चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग के बाद, इसरो आदित्य-एल1 सूर्य मिशन के लिए कर रहा है तैयारीएबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की नजर चंद्रमा के बाद अब सौरमंडल के सबसे गर्म और सबसे बड़े सदस्य सूर्य की सबसे चुनौतीपूर्ण सतह की पर उतरने पर है। अंतरिक्ष एजेंसी सूर्य का अध्ययन करने के लिए आदित्य-एल1 सौर अन्वेषण मिशन के प्रक्षेपण की तैयारी कर रही है।आदित्य-एल1 मिशन को इसरो पीएसएलवी रॉकेट द्वारा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र एसएचएआर (एसडीएससी एसएचएआर), श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया जायेगा। इसके बाद कक्षा को और अधिक अण्डाकार बनाया जाएगा और बाद में अंतरिक्ष यान को ऑन-बोर्ड प्रणोदन का उपयोग करके लैग्रेंज बिंदु एल-1की ओर प्रक्षेपित किया जायेगा। एल1 बिंदु के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में रखे गये उपग्रह को बिना किसी ग्रहण/ग्रहण के सूर्य को लगातार देखने का प्रमुख लाभ होता है। इससे वास्तविक समय में सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम पर इसके प्रभाव को देखने का अधिक लाभ मिलेगा।जैसे ही अंतरिक्ष यान एल 1 की ओर यात्रा करेगा, यह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र (एसओआई) से बाहर निकल जायेगा। एसओआई से बाहर निकलने के बाद, क्रूज़ चरण शुरू हो जायेगा और बाद में अंतरिक्ष यान को एल1 के चारों ओर एक बड़ी प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया जायेगा। लॉन्च किये जाने के बाद से एल1 तक की कुल यात्रा में आदित्य-एल1 को लगभग चार महीने लगेंगे।
अगले हफ्ते होगी सॉफ्ट लैडिंग एबीएन नॉलेज डेस्क। चंद्रयान 3 चांद के और करीब पहुंच गया है। हाल ही में चंद्रयान 3 के लैंडर मॉड्यूल ने चांद की तस्वीरें ली हैं। इसरो ने अपने (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर यह तस्वीरें शेयर की हैं। इसरो ने दो तस्वीरें शेयर की हैं, जिसमें एक तस्वीर 15 अगस्त और दूसरी तस्वीर 17 अगस्त की है। इसरो ने ट्विटर पर बताया कि चंद्रयान-3 के लैंडर मॉड्यूल (एलएम) की स्थिति सामान्य है। चंद्रयान-3 के लैंडर मॉड्यूल की डिबूस्टिंग प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी, यान चंद्रमा के और करीब पहुंचा गया है। प्रणोदन मॉड्यूल और लैंडर मॉड्यूल के बृहस्पतिवार को अलग होने के बाद ली गयी तस्वीरों में चंद्रमा की सतह पर गड्ढे दिखाई देते हैं जिन्हें इसरो द्वारा जारी की गयीं तस्वीरों में फैब्री, जियोडार्नो ब्रूनो और हरखेबी जे के रूप में चिह्नित किया गया है।