एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रेल हर रोज लाखों लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने का काम करती है। रेलवे की ओर से हर वर्ग के यात्री को हरसंभव सुविधाएं देने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा रेलवे यात्रियों और उसके सामान को सुरक्षा देने की कोशिश करता है। कई बार होता है कि यात्री अपना सामान ट्रेन में छोड़ देते हैं, इस स्थिति में रेलवे की कोशिश रहती है कि वो सामान यात्री को मिल जाए। ऐसे में जानते हैं जब ट्रेन में बैग छूट जाता है तो उसका क्या किया जाता है... जब कभी किसी यात्री का बैग ट्रेन में छूट जाता है तो उसे स्टेशन पर जमा करवा दिया जाता है। दरअसल, छूटे हुए बैग आदि को रेलवे कर्मचारी स्टेशन मास्टर को जमा करवा देते हैं। इसके बाद सामान के आधार पर आगे की प्रक्रिया डिसाइड होती है। जैसे मान लीजिए अगर बैग में कोई ज्वैलरी आदि है तो इसे 24 घंटे ही रेलवे स्टेशन पर रखा जाता है। अगर 24 घंटे में कोई इस सामान पर क्लेम करता है तो उसे दे दिया जाता है। अगर कोई क्लेम नहीं करता है तो उसे जोनल ऑफिस में भेज दिया जाता है। वहीं, अगर सामान्य सामान होता है तो तीन महीने का टाइम होता है। रेलवे अधिकारी इसे तीन महीने तक अपने पास ही रखते हैं और उसके बाद उसे आगे भेज दिया जाता है। लंबे समय तक सामान पड़े रहने पर उसे बेचने या निपटारे के भी नियम हैं। कभी बैग छूट जाए तो क्या करें : अगर कभी आपका बैग ट्रेन में छूट जाए तो आप रेलवे पुलिस को इसकी जानकारी दे। आप आरपीएफ में इसकी एफआईआर भी दर्ज करवा सकते हैं। ऐसे में रेलवे और पुलिस की जिम्मेदारी बनती है कि वो आपके सामान को ढूंढने का प्रयास करते हैं। इस कई तरह से जांच आगे बढ़ती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। हवाई चप्पल तो आप सभी पहनते होंगे! मतलब स्कूल, कॉलेज, दफ्तर वगैरह भले ही जूते पहनकर जाते होंगे, लेकिन घर पर, मॉर्निंग वॉक वगैरह करते समय आप हवाई चप्पल ही पहनते होंगे! दिनभर जूते पहनने के बाद घर लौटकर हवाई चप्पल में जो आराम मिलता है, वह और कहां! चमड़े के चप्पल-जूते या फिर डिजाइनर फुटवियर एक तरफ और हवाई चप्पल एक तरफ। हवाई चप्पल को स्लीपर भी कहा जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसके अलग नाम हो सकते हैं, लेकिन भारत में हम सभी इसे हवाई चप्पल ही कहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं, इसका नाम हवाई चप्पल कब और क्यों पड़ा? दो फीते वाले इस हवाई चप्पल का डिजाइन बहुत ही पुराने समय से चला आ रहा है। न केवल भारत, बल्कि चीन, जापान, अमेरिका समेत दुनिया के अलग-अलग देशों में इस तरह की चप्पलों की पुरानी तस्वीरें मिलती हैं। हालांकि सवाल ये है कि इसका नाम हवाई चप्पल ही क्यों पड़ा। ये हवाई शब्द इसमें क्यों और कैसे जुड़ा, इसकी कहानी दिलचस्प है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दो पट्टे वाली चप्पल के नाम में हवाई जुड़ा, अमेरिका में मौजूद हवाई आईलैंड की वजह से। दरअसल, इस आइलैंड पर टी नाम का एक पेड़ होता है, जिससे रबरनुमा फैब्रिक तैयार कर के चप्पलें बनाई जाती हैं। शुरुआत में इसी वजह से इस चप्पल के नाम में हवाई शब्द जुड़ गया और यह हवाई चप्पल हो गया। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, हवा जैसी हल्की होने के कारण इसके नाम में हवाई शब्द जुड़ा। इसके इतिहास के बारे में बताया जाता है कि वर्ष 1880 में जापान के गांवों से मजदूरों को फैक्ट्रियों, कल-कारखानों और खेतों में काम करने के लिए अमेरिका के हवाई आईलैंड लाया गया था। उन्हीं के साथ चप्पलों का यह डिजाइन हवाई आइलैंड पहुंचा। वर्ष 1932 में कोबलर एल्मर स्कॉट ने हवाई आइलैंड पर चप्पल बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रबरनुमा फैब्रिक को जापानी डिजाइन में ढाला और हवाई चप्पलें अस्तित्व में आईं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हवाई चप्पलों का सबसे पहले इस्तेमाल प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों ने किया था। हवाई चप्पल का नाम फेमस करने के पीछे हवाइनाज की भूमिका बताई जाती है, जो ब्राजील का एक फुटवियर ब्रांड है। वर्ष 1962 में हवाइनाज ने रबर की चप्पलें लॉन्च की थीं। नीली स्ट्रिप के साथ सफेद-नीले रंग की ये वही चप्पलें थीं, जिसकी तस्वीर हवाई चप्पल का नाम लेते ही हमारे जेहन में उभरती है। वहीं भारत के घर-घर में हवाई चप्पल को पहुंचाने में बाटा कंपनी की भूमिका मानी जाती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा आने वाले सालों में कई बड़े अभियानों पर काम करने जा रही है। इसमें चंद्रमा और मंगल पर भेजे जाने वाले मानव अभियान भी शामिल हैं। हाल ही में एजेंसी ने अमेरिकी उद्योग, शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय, और लोगों से अपने डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन अभियानों और कार्यक्रमों की रणनीति और उद्देश्यों के लिए सुझाव मांगे हैं। इसके साथ ही नासा ने मंगल और चंद्रमा अभियानों के लिए उच्च स्तरीय उद्देश्यों की सूची भी जारी की है। इसमें उनसे मंगल अभियान की योजना के बारे में भी कुछ जानकारी भी है। कितने दिन रुकेंगे मंगल पर : नासा के लक्ष्यों में मंगल के लिए उसका महत्वाकांक्षी मानव अभियान है। इस अभियान में दो लोग मंगल की सतह पर 30 दिन के लिए रुकेंगे। नासा ने लोगों से फीडबैक मांगा है कि उसकी योजना कैसी चल रही है। इसके लिए पूर्वनियत आखिरी तारीख को 31 मई से आगे बढ़ा कर 3 जून कर दिया गया है। क्या आगे खिसका है अभियान : नासा ने बताया है कि उसका लक्ष्य मंगल पर जाने के लिए 2030 दशक के अंत या फिर 2040 के दशक के शुरुआत में है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि दो साल पहले ही यह लक्ष्य 2030 के दशक की शुरुआत से मध्य तक का अनुमानित किया गया था। फिर भी इस बार तो समय बताया जा रहा है उसमें माना गया रहै कि फंडिंग और तकनीकी की वजह से इस कार्यक्रम के कालक्रम में बदलाव नहीं आएगा। गुरुत्व की विविधता : नासा के अनुसार अब भी पृथ्वी से मंगल तक जाने, वहां रुकने और फिर वापस आने में 500 दिन का ही समय लगेगा। इसके अलावा कई तरह की चुनौतियों का सामना करना होगा। गुरुत्व की विविधता भी एक समस्या होगी। अंतरिक्ष यात्री महीनों सूक्ष्मगुरुत्व में रहकर सफर करते हुए मंगल पर पहुंचेंगे जहां उन्हें मंगल के गुरुत्व का सामना करना होगा जो पृथ्वी के गुरुत्व का एक तिहाई है। नासा का सुझाव : नासा ने सुझाया है कि इस समस्या से निपटना का एक रास्ता यह हो सकता है कि मिशन के दौरान क्रू सदस्य दबाव वाले रोवर में ही रहें। नासा क स्पेस आर्कीटेक्चर्स के निदेशक कर्ट वोगेल ने कहा,हम विज्ञान पर ज्यादा जोर देना चाहते हैं इसलिए हमें उन्हें हालात के आदी होने से पहले