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Published / 2026-02-17 13:47:12
जानें मीडिया में कैसे दखल दे रहा है AI

  • India AI Impact Summit 2026: मीडिया में कैसे दखल दे रहा है AI, विशेषज्ञों का जवाबदेही और भरोसा बढ़ाने पर जोर

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत के डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और पत्रकारिता विषय पर एक चर्चा का आयोजन किया। इसका आयोजन दिल्ली में चल रहे इंडिया एआई इंपैक्ट समिट के दौरान किया गया। इस परिचर्चा में देश के बड़े मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सदस्यों ने भाग लिया।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में पत्रकारिता

इस परिचर्चा में यह समझने की कोशिश की गई कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पत्रकारिता को कैसे बदल रहा है और भारत को इस बदलाव को जिम्मेदारी से कैसे अपनाना चाहिए. कार्यक्रम का संचालन अशीष फेरवानी ने किया।

इसमें इंडिया टुडे ग्रुप, दैनिक भास्कर ग्रुप, अमर उजाला ग्रुप, बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड, द हिंदू ग्रुप और इंटरनेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन के वरिष्ठ पदाधिकारी और अधिकारी शामिल थे.
कार्यक्रम में डीएनपीए की महासचिव सुजाता गुप्ता ने कहा कि AI के दौर में पत्रकारिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।

AI यह बदल रहा है कि खबरें कैसे बनती हैं, फैलती हैं और उन पर भरोसा कैसे किया जाता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पत्रकारिता सिर्फ कंटेंट नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूत नींव है। इसलिए AI के विकास में जवाबदेही और भरोसा बहुत जरूरी है।

चर्चा में यह बात भी सामने आई कि खबरों को AI में दूसरे कंटेंट से अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। खबरों का असर चुनाव, बाजार, समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। इसलिए पत्रकारिता को सिर्फ इंटरनेट की सामान्य जानकारी नहीं माना जा सकता। यह मेहनत, निवेश और संपादकीय जिम्मेदारी से तैयार की जाती है।

चर्चा में भाग लेने वाले पैनल में शामिल सदस्यों का कहना था कि न्यूजरूम में AI मददगार हो सकता है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी इंसानों की ही रहनी चाहिए। अगर AI खबरों का सार बनाता है और उन्हें आगे फैलाता है, तो उसे भी जिम्मेदारी के साथ काम करना होगा।

Published / 2026-02-15 22:53:13
जानें कब लगेगा साल का पहला सूर्य ग्रहण

  • कब लगेगा साल का पहला सूर्य ग्रहण, नोट करें सही तारीख और दूर करें सारा कन्फ्यूजन

एबीएन नॉलेज डेस्क। प्रत्येक साल की तरह इस साल भी खगोलीय घटनाएं घटेंगी या फिर कहें उस ग्रहण की स्थिति बनेगी, जिसका नाम आते ही अक्सर लोगों का मन तमाम तरह की आशंकाओं से घिर जाता है। 

फरवरी 2026 में लगने जा रहे साल के पहले सूर्य ग्रहण को लेकर भी लोग इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि यह 16 को लगेगा या फिर 17 फरवरी को? सूर्य ग्रहण भारत में दिखेगा या नहीं? 

इसका सूतक लगेगा या नहीं? सूर्य ग्रहण का किस राशि पर क्या प्रभाव पड़ेगा? अगर आप भी सूर्य ग्रहण को लेकर कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रहे हैं तो आइए उनके जवाब जाने-माने ज्योतिषविद् पं. कृष्ण गोपाल मिश्र से जानते हैं।

16 या 17 को कब शुरू होगा सूर्य ग्रहण? 

साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी 2026 को भारतीय समयानुसार दोपहर 03:26 बजे से प्रारंभ होगा और और इसका मध्य समय 05:42 बजे और यह 07:52 बजे बजे खत्म होगा।

क्या साल का पहला सूर्य ग्रहण भारत में दिखेगा?

