एबीएन नॉलेज डेस्क। एरोपोनिक विधि से विषाणु रोग रहित आलू बीज उत्पादन के लिए मध्य प्रदेश सरकार के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला के साथ बुधवार को नई दिल्ली में एक करार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत आने वाले इस संस्थान ने हवा में आलू के बीज उत्पादन की यह अनूठी तकनीक विकसित की है। इस मौके पर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों को फसलों के प्रमाणित बीज समय पर उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। इसी कड़ी में आईसीएआर के संस्थानों द्वारा अपने-अपने क्षेत्र में नई तकनीकों का विकास किया जा रहा है। जिसका फायदा किसानों तक पहुंचाने की कोशिश जारी है। आईसीएआर के अधीन आने वाले केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित विषाणु रोग रहित आलू बीज उत्पादन की एरोपोनिक तकनीक से आलू की उपलब्धता देश के कई भागों में किसानों के लिए सुलभ की गई है। आज मध्य प्रदेश के बागवानी विभाग को इस तकनीक का लाइसेंस देने के लिए अनुबंध किया गया है। तोमर ने कहा कि यह नई तकनीक आलू के बीज की आवश्यकता को महत्वपूर्ण रूप से पूरा करेगी। जिससे देश में आलू के उत्पादन में वृद्धि होगी। किसानों की आय बढ़ेगी। रिसर्च के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सराहना : कृषि मंत्री ने कहा कि आलू विश्व की सबसे महत्वपूर्ण गैर-अनाज फसल है, जिसकी वैश्विक खाद्य प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने इसके उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सराहना की। कहा कि कृषि के समग्र विकास के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार अनेक योजनाओं पर मिशन मोड में काम कर रही है। भारत आलू का प्रमुख उत्पादक है। आलू का छठा सबसे बड़ा उत्पादक है मध्य प्रदेश इस मौके पर मध्य प्रदेश के बागवानी मंत्री भरत सिंह कुशवाह ने उम्मीद जताई कि यह तकनीक आलू के बीज की आवश्यकता को काफी हद तक पूरा करेगी। राज्य में आलू उत्पादन में वृद्धि होगी। श्री कुशवाहा ने कहा कि मध्य प्रदेश भारत में आलू का छठा सबसे बड़ा उत्पादक है। मालवा क्षेत्र आलू उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह आलू के लिए आदर्श क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। इन क्षेत्रों में होती है आलू की खेती : मध्य प्रदेश में प्रमुख आलू उत्पादक क्षेत्र इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर, छिंदवाड़ा, सीधी, सतना, रीवा, सरगुजा, राजगढ़, सागर, दमोह, जबलपुर, पन्ना, मुरैना, छतरपुर, विदिशा, रतलाम एवं बैतूल हैं। अकेले इंदौर जिला क्षेत्र, राज्य उत्पादन में लगभग 30 फीसदी का योगदान दे रहा है। प्रदेश में उच्च गुणवता वाले बीज की कमी हमेशा से एक समस्या रही है, जिसका समाधान किया जा रहा है। आलू अनुसंधान संस्थान के साथ हुए करार से किसानों को काफी सहूलियत होगी। प्रदेश के बागवानी आयुक्त ई. रमेश कुमार ने कहा कि एमपी को लगभग चार लाख टन बीज की आवश्यकता है, जिसे 10 लाख मिनी ट्यूबर उत्पादन क्षमता वाली इस तकनीक से पूरा किया जाएगा। प्रसंस्करण में गुणवत्ता वाले आलू बीज की उपलब्धता भी राज्य के आलू प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देगी। एरोपॉनिक तकनीक में क्या है एरोपोनिक तकनीक के माध्यम से पोषक तत्वों का छिड़काव मिस्टिंग के रूप में जड़ों में किया जाता है। पौधे का ऊपरी भाग खुली हवा व प्रकाश में रहता है। एक पौधे से औसत 35-60 मिनिकन्द (3-10 