कई असाध्य बीमारियों का समुचित इलाज भी है मां की जयन्तीकहीं आप भी तो बर्बाद नहीं कर रहे मां की असली औषधिपंडित रामदेव पाण्डेय एबीएन नॉलेज डेस्क। नवरात्र के ये भी तीन चरण हैं : नवपत्रिका, जयश्री और विग्रह /मूर्ति/ सन्निधि, यह जौ जव/ जयन्ती (बार्ली) है इसकी आयुर्वेद में बड़ी महता है। इसे फेंकें नहीं, इसकी जड़ सहित बालु मिट्टी से दशमी को उखाड़ें और पानी में धो दें। फिर सुखा दें और ड्राई करें। फिर पाउडर बना लें और दो चम्मच सुबह शाम खायें। ये बार्ली पेड़ी पाउडर 2000 रुपये प्रति किलो बाजार में बिकता है। जयन्ती क्या हैजयन्ती जव का वह रुप है जो नौ दिनों का अंकुरित बीज और पौधा है। इसे नवरात्रि में बालु मिट्टी में कलश के नीचे रखा जाता है। इसे पहले दिन साफ कर धोकर बालु में मिलाते हैं। फिर इसे बालू में डालकर इसपर बालू में बीच में गड्ढा कर कलश रखा जाता है। विधान तो तांबा या पीतल रखने का है, पर मिट्टी कलश भी रखते हैं। रोज इसमें गंगा जल, पंचामृत, सर्वोषधि, महोषधि का जल डाला जाता है और इसमें दुर्गा देवी की पूजा की जाती है। इसी आदिशक्ति की जिसने ब्रह्मांड का निर्माण किया है। महाविष्फोट से इसके साथ ही नव दुर्गा शक्ति की आराधना, पंचदेव (जो प्रकृति के पांच तत्वों के प्रतीक हैं) इनकी अराधना की जाती है। दुर्गा सप्तशती के पाठ से उच्चरित ध्वनि, घंटा की ध्वनि इस जौ (बार्ली) के नव अंकुरित पौधों में प्रवाहित होती है। इसमें इतनी ऊर्जा होती है कि दशमी के दिन दाहिने कान पर रखने से ही यजमान का कल्याण करती है। तो इसके सेवन से अंदाज लगायें कितनी ऊर्जा शरीर में जायेगी।इसमें कौन-कौन से विटामिन-खनिज हैं, जो आदिकाल से हमारे पूर्वज इस जयंती को हर घर में सालों भर संजोकर रखते थे और स्वास्थ्य संबंधी लाभ के लिए चूर्ण के रूप में पान करते थे। परंतु अज्ञानता में हम नदी में बहा रहे हैं और पर्यावरण को पीड़ित कर रहे हैं।जयंती का स्वरस 20 मिली और सुखाकर पाउडर बनाकर एक चम्मच सुबह-शाम खाली पेट लेने से असाध्य रोगों में अत्यंत लाभकारी है। इसे ग्रीन ब्लड भी कह सकते हैं, जो एंटी आॅक्सीडेंट से भरपूