एबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य की किरणें धीरे-धीरे मारक होती जा रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है धरती पर सूर्य की किरणों का हमला उसके आकलन से कहीं ज्यादा होने वाला है। हालात बता रहे हैं कि इस बार का सौर तूफान धरती के जीव-जंतु के लिए भी काफी खतरनाक हो सकता है। वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है सूर्य का तापमान अपने शिखर पर पहुंच गया है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ये साल सूर्य अपना सबसे खतरनाक असर दिखा सकता है। साल 2023 के अंत तक सूर्य का प्रकोप बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस खतरे का आकलन कुछ समय के बाद लगाया गया था, लेकिन यह समय से पहले ही दिख रहा है।
क्यों बदले हालात
जानकारी के मुताबिक सौरमंडल में हर 11 साल के बाद ऐसी स्थिति आती है। सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन आता है। उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव में बदल देता है। इस उलटफेर के चलते सूर्य की रोशनी तीक्ष्ण हो जाती है। रोशनी से अग्नि जैसी गर्मी निकलती है।
क्या होता है नुकसान
सौरमंडल के ये हालात पृथ्वी के लिए खतरनाक माने जाते हैं। सौर तूफानों से संचार माध्यम प्रभावित होने का खतरा रहता है। बिजली के बुनियादी ढांचे को भी नुकसान हो सकता है। इससे अंतरिक्ष यात्रियों पर बुरा प्रभाव होता है।
कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि अगला सौर तूफान जल्द आ सकता है। संभव है इसके बारे में जैसा अनुमान लगाया गया है, उससे अधिक शक्तिशाली हो सकता है।
समय से पहले खतरा क्यों
वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की थी कि वर्तमान सौर चक्र 2025 में चरम पर होने वाला था लेकिन सनस्पॉट, सौर तूफान और दुर्लभ सौर घटनाओं को देखते हुए अनुमान को बदलना पड़ा है। ये खतरा इसी साल के अंत तक देखने को मिल सकता है।
वैसे वैज्ञानिकों के मुताबिक यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि सूर्य का चक्र इतने लंबे समय तक क्यों चलता है। यूके में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के सौर भौतिक विज्ञानी एलेक्स जेम्स का कहना है कि यह सब सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र पर निर्भर करता है। जैसे ही सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र सक्रिय होता है उसके सुरक्षा घेरे पर असर होता है, जिससे प्रचंड रोशनी निकलती है। इसे सौर ज्वाला कहा जाता है।
कितना अलग है सौर 2025
अप्रैल 2019 में नासा ने सौर चक्र 25 के लिए अपना पूर्वानुमान जारी किया था और चेतावनी भी जारी की थी। इससे पहले 2014 के मध्य और 2016 की शुरुआत के बीच सौर चक्र चरम पर था, लेकिन आने वाले सौर चक्र के मुकाबले वह कमजोर था।
वैज्ञानिकों के मुताबिक दिसंबर 2022 में सूर्य 8 साल के सनस्पॉट शिखर पर पहुंच गया था और जनवरी 2023 में ही वैज्ञानिकों ने नासा की भविष्यवाणी के मुकाबले दोगुने से भी अधिक सनस्पॉट देखे। जिसके अगले महीनों में ही यह संख्या फिर बढ़ गयी। कुल मिलाकर लगातार 27 महीनों में देखे गये सौर धब्बों की संख्या अनुमानित संख्या से अधिक हो गयी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत सहित दुनिया भर में 21 जून को योग दिवस का त्यौहार मनाया जाता है और सभी इसमें बढ़ चढ़कर शिरकत करते हैं। 21 जून के दिन की एक खासियत है कि यह वर्ष के 365 दिन में सबसे लंबा दिन होता है और योग के निरंतर अभ्यास से व्यक्ति को लंबा जीवन मिलता है इसलिए इस दिन को योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया गया।
21 जून साल का सबसे बड़ा दिन होता है और इस दिन एक पल ऐसा भी आता है जब परछाई तक साथ छोड़ जाती है। जी हां साल के 365 दिनों में 21 जून इतना लंबा और बड़ा होता है कि समय जल्दी नहीं कटता और रात छोटी होती है। इस दिन को ग्रीष्म अयनांत भी कहते हैं।
