एबीएन सेंट्रल डेस्क। विश्व के सबसे बड़े और अब तक का सबसे ज्यादा ताकतवर स्पेस टेलीस्कोप शनिवार को अपने अभियान पर रवाना हो गया। दुनिया के सबसे बड़ा यह टेलीस्कोप ब्रह्मांड के कई अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने में वैज्ञानिकों की मदद कर सकता है। यह पहले तारों, आकाशगंगाओं की खोज और जीवन के संकेतों का पता लगाने में भी अहम भूमिका निभाएगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट स्थित फ्रेंच गुयाना अंतरिक्ष केंद्र से क्रिसमस की सुबह यूरोपीय रॉकेट एरियन के जरिए अंतरिक्ष के लिए रवाना किया गया। यह टेलीस्कोप अपने कक्षा तक पहुंचने में 16 लाख किलोमीटर की दूरी तय करेगा जो कि चंद्रमा से चार गुना अधिक दूर है। इसे वहां पहुंचने में एक महीने का समय लगेगा और फिर अगले पांच महीनों में यह ब्रह्मांड की पड़ताल शुरू करने के लिए तैयार हो जाएगा। नासा के एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने इस हफ्ते की शुरूआत में कहा था कि यह हमें हमारे ब्रह्मांड और उसमें हमारे स्थान की बेहतर समझ देने जा रही है कि हम कौन और क्या हैं। हालांकि, उन्होंने आगाह करते हुए यह भी कहा था, जब आप एक बड़ा पुरस्कार चाहते हैं, तो आपके सामने आमतौर पर एक बड़ा जोखिम होता है। एरियनस्पेस के मुख्य कार्याधिकारी स्टीफन इजराइल ने प्रक्षेपण से कुछ मिनट पहले कहा, हम आज सुबह मानवता के लिए प्रक्षेपण कर रहे हैं।
नई दिल्ली। Realme की तरफ से एक खास स्मार्टफोन पर काम किया जा रहा है। Realme GT 2 सीरीज के कैमरे डिटेल की ऑफिशियल जानकारी दी गई है। जिसके मुताबिक अपकमिंग रियलमी जीटी 2 सीरीज के स्मार्टफोन कई कमाल की खूबियों से लैस होगा। जो किसी अन्य स्मार्टफोन में नहीं देखने को मिलेंगी। Realme GT 2 सीरीज को कब लॉन्च किया जाएगा? इस बारे में Realme कंपनी की तरफ से कोई खुलासा नहीं किया है। 150 डिग्री अल्ट्रा-वाइड कैमरे का मिलेगा सपोर्ट : कंपनी की मानें, तो Realme GT 2 सीरीज के स्मार्टफोन में दुनिया का पहला 150 डिग्री अल्ट्रा वाइड एंगल लेंस दिया जाएगा। यह पहले के 120 डिग्री अल्ट्रा वाइड एंगल के मुकाबले ज्यादा डिटेल कैप्चर करेगा। साथ ही यह दुनिया का पहला फिशआई (FishEye) मोड वाला स्मार्टफोन होगा। यह कंपनी का अब तक का सबसे फ्लैगशिप स्मार्टफोन होगा। जिसे जल्द ग्लोबल मार्केट में लॉन्च किया जाएगा। Realme GT 2 सीरीज के स्मार्टफोन में इंप्रूव सिग्नल स्ट्रेंग्थ मिलेगी, जिससे किसी भी एरिया में कनेक्टिविटी से समझौता नहीं करना पडे़गा। Realme GT 2 सीरीज टेंपेरचर कंट्रोल के साथ आएगा। फोन में बैटरी लाइफ को इंप्रूव किया जा सकेगा। फोन एंटीना Array Matrix System के साथ आएगा। इसमें अल्ट्रा-वाइड बैंड हाइपर स्मार्ट एंटीना स्विचंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है साथ ही वाई-फाई इन्हैंस सपोर्ट दिया गया है। फोन में 360 डिग्री NFC सपोर्ट मिलेगा। Realme GT 2 Pro दुनिया का पहला स्मार्टफोन होगा, जिसमें दो सेलुलर एंटीना को NFC सिग्नल ट्रांसरिसीवर फंक्शन के साथ पेश किया जाएगा। इससे सेंसिंग एरिया 500 फीसदी बढ़ जाएगा। साथ सेंसिंग दूरी में 20 फीसदी का इजाफा होगा। Realme GT 2 Pro में एक एंटीना Array Matrix System का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसमें तीन तरह की टेक्नोलॉजी मिलेंगी। इसमें पहले अल्ट्रा-वाइड बैंड एटीना स्विचिंग टेक्नोलॉजी (hyperSmart), एक वाई-फाई इन्हैंसर और 360Ao नियर फील्ड कम्यूनिकेशन (NFC) टेक्नोलॉजी का सपोर्ट मिलेगा।
