एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बृहस्पतिवार को चंद्रयान-3 को चंद्रमा की कक्षा में ऊपर उठाने की चौथी कवायद सफलतापूर्वक पूरी की। यह कार्य यहां इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) से किया गया।
अंतरिक्ष एजेंसी ने यहां कहा कि इस तरह की अगली कवायद 25 जुलाई को अपराह्न दो और तीन बजे के बीच किये जाने की योजना है। इसने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय चंद्रमा दिवस के अवसर पर चंद्रयान-3 को चंद्रमा के और करीब पहुंचा दिया है। चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को प्रक्षेपित किया गया था।
इसरो प्रमुख सोमनाथ एस ने इससे पहले कहा था, ...अंतरिक्ष यान चंद्रमा के सफर पर है। अगले कुछ दिनों में यह (लैंडर को चंद्रमा की सतह पर उतारने का कार्य) कर दिखायेगा। उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं जागरूकता प्रशिक्षण (स्टार्ट) कार्यक्रम 2023 के उद्घाटन भाषण में यह बात की।
उन्होंने कहा- मैं आश्वस्त हूं कि जहां तक विज्ञान की बात है, आप इस (चंद्रयान-3) मिशन के जरिये कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्त्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है।
दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारण
आरती के बाद सभी लोग दीये पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है।
मंदिर में घंटा लगाने का कारण
जब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है।
भगवान की मूर्ति
मंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भ गृह के बिल्कुल बीच में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर सबसे अधिक ऊर्जा होती है जहां सकारात्मक सोच से खड़े होने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा पहुंचती है और नकारात्मकता दूर भाग जाती है।
परिक्रमा करने के पीछे वैज्ञानिक कारण
हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा 3, 5, 7 से बार करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। जब भारतीय अपने चंद्रयान-3 के चांद पर उतरने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, तो ऐसे समय में ऑस्ट्रेलिया से आयी एक तस्वीर ने टेंशन पैदा कर दी। जी हां, ऑस्ट्रेलिया के समुद्री तट पर गुंबद के आकार की एक विशाल रहस्यमय वस्तु बहकर आयी है, हालांकि अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि यह भारतीय अंतरिक्ष संस्थान (इसरो) के पीएसएलवी प्रक्षेपण यान का हिस्सा है या नहीं, जिसके इसरो ने कुछ समय पहले ही लॉन्च किया था।
ऑस्ट्रेलिया की अंतरिक्ष एजेंसी ने एक ट्वीट में कहा, हम वर्तमान में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में ज्यूरियन खाड़ी के पास एक समुद्र तट पर स्थित इस वस्तु के बारे में जांच कर रहे हैं। एजेंसी ने कहा, वस्तु किसी विदेशी अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान से संबंधित हो सकती है और हम वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ संपर्क कर रहे हैं जो अधिक जानकारी प्रदान करने में सक्षम हो सकते हैं।
एजेंसी ट्वीट में कहा, अगर समुदाय को कोई और संदिग्ध मलबा दिखता है, तो उन्हें स्थानीय अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए और एसपीएसीई.एमओएनआईटीओआरआईएनजी@एसपीएसीई.जीओवी.एयू के माध्यम से ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी को सूचित करना चाहिए।
ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि हम मलबा शमन सहित बाहरी अंतरिक्ष गतिविधियों की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर करना जारी रखेंगे।
इस बीच अटकलें लगायी जा रही है कि ऑस्ट्रेलिया में मिला मलबा इसरो के पीएसएलवी प्रक्षेपण यान का हिस्सा हो सकता है। इसरो के सूत्र न तो इसकी पुष्टि की और न ही इससे इनकार किया कि ज्यूरियन खाड़ी के पास पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट पर बहकर आई विशाल वस्तु उसके पीएसएलवी रॉकेट का हिस्सा है या नहीं।
सूत्रों ने कहा- इसे प्रत्यक्ष रूप से देखे बिना और इसकी जांच किये बिना कुछ भी नहीं कहा जा सकता (चाहे यह पीएसएलवी का मलबा है)। उन्होंने कहा कि हम इसे व्यक्तिगत रूप से देखे बिना और इसकी जांच किये बिना इसके बारे में किसी भी बात की पुष्टि या खंडन नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह तभी पता लगाया जा सकता है, जब ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी उस वस्तु का वीडियो भेजेगी।
सूत्रों ने कहा- हमें यह देखना होगा कि क्या इस पर कोई निशान हैं। यदि आवश्यक हुआ, तो इसरो अधिकारी यह पुष्टि करने के लिए वहां जा सकते हैं कि यह भारतीय रॉकेट का है या नहीं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने शुक्रवार को कहा कि भारत का तीसरा चंद्र अभियान चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास 23 अगस्त को करेगा। सॉफ्ट लैंडिंग को तकनीकी रूप से चुनौतिपूर्ण कार्य माना जाता है।
सोमनाथ ने 600 करोड़ रूपये की अनुमानित लागत वाले इस मिशन के सफल प्रक्षेपण के बाद संवाददाताओं से कहा कि चंद्रयान-3 को एक अगस्त से चंद्रमा की कक्षा में स्थापित करने की योजना है। उन्होंने कहा कि चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग 23 अगस्त को शाम पांच बजकर 47 मिनट पर किये जाने की योजना है।
भारत ने शुक्रवार को यहां एलवीएम3-एम4 रॉकेट के जरिए अपने तीसरे चंद्र मिशन-चंद्रयान-3 का सफल प्रक्षेपण किया। सोमनाथ ने कहा कि शुक्रवार को प्रक्षेपण के बाद राकेट दीर्घ वृताकार चंद्र कक्षा में आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा- हमें चंद्रयान-3 को एक अगस्त से चंद्रमा की कक्षा में स्थापित करने की उम्मीद है और इसके दो-तीन सप्ताह के बाद प्रणोदन मॉड्यूल और लैंडर मॉड्यूल अलग होगा जो 17 अगस्त को होगा।
सोमनाथ ने कहा कि अगर सभी चीजें निर्धारित कार्यक्रम के अनुरूप रहती हैं तो इसका अंतिम चरण 23 अगस्त को शाम पांच बजकर 47 मिनट पर किये जाने की योजना है। वर्ष 2019 में चंद्रयान-2 के बाद वर्तमान मिशन में हुई देरी के बारे में एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह अध्ययन करने में एक वर्ष लग गया कि पिछले मिशन में क्या गलती हुई।
उन्होंने कहा कि दूसरा हमने विचार किया कि इसे बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है और क्या-क्या गलत हो सकता है। सोमनाथ ने कहा कि इस बात पर भी विचार किया गया कि क्या कोई छिपी समस्या है और हमने इस आधार पर समीक्षा की और तीसरे वर्ष परीक्षण किया तथा अंतिम वर्ष एलवीएम3-एम4 रॉकेट को जोड़ने का रहा। उन्होंने कहा कि आज जो हुआ है, उसके लिए हजारों लोगों की बड़ी टीम थी।
यह पूछे जाने पर कि वर्तमान मिशन के वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए दक्षिण ध्रुव को क्यों चुना गया। उन्होंने कहा- हमारा लक्ष्य चंद्रमा के सतह पर सभी भू भौतिकी एव रासायनिक विशेषताओं का पता लगाना है। दूसरा यह कि दक्षिण ध्रुव का अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों ने एलवीएम3-एम4 रॉकेट में कई बदलाव किये जिसमें इंजन की संख्या को पूर्ववर्ती पांच से घटाकर चार करना शामिल है।
उन्होंने कहा- यह वाहन के वजन को कम करने के लिए किया गया। वहीं, चंद्रयान मिशन की लागत के बारे में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेन्द्र सिंह ने कहा- यह करीब 600 करोड़ रूपये है। केंद्र सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान का उल्लेख करते हुए सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले चार-पांच वर्षों में अंतरिक्ष से जुड़ी व्यवस्था तैयार करने में व्यक्तिगत तौर पर रूचि दिखायी है।
उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से जुड़ी व्यवस्था को तैयार करने में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के साथ बड़ी संख्या में स्टार्टअप सहयोग कर रहे हैं। भारत को गौरवान्वित करने के लिए इसरो टीम की सराहना करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का धन्यवाद व्यक्त किया और कहा कि उन्होंने श्रीहरिकोटा के द्वार खोलकर तथा भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को सक्षम करके इसे संभव बनाया है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत के तीसरे चंद्र मिशन चंद्रयान-3 को लॉन्च कर दिया गया है। चंद्रयान-3 ने दोपहर 2:35 बजे चंद्रमा की ओर उड़ान भरा। इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से छोड़ा गया है।
615 करोड़ की लागत से तैयार हुआ यह मिशन करीब 50 दिन की यात्रा के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड करेगा। चंद्रयान-3 को भेजने के लिए एलवीएम-3 लॉन्चर का इस्तेमाल किया गया है।
अगर दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर की सॉफ्ट लैंडिग होती है, तो भारत दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बन जायेगा। वहीं, पीएम मोदी ने ट्वीट कर शुभकामनाएं दीं और कहा कि आज का दिन सुनहरे अक्षरों में अंकित रहेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। चंद्रयान-3 के प्रक्षेपण और उसकी सफलता का सभी को इंतजार है। चंद्रयान-3 के प्रक्षेपण की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। शुक्रवार (14 जुलाई 2023) को 14 जुलाई को दोपहर 2:35 बजे इसका प्रक्षेपण होगा।
इसके लिए कई कंपनियों ने विभिन्न कल-पुर्जों और उपकरणों की आपूर्ति की है। किसी भी सैटेलाइट की लांचिंग के लिए जरूरी लांच पैड और सैटेलाइट को संभालने वाले क्रेन का निर्माण झारखंड की राजधानी रांची स्थित हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (एचइसी) में हुआ है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए एचइसी ने इसे बनाया था सैटेलाइट को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में भी इसका इस्तेमाल होता है। इसे मोबाइल लांचिंग पैड कहते हैं। मदर ऑफ ऑल इंडस्ट्रीज एचइसी में दूसरा मोबाइल लांचिंग पैड भी तैयार हो रहा है। एचइसी के अलावा लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने भी कई पुर्जों की आपूर्ति की है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। वैज्ञानिकों को हमारे सूर्य से 90 लाख गुना बड़ा ब्लैक होल मिला है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह अब तक का सबसे पुराना और विशालकाय ब्लैक होल है। उनका मानना है कि इसके अलावा और भी कई विशालकाय ब्लैक होल ऐसे हैं, जिन्हें जेम्स वेब टेलीस्कोप की नजरें अभी तक ढूंढ नहीं पायी हैं।
यह ब्लैक होल अब तक की खोजी गयी सबसे शुरुआती आकाशगंगा में से एक के अंदर मिला है, जो मध्यम अवस्था में है। इसमें केंद्रक के उत्सर्जन हावी नहीं होते। पहले इसका नाम इजीएसवाई8पी7 था, अब इसे सीईईआरएस1019 नाम दिया गया है। यह खोज शुरुआती ब्रह्माण्ड की सबसे उलझी पहेली को सुलझाने में मददगार हो सकता है।
सबसे पुराना ब्लैक होल
बिग बैंग की घटना के केवल 57 करोड़ साल के बाद के समय में देखा गया यह विशालकाय ब्लैक होल अब तक का खोजा गया सबसे पुराना ब्लैक होल है। ऑस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास की खगोलभौतिविद रेबैका लार्सन की अगुआई में किये गये शोध के मुताबिक, सीईईआरएस1019 का अध्ययन शुरुआती ब्रह्माण्ड में तारों के निर्माण से बने प्रकाश की जांच के हिस्से के रूप में किया जा रहा है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। हरित हाइड्रोजन भविष्य का ईंधन हैं। केंद्रीय बिजली, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने निवेशकों को देश में स्वच्छ ऊर्जा स्रोत में निवेश का आग्रह करते हुए यह बात कही है।
सिंह ने हरित हाइड्रोजन पर पहले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन-2023 को संबोधित करते हुए बुधवार को यहां निवेशकों से कहा कि हम आपको हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं के विकास में मदद करेंगे। आप आयें और हमारे साथ भागीदारी करें। सम्मेलन में 2,500 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं।
सिंह ने कहा कि निवेशक इलेक्ट्रोलाइजर के विकास, हरित हाइड्रोजन के परिवहन तंत्र, हरित इस्पात और सीमेंट के विनिर्माण में हरित हाइड्रोजन के इस्तेमाल जैसे क्षेत्रों में भागीदारी कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है।
केंद्रीय बिजली मंत्री ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा की तरह भारत हरित हाइड्रोजन क्षेत्र में भी अगुवा बन सकता है। उन्होंने बताया कि ऐसे उद्योग हैं जिन्होंने हरित हाइड्रोजन की बड़ी क्षमता स्थापित करने के लिए काम करना शुरू कर दिया है।
उन्होंने बताया कि ये लोग भूमि अधिग्रहण के लिए विभिन्न राज्यों के साथ काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने जनवरी, 2023 में 19,744 करोड़ रुपए के खर्च के साथ राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी दी थी। इसका लक्ष्य भारत को हरित हाइड्रोजन के विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाना है।
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