एबीएन नॉलेज डेस्क। तकनीक के जरिये विकास की अंधी दौड़ में हम बहुत कुछ खो भी रहे हैं। इंसान कभी मशीन से संचालित नहीं हो सकता। मानवीय संवेदनाएं और अहसास कभी कृत्रिम नहीं हो सकते। दूसरे शब्दों में कहें तो कोई तकनीक, मशीन व उपकरण सहयोगी तो हो सकते हैं, मगर मालिक नहीं हो सकते। कमोबेश यही बात शिक्षा में तेजी से बढ़ते स्मार्टफोन के उपयोग और उसके घातक प्रभावों को लेकर कही जा सकती है। निस्संदेह, शिक्षा के बाजारीकरण और नयी शैक्षिक परिपाटी में मोबाइल की अपरिहार्यता को महंगे स्कूलों ने स्टेटस सिंबल बना दिया है। लेकिन हालिया वैश्विक सर्वेक्षण बता रहे हैं कि पढ़ाई में अत्यधिक मोबाइल का प्रयोग विद्यार्थियों के लिये मानसिक व शारीरिक समस्याएं खड़ी कर रहा है।
निस्संदेह, विभिन्न आनलाइन शैक्षिक कार्यक्रमों के चलते छात्र-छात्राओं में मोबाइल फोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। तमाम पब्लिक स्कूलों ने आनलाइन शिक्षा के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल अनिवार्य तक बना दिया है। कमोबेश सरकारी स्कूलों में ऐसी बाध्यता नहीं है। लेकिन वैश्विक स्तर पर किए गए सर्वेक्षण से यह तथ्य सामने आया है कि स्मार्टफोन एक हद तक तो सीखने की प्रक्रिया में मददगार साबित हुआ है, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
इसमें दो राय नहीं कि एक समय महज बातचीत का जरिया माना जाने वाला मोबाइल फोन आज दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने वाला बेहद जरूरी उपकरण बन चुका है। खासकर कोरोना संकट के चलते स्कूल-कालेजों के बंद होने के बाद तो यह पढ़ाई का अनिवार्य हिस्सा बन गया। तब लगा था कि इसके बिना तो पढ़ाई संभव ही नहीं है। लेकिन नादान बच्चों के हाथ में मोबाइल बंदर के हाथ में उस्तरे जैसा ही है। जाहिरा तौर पर ये उनके भटकाव और मानसिक विचलन का कारण भी बन सकता है। अब इसके मानसिक व शारीरिक दुष्प्रभावों पर व्यापक स्तर पर बात होने लगी है। यहां तक कि आस्ट्रेलिया समेत तमाम विकसित देश स्कूलों में मोबाइल के उपयोग पर रोक लगा रहे हैं।
अब तो यूनेस्को अर्थात संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन की दुनिया में शैक्षिक स्थिति पर नजर रखने वाली टीम ने भी स्मार्टफोन के उपयोग से विद्यार्थियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर चिंता जतायी है। इसकी रिपोर्ट भारत में शिक्षा के नीति-नियंताओं की आंख खोलने वाली है। यूनेस्को की टीम के मुताबिक बीते साल के अंत तक कुल पंजीकृत शिक्षा प्रणालियों में से चालीस फीसदी ने सख्त कानून या नीति बनाकर स्कूलों में छात्रों के स्मार्टफोन के प्रयोग पर रोक लगा दी है। दरअसल, आधुनिक शिक्षा के साथ कदमताल की दलील देकर तमाम पब्लिक स्कूलों में मोबाइल के उपयोग को अनिवार्य बना दिया गया।
निस्संदेह, आधुनिक समय में स्मार्टफोन कई तरह से शिक्षा में मददगार है। लेकिन यहां प्रश्न इसके निरंकुश प्रयोग का है। साथ ही दुनिया में बेलगाम इंटरनेट पर परोसी जा रही अनुचित सामग्री और बच्चों पर पड़ने वाले उसके दुष्प्रभावों पर भी दुनिया में विमर्श जारी है। जिसमें प्रश्न बच्चों की निजता का भी है। वहीं प्रश्न ज्यादा प्रयोग से बच्चों के दिमाग व शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का भी है। निस्संदेह, शिक्षकों व अभिभावकों की देखरेख में सीखने की प्रक्रिया में स्मार्टफोन का सीमित उपयोग तो लाभदायक हो सकता है। लेकिन इसका अंधाधुंध व गलत उपयोग घातक भी हो सकता है।