देश की अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा की गयीं तस्वीरों में 15 अगस्त को लैंडर पोजिशन डिटेक्शन कैमरा (एलपीडीसी) द्वारा ली गयीं तस्वीरें और 17 अगस्त को प्रणोदन मॉड्यूल से लैंडर मॉड्यूल के अलग होने के ठीक बाद लैंडर इमेजर (एलआई) कैमरा-1 द्वारा ली गयीं तस्वीरें शामिल हैं। लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) से युक्त लैंडर मॉड्यूल को शुक्रवार को एक कक्षा में नीचे लाया जायेगा जिससे यह 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए चंद्रमा की सतह के और करीब आ जायेगा। इससे पहले भारत के महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-3 ने बृहस्पतिवार को तब एक बड़ी उपलब्धि हासिल की जब इसका लैंडर मॉड्यूल सफलतापूर्वक प्रणोदन मॉड्यूल से अलग हो गया और अब पूरे देश को 23 अगस्त को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर इसकी निर्धारित सॉफ्ट लैंडिंग की प्रतीक्षा है। लैंडर मॉड्यूल में लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान शामिल हैं, जो अब एक ऐसी कक्षा में उतरने के लिए तैयार है। जिससे यह चंद्रमा की सतह के और करीब आ जायेगा। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग अगले बुधवार को शाम 5.47 बजे निर्धारित है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा- लैंडर मॉड्यूल ने कहा, यात्रा के लिए धन्यवाद, दोस्त। लैंडर मॉड्यूल, प्रणोदन मॉड्यूल से सफलतापूर्वक अलग हो गया है। कल (शुक्रवार) लैंडर मॉड्यूल के भारतीय समयानुसार शाम करीब चार बजे डीबूस्टिंग (गति कम करने की प्रक्रिया) से गुजरते हुए चंद्रमा की कक्षा में थोड़ा और नीचे आने की उम्मीद है। अनुमानित तौर पर 600 करोड़ रुपये की लागत वाले चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को चांद के दक्षिणी ध्रुव तक की 41 दिन की जटिल यात्रा पर रवाना किया गया था। इसरो के एक अधिकारी ने कहा कि प्रणोदन मॉड्यूल से अलग हुए लैंडर को एक ऐसी कक्षा में लाने के लिए डीबूस्ट (गति कम करने की प्रक्रिया) से गुजारा जायेगा, जहां पेरिल्यून (चंद्रमा से कक्षा का निकटतम बिंदु) 30 किलोमीटर और अपोल्यून (चंद्रमा से सबसे दूर का बिंदु) 100 किमी की दूरी पर होगा, जहां से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र पर सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास किया जायेगा। राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी ने यह भी कहा कि प्रणोदन मॉड्यूल वर्तमान कक्षा में अपनी यात्रा महीनों/वर्षों तक जारी रखेगा। चंद्रयान-1 के परियोजना निदेशक एम अन्नादुरई ने कहा- मैच वास्तव में अब शुरू होता है। ये अंतिम ओवर हैं जिनके बारे में हम बात कर रहे हैं। चंद्रयान-3 से पहले भेजा गया चंद्रयान-2 सात सितंबर 2019 को सॉफ्ट लैंडिंग करने में असफल रहा था। चंद्रयान-3 का उद्देश्य भी चंद्र सतह पर सुरक्षित साफ्ट लैंडिंग करने, चांद पर रोवर के घूमने और वैज्ञानिक प्रयोग करने का है। चंद्रयान-1 मिशन 2008 में भेजा गया था। अगर चंद्रयान-3 सॉफ्ट लैंडिंग करने में सफल रहता है तो अमेरिका, चीन और पूर्व सोवियत संघ के बाद भारत इस तकनीक में महारत हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जायेगा। इसके साथ ही चंद्रमा के अज्ञात दक्षिणी ध्रुव की दौड़ भी तेज हो गयी है और रूस का लूना-25 भी अगले सप्ताह चंद्रमा पर उतरने की तैयारी कर रहा है। दोनों यानों के चंद्रमा पर उतरने की संभावित तारीखों से संबंधित टकराव ने भी दुनिया भर के वैज्ञानिक समुदाय में उत्साह बढ़ा दिया है। लूना-25 के चंद्र सतह पर उतरने की तारीख जहां 21-23 अगस्त है, वहीं चंद्रयान-3 के उतरने की तारीख 23-24 अगस्त है।
भारत के लिए खास दिन, इसरो ने किया ट्वीटएबीएन नॉलेज डेस्क। भारत का महत्वाकांक्षी तीसरा चंद्र मिशन चंद्रयान-3 सोमवार को कक्षा में नीचे लाये जाने की एक और सफल प्रक्रिया से गुजरने के साथ ही चंद्रमा की सतह के और नजदीक पहुंच गया। बेंगलुरु में स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बताया कि चंद्रयान-3 अब चंद्रमा की निकटवर्ती कक्षा में पहुंच गया है। चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण 14 जुलाई को किया गया था और पांच अगस्त को इसने चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश किया था। इसके बाद छह और नौ अगस्त को चंद्रयान को कक्षा में नीचे लाये जाने की दो प्रक्रियाओं को अंजाम दिया गया। इसरो ने ट्वीट किया- चंद्रयान को चंद्रमा की सतह के नजदीक लाने की प्रक्रिया शुरू। आज की गयी प्रक्रिया के बाद चंद्रयान-3 की कक्षा घटकर 150 किमी गुना 177 किमी रह गयी है। उसने बताया कि अगली प्रक्रिया को 16 अगस्त को सुबह करीब साढ़े आठ बजे अंजाम दिये जाने की योजना है। इसरो ने अभियान के आगे बढ़ने पर चंद्रयान-3 की कक्षा धीरे-धीरे घटानी शुरू की तथा उसे चंद्र ध्रुव के समीप लाने की प्रक्रियाओं को अंजाम दिया। इसरो के सूत्रों के अनुसार, अंतरिक्ष यान को 100 किमी की कक्षा तक पहुंचाने के लिए एक और प्रक्रिया को अंजाम दिया जायेगा, जिसके बाद लैंडर और रोवर से युक्त लैंडिंग मॉड्यूल आगे की प्रक्रिया के तहत प्रॅपल्शन मॉड्यूल से अलग हो जायेगा। इसके बाद, लैंडर के डीबूस्ट (धीमे होने की प्रक्रिया) से गुजरने और 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र पर सॉफ्ट लैंडिंग करने की उम्मीद है। इससे पहले 9 अगस्त को चंद्रयान की आर्बिट घटायी गयी थी। वहीं 6 अगस्त को रात करीब 11 बजे पहली बार चंद्रयान की आर्बिट घटायी गयी थी। तब ये चंद्रमा की 170 गुना 4313 की आर्बिट में आया था। आर्बिट घटाने के लिए चंद्रयान के इंजन कुछ देर चालू किये गये थे।गौरतलब है कि 22 दिन के सफर के बाद चंद्रयान 5 अगस्त को शाम करीब 7:15 बजे चंद्रमा की कक्षा में पहुंचा था। तब यान चंद्रमा की ग्रैविटी में कैप्चर हो सके, इसके लिए उसकी स्पीड कम की गयी थी। स्पीड कम करने के लिए इसरो वैज्ञानिकों ने यान के फेस को पलटकर थ्रस्टर 1835 सेकेंड यानी करीब आधे घंटे के लिए फायर किये। ये फायरिंग शाम 7:12 बजे शुरू की गयी थी।वर्तमान स्थिति क्या है? यह चंद्रमा पर कब उतरेगा?चंद्रयान-3 के 40 दिनों की यात्रा के बाद 23 अगस्त को चंद्रमा पर उतरने की उम्मीद है। चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह के और भी करीब पहुंच गया है और 9 अगस्त को किये गये एक युद्धाभ्यास के बाद अंतरिक्ष यान का पथ 174 किमी गुना 1437 किमी तक समायोजित कर दिया गया है।सब कुछ ठीक रहा तो फौरन ही यह अपने काम में लग जायेगा। चंद्रयान-3 को बड़े प्यार से चांद पर उतारने की जिम्मेदार लैंडर विक्रम की है।इसके बाद रोवर प्रज्ञान का मिशन शुरू होगा। चंद्रमा की जमीन पर चलते हुए चंद्रयान-3 का रोवर धरती के इकलौते प्राकृतिक उपग्रह के बारे में अहम डेटा जुटायेगा।चंद्रयान-3 से पहले चंद्रमा पर रूस का लूना-25 स्पेसक्राफ्ट भी पहुंच रहा है।हालांकि, लूना-25 में रोवर नहीं है। रूसी मिशन के चलते चंद्रयान-3 को अपना काम करने में कोई परेशानी नहीं होगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। तुर्की ने स्वदेश में निर्मित परीक्षण रॉकेट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया है। तुर्की अंतरिक्ष एजेंसी ने जानकारी दी है। अंतरिक्ष एजेंसी ने शनिवार को ट्वीट कर कहा- अंतरिक्ष तक पहुंचने के हमारे देश के प्रयासों के तहत, घरेलू और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकियों से विकसित परीक्षण रॉकेट को इग्नेडा से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। इस रॉकेट को प्रमुख तुर्की हथियार और मिसाइल निमार्ता रोकेटसन द्वारा विकसित किया गया है। तुर्की अंतरिक्ष एजेंसी ने बताया कि रॉकेट का इच्छित लक्ष्य 550 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच रहा है।
इसरो ने दी बधाई; कहा- अंतरिक्ष यात्रा में एक और मुलाकातएबीएन नॉलेज डेस्क। भारत के बाद अब रूस ने भी लूनर मिशन लूना-25 लॉन्च कर दिया है। 47 साल बाद रूस ने अपना यान भेजा है। शुक्रवार को लॉन्च किये जाने वाले इस चंद्रयान मिशन के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रूसी अंतरिक्ष एजेंसी को बधाई दी। इसरो ने यह भी कामना की कि चंद्रयान-3 और लूना-25 दोनों मिशन अपने लक्ष्य हासिल करें।रूसी अंतरिक्ष एजेंसी को दी बधाईइसरो ने कहा कि लूना-25 के सफल लॉन्च पर रोस्कोस्मोस को हमारी तरफ से बधाई। हमारी अंतरिक्ष यात्रा में एक और मुलाकात होना अद्भुत है। उसने कहा कि चंद्रयान-3 और लूना-25 मिशनों को अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए शुभकामनाएं। बता दें कि रोस्कोस्मोस रूसी अंतरिक्ष एजेंसी है।47 साल बाद रूस ने भेजा अपना यानशुक्रवार को लॉन्च किये जाने वाले लूना-25 मिशन के बारे में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने भी पुष्टि की है। इससे पहले रोस्कोस्मोस ने साल 1976 में लूना-24 को लॉन्च किया था। 47 साल बाद रूस ने अपना यान भेजा है। मॉस्को से करीब 5500 किलोमीटर पूर्व में स्थित अमूर ओब्लास्ट के वोस्तोनी कॉस्मोड्रोम से लूना 25 की लॉन्चिंग की गयी। कहा जा रहा है कि भारत के चंद्रयान-3 से पहले रूस का लूना-25 चांद पर कदम रखेगा।7-10 दिनों तक चांद के चक्कर लगायेगा रूसी लैंडररूसी मीडिया के अनुसार, शुक्रवार 11 अगस्त को सुबह 4.40 बजे रूस के वोस्तोनी कॉस्मोड्रोम से लूना- 25 लैंडर की लॉन्चिंग की। लूना- 25 को सोयुज 2.1 बी रॉकेट में चांद पर भेजा गया है। इसे लूना-ग्लोब मिशन का नाम दिया गया है। रॉकेट की लंबाई करीब 46.3 मीटर है, वहीं इसका व्यास 10.3 मीटर है। रूस की अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस का कहना है कि लूना-25 चांद की ओर निकल चुका है। पांच दिनों तक यह चांद की तरफ बढ़ेगा। इसके बाद 313 टन वजनी रॉकेट 7-10 दिनों तक चांद का चक्कर लगायेगा। उम्मीद है कि 21 या 22 अगस्त को यह चांद की सतह पर पहुंच जायेगा।नासा ने किया था पानी मिलने का दावारूसी मीडिया के अनुसार, रूस की योजना है कि लैंडर को चांद के दक्षिणी पोल पर उतरेगा। जानकारों का कहना है कि चांद के इसी पोल पर पानी मिलने की संभावना है। बता दें, 2018 में नासा ने कहा था कि चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी है। लूना- 25 में रोवर और लैंडर हैं। इसका लैंडर करीब 800 किलो का है। लूना- 25 सॉफ्ट लैंडिंग की प्रैक्टिस करेगा। लैंडर में एक खास यंत्र है, जो सतह की छह इंच की खुदाई करेगा। लूना- 25 पत्थर और मिट्टी के सैंपल जमा करेगा। इससे जमे हुए पानी की खोज हो सकती है। रूस का मकसद है कि भविष्य में जब भी इंसान चांद पर अपना बेस बनाये तो उसके लिए पानी की समस्या न हो।चंद्रयान- 3 से पहले रूस कर सकता है चांद पर लैंडउम्मीद जतायी जा रही है कि 21 या 22 अगस्त को यह चांद की सतह पर पहुंच जायेगा। वहीं, चंद्रयान-3 भारत ने 14 जुलाई को लॉन्च किया था, जो 23 अगस्त को चांद पर लैंड करेगा। लूना- 25 और चंद्रयान-3 के चांद पर उतरने का समय करीब-करीब एक ही होगा। लूना कुछ घंटे पहले चांद की सतह पर लैंड करेगा। रूस इससे पहले 1976 में चांद पर लूना-24 उतार चुका है। विश्व में अबतक जितने भी चांद मिशन हुए हैं, वे चांद के इक्वेटर पर पहुंचे हैं। लेकिन अगर लूना-25 सफल हुआ तो ऐसा पहली बार होगा कि कोई देश चांद के साउथ पोल पर लैंड करे।
इसरो ने दी बड़ी अपडेट, अब बस इतना सफर बाकीएबीएन नॉलेज डेस्क। भारत का तीसरा चंद्र मिशन चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह के और भी करीब पहुंच गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बुधवार दोपहर को चंद्रयान -3 अंतरिक्ष यान की कक्षा को और कम करने और इसे चंद्रमा की सतह के और भी करीब ले जाने के लिए एक और महत्वपूर्ण पैंतरेबाज़ी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। कक्षा को और कम करने के लिए दूसरा ऑपरेशन 13:00 से 14:00 बजे के बीच किया गया। इसरो ने एक ट्वीट में कहा कि चंद्रयान-3 मिशन चंद्रमा की सतह के और भी करीब।अगला ऑपरेशन 14 अगस्त, 2023 कोइसरो ने कहा कि आज किये गये युद्धाभ्यास के बाद चंद्रयान-3 की कक्षा घटकर 174 किमी x 1437 किमी रह गयी है। इसरो ने कहा कि अगला ऑपरेशन 14 अगस्त, 2023 को 11:30 से 12:30 बजे IST के बीच निर्धारित है। 5 अगस्त को चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान को चंद्र कक्षा में स्थापित किये जाने के बाद, रविवार की देर रात इसने नियोजित कक्षा कटौती प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था।