एबीएन नॉलेज डेस्क। सड़कों पर कई तरह की गाड़ियां दौड़ती है। आमतौर पर लोगों की नजर गाड़ियों की डिजाइन और उसके ब्रांड्स पर पड़ती है। लेकिन अगर आप गौर करैंगे तो पाएंगे कि गाड़ियों में अलग-अलग रंग के नंबर प्लेट लगे रहते हैं। किसी में सफ़ेद, तो किसी में पीली, काली, लाल नंबर प्लेट्स भी दिख जाती हैं। क्या आप जानते हैं इन अलग-अलग रंगों के नेम प्लेट्स का मतलब क्या होता है? आखिर इन नंबर प्लेट्स का रंग के आधार पर क्या मतलब होता है। आज हम आपको हर रंग के नंबर प्लेट्स का मतलब और उनसे जुड़े राज के बारे में बताने जा रहे हैं। सफ़ेद नंबर प्लेट्स- जिस गाड़ी पर सफ़ेद नंबर प्लेट लगा होता है, उसे कभी भी कमर्शियल यूज में नहीं लाया जा सकता। सफ़ेद नंबर प्लेट पर काले रंग से नंबर लिखे होते हैं। पीले नंबर प्लेट्स- जिन गाड़ियों को टैक्सी या ट्रकों में पीले नंबर प्लेट्स लगे होते हैं, उसका मतलब होता है कि इनका इस्तेमाल कमर्शियल पर्पस से किया जा सकता है। इसमें भी काले रंग से नंबर लिखे जाते हैं। नीले नंबर प्लेट- नीले रंग नंबर प्लेट की गाड़ियां आपको दिल्ली में आसानी से दिख जाएंगे। ऐसे नंबर प्लेट्स विदेशी दूतावास या यूएन मिशन के लिए चलने वाले गाड़ियों में लगे रहते हैं। नीले नंबर प्लेट्स पर सफ़ेद रंग से अक्षर लिखे जाते हैं। काले नंबर प्लेट्स- काले रंग के नंबर प्लेट्स भी कमर्शियल गाड़ियों में लगे होते हैं। लेकिन ये गाड़ियां किसी और के यूज के लिए होती हैं। ऐसे नंबर प्लेट्स की गाड़ियां किसी होटल के बाहर आपको लगी मिल जाएंगी। इसपर पीले रंग से अक्षर लिखे होते हैं। लाल नंबर प्लेट्स- देश के किसी बड़े ओहदे के शख्स यानी राज्यपाल या राष्ट्रपति की गाड़ियों पर लाल रंग के नंबर प्लेट्स लगे होते हैं। इनके पास लाइसेंस नहीं होता। ये ऑफिशियली इन गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। इनपर गोल्डन रंग से नंबर लिखे जाते हैं। साथ ही इसपर अशोक चक्र बना होता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने गुरुवार को आईआईटी मद्रास में 5जी कॉल का सफल परीक्षण किया। वीडियो और वॉइस कॉल कर उन्होंने 5जी कॉल का टेस्ट किया। बता दें कि इसे भारत में ही डिजाइन और विकसित किया गया है। सफल परीक्षण के बाद केंद्रीय मंत्री ने कहा, ह्यहमें आईआईटी मद्रास टीम पर गर्व है, जिसने 5जी टेस्ट पैड को विकसित किया है, जो संपूर्ण 5जी विकास पारिस्थितिकी तंत्र और हाइपरलूप पहल को बड़े अवसर प्रदान करेगा। रेल मंत्रालय हाइपरलूप पहल का पूरा समर्थन करेगा। गौरतलब है कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा था कि अगले डेढ़ दशकों में 5ॠ से देश की अर्थव्यवस्था में 450 अरब डॉलर का योगदान होने वाला है और इससे देश की प्रगति और रोजगार निर्माण के अवसर को गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी के संपर्क यानी कनेक्टिविटी, देश की प्रगति की गति को निर्धारित करेगी। इस दौरान पीएम मोदी ने आईआईटी मद्रास के नेतृत्व में कुल आठ संस्थानों द्वारा बहु-संस्थान सहयोगी परियोजना के रूप में विकसित 5जी टेस्ट बेड की भी शुरूआत की। इसके अलावा उन्होंने एक डाक टिकट भी जारी किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ह्यमुझे देश को अपना, खुद से निर्मित 5जी टेस्ट बेड राष्ट्र को समर्पित करने का अवसर मिला है। ये दूरसंचार क्षेत्र में क्रिटिकल और आधुनिक टेक्नॉलॉजी की आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक अहम कदम है। मोदी ने कहा कि 5जी के रूप में जो देश का अपना 5जी मानदंड बनाया गया है, वह देश के लिए बहुत गर्व की बात है और यह देश के गांवों में 5जी प्रौद्योगिकी पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा, 21वीं सदी के भारत में कनेक्टिविटी, देश की प्रगति की गति को निर्धारित करेगी। इसलिए हर स्तर पर कनेक्टिविटी को आधुनिक बनाना ही होगा। पीएम मोदी ने कहा कि 5जी प्रौद्योगिकी देश के शासन में, जीवन की सुगमता में और व्यापार की सुगमता में सकारात्मक बदलाव लाने वाली है तथा इससे खेती, स्वास्थ्य, शिक्षा, अवसंरचना और हर क्षेत्र में प्रगति को बल मिलेगा। जल्द 5जी बाजार में आये : मोदी- प्रधानमंत्री ने कहा कि जल्द से जल्द 5जी बाजार में आए, इसके लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, इस दशक के अंत तक 6जी सेवा आरंभ हो पाए, इसके लिए एक कार्य बल काम करना शुरू कर चुका है। बता दें कि 5जी से जुड़ी इस परियोजना में भाग लेने वाले अन्य संस्थानों में आईआईटी दिल्ली, आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी कानपुर, आईआईएस बैंगलोर, सोसाइटी फॉर एप्लाइड माइक्रोवेव इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग एंड रिसर्च (एसएएमईईआर) और सेंटर आॅफ एक्सीलेंस इन वायरलेस टेक्नोलॉजी (सीईडब्लूआईटी) शामिल हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को रेगुलेटरी ऑथोरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) के रजत जयंती समारोह में शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर एक डाक टिकट भी किया। पीएम मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए आईआईटी मद्रास के नेतृत्व में आठ संस्थानों की बहु-संस्थान सहयोगी परियोजना के रूप में विकसित 5जी टेस्ट बेड का भी शुभारंभ किया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के रजत जयंती समारोह के मौके पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि ये सुखद सहयोग है कि TRAI ने 25 वर्ष पूरे किए हैं। आज देश आजादी के अमृत काल में अगले 25 वर्ष के रोड मैप पर काम कर रहा है। मुझे देश को खुद से निर्मित 5G-Testbed राष्ट्र को समर्पित करने का अवसर मिला है। आज देश आजादी के अमृत काल में अगले 25 साल के रोड मैप पर काम कर रहा है। ये टेलीकॉम सेक्टर में क्रिटिकल और आधुनिक टेक्नोलाजी की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम है। पीएम मोदी ने कहा कि आत्मनिर्भरता और स्वस्थ स्पर्धा कैसे समाज में, अर्थव्यवस्था में गुणात्मक प्रभाव पैदा करती है, इसका एक बेहतरीन उदाहरण हमारा टेलिकॉम सेक्टर है। 2G काल की निराशा, हताशा, करप्शन, पॉलिसी पैरालिसिस से बाहर निकलकर देश ने अब 5G और 6G की तरफ तेजी से कदम बढ़ाए हैं। पीएम ने कहा कि 2014 से पहले भारत में 100 ग्राम पंचायतें भी ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी से नहीं जुड़ी थीं। आज हम करीब पौने दो लाख ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचा चुके हैं। कुछ समय पहले सरकार ने देश के नक्सल प्रभावित अनेक जनजातीय जिलों में 4जी सुविधा पहुंचाने की बड़ी शुरुआत की है। बीते वर्षों में सरकार जिस तरह नई सोच और एप्रोच के साथ काम कर रही है। बता दें कि ट्राई की स्थापना 1997 में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 के माध्यम से हुई थी। जिसके 25 साल पूरे हो गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने आईआईटी मद्रास के नेतृत्व में विकसित 5G टेस्ट बेड का शुभारंभ किया है। इस प्रोजेक्ट में आईआईटी मद्रास के साथ आईआईटी दिल्ली, आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी कानपुर, IISc बैंगलोर, सोसाइटी फॉर एप्लाइड माइक्रोवेव इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग एंड रिसर्च और सेंटर आफ एक्सीलेंस इन वायरलेस टेक्नोलॉजी शामिल हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मादा ऑक्टोपस कभी भी अपने बच्चों को नहीं देख पाती। वह अंडे देने के बाद आत्महत्या कर लेती है। वह आत्महत्या का जो तरीका चुनती है वो और भी ज्यादा रोंगटे खड़े कर देने वाला है। यह दावा ऑक्टोपस पर हुई हालिया रिसर्च में किया गया है। रिसर्च करने वाली शिकागो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है, मादा ऑक्टोपस अंडे देने के बाद खुद को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर देती है, जानिए, ऐसा क्यों और कैसे होता है। शोधकर्ताओं का कहना है, मादा ऑक्टोपस अंडे देने के बाद धीरे-धीरे भोजन लेना बंद कर देती है। खुद को नुकसान पहुंचाने लगती है। शरीर से स्किन को नोचना शुरू कर देती है। अपने टेन्टेकल्स के ऊपरी हिस्से को काट देती है। जब तक इसके बच्चे अंडे से बाहर निकलते हैं जब तक मादा ऑक्टोपस की मौत हो चुकी होती है। सबसे चौंकाने वाली बात है कि कुछ ही समय बाद बच्चों के पिता यानी नर ऑक्टोपस की मौत भी हो जाती है। शोधकर्ताओं का कहना है, नर और मादा ऑक्टोपस संभोग करते हैं। इसके बाद मादा ऑक्टोपस के हार्मोंस में कोलेस्ट्रॉल से जुड़े बायोकेमिकल पाथवेज में बदलाव होता है। इनके जीवन में भी कोलेस्ट्रॉल अहम रोल निभाता है। इनके शरीर में ऑप्टिक ग्लैंड होती है। नर और मादा के बीच मेटिंग के बाद यह ग्लैंड सेक्स हॉर्मोन, इंसुलिन और कोलेस्ट्रॉल को अधिक बनाने लगती है। यही तीनों मॉलिक्यूल ऑक्टोपस की मौत की वजह बनते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऑक्टोपस के शरीर में जब ये बदलाव होते हैं तो वो पागलों की तरह व्यवहार करने लगते हैं और खुद को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। मौत से पहले इनका व्यवहार बदला-बदला नजर आता है। आसान भाषा में समझें तो आंखों के बीच मौजूद ऑप्टिक ग्रंथि ही ऑक्टोपस की समय से पहले से मौत के लिए जिम्मेदार होती है। साइंसअलर्ट की रिपोर्ट में शिकागो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है, अगर ऑक्टोपस के शरीर से इस ग्रंथि को हटा दिया जाए तो इतनी जल्दी उसकी मौत नहीं होगी। वह अंडे देने के बाद भी कई महीनों तक जीवित रह सकेगी। रिसर्च में यह साबित भी हुआ है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कंपनी टेस्ला के उएड एलन मस्क ने हाल ही में ट्विटर का सौदा किया था लेकिन अब इससे जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। एलन मस्क ने अब नया ट्वीट कर जानकारी दी है कि ट्विटर की खरीद संबंधी 44 अरब डॉलर के सौदे को अस्थायी तौर पर रोक दिया है। ट्विटर की डील को रोकने के पीछे का कारण माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म पर फर्जी या स्पैम अकाउंट्स की लंबित जानकारी को बताया जा रहा है। मस्क ने ट्वीट किया कि यह गणना बताती है कि प्लेटफॉर्म पर फर्जी या स्पैम अकाउंट्स की संख्या पांच फीसदी से कम है। कुछ दिन पहले ही ट्विटर ने कहा था कि पहली तिमाही के दौरान इसके मोनेटाइजेबल दैनिक सक्रिय यूजर्स में फर्जी या स्पैम अकाउंट्स की संख्या पांच फीसदी से कम रही। सोशल मीडिया कंपनी के पहली तिमाही में 22.90 करोड़ यूजर्स ऐसे थे जिनको विज्ञापन मिले थे। बता दें कि ट्विटर के सबसे बड़े शेयरधारक मस्क ने पिछले महीने 44 अरब डॉलर में इसको खरीदने की घोषणा की थी। इसके लिए उन्होंने कोष जुटाना भी शुरू कर दिया था।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष एक पहेली है और विज्ञान की इतनी प्रगति के बावजूद इसके बहुत से ऐसे सवाल है जो अभी भी अनसुलझे हुए हैं। अंतरिक्ष को जानने के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक दिन रात रिसर्च में लगे हुए हैं। इस बीच गुरुवार को खगोलविदों ने अंतरिक्ष को लेकर एक बड़ी जानकारी दी है। वैज्ञानिकों के दावा किया कि हमारी आकाशगंगा के केंद्र में एक विशाल ब्लैकहोल है। इसकी घोषणा एक स्वतंत्र एजेंसी नेशनल साइंस फाउंडेशन की तरफ से की गई है। अंतरिक्ष की जानकारी तलाशने वाले खगोलविदों ने कहा कि हमारी आकाश गंगा समेत अंतरिक्ष में मौजद सभी आकाश गंगाओं के केंद्र में एक विशाल ब्लैक होल है। वैज्ञानिकों ने अपनी आकाश गंगा में एक विशाल ब्लैक होल की तस्वीर का दावा किया हालांकि यह छवि अस्पष्ट है.₹। ब्लैक होल के चारों तरफ अंगूठी की तरह आकृति : ब्लैक होल के बारे में जानकारी देते हुए टक्सन में यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के एस्ट्रोफिजिस्ट फेरियल ओजेल ने कहा कि यह छवि ब्लैक होल के चारों तरफ एक चमकती हुई अंगूठी की तरह है। मिल्की वे ब्लैक होल को धनु A कहा जाता है। उन्होंने बताया कि यह ब्लैक होल धनु और स्कॉर्पियस नक्षत्रों की सीमा के करीब है। वैज्ञानिक के मुताबित आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद ब्लैक होल हमारे सूर्य की तलुना में 4 मिलियन यानि 40 लाख गुना अधिक विशाल है। वैज्ञानिकों द्वारा किसी ब्लैकहोल की यह पहली तस्वीर नहीं है। इससे पहले इसी समूह ने 2019 में एक ब्लैकहोल की तस्वीर को जारी किया था और यह 53 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर एक आकाशगंगा में मौजूद था। वैज्ञानिकों ने जिस मिल्की वे ब्लैकहोल की जानकारी दी है, वह करीब 27 हजार प्रकाश वर्ष दूर है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। बरमूडा ट्राएंगल को दुनिया की सबसे रहस्यमय जगहों में गिना जाता है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र से गुजरने वाला जहाज गायब हो जाता है। उसे अदृश्य शक्तियां अपनी तरफ खींच लेती हैं। पिछले 100 सालों के इतिहास में यहां करीब 75 हवाई जहाज (अ्र१ ढह्णंल्ली) गुम हो चुके हैं और 1 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। दशकों से यह क्षेत्र वैज्ञानिकों के बीच बहस का मुद्दा रहा है। कई वैज्ञानिक इसका कारण तलाशने जुटे हैं। इसी क्रम में आॅस्ट्रेलिया वैज्ञानिक ने अपनी बात रखी है। उन्होंने बताया कि यहां पर होने वाली दुर्घटनाओं की वजह क्या है। क्या है बरमुडा ट्राएंगल, कहां है यह क्षेत्र, इसे इतना रहस्यमय क्यों माना जाता है और वैज्ञानिकों ने कैसे सुलझाई इसकी गुत्थी? जानिये इन सवालों के जवाब... कहां है बरमुडा ट्राएंगल : बरमुडा ट्राएंगल को कई और नामों से भी जाना जाता है। जैसे होडो सी, डेविल्स ट्राएंगल और लिम्बो आॅफ द लॉस्ट। यह आॅस्टेलिया का प्रवासी क्षेत्र है। सबसे पहले इसकी जानकारी क्रिस्टोफर कोलंबस ने दी थी। उनका कहना था, यह इलाका एलियंस के बेस तक जाता है। इसे हमेशा से ही एक रहस्यमय माना जाता रहा है। अटलांटिक महासागर का 7 लाख स्क्वायर किलोमीटर वाला हिस्सा बरमुडा ट्राएंगल। कहा जाता है कि इसका आकार एक तिकोना है, इसलिए इसे ट्राएंगल का नाम दिया। हालांकि इसके आकार की पुष्टि अब तक नहीं हो पाई है। यहां कई घटनाएं होने के कारण इसे डेविल्स ट्राएंगल भी नाम दिया गया। 3 प्वाइंट में समझें अब तक क्या कुछ कहा गया है इसके बारे में : 1. यहां से गुजरने वाले जहाज क्यों गायब हो जाते हैं, इस पर कई रिसर्च हुई हैं। रिसर्च में इसका कोई पुख्ता कारण सामने नहीं आ पाया है। वैज्ञानिकों का कहना है, यहां का मौसम अब तक हुई घटनाओं की एकमात्र वजह है। 2. वैज्ञानिकों का कहना है, यहां 270 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलती हैं। जब भी कोई जहाज इन हवाओं के सम्पर्क में आता है तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है और दुर्घटना हो जाती है। आम लोगों का मानना है कि यहां कोई अदृश्य शक्ति है जो भारी से भारी चीजों को खींचने की ताकत रखती है। 3. ऐसा क्यों होता है, इस पर वैज्ञानिकों का कहना है, बरमुडा ट्राएंगल में भारी चीजों को खींचने की ताकत बादलों में बनने वाले षटभुजाकार आकृति से मिलती है। यही दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार होती है। बादल और तेज हवाओं से जब जहाज टकराते हैं तो उसे खींचकर समुद्र में ले जाते हैं। नई रिसर्च में क्या दावा किया गया है, अब इसे समझते हैं : मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, आॅस्ट्रेलियाई शोधकतार्कार्ल क्रुजेलनिकिक का कहना है, यहां से गायब हुए विमानों और मौतों के पीछे मानवीय गलतियां और खराब मौसम जिम्मेदार है। बरमुडा ट्राएंगल समुद्र के 700,000 वर्ग किमी के ऐसे क्षेत्र में फैला है जहां सबसे ज्याद एयर ट्रैफिक है। अमेरिका से इसकी दूरी कम होने के कारण ट्रैफिक का असर समझा जा सकता है। क्रुजेलनिकिक का कहना है, बरमूडा ट्राएंगल के रहस्य की शुरूआत फ्लाइट-19 के पांच विमानों के लापता होने से हुई थी। उस दिन समुद्र में उठने वाली 15 मीटर ऊंची लहरें विमानों के लिए खतरा बनी थीं। रेडियो ट्रांसक्रिप्ट से यह बात साफ हुई थी कि वह विमान अपनी वास्तविक लोकेशन से भटक गया था।
एबीएन नॉलेज डेस्क। एरोपोनिक विधि से विषाणु रोग रहित आलू बीज उत्पादन के लिए मध्य प्रदेश सरकार के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला के साथ बुधवार को नई दिल्ली में एक करार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत आने वाले इस संस्थान ने हवा में आलू के बीज उत्पादन की यह अनूठी तकनीक विकसित की है। इस मौके पर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों को फसलों के प्रमाणित बीज समय पर उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। इसी कड़ी में आईसीएआर के संस्थानों द्वारा अपने-अपने क्षेत्र में नई तकनीकों का विकास किया जा रहा है। जिसका फायदा किसानों तक पहुंचाने की कोशिश जारी है। आईसीएआर के अधीन आने वाले केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित विषाणु रोग रहित आलू बीज उत्पादन की एरोपोनिक तकनीक से आलू की उपलब्धता देश के कई भागों में किसानों के लिए सुलभ की गई है। आज मध्य प्रदेश के बागवानी विभाग को इस तकनीक का लाइसेंस देने के लिए अनुबंध किया गया है। तोमर ने कहा कि यह नई तकनीक आलू के बीज की आवश्यकता को महत्वपूर्ण रूप से पूरा करेगी। जिससे देश में आलू के उत्पादन में वृद्धि होगी। किसानों की आय बढ़ेगी। रिसर्च के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सराहना : कृषि मंत्री ने कहा कि आलू विश्व की सबसे महत्वपूर्ण गैर-अनाज फसल है, जिसकी वैश्विक खाद्य प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने इसके उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सराहना की। कहा कि कृषि के समग्र विकास के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार अनेक योजनाओं पर मिशन मोड में काम कर रही है। भारत आलू का प्रमुख उत्पादक है। आलू का छठा सबसे बड़ा उत्पादक है मध्य प्रदेश इस मौके पर मध्य प्रदेश के बागवानी मंत्री भरत सिंह कुशवाह ने उम्मीद जताई कि यह तकनीक आलू के बीज की आवश्यकता को काफी हद तक पूरा करेगी। राज्य में आलू उत्पादन में वृद्धि होगी। श्री कुशवाहा ने कहा कि मध्य प्रदेश भारत में आलू का छठा सबसे बड़ा उत्पादक है। मालवा क्षेत्र आलू उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह आलू के लिए आदर्श क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। इन क्षेत्रों में होती है आलू की खेती : मध्य प्रदेश में प्रमुख आलू उत्पादक क्षेत्र इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर, छिंदवाड़ा, सीधी, सतना, रीवा, सरगुजा, राजगढ़, सागर, दमोह, जबलपुर, पन्ना, मुरैना, छतरपुर, विदिशा, रतलाम एवं बैतूल हैं। अकेले इंदौर जिला क्षेत्र, राज्य उत्पादन में लगभग 30 फीसदी का योगदान दे रहा है। प्रदेश में उच्च गुणवता वाले बीज की कमी हमेशा से एक समस्या रही है, जिसका समाधान किया जा रहा है। आलू अनुसंधान संस्थान के साथ हुए करार से किसानों को काफी सहूलियत होगी। प्रदेश के बागवानी आयुक्त ई. रमेश कुमार ने कहा कि एमपी को लगभग चार लाख टन बीज की आवश्यकता है, जिसे 10 लाख मिनी ट्यूबर उत्पादन क्षमता वाली इस तकनीक से पूरा किया जाएगा। प्रसंस्करण में गुणवत्ता वाले आलू बीज की उपलब्धता भी राज्य के आलू प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देगी। एरोपॉनिक तकनीक में क्या है एरोपोनिक तकनीक के माध्यम से पोषक तत्वों का छिड़काव मिस्टिंग के रूप में जड़ों में किया जाता है। पौधे का ऊपरी भाग खुली हवा व प्रकाश में रहता है। एक पौधे से औसत 35-60 मिनिकन्द (3-10 ग्राम) प्राप्त किए जाते हैं। चूंकि, मिट्टी उपयोग नहीं होती तो मिट्टी से जुड़े रोग नहीं होते और पारंपरिक प्रणाली की तुलना में एरोपॉनिक प्रणाली प्रजनक बीज के विकास में दो साल की बचत करती है। इस तकनीक का व्यावसायीकरण 8 राज्यों की 20 फर्मों के साथ आलू बीज उपलब्धता के लिए किया गया है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि वैज्ञानिक अभी तक इसके कुछ ही रहस्यों के बारे में जान पाए हैं। वैज्ञानिक को यह पता लगाने में कामयाबी हासिल की है कि ब्रह्मांड में मिल्की वे की तरह कई गैलेक्सी भी हैं। हर गैलेक्सी अपना अलग सिस्टम है। अब इस बीच वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल के बाहर बाहर दो नए ग्रहों की खोज की है। इसके अलावा उन्होंने 30 धूमकेतु का भी पता लगाया है। यह धूमकेतु सूर्य की ही तरह बीटा पिक्टोरिस स्टार का चक्कर लगाते हैं। बीटा पिक्टोरिस की खोज करीब 40 साल पहले हुई थी जो एक मलबे की डिस्क से घिरा हुआ है। यह डिस्क गैस और धूल के गुबार से घिरा हुआ है। इन ग्रहों को देखने के बाद वैज्ञानिकों में काफी उत्साह है। हमारा सौर मंडल 4.5 अरब साल पुराना है, तो वहीं 20 मिलियन साल पुराना बीटा पिक्टोरिस है। वैज्ञानिक इसी के माध्यम से ग्रहों के निर्माण को समझ सकते हैं। धरती से 63 प्रकाश वर्ष दूर हैं ग्रह : एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, धरती से यह दोनों ग्रह करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं। इसलिए इनकी रोशनी को धरती तक पहुंचने में 63 साल लगते हैं। वैज्ञानिकों ने धूमकेतु को साल 1987 की शुरुआत में खोजा था जो सूर्य जैसे तारे की परिक्रमा कर रहे हैं। नासा के ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट से बीटा पिक्टोरिस सिस्टम का 156 दिनों तक जांच पड़ताल किया गया। यह जांच पड़ताल एक इंटरनेशनल रिसर्च टीम ने की है। धमकेतु खोजने के अलावा शोधकर्ताओं ने उनके आकार का भी पता लगा लिया है। इनका आकार हमारे सौर मंडल में मिलने वाले धूमकेतुओं जैसा ही है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि इनका आकार करीब 3 से 14 किमी वृत का है। वैज्ञानिकों ने पहली बार हमारे सौरमंडल के बाहर मिले किसी धूमकेतु के आकार का पता लगाने में कामयाबी हासिल की है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, हमारे सौर मंडल में जो धूमकेतु मिलते हैं वह अंतरिक्ष में घूमने वाली दूसरी चीजों से टकराते हैं, तो उनका आकार बदल सकता है। उल्कापिंड और धूमकेतु की किसी ग्रह के निर्माण की शुरुआत में अहम भूमिका होती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि धरती पर जो पानी मिलता है उसका कुछ भाग धूमकेतु के बर्फ से ही पहुंचा है। वैज्ञानिकों के उत्साहित होने की वजह यह है कि दो नए ग्रहों पर इनका कैसा प्रभाव होगा। अब आने वाले समय में वैज्ञानिक इन दोनों के और रहस्यों से पर्दा उठाएंगे।
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