दरअसल, स्मार्टफोन में वयस्कों से जुड़े तमाम एप ऐसे भी हैं जो समय से पहले बच्चों को वयस्क बना रहे हैं। उन्हें यौन कुंठित बना रहे हैं। बड़ी चुनौती यह है कि बच्चों की एकाग्रता भंग हो रही है। बच्चों में याद करने की क्षमता घट रही है। ऐसे में जब शिक्षा में स्मार्टफोन का उपयोग टाला नहीं जा सकता, लेकिन उसका नियंत्रित उपयोग तो किया ही जा सकता है। निस्संदेह उसका उपयोग सीमित किया जाना चाहिए। संकट यह भी कि मोबाइल पर खेले जाने वाले आन लाइन गेम जहां बच्चों को मैदानी खेलों से दूर कर रहे हैं, वहीं स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डाल रहे हैं। निश्चित तौर पर फोन छात्र-छात्राओं का सहायक तो बन सकता है, लेकिन उनके दिमाग को नियंत्रित करने वाला नहीं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। पृथ्वी की ओर बढ़ रहे विशाल एस्टेरॉयड 2024 वाइआर-4 ने वैज्ञानिकों की चिंता को और बढ़ा दिया है। इस एस्टेरॉयड के पृथ्वी से टकराने की संभावना पहले जतायी गयी थी, लेकिन अब एक नये अध्ययन में इसकी संभावना को और बढ़ा दिया गया है। नासा के सेंटर फॉर नियर अर्थ आब्जेक्ट स्टडीज के वैज्ञानिकों ने इसके पृथ्वी से टकराने की संभावना को 1.3% से बढ़ाकर 2.3% कर दिया है। इसके अलावा, अब वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एस्टेरॉयड चंद्रमा से भी टकरा सकता है, जिसमें इसकी संभावना 0.3% जतायी गयी है।
अगर यह एस्टेरॉयड चंद्रमा से टकराता है, तो इसके परिणामस्वरूप एक बड़ा गड्ढा बन सकता है, क्योंकि चंद्रमा पर वायुमंडल नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रमा पर टकराव से मलबा अंतरिक्ष में फैल सकता है और कुछ मलबा पृथ्वी पर गिर सकता है। हालांकि, डेविड रैंकिन, एरिजोना विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री के अनुसार, पृथ्वी पर गिरने वाले मलबे से कोई बड़ा खतरा उत्पन्न नहीं होगा।
एस्टेरॉयड 2024 वाइआर-4 का आकार 40 से 90 मीटर के बीच है, और इसकी टकराव की संभावना पहले 1.3% थी, जो अब बढ़कर 2.3% हो गयी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह एस्टेरॉयड पृथ्वी से टकराता है और किसी आबादी वाले इलाके में गिरता है, तो इससे गंभीर नुकसान हो सकता है। हालांकि, यह संभावना है कि यह एस्टेरॉयड समुद्र या पृथ्वी के किसी दूरस्थ हिस्से में गिरेगा।
वर्तमान में यह एस्टेरॉयड पृथ्वी से काफी दूर है और यह कहना मुश्किल है कि अगर टकराव होता है तो इसके प्रभाव क्या होंगे। संयुक्त राष्ट्र के खगोलविद इस एस्टेरॉयड पर लगातार नजर बनाये हुए हैं। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (एरअ) के अनुसार, इस एस्टेरॉयड के पृथ्वी के पास 22 दिसंबर 2032 को सुरक्षित रूप से गुजरने की संभावना 98-99% है, लेकिन 2% संभावना टकराव की बनी हुई है, जो एक बड़ी तबाही का कारण बन सकती है। इस तबाही की जद में दक्षिण एशिया के देशों जैसे भारत और पाकिस्तान भी आ सकते हैं।
एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। ग्रहण एक खगोलीय घटना होती है, जिसका धार्मिक दृष्टि से भी खास महत्व होता है। अक्सर लोगों को चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का बेसब्री से इंतजार रहता है।
साल 2025 में चार ग्रहण लगने वाले हैं, जिसमें से दो सूर्य ग्रहण होंगे और दो चंद्र ग्रहण। हालांकि, इन चारों ग्रहण में से सिर्फ एक ही भारत में दिखाई देगा। आइये जानते हैं कि साल 2025 में चारों ग्रहण कब कब लगेंगे और वह कौन सा ग्रहण होगा, जो भारत में दिखाई देगा।
साल का पहला ग्रहण पूर्ण चंद्रग्रहण होगा और ग्रहण 14 मार्च को भारतीय समयानुसार दिन में लगेगा। हालांकि यह चंद्रग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा। साल 2025 का पहला चंद्रग्रहण अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी अफ्रीका और उत्तरी और दक्षिणी अटलांटिक महासागर में दिखाई देगा।
साल 2025 का पहला सूर्य ग्रहण आंशिक ग्रहण होगा। यह ग्रहण 29 मार्च को लगने वाला है लेकिन इसे भी आप भारत में नहीं देख पायेंगे। यह सूर्य ग्रहण सिर्फ उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड, आइसलैंड, उत्तरी अटलांटिक महासागर, यूरोप और उत्तर-पश्चिमी रूस में दिखेगा।
साल 2025 का दूसरा चंद्र ग्रहण सितंबर में दिखेगा जो कि पूर्ण चंद्रग्रहण होगा, जिसका दीदार आप भारत में कर सकते हैं. पूर्ण चंद्रग्रहण एशिया के अन्य देशों के साथ-साथ यूरोप, अंटार्कटिका, पश्चिमी प्रशांत महासागर, ऑस्ट्रेलिया और हिंद महासागर में भी नजर आयेगा।
यह चंद्र ग्रहण भारतीय समय के मुताबिक 7 सितंबर को रात 8:58 मिनट से लेकर 8 सितंबर रात 2:25 बजे तक चलेगा. इस दौरान चंद्रमा गहरे लाल रंग का दिखाई देगा, जिसे ब्लड मून भी कहा जायेगा।
वहीं, साल का आखिरी ग्रहण सूर्य ग्रहण होगा जो कि 21-22 सितंबर को लगेगा। यह सूर्य ग्रहण आंशिक ग्रहण होगा, लेकिन यह भी भारत में नजर नहीं आयेगा। आंशिक सूर्य ग्रहण न्यूजीलैंड, पूर्वी मेलानेशिया, दक्षिणी पोलिनेशिया और पश्चिमी अंटार्कटिका में देखा जा सकता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। इसरो ने रविवार को बताया कि उसके रॉकेट जीएसएलवी-एफ15 का सैटेलाइट एनवीएस-02 के साथ इंटीग्रेशन पूरा हो गया है। यह रॉकेट, जिसमें स्वदेशी क्रायोजेनिक स्टेज है, 29 जनवरी को लॉन्च किया जायेगा। इस रॉकेट पर सैटेलाइट एनवीएस-02 होगा। यह श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 100वां मिशन होगा।
इसरो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट में बताया कि जीएसएलवी-एफ15 का इंटीग्रेशन पूरा हो गया है! इस मिशन के पीछे की अद्भुत टीमवर्क की एक झलक देखें। लॉन्च के काउंटडाउन में 3 दिन से कम बचे हैं!। इसरो ने बताया कि जीएसएलवी-एफ15, एनवीएस-02 सैटेलाइट को भू-स्थिर स्थानांतरण कक्षा में स्थापित करेगा। इसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से लॉन्च किया जायेगा।
बता दें कि, एनवीएस-01, जो दूसरी पीढ़ी का पहला सैटेलाइट था, 29 मई 2023 को जीएसएलवी-एफ12 के जरिए लॉन्च किया गया था। जबकि, एनवीएस-02, एनवीएस सीरीज का दूसरा सैटेलाइट है। इसमें एल1, एल5 और एस बैंड में नेविगेशन पेलोड के साथ-साथ सी-बैंड में रेंजिंग पेलोड भी लगाया गया है, जैसा कि इसकी पहली पीढ़ी की सैटेलाइट एनवीएस-01 में था।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने मानवरहित अंतरिक्ष यान डॉकिंग में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की। इसरो ने अंतरिक्ष यान डॉकिंग की जटिल तकनीक को सफलतापूर्वक प्रदर्शित करते हुए अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक अहम कदम बढ़ाया। भारत अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जिन्होंने इस तकनीक में सफलता पायी है जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन पहले ही इस उपलब्धि को हासिल कर चुके हैं।
इस सफलता का श्रेय स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (स्पाडेक्स) मिशन को जाता है जिसमें दो छोटे अंतरिक्ष यान—टारगेट और चेजर—को डॉक किया गया। दोनों यान का वजन लगभग 220 किलोग्राम था। इन यानों को 30 दिसंबर 2024 को भारतीय निर्मित पीएसएलवी रॉकेट से लॉन्च किया गया था और इन्हें पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया गया था। 11 जनवरी को इन यानों के बीच सफलतापूर्वक डॉकिंग का पैंतरेबाजी किया गया।