बाहर चहलकदमी करने पर जोर नहीं देंगे। अपोलो कार्यक्रम की तरह : फिलहाल नासा के इस मिशन की योजना शुरुआती चरणों में हैं और बाद में बदल भी सकती है। फिलहाल, नासा ऐसे अंतरिक्ष यान के उपयोग पर विचार कर रहा है जो हाइब्रिड रॉकेट चरण हो (यानि जिसमें रासानियक और विद्युत नोदन दोनों का उपयोग हो। इस अभियान में चार लोग मंगल तक लंबी यात्रा तक जाएंगे जिनमें से दो सतह पर उतरेंगे। यह अपोलो कार्यक्रम की ही तरह है जिसमें तीन यात्री जाते थे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। वैज्ञानिकों ने सुपर टमाटर विकसित किया है। उनका दावा है कि यह खास तरह का टमाटर है। इसमें उतना विटामिन-डी है जितना दो अंडों में होता है। यह बच्चे और वयस्क की रोजाना की विटामिन-डी3 की जरूरत को पूरा कर देगा। इतना ही नहीं, यह इंसानों में कई बीमारियों जैसे- कैंसर, डिमेंशिया और पार्किंसंस डिजीज के पनपने के खतरे को कम करेगा। इस टमाटर को तैयार करने वाले नॉर्विक के जॉन इंस सेंटर के वैज्ञानिकों का कहना है, दुनियाभर ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है जो विटामिन-डी की कमी से जूझ रहे हैं। कैसे तैयार हुआ सुपर टमाटर : ब्रिटिश वैज्ञानिकों का कहना है, इस सुपर टमाटर को जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से तैयार किया गया है। आसान भाषा में समझें तो हर पौधे और इंसान का अपना एक जीन होता है। जीन में बदलाव करने पर उस चीज में भी परिवर्तन होने लगते हैं। इसे ही जेनेटिक इंजीनियरिंग कहते हैं। सुपर टमाटर के जीन में ऐसा ही बदलाव किया गया है कि इससे अधिक विटामिन-डी3 मिल सके। वैज्ञानिकों का कहना है जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए इसमें इतना बदलाव किया गया है कि यह दो अंडे या 28 ग्राम टूना फिश से मिलने वाले विटामिन-डी की कमी पूरी कर सकता है। क्यों खास है यह टमाटर : डेलीमेल की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में करीब 100 करोड़ लोग विटामिन-डी की कमी से जूझ रहे हैं, जिसकी वजह से कई तरह की बीमारियां बढ़ती हैं। विटामिन-डी आमतौर पर सुबह-सुबह सूरज की हल्की धूप में बैठने पर शरीर में बनता है, लेकिन सर्दियों के दिनों में धूप नहीं मिल पाती, इसलिए विटामिन-डी की कमी हो सकती है। ऐसे में विटामिन-डी की कमी पूरी करने के लिए मछली, रेड मीट, अंडे पर निर्भर रहता पड़ता है। ब्रिटेन में हर 6 में से एक इंसान विटामिन-डी की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में सुपर टमाटर इसका अच्छा सोर्स हो सकता है। विटामिन-डी क्यों जरूरी है, अब इसे समझ लेते हैं : शरीर में कैल्शियम के अवशोषण के लिए विटामिन-डी होना बहुत जरूरी है। ऐसा न होने पर हड्डियां, दांत और मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं। इसकी कमी होने पर बच्चों में रिकेट्स नाम की बीमारी हो सकती है और वयस्कों में हड्डियों में दर्द बना रह सकता है, जिसे ऑस्टियोमेलेसिया कहा जाता है। इसके अलावा विटामिन-डी मूड को बेहतर बनाता है, रोगों से लड़ने की क्षमता यानी इम्युनिटी को बढ़ाता है और बेहतर नींद के लिए जिम्मेदार होता है। शोधकर्ताओं का कहना है, पौधों के जरिए विटामिन-डी की पूर्ति ठीक से नहीं हो पाती, इसके लिए ज्यादातर मांसाहार खानपान पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में सुपर टमाटर एक बेहतर विकल्प है, जिसे शाकाहारी