चंद्रमा की सतह के और करीब चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान इंजनों की रेट्रोफायरिंग ने अंतरिक्ष यान को चंद्रमा की सतह के 170 X 4313 किमी के करीब ला दिया है। यह युद्धाभ्यास चंद्रयान-3 की कक्षा को धीरे-धीरे कम करने और इसे चंद्र ध्रुवों पर स्थापित करने के लिए योजनाबद्ध युद्धाभ्यासों की श्रृंखला में पहला था। चंद्र बाउंड ऑर्बिट पैंतरेबाज़ी रविवार रात 22:30 बजे से 23:30 बजे के बीच की गयी।एंटीना से की जा रही है निगरानीइसरो ने कहा कि जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ रहा है, चंद्रयान-3 की कक्षा को धीरे-धीरे कम करने और इसे चंद्र ध्रुवों पर स्थापित करने के लिए कई युक्तियों की योजना बनायी गयी है। कुछ युद्धाभ्यासों के बाद, प्रणोदन मॉड्यूल कक्षा में रहते हुए लैंडर से अलग हो जायेगा। इसके बाद, 23 अगस्त को चंद्रमा के अब तक अनछुए दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सॉफ्ट लैंडिंग की सुविधा के लिए जटिल ब्रेकिंग युद्धाभ्यास की एक श्रृंखला को अंजाम दिया जायेगा। अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि चंद्रयान-3 की सेहत सामान्य है। पूरे मिशन के दौरान, अंतरिक्ष यान के स्वास्थ्य की लगातार इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) में मिशन ऑपरेशंस कॉम्प्लेक्स (एमओएक्स), बेंगलुरु के पास बयालू में इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क (आईडीएसएन) एंटीना से निगरानी की जा रही है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत का मिशन चंद्रयान-3 कामयाबी की नयी इबारत लिखने को तैयार है। चांद की दहलीज अब महज चंद कदम दूर है। पांच अगस्त को चंद्रयान-3 सफलतापूर्वक लूनर ऑर्बिट में दाखिल हो चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं, लैंडिंग से पहले चंद्रयान-3 से करीब इक्कीस सौ (2100) किलोग्राम वजन छू-मंतर हो जायेगा। अब आप पूछेंगे कि ऐसा कैसा हो जायेगा? बता दें कि चंद्रयान का कुल वजन करीब 3 हजार 900 किलोग्राम है। वजन के मुताबिक हम इसे तीन हिस्सों में बांट लेते हैं; पहला प्रोपल्शन मॉड्यूल, दूसरा लैंडर और तीसरा रोवर। इन तीनों हिस्सों में प्रोपल्शन मॉड्यूल का वजन सबसे ज्यादा है, यानी 2148 (इक्कीस सौ अड़तालीस) किलोग्राम। लैंडर मॉड्यूल का वजन 1752 किलोग्राम जबकि रोवर प्रज्ञान का वजन महज 26 किलोग्राम है। लैंडिंग से पहले चंद्रयान का प्रोल्शन मॉड्यूल अलग हो जायेगा, यानि 2100 किलोग्राम वजन कम हो जायेगा। गौरतलब है कि 5 अगस्त को चंद्रयान-3 चांद की ऑर्बिट में दाखिल हो चुका है। इसरो ने बेहद रोचक अंदाज में चंद्रयान-3 के इस पड़ाव की जानकारी दी। इसरो के ट्वीट के मुताबिक चंद्रयान-3 सफलतापूर्वक चांद की कक्षा में दाखिल हो चुका है। चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने के बाद उन्होंने ट्वीट करके अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने लिखा कि चंद्रयान-3 को अब चांद की ग्रेविटी महसूस होने लगी है।तय समय पर लैंड करेगा चंद्रयान-3स्पेस एजेंसी ने ट्वीट कर इस बात की पुष्टि की है। इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 सही गति से आगे बढ़ रहा है और तय प्लान के मुताबिक इसका रोवर चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंड करेगा। लेकिन इससे पहले कई जटिल प्रक्रिया बाकी हैं। सबसे पहले इसको ऑर्बिट बदलकर पेरील्यून तक पहुंचाना है। बता दें कि पेरील्यून का मतलब चांद की सबसे करीबी कक्षा से है। इसकी शुरुआत 6 अगस्त की रात 11 बजे से होनी है। इसरो का मिशन ऑपरेशन कॉम्प्लेक्स टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क चंद्रयान के हर मूवमेंट पर नजर बनाये हुए है। यहीं से उसे कमांड भेजकर स्पीड को कंट्रोल किया जायेगा। कई जटिल प्रक्रियाओं के बाद 23 अगस्त 2023 को ये चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव इलाके में सॉफ्ट लैंडिंग करेगा।चंद्रयान-3 में किये गये हैं कई बदलावइसरो के सूत्रों के हवाले से बताया है कि चंद्रयान 3 को चंद्रमा के करीब लाने के लिए अभी और चार मैनूवर, यानी प्रक्रिया करनी होगी, जिसके तहत चंद्रयान-3 को 6 अगस्त को पेरील्यून में इस्टैब्लिश किया जायेगा। उसके बाद 17 अगस्त तक तीन और प्रक्रिया होंगी जिसके बाद लैंडिंग मॉड्यूल, जिसमें लैंडर और रोवर शामिल हैं, प्रपल्शन मॉड्यूल से अलग हो जायेगा। इसके बाद चंद्रमा पर अंतिम लैंडिंग से पहले लैंडर पर डी-ऑर्बिटिंग प्रक्रिया होगी।
देश में चलेगी खास ट्रेन, इस डबल डेकर ट्रेन में 20 कोच होंगे। इस डबल डेकर ट्रेन में 20 कोच होंगे एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश में आपको जल्द ही ऐसी ट्रेन पटरियों पर दौड़ती नजर आयेगी, जिसके ऊपरी डेक पर यात्री बैठे होंगे और नीचे के डिब्बे में सामान भरा होगा। यानी एक ही ट्रेन में दो तरह का काम- पैसेंजर और सामान की ढुलाई साथ-साथ। इस डबल डेकर ट्रेन का निर्माण रेल कोच फैक्टरी कपूरथला में हो रहा है।बैली फ्रेट कॉन्सेप्ट के तहत चलाई जाने वाली इन ट्रेनों के कोच का ट्रायल इसी महीने के आखिर तक होने की उम्मीद है। शुरू में दो डबल डेकर ट्रेन बनाने की योजना है। ट्रेन के ऊपरी कोच में 46 यात्रियों के लिए जगह होगी तो नीचे के डिब्बे में 6 टन तक माल आ सकेगा। इन टू इन वन डबल डेकर ट्रेनों को चलाने का सुझाव कोरोना महामारी के दौरान आया था जब यात्री आवागमन बिल्कुल ठप हो गया था। रेल कोच फैक्टरी कपूरथला के एक अधिकारी ने बताया कि रेलवे बोर्ड को तीन डिजाइन सुझाये गए थे। इनमें से एक को पास किया गया है। एक कोच के निर्माण पर 2.70 करोड़ से 3 करोड़ के बीच खर्च आयेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, आरसीएफ कपूरथला के जनरल मैनेजर आशीष अग्रवाल का कहना है कि रेल कोच फैक्टरी में पहली कार्गो लाइनर ट्रेन बनाई जा रही है। इस ट्रेन के कोच के इसी महीने रोल आउट होने की पूरी संभावना है। अग्रवाल का कहना है कि इस ट्रेन का डिजाइन काफी अनूठा है और यह पूरी पूर्ण रूप से वातानूकुलित होगी। अग्रवाल का कहना है कि इस ट्रेन के कोच का प्रोटोटाइप जल्द बन जायेगा। फिर इसे रेलवे मंत्रालय के शोध और विकास संगठन, रिसर्च डिजाइन एंड