ग्राम) प्राप्त किए जाते हैं। चूंकि, मिट्टी उपयोग नहीं होती तो मिट्टी से जुड़े रोग नहीं होते और पारंपरिक प्रणाली की तुलना में एरोपॉनिक प्रणाली प्रजनक बीज के विकास में दो साल की बचत करती है। इस तकनीक का व्यावसायीकरण 8 राज्यों की 20 फर्मों के साथ आलू बीज उपलब्धता के लिए किया गया है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि वैज्ञानिक अभी तक इसके कुछ ही रहस्यों के बारे में जान पाए हैं। वैज्ञानिक को यह पता लगाने में कामयाबी हासिल की है कि ब्रह्मांड में मिल्की वे की तरह कई गैलेक्सी भी हैं। हर गैलेक्सी अपना अलग सिस्टम है। अब इस बीच वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल के बाहर बाहर दो नए ग्रहों की खोज की है। इसके अलावा उन्होंने 30 धूमकेतु का भी पता लगाया है। यह धूमकेतु सूर्य की ही तरह बीटा पिक्टोरिस स्टार का चक्कर लगाते हैं। बीटा पिक्टोरिस की खोज करीब 40 साल पहले हुई थी जो एक मलबे की डिस्क से घिरा हुआ है। यह डिस्क गैस और धूल के गुबार से घिरा हुआ है। इन ग्रहों को देखने के बाद वैज्ञानिकों में काफी उत्साह है। हमारा सौर मंडल 4.5 अरब साल पुराना है, तो वहीं 20 मिलियन साल पुराना बीटा पिक्टोरिस है। वैज्ञानिक इसी के माध्यम से ग्रहों के निर्माण को समझ सकते हैं। धरती से 63 प्रकाश वर्ष दूर हैं ग्रह : एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, धरती से यह दोनों ग्रह करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं। इसलिए इनकी रोशनी को धरती तक पहुंचने में 63 साल लगते हैं। वैज्ञानिकों ने धूमकेतु को साल 1987 की शुरुआत में खोजा था जो सूर्य जैसे तारे की परिक्रमा कर रहे हैं। नासा के ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट से बीटा पिक्टोरिस सिस्टम का 156 दिनों तक जांच पड़ताल किया गया। यह जांच पड़ताल एक इंटरनेशनल रिसर्च टीम ने की है। धमकेतु खोजने के अलावा शोधकर्ताओं ने उनके आकार का भी पता लगा लिया है। इनका आकार हमारे सौर मंडल में मिलने वाले धूमकेतुओं जैसा ही है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि इनका आकार करीब 3 से 14 किमी वृत का है। वैज्ञानिकों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर मिले किसी धूमकेतु के आकार का पता लगाने में कामयाबी हासिल की है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, हमारे सौर मंडल में जो धूमकेतु मिलते हैं वह अंतरिक्ष में घूमने वाली दूसरी चीजों से टकराते हैं, तो उनका आकार बदल सकता है। उल्कापिंड और धूमकेतु की किसी ग्रह के निर्माण की शुरुआत में अहम भूमिका होती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि धरती पर जो पानी मिलता है उसका कुछ भाग धूमकेतु के बर्फ से ही पहुंचा है। वैज्ञानिकों के उत्साहित होने की वजह यह है कि दो नए ग्रहों पर इनका कैसा प्रभाव होगा। अब आने वाले समय में वैज्ञानिक इन दोनों के और रहस्यों से पर्दा उठाएंगे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में 155 मिमी/52 कैल एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) का परीक्षण सफलतापूर्वक किया गया। डीआरडीओ (DRDO) ने इसकी जानकारी दी। डीआरडीओ के मुताबिक, ये परीक्षण 26 अप्रैल से 2 मई 2022 के बीच किया गया। एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम डीआरडीओ द्वारा विकसित की गई एक आधुनिक तोप है। इस तोप को भारत फोर्ज लिमिटेड और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड द्वारा निर्मित किया गया है। अब तक इसके छह से सात परीक्षण हो चुके हैं। इसे सबसे पहले 26 जनवरी 2017 को गणतंत्र दिवस परेड पर लोगों के सामने प्रदर्शित किया गया था। इस सफल परीक्षण से सेना की भविष्य की युनौतियों से निपटा जा सकेगा और सेना की मारक क्षमता और मजबूत होगी। बता दें कि इसका पहला परीक्षण 2016 में हुआ था। अगर इसकी खासियत की बात करें तो इसका वजन 18 टन है। यह सबसे लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम स्वदेशी तोप है। इसकी नली यानी बैरल की लंबाई 8060 मिलिमीटर है। यह माइनस 3 डिग्री से लेकर प्लस 75 डिग्री तक एलिवेशन ले सकता है। इसकी फायरिंग रेंज 48 किलोमीटर है। एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम को विकसित करने में करीब चार साल लगे हैं। बता दें कि भारतीय सेना के पास 155 mm की यह गन फिलहाल सात हैं। टैंक विध्वंसक हेलिना मिसाइल का दूसरा सफल परीक्षण पिछले महीने की 12 तारीख को टैंक विध्वंसक हेलिना मिसाइल का हेलीकॉप्टर के जरिए दूसरा सफल परीक्षण किया गया था। रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि हेलिना का पहला सफल परीक्षण एक दिन पहले किया गया था। दोनों परीक्षण उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर के जरिए से किए गए। बयान में कहा गया, आज का परीक्षण विभिन्न परिधि और ऊंचाई से किया गया। योजना के अनुसार, मिसाइल ने टैंक प्रतिकृति लक्ष्य पर सटीक निशाना साधा। परीक्षण के दौरान सेना के वरिष्ठ कमांडर और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिक मौजूद थे। मंत्रालय ने कहा कि परीक्षण के साथ ही इमेजिंग इन्फ्रा-रेड कौशल प्रणाली सहित मिसाइल की पूरी प्रणाली का प्रदर्शन सफल रहा है जिससे हेलिना को सशस्त्र बलों में शामिल करने में मदद मिलेगी। हेलिना हर मौसम में दिन या रात कभी भी निशाना साधकर लक्ष्य नष्ट करने में सक्षम है और यह पारंपरिक बख्तरबंद प्रणालियों तथा युद्धक टैंकों को तबाह कर सकती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। ये तो आप जानते हैं कि एक घंटे में 60 मिनट होती है और एक मिनट में 60 सेकेंड्स होती है। लेकिन, कभी आपने सोचा है कि आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई होगी और सबसे पहले 60 के आधार पर गणना किसने की होगी। ये जानना काफी दिलचस्प है कि आखिर सबसे पहले 60 वाले इस कंसेप्ट की किस तरह शुरुआत हुई और सबसे पहले इसकी शुरुआत किसने की थी। इसके बाद आप समझ पाएंगे कि समय में एक घंटे में 60 मिनट और 60 सेकेंड्स का कंसेप्ट किस तरह से शुरू हुआ। डीडब्ल्यू हिंदी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बेबीलॉग के लोगों द्वारा विकसित की गई यह एक प्राचीन प्रणाली पर आधारित होता है, जो मेसोपोटामिया की सभ्यता में रहते थे। रिपोर्ट के अनुसार, उन लोगों ने बाएं हाथ के अंगूठे से चार अगुंलियों के 12 हिस्सों को गिना था, जिसे एक पवित्र अंक माना था। इसके बाद उन्होंने रात और दिन को इस 12 के आधार पर बांट दिया। हालांकि, उस वक्त तक उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाने में 24 घंटे का समय लेती है। लेकिन, उन्होंने पहले ही 12-12 के आधार पर यह तय कर लिया था और दिन-रात वैसे ही तय किया था, जिसे अलग अलग दुनिया की तरह माना। इससे ही दिन में 24 घंटे की बात को आधार मिला और यह बाद में सच भी साबित हुआ। एक घंटे में 60 मिनट का कैसे पता किया : दरअसल, उन्होंने अपने दाहिने हाथ के जरिए अपने बाएं हाथ की चार उंगुलियों के हिस्सों को अलग अलग उंगलियों और अंगूठे से गिना, जिसका जोड़ 60 निकला। हालांकि, उस वक्त तक समय की जानकारी सटीक जानकारी जरूरी नहीं थी। उस वक्त केवल खगोलशास्त्री ही इस 60 का इस्तेमाल समय की सटीक गणना के लिए करते थे। माना जाता है कि इन लोगों की इस गणना सिस्टम की वजह से घंटे में 60 मिनट के कंसेप्ट के बारे में पता चला। द गार्डियन की एक रिपोर्ट भी बताती है कि एक मिनट में 60 सेकेंड और एक घंटे में 60 मिनट की बात बैबीलोन के लोग से पता चली है, जो मैथ्स आदि के लिए सेक्सागेसिमल सिस्टम का इस्तेमाल करते थे और ये गणना 60 पर आधारित थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने अपना ये नंबर सिस्टम सुमेरियों से प्राप्त की जो 3500 ईसा पूर्व में इसका उपयोग कर रहे थे। बताया जाता है कि ये सिस्टम ही दिन और रात के लिए 12 उपखंडों का उपयोग करने, 60 घंटे और मिनट के लिए इसका इस्तेमाल होता है। 60 ही क्यों : अब सवाल ये है कि आखिर वे लोग 60 को इतना अहम क्यों मानते हैं। दरअसल, 60 एक ऐसी संख्या है, जिससे सबसे ज्यादा तरीकों से बराबर हिस्सों में बांटा जा सकता है। यानी 60 में काफी संख्या का भाग दिया जा सकता है, जैसे 2,3,5,10,12 आदि। ऐसे में 60 के आधार पर कई गणना की गई और उस गणना के आधार पर मिनट, सेकेंड, घंटे के कंसेप्ट को समझने में मदद मिली। ऐसे में कहा जा सकता है कि एक घंटे में 60 मिनट और 1 मिनट में 60 सेकेंड का कंसेप्ट बैबीलॉन के लोगों की देन हो सकती है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में अब अगर शराब पीकर गाड़ी चलाने की सोच रहे हैं तो हो जाएं सावधान। दरअसल, धनबाद के बीसीसीएल (भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) में काम करने वाले इंजीनियरों ने कमाल कर दिखाया है। उन्होंने एक ऐसी डिवाइस का आविष्कार किया है, जिससे यदि व्यक्ति ने शराब पी रखी है तो गाड़ी स्टार्ट नहीं होगी। वहीं अगर गाड़ी का इंजन पहले से ही चल रहा है तो और ड्राइविंग सीट पर कोई व्यक्ति शराब पीकर बैठता है तो इंजन खुद ही बंद हो जाएगा। धनबाद के 3 इंजीनियर अजीत यादव, सिद्धार्थ सुमन और मनीष बलमुचू ने इस तकनीक का नाम ह्यस्मार्ट सेफ्टी सिस्टम अगेंस्ट अल्कोहल इन व्हीकल (एसएसएसएएवी) दिया है। इस तकनीक के तहत एक ऐसी डिवाइस बनाई गई है, जिसे ड्राइविंग सीट के सामने लगाया जाता है। यह डिवाइस ड्राइविंग सीट पर बैठने वाले शख्स की सांस को सेंसर के जरिए पकड़ लेती है। डिवाइस के जरिए सड़क दुर्घटनाओं से मिलेगी निजात : वहीं तीनों इंजीनियर ने पाया कि कोयला क्षेत्र में ट्रांसपोर्टिंग करने वाली गाड़ियों की दुर्घटनाओं में ज्यादातर मामलों में ड्राइवर के शराब के नशे में होने की बात सामने आती है। इसके बाद उन्होंने ऐसी तकनीक को विकसित करने का फैसला लिया, जिससे ड्राइवर को शराब पीने से रोका जा सके। उन्होंने कंपनी को इस डिवाइस के उपयोग का सुझाव भी दिया है। BCCL के पूर्वी क्षेत्र के जीएम ने कही ये बात : बीसीसीएल के पूर्वी क्षेत्र के जीएम एसएस दास ने कहा कि इस डिवाइस को आगे के परीक्षण के लिए डीजीएमएस (डायरेक्टर जेनरल माइंस सेफ्टी) के पास भेजा जायेगा। उनके अप्रूवल के बाद इसका इस्तेमाल करने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। बता दें कि कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनी बीसीसीएल की वार्षिक सुरक्षा प्रदर्शनी में इस तकनीक का प्रदर्शन भी किया जा चुका है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। एक सरकारी रिपोर्ट में अमेरिका की सनक व सीक्रेट मून मिशन को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। वाइस मीडिया के हाथ लगी इस सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका चांद पर परमाणु विस्फोट करके सुरंग बनाने की फिराक में था। यह बात बेशक साइंस-फिक्शन मूवी की कहानी लगती है, लेकिन कई सालों से अमेरिका हकीकत में इस पर रिसर्च कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने इस योजना पर भारी-भरकम खर्च भी किया लेकिन उसका यह प्लान सफल नहीं हुआ। वाइस मीडिया के अनुसार, चांद पर विस्फोट करके सुरंग बनाने की बात नेगेटिव मास प्रोपल्जन रिपोर्ट में की गई है। अमेरिकी रिसर्चर्स का मानना है कि चांद के बीचों-बीच बेहद हल्के मेटल्स मिल सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये स्टील से एक लाख गुना ज्यादा हल्के हो सकते हैं, लेकिन इनकी ताकत स्टील जितनी ही होगी। रिपोर्ट में इस मून मिशन के लिए उस समय करीब 22 मिलियन डॉलर फंड किए जाने की बात की गई है। रिपोर्ट के अनुसार करीब 1600 पन्नों के इन दस्तावेजों में एडवांस्ड एयरोस्पेस थ्रेट आइडेंटिफिकेशन प्रोग्राम (AATIP) और एडवांस्ड एयरोस्पेस वेपन्स सिस्टम ऐप्लिकेशन प्रोग्राम (AAWSAP) का जिक्र किया गया है। इन दोनों ही योजनाओं को अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने फंड किया था। रिपोर्ट में रिसर्च प्रपोजल, कॉन्ट्रैक्ट और मीटिंग नोट्स शामिल हैं। दस्तावेजों में कहा गया है कि अमेरिका में AATIP के तहत UFO से जुड़ी रहस्यमयी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च भी की जा रही थी। AATIP साल 2007 से 2012 तक सक्रिय था। यह लोगों की नजर में तब आया, जब 2017 में प्रोग्राम के पूर्व डायरेक्टर ने पेंटागन से इस्तीफा दे दिया था। अब 5 साल बाद ये बात सामने आई है कि AATIP की रिसर्च केवल UFO तक सीमित न होकर दूसरी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पर भी चल रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक AAWSAP मिशन के तहत अमेरिका ऐसी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च कर रहा था, जो हम सिर्फ फिल्मों में देखते हैं। इसमें चांद पर न्यूक्लियर एक्सप्लोजन करने, इनविजिबल होने के लिए कपड़ा बनाने, एंटी ग्रैविटी टेक्नोलॉजी और टाइम ट्रैवलिंग मशीन बनाने जैसे मिशन्स पर रिसर्च की जा रही थी। हालांकि, अब तक इनमें से कोई भी चीज सच में नहीं हो पाई है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष में कई रहस्य छिपे हैं। अंतरिक्ष में रोजाना कई ऐसी गतिविधियां होती हैं, जो हमारे लिए शोध का विषय रही हैं। ऐसी ही एक गतिविधि है उल्का पिंडों की बारिश या टूटते तारों का दिखना। ऐसा ही नजारा शुक्रवार रात से अगले कुछ दिनों तक देखने को मिलेगा। सालाना लिरिड उल्का पिंडों की यह बारिश भारतीय शहरों से भी देखने को मिलेगी। ऐसा नजारा अब 29 अप्रैल तक रोज आसमान में देखा जा सकेगा। हालांकि, विशेषज्ञों को कहना है कि कहीं कहीं पर चांद अपनी रोशनी के जरिये ऐसा नजारा दिखने से रोक सकता है। वहीं, खगोलविदों का मानना है कि चांद की रोशनी की वजह से जब उल्कापिंडों को देखना मुमकिन ना हो तो इसे सुबह तड़के देखा जा सकता है। इस साल इस नजारे को देखने में दिक्कत आएगी क्योंकि चांद इसकी दृश्यता 20 से 25 फीसदी तक कम कर देगा। वहीं विशेषज्ञों ने कहा है कि हर घंटे कम से कम 10-15 उल्कापिंडों को बारिश होगी। इन्हें दिल्ली, कोलकाता के साथ-साथ देश के कुछ अन्य हिस्सों से भी देखा जा सकता है। अगले कुछ दिन रात