और मांसाहारी दोनों लोग चुन सकते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आजकल टैटू बनवाना एक नया फैशन बन गया है और काफी लोग शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर टैटू बनवा रहे हैं। लेकिन, टैटू को लेकर कहा जाता है कि इसे बनवाने के कई तरह नुकसान होते हैं। इन नुकसान में नौकरी ना लगने के तर्क के साथ ये भी कहा जाता है कि टैटू बनवाने के बाद कोई व्यक्ति कभी भी ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। इंटरनेट पर कई रिपोर्ट्स में और सोशल मीडिया पर यह जानकारी शेयर की जाती है कि जिस व्यक्ति ने अपने शरीर के किसी हिस्से में टैटू करवा रखा है तो वो जिंदगी भर ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। हालांकि, डॉक्टर्स का इस मामले में कुछ और कहना है। ऐसे में आज हम आपको बताते हैं कि सोशल मीडिया पर टैटू और ब्लड डोनेशन को लेकर जो जानकारी शेयर की जाती है, उसमें कितनी सच्चाई है। दरअसल, सोशल मीडिया पर टैटू को लेकर कई गलत जानकारी दी जाती है तो जानते हैं ये तथ्य कितने सही है और इस पर डॉक्टर्स का क्या कहना है? क्या है इसका सच : डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा नहीं है कि एक बार टैटू करवाने के बाद व्यक्ति कभी भी खून डोनेट नहीं कर सकता है। टैटू करवाने के बाद भी एक व्यक्ति आसानी से ब्लड डोनेट कर सकता है। लेकिन, इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर किसी ने हाल ही में टैटू करवाया है तो वो ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। टैटू करवाने के करीब 6 महीने बाद तक कोई भी व्यक्ति ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है और इसके बाद डोनेट कर सकता है। इसके अलावा पीयरसिंग को लेकर भी कहा जाता है कि अगर किसी ने पीयरसिंग करवाई है तो वो व्यक्ति भी ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। हालांकि, इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि अगर किसी ने बॉडी पियरसिंग किसी हेल्थ प्रोफेशनल और पियरसिंग से होने वाली सूजन ठीक हो गई है, तो पियरसिंग करवाने के करीब 12 घंटे बाद भी ब्लड डोनेट किया जा सकता है। इसलिए अगर आप ब्लड डोनेट करना चाहते हैं तो पहले इन बातों का जरूर ध्यान रखें। क्या कहते हैं एक्सपर्ट : वहीं, इस पर एशियन हॉस्पिटल की एसोसिएट डायरेक्टर (लेबोरेट्री) डॉक्टर उमा रानी का कहना है, अगर किसी ने टैटू बनवाया है तो वो एक साल तक ब्लड डोनेट नहीं कर सकते हैं। टैटू को मल्टीपल पियरसिंग माना जाता है, इसलिए कुछ दिन का इंतजार करना आवश्यक है। इसके अलावा अगर शरीर में कोई छोटी सी भी सर्जरी हुई है तो ऐसी स्थिति में ब्लड डोनेट के लिए वैट करना होता है। इसके अलावा दिल्ली के पीएसआरआई हॉस्पिटल की डॉक्टर विनीता का कहना है, अगर किसी व्यक्ति ने टैटू करवाया है तो 6 महीने तक ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। दरअसल, टैटू में निडल से काफी पियरसिंग होती है और इससे काफी इंफेक्शन हो सकते हैं। ऐसे में उसके एचआईवी, हेपेटाइटस बी आदि हो सकते हैं और ये ट्रांसमिसबल होते हैं, इससे दूसरे मरीज के होने के कारण बढ़ जाते हैं। वहीं, अगर किसी ने हेल्थ एक्सपर्ट से पियरसिंग करवाया है तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर कहीं से भी पियरसिंग करवाई है तो इसके लिए वेट करना चाहिए। इसके साथ ही जिन लोगों के बुखार, जुकाम आदि है तो भी ब्लड डोनेट से बचना चाहिए।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। आईफोन निर्माता एपल चीन से परेशान होकर भारत का दामन थामने की योजना बना रहा है। एपल ने अपने कई कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चर्स से कहा है कि वह भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना उत्पादन बढ़ाना चाहता है। एपल चीन के कड़े कोविड प्रतिबंधों से परेशान हो गया है और अब चीन के बाहर अपना उत्पादन बढ़ाना चाहता है। चीन के बाहर एपल की पहली पसंद भारत है। एपल ने चीन की एंटी कोविड पॉलिसी सहित कई दूसरे फैक्टर्स की आलोचना की है। वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, सूत्रों ने भारत और वियतनाम को चीन के सबसे बड़े विकल्प बताए हैं। उन्होंने बताया कि इन दो देशों में अभी एपल के वैश्विक उत्पादन का एक छोटा हिस्सा ही है लेकिन कंपनी अब इन्हें चीन के विकल्प के रूप में देख रही है। एक अनुमान के अनुसार, चीन में इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर्स के 90 फीसदी से अधिक उत्पाद बनाते हैं। भारत को अगले चीन के रूप में देखता है एपल : विश्लेषकों के अनुसार, बीजिंग के दमनकारी कम्युनिस्ट शासन और अमेरिका के साथ उसके संघर्षों के चलते चीन पर निर्भरता को एक संभावित खतरा है। हालांकि, वॉल स्ट्रीट जर्नल ने जब एपल के प्रवक्ता से संपर्क किया, तो उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। एपल के मैन्युफैक्चरिंग योजना से जुड़े लोगों के अनुसार, कंपनी बड़ी जनसंख्या और कम लागत के चलते भारत को अगले चीन के रूप में देखता है। चीन में यह है एपल को फायदा : दूसरी तरफ चीन में योग्य श्रमिकों की एक बड़ी तादात है, जो कई एशियाई देशों की आबादी से अधिक है। एपल ने चीन में स्थानीय सरकारों के साथ मिलकर काम किया है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसके ठेकेदारों के पास प्लांट्स में आईफोन और दूसरी उपकरणों के निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि, लोग और अन्य सामानों की सप्लाई हो। अप्रैल में एपल के सीईओ टिम कुक ने कहा, हमारी आपूर्ति श्रृंखला वास्तव में ग्लोबल है और इसलिए उत्पाद हर जगह बनाए जाते हैं। हम आॅप्टिमाइज करना भी जारी रखते हैं। महामारी से पहले भी चीन से दूर होना चाह रही थी कंपनी : साल 2020 की शुरूआत में कोविड-19 के दुनिया भर में फैलने से पहले एपल चीन से दूर होने की कोशिश कर रहा था लेकिन महामारी ने उसकी इन महत्वाकांक्षाओं को रोक दिया। मामले से जुड़े लोगों के अनुसार, एपल फिर से अपने कॉन्ट्रैक्टर्स पर दबाव बना रहा है और उन्हें निर्देश दे रहा है कि वे नई विनिर्माण क्षमता की तलाश करें।
एबीएन नॉलेज डेस्क। सड़कों पर कई तरह की गाड़ियां दौड़ती है। आमतौर पर लोगों की नजर गाड़ियों की डिजाइन और उसके ब्रांड्स पर पड़ती है। लेकिन अगर आप गौर करैंगे तो पाएंगे कि गाड़ियों में अलग-अलग रंग के नंबर प्लेट लगे रहते हैं। किसी में सफ़ेद, तो किसी में पीली, काली, लाल नंबर प्लेट्स भी दिख जाती हैं। क्या आप जानते हैं इन अलग-अलग रंगों के नेम प्लेट्स का मतलब क्या होता है? आखिर इन नंबर प्लेट्स का रंग के आधार पर क्या मतलब होता है। आज हम आपको हर रंग के नंबर प्लेट्स का मतलब और उनसे जुड़े राज के बारे में बताने जा रहे हैं। सफ़ेद नंबर प्लेट्स- जिस गाड़ी पर सफ़ेद नंबर प्लेट लगा होता है, उसे कभी भी कमर्शियल यूज में नहीं लाया जा सकता। सफ़ेद नंबर प्लेट पर काले रंग से नंबर लिखे होते हैं। पीले नंबर प्लेट्स- जिन गाड़ियों को टैक्सी या ट्रकों में पीले नंबर प्लेट्स लगे होते हैं, उसका मतलब होता है कि इनका इस्तेमाल कमर्शियल पर्पस से किया जा सकता है। इसमें भी काले रंग से नंबर लिखे जाते हैं। नीले नंबर प्लेट- नीले रंग नंबर प्लेट की गाड़ियां आपको दिल्ली में आसानी से दिख जाएंगे। ऐसे नंबर प्लेट्स विदेशी दूतावास या यूएन मिशन के लिए चलने वाले गाड़ियों में लगे रहते हैं। नीले नंबर प्लेट्स पर सफ़ेद रंग से अक्षर लिखे जाते हैं। काले नंबर प्लेट्स- काले रंग के नंबर प्लेट्स भी कमर्शियल गाड़ियों में लगे होते हैं। लेकिन ये गाड़ियां किसी और के यूज के लिए होती हैं। ऐसे नंबर प्लेट्स की गाड़ियां किसी होटल के बाहर आपको लगी मिल जाएंगी। इसपर पीले रंग से अक्षर लिखे होते हैं। लाल नंबर प्लेट्स- देश के किसी बड़े ओहदे के शख्स यानी राज्यपाल या राष्ट्रपति की गाड़ियों पर लाल रंग के नंबर प्लेट्स लगे होते हैं। इनके पास लाइसेंस नहीं होता। ये ऑफिशियली इन गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। इनपर गोल्डन रंग से नंबर लिखे जाते हैं। साथ ही इसपर अशोक चक्र बना होता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने गुरुवार को आईआईटी मद्रास में 5जी कॉल का सफल परीक्षण किया। वीडियो और वॉइस कॉल कर उन्होंने 5जी कॉल का टेस्ट किया। बता दें कि इसे भारत में ही डिजाइन और विकसित किया गया है। सफल परीक्षण के बाद केंद्रीय मंत्री ने कहा, ह्यहमें आईआईटी मद्रास टीम पर गर्व है, जिसने 5जी टेस्ट पैड को विकसित किया है, जो संपूर्ण 5जी विकास पारिस्थितिकी तंत्र और हाइपरलूप पहल को बड़े अवसर प्रदान करेगा। रेल मंत्रालय हाइपरलूप पहल का पूरा समर्थन करेगा। गौरतलब है कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा था कि अगले डेढ़ दशकों में 5ॠ से देश की अर्थव्यवस्था में 450 अरब डॉलर का योगदान होने वाला है और इससे देश की प्रगति और रोजगार निर्माण के अवसर को गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी के संपर्क यानी कनेक्टिविटी, देश की प्रगति की गति को निर्धारित करेगी। इस दौरान पीएम मोदी ने आईआईटी मद्रास के नेतृत्व में कुल आठ संस्थानों द्वारा बहु-संस्थान सहयोगी परियोजना के रूप में विकसित 5जी टेस्ट बेड की भी शुरूआत की। इसके अलावा उन्होंने एक डाक टिकट भी जारी किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ह्यमुझे देश को अपना, खुद से निर्मित 5जी टेस्ट बेड राष्ट्र को समर्पित करने का अवसर मिला है। ये दूरसंचार क्षेत्र में क्रिटिकल और आधुनिक टेक्नॉलॉजी की आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक अहम कदम है। मोदी ने कहा कि 5जी के रूप में जो देश का अपना 5जी मानदंड बनाया गया है, वह देश के लिए बहुत गर्व की बात है और यह देश के गांवों में 5जी प्रौद्योगिकी पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा, 21वीं सदी के भारत में कनेक्टिविटी, देश की प्रगति की गति को निर्धारित करेगी। इसलिए हर स्तर पर कनेक्टिविटी को आधुनिक बनाना ही होगा। पीएम मोदी ने कहा कि 5जी प्रौद्योगिकी देश के शासन में, जीवन की सुगमता में और व्यापार की सुगमता में सकारात्मक बदलाव लाने वाली है तथा इससे खेती, स्वास्थ्य, शिक्षा, अवसंरचना और हर क्षेत्र में प्रगति को बल मिलेगा। जल्द 5जी बाजार में आये : मोदी- प्रधानमंत्री ने कहा कि जल्द से जल्द 5जी बाजार में आए, इसके लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, इस दशक के अंत तक 6जी सेवा आरंभ हो पाए, इसके लिए एक कार्य बल काम करना शुरू कर चुका है। बता दें कि 5जी से जुड़ी इस परियोजना में भाग लेने वाले अन्य संस्थानों में आईआईटी दिल्ली, आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी कानपुर, आईआईएस बैंगलोर, सोसाइटी फॉर एप्लाइड माइक्रोवेव इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग एंड रिसर्च (एसएएमईईआर) और सेंटर आॅफ एक्सीलेंस इन वायरलेस टेक्नोलॉजी (सीईडब्लूआईटी) शामिल हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को रेगुलेटरी ऑथोरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) के रजत जयंती समारोह में शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर एक डाक टिकट भी किया। पीएम मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए आईआईटी मद्रास के नेतृत्व में आठ संस्थानों की बहु-संस्थान सहयोगी परियोजना के रूप में विकसित 5जी टेस्ट बेड का भी शुभारंभ किया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के रजत जयंती समारोह के मौके पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि ये सुखद सहयोग है कि TRAI ने 25 वर्ष पूरे किए हैं। आज देश आजादी के अमृत काल में अगले 25 वर्ष के रोड मैप पर काम कर रहा है। मुझे देश को खुद से निर्मित 5G-Testbed राष्ट्र को समर्पित करने का अवसर मिला है। आज देश आजादी के अमृत काल में अगले 25 साल के रोड मैप पर काम कर रहा है। ये टेलीकॉम सेक्टर में क्रिटिकल और आधुनिक टेक्नोलाजी की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम है। पीएम मोदी ने कहा कि आत्मनिर्भरता और स्वस्थ स्पर्धा कैसे समाज में, अर्थव्यवस्था में गुणात्मक प्रभाव पैदा करती है, इसका एक बेहतरीन उदाहरण हमारा टेलिकॉम सेक्टर है। 2G काल की निराशा, हताशा, करप्शन, पॉलिसी पैरालिसिस से बाहर निकलकर देश ने अब 5G और 6G की तरफ तेजी से कदम बढ़ाए हैं। पीएम ने कहा कि 2014 से पहले भारत में 100 ग्राम पंचायतें भी ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी से नहीं जुड़ी थीं। आज हम करीब पौने दो लाख ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचा चुके हैं। कुछ समय पहले सरकार ने देश के नक्सल प्रभावित अनेक जनजातीय जिलों में 4जी सुविधा पहुंचाने की बड़ी शुरुआत की है। बीते वर्षों में सरकार जिस तरह नई सोच और एप्रोच के साथ काम कर रही है। बता दें कि ट्राई की स्थापना 1997 में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 के माध्यम से हुई थी। जिसके 25 साल पूरे हो गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने आईआईटी मद्रास के नेतृत्व में विकसित 5G टेस्ट बेड का शुभारंभ किया है। इस प्रोजेक्ट में आईआईटी मद्रास के साथ आईआईटी दिल्ली, आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी कानपुर, IISc बैंगलोर, सोसाइटी फॉर एप्लाइड माइक्रोवेव इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग एंड रिसर्च और सेंटर आफ एक्सीलेंस इन वायरलेस टेक्नोलॉजी शामिल हैं।
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