यह सफलता न केवल इसरो के लिए एक तकनीकी उपलब्धि है बल्कि यह भविष्य के मिशनों के लिए भी एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। इसके जरिए भारत अब उपग्रह सर्विसिंग, अंतरिक्ष निर्माण और यहां तक कि चंद्रमा पर मानव मिशन जैसे महत्वपूर्ण और जटिल मिशनों के लिए रास्ता बना सकता है।
इसरो के लिए यह उपलब्धि अंतरिक्ष अन्वेषण में आगे बढ़ने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है और भविष्य में भारत को वैश्विक अंतरिक्ष समुदाय में एक उभरते हुए नेता के रूप में स्थापित कर सकती है।
स्पाडेक्स मिशन ने यह भी साबित किया है कि भारत अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में अपनी तकनीकी क्षमता को निरंतर बढ़ा रहा है और अब वह वैश्विक अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा में अपनी अहम भूमिका निभाने के लिए तैयार है। इस मिशन की सफलता ने भारत को न केवल अपने अंतरिक्ष मिशनों में आत्मनिर्भर बनने के करीब ला दिया है बल्कि यह देश के लिए भविष्य में और भी जटिल अंतरिक्ष अभियानों के लिए रास्ता खोलता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अगर आप भी स्पेस और साइंस से जुड़ी चीजों में दिलचस्पी रखते हैं तो 13 जनवरी की तारीख को नोट कर लीजिये। इस दिन कुछ ऐसा होने वाला है जो आज से एक लाख 60 हजार साल पहले आखिरी बार देखने को मिला था। जी हां, इस दिन एक नहीं बल्कि दो सूरज सुबह-सुबह देखने को मिलेंगे। सूरज निकलने से करीब आधे घंटे पहले ही पूर्व की दिशा में एक तेज रौशनी नजर आयेगी।
यह रौशनी सूरज की नहीं बल्कि धूमकेतु जी-3 एटलस की होगी। वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि यह पृथ्वी से अबतक नजर आये धुमकेतुओं में से सबसे ज्यादा चमकदार हो सकता है। यह बेहद चमकदार धूमकेतु पृथ्वी के बेहद करीब से गुजरने वाला है। इसे रात के अंधेरे में अपनी आंखों से भी देखा जा सकता है। 13 जनवरी की सुबह सूरज निकलने से करीब 35 मिनट पहले इसे देखा जा सकेगा।
दावा किया जा रहा है कि यह लगभग पिछले दो दशकों में देखा गया अबतक का सबसे चमकीला धूमकेतु हो सकता है। चिली में एटलस सर्वे ने पांच जनवरी को रिसर्च के दौरान इसे खोजा। बताया गया कि धूमकेतु जी-3 एटलस शुरू में धुंधला दिख रहा था। इसके बारे में पता लगाना मुश्किल था। यह धूमकेतु अपना एक चक्कर पूरा करने में 1,60,000 वर्ष का वक्त लेता है।
यह किसी भी व्यक्ति के जीवन में एक बार देखा जाने वाला पल है। वैज्ञानिकों ने दावा किया कि यह धूमकेतु शुक्र और बृहस्पति ग्रह की चमक को मात देने की क्षमता रखता है। धूमकेतु 13 जनवरी को सूर्य के सबसे करीब होगा। तब उसकी दूरी सूर्य से 8.7 मिलियन मील की होगी।
वैज्ञानिकों के मुताबिक जी-3 एटलस दो जनवरी को नाटकीय तरीके से तेजी से चमका। धूमकेतु पर हुए तेज विस्फोट के बाद अचानक उसकी चमक बढ़ गयी, जिसके बाद वो उनकी नजर में आया। इसे लेकर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी भी काफी ज्यादा बढ़ गयी है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि 12 जनवरी को धूमकेतु सूर्योदय से लगभग 35 मिनट पहले उगेगा। इसकी लोकेशन सूर्य के ठीक ऊपर होगा। लोगों को यह सलाह दी गई है कि वो इस दुर्लभ धूमकेतु की एक झलक पाने और इसे अच्छे से स्कैन करने के लिए दूरबीन का उपयोग जरूर करें।