ज्योतिषाचार्य कृष्ण गोपाल मिश्र के अनुसार साल का पहला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं नजर आएगा। यह सिर्फ अंटार्टिका और दक्षिण अफ्रीका की तरफ नजर आएगा।

भारत में सूतक काल मान्य होगा या नहीं?

पंचांग के अनुसार किसी भी सूर्य ग्रहण का सूतक 12 घंटे पहले लग जाता है। चूंकि यह सूर्य ग्रहण भारत में बिल्कुल भी नजर नहीं आएगा इसलिए इसका सूतक भी यहां पर मान्य नहीं होगा। 

ऐसी स्थिति में भारत में रहने वाले लोगों अमावस्या के दिन किए जाने वाले पूजा-पाठ से लेकर धार्मिक एवं सामान्य कार्य को बगैर किसी रोक-टोक के जारी रखेंगे। इस दिन पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध पर कोई मनाही नहीं रहेगी।

Published / 2026-02-09 21:29:17
भारतीय एआई करेगी चैट जीपीटी और जेमिनी की छुट्टी!

ChatGPT और Gemini की छुट्टी! भारतीय AI ने रच दिया इतिहास, देखकर दुनिया भी हैरान

एबीएन नॉलेज डेस्क। जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चर्चा होती है तो आमतौर पर अमेरिका और चीन की बड़ी टेक कंपनियों के मॉडल्स का नाम सामने आता है, लेकिन बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप Sarvam AI ने इस सोच को बदल दिया है। भारत में ही फाउंडेशनल AI मॉडल्स तैयार कर रही यह कंपनी अब वैश्विक स्तर पर पहचान बना रही है। हाल ही में इसके दो टूल्स Sarvam Vision और Bulbul ने अंतरराष्ट्रीय AI दुनिया में खास जगह बनाई है।

OCR के क्षेत्र में Sarvam Vision का शानदार प्रदर्शन

Sarvam Vision एक एडवांस्ड AI टूल है, जो ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन यानी OCR तकनीक पर काम करता है। इस तकनीक की मदद से डॉक्युमेंट्स, इमेज या स्कैन की गई फाइलों से टेक्स्ट को पढ़ा और समझा जाता है। Sarvam Vision ने कई अहम बेंचमार्क्स पर ChatGPT, Google Gemini और Anthropic Claude जैसे मशहूर AI मॉडल्स से बेहतर नतीजे दिए हैं, जिसकी जमकर सराहना हो रही है।

93.28 प्रतिशत सटीकता के साथ बनाया रिकॉर्ड

Sarvam AI के को-फाउंडर प्रत्युष कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस उपलब्धि की जानकारी साझा की। उनके मुताबिक, Sarvam Vision ने OmniDocBench v1.5 के इंग्लिश सबसेट में 93.28 प्रतिशत की सटीकता हासिल की है। यह बेंचमार्क इस बात को परखता है कि कोई AI सिस्टम असली दुनिया के जटिल डॉक्युमेंट्स को कितनी अच्छी तरह समझ पाता है। इस टेस्ट में कठिन डिजाइन, तकनीकी टेबल और गणितीय फॉर्मूले भी शामिल होते हैं, जहां पारंपरिक OCR सिस्टम अक्सर कमजोर साबित होते हैं।

ग्लोबल लेवल पर मिली सराहना

Sarvam Vision की इस सफलता के बाद Sarvam AI को वैश्विक स्तर पर चर्चा मिल रही है। पहले कंपनी को केवल भारतीय भाषाओं पर फोकस करने को लेकर सवालों का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब वही सवाल तारीफ में बदल चुके हैं। कई टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि Sarvam का OCR और स्पीच मॉडल्स उन कमियों को पूरा कर रहे हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय AI सिस्टम्स लंबे समय से नजरअंदाज करते आए हैं।

