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Published / 2022-04-07 17:18:13
नेटवर्क होने के बावजूद कॉल नहीं कर पा रहे जियो यूजर्स

एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश के कुछ हिस्सों में रिलायंस जियो का नेटवर्क डाउन होता दिख रहा है। उपयोगकर्ताओं ने अपनी शिकायतों की रिपोर्ट करने के लिए माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर और डाउनडेक्टर का सहारा लिया है। ज्यादातर यूजर्स का कहना है कि नेटवर्क होने के बावजूद वे कॉल नहीं कर पा रहे हैं। कंपनी ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। आउटेज ट्रैकिंग वेबसाइट डाउनडेक्टर का कहना है कि जियो का नेटवर्क रात 8:06 बजे से बंद है। वेबसाइट के अनुसार, लगभग 66 प्रतिशत उपयोगकर्ता सिग्नल प्राप्त करने में असमर्थ थे। नेटवर्क की समस्या केवल मोबाइल उपयोगकर्ताओं के लिए सामने आई है। कंपनी की ब्रॉडबैंड सेवा अप्रभावित रही। कई उपयोगकर्ताओं ने ट्विटर पर उन मुद्दों के बारे में पोस्ट किया जिसका वे सामना कर रहे थे। एक यूजर ने कहा कि पूरा नेटवर्क मिलने के बावजूद वह कॉल नहीं कर पा रहा था।

Published / 2022-04-06 17:25:24
आज या कल तक धरती पर आ सकता है सौर तूफान

एबीएन नॉलेज डेस्क। केतिक तस्वीर धरती के स्पलैश जोन वैक्यूम आॅप स्पेस में सोलर साइकिल के तेज होने के साथ सूर्य तेजी से प्लाज्मा को बाहर निकाल रहा है। नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के तहत आने वाले द स्पेस वेदर प्रेडिक्शन सेंटर ने बुधवार और गुरुवार को सौर विकिरण तूफान की भविष्यवाणी की है क्योंकि सूर्य रविवार को सतह पर खुलने वाली दर्रे से प्लाज्मा के फिलामेंट्स को बाहर निकाल रहा है। अमेरिका स्थित अंतरिक्ष पर्यवेक्षक ने सूर्य पर S22H30 के पास केंद्रित फिलामेंट विस्फोट से कोरोनल मास इजेक्शन के प्रत्याशित आगमन के जवाब में एक छोटे भू-चुंबकीय तूफान के लिए अलर्ट जारी किया। एजेंसी ने चेतावनी दी कि पृथ्वी पर सौर विकिरण तूफान आने की संभावना है जिसमें प्रोटॉन का स्तर 1 (माइनर) लेवल से अधिक है। कल तक सौर तूफान के बढ़ने की संभावना : भू-चुंबकीय तूफान के 7 अप्रैल तक बढ़ने की संभावना है, जिससे पृथ्वी की निचली कक्षा में सेटेलाइट्स पर मामूली प्रभाव के साथ-साथ बिजली ग्रिड में उतार-चढ़ाव और उच्च ऊंचाई पर आॅरोरस (उत्तरी रोशनी और दक्षिणी रोशनी) हो सकता है। भू-चुंबकीय तूफान से छोटे रेडियो ब्लैकआउट भी हो सकते हैं। -चुंबकीय तूफान पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर की एक बड़ी गड़बड़ी है जो तब होती है जब सौर हवा से पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण में ऊर्जा का एक बहुत ही कुशल आदान-प्रदान होता है। विस्फोट का नवीनतम स्रोत ह्यआग की घाटी : विस्फोट का नवीनतम स्रोत एक स्थान है जिसे आग की घाटी कहा जाता है, जो कि स्पेस वेदर के अनुसार, चुंबकत्व का एक काला रेशा है जो सूर्य के वातावरण में खुल गया है। घाटी की दीवारें कम से कम 20,000 किमी ऊंची और 10 गुना लंबी हैं। कई विशेषज्ञों की ओर से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि चुंबकीय फिलामेंट्स के टुकड़े विस्फोट स्थल से पृथ्वी की दिशा में सीएमई के रूप में निकल सकते हैं।

Published / 2022-04-02 10:01:27
जानें बुध ग्रह पर आने वाले चुंबकीय तूफान के मायने