स्टैडर्ड्स आगेर्नाइजेशन के पास ट्रायल के लिए भेजा जायेगा। ट्रायल के सफल होने पर आरसीएफ और कोचेच का निर्माण करेगा। एक ट्रेन में होंगे 20 कोच सूत्रों का कहना है कि रेलवे की योजना शुरूआत में दो टू इन वन डबल डेकर ट्रेनें चलाने की है। हर एक ट्रेन में 20 कोच होंगे। इन ट्रेनों को कार्गो लाइनर कॉन्सेप्ट पर रोल आउट किया जाएगा और ये निर्धारित रूट रेगुलर चलेंगी। यह ट्रेन अलग-अलग तरह के सामान ढो सकती है। दो स्टेशनों के बीच जिन सामानों की ढुलाई का आॅर्डर मिलेगा, वे सभी सामान यह डबल डेकर ट्रेन लेकर चलेगी। साथ में यात्री भी सफर करेंगे।
सौर मंडल के बाहर कर रहा काम, वैज्ञानिक भी हैरानएबीएन नॉलेज डेस्क। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के सुदूर यान वॉयेजर 2 ने धरती पर संकेत भेजे हैं। गौरतलब है कि नासा का वॉयेजर से संकेत कट गया था और अब नासा के वैज्ञानिकों की कोशिशों से फिर से यान से संपर्क स्थापित किया गया तो वैज्ञानिकों को वॉयेजर 2 ने फिर से संकेत पृथ्वी पर भेजे हैं।वॉयेजर ने धरती पर फिर भेजे संकेतबता दें कि नासा ने साल 1977 में अन्य ग्रहों का पता लगाने और हमारे ब्रह्मांड के बाहर मानवता के प्रतीक के रूप में वॉयेजर 2 यान को अंतरिक्ष में लॉन्च किया था। अब यह यान पृथ्वी से 12.3 बिलियन मील दूर है और हमारे सौर मंडल से भी परे है। नासा की जेट प्रोपेल्शन लेबोरेट्री ने बताया कि वॉयेजर 2 को भेजे गये नियोजित आदेशों की एक श्रृंखला के चलते इसका एंटीना अनजाने में पृथ्वी से दो डिग्री दूर चला गया। इसके कारण वॉयेजर से नासा का संपर्क टूट गया।मंगलवार को नासा के विशेषज्ञों की टीम ने वायेजर 2 से संपर्क साधने के अंतिम प्रयास के तहत डीप स्पेस नेटवर्क की मदद ली और चमत्कारिक रूप से वॉयेजर 2 से फिर से संपर्क स्थापित हो गया और उसने धरती पर संकेत भेजे। इससे साफ हो गया कि वॉयेजर 2 अभी भी काम कर रहा है।वॉयेजर 2 ने कई ग्रहों को खोजावॉयेजर 2 ने सौर मंडल छोड़ने से पहले बृहस्पति और शनि गृह की खोज की और यूरेनस और नेपच्यून ग्रहों जाने वाला पहला स्पेसक्राफ्ट बना। नासा का वॉयेजर 2 यान अंतरतारकीय माध्यम (इंटरस्टेलर मीडियम) में प्रवेश कर चुका है और धरती से करीब 15 बिलियन मील दूर है। वॉयेजर 2 यान में 12 इंच की सोने की परत चढ़ी तांबे की प्लेट लगी हैं। इनका उद्देश्य आलौकिक लोगों को हमारी दुनिया की कहानी सुनाना है। साथ ही इस यान में हमारे सौर मंडल का नक्शा, रेडियोएक्टिव घड़ी के रूप में एक यूरेनियम का टुकड़ा है, जो यह बताता है कि यान किस तारीख में लॉन्च हुआ। साथ ही यान में प्रतीकात्मक निर्देश हैं, जो यह बताते हैं कि रिकॉर्ड को कैसे चलाना है।मशहूर अंतरिक्ष विज्ञानी कार्ल सेगन की अध्यक्षता में एक समिति ने यह तय किया था कि यान के साथ क्या-क्या भेजा जायेगा। वॉयेजर 2 का पावर बैंक कुछ समय बात खत्म हो जायेगा, जिसकी वजह से वॉयेजर 2 करीब साल 2025 तक संचालित होगा लेकिन उसके बाद भी यह यान आकाशगंगा में घूमता रहेगा।
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