हालांकि साथ ही यह भी कहा गया कि सूर्य से इसकी नजदीकी के कारण लोगों को इसे देखने में मुश्किल भी हो सकती है। एक बार सूरज तेजी से चमकने लगेगा तो धूमकेतु नजर आना बंद हो जायेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। इसरो ने मंगलवार को कहा कि उसने 6 दिसंबर को भारतीय नौसेना के साथ गगनयान का वेल डेक रिकवरी ट्रायल किया। इसरो ने एक बयान में कहा कि विशाखापत्तनम के तट पर एक वेल डेक जहाज का उपयोग करके पूर्वी नौसेना कमान में परीक्षण किये गये।
इस दौरान भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि जहाज में वेल डेक को पानी से भरा जा सकता है ताकि नावों, लैंडिंग क्राफ्ट, बरामद अंतरिक्ष यान को जहाज के अंदर ले जाया जा सके। भारत का लक्ष्य 2025 तक 400 किमी. ऊपर अंतरिक्ष यात्री भेजने का है।
इसरो के मिशन गगनयान की क्रू रिकवरी टीम के पहले बैच को कोच्चि में नौसेना की जल जीवन रक्षा प्रशिक्षण सुविधा (डब्ल्यूएसटीएफ) में नौसेना के गोताखोरों और समुद्री कमांडो की एक टीम ने कई समुद्री परिस्थितियों में प्रशिक्षित किया है।
इसरो के अनुसार गगनयान परियोजना में तीन सदस्यों के एक दल को तीन दिन के मिशन के लिए 400 किमी की कक्षा में लॉन्च करके और भारतीय समुद्री जल में उतरा जायेगा। इसके बाद उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाकर मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करने की परिकल्पना की गयी है।
इसरो ने कहा कि इस ट्रायल का प्राथमिक उद्देश्य रिकवरी समय को कम करना और क्रू मॉड्यूल के समुद्र में उतरने के बाद चालक दल के लिए कम से कम परेशानी न होने देना है। इसरो ने कहा कि गगनयान के लिए चल रही तैयारियों के तहत रिकवरी ट्रायल जारी रहेंगे।
एबीएन डेस्क। अंग्रेजी का शब्द टैलीविजन ग्रीक शब्द टैली और लैटिन शब्द ‘विजन’ से मिलकर बना है। टैली का अर्थ है दूरी पर (फार ऑफ) तथा विजन का अर्थ है देखना अर्थात जो दूर की चीजों का दर्शन कराए, वह टैलीविजन। आज दूर घटित घटनाओं को घर बैठे देख पाना टैलीविजन का ही कमाल है। इससे हम घर में बैठ कर दुनिया के किसी भी कोने में घटी घटना के प्रत्यक्षदर्शी बन जाते हैं।
यह संचार का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम है जिसका आविष्कार जॉन लोगी बेयर्ड ने 1925 में लंदन में किया था। जॉन बचपन के दिनों में बीमार रहा करते थे, इसलिए स्कूल नहीं जा पाते थे। 13 अगस्त, 1888 को स्कॉटलैंड में पैदा हुए जॉन को टैलीफोन का इतना क्रेज था कि 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने खुद ही अपना टैलीफोन बना लिया।
वह सोचा करते थे कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब लोग हवा के माध्यम से तस्वीरें भेज सकेंगे। उन्होंने वर्ष 1924 में बक्से, बिस्कुट के टिन, सिलाई की सूई, कार्ड और पंखे की मोटर का इस्तेमाल कर पहला टैलीविजन बनाया था।
इसके बाद दुनिया के पहले कामकाजी टैलीविजन का निर्माण 1927 में फिलो फान्र्सवर्थ ने किया, जिसे 1 सितम्बर, 1928 को जनता के सामने पेश किया गया। जॉन लोगी बेयर्ड ने कलर टैलीविजन का आविष्कार 1928 में किया। पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग 1940 में हुई और लोगों ने 1960 के दशक में उसे अपनाना शुरू कर दिया था। टैलीविजन शब्द का सर्वप्रथम उपयोग रूसी साइंटिस्ट कांस्टेंटिन परस्कायल ने किया। टैलीविजन से विश्व पर पड़ने वाले प्रभाव और उसके बढ़ते योगदान से होने वाले परिवर्तन को ध्यान में रखकर 17 दिसम्बर, 1996 को सयुक्त राष्ट्र सभा ने 21 नवम्बर को वर्ल्ड टैलीविजन डे के रूप मनाने की घोषणा की।
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