यूजर्स के अनुभव ने बढ़ाया भरोसा

Sarvam AI को लेकर आम यूजर्स भी अपने सकारात्मक अनुभव साझा कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि उन्होंने Sarvam Vision का इस्तेमाल किया और यह टूल वास्तविक जरूरतों में काफी असरदार साबित हुआ। इससे साफ है कि यह तकनीक सिर्फ टेस्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यावहारिक उपयोग में भी मजबूत प्रदर्शन कर रही है।

Bulbul V3 से वॉयस AI में भी कदम

OCR के अलावा Sarvam AI ने टेक्स्ट-टू-स्पीच वॉयस मॉडल Bulbul V3 भी लॉन्च किया है। यह AI सिस्टम लिखे हुए टेक्स्ट को प्राकृतिक और स्पष्ट आवाज में बदलता है। कंपनी के अनुसार, Bulbul V3 उनका अब तक का सबसे सक्षम वॉयस मॉडल है, जिसे खासतौर पर भारतीय भाषाओं के लिए तैयार किया गया है। फिलहाल इसमें 11 भारतीय भाषाओं और 35 से अधिक वॉयस का सपोर्ट मौजूद है, और आगे इसमें और भाषाएं जोड़ी जाएंगी।

भारतीय AI की बढ़ती ताकत

Sarvam AI की यह कामयाबी दिखाती है कि भारत में विकसित AI मॉडल्स अब सिर्फ देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बड़ी टेक कंपनियों को कड़ी चुनौती देने की क्षमता रखते हैं।

Published / 2026-02-08 20:04:52
कहीं आपका फोन हैक तो नहीं...

  • गूगल की चेतावनी, 100 करोड़ से ज्यादा फोन हो सकते हैं हैक, आपका फोन भी लिस्ट में तो नहीं?

एबीएन नॉलेज डेस्क। गूगल ने एंड्रॉयड यूजर्स के लिए बड़ा सिक्योरिटी अलर्ट जारी किया है। कंपनी ने साफ कर दिया है कि एंड्रॉयड 12 या उससे पुराने वर्जन पर चल रहे फोन अब सिक्योरिटी अपडेट नहीं पाएंगे।

इसका सीधा मतलब है कि ऐसे डिवाइस नए मालवेयर और स्पायवेयर अटैक के लिए ज्यादा असुरक्षित हो गए हैं। दुनियाभर में करीब एक अरब एंड्रॉयड यूजर्स इस जोखिम वाले जोन में आ चुके हैं। अगर आपका फोन अपडेट नहीं हो पा रहा, तो उसे बदलने की सलाह दी गई है। 

गूगल ने पुष्टि की है कि एंड्रॉयड 12 या उससे पुराने वर्जन पर चल रहे स्मार्टफोन को अब नए सिक्योरिटी पैच नहीं मिलेंगे। लेटेस्ट आंकड़ों के अनुसार सिर्फ करीब 57.9 प्रतिशत डिवाइस ही एंड्रॉयड 13 या उससे ऊपर के वर्जन पर हैं।

बाकी डिवाइस सिक्योरिटी के मामले में फ्रीज हो चुके हैं। 2021 या उससे पहले लॉन्च हुए ज्यादातर फोन इस समस्या से प्रभावित हैं। इसका मतलब है कि सिस्टम की कमजोरियों को अब आधिकारिक तौर पर ठीक नहीं किया जाएगा। इससे हैकिंग और डेटा चोरी का खतरा बढ़ जाता है।

Published / 2026-01-24 16:22:09
इंडियन अर्थ में दरार से एशिया के नक्शे पर खतरा

वैज्ञानिकों का बड़ा अलर्ट : भारतीय धरती में आयी दरार, अब बदल सकता है एशिया का नक्शा! 