बाकी दिनों में पृथ्वी की प्रक्रिया सामान्य होती है। पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने के साथ अपने अक्ष पर भी घूमती है। वह अपने अक्ष में 23.5 डिग्री झुकी हुई है। इसकी वजह से सूरज की रोशनी धरती पर हमेशा एक जैसी नहीं पड़ती और दिन रात की अवधि में अंतर आता है।
21 जून को सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से चलकर भारत के मध्य से गुजरी कर्क रेखा में आ जाता है। इसलिए सूर्य की किरणें ज्यादा समय तक धरती पर पड़ती हैं। दोपहर के समय सूरज काफी ऊंचाई पर आ जाता है इसलिए आज का दिन लंबा होता है। 21 सितंबर के आसपास दिन व रात की अवधि बराबर हो जाती है जिसके बाद रातें बड़ी होने लगती हैं और दिन छोटे। दिन-रात की अवधि का यह चक्र 23 दिसंबर तक जारी रहता है। जिस वजह से 23 दिसंबर की रात सबसे लंबी और दिन छोटा होता है।
सूर्य जब कर्क रेखा के ऊपर होता है तो एक पल ऐसा भी आता है जब परछाई भी साथ छोड़ जाती है। इस दिन सूर्य की किरणें करीब 15 से 16 घंटे तक पृथ्वी पर पड़ती हैं। इस दिन दक्षिणी गोलार्द्ध में ठीक इसका उलटा होता है। जहां उत्तरी गोलार्द्ध में रह रहे लोगों के लिए 21 जून को गर्मी की शुरुआत कहा जाता है, वहीं दक्षिणी गोलार्द्ध में रह रहे लोगो के लिए ये सर्दी की शुरुआत मानी जाती है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि 21 जून को ही सबसे बड़ा दिन हो। यह 20 या 22 जून को भी हो सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक साल 1975 में 22 जून को साल का सबसे बड़ा दिन आया था और अब 2203 में ऐसा होगा जब 21 को नहीं 22 जून को सबसे लंबा दिन होगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। ट्विटर को टक्कर देने के लिए इंस्टाग्राम एक बड़ी योजना पर कार्य चल रहा है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सारे बड़े कंटेंट क्रिएटर्स के साथ मेटा इस प्रोग्राम की टेस्टिंग कर रही है, ताकि लोगों के इंटरेस्ट पता चले, सेलिब्रिटीज के इंटरेस्ट पता चले और ट्विटर का विकल्प दिया जा सके।
बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां रोज संघर्ष कर रही हैं मार्केट में बने रहने के लिए और एक दूसरे से आगे निकलने के लिए। जैसा कि हम सबको पता है एक तरफ फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा न केवल फेसबुक बल्कि इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे बड़े सफल एप्लीकेशंस को लीड करती है, वहीं शॉर्ट मेसेजिंग प्लेटफार्म के तौर पर ट्विटर ने बेहद मजबूत पकड़ बना ली है।
अकेले ट्विटर एक बड़े इनफ्लुएंसर प्लेटफार्म के तौर पर उभर आया है। चाहे किसी मुद्दे पर चर्चा हो, ट्रेंड हो ट्विटर ने अपना एक अलग मार्केट में स्थान बनाया है। अब जाहिर तौर पर ये दोनों सोशल मीडिया कंपनियां हैं और इसलिए एक दूसरे के साथ उठापटक जारी रहती है। इस कड़ी में मेटा प्लेटफार्म का इंस्टाग्राम इसी तरह का एक एप्लीकेशन लाने के तैयारी में है।
जी हां आप सही सुन रहे हैं ट्विटर को टक्कर देने के लिए इंस्टाग्राम एक बड़ी योजना पर कार्य चल रहा है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सारे बड़े कंटेंट क्रिएटर्स के साथ मेटा इस प्रोग्राम की टेस्टिंग कर रही है, ताकि लोगों के इंटरेस्ट पता चले, सेलिब्रिटीज के इंटरेस्ट पता चले और ट्विटर का विकल्प दिया जा सके।
कुछ रिपोर्ट में यह भी बताया जा रहा है कि यह एक इंस्टाग्राम से अलग होगा हालांकि इंटरकनेक्टिविटी बनी रहेगी। इसका मतलब कि जिस प्रकार से आप फेसबुक और इंस्टाग्राम में इंटरकनेक्टिविटी देखते हैं, कुछ कुछ वैसी ही नये ऐप के साथ भी होगी। अभी तक जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक यह एप्लीकेशन लोगों को टेक्स्ट शेयर किये गये लिंक फोटो एवं वीडियो के जरिये अपने दोस्तों से जुड़ने का मौका देगा।
इसके अलावा फैन और फॉलोवर सिर्फ एक क्लिक पर प्रभावशाली लोगों से जुड़ सकेंगे। तो अब इंतजार है इंस्टग्राम के इस नए सुविधा को जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह ट्विटर को टक्कर देने वाला है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। मानव निर्मित इस उड़न तश्तरी का हाल ही में चीन के दक्षिणी शहर शेनझेन में परीक्षण भी हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह इलेक्ट्रानिक उड़न तश्तरी हवा तथा जमीन दोनों से टैक आफ और लैंडिंग करने में सक्षम है।
आसमान में उड़न तश्तरी के बारे में आपने सुना होगा, कई बार इन्हें ऐसा स्पेस शिप बताया जाता है जिस पर एलियन सवार हैं, हालांकि इसकी कभी पुष्टि नहीं हुई, न ही कोई इसे पास से देख सका, लेकिन आने वाले समय में ये ख्वाहिश पूरी हो सकती है, चीन ने दुनिया की पहली उड़न तश्तरी बना ली है।
मानव निर्मित इस उड़न तश्तरी का हाल ही में चीन के दक्षिणी शहर शेनझेन में परीक्षण भी हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह इलेक्ट्रानिक उड़न तश्तरी हवा तथा जमीन दोनों से टैक आफ और लैंडिंग करने में सक्षम है। चीन में निर्मित यह उड़न तश्तरी ईवीटीओएल यानी इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेक आफ और लैंडिंग की तर्ज पर बनाया गया है।
यानी 15 मिनट की उड़ान में ही यह 656 फीट की ऊंचाई तक पहुंच सकता है। इसे शेनझेल शहर की यूएफओ पावर टेक्नोलॉजी ने विकसित किया है। इसमें 12 प्रोपेलर लगे हैं, पायलट की सीट इनके बीच में डिजाइन की गयी है। चीन में इस उड़न तश्तरी को विकसित करने में तीन साल का समय लगा।
चीनी मीडिया के मुताबिक यह उड़न तश्तरी को ऐसे डिजाइन किया गया है कि यह पानी या जमीन कहीं से भी उड़ान भर सकती है। कंपनी की ओर से जो वीडियो जारी किया गया है, उसमें यह शेनझेल झील के ऊपर उड़ान भरती नजर आ रही है। हालांकि कंपनी ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि आम लोगों के लिए इसे कब से शुरू किया जायेगा।
उड़न तश्तरी के सफल परीक्षण के बाद अब चीन उड़ने वाली कार बनाने जा रहा है, एक एयरोस्पेस कंपनी ने ये दावा किया है, कंपनी का दावा है कि अगले दो साल में उड़ने वाली कार बाजार में उतार दी जायेगी। इसकी कीमत तकरीबन 3 लाख 50 हजार डॉलर रहने की संभावना है।
इससे पहले इजरायल ने हाल ही फ्लाइंग टैक्सी का परीक्षण किया था। यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा था, दो लोगों ने फ्लाइंग टैक्सी में बैठकर 30 किलोमीटर तक की यात्रा भी पूरी की थी। इजरायल की पर्यटन मंत्री ने दावा किया था कि जल्द ही आम लोगों की सुविधा के लिए इसे शुरू किया जायेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। दुनियाभर में लोगों की आंखें अलग अलग रंगों की होती हैं। काली, भूरी, नीली, पीली, हरी। क्या आपको मालूम है कि दुनियाभर में आंखों का सबसे दुर्लभ रंग क्या है। क्यों ये दुर्लभ है। क्या ये बात आपको हैरान नहीं करती कि मानव आंखें अलग अलग रंगों की क्यों होती हैं।
भारत में आमतौर पर लोगों की आंखें काली और भूरी होती हैं लेकिन जब हम नीली या दूसरी रंगों की आंखों वाले लोगों को देखते हैं तो बरबस उनकी आंखें हमें आकर्षित करती हैं। वैसे मानव आंखों में रंगों का गजब की विविधता दुनियाभर में पायी जाती है। अगर आप ये समझते हैं कि बच्चे की आंखों का रंग वैसा ही होगा, जैसा माता-पिता का होगा तो ये गलत साबित हो सकता है।
माता-पिता की आंखों के रंग के आधार पर बच्चे की आंखों के रंग का अनुमान नहीं लगा सकते। हमारी आंख के बीच में पुतली लगभग हमेशा काले रंग की होती है, इसके चारों ओर रंगीन वलय, जिसे परितारिका कहा जाता है, कितने भी रंगों की हो सकती है पारितारिका को अंग्रेजी में आइरिश भी कहते हैं।