एबीएन नॉलेज डेस्क। हमारे सौरमंडल में पृथ्वी बहुत अनोखा ग्रह है। इसकी बहुत सारी विशेषताएं हैं जो सौरमंडल के किसी दूसरे ग्रह में नहीं होती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिक भी दूसरे ग्रहों का अध्ययन कर यह पता लगाने का प्रयास करते रहते हैं कि कहीं किसी ग्रह या उपग्रह में पृथ्वी जैसी विशेषताएं तो नहीं हैं। अब अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने यह सिद्ध किया है कि हमारे सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह, बुध में भी भूचुंबकीय तूफान आते हैं जैसे कि पृथ्वी पर आते हैं। इससे पहले यह माना जाता था कि भूचुंबकीय तूफान केवल पृथ्वी पर ही आ सकते हैं, लेकिन इस खोज ने यह धारणा बदल दी है। क्या दूसरे ग्रहों में आ सकता है ऐसा तूफान : इस शोध में अमेरिक, कनाडा और चीन के वैज्ञानिक शामिल थे जिसमें अलास्का फेयरबैंक्स जियोफिजिकल इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी के अंतरिक्ष भौतिकी की प्रोफेसर हुई जांग की प्रमुख भूमिका थी। शोधकर्ताओं ने सबसे पहले इस प्रश्न का समाधान निकाला कि क्या दूसरे ग्रहों में भूचुंबकीय तूफान हो सकता है या नहीं। प्रमुख प्रश्नों के उत्तर : शोधकर्ताओं का प्रयास यह जानने का था कि क्या किसी ग्रह के आकार की इस तरह के तूफानों के होने की निर्भरता होती है या नहीं या क्या दूसरे ग्रहों में भी पृथ्वी की तरह आयनमंडल होता है। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के नतीजे दो शोधपत्रों में पिछले महीने ही प्रकाशित किए हैं जिसमें जांग दोनों ही पत्रों में सहलेखक हैं। वलय प्रवाह : पहले शोधपत्र में यह सिद्ध किया गया है कि बुध ग्रह के पास डोनट के आकार का एक वलय प्रवाह का क्षेत्र है जिसमें आवेशित कण ध्रुवों को छोड़कर ग्रह के चारों ओर घूम रहे हैं। वहीं दूसरे शोधपत्र में शोधकर्ताओं ने यह सिद्धकिया है कि इस वलय प्रवाह के कारण ही बुध में भूचुंबकीय तूफान आते हैं। सौर पवनों का व्यवधान : भूचुंबकीय तूफान किसी ग्रह के मेग्नेटोस्फियर में वह व्यवधान होते हैं जो सौर पवनों की ऊर्जा के हस्तांतरण के कारण पैदा होते हैं। ऐसे ही भूचुंबकीय तूफान के कारण पृथ्वी के ध्रुवों पर ऑरोर बनते हैं और उनकी वजह से रेडियो संचार को नष्ट कर सकते हैं। यह पड़ताल चाइना टेक्नोलॉजिकल साइंसेस नाम के जर्नल में प्रकाशित हुई हैं। वलय प्रवाह के आधार पर : इसअध्ययन के लेखक पेकिंग यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑप स्पेस फिजिक्स एंड एप्लाइड टेक्नोलॉजी के क्वीगांग जोंग हैं। वह शोधपत्र एक ही दिन पहले प्रकाशित शोधपत्र के आधार पर है जिसने आंकड़ों के आधार पर यह पुष्टि की कि बुध ग्रह के पास एक वलय प्रवाह है। पृथ्वी के पास भी एक वलय प्रवाह है। पृथ्वी के जैसे ही तूफान : वलय प्रवाह वालाशोध पत्र नेच कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित हुआ है जिसके लेखक जिउटोंग झाओ हैं जो पेकिंग यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑप स्पेस फिजिक्स एंड एप्लाइड टेक्नोलॉजी के ही हैं। इन शोधों में भाग लेने वाले कुल 14 वैज्ञानिकों में से सात दोनों में शामिल थे। शोधकर्ताओं ने बताया कि बुध पर इन तूफानों की प्रक्रियाएं पृथ्वी की तूफानों के जैसी ही थीं। फर्क इतना है कि बुध का मैग्नेटिक फील्ड बहुत कमजोर है और वहां कोई वायुमंडल नहीं है। इन तूफानों की पुष्टि मैसेंजर प्रोब के आंकड़े और सूर्य से निकलने वाली कोरोना द्रव्य उत्क्षेपण के अध्ययन से हो सकी थी। अप्रैल 2014 में सूर्य से निकलने वाली इस आवेशित प्लाज्मा ने इस वलय को दबा दिया था और उसकी ऊर्जा बहुत बढ़ा दी थी। इसी वजह से भूचंबकीय तूफान आया था।

Published / 2022-04-02 03:35:36
फाल्कन-9 : स्पेसएक्स ने सफलतापूर्वक की रॉकेट की लॉन्चिंग

एबीएन नॉलेज डेस्क। स्पेसएक्स ने फ्लोरिडा के केप कैनावेरल स्पेस फोर्स स्टेशन से 40 अंतरिक्ष यान को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए फाल्कन-9 रॉकेट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। स्पेसएक्स ने कहा कि लॉन्च कंपनी के चौथे स्मॉलसैट राइडशेयर मिशन का प्रतिनिधित्व करता है। जानकारी के अनुसार, फाल्कन-9 रॉकेट को अंतरिक्ष में 40 अंतरिक्ष यान ले जाया जाता है, जिसमें क्यूब उपग्रह, सूक्ष्म उपग्रह, पिकोसैट, गैर-तैनाती होस्टेड पेलोड और अंतरिक्ष यान ले जाने वाला एक कक्षीय स्थानांतरण वाहन शामिल है, जिसे बाद में तैनात किया जाना है।

Published / 2022-03-31 17:43:34
कहां बना दुनिया का सबसे लंबा हैंगिंग ब्रिज? जानें इसकी खूबियां...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूरोप और एशिया को जोड़ने वाला दुनिया का सबसे लम्बा हैंगिंग आम जनता के लिए खोल दिया गया है। तुर्की में बना यह ब्रिज कई मायनों में खास है। 20,503 करोड़ रुपये की लागत से बने इस ब्रिज को तैयार होने में 5 साल का वक्त लगा है। इसे तुर्की और दक्षिण कोरिया की कंपनी ने मिलकर तैयार किया है। जानिए, इस ब्रिज की खासियतें और इससे आम लोगों को कितनी राहत मिलेगी। इस ब्रिज का नाम है 1915 कैनेकेल ब्रिज। इसके नाम में 1915 जोड़ने की भी एक खास वजह है। दरअसल, प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश सेना के डडार्नेलेस खाड़ी पर कब्जा करना चाहती है, लेकिन ओटोमन साम्राज्य ने ब्रिटिश सेना के इस मंजूबे पर पानी फेर दिया था। इसलिए इसे यह नाम दिया गया। 6 लेन वाली सड़क के इस ब्रिज की लम्बाई 4.60 किलोमीटर है। वहीं, इसकी चौड़ाई 45.06 मीटर है। इस ब्रिज को तैयार होने में पूरा 5 साल लगा है। ब्रिज के निर्माण की शुरूआत 26 फरवरी, 2017 को हुई थी और 26 जनवरी, 2022 को यह बनकर तैयार हुआ। अब इसे आम लोगों के लिए खोला जा चुका है। कैनेकेल ब्रिज तुर्की का दूसरा सबसे ऊंचा ब्रिज है। इससे पहले से बने यहां के सबसे ऊंचे ब्रिज का नाम है यावुज सुल्तान सलीम ब्रिज। इतना ही नहीं, कैनेकेल ब्रिज यूरोप और एशिया को जोड़ता है। यह ब्रिज अब तुर्की की राजधानी इस्तांबुल के बाहर यूरोप और एशिया को मात्र 6 मिनट की यात्रा से जोड़ देता है। इस ब्रिज पर बने दोनों टावरों की ऊंचाई 1,043 फीट है। ब्रिज बनने से पहले फेरी से खाड़ी को पार करने में डेढ़ घंटा लगता था, लेकिन अब ब्रिज बनने के बाद इसे पार करने में मात्र 6 मिनट का समय लगता है।

Published / 2022-03-28 18:01:22
ऑस्कर ट्रॉफी : किसकी होती है मूर्ति, क्या है सही कीमत...