करीब 8:31 बजे इनकी बारिश चरम पर देखी जा सकती है। नासा के अनुसार लिरिड उल्का पिछले 2,700 वर्षों से देखे जा रहे हैं और रात के आकाश में चमकते धूल के निशान और लकीरों को पीछे छोड़ने के लिए जाने जाते हैं। सितारों के लायरा नक्षत्र के नाम पर इनका नाम रखा गया है। यह उल्का धूमकेतु थैचर द्वारा छोड़े गए मलबे के क्षेत्र का हिस्सा हैं। जो वर्तमान में सूर्य से दूर सौर मंडल के माध्यम से चल रहा है। यह अगले 45 साल में अपनी ट्रैजेक्टरी को उलट देगा। धूमकेतु को लंबी अवधि के धूमकेतु के रूप में वगीर्कृत किया गया है और इसे एक बार सूर्य की परिक्रमा करने में 415 वर्ष लगते हैं। मलबे के क्षेत्र तब बनते हैं जब धूमकेतु छोटे-छोटे टुकड़ों को पीछे छोड़ते हुए गुजरते हैं। पृथ्वी की स्थिति के आधार पर जब यह इन मलबे के क्षेत्रों में पहुंचता है तो उल्का वर्षा बनाने के लिए वातावरण में कई टुकड़े जल जाते हैं। लिरिड उल्का की बारिश करीब 3 बार होगी। 3 महीने तक कोई भी टूटा तारा या उल्का पिंड की बारिश देखने को नहीं मिली है। इसे लेकर विशेषज्ञों में उत्साह है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आप वेजिटेरियन हैं या नॉनवेजिटेरियन? यानी आप शाकाहारी हैं या मांसाहारी? इस सवाल पर कुछ लोगों का जवाब होता है कि वे शाकाहारी हैं, बस अंडा खा लेते हैं। इसके लिए एक नया वर्ड एजिटेरियन होता है। अब सवाल ये है कि अंडा शाकाहार है मांसाहार? क्या आप बता सकते हैं कि अंडा वेज है या नॉनवेज? नहीं बता सकते तो कोई बात नहीं। हम आपको बता देते हैं कि अंडा शाकाहार है या मांसाहार। दरअसल, अंडा वेज भी है और नॉनवेज भी। अब आप सोचेंगे कि ऐसा कैेस हो सकता है! क्षेत्रीय कुक्कुट प्रक्षेत्र भागलपुर की निदेशक डॉ अंजली ने इस बारे में विस्तार से समझाया है। उनके मुताबिक, अगर मुर्गी बिना मुर्गे के संसर्ग में आए अंडा देती है तो उसे टेबल परपस या शाकाहारी अंडा कहा जा सकता है। यहां अंतर फर्टिलाइज्ड अंडे और अनफर्टिलाइज्ड अंडे का होता है। यानी मुर्गियां बिना मुर्गे से संबंध बनाए भी अंडा दे सकती हैं। मुर्गी के अंडा देने की एक नैचुरल प्रक्रिया होती है। चूजा उत्पादन के लिए इनक्वेटर हेचरीज का यूज करते हैं। इसके लिए 10 मुर्गी पर एक मुर्गा छोड़ा जाता है। इस केज में जो अंडा होगा, वह फर्टिलाइज अंडा होगा और उससे चूजा निकल सकता है। ऐसे अंडे को नॉन वेजिटेरियन अंडा कहा जाता है। यानी मुर्गी, मुर्गे के संपर्क में आने के बाद फर्टिलाइजेशन से अंडा देती है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि अंडे से चूजा निकलता है, इसलिए यह मांसाहार हुआ। लेकिन आपको बता दें कि बाजार में ज्यादातर अंडे अनफर्टिलाइज्ड होते हैं, जिनसे कभी चूजे बाहर नहीं निकल पाएंगे। ऐसे अंडों को टेबल परपस से तैयार किया जाता है। मुर्गी जब 6 महीने की हो जाती है तो हर एक-डेढ़ दिन में अंडे देती है, लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं कि उसे मुर्गे से संबंध बनाना पड़े। डॉक्टर अंजली के मुताबिक, शाकाहारी और मांसाहारी अंडे में फर्क करने का एक आसान सा तरीका है। इस तरीके में अंडे को एक टेबल पर बने खांचे में रखा जाता है। इसके बाद बंद कमरे में उस टेबल के नीचे एक बल्ब जलाते हैं। बल्ब की रोशनी एक-एक अंडे के नीचे से गुजारी जाती है। इसमें जिस अंडे से रोशनी पार हो जाए या अंडा पूरी तरह से लाल दिखे तो वह शाकाहारी अंडा होगा। मांसाहार वाले अंडे में ऐसी बात नहीं नजर आएगी।
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