जाती हैं। इसके असर के कारण कागज का रंग बदलता है। ऐसा होता कैसे है, अब इसे समझते हैं। कागज में मौजूद लिगनिन के कण जब हवा और सूरज की रोशनी के सम्पर्क में आते हैं तो रिएक्शन करते हैं, इसे ऑक्सीडेशन कहते हैं। इस दौरान लिगनिन के कण अधिक मात्रा में सूरज की किरणों को एब्जॉर्ब करते हैं। जितना ज्यादा ये किरणों को एब्जॉर्ब करते हैं कागज का रंग गहरा होने लगता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यही वजह है कि घर पर मौजूद अखबार के मुकाबले खुले रखा न्यूजपेपर शाम तक पीला या भूरा नजर आता है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि हर तरह के कागज में लकड़ी का प्रयोग होता है तो सभी कागज पीले क्यों नहीं होते? विशेषज्ञों का कहना है, कुछ दूसरी तरह के पेपर्स में इतनी तेजी से रंग नहीं बदलता। इसकी भी एक वजह है। महंगे पेपर्स के साथ ऐसा बहुत धीमी गति से होता है क्योंकि पेपर को तैयार करने के बाद इसमें से लिगनिन को बाहर निकाल दिया जाता है। इसलिए पेपर में लिगनिन न मौजूद होने पर सूरज की रोशनी के साथ रिएक्शन नहीं होती। नतीजा, वो पेपर पीला नहीं पड़ता।

Published / 2022-03-12 18:03:57
सिक्के पर बने अंगूठे के निशान का आखिर मतलब क्या है...

एबीएन डेस्क। आपने देखा होगा कि बाजार में कई तरह के सिक्के चलन में हैं। कई सिक्के ऐसे भी आपने देखे होंगे, जिसमें एक और दो रुपये के सिक्के में हाथ के निशान बने होते हैं। ये सिक्के सिर्फ डिजाइन के लिए नहीं है, बल्कि इसका एक खास मतलब होता है। साथ ही इन सिंबल के पीछे भी एक कहानी है, जो बताती है कि इन हाथों को क्या मतलब हैतो जानते हैं इन सिंबल से जुड़ी खास बातें... ये सिंबल भारतनाट्यम डांस से लिए गए हैं। यानी ये जो सिंबल आप सिक्के पर देखते हैं, वो भारतनाट्यम डांस की मुद्राएं हैं। ये मुद्राएं ही एक और दो रुपये के बारे में बताते हैं। इस पर डिजाइन का काम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन के प्रोफेसर अनिल सिन्हा ने किया था। साथ ही ये हस्त मुद्राएं होती हैं। इसमें आयरन 83 फीसदी होता है और 17 फीसदी क्रोमियम होता है। बता दें कि ये सिक्के साल 2007 में आए थे।

Published / 2022-03-10 07:28:09
दवा की शीशियों पर ढक्‍कन से पहले रूई... क्या है इसके पीछे का विज्ञान

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अक्सर देखा होगा जिन ट्रांसपेरेंट शीशियों में दवा की टेबलेट्स रखकर मरीजों को दी जाती हैं उसमें ढक्कन लगाने से पहले रूई रखी जाती है। कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है। ऐसा खासकर होम्योपैथिक दवाओं के मामले में अधिक देखा जाता है। डॉक्टर शीशी में दवा डालने के बाद उसमें कुछ रूई डालते हैं। इसके बाद ही ढक्कन बंद करते हैं। जानिए ऐसा क्यों होता है। रीडर डाइजेस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा करने की शुरुआत 1900 में हुई। कहा जाता है, सबसे पहले फार्मा कंपनी बायर ने ऐसा किया। कंपनी दवा की जिन शीशियों की डिलीवरी करती थी उसमें रूई को गेंद जैसा आकार बनाकर शीशी में रखते थे। दवा की बड़ी कंपनी होने के कारण इस ट्रेंड को दूसरी कंपनियों ने भी फॉलो किया। कंपनी ने ऐसा क्यों किया, इसकी भी एक खास वजह थी। कंपनी का मानना है कि अगर दवाओं से भरी शीशी में रूई लगाई जाती है तो इनके टूटने की आशंका कम हो जाएगी। इसके अलावा डोज की मात्रा घटेगी नहीं। यह समान मात्रा में बनी रहेगी। अगर कोई कस्टमर शीशी को खोलता है तो उसे परेशान नहीं होना पड़ेगा, इसलिए ऐसा किया गया। यह चलन शुरू होने के बाद 1980 में बड़ा बदलाव आया जब टेबलेट के बाहरी हिस्से में ऐसी लेयर बनाई जाने लगी जिससे इन्हें शीशी में रखने पर ये टूटे नहीं। दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने 1999 में ऐसा करना बंद कर दिया। हालांकि स्थानीय स्तर पर फार्मेसी ने ऐसी होम्योपैथिक दवाएं जिनमें अल्कोहल का प्रयोग नहीं किया जाता, उनके लिए रूई का प्रयोग करना जारी रखा। लम्बे समय से मरीजों को ऐसा देखते हुए दवा की खास देखभाल करने की आदत सी हो गई थी। इसलिए मरीज खुद से भी यही काम करने लगे थे। यही कारण था कि कई कंपनियों ने शीशी में रूई रखने का चलन फिर से शुरू किया, जो खासतौर पर होम्योपैथिक दवाओं के मामले में आज भी जारी है।

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