एबीएन नॉलेज डेस्क। हिमालय को हम हमेशा मजबूती, ऊंचाई और स्थिरता का प्रतीक मानते आये हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों की एक चौंकाने वाली खोज ने इस सोच को हिला दिया है। हिमालय की ऊंची चोटियों के नीचे धरती के भीतर एक ऐसी प्रक्रिया चल रही है, जिसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं। 

ताजा शोध में सामने आया है कि तिब्बत के नीचे भारतीय टेक्टॉनिक प्लेट सिर्फ टकरा नहीं रही, बल्कि अंदर ही अंदर दो हिस्सों में फट रही है। अब तक यह माना जाता था कि भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराकर हिमालय को ऊपर उठा रही है। लेकिन नये सबूत बताते हैं कि कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल है। 

वैज्ञानिकों ने क्या नया देखा? 

भूकंप से निकलने वाली तरंगें धरती के भीतर की संरचना का एक्स-रे जैसी जानकारी देती हैं। इन्हीं तरंगों का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों को पता चला कि भारतीय प्लेट की निचली परत भारी और घनी होने के कारण टूटकर नीचे की ओर धंस रही है, जबकि उसकी ऊपरी परत अब भी उत्तर दिशा में खिसक रही है। 

यानी प्लेट झुक नहीं रही, बल्कि परत-दर-परत अलग हो रही है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में डीलैमिनेशन कहा जाता है, और हिमालय क्षेत्र में इसका इतना स्पष्ट प्रमाण पहली बार मिला है। 

यह खोज इतनी खास क्यों है? 

अब तक प्लेट टेक्टॉनिक्स के मॉडल यह मानते थे कि महाद्वीपीय प्लेटें या तो एक-दूसरे के नीचे जाती हैं या मुड़कर ऊपर उठती हैं। लेकिन भारतीय प्लेट का इस तरह अंदर से छिल जाना एक नयी सोच को जन्म देता है। 

इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि: 

  • हिमालय दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ क्यों बने 
  • तिब्बत का पठार इतना फैला और ऊंचा कैसे हुआ 
  • और धरती के भीतर तनाव कैसे जमा होता है 

धरती के भीतर झांकी कैसे मिली? 

अमेरिका और चीन के वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने दक्षिणी तिब्बत में 90 से ज्यादा सीस्मिक स्टेशन लगाये। इन उपकरणों से मिले डेटा की मदद से वैज्ञानिकों ने धरती के अंदर की 3डी संरचना तैयार की इस मॉडल में साफ दिखा कि जमीन की सतह से करीब 100 किलोमीटर नीचे भारतीय प्लेट टूटकर अलग हो रही है। यह प्रक्रिया लाखों-करोड़ों सालों से धीरे-धीरे चल रही है। 

इसका असर क्या हो सकता है? 

इस खोज के कई दूरगामी नतीजे हो सकते हैं। वैज्ञानिकों को अब यह समझने में मदद मिलेगी कि इस इलाके में भूकंप बार-बार क्यों आते हैं। इसके अलावा हिमालय और तिब्बत में पाये जाने वाले गर्म पानी के झरनों में मिलने वाली हीलियम-3 गैस को भी इसी प्रक्रिया से जोड़ा जा रहा है। प्लेट के टूटने से धरती के अंदर की गर्मी और गैसों को बाहर आने का रास्ता मिल सकता है। 

वैज्ञानिकों की चेतावनी 

हालांकि यह खोज बेहद अहम है, लेकिन वैज्ञानिक जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने के मूड में नहीं हैं। मोनाश यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक फैबियो कैपिटानियो का कहना है कि यह धरती के भीतर चल रही बेहद लंबी प्रक्रिया का सिर्फ एक छोटा सा दृश्य है। उनके मुताबिक, हमने अभी सिर्फ एक झलक देखी है, पूरी कहानी समझने के लिए और गहरे अध्ययन की जरूरत है। 

आगे क्या होगा? 

अब वैज्ञानिक सैटेलाइट डेटा और कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से इस प्रक्रिया को और विस्तार से समझने की तैयारी कर रहे हैं। 3डी मॉडलिंग से यह पता लगाया जाएगा कि प्लेट के टूटने से भविष्य में भूकंप का खतरा कितना बढ़ सकता है। एक बात तय है—हिमालय सिर्फ बाहर से ही नहीं, अंदर से भी दुनिया के सबसे रहस्यमय पहाड़ों में से एक है।

Published / 2026-01-12 12:47:34
तकनीकी समस्या के बाद रास्ते से भटका इसरो का पीएसएलवी सी62 रॉकेट

  • ISRO: पीएसएलवी सी62 रॉकेट में प्रक्षेपण के बाद तकनीकी समस्या, रास्ते से भटका व्हीकल; इसरो चीफ बोले- जांच जारी

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने आज 260 टन वजनी पीएसएलवी-सी62 रॉकेट से उपग्रह अन्वेषा समेत 14 अन्य सैटेलाइट की लॉन्चिंग की, लेकिन प्रक्षेपण के तीसरे चरण में तकनीकी खराबी आ गई। यह इस साल का पहला प्रक्षेपण है। 

आज श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केंद्र से पृथ्वी अवलोकन उपग्रह अन्वेषा व 14 अन्य उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया जाना था। लेकिन इससे पहले रॉकेट तय रास्ते से भटक गया, जिसकी जांच इसरो की टीम कर रही है। 

इसरो ने जानकारी देते हुए बताया कि PSLV-C62 मिशन में PS3 स्टेज के आखिर में एक गड़बड़ी हुई। इसकी विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। इससे पहले इसरो प्रमुख डॉ. वी नारायणन ने कहा, हमने पीएसएलवी सी62 ईओएस-एन1 मिशन के प्रक्षेपण का प्रयास किया। 

पीएसएलवी रॉकेट चार चरणों का होता है... तीसरे चरण की समाप्ति से ठीक पहले तक सबकुछ सामान्य रहा, इसके बाद कुछ परेशानी देखी गई। हम जल्द ही अपडेट साझा करेंगे। 

दरअसल, इस मिशन के तहत अन्वेषा के जरिए भारत की निगरानी क्षमताओं को मजबूती करना है। जिसे भारत का सीसीटीवी भी कहा जा रहा है। इसकी मदद से हम दुश्मन की हर हरकत पर नजर रख सकेंगे।

दुश्मन की निगरानी करेगा उपग्रह अन्वेषा

उपग्रह अन्वेषा पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए तस्वीरें लेगा। इसमें हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर लगे हैं, जो साधारण कैमरों से ज्यादा स्मार्ट हैं। यह आसमान से दुश्मन की हर हरकत पर नजर रख सकता है। 

इसे डीआरडीओ ने विकसित किया है। इस लॉन्च में दो सॉलिड स्ट्रैप-ऑन मोटर वाले पीएसएलवी-डीएल वेरिएंट का इस्तेमाल किया गया था। यह मिशन पीएसएलवी रॉकेट की 64वीं उड़ान थी। 

  • अन्वेषा को धरती से करीब 600 किलोमीटर ऊपर पोलर सन-सिंक्रोनस पोलर आर्बिट में स्थापित किया जाता।
  • इससे आतंकियों से लेकर घुसपैठियों के साथ उपद्रवी पर आसानी से पैनी नजर रख जा सकेगी।
  • यह जंगलों या बंकरों में छिपे दुश्मनों की तस्वीरें भी खींच सकता है।
  • इससे सेना को बहुत मदद मिलेगी और देश के दुश्मनों पर निगरानी की जा सकेगी।

Published / 2026-01-12 11:24:38
आज सैटेलाइट में ईंधन भरने वाला बनेगा दुनिया का दूसरा देश बनेगा भारत

  • ISRO आज रचेगा इतिहास, सैटेलाइट में ईंधन भरने वाला बनेगा दुनिया का दूसरा देश

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आज साल 2026 के अपने पहले और सबसे महत्वपूर्ण मिशन PSLV-C62 के साथ इतिहास रचने के लिए तैयार है। 

आज सुबह 10:17 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर से दिव्य दृष्टि कहे जाने वाले इस रॉकेट को लॉन्च किया जाएगा। इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भारत अंतरिक्ष में सैटेलाइट रिफ्यूलिंग (उपग्रह में दोबारा ईंधन भरना) की तकनीक का सफल परीक्षण करने जा रहा है।

मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धि: अंतरिक्ष में रिफ्यूलिंग

अभी तक उपग्रहों का जीवनकाल उनके ईंधन खत्म होने के साथ ही समाप्त हो जाता था लेकिन भारत अब इसे बदलने वाला है। चीन के बाद भारत दुनिया का मात्र दूसरा ऐसा देश बनने वाला है जिसने अंतरिक्ष में सैटेलाइट रिफ्यूलिंग की तकनीक हासिल की है। 

अमेरिका और यूरोप भी अभी इस रेस में पीछे हैं। इस मिशन में बेंगलुरु के स्टार्टअप ऑर्बिटएड का आयुलसैट (Ayulsat) सैटेलाइट मुख्य भूमिका निभाएगा। लॉन्च के 4 घंटे के भीतर यह अंतरिक्ष में फ्यूल ट्रांसफर का परीक्षण करेगा।

अन्वेषा सैटेलाइट: आसमान से दुश्मन पर पैनी नजर

इस मिशन का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा अन्वेषा (EOS-N1) सैटेलाइट है। इसे भारत की नई स्पाई आई (जासूसी आंख) कहा जा रहा है। यह सैटेलाइट बेहद एडवांस रिमोट सेंसिंग तकनीक से लैस है। 

यह रोशनी के सूक्ष्म स्पेक्ट्रम और बारीक रंगों को भी पहचान सकता है। धरती से 600 किमी ऊपर होने के बावजूद यह दुश्मन के ठिकानों, छिपे हुए बंकरों और उनकी हलचल की हाई-डेफिनेशन तस्वीरें लेने में सक्षम है।

Published / 2025-12-08 20:21:35
वाह रे चीन... खारा पानी से बना दिया पेट्रोल का विकल्प

खारे पानी से बना दिया पेट्रोल का विकल्प 

एबीएन नॉलेज डेस्क। दुनिया पीने के पानी की कमी और पेट्रोल-डीजल के विकल्प ग्रीन एनर्जी के लिए जूझ रही है, लेकिन चीन ने एक ही तीर से ये दोनों शिकार कर लिये हैं। चीन के पूर्वी प्रांत शेडोंग में एक ऐसी क्रांतिकारी फैक्ट्री शुरू हुई है, जिसने वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों दोनों को हैरान कर दिया है।

यहां समंदर के खारे पानी से पीने लायक मीठा पानी और भविष्य का ईंधन यानी ग्रीन हाइड्रोजन बनाया जा रहा है। और सबसे चौंकाने वाली बात है इसकी कीमत महज 2 युआन करीब 24 भारतीय रुपये प्रति क्यूबिक मीटर। यह तकनीक इतनी सस्ती है कि इसने पानी के लिए मशहूर सऊदी अरब और टेक्नोलॉजी के सरताज अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। 

साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, शेडोंग के रिझाओ शहर में लगी यह दुनिया की अपनी तरह की पहली फैसिलिटी है। यह पूरी तरह से समंदर के पानी और पास की स्टील और पेट्रोकेमिकल फैक्ट्रियों से निकलने वाली वेस्ट हीट पर चलती है। 

यानी फैक्ट्रियों की जो गर्मी बर्बाद हो जाती थी, उसी से अब पानी और ईंधन बन रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह सिस्टम एक इनपुट, तीन आउटपुट के सिद्धांत पर काम करता है।

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