सुनीता विलियम्स समेत चार यात्री सुरक्षित लौटे, नासा ने कहा- क्रू-9 की सफल वापसीएबीएन सेन्ट्रल डेस्क। भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स 286 दिनों के बाद धरती पर वापस लौट आई हैं। अंतरिक्ष एजेंसी- नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक सुनीता और बैरी विल्मोर को लेकर लौट रहा यान तड़के 3.27 बजे अमेरिका के फ्लोरिडा में समुद्र तल पर उतारा। खास बात ये है कि इस मिशन में नासा के साथ एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का भी उल्लेखनीय सहयोग रहा। सुनीता विलियम्स की सकुशल वापसी के लिए भारत में परिजनों ने यज्ञ-हवन और प्रार्थना की। गुजरात में अखंड ज्योति जलाई गई। फ्लोरिडा में स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल से लौटे चारों अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी की नासा ने पुष्टि की। इसे वैज्ञानिक भाषा में सफल स्प्लैशडाउन बताया गया।
भारत भेजेगा Chandrayaan-5 मिशनएबीएन नॉलेज डेस्क। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के जितने भी चंद्रयान मिशन अब तक चांद की सतह पर पहुंचे हैं, सभी ने चांद के बारे में कुछ नई खोज करने के साथ-साथ एक नया रिकॉर्ड भी बनाया है। फिर वह चाहें चांद पर पानी की मौजूदगी का पता लगाना हो या दुनिया में पहली बार चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना। भारतीय चंद्रयान मिशन की वजह से ही चांद की सतह पर भारत का तिरंगा और ऊंचा उठा है। अब भारत ने चंद्रयान-5 मिशन भेजने की तैयारी शुरू कर दी है।इसरो के चेयरमैन वी. नारायण का कहना है कि केंद्र सरकार ने हाल ही में चंद्रयान-5 मिशन को अनुमति दे दी है। ये भारत के चांद की सतह पर मानव को उतारने की दिशा में एक बड़ा कदम है।क्या है चंद्रयान-5 मिशनISRO के चेयरमैन वी. नारायणन का कहना है कि भारत ने 2040 तक मानव को चांद की सतह पर उतारने का लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में भारत की कैपेसिटी बिल्डिंग करने के लिए चंद्रयान-5 मिशन भेजा जाएगा। इतना ही नहीं भारत ने 2035 तक अपना खुद का स्पेस स्टेशन डेवलप करने का भी टारगेट सेट किया है।चंद्रयान-5 मिशन के लिए सरकार ने मंजूरी दे दी है। इसमें 350 किलोग्राम का एक रोवर होगा। वहीं भारत और जापान मिलकर इस पर काम करेंगे। चंद्रयान-5 से पहले भारत ने चंद्रयान-4 मिशन भेजना है। ये चांद की सतह से सैंपल कलेक्ट करने के लिए भेजा जाना है। सरकार ने पिछले साल ही चंद्रयान-4 मिशन को मंजूरी दे दी थी। ये मिशन चंद्रमा पर सेफ लैंडिंग और फिर उसके सेफ रिटर्न की कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए पूरा किया जाना है। साथ ही इसमें सैंपल कलेक्ट करने की टेक्नोलॉजी को भी विकसित करने का लक्ष्य है।जबकि इससे पहले भारत ने 3 चंद्रयान मिशन और पूरे किए हैं। भारत का चंद्रयान-3 मिशन दुनिया का पहला ऐसा लूनार मिशन था, जिसमें रोवर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग की थी। इतना ही नहीं, इस मिशन के साथ ही भारत ने चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने की कैपेसिटी भी तैयार की है।
अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंचा क्रू-10 मिशनजानें सुनीता विलियम्स और विल्मोर कब होंगे धरती के लिए रवानाएबीएन नॉलेज डेस्क। नासा और स्पेसएक्स का क्रू-10 मिशन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंच गया है। फैल्कन 9 रॉकेट में गए इस मिशन के चारों सदस्य अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंच गए हैं। डॉकिंग और हैच खुलने के बाद चारों अंतरिक्ष यात्रियों ने क्रू-9 मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों से मुलाकात की। वहीं नासा के मुताबिक बुधवार को नौ महीने से अंतरिक्ष में फंसी सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर धरती के लिए रवाना होंगे। नासा और स्पेसएक्स का क्रू-10 मिशन शनिवार को फैल्कन 9 रॉकेट के जरिये अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए रवाना हुआ था। इस मिशन में एन मैक्लेन, निकोल आयर्स, जापानी अंतरिक्ष यात्री तकुया ओनिशी और रूसी अंतरिक्ष यात्री किरिल पेस्कोव गये हैं। बताया जाता है कि क्रू-10 मिशन अंतरराष्ट्रीय स्टेशन पर पहुंच गया है। सफल डॉकिंग और हैच खुलने के बाद चारों अंतरिक्ष यात्रियों ने स्टेशन में प्रवेश किया।
एबीएन नॉलेज डेस्क। 14 मार्च 2025 को आसमान में ब्लड मून का नजारा देखने को मिलेगा। ये एक ऐसी दुर्लभ घटना है जो कई सालों में एक ही बार घटित होती है। झारखण्ड की राजधानी रांची के प्रख्यात ज्योतिर्विद पंडित रामदेव पाण्डेय ने बताया कि ब्लड मून का मतलब है लाल चमक वाला चांद। यह ब्लड मून पूर्ण चंद्रग्रहण के दौरान होता है। पूर्ण चंद्रग्रहण तब लगता है जब पृथ्वी चंद्रमा और सूर्य के बीच में आ जाती है। इससे चंद्रमा सूर्य की रोशनी से काफी हद तक या पूर्ण रूप से छिप जाता है। इस साल होली पर 65 मिनट के लिए ब्लड मून का नजारा देखने को मिलेगा।
इसरो की नयी सफलता एबीएन सेंट्रल डेस्क। इसरो का प्रमुख रॉकेट लॉन्च पैड आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में है। यहां से भारत ने अब तक कई ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशन लॉन्च किये हैं। देश की बढ़ती अंतरिक्ष गतिविधियों के चलते, इसरो एक और नया लॉन्च पैड बनाने जा रहा है, जो तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के कुलसेकरपट्टनम में बनेगा। यह कदम करफड की बढ़ती लॉन्चिंग क्षमता को देखते हुए उठाया गया है। नये लॉन्च पैड के बनने से इसरो को अंतरिक्ष मिशनों को और तेजी से और बेहतर तरीके से पूरा करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही, देश में उपग्रहों की लॉन्चिंग क्षमता में भी बढ़ोतरी होगी, जिससे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को और गति मिलेगी।कुलसेकरपट्टनम में इस रॉकेट लॉन्च पैड के लिए 2,233 एकड़ भूमि का अधिग्रहण पहले ही किया जा चुका है। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला पिछले साल फरवरी में रखी थी। इसके बाद इसरो ने यहां से पहले रोहिणी रॉकेट की लॉन्चिंग भी सफलतापूर्वक की थी।नये लॉन्च पैड के निर्माण के बाद, यहां से पहली सफल लॉन्चिंग भी की गयी। रोहिणी 6एच200 छोटा रॉकेट 75.24 किमी की ऊंचाई तक पहुंचने के बाद 121.42 किमी की दूरी तय करते हुए समुद्र में गिरा। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य एटमोसफेरिक सर्वे करना था। आज इस नये रॉकेट लॉन्च पैड के निर्माण कार्य की शुरुआत हो गयी है। मौके पर इसरो के प्रमुख वैज्ञानिक राजाराजन और अन्य वैज्ञानिकों ने भूमि पूजन किया। इस परियोजना में एक नया सेवा भवन और प्रक्षेपण कॉम्प्लेक्स भी बनाया जायेगा, जिससे इसरो को भविष्य में अधिक स्वतंत्रता और लॉन्चिंग की गति मिलेगी।
आईआईआईटी रांची में भाषण के दौरान किसी अज्ञात ने हैक किया लिंक, प्रसारित की अश्लील सामग्री टीम एबीएन, रांची। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैम पित्रोदा ने आरोप लगाया कि आईआईआईटी रांची के छात्रों को डिजिटल माध्यम से संबोधित करते समय किसी ने उनके लिंक को हैक किया और अश्लील सामग्री प्रसारित करना शुरू कर दिया, जिसके कारण आयोजकों को इसे बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सैम के साथ संवाद: उथल-पुथल के दौर में गांधी की प्रासंगिकता विषय पर आॅनलाइन चर्चा के दौरान पित्रोदा ने यह दावा किया। इस चर्चा को उन्होंने शनिवार को एक्स पर पोस्ट किया गया था। पित्रोदा ने कहा, हाल ही में मैं आईआईटी रांची के करीब 100 छात्रों से (आनलाइन) बात कर रहा था। अचानक किसी ने इसे हैक कर दिया और अश्लील सामग्री दिखाना शुरू कर दिया। हमारे पास इसे बंद करने के लिए अलावा कोई विकल्प नहीं था। कांग्रेस नेता ने टिप्पणी की, अब क्या यह लोकतंत्र है? क्या यह उचित है? वीडियो में पित्रोदा ने गलती से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईआईटी) रांची को आईआईटी रांची कह दिया। कांग्रेस नेता ने कहा कि यह घटना बताती है कि शिक्षण संस्थान अब अपने लोकतांत्रिक और स्वतंत्र चरित्र खोते जाते हैं। उन्होंने घटना पर दुख जताते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं अकादमिक चचार्ओं की अखंडता और विचारों के स्वतंत्र आदान-प्रदान को कमजोर करती हैं।
टीम एबीएन, रांची। जोहार लॉर्ड बुद्धा फाउंडेशन द्वारा आयोजित एआई टूल्स और उसकी विशेषताएं वेबीनार में राम लखन सिंह यादव कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ भारत भूषण ने कहा कि वर्तमान समय में लोग जितना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के टूल्स को जानेंगे उतना ही ज्यादा किसी कार्य को आसानी से कर सकते हैं।एआई का एक टूल कई काम कर सकता है, परंतु किसी खास कार्य को वह अन्य टूल्स की तुलना में अधिक बेहतर से कर सकता है। जैसे गूगल जेमिनी एक मल्टी-फंक्शनल एआई टूल्स है, जो टेक्स्ट, इमेज, ऑडियो, वीडियो, कोडिंग, रिसर्च, कंटेंट क्रिएशन, बिजनेस एनालिसिस, हेल्थ और ट्रैवल प्लानिंग में एक्सपर्ट है। इसका उपयोग खासकर स्टूडेंट्स, जनरल यूजर्स, कंटेंट क्रिएटर्स, रिसर्चर्स करते हैं।इसी तरह माइक्रोसॉफ्ट कोपिलॉट एआई टूल्स मुख्य रूप से ऑफिस प्रोडक्टिविटी, बिजनेस टूल्स, डेटा एनालिसिस और कोडिंग में विशेषज्ञ है। इसलिए इसका उपयोग ज्यादातर बिजनेस प्रोफेशनल्स, ऑफिस कर्मचारी, डेवलपर्स करते हैं।जबकि क्लाउड एआई टूल्स हजारों शब्दों को एक साथ प्रोसेस कर सकता है, जो अन्य एआई मॉडल की तुलना में बेहतर है। यह लंबी बातचीत, नैतिक एआई, स्टोरीटेलिंग और टेक्स्ट एनालिसिस में एक्सपर्ट है। इस कारण लेखक, रिसर्चर्स, चैटबॉट यूजर्स, प्रोफेशनल्स इसका अधिक उपयोग करते हैं।
मानसिक एकाग्रता व सेहत के लिये घातक एबीएन नॉलेज डेस्क। तकनीक के जरिये विकास की अंधी दौड़ में हम बहुत कुछ खो भी रहे हैं। इंसान कभी मशीन से संचालित नहीं हो सकता। मानवीय संवेदनाएं और अहसास कभी कृत्रिम नहीं हो सकते। दूसरे शब्दों में कहें तो कोई तकनीक, मशीन व उपकरण सहयोगी तो हो सकते हैं, मगर मालिक नहीं हो सकते। कमोबेश यही बात शिक्षा में तेजी से बढ़ते स्मार्टफोन के उपयोग और उसके घातक प्रभावों को लेकर कही जा सकती है। निस्संदेह, शिक्षा के बाजारीकरण और नयी शैक्षिक परिपाटी में मोबाइल की अपरिहार्यता को महंगे स्कूलों ने स्टेटस सिंबल बना दिया है। लेकिन हालिया वैश्विक सर्वेक्षण बता रहे हैं कि पढ़ाई में अत्यधिक मोबाइल का प्रयोग विद्यार्थियों के लिये मानसिक व शारीरिक समस्याएं खड़ी कर रहा है। निस्संदेह, विभिन्न आनलाइन शैक्षिक कार्यक्रमों के चलते छात्र-छात्राओं में मोबाइल फोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। तमाम पब्लिक स्कूलों ने आनलाइन शिक्षा के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल अनिवार्य तक बना दिया है। कमोबेश सरकारी स्कूलों में ऐसी बाध्यता नहीं है। लेकिन वैश्विक स्तर पर किए गए सर्वेक्षण से यह तथ्य सामने आया है कि स्मार्टफोन एक हद तक तो सीखने की प्रक्रिया में मददगार साबित हुआ है, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि एक समय महज बातचीत का जरिया माना जाने वाला मोबाइल फोन आज दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने वाला बेहद जरूरी उपकरण बन चुका है। खासकर कोरोना संकट के चलते स्कूल-कालेजों के बंद होने के बाद तो यह पढ़ाई का अनिवार्य हिस्सा बन गया। तब लगा था कि इसके बिना तो पढ़ाई संभव ही नहीं है। लेकिन नादान बच्चों के हाथ में मोबाइल बंदर के हाथ में उस्तरे जैसा ही है। जाहिरा तौर पर ये उनके भटकाव और मानसिक विचलन का कारण भी बन सकता है। अब इसके मानसिक व शारीरिक दुष्प्रभावों पर व्यापक स्तर पर बात होने लगी है। यहां तक कि आस्ट्रेलिया समेत तमाम विकसित देश स्कूलों में मोबाइल के उपयोग पर रोक लगा रहे हैं। अब तो यूनेस्को अर्थात संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन की दुनिया में शैक्षिक स्थिति पर नजर रखने वाली टीम ने भी स्मार्टफोन के उपयोग से विद्यार्थियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर चिंता जतायी है। इसकी रिपोर्ट भारत में शिक्षा के नीति-नियंताओं की आंख खोलने वाली है। यूनेस्को की टीम के मुताबिक बीते साल के अंत तक कुल पंजीकृत शिक्षा प्रणालियों में से चालीस फीसदी ने सख्त कानून या नीति बनाकर स्कूलों में छात्रों के स्मार्टफोन के प्रयोग पर रोक लगा दी है। दरअसल, आधुनिक शिक्षा के साथ कदमताल की दलील देकर तमाम पब्लिक स्कूलों में मोबाइल के उपयोग को अनिवार्य बना दिया गया।निस्संदेह, आधुनिक समय में स्मार्टफोन कई तरह से शिक्षा में मददगार है। लेकिन यहां प्रश्न इसके निरंकुश प्रयोग का है। साथ ही दुनिया में बेलगाम इंटरनेट पर परोसी जा रही अनुचित सामग्री और बच्चों पर पड़ने वाले उसके दुष्प्रभावों पर भी दुनिया में विमर्श जारी है। जिसमें प्रश्न बच्चों की निजता का भी है। वहीं प्रश्न ज्यादा प्रयोग से बच्चों के दिमाग व शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का भी है। निस्संदेह, शिक्षकों व अभिभावकों की देखरेख में सीखने की प्रक्रिया में स्मार्टफोन का सीमित उपयोग तो लाभदायक हो सकता है। लेकिन इसका अंधाधुंध व गलत उपयोग घातक भी हो सकता है। दरअसल, स्मार्टफोन में वयस्कों से जुड़े तमाम एप ऐसे भी हैं जो समय से पहले बच्चों को वयस्क बना रहे हैं। उन्हें यौन कुंठित बना रहे हैं। बड़ी चुनौती यह है कि बच्चों की एकाग्रता भंग हो रही है। बच्चों में याद करने की क्षमता घट रही है। ऐसे में जब शिक्षा में स्मार्टफोन का उपयोग टाला नहीं जा सकता, लेकिन उसका नियंत्रित उपयोग तो किया ही जा सकता है। निस्संदेह उसका उपयोग सीमित किया जाना चाहिए। संकट यह भी कि मोबाइल पर खेले जाने वाले आन लाइन गेम जहां बच्चों को मैदानी खेलों से दूर कर रहे हैं, वहीं स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डाल रहे हैं। निश्चित तौर पर फोन छात्र-छात्राओं का सहायक तो बन सकता है, लेकिन उनके दिमाग को नियंत्रित करने वाला नहीं।
पृथ्वी की ओर बढ़ रहे विशाल एस्टेरॉयड ने बढ़ायी वैज्ञानिकों की चिंता, चांद से टकराने की संभावना एबीएन नॉलेज डेस्क। पृथ्वी की ओर बढ़ रहे विशाल एस्टेरॉयड 2024 वाइआर-4 ने वैज्ञानिकों की चिंता को और बढ़ा दिया है। इस एस्टेरॉयड के पृथ्वी से टकराने की संभावना पहले जतायी गयी थी, लेकिन अब एक नये अध्ययन में इसकी संभावना को और बढ़ा दिया गया है। नासा के सेंटर फॉर नियर अर्थ आब्जेक्ट स्टडीज के वैज्ञानिकों ने इसके पृथ्वी से टकराने की संभावना को 1.3% से बढ़ाकर 2.3% कर दिया है। इसके अलावा, अब वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एस्टेरॉयड चंद्रमा से भी टकरा सकता है, जिसमें इसकी संभावना 0.3% जतायी गयी है। क्या होगा अगर एस्टेरॉयड चांद से टकरा गया अगर यह एस्टेरॉयड चंद्रमा से टकराता है, तो इसके परिणामस्वरूप एक बड़ा गड्ढा बन सकता है, क्योंकि चंद्रमा पर वायुमंडल नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रमा पर टकराव से मलबा अंतरिक्ष में फैल सकता है और कुछ मलबा पृथ्वी पर गिर सकता है। हालांकि, डेविड रैंकिन, एरिजोना विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री के अनुसार, पृथ्वी पर गिरने वाले मलबे से कोई बड़ा खतरा उत्पन्न नहीं होगा। पृथ्वी पर टकराव की संभावना और खतरे एस्टेरॉयड 2024 वाइआर-4 का आकार 40 से 90 मीटर के बीच है, और इसकी टकराव की संभावना पहले 1.3% थी, जो अब बढ़कर 2.3% हो गयी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह एस्टेरॉयड पृथ्वी से टकराता है और किसी आबादी वाले इलाके में गिरता है, तो इससे गंभीर नुकसान हो सकता है। हालांकि, यह संभावना है कि यह एस्टेरॉयड समुद्र या पृथ्वी के किसी दूरस्थ हिस्से में गिरेगा। खगोलविद एस्टेरॉयड पर नजर बनाये हुए हैं वर्तमान में यह एस्टेरॉयड पृथ्वी से काफी दूर है और यह कहना मुश्किल है कि अगर टकराव होता है तो इसके प्रभाव क्या होंगे। संयुक्त राष्ट्र के खगोलविद इस एस्टेरॉयड पर लगातार नजर बनाये हुए हैं। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (एरअ) के अनुसार, इस एस्टेरॉयड के पृथ्वी के पास 22 दिसंबर 2032 को सुरक्षित रूप से गुजरने की संभावना 98-99% है, लेकिन 2% संभावना टकराव की बनी हुई है, जो एक बड़ी तबाही का कारण बन सकती है। इस तबाही की जद में दक्षिण एशिया के देशों जैसे भारत और पाकिस्तान भी आ सकते हैं।
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