इंसान के शरीर में पैदा हुआ था टोको, अब लाखों रुपये खर्च और सर्जरी के बाद बन गया कुत्तारितिका कमठानएबीएन नॉलेज डेस्क। जापान में एक आदमी ने बेहद अलग काम किया है। इस शख्स ने लाखों रुपये में सिर्फ अपना शौक पूरा करने के लिए ऐसा काम किया है जिसकी हर तरफ चर्चा हो रही है। इसने ऐसा काम किया है कि इसका पूरा स्वरूप ही बदल गया है। ये दुनिया सिर्फ सात आजूबों से ही नहीं बल्कि कई अजीब लोगों से भी भरी पड़ी है जिनके अनोखे शौक उन्हें आम लोगों से बिलकुल अलग बनाते है। कई लोग ऐसे होते हैं जो नया और अनोखा करने के चक्कर में हर काम करने को तैयार हो जाती है। कई लोग बेहद ही अलग-अलग कदम उठाते हैं जिससे वो चर्चा के विषय बन जाते हैं। कोई पूरे शरीर पर टैटू बनवाता है तो कोई नाखूनों को बढ़ाकर उनके जरिए चर्चा में आता है। मगर जापान में एक व्यक्ति ऐसा है जिसने वो काम किया है कि उसके इंसान होने का अस्तित्व ही मिट गया है। जापान में एक शख्स ने खुद को कुत्ते में बदल लिया है। इस व्यक्ति का नाम टोको है, जिसने 22 हजार डॉलर सिर्फ एक कुत्ता बनने के लिए खर्च कर दिये हैं। ये राशि लगभग 18 लाख रुपये होती है। इस व्यक्ति द्वारा 18 लाख रुपये कुत्ता बनने के लिए खर्च करने पर काफी हैरानी भी जतायी जा रही है। हर कोई इस व्यक्ति के इस कदम की चर्चा कर रहा है। जानकारी के मुताबिक इस व्यक्ति को इंसान से कुत्ता बनने में जेपपेट नामक कंपनी ने मदद की है। इस पूरी प्रक्रिया में 40 दिनों का समय लगा है। इस व्यक्ति ने कोल्ली ब्रीड के कुत्ते के तौर पर नया रूप धारण किया है। ये व्यक्ति टोको बिलकुल असली कुत्ते की तरह ही दिखता है और उसकी तरह ही चलता भी है।कुत्ता बनना था सपनाजापान के इस व्यक्ति ने बताया कि इंसान की जगह कुत्ता बनना उसका असल में सपना था। वर्षों से वो इसके लिए इंतजार कर रहा था। इस संबंध में व्यक्ति ने अपने यूट्यूब चैनल पर भी वीडियो अपलोड किया है जिसमें उसने बताया कि आई वांट टू बी एन एनिमल, जिसे 1 मिलियन से अधिक लोग देख चुके हैं। वीडियो में ये व्यक्ति गले में पट्टा डालकर सैर के लिए निकला है। इंसान से कुत्ता बना ये व्यक्ति अन्य कुत्तों की तरह पार्क में की चीजें सूंघ रहा है और फर्श पर लोटता हुआ भी दिख रहा है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने मंगलवार को चंद्रयान-3 अंतरिक्षयान को पृथ्वी की कक्षा से निकालकर सफलतापूर्वक चांद की कक्षा की तरफ रवाना किया। इसरो ने बयान में कहा कि चंद्रयान-3 ने पृथ्वी की कक्षा का चक्कर पूरा कर लिया है और अब यह चांद की तरफ बढ़ रहा है।पांच अगस्त का दिन अहमइसरो ने बताया कि ISTRAC (ISRO Telemetry, Tracking and Command Network) सफलतापूर्वक पेरिजी फायरिंग की गयी। जिसके बाद अंतरिक्षयान ने चांद की अपनी यात्रा शुरू कर दी है। अगल कदम चांद है। पांच अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 अंतरिक्षयान चांद की कक्षा में प्रवेश करेगा।इसके बाद 16 अगस्त तक अंतरिक्षयान चांद की कक्षा में चक्कर लगायेगा। 17 अगस्त को चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर ऊपर प्रोपल्शन मॉड्यूल से लैंडर अलग होगा। 23 अगस्त को शाम 5.47 बजे चंद्रयान-3 को चांद की सतह पर लैंडिंग करनी है।चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा चंद्रयान-3इसरो ने 14 जुलाई को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से दोपहर दो बजकर 35 मिनट पर अपनी महत्वकांक्षी योजना चंद्रयान-3 अंतरिक्षयान को रवाना किया था। चंद्रयान-3 में लैंडर, रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल हैं। लैंडर और रोवर चांद के दक्षिण ध्रुव पर उतरेंगे और 14 दिन तक वहां प्रयोग करेंगे। इस मिशन के जरिए इसरो पता लगायेगा कि चांद की सतह पर भूकंप कैसे आते हैं। साथ ही चंद्रमा की मिट्टी का अध्ययन भी करेगा।
खराब मौसम में भी काम करने में सक्षमएबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रविवार सुबह सिंगापुर के डीएस-सार उपग्रह सहित सात उपग्रहों को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इसरो का रॉकेट पीएसएलवी सी56 श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह साढ़े छह बजे इन उपग्रहों को लेकर अंतरिक्ष की ओर रवाना हुआ। बाद में इसरो ने घोषणा की है कि मिशन सफल रहा है और सिंगापुर के ये सात उपग्रह सफलतापूर्वक निर्धारित कक्षा में स्थापित हो गए हैं। इसरो ने कहा कि उड़ान भरने के लगभग 23 मिनट बाद प्रमुख उपग्रह अलग हो गया और उसके बाद छह अन्य सह-यात्री उपग्रह अलग हुए, जिन्हें क्रमानुसार निर्धारित कक्षाओं में स्थापित किया गया है। उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण पर इसरो ने ट्विटर पर लिखा, पीएसएलवी-सी56/डीएस-एसएआर मिशन: मिशन पूरी तरह सफल रहा। ढरछश्-उ56 रॉकेट ने सभी सात उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में सटीक रूप से प्रक्षेपित किया। अनुबंध के लिए एनएसआईएल इंडिया और सिंगापुर को धन्यवाद।उपग्रहों के बारे में जानें...डीएस-सार : सिंगापुर का यह उपग्रह सिंथेटिक अपर्चर रडार (सार) उपकरण से युक्त है जिसे इस्राइल की अंतरिक्ष तकनीक क्षेत्र की कंपनियों ने बनाया है। यह उपग्रह हर मौसम व रात में भी काम करते हुए धरती की 1 मीटर सतह तक का डाटा उपलब्ध करवायेगा।वेलॉक्स-एएम : 23 किलो का यह माइक्रो उपग्रह तकनीक प्रदर्शन के लिए भेजा रहा है। आर्केड एटमॉस्फियर कपलिंग व डायनेमिक एक्सप्लोरर : यह एक प्रायोगिक उपग्रह है।स्कूब-2 : यह 3यू नैनो सैटेलाइट एक तकनीक प्रदर्शक उपकरण से युक्त है।ग्लासिया-2 : यह भी 3यू नैनो सैटेलाइट है, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में परिक्रमा करेगा।ओआरबी-12 स्ट्राइडर : यह उपग्रह अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बना है।
उद्योग की स्थापना के लिए सीएम हेमंत सोरेन ने दी मंजूरीटीम एबीएन, रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जमशेदपुर में देश की पहली हाइड्रोजन ईंधन से जुड़े उद्योग की स्थापना के लिए स्वीकृति प्रदान कर दी है। मुख्यमंत्री के इस पहल के बाद अब देश में पेट्रोल, डीजल और बैटरी साथ जल्द हाइड्रोजन ईंधन से भी वाहन चलेंगे। इसके लिए सीएम ने मंजूरी दे दी है।एम ओ यू के उपरांत जमशेदपुर में देश की पहली हाइड्रोजन ईंधन से जुड़े उद्योग के स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा। इस कार्य में हाइड्रोजन इंजन बनने की नवीनतम तकनीक का उपयोग किया जायेगा, जिसका लाभ आने वाले समय में पूरे देश को होगा।झारखंड औद्योगिक एवं निवेश प्रोत्साहन नीति 2021 के वर्गीकृत सॉफ्टवेयर मेगा प्रोजेक्ट के अनुसार उपर्युक्त परियोजना निर्माण से संबंध रखती है। ईकाई से प्राप्त निवेश तथा प्रत्यक्ष नियोजन के आधार पर ईकाई का वर्गीकरण मेगा श्रेणी के अंतर्गत किया गया है। इस ईकाई की प्रस्तावित क्षमता 4000+ हाइड्रोजन आईसी इंजन/ फ्यूल अग्नोस्टिक इंजिन एंड 10,000+बैटरी सिस्टम है, इसके लिए प्रस्तावित निवेश 354.28 करोड़ रुपए है। एक अनुमान के अनुसार इकाई 310 से अधिक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लोगों का नियोजन सुनिश्चित हो सकेगा।हाइड्रोजन ऐसा ईंधन है, जिसकी क्षमता अन्य ईंधनों के अपेक्षा अधिक होती है। इसका एनर्जी लेबल अधिक होता है। यह सस्ता और हल्का होता है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल के बीच इसे एक बेहतर विकल्प माना जा सकता है। हाइड्रोजन ईंधन से प्रदूषण को काफी हद तक नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।भारतीय बाजार और विश्व स्तर पर हाइड्रोजन इंजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए 4000+ हाइड्रोजन आईसी इंजन/ईंधन एग्नोस्टिक इंजन और 10,000+ बैटरी सिस्टम की उत्पादन क्षमता के निर्माण आवश्यक जरूरतों की आपूर्ति और नई सहायक इकाइयों की स्थापना के लिए स्थानीय औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देगा।
पीएसएलवी-सी56/डीएस-एसएआर मिशन के लिए उल्टी गिनती शुरूएबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष स्टेशन से रविवार को पीएसएलवी-सी56 से छह सह-यात्रियों के साथ सिंगापुर के डीएस-एसएआर विशेष वाणिज्यिक उपग्रह को प्रक्षेपित किये जाने की शनिवार से उल्टी गिनती शुरु हुई।44.4 मीटर लंबा चार चरण वाला वाहन पीएसएलवी-सी56, 228 टन भार के साथ रविवार सुबह 06.30 बजे शार रेंज से प्रथम लॉन्च पैड से उड़ान भरेगा। इसरो ने कहा कि उल्टी गिनती शनिवार सुबह पांच बजे शुरू हो गयी।इसरो ने ट्वीट किया कि 30 जुलाई, 2023 को भारतीय समयानुसार सुबह 6:30 बजे लॉन्च की उलटी गिनती शुरू हो गयी है। उलटी गिनती के दौरान, चार चरणों वाले वाहन में प्रणोदक भरने का कार्य किया जायेगा।
नासा ने बताया पृथ्वी पर गिरने वाला है सैटेलाइट, कब, कहां खत्म होगा, जानें पूरी जानकारीएबीएन नॉलेज डेस्क। धरती पर गिरने वाला है एक और सैटेलाइट! यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) का एओलस उपग्रह इस सप्ताह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है। अंतरिक्ष एजेंसी सैटेलाइट को नियंत्रित तरीके से नष्ट करने की पूरी कोशिश कर रही हैईएसए ने इसे अंतरिक्ष उड़ान के लिए मील का पत्थर बताया है। ऐसा कहा जाता है कि इससे पहले किसी भी उपग्रह को सहायक तरीके से डीऑर्बिट नहीं किया गया है। ऐसे तरीके आमतौर पर रॉकेट चरणों के लिए अपनाये जाते हैं, ताकि वे समुद्र में सुरक्षित रूप से उतर सकें।रिपोर्ट के मुताबिक, माना जा रहा है कि कल यानी 28 जुलाई को एयोलस उपग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करेगा और खत्म हो जायेगा। 1360 किलोग्राम वजनी इस सैटेलाइट को अगस्त 2018 में लॉन्च किया गया था। इसका मकसद धरती पर चलने वाली हवाओं का अध्ययन करना था। इस उपग्रह में केवल डॉपलर विंड लिडार लगा है, जिसकी मदद से वैज्ञानिकों को मौसम का पूर्वानुमान लगाने में मदद मिली है। अपने जीवनकाल के दौरान, एओलस उपग्रह ने पृथ्वी से 320 किमी ऊपर से पृथ्वी की ओर आने वाली हवाओं का अवलोकन किया। ये मिशन 3 साल के लिए था। फिलहाल इस सैटेलाइट का ईंधन काफी कम हो गया है। यही वजह है कि अंतरिक्ष एजेंसी इसे नीचे ला रही है।आमतौर पर जब सैटेलाइट अपना मिशन पूरा कर लेते हैं तो वे अनियंत्रित होकर धरती पर गिर जाते हैं। ज्यादातर मामलों में इनकी दुर्घटनाएं समुद्री इलाकों में होती हैं। एयोलस उपग्रह के लिए भी कुछ ऐसा ही सोचा गया था, लेकिन अंतिम समय में मिशन टीम ने इसे नियंत्रित तरीके से समाप्त करने का निर्णय लिया। ईएसए का यह कदम दूसरे देशों खासकर चीन के लिए बड़ा संदेश है कि उसे ऐन वक्त पर अपने सैटेलाइट नहीं छोड़ने चाहिए। इन्हें नियंत्रित तरीके से ख़त्म करना चाहिए। एयोलस उपग्रह धीरे-धीरे नीचे आ रहा है। इसे 120 किमी तक नीचे लाया जायेगा, जिसके बाद यह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करेगा। ईएसए टीम को उम्मीद है कि उपग्रह अटलांटिक महासागर में प्रवेश करेगा। हालांकि सटीक स्थान अभी तक ज्ञात नहीं है।
चंद्रयान-3 को और ऊंची परिक्रमा-कक्षा में पहुंचाने की कार्रवाई की इसरो नेएबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक अनुसंधान संगठन (इसरो) के मंगलवार को बताया कि उसके वैज्ञानिकों ने दूरस्थ नियंत्रण प्रणाली से एक और प्रयोग कर चंद्रयान-3 को और अधिक ऊंची कक्षा में पहुंचा दिया है।इसरो ने एक वक्तव्य में कहा कि चंद्रयान-3 को और ऊंची परिक्रमा-कक्षा में पहुंचाने के प्रयास (पृथ्वी से निकटतम कक्षा से प्रणोतदक-मोटर दाग कर की जाने वाली कार्यवाही) को बेंगलुरु में इसरो उपग्रह दूरमापी , निगरानी एवं नियंत्रण नेटवर्क (आईएसटीआरएसी/इसरो) से सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया।बयान में कहा गया है कि इस प्रकिया के पूरा होने से अब यह अंतरिक्ष यान 127609 किमी गुणा 236 किमी की कक्षा प्राप्त कर सकता है। इसरो ने कहा है कि चन्द्रयान-3 की आगे की स्थिति की निगरानी के बाद उसकी नयी कक्षा के बारे में पुष्टि की जायेगी।इसरो की ओर से इस तरह का अगला प्रयास ( ट्रांसलूनर इंजेक्शन) चंद्रयान-3 को धरती की कक्षा से चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कराने के लिए आगामी पहली अगस्त को मध्यरात्रि 12 बजे से एक बजे के बीच किये जाने की योजना है। गौरतलब है कि तय योजना के अनुसार चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश में श्रीहरिकोटा से 14 जुलाई को किया गया था। इस पर स्थापित लैंडर (अवतरण-यंत्र) और उसमें स्थित रोवर (चंद्रमा की सतह पर चल कर खोज करने वाले यंत्र) को 23 अगस्त या उसके एकाध दिन बाद चंद्रमा पर उतारा जा सकता है।
चंद्रयान-3 को चंद्रमा की कक्षा में ऊपर उठाने की चौथी कवायद पूरी, इसरो ने बताया अब आगे क्या होगा...एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बृहस्पतिवार को चंद्रयान-3 को चंद्रमा की कक्षा में ऊपर उठाने की चौथी कवायद सफलतापूर्वक पूरी की। यह कार्य यहां इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) से किया गया। अंतरिक्ष एजेंसी ने यहां कहा कि इस तरह की अगली कवायद 25 जुलाई को अपराह्न दो और तीन बजे के बीच किये जाने की योजना है। इसने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय चंद्रमा दिवस के अवसर पर चंद्रयान-3 को चंद्रमा के और करीब पहुंचा दिया है। चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को प्रक्षेपित किया गया था। इसरो प्रमुख सोमनाथ एस ने इससे पहले कहा था, ...अंतरिक्ष यान चंद्रमा के सफर पर है। अगले कुछ दिनों में यह (लैंडर को चंद्रमा की सतह पर उतारने का कार्य) कर दिखायेगा। उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं जागरूकता प्रशिक्षण (स्टार्ट) कार्यक्रम 2023 के उद्घाटन भाषण में यह बात की। उन्होंने कहा- मैं आश्वस्त हूं कि जहां तक विज्ञान की बात है, आप इस (चंद्रयान-3) मिशन के जरिये कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्त्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है।दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारणआरती के बाद सभी लोग दीये पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है।मंदिर में घंटा लगाने का कारणजब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है।भगवान की मूर्तिमंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भ गृह के बिल्कुल बीच में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर सबसे अधिक ऊर्जा होती है जहां सकारात्मक सोच से खड़े होने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा पहुंचती है और नकारात्मकता दूर भाग जाती है।परिक्रमा करने के पीछे वैज्ञानिक कारणहर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा 3, 5, 7 से बार करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
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