सबसे आम परितारिका का रंग भूरा है। इसका मतलब है कि पृथ्वी पर किसी भी अन्य रंग की तुलना में अधिक लोगों की आंखें भूरी हैं लेकिन सबसे दुर्लभ आंखों का रंग क्या है? हरे रंग को दुनिया का सबसे दुर्लभ आंखों का रंग बताया गया है।
2014 के अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी के सर्वेक्षण में पाया गया कि सिर्फ 9 प्रतिशत लोगों की आंखें हरी हैं, जबकि 45 प्रतिशत की आंखें हल्के भूरे रंग की हैं। 18 प्रतिशत की भूरी आंखें हैं और 27 प्रतिशत की नीली आंखें हैं। कभी कभी लोगों की आंखें लाल या गुलाबी होती हैं लेकिन ऐल्बिनिज्म जैसे रोग का परिणाम हो सकता है।
इन मामलों में आंख के अंदर की रक्त वाहिकाएं उन्हें गुलाबी या लाल रूप देती हैं। हेटरोक्रोमिया नामक एक अन्य दुर्लभ स्थिति में लोगों की दोनों आंखों का रंग अलग अलग हो सकता है। उनकी एक भूरी आंख और एक नीली आंख हो सकती है। हेटरोक्रोमिया वाले अधिकांश लोग इसके साथ पैदा होते हैं आपकी आंखों का रंग विभिन्न जीनों से तय होता है, जो आपको विरासत में मिला है।
आंखों के रंग का आनुवंशिकी एक जटिल विज्ञान है जो एक बच्चे के माता-पिता की आंखों के रंग से परे जाता है। उदाहरण के तौर पर नीली आंखों वाले दो माता-पिता भूरी आंखों वाला बच्चा पैदा कर सकते हैं। ज्यादातर समय, लोगों की आंखों का रंग जीवनभर एक जैसा रहता है।
नीली आंखों वाले बच्चे की आंखें उनके पहले वर्ष या यहां तक कि उनके पहले कुछ वर्षों में काली हो सकती हैं हालांकि, ऐसी कई स्थितियां हैं जिनके कारण किसी व्यक्ति की आंखों का रंग बदल जाता है। उदाहरण के लिए, मोतियाबिंद आंखों को धुंधला बना सकता है। चोट लगने से भी आंखों के रंग में बदलाव आ सकता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दूध की उम्र को लम्बे समय तक बरकरार चाहते हैं तो फ्रिज में इसकी सही लोकेशन को चुनें। दूध को फटने से बचाने के लिए सिर्फ फ्रिज में रखना ही काफी नहीं। उसे सही जगह पर रखना जरूरी है। ऐसा करके उसे लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
विशेषज्ञों की एक टीम का कहना है कि दूध को लम्बे समय तक बचाने के लिए आमतौर पर लोग इसे दरवाजे की तरफ रखते हैं, लेकिन यह इसकी सही लोकेशन नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा करके दूध की उम्र को हम कम कर देते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर दूध को फटने से बचाना चाहते हैं तो उसे फ्रिज के मुख्य हिस्से में रखें, न कि दरवाजे वाले हिस्से में क्योंकि यह फ्रिज का सबसे कम ठंडा हिस्सा होता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के फूड पॉलिसी के रीडर डॉ क्रिश्चियन रेनॉड्स कहते हैं, दूध खराब होने जाने वाली चीज है। इसलिए यह सबसे जरूरी बात है कि इसे फ्रिज के किस हिस्से में स्टोर करें और वहां का तापमान कितना हो। इस रिसर्च प्रोजेक्ट से जुड़े डॉ रेनॉल्ड्स कहते हैं, हमारे पास हाउसहोल्ड स्टीमुलेशन मॉडल है जो पिछले 6 साल से इस बात पर नजर रख रहा है कि लोग कैसे दूध का इस्तेमाल करते हैं।
वह कहते हैं, फ्रिज का तापमान 0 से 5 डिग्री सेंटीग्रेड होता है। इतने तापमान के बीच ऐसी चीजों को सुरक्षित रखा जा सकता है। अगर तापमान 5 डिग्री से नीचे रहता है तो दूध की लाइफ एक दिन अधिक बढ़ायी जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीज और दूध जैसी चीजों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उसे डोर वाले हिस्से में अंदर की तरफ न रखें ताकि इसे से कम से कम तापमान मिले और खराब न हो।
ब्रिटेन में ऐसा देखा गया है कि लोग इसे फ्रिज के तापमान को मेंटेन नहीं रखते। ऐसे में यह ध्यान रखना चाहिए कि फ्रिज में किस चीज के लिए कितना तापमान मेंटेन रखना चाहिए। विशेषज्ञ कहते हैं, यह नियम सिर्फ दूध के बारे में ही नहीं है बल्कि दूसरे डेयरी प्रोडक्ट के लिए है। चीज, दही जैसे डेयरी प्रोडक्ट को फ्रिज के सबसे गहरे हिस्से में स्टोर किया जाना चाहिए।
लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता क्योंकि दूध के पैकेट पर एक्सपायरी डेट तक नहीं उबालते और फ्रिज में रखना पसंद करते हैं। ऐसे में उन्हें पर्याप्त तापमान नहीं मिलता, जितना मिलना चाहिए। नतीजा फ्रिज में रखने के बाद भी कई बार दूध के फटने का खतरा रहता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आखिर ये पीला तारा हमें क्यों अलग-अलग रंग में दिखता है सबसे अहम सवाल ये है कि आखिर सूर्य का मूल रंग क्या है और कैसे ये इंद्रधनुष के सभी रंगों का उत्सर्जन करता है। आइये समझते हैं : -
आकाश में जब सूर्य निकते तो बेहद भव्य नजर आता है।
उस वक्त ये रंगीन दिखता है, लेकिन दिन में एक दम पीला नजर आता है। शाम को फिर ये अलग रंग का हो जाता है, आपने कभी सोचा है क्यों? आखिर ये पीला तारा हमें क्यों अलग-अलग रंग में दिखता है? सबसे अहम सवाल ये है कि आखिर सूर्य का मूल रंग क्या है और कैसे ये इंद्रधनुष के सभी रंगों का उत्सर्जन करता है।
आइये समझते हैं। आसान भाषा में कहें तो सूर्य तो सिर्फ चमकता है, लेकिन उसकी चमक यानी प्रकाश जब वायुमंडल में गैस के कणों से टकराता है तो यह इंद्रधनुष के सभी रंगों में बदल जाता है। लॉर्ड रेले ने इसकी खोज की थी और उन्हीं के नाम पर इस प्रक्रिया को रेले स्कैटरिंग कहा जाता है।
सूर्य की रोशनी से इंद्रधनुष के सभी रंग उत्सर्जित हेाते हैं, यदि स्पेक्ट्रम से देखा जाये तो हमें जो दिखाई देता है उस पर यकीं करना खुद मुश्किल हो जाता है। साइंस एबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक सूर्य की रोशनी में हरा रंग सबसे ज्यादा दिखाई देता है। इससे ऐसा लगता है कि जैसे सूर्य हरे रंग का का है।
आप सोच रहे होंगे कि जब सूर्य हरे रंग को सबसे ज्यादा उत्सर्जन करता है तो ये हमें हरा क्यों नहीं दिखता? इसका कारण हमारा वायुमंडल है, दरअसल ये कम तरंग दैर्ध्य के प्रकाश को बिखेरता है। आसान भाषा में कहें तो ये नीले हिस्से से प्रकाश को फ़िल्टर करता है, इसीलिए हमें आसमान नीला और सूर्य पीला दिखाई देता है।
बेशक सूरज की रोशनी से सबसे ज्यादा हरा रंग उत्सर्जित होता है, लेकिन इसके अलावा भी इसमें सारे रंग मौजूद होते हैं। दोपहर के बाद सूर्य सफेद रंग का भी नजर आता है, ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उस वक्त प्रकाश वायुमंडल के पतले हिस्से से गुजर रहा होता है। धरती से बेशक इसमें कम अंतर दिखे, लेकिन स्पेस से उस वक्त सूर्य एक सफेद गेंद की तरह ही नजर आता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। नाविक से लैस होकर जवान और सशक्त व घातक होंगे। अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) से नेविगेशन सैटेलाइट नाविक एनवीएस-1 को सोमवार को सुबह 10:42 बजे प्रक्षेपित किया। यह सैटेलाइट खासकर सशस्त्र बलों को मजबूत करने और नौवहन सेवाओं की निगरानी के लिए बनाया गया है।
नाविक अमेरिकी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) का जवाब है। नाविक का इस्तेमाल स्थलीय, हवाई और समुद्री परिवहन, लोकेशन-आधारित सेवाओं, निजी गतिशीलता, संसाधन निगरानी, सर्वेक्षण और भूगणित, वैज्ञानिक अनुसंधान, समय प्रसार और आपात स्थिति में किया जाएगा।
भारत अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) से नेविगेशन सैटेलाइट नाविक को प्रक्षेपित करने की तैयारी पूरी कर ली है।
वैज्ञानिकों ने सोमवार को प्रक्षेपित किए जाने वाले सैटेलाइट के लिए 27.5 घंटे की उल्टी गिनती रविवार सुबह 7.12 बजे शुरू की। नाविक अमेरिकी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) का जवाब है। नाविक (भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम) सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करेगा।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse