एबीएन नॉलेज डेस्क। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) हाल के वर्षों में सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले डिजिटल पेमेंट मोड के रूप में उभरा है। यूपीआई की सुविधा आपको घर बैठे आसानी से मनी ट्रांसफर की सुविधा देती है। आप किसी भी यूपीआई ऐप के जरिए टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड यानी टाटा पावर-डीडीएल के बिजली बिल का पेमेंट कर सकते हैं। किसी भी UPI ऐप के जरिए टाटा पावर-डीडीएल का बिजली बिल चुकाने का प्रोसेस • सबसे पहले भीम, पेटीएम, फोनपे, अमेजॉन या कोई यूपीआई एप्लीकेशन को ओपन करें। • Send Money या Send Money To Anyone या Transfer Money आदि पर क्लिक करें। • इसके बाद UPI ID डालने का ऑप्शन दिखेगा। • अब UPI ID की जगह TPDDLY@yesbankltd डालें। इसे वैरिफाई करने पर आपका नाम नहीं दिखकर Tata Power Delhi Distribution Limited दिखेगा। ध्यान रखने की बात है कि TPDDLY और सीए नंबर के बीच कोई स्पेस नहीं होना चाहिए। • अब अमाउंट डालकर Proceed पर क्लिक करें। • अब यूपीआई ऐप में लिंक्ड बैंक अकाउंट के जरिए UPI PIN डालकर पेमेंट पूरा करें। कैसे काम करता है मनी ट्रांसफर का UPI सिस्टम यूपीआई एक रियल टाइम पेमेंट सिस्टम है, जो एक बैंक के अकाउंट से दूसरे बैंक के अकाउंट में पैसा तुरंत ट्रांसफर करने की सुविधा देता है। खास बात है कि यूपीआई के जरिए रात या दिन कभी भी मनी ट्रांसफर कर सकते हैं। इस सुविधा का उपयोग करना काफी आसान है। इसके लिए आपके मोबाइल में पेटीएम, फोनपे, गूगलपे, भीम आदि कोई यूपीआई ऐप डाउनलोड करना होगा। आप अपने बैंक अकाउंट को यूपीआई ऐप से लिंक कर इस सिस्टम का इस्तेमाल कर सकते हैं। यूपीआई के माध्यम से आप एक बैंक अकाउंट को कई यूपीआई ऐप से लिंक कर सकते हैं। वहीं, अनेक बैंक अकाउंट को एक यूपीआई ऐप के जरिए संचालित कर सकते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और नौसेना ने सतह से हवा में मार करने वाली छोटी दूरी की वर्टिकल लॉन्च शॉर्ट रेंज सर्फेस टू एयर मिसाइल मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मिसाइल के सफल परीक्षण पर डीआरडीओ और नौसेना तथा उद्योग जगत को बधाई देते हुए कहा कि इससे नौसेना के युद्धपोतों की हवाई खतरों से निपटने में मारक क्षमता बढ़ेगी। यह परीक्षण शुक्रवार को नौसेना के युद्धपोत द्वारा ओडिशा स्थित चांदीपुर परीक्षण रेंज से किया गया। परीक्षण के दौरान हवा में तेज गति से आ रहे लक्ष्य पर निशाना साधा गया जो पूरी तरह सटीक रहा। डीआरडीओ और नौसेना के अधिकारी मिशन पर निरंतर नजर रखे हुए थे जिसने अपने सभी उद्देश्यों को पूरा किया।
एबीएन नॉलेज डेस्क। एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत का नया कम्युनिकेशन सेटेलाइट जीसैट-24 सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया गया है। इस सेटेलाइट को इसरो ने न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के लिए तैयार किया था जिसे साउथ अमेरिका के फ्रेंच गुयाना स्थित कोउरू से फ्रेंच कंपनी एरियानेस्पेस की मदद से लॉन्च किया गया है। जीसैट-24 एक 24-Ku बैंड कम्युनिकेशन सेटेलाइट है जिसका वज़न 4,180 किलोग्राम या चार टन है। GSAT-24 की लॉन्चिंग में देरी हालांकि सेटेलाइट को 50 मिनट की देरी से लॉन्च किया गया। GSAT-24 को स्पेस ऑर्बिट में भारतीय समयानुसार 23 जून की सुबह 2:30am से 4:13am के बीच पहुंचाना था। इससे पहले ही 2:28 बजे लॉन्चिंग टीम ने अतिरिक्त चेकिंग के लिए लॉन्चिंग रोक दी और गड़बड़ी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। बाद में बताया गया कि टैंक्स की फिलिंग में कुछ विसंगतियों की वजह से लॉन्चिंग में देरी हुई और सेटेलाइट को भारतीय समयानुसार सुबह 3:20 बजे लॉन्च किया गया। इस सेटेलाइट की मदद से डीटीएच संबंधी ज़रूरतें पूरी होंगी जो पूरे भारत को कवरेज मुहैया कराएगा। इसकी मदद से पूरे भारत को हाई-क्वालिटी टेलिविज़न, टेलिकम्युनिकेशंस और ब्रोडकास्टिंग सर्विस मिल सकेगी। फ्रेंच गुयाना से लॉन्च किया गया GSAT-24 : स्पेस क्षेत्र में रिफॉर्म के बाद एनएसआईएल का यह पहला कम्युनिकेशन सेटेलाइट मिशन था जिसे पहली बार में पहली सफलता मिली है। डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस के तहत एनएसआइएल एक पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग–पीएसयू है जिसकी मदद से स्पेस क्षेत्र में भारत को बढ़ावा देना है। GSAT-24 सेटेलाइट को Ariane-V VA257 फ्लाइट की मदद से ऑर्बिट स्पेस में पहुंचाया गया। ग़ौरतलब है कि एनएसआइएल ने अपनी पूरी सेटेलाइट केपेसिटी टाटा प्ले को लीज़ पर दी है और GSAT-24 पहली समर्पित कॉमर्शियल सेटेलाइट है। वहीं GSAT-24 की व्यवसायिक आधार पर पूरी फंडिंग और इसके रखरखाव की ज़िम्मेदारी एनएसआइएल के हाथों में होगी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। जलवायु परिवर्तन लगातार और भयानक सूखा, तूफान, हीट वेभ और ग्लेशियर की वजह से समुद्री जलस्तर बढ़ने का कारण बन रहा है और इस विनाश को रोकने के लिए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी के बीच "स्पेस बबल्स" बनाने का प्रस्ताव दिया है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि सूरज और पृथ्वी के बीच एक विशालकाय बुलबुले का निर्माण किया जाए, ताकि सूरज से धरती की तरफ आने वाली भयानक रेडिएशन को धरती पर पहुंचने से रोका जा सके। वैज्ञानिकों की इस इस जियोइंजीनियरिंग के विचार के मुताबिक, ब्राजील के आकार के एक गोलाकार बुलबुले, जिसे वैज्ञानिक भाषा में इन्फ्लेटेबल बुलबुला कहा जाता है, उसका निर्माण पृथ्वी और सूर्य के बीच किया जाएगा, ताकि रेडिएशन को हमारे ग्रह से टकराने से रोका जा सकेगा। वैज्ञानिकों की टीम ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि हम सूरज और पृथ्वी के बीच स्पेस बबल का निर्माम करना चाहते हैं, जिसे लिक्विड सिलिकॉन से बनाया जाएगा और उसे विशालकाय बुलबुला बनाकर सूरज और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा करने से सूरज से आने वाली रेडिएशन की किरणें परावर्तित हो जाएंगी और हमें अंतरिक्ष में बड़ी बड़ी फिल्म लांच करने की भी जरूरत नहीं होगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि सूरज से आने वाले रेडिएशन को इस स्पेस बुलबुले के जरिए पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता है, हां उसे रेडिएशन को कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के मौजूदा प्रयासों को रिप्लेस कर देगा। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो भी मौजूदा उपाए किए जा रहे हैं, उनमें से ये सबसे ज्यादा बेहतर है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये एक तरह से सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता बनाने जैसा है, जो रेडिएशन को बहुत हद तक रोक सकेगा। वहीं, एमआईटी की सेंसेबल सिटी लैब के मुताबिक, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुले का टेस्ट किया जा चुका है और एमआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सूरज के रेडिएशन को रोकने के लिए अंतरिक्ष बुलबुलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरिक्ष में किया जाने वाला ये उपाए आने वाले दिनों में काफी सुरक्षित होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर हम धरती पर टकराने से पहले 1.8 प्रतिशत सौर रेडिएशन को परावर्तित कर देते हैं, तो हम आज की ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से उलट सकते हैं। एमआईटी वैज्ञानिकों की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच जिस बुलबुले का निर्माण किया जाएगा, उसे कभी भी नष्ट किया जा सकता है। इससे सौर जियोइंजीनियरिंग समाधान पूरी तरह से प्रतिवर्ती हो जाएगा और अंतरिक्ष मलबे को काफी कम कर देगा। वैज्ञानिकों ने कहा कि पृथ्वी और सूर्य के बीच का वो क्षेत्र, जहां जेम्स वेब टेलीस्कॉप स्थिति है, वहां पर अंतरिक्ष बुलबुले को रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, सूरज से निकलने वाले रेडिएशन को परावर्तित करने के लिए वो सबसे सही स्थान है। स्पेस बबल्स रिसर्च प्रोजेक्ट वैज्ञानिक जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है, जिन्होंने पहले लैग्रैंगियन पॉइंट पर एक डिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट को तैनात करने का सुझाव दिया था, और खगोलविद रोजर एंजेल, जिन्होंने बबल-बेड़ा का प्रस्ताव रखा था। हालांकि जियो इंजीनियरिंग एक साइंस फिक्शन फिल्म की तरह लगती है, लेकिन इसका इस्तेमाल वास्तविक दुनिया में किया जा रहा है। पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने 122 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान को कम करने के लिए दुबई में बारिश बनाने के लिए जियो इंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया था। बादल का निर्माण ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किया गया था, जिसमें बारिश करवाने के लिए बिजली का झटका दिया गया था। 2021 में जारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन (NASEM) की एक रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए पृथ्वी के महासागरों को जियोइंजीनियरिंग करने का प्रस्ताव दिया था। इस आइडिया के तहत छोटे प्रकाश संश्लेषक के विकास को बढ़ाने के लिए उर्वरक जोड़ना, क्षारीयता को बढ़ावा देने के लिए पानी के माध्यम से विद्युत धाराओं को पारित करना और समुद्री जल के कैमिकल साइंस को बदलना शामिल है। स्कॉट डोनी, जो वर्जीनिया विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान में प्रोफेसर हैं और इस रिपोर्ट के लेखक हैं, उन्होंने एक बयान में कहा कि महासागर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की रणनीतियों पर पहले से ही वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और द्वारा चर्चा की जा रही है। संभावित जलवायु प्रतिक्रिया रणनीतियों के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। सांप से लोग डरते तो बहुत हैं, लेकिन सांप के बारे में जानना पसंद करते हैं। ऐसे में आज हम आपको सांप के कान के बारे में बता रहे हैं। दरअसल, आपने सांप के आंख, मुंह, जीभ देखे होंगे, लेकिन कभी आपने सांप के कान देखे हैं? अब सवाल ये है कि अगर सांप के कान ही नहीं है तो उसे सुनाई कैसे देता है। तो जानते हैं सांप के सुनने की क्षमता और उससे जुड़े विज्ञान के बारे में... दरअसल, सांप के पास सुनने के लिए इंसानों और अन्य जानवरों की तरह अलग से कान नहीं होते हैं। लेकिन, उनके शरीर में अलग तरह का सिस्टम होता है, जिसेस वो किसी की आहट को भी सुन लेते हैं और उसके हिसाब से अपना बचाव कर लेते हैं। उनके आंतरिक कान होते हैं और इसलिए उन्हें बहरा नहीं कहा जा सकता है। अब सवाल है कि आखिर सांप के कान किस तरह से काम करते हैं। दरअसल, सांप के शरीर में एक छोटी सी हड्डी होती है, जो जबड़े की हड्डी को भीतरी कान की नली से जोड़ती है। ऐसे में सांप के कान का काम उनकी स्किन करती है और वो स्किन दिमाग को कमांड देती है। जैसे अन्य जीवों में कान में ईयर ड्रम होते हैं, वैसे सांप के कान में नहीं होते हैं। वहीं, जो प्रोसेस दूसरे लोगों के कानों में होता है, वैसे ही होता है। बस वे स्किन के जरिए कमांड अंदर देते हैं। बता दें कि सांपों के सुनने की क्षमता सीमित होती है। उनके शरीर में एक छोटी सी हड्डी होती है। सांप केवल 200 से 300 हर्ट्ज की ध्वनि सुन सकते हैं।
एबीएन डेस्क। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 5जी दूरसंचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी की मंजूरी दे दी है। एक आधिकारिक बयान में जानकारी दी गई कि सरकार 20 साल की वैधता वाले कुल 72097.85 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम की जुलाई माह के अंत तक नीलामी करेगी। बयान में कहा गया कि मंत्रिमंडल ने नवोन्मेष को बढ़ावा देने के लिए निजी उपयोग वाले नेटवर्क की स्थापना को मंजूरी देने का निर्णय लिया है। सरकार ने स्पेक्ट्रम के लिए अग्रिम भुगतान की आवश्यकता को खत्म किया, सफल बोलीदाता 5जी स्पेक्ट्रम के लिए 20 एटक में भुगतान कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय से संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। 5जी सेवाएं 4 जी सेवा की तुलना में 10 गुना अधिक गति से काम करेंगी और इनकी शुरूआत जल्द ही की जाएगी। इस योजना में दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों की लागत को कम करने के उपाय भी किए जा रहे हैं। इस योजना के तहत बोली में सफल रहने वाली कंपनियों को 5जी स्पेक्ट्रम का आवंटन किया जाएगा जिससे वे आम लोगों और विभिन्न उपक्रमों को सेवाएं दे सकेंगी। सरकार 20 साल की वैधता वाले कुल 72097.85 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम की जुलाई माह के अंत तक नीलामी करेगी। इसके अलावा विभिन्न निम्न, मध्यम और उच्च फ्रिक्वेंसी बैंड के लिए भी स्पेक्ट्रम नीलामी की जाएगी। दूरसंचार क्षेत्र में सुधारों को गति देते हुए मंत्रिमंडल ने स्पेक्ट्रम नीलामी से संबंधित कई विकासशील विकल्पों की भी घोषणा की है जो कारोबारी सुगमता को बढ़ावा देंगे। इसमें कहा गया, सफल बोलीदाताओं को अग्रिम भुगतान करने की कोई अनिवार्यता नहीं होगी, ऐसा पहली बार हो रहा है। स्पेक्ट्रम के लिए भुगतान 20 बराबर सालाना किस्तों में किया जायेगा और ये अग्रिम किस्तें प्रत्येक वर्ष की शुरुआत में देनी होगी। इसके अलावा बोलीदाताओं को 10 वर्ष के बाद स्पेक्ट्रम वापस करने का विकल्प भी दिया जायेगा।
एबीएन डेस्क। देश में 5G एक मृग मरीचिका या Mirage के जैसे हो गया है। जैसे ही लगता है कि बस अब इसकी लॉन्चिंग हो ही जाएगी, तभी कोई अड़ंगा लग जाता है। नीतियों, इक्विपमेंट, चाइनीज वेंडर्स, फिर स्पेक्ट्रम (5G Spectrum) की कीमतों से होता हुआ 5G के हकीकत बनने का संघर्ष अब प्राइवेट एंटरप्राइज और टेलीकॉम ऑपरेटरों की रस्साकसी के बीच फंस गया है। पूरा देश टकटकी लगाए देख रहा है कि कब 5G की घंटी उनके फोनों में बजेगी? कब बिना बफरिंग के वीडियो देखने का मजा मिलेगा? बात तो जुलाई महीने में ही इसके नीलामी (5G Auction) की हो रही है। लेकिन यह अभी देखने वाली बात होगी कि नीलामी कब शुरू होती है और सर्विस का श्रीगणेश कब तक हो पाता है। पहले ये उम्मीद थी कि जुलाई में स्पेक्ट्रम की नीलामी हो जाएगी और अगस्त में इसकी औपचारिक लॉन्चिंग, लेकिन ये आस अब टूटती दिख रही है। 5G स्पेक्ट्रम पर नई रार छिड़ गई है। इस दफा मैदान में टेक कंपनियां और टेलीकॉम ऑपरेटर लाव-लश्कर लेकर आमने-सामने हैं। 5G नेटवर्क को लेकर एमेजॉन इंडिया, मेटा, TCS, L&T जैसी कंपनियों के ब्रॉडबैंक इंडिया फोरम यानी BIF और सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच तकरार है। BIF में शामिल कंपनियां चाहती हैं कि दुनियाभर की तर्ज पर भारत में भी सरकार उन्हें सीधे स्पेक्ट्रम दे और इस पर न के बराबर एडमिनिस्ट्रेटिव फीस ले। इन कंपनियों का ये भी दावा है कि चूंकि उनका पब्लिक नेटवर्क्स से कोई लेनादेना नहीं है, ऐसे में देश की सिक्योरिटी को भी कोई खतरा नहीं है। यही नहीं, सरकार को अच्छा-खासा रेवेन्यू भी उनसे मिलेगा। इसके उलट, टेलीकॉम ऑपरेटरों के संगठन सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन (COAI) ने साफ बोल दिया है कि अगर इन प्राइवेट एंटरप्राइजेज को कैप्टिव नेटवर्क्स खड़े करने की इजाजत दी गई तो टेलीकॉम ऑपरेटरों के लिए धंधा करना बेमानी हो जाएगा। COAI का कहना है कि इन कंपनियों को पीछे के दरवाजे से टेलीकॉम के धंधे में उतरने की इजाजत बिलकुल नहीं दी जानी चाहिए। इसके जवाब में टेक कंपनियों ने कहा है कि उन्हें 5G नेटवर्क मिलने से टेलीकॉम ऑपरेटरों को रेवेन्यू लॉस होने की थ्योरी फर्जी है। ट्राई चाहता था कि प्राइवेट कंपनियों को अलग से स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया जाए। लेकिन, डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम यानी DoT ने इसे खारिज कर दिया। क्या है DoT का तर्क : DoT का मानना है कि प्राइवेट एंटरप्राइजेज को टेलीकॉम ऑपरेटरों से स्पेक्ट्रम लीज पर लेना चाहिए। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला कैबिनेट में ही होगा। BIF को उम्मीद है कि सरकार DoT के तर्क को खारिज कर देगी और उन्हें अलग से स्पेक्ट्रम आवंटित किए जाने पर ही मुहर लगेगी। अब ये सब कवायद पूरी होने में वक्त लगना तय है। हो सकता है मसला कोर्ट भी चला जाए। लेकिन, बात यहीं तक रुकी नहीं है। अभी एक मसला स्पेक्ट्रम की प्राइसिंग का भी अटका पड़ा है। भले ही ट्राई ने हाल में स्पेक्ट्रम की रिजर्व प्राइसिंग पर अपनी सिफारिशों में कीमतों को 35 से 40 फीसदी तक कम कर दिया है। लेकिन, कंपनियां इस दाम को भी ज्यादा बता रही हैं। अर्न्स्ट एंड यंग EY ने भी हाल में ही कहा है कि भारत में स्पेक्ट्रम का दाम दुनिया के मानकों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। सरकार भी उहापोह में है और अभी तक कैबिनेट 5G स्पेक्ट्रम की कीमतों को तय नहीं कर पाई है। खैर, 5G की राह में पचड़े तमाम हैं और सरकार अभी अनिश्चय की स्थिति में है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। हाइपर्शन की गिनती दुनिया के सबसे लम्बे पेड़ों में की जाती है। इसकी लम्बाई 379 फीट को पार कर चुकी है। ऐसे पेड़ों की अपनी जितनी भी खूबियां हैं, उसमें एक खूबी यह भी है कि ये 90 डिग्री की सीध में ही बढ़ते हैं। कभी सोचा है कि से इतनी सीध में ही क्यों बढ़ते हैं। किसी भी पेड़ के 90 डिग्री में बढ़ने के लिए फैक्टर जिम्मेदार होते हैं। जानिए, ऐसा कैसे होता है? पौधे की ग्रोथ के लिए तीन चीजें सबसे ज्यादा जरूरी हैं। प्रकाश, कार्बन-डाई-आॅक्साइड और पानी। किसी भी पेड़ की लंबाई में सूरज की रोशनी का अहम रोल होता है। सूरज की रोशनी के कारण उनमें क्लोरोफिल के निर्माण को बढ़ावा मिलता है। आसान भाषा में समझें तो क्लोरोफिल की मदद से ही ये अपना भोजना बना पाते हैं। अब सवाल उठता है कि सूर्य का प्रकाश तो हर पेड़-पौधे को मिलता है, लेकिन हर पौधा लम्बे होने का रिकॉर्ड नहीं बना पाता। कुछ ही पेड 90 डिग्री की सीध में आगे बढ़ पाते हैं। हर पौधे का अपना एक जीन होता है। यही जीन ही तय करता है पेड़ लम्बा होगा या छोटा। खास जीन की प्रजाति वाले पौधे एक खास रिकॉर्ड बनाते हैं। जो पेड़ 90 डिग्री की सीध में बढ़ने का रिकॉर्ड बनाते हैं, उनके लिए आसपास का महौल भी निर्भर करता है। कुछ ऐसे पेड़ भी होते हैं जिन्हें प्रकाश की अधिक जरूरत होती है। अगल-बगल पेड़ होने के कारण जब उन्हें प्रकाश नहीं मिल पाता तो वो प्रकाश पाने के लिए ऊपर की तरफ बढ़ते हैं। एक यह भी वजह है इनकी लंबाई के लिए। कई पेड़ों की प्रजाति ही ऐसी होती है, जो अपनी लम्बाई के लिए जाने जाते हैं। इस तरह पेड़ों की लम्बाई के लिए कई फैक्टर काम करते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। धरती के बाहर जीवन है या नहीं, यह शोध का रोचक विषय रहा है। इस पूरे ब्रह्माण्ड में धरती पर ही जीवन है या दूर आसमान, बादलों के पार भी जीवन संभव है? अंतरिक्ष अनंत है, इसकी कोई सीमा नहीं है। मनुष्य एक हद तक अंतरिक्ष के बारे में जानकारी ले सकता है, इससे आगे की खबर स्वयं प्रकृति समय-समय पर धरती पर रहने वाले बुद्धिजीवियों को देता रहता है। जापान के वैज्ञानिकों का दावा है कि धरती के बाहर भी जीवन है। जापानी शोधकर्ताओं ने एक क्षुद्रग्रह में अमीनो एसिड की खोज की है। उन्होंने हायाबुसा 2 मिशन द्वारा एस्टेरॉयड रयुगु से लौटे नमूनों में 20 अमीनो एसिड की पहचान की। वैज्ञानिकों का दावा है कि, अंतरिक्ष से आने वाले एस्टेरॉयड में 20 अमीनो एसिड पाए गए हैं। उन्होंने कहा ये अमीनो एसिड यह पुष्टि करता है कि धरती के बाहर दूर गगन में भी जीवन है। होक्काइडो यूनिवर्सिटी के भू-विज्ञान के प्रोफेसर हिसायोशी युरीमोटो ने स्पेस डॉट कॉम को बताया कि पानी और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर अरबों साल पहले पृथ्वी को दिए गए जीवन का एक संभावित स्त्रोत है। शोधकर्ताओं का कहना है कि, सभी जीवित चीजों को प्रोटीन की आवश्यकता होती है और अमीनो एसिड से ही इसे तैयार किया जाता है। इससे यह साबित होता है कि धरती के बाहर भी जीवन है। इससे पहले भी वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में कहा था कि एस्टोरॉयड में कार्बन और ऑर्गेनिक मैटर पाए जाते हैं। जापानी शोधकर्ताओं की इस रिसर्च में यह साबित भी हुआ है। जापानी स्पेस एजेंसी जाक्सा को इस रिसर्च से कई उम्मीदे हैं। जाक्सा का मानना है कि इस शोध के जरिए कई रहस्य सामने आ सकते हैं। जैसे धरती के बाहर जीवन की कितनी संभावना है। धरती के बाहर इंसान का जीवन क्या वाकई में संभव है। रिसर्च से इन सवालों का जवाब भी इस शोध से पता लग सकता है।
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