एबीएन डेस्क। फिल्म जगत के लोगों के लिए एकेडमी अवॉर्ड यानी ऑस्कर सबसे अहम पुरस्कारों में से एक है। आज 94वें ऑस्कर अवॉर्ड्स की घोषणा की जा रही है, जिसपर सभी सिनेमा प्रेमियों की निगाहें टिकी हैं। अगर भारत की बात करें तो एंटरटेनमेंट वर्ल्ड के सबसे बड़े अवॉर्ड के लिए भारत की तरफ से तमिल फिल्म कूजांगल को नॉमिनेट किया गया है। आप ऑस्कर अवॉर्ड्स के विजेताओं की लिस्ट तो देख ही रहे होंगे, लेकिन ऑस्कर अवॉर्ड्स से जुड़ी ऐसी बातें हैं, जो आपको जानना जरूरी है और काफी दिलचस्प भी हैं। ऐसे में आज हम आपको ऑस्कर की ट्रॉफी के बारे में बता रहे हैं, जिसे पाने का हर फिल्ममेकर या कलाकार का सपना होता है। तो जानते हैं कि आखिर ऑस्कर अवॉर्ड्स की जो ट्रॉफी मिलती है, उसमें किसकी मूर्ति होती है और इस खास ट्रॉफी की क्या कहानी है… मूर्ति के पीछे कौन है? बता दें कि पहला ऑस्कर अवॉर्ड इवेंट 16 मई 1929 को आयोजित किया गया था। सन 1927 में एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज की मीटिंग में पहली बार ट्रॉफी के डिजाइन पर चर्चा की गई। इस दौरान लॉस एंजिल्स के कई कलाकारों से अपने-अपने डिजाइन सामने रखने को कहा गया। इस दौरान मूर्तिकार जॉर्ज स्टैनली की बनाई हुई मूर्ति को पसंद किया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑस्कर अवॉर्ड में जो ट्रॉफी दी जाती है कहते हैं कि उसकी प्रेरणा मैक्सिकन फिल्ममेकर और एक्टर एमिलियो फर्नांडीज थे। ऐसे में माना जाता है कि इस मूर्ति के पीछे फर्नांडीज है और ये उनकी ही तस्वीर है। क्या है मूर्ति बनने की कहानी : बता दें कि साल 1904 को मैक्सिको के कोआहुइलिया में जन्में एमिलियो मैक्सिको की क्रांति के दौर में बड़े हुए। हाई स्कूल ड्रॉप आउट फर्नांडीज, ह्यूरितिस्ता विद्रोहियों के ऑफिसर बन गए। उन्हें सजा भी सुनाई गई, लेकिन वो वहां से भाग गए। इसके बाद फर्नांडीज, हॉलीवुड में एक्स्ट्रा वर्क करने लगे। यहां पर उन्हें साइलेंट फिल्म स्टार डोलोरेस डेल रियो ने एल इंडियो नाम दिया था। वह एक्ट्रेस रियो के अच्छे दोस्त बन गए थे। रियो मेट्रो गोल्डविन मेयर स्टूडियो के आर्ट डायरेक्टर और एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य कैड्रिक गिबॉन्स की पत्नी थीं। डेल रियो ने फर्नांडीज को गिबॉन्स से मिलवाया जो उस समय स्टैच्यू की डिजाइन पर काम कर रहे थे। गिबॉन्स ने फर्नांडीज से एक स्केच के लिए पोज देने के लिए कहा जो 8.5 पौंड के वजन वाली ट्रॉफी का आधार था। फर्नांडीज ने बेमन ने पोज दिया और वो आइकॉनिक पोज हो गया। जॉर्ज स्टैनली इसे तैयार किया और लॉस एंजिल्स में सन् 1929 में हुए पहले ऑस्कर समारोह में यही ट्रॉफी सौंपी गई। इसलिए इस ऑस्कर की ट्रॉफी के पीछे फर्नांडीस को माना जाता है। क्या एक डॉलर है इसकी कीमत? ऑस्कर के नियम के अनुसार ऑस्कर विजेता उसकी ट्रॉफी का पूरा मालिकाना हक नहीं होता है। विजेता ट्रॉफी को चाहकर भी कहीं और नहीं बेच सकता। अगर कोई विजेता इस ट्रॉफी को बेचना चाहता है तो तो सबसे पहले यह इस ट्रॉफी को देने वाली अकेडमी को ही बेचना होगा। वहीं एकेडमी इस ट्रॉफी को सिर्फ 1 डॉलर में ही खरीदेगी। इसलिए इस ट्रॉफी की कीमत एक डॉलर मानी जाती है। हालांकि, इसके बनाए जाने की खर्चे की बात करें तो इसमें काफी खर्चा होता है। ऑस्कर में भारत का प्रदर्शन : 94 सालों से चले आ रहे इस अवॉर्ड में अब तक भारत की चार फिल्मों को जगह मिल चुकी है- मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे, श्वास (मराठी) और लगान। पहला ऑस्कर अवॉर्ड 1929 में आयोजित किया गया था, वहीं साल 1957 से भारत की फिल्में ऑस्कर के लिए भेजी जा रही हैं।

Published / 2022-03-27 14:15:52
2023 से "फ्लीट मोड" में एक साथ 10 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण शुरू करेगा भारत

एबीएन सेंट्रल डेस्क। कर्नाटक के कैगा में 2023 में 700 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए नींव डालने के साथ भारत अगले तीन वर्षों में फ्लीट मोड में एक साथ 10 परमाणु रिएक्टरों के निर्माण कार्यों को गति देने के लिए तैयार है। नींव के लिए कंक्रीट डालने (एफपीसी) के साथ परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों का निर्माण अब पूर्व-परियोजना चरण से आगे बढ़कर निर्माण को गति देने का संकेत है, जिसमें परियोजना स्थल पर उत्खनन गतिविधियां शामिल हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अधिकारियों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति को बताया, कैगा इकाइयों 5 और 6 का एफपीसी 2023 में अपेक्षित है, गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजन इकाइयों 3 और 4 और माही बांसवाड़ा राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाई 1 से 4 का एफपीसी 2024 में अपेक्षित है और 2025 में चुटका मध्य प्रदेश परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाइयों 1 और 2 का एफपीसी होने की संभावना है। केंद्र ने जून 2017 में 700 मेगावाट के 10 स्वदेशी विकसित दबावयुक्त भारी जल संयंत्र (पीएचडब्ल्यूआर) के निर्माण को मंजूरी दी थी। ये 10 पीएचडब्ल्यूआर 1.05 लाख करोड़ रुपये की लागत से बनाए जाएंगे। यह पहली बार है जब सरकार ने लागत कम करने और निर्माण के समय में तेजी लाने के उद्देश्य से एक बार में 10 परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के निर्माण को मंजूरी दी थी। डीएई अधिकारी कहा कि फ्लीट मोड परियोजनाओं के लिए थोक स्तर पर खरीद की जा रही थी जिसमें स्टीम जेनरेटर, एसएस 304 एल जाली ट्यूब और एंड शील्ड के लिए प्लेट, प्रेशराइजर फोर्जिंग, ब्लीड कंडेनसर फोर्जिंग, 40 स्टीम जनरेटर के लिए इंकोलॉय-800 ट्यूब, रिएक्टर हेडर के निर्माण के लिए ऑर्डर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि गोरखपुर इकाई 3 और 4 तथा कैगा इकाई 5 और 6 के टरबाइन आइलैंड के लिए इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण पैकेज प्रदान किए गए हैं। फ्लीट मोड के तहत पांच साल की अवधि में एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण की उम्मीद है।

Published / 2022-03-27 12:35:31
बालासोर : सतह से हवा में मारने वाली मिसाइल का परीक्षण सफल

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने आज ओडिशा के बालासोर तट पर मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल वायु रक्षा प्रणाली (का सफल परीक्षण किया है। यह परीक्षण बालासोर तट पर किया गया है। इसकी जानकारी DRDO के एक अधिकारी ने दी है। उन्होंने बताया कि यह एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय सेना का हिस्सा है। अधिकारी ने कहा कि इस परीक्षण में मिसाइल ने काफी दूर से ही अपने टारगेट पर सीधा हमला कर दिया। इससे पहले, भारत ने 23 मार्च को सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। यह परीक्षण अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में किया गया था। रक्षा अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि इस मिसाइल ने सीधे अपने टारगेट को अचीव किया। एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने इस सतह से सतह पर मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के सफल परीक्षण पर बधाई भी दी थी। डिफेंस सेक्टर पर लगातार जोर दे रहा भारत : गौरतलब है कि भारत लगातार अपने डिफेंस बजट को बढ़ा रहा है। देश का फोकस डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने का है। इसलिए केंद्र सरकार भारत के डिफेंस इंपोर्ट (आयात) को घटाने और एक्सपोर्ट (निर्यात) को बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है। पिछले आठ सालों में भारत के हथियार निर्यात में 6 गुना उछाल आया है। चालू वित्त वर्ष में भारत ने अब तक 11607 करोड़ रुपए के हथियार का निर्यात किया है। रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने लोकसभा में इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि वित्त वर्ष 2014-15 में भारत ने 1941 करोड़ के हथियार का निर्यात किया था जो वित्त वर्ष 2021-22 में अब 11,607 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।

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