एबीएन डेस्क। हम बचपन से ही एक सवाल सुनते आ रहे हैं। यह सवाल है पहले मुर्गी आई या अंडा? लेकिन अब इस सवाल का उत्तर मिल गया है। वैज्ञानिकों ने इसका पता लगा लिया है कि दुनिया में पहले मुर्गी आई या अंडा? पहले यह सवाल लोगों को दुविधा में डाल देता था। लोग समझ नहीं पाते थे कि इसका जवाब क्या है? लेकिन वैज्ञानिकों ने अब लोगों के कन्फ्यूजन को दूर कर दिया है। वैज्ञानिकों ने 'पहले मुर्गी आई या अंडा?" इस सवाल का जवाब पूरे तर्क के साथ दिया है। यूनाइटेड किंगडम (UK) के शेफील्ड और वारविक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स ने 'पहले मुर्गी आई या अंडा?" के सवाल के उत्तर को खोजने के लिए इस पर काफी रिसर्च किया है। लंबे समय तक रिसर्च करने के बाद वैज्ञानिकों को आखिरकार कामयाबी मिल गई और उन्होंने इस बड़े प्रश्न के उत्तर को खोज लिया। अपने इस उत्तर को सच साबित करने के लिए वैज्ञानिकों ने कई तर्क भी दिए हैं। वैज्ञानिकों के इस रिसर्च से पता चला है कि दुनिया में पहले मुर्गी आई थी और बांद में अंडा आया था। सबसे खास बात यह है कि मुर्गी के बिना अंडे पैदा नहीं हो सकते हैं। रिसर्च में पाया गया है कि अंडे के खोल में ओवोक्लाइडिन नामक एक प्रोटीन होता है जिसके बिना अंडे की खोल नहीं बन सकती है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह प्रोटीन सिर्फ और सिर्फ मुर्गी के गर्भाशय में ही बनता है। इसलिए जबतक मुर्गी के गर्भाशय से यह प्रोटीन अंडे के निर्माण में इस्तेमाल नहीं होगा तब तक अंडा नहीं बन सकता है। इस बात से अब यह साफ हो चुका है कि दुनिया में पहले मुर्गी आई थी जिसके बाद अंडा आया। इस दुनिया में जब मुर्गी आई तब उसके गर्भाशय में ओवोक्लाइडिन बना जिसके बाद ये प्रोटीन अंडे की खोल में पहुंच पाया। इस रिसर्च के मुख्य वैज्ञानिक डॉ कोलिन फ्रीमैन का कहना है कि यह सवाल काफी समय से लोगों को परेशना कर रहा था कि आखिर दुनिया में पहले मुर्गी आई या अंडा? लेकिन वैज्ञानिकों ने सूबत के साथ इसका जवाब खोज निकाला है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमरीकी स्पेस एजैंसी नासा के अंतरिक्ष यान पार्कर सोलर प्रोब ने सूर्य तक पहुंचने व छूने का अभूतपूर्व कारनामा किया है। एक समय तक असंभव मानी जाने वाली यह उपलब्धि अंतरिक्ष यान ने 8 महीने पहले यानि अप्रैल में ही हासिल कर ली थी, लेकिन अंतरिक्ष में करोड़ों किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस यान से जानकारी पहुंचने और इसके बाद जानकारी का विश्लेषण करने में वैज्ञानिकों को लंबा समय लग गया। नासा ने अपना पार्कर सोल प्रोब अंतरिक्ष यान 12 अगस्त 2018 को लॉन्च किया था। नासा का कहना है कि पार्कर प्रोब से जो भी जानकारी मिलेगी, उससे सूर्य के बारे में हमारी समझ और विकसित होगी। सूर्य के वायुमंडल का तापमान लगभग 11 लाख डिग्री सैल्सियस (करीब 20 लाख डिग्री फारेनहाइट) है। इतनी गर्मी कुछ ही सैकेंड्स में पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी पदार्थों को पिघला सकती है इसलिए वैज्ञानिकों ने स्पेसक्राफ्ट में खास तकनीक वाली हीट शील्ड्स लगाई हैं, जो कि लाखों डिग्री के तापमान में भी अंतरिक्ष यान को सूर्य के ताप से बचाने का काम करती हैं। ऐसे में इस उपकरण को उच्च गलनांक वाले पदार्थ जैसे-टंगस्टन, नियोबियम, मॉलिबिडनम और सैफायर की मिलावट से तैयार किया गया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। जापान के वैज्ञानिकों ने कोरोना संक्रमण की जांच का नया तरीका खोज निकाला है। जापान की क्योटो प्रिफेक्चुअल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा मास्क तैयार किया है जो मोबाइल की फ्लैश लाइट के जरिए बता देता है कि मास्क पहनने वाला कोविड-19 से संक्रमित है या नहीं। मोबाइल के अलावा अल्ट्रा वॉयलेट लाइट से भी इसका पता लगाया जा सकता है। रिसर्चर्स के मुताबिक मास्क की परतों में एक फिल्टर लगाया गया है। इस पर एक फ्लोरोसेंट स्प्रे किया जाता है। इसमें ऐसी एंटीबॉडी होती है जो वायरस के साथ बंध जाती है। यदि मास्क पर वायरस के कण मौजूद होते हैं तो फिल्टर वश् लाइट में चमकता है। यह मास्क स्मार्टफोन की छएऊ लाइट में भी चमकता है। इससे लोग घर बैठे ही अपना कोविड टेस्ट कर सकते हैं। खास बात यह है कि इस मास्क के फिल्टर को शुतुरमुर्ग की कोशिकाओं से बनाया गया है। यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि वैज्ञानिकों ने सबसे पहले कोरोना वायरस को मादा शुतुरमुर्ग में इंजेक्ट किया। इसके बाद उसके अंडों से एंटीबॉडी निकालकर फ्लोरोसेंट स्प्रे तैयार किया। वैज्ञानिकों का दावा है कि शुतुरमुर्ग में मिलने वाली एंटीबॉडी कई तरह के वायरस और बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती है। रिसर्च को लीड करने वाले साइंटिस्ट यासुहिरो सुकामोटो ने बताया कि मास्क का ट्रायल सिर्फ 10 दिन में किया गया है। एक्सपेरिमेंट में शामिल 32 कोरोना मरीजों का मास्क वश् लाइट में तेजी से चमका। रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि जैसे-जैसे मरीज रिकवर हुए, वैसे-वैसे मास्क का चमकना कम होता गया। सुकामोटो का कहना है कि वे अगला ट्रायल 150 लोगों पर करना चाहते हैं। अगर ट्रायल कामयाब रहता है तो सरकार से इजाजत ली जाएगी। मंजूरी मिलने के बाद यह मास्क 2022 में मार्केट में आ सकता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। रक्षा विकास एवं अनुसंधान संगठन (डीआरडीओ) ने सोमवार को ओडिशा में बालासोर तट पर एक लंबी रेंज के सुपरसोनिक मिसाइल असिस्टेड टॉरपीडो (स्मार्ट) का सफल परीक्षण किया। डीआरडीओ ने कहा कि इस प्रणाली को पनडुब्बी रोधी युद्धक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है जो पारंपरिक टॉरपीडो की रेंज से कहीं अधिक हैं। यह एक अगली पीढ़ी की मिसाइल आधारित टॉरपीडो डिलिवरी प्रणाली है। डीआरडीओ ने बताया कि परीक्षण के दौरान मिसाइल की सभी क्षमताओं का सफलतापूर्वक प्रदर्शन देखने को मिला। इस उन्नत मिसाइल प्रणाली के लिए डीआरडीओ की कई प्रयोगशालाओं ने विभिन्न प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं। नौसेना को जल्द की इसकी सौगात मिल सकती है। इस महत्वपूर्ण परीक्षण से दो दिन पहले ही डीआरडीओ और वायु सेना ने स्वदेश में तैयार और विकसित टैंक रोधी मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। यह परीक्षण पोखरण रेंज में हुआ था। इस टैंक रोधी मिसाइल की खास बात यह है कि इसे हेलिकॉप्टर से लॉन्च किया जा सकता है। स्वदेशी हथियार प्रणालियों का हाल के समय में यह तीसका परीक्षण था। मिसाइल और तारपीडो, दोनों की खूबियां : यह एक तरह की सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल है। इसके साथ एक कम वजन का टॉरपीडो लगा है जो पेलोड की तरह इस्तेमाल होता है। दोनों मिलकर इसे एक सुपरसोनिक एंटी-सबमरीन मिसाइल बना देते हैं यानी इसमें मिसाइल के फीचर्स भी मिलेंगे और पनडुब्बी नष्ट करने की क्षमता भी। पूरी तरह तैयार होने पर इसकी रेंज 650 किलोमीटर होगी। इतनी ज्यादा रेंज वाली प्रणाली की मौजूदगी भारतीय नौसेना को दुनिया की सबसे खतरनाक नौसेनाओं की सूची में और ऊपर पहुंचा देगी। उल्लेखनीय है कि देश के पास वरुणास्त्र नामक एक पनडुब्बी रोधी टॉरपीडो पहले से है जो जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) की मदद से अपने लक्ष्य को भेद सकता है। स्मार्ट इसकी तुलना में काफी हल्का है।
एबीएन डेस्क। आपके नाम से कितने सिम कार्ड्स एक्टिव हैं, ये जानना बहुत ही जरूरी है। यदि आपकी ID पर कोई ऐसा सिम एक्टिवेट है जिसका इस्तेमाल आप नहीं कर रहे, तब उसका खामियाजा आपको भुगतना पड़ सकता है। जैसे आपकी ID से रजिस्टर्ड सिम से गलत या गैर कानूनी गतिविधियां चल रही हैं तो आप मुसीबत में पड़ जाएंगे। इसलिए आपके लिए ये जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि आपकी ID पर कितने सिम रजिस्टर्ड हैं। तो चलिए, हम बताते हैं कि आप कैसे पता कर पाएंगे कि आपकी आईडी पर कितने नंबर रजिस्टर्ड हैं। अब दूरसंचार विभाग ने ज्यादा सिम रखने वालों पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यदि कोई ग्राहक तय नंबर से ज्यादा सिम रखता है तब उसे सभी सिम की KYC करनी होगी। इसे लेकर 7 दिसंबर को नोटिफिकेशन जारी हो चुका है। KYC के लिए ग्राहकों को 60 दिन का वक्त दिया जाएगा। इंटरनेशनल रोमिंग, बीमार और विकलांग ग्राहकों को 30 दिनों का अतिरिक्त समय दिया जाएगा। दूरसंचार विभाग ने टेलिकॉम एनालिटिक्स फॉर फ्रॉड मैनेजमेंट एंड कंज्यूमर प्रोटेक्शन (TAFCOP) तैयार किया है। इसके लिए एक पोर्टल tafcop.dgtelecom.gov.in भी लॉन्च किया गया है। इस पोर्टल में देशभर के सभी मोबाइल नंबर का डेटाबेस अपलोड है। पोर्टल के जरिए स्पैम और फ्रॉड पर लगाम लगाने की कोशिश की गई है।इसकी मदद से आप इस बात का पता लगा सकते हैं कि आपकी ID पर कितने सिम चालू हैं। यदि कोई आपकी ID पर सिम चला रहा है तब उसकी शिकायत भी कर सकते हैं। इस प्रोसेस में महज 30 सेकेंड का वक्त लगता है। स्टेप बाय स्टेप इस प्रोसेस को फॉलो कर आप जानकारी हासिल कर सकते हैं। सबसे पहले tafcop.dgtelecom.gov.in पोर्टल पर जाएं। यहां बॉक्स में अपना मोबाइल नंबर डालें और OTP की मदद से लॉगइन करें।अब उन सभी नंबर्स की डिटेल आ जाएगी जो आपकी ID से चल रहे हैं। लिस्ट में कोई ऐसा नंबर है जिसे आप नहीं जानते, तब उसकी रिपोर्ट कर सकते हैं। इसके लिए नंबर और This is not my number को सिलेक्ट करें। अब ऊपर की तरफ दिए बॉक्स में ID में लिखा नाम डालें। अब नीचे की तरफ Report के बॉक्स पर क्लिक कर दें। शिकायत करने के बाद आपको एक टिकट ID रिफरेंस नंबर भी दिया जाता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने मंगलवार को ओडिशा के तट पर चांदीपुर में जमीन से हवा में मार करने वाली वर्टिकली शॉर्ट रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल (वीएल-एसआरएसएएम) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। श्छ-रफरअट को भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित किया गया है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के अधिकारियों के अनुसार यह मिसाइल लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित दुश्मन के टारगेट को तबाह कर सकती है।डीआरडीओ के अनुसार मिसाइल को बहुत कम ऊंचाई पर स्थित इलेक्ट्रॉनिक लक्ष्य को ध्वस्त करने के लिए वर्टिकल लॉन्चर से दागा गया था। वीएल-एसआरएसएएम मिसाइल की लॉन्चिंग का मुख्य उद्देश्य भारतीय नौसेना के युद्धपोतों की तैनाती करना है। इस मिसाइल को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की तीन सुविधाओं द्वारा संयुक्त रूप से डिजाइन और विकसित किया गया है। मिसाइल में समुद्री-स्किमिंग लक्ष्यों सहित निकट सीमा पर विभिन्न हवाई खतरों को बेअसर करने की क्षमता है। समुद्री स्किमिंग की रणनीति का उपयोग विभिन्न जहाज-रोधी मिसाइलों और कुछ लड़ाकू विमानों द्वारा किया जाता है ताकि युद्धपोतों पर रडार द्वारा पता लगाने से बचा जा सके। यह मिसाइल समुद्र की सतह के बेहद करीब से उड़ान भरती हैं और इस तरह इनका पता लगाना और बेअसर करना मुश्किल होता है। इस मिसाइल को 40 से 50 किमी की दूरी पर और लगभग 15 किमी की ऊंचाई पर उच्च गति वाले हवाई लक्ष्यों पर हमला करने के लिए डिजाइन किया गया है। डीआरडीओ के अधिकारियों ने कहा है कि इसका डिजाइन एस्ट्रा मिसाइल पर आधारित है जो कि एक विजुअल रेंज से परे हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। वीएल-एसआरएसएएम मिसाइल की दो प्रमुख विशेषताएं हैं क्रूसिफॉर्म विंग्स और थ्रस्ट वेक्टरिंग। क्रूसिफॉर्म में पंख चार छोटे पंख होते हैं जो चारों तरफ एक क्रॉस की तरह व्यवस्थित होते हैं और प्रक्षेप्य को एक स्थिर मुद्रा देते हैं। वहीं थ्रस्ट वेक्टरिंग अपने इंजन से कोणीय वेग और मिसाइल को नियंत्रित करने वाले थ्रस्ट की दिशा बदलने में मदद करता है। अपने करियर के दौरान कई युद्धपोतों पर काम कर चुके नौसेना के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि नौसेना को अपने युद्धपोत को जहाज-रोधी मिसाइलों और विरोधी विमानों से बचाने के लिए विभिन्न रक्षा तंत्रों को नियोजित करना पड़ता है। सदियों पुरानी विधियों में से एक है चैफ्स - जो दुनिया भर में दुश्मन के रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी (आरएफ) मिसाइल से नौसेना के जहाजों की रक्षा के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक काउंटरमेजर तकनीक है। दूसरा तरीका एंटी शिप मिसाइलों का मुकाबला करने के लिए मिसाइलों को तैनात करना है। इन प्रणालियों में एक त्वरित पहचान तंत्र, त्वरित प्रतिक्रिया, उच्च गति और उच्च गतिशीलता होनी चाहिए। श्छ-रफरअट मिसाइल इन सभी गुणों का दावा करता है। हालांकि, भारतीय नौसेना के जहाजों पर तैनाती के लिए तैयार होने के लिए इसे विभिन्न परिस्थितियों और विन्यासों में परीक्षणों से गुजरना होगा।
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