एबीएन सेंट्रल डेस्क। मुख्यमंत्री पी विजयन ने कहा कि केरल देश का ऐसा पहला और इकलौता राज्य है जिसके पास अपनी इंटरनेट सेवा है। केरल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क लिमिटिड को दूरसंचार विभाग से इंटरनेट सेवा प्रदाता लाइसेंस मिल गया है। इसके बाद मुख्यमंत्री ने यह टिप्पणी की। केरल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क लिमिटिड राज्य में हर शख्स की इंटरनेट तक पहुंच सुनिश्चित करने की सरकार की महत्वाकांक्षी आईटी अवसंरचना योजना है। मुख्यमंत्री ने कहा कि लाइसेंस मिलने के बाद समाज में डिजिटल विभाजन को पाटने के लिए परिकल्पित परियोजना अपना कामकाज शुरू कर सकती है। विजयन ने ट्विटर पर कहा कि केरल अपनी इंटरनेट सेवा वाला देश का एकमात्र राज्य बन गया है। उन्होंने कहा कि अब हमारी प्रतिष्ठित #KFON परियोजना इंटरनेट को एक बुनियादी अधिकार के रूप में देने के अपने संचालन को शुरू कर सकती है। KFON योजना की परिकल्पना बीपीएल परिवारों और 30,000 सरकारी कार्यालयों को मुफ्त इंटरनेट देने के लिए की गई है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के जरिए गैलेक्सी की पहली ऐसी तस्वीर दिखाई है जो इससे पहले कभी नहीं देखी गई थी। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने इस तस्वीर को सबसे पहले देखा। तस्वीर को नासा, यूरोपियन स्पेस एजेंसी और कैनेडियन स्पेस एजेंसी ने जारी किया है। तस्वीर में अंतरिक्ष को काफी डिटेल में क्लिक किया गया है और छोटे से छोटे कण को भी देखा जा सकता है। तस्वीर को जारी करते हुए जो बाइडेन ने कहा कि आज का दिन ऐतिहासिक दिन है, यह सबसे ऐतिहासिक क्षण है, पूरे अमेरिका और मानवता के लिए। वहीं कमला हैरिस ने भी तस्वीर को लेकर कहा कि यह हम सभी के लिए रोमांचक क्षण है। अंतरिक्ष में आज एक नया अध्याय जुड़ गया है। नासा के एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने कहा कि हम 13 बिलियन साल से अधिक पीछे देख रहे हैं। आप तस्वीर में जो रोशनी देख रहे हैं व 13 बिलियन साल से अधिक समय से यात्रा कर रही है। नासा ने कहा कि इन तस्वीरों के साथ ही वेब साइंस ऑपरेशन की आधिकारिक शुरुआत होती है, जो कि आगे भी इस मिशन के तहत साइंस थीम को आगे भी अनुंसाधन करती रहेगी। बता दें कि जेम्स वेब टेलीस्कोप से ली गई तस्वीर को पिछले 6 महीने से प्रोसेस किया जा रहा था। दुनिया की सबसे शक्तिशाली दूरबीन के बारे में जानिए : वैज्ञानिकों ने वेब टेलिस्कोप की उम्र यूं तो दस वर्ष बताई है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि ये करीब 20 वर्षों तक काम करता रहेगा। ये वेब टेलीस्कोप अंतरिक्ष में प्रक्षेपित सबसे शक्तिशाली दूरबीनों में से एक है। नासा के डिप्टी एडमिनिस्ट्रेटर पाम मेलरॉय के मुताबिक, नासा के मिशन में 20 साल तक संचालित करने के लिए पर्याप्त अतिरिक्त ईंधन क्षमता है। वहीं वेब के डिप्टी सीनियर प्रोजेक्ट साइंटिस्ट जोनाथन गार्डनर ने कहा यह दूरबीन बहुत दूर स्थित आकाशगंगाओं की तलाश में अहम भूमिका निभा सकती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। इस समय भारत में टेलीकॉम कंपनियां 5जी का ट्रायल कर रही हैं। इस तरह की उम्मीद जताई जा रही है कि अगले साल तक भारत में 5जी सर्विस की शुरूआत हो जाएगी। वहीं, भारत में 5जी के कर्मिशियल रोल आउट से पहले ही 6जी को लेकर खबरें आ रहीं हैं। ऐसा कहा जा रहा कि भारत में 6जी को लेकर भी तैयारियां शुरू हो गई हैं। सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स ने हाल ही में 6जी अनुसंधान, विकास और मानकीकरण का नेतृत्व करने के लिए संचार प्रौद्योगिकियों के भविष्य पर चर्चा करने के लिए अकादमिक और उद्योग के विशेषज्ञों के साथ अपना पहला 6जी फोरम आयोजित किया। फोरम में, द नेक्स्ट हाइपर-कनेक्टेड एक्सपीरियंस फॉर आॅल शीर्षक से, वैश्विक उद्योग विशेषज्ञों ने 6जी एयर इंटरफेस और 6जी के लिए एआई- आधारित इंटेलिजेंट नेटवर्क के विषयों पर प्रस्तुतिकरण और चर्चा की। सैमसंग रिसर्च के अध्यक्ष और प्रमुख सेबेस्टियन सेउंग ने अपने भाषण के दौरान कहा, हम कल्पना करते हैं कि 6जी हाइपर-कनेक्टिविटी के अगले स्तर के माध्यम से मनुष्यों और हर चीज के लिए अंतिम अनुभव प्रदान करेगा और यह विचार हमारे 6जी विजन की नींव के रूप में कार्य करता है। सेउंग ने कहा कि यह 6जी की तैयारी शुरू करने का समय है। सैमसंग ने इस महीने की शुरुआत में एक श्वेत पत्र जारी किया था, जिसमें 6जी के लिए अपना दृष्टिकोण रखा गया, जिसे अल्ट्रा-वाइडबैंड, अल्ट्रा-लो लेटेंसी, अल्ट्रा-इंटेलिजेंस और हाइपर-स्पेशियलाइजेशन और 6जी के लिए ग्लोबल फ्ऱीक्वेंसी बैंड को सुरक्षित करने के तरीके के रूप में वर्णित किया गया।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष में करीब तीन हजार सक्रिय उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए मानव के लिए कई तरह के काम कर रहे हैं। इनमें से 53 उपग्रह भारतीय हैं। इनके अलावा औसतन 27 हजार किमी प्रति घंटे रफ्तार से हजारों निष्क्रिय उपग्रहों, रॉकेटों व अन्य उपकरणों का मलबा भी वहां टुकड़ों में तैर रहा है। यह गति इतनी तेज है कि मलबे से आया एक सेमी का छोटा टुकड़ा भी किसी सक्रिय उपग्रह से टकरा कर उसे तबाह कर सकता है। यह खतरा टालने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने इसरो सिस्टम फॉर सेफ एंड सस्टेनेबल ऑपरेशन एंड मैनेजमेंट (आईएस4ओएम) प्रणाली तैयार की है। केंद्रीय अंतरिक्ष राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह अंतरिक्ष विभाग के अध्यक्ष व इसरो चेयरमैन एस सोमनाथ की मौजूदगी में इसे सोमवार को लॉन्च करेंगे। इसरो के सूत्रों ने बताया कि भारत में ही बना आईएस4ओएम देश के विकास के लिए अंतरिक्ष का उपयोग करने में भी मदद करेगा। इसरो के मुताबिक आईएस4ओएम एक ऐसी प्रणाली है जो अंतरिक्ष में सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने की दिशा में एक समग्र रुख रखती है और साथ ही, बाहरी अंतरिक्ष के सतत उपयोग के फायदे उपलब्ध कराती है। इसरो के एक अधिकारी ने कहा, यह अंतरिक्ष में मलबे का पता लगाने और उसकी निगरानी के लिए अंतरिक्ष पारिस्थितिजन्य जागरूकता कार्यक्रम का हिस्सा है। अधिकारी ने कहा, आईएस4ओएम हमारी अंतरिक्ष संपत्ति की सुरक्षा करने में आत्मनिर्भरता बढ़ाएगी और यह मलबा प्रबंधन पर संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के अनुरूप है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। बालों का शरीर में खास रोल होता है। यह शरीर के ज्यादातर हिस्सों में मौजूद रहते हैं, लेकिन हथेली और तलवों में बाल नहीं मौजूद होते हैं। कभी सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों होता है। इसकी भी एक खास वजह होती है, जबकि कई जानवर ऐसे भी होते हैं जिनके तलवों और पैरों में कुछ हद तक बाल होते हैं। जानिए ऐसा क्यों है… ऐसा क्यों होता है, इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने रिसर्च की है। साइंस अलर्ट की रिसर्च में सामने आया कि हाथों और तलवों में बाल न उगने की एक खास वजह होती है, वो है प्रोटीन। वैज्ञानिकों का कहना है, शरीर में एक खास तरह का प्रोटीन होता है जिसका कनेक्शन इस बदलाव से है। पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी की रिसर्च कहती है, शरीर में बालों के उगने के लिए Wnt प्रोटीन से मिलने वाले सिग्नल जरूरी होते हैं। यह एक मैसेंजर की तरह होता है। शोधकर्ताओं का कहना है, शरीर में कुछ ऐसे ब्लॉकर होते हैं जो Wnt प्रोटीन को अपना काम करने से रोकते हैं। ये ब्लॉकर भी एक तरह के प्रोटीन होते हैं। इन अवरोधक को Dickkopf 2 (DKK2) कहते हैं। चूहों पर रिसर्च करके इसे समझने की कोशिश की गई। रिसर्च में सामने आया जब चूहों के शरीर से DKK2 प्रोटीन को हटाया गया तो उनके उस हिस्से पर भी बाल उगने लगे जहां पर बाल नहीं नजर आते थे, जैसे- हथेली। शोधकर्ताओं का कहना है, कुछ जानवरों की तरह अगर इंसानों में भी अगर हाथों और पैरों में बाल आने लगें तो उन्हें कई कामों को करने में मुश्किलें आएंगी। वैज्ञानिकों का कहना है, इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए अभी और रिसर्च की जानी बाकी है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आसमान को आकाश, अंबर और शून्य भी कहा जाता है। शून्य यानी जहां कुछ भी न हो। आसमान का कोई नियत रंग नहीं होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है आसमान नीला क्यों दिखता है? हरा या काला क्यों नहीं? इसके पीछे भी एक विज्ञान है। WWD की रिपोर्ट के अनुसार, इसके पीछे सूर्य का प्रकाश की भूमिका होती है। अब आप कहेंगे कि प्रकाश में तो 7 रंग होते हैं, फिर आसमान नीला ही क्यों? रिपोर्ट के अनुसार, प्रकाश धरती के साथ जिस तरह से संपर्क करता है, उसी वजह से आकाश नीला दिखाई देता है। दरअसल सूर्य का प्रकाश वायुमंडल में जब गैस के कणों से टकराता है तो यह इंद्रधनुष के सभी सातों रंगों (बैगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल) में बिखर जाता है। यह खोज करनेवाले लॉर्ड रेले के नाम पर इसे रेले स्कैटरिंग कहा गया। सूर्य का प्रकाश, ऊर्जा की तरंगों के रूप में यात्रा करता है, जो अलग होने पर सभी जगह बिखर जाती है। चूंकि नीली प्रकाश तरंगें अन्य रंगों की तुलना में अधिक प्रकीर्णन करती हैं, इसलिए आसमान नीला दिखाई देता है। सूर्य वैसे तो झक सफेद होता है, लेकिन सूर्योदय और सूर्यास्त के समय लाल रंग का दिखता है। इसके पीछे की वजह भी प्रकाश ही है। सूर्य के प्रकाश को वायुमंडल की एक मोटी परत के माध्यम से बिखरने, विक्षेपित करने और मानव आंखों से देखने से पहले चलना पड़ता है और ऐसे में हम लाल और पीली रोशनी देखते हैं। इसलिए सूर्योदय और सूर्यास्त अक्सर लाल या नारंगी रंग के दिखाई देते हैं। ऐसा नहीं है कि आसमान हमेशा नीला ही दिखाई दे। आसमान लाल और गुलाबी रंग के भी दिखते हैं। इसके पीछे सूर्योदय और सूर्यास्त जैसी वजह है। लंदन में मार्च 2022 में धूल के बादलों के कारण आसमान नारंगी हो गया था। कई बार आसमान का रंग ऐसे ही असामान्य हो सकता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आॅर्गनाइजेशन (को अत्याधुनिक मानवरहित विमान के विकास में एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। डीआरडीओ ने आॅटोनॉमस फ्लाइंग विंग टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर की पहली फ्लाइट को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। इस फ्लाइट की खासियत यह है कि ये बिना पायलट के उड़ान भर सकती है। इतना ही नहीं, ये टेकआॅफ से लेकर लैंडिंग तक का सारा काम भी बिना किसी मदद के खुद ही हैंडल कर सकती है। डीआरडीओ ने एक बयान में बताया कि इस एक्सरसाइज को शुक्रवार को कर्नाटक के चित्रदुर्ग स्थित एरोनॉटिकल टेस्ट रेंज में अंजाम दिया गया। मानव रहित हवाई वाहन यानी अनमैन्ड एरियल व्हीकल को आॅटोनॉमस फ्लाइंग विंग टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर कहा जाता है। विमान के बारे में ज्यादा जानकारी देते हुए रक्षा मंत्रालय ने कहा, विमान पूरी तरह से आॅटोनॉमस मोड में आॅपरेट हुई। एयरक्राफ्ट ने एक सफलतापूर्वक उड़ान का प्रदर्शन किया, जिसमें टेकआॅफ, वे पॉइंट नेविगेशन और एक स्मूथ टचडाउन शामिल है। ये एयरक्राफ्ट आगामी बिना पायलट के चलने वाली विमानों के डेवलपमेंट की दिशा में एक मील का पत्थर है। यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक जरूरी कदम भी है। डीआरडीओ ने बयान में कहा कि एयरक्राफ्ट ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी। इस एयरक्राफ्ट ने खुद इस एक्सरसाइज को अंजाम दिया। यह विमान इस तरह की सामरिक रक्षा प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाया गया एक जरूरी कदम है। इस एयरक्राफ्ट को बेंगलुरू स्थित एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट इस्टैब्लिशमेंट ने डिजाइन और विकसित किया है। एडीई डीआरडीओ के तहत एक प्रमुख रिसर्च लेबोरेटरी है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। जलवायु परिवर्तन की सच्चाई को लोग धीरे-धीरे अब स्वीकार कर रहे हैं। हालांकि, अब भी कुछ लोग हैं जो सवाल कर रहे हैं कि यह वास्तविक और मानव जनित है या नहीं। सच्चाई को जान चुकी संस्थाएं और देश इस आपदा की गति को धीमी करने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही समाधान और झूठी उम्मीदों के बीच के अंतर को भी समझ रहे हैं। जब तक तत्काल कदम नहीं उठाया जाता उत्सर्जन से अगले कुछ दशकों तक हमारे ग्रह के तेजी से गर्म होने की प्रक्रिया जारी रहने की आशंका है। जिससे पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान तय लक्ष्य के करीब पहुंच सकता है। बता दें कि पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री से दो डिग्री तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसकी वजह से इस सदी के मध्य में उच्च तापमान की स्थिति होगी। फिर, विचार यह है कि वातावरण से ग्रीनहाउस गैसों को खींचने के लिए नई लेकिन अभी तक अप्रमाणित टेक्नोलॉजी और टेक्निक्स आखिरकार तापमान को एक सुरक्षित स्तर पर वापस लाएंगी। अब तक वैज्ञानिक इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि अस्थाई तौर पर पेरिस समझौते के तहत तापमान बढ़ने पर और उसके बाद दोबारा नीचे आने पर प्रकृति पर क्या असर होगा। टेंपरेचर बढ़ने के प्रभावों को समझने के लिए केपटाउन विश्वविद्यालय के रिसर्चर्स जोआन बेंटले, एंड्रियास एलएस मेयर और क्रिस्टोफर ट्रिसो ने रिसर्च स्टडी की है। शोधकर्ताओं ने पहली बार हमने धरती का तापमान इस एहतियाती सीमा से अधिक होने और दोबारा कम होने पर समुद्री और स्थलीय जीवों पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया। शोधकर्ता देख रहे हैं कि लक्षित तापमान दो डिग्री तक बढ़ने का सफर कितना हानिकारक होगा। नतीजों से संकेत मिलता है कि अस्थाई रूप से भी तापमान बढ़ने पर हजारों प्रजातियों के विलुप्त होने की लहर चलेगी और यह क्षति स्थाई होगी। अगर मानव इस दशक में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में बड़ी कटौती नहीं करता और बाद में उत्सर्जन को हटाने के लिए भविष्य की प्रौद्योगियों पर भरोसा नहीं करता है तो इस नतीजे की उम्मीद दुनिया कर सकती है। शोधकर्ताओं का अध्ययन मॉडल वर्ष 2040 से 2100 के बीच के 60 साल की अवधि में वैश्विक तापमान में दो डिग्री से अधिक वृद्धि का जलीय और स्थलीय जीवों की करीब 30 हजार प्रजातियों पर पड़ने वाले असर का आकलन करता है। उन्होंने देखा कि उनमें से कितनी प्रजातियां है जिनका प्रजनन और जीवन तापमान बढ़ने से प्रभावित होता है और उन पर यह खतरा कितना है। अगर तापमान में गिरावट भी आती है तो प्रकृति को नुकसान तेजी से होगा और धीरे-धीरे उसका असर समाप्त होगा। केवल कुछ वर्षों तक वैश्विक तापमान में वृद्धि दुनिया की अधिकतर प्रमुख पारिस्थितिकी को बदल सकती है। अमेजन घाटी का उदाहरण लें तो कुछ प्रजातियों पर वैश्विक तापमान स्थिर होने के बावजूद खतरा बना रहेगा जबकि कुछ प्रजातियां वर्ष 2300 के उत्तरार्ध तक इस खतरे का सामना करेंगी। यह इसलिए कि कुछ प्रजातियां जो उष्णकटिबंध के पास रहती है वे ऊष्मा को सहन करने की सीमा के नजदीक होते हैं और वे इसका सामना कर सकते हैं। इसलिए वे तापमान में मामूली बदलाव के प्रति संवेदनशील होते हैं और जब वैश्विक औसत तापमान वापस सुरक्षित स्तर पर आएगा तब स्थानीय तापमान में बदलाव देर से होगा। इस खतरे का परिणाम अपरिवर्तनीय होगा और उष्णकटिबंधीय वन सवाना घास के मैदान में तब्दील हो सकते हैं। दुनिया वैश्विक कार्बन को सोखने वाले अहम केंद्र को खो सकती है जिससे पृथ्वी के वायुमंडल में और अधिक गर्म करने वाली गैसों की मौजूदगी हो सकती है। पश्चिमी प्रशांत महासागर का कोरल त्रिकोण संपन्न समुद्री परिस्थिति की प्रजातियों का घर है जिनमें मूंगे की चट्टान बनाने वाली प्रजातियां, समुद्री कछुए, रीफ मछली और मैग्रोव के जंगल शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मॉडल दिखाता है कि कुछ समुदाय, सभी या अधिकतर प्रजातियां इस खतरनाक स्थिति का एक साथ कम से कम कुछ दशकों और अधिकतर दो सदियों तक कर सकते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो ने गुरुवार को अपने महत्वाकांक्षी मिशन पीएसएलवी-सी53 के तहत सिंगापुर की तीन सैटेलाइट को लॉन्च किया है। पीएसएलवी-सी53 (PSLV-C53) एनएसआईएल का दूसरा समर्पित वाणिज्यिक मिशन है। यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर के दूसरे लॉन्च पैड से किया गया है। यह पीएसएलवी (PSLV) का 55वां मिशन है। इस मिशन के तहत एक खास उपग्रह भी लॉन्च किया है। यह उपग्रह किसी भी मौसम में तस्वीरें लेने में सक्षम है। पीएसएलवी-सी53 इसरो के कॉरपोरेट आर्म न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) का दूसरा महत्वाकांक्षी मिशन है। जानकारी के मुताबिक प्रक्षेपण के 18 मिनट बाद सिंगापुर की तीन सैटेलाइटों को उनकी कक्षा में स्थापित करने के लिए लॉन्च कर दिया। अंतरिक्ष एजेंसी ने इससे पहले एक ट्वीट में बताया था, पीएसएलवी-सी53/डीएस-ईओ मिशन : 30 जून, 2022 को भारतीय समयानुसार 18:02 बजे होने वाले प्रक्षेपण की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। वहीं पिछले दिनों हैदराबाद के ध्रुव स्पेस प्राइवेट लिमिटेड और बेंगलुरु के दिगांतरा रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के पेलोड को भी गुरुवार को अंतरिक्ष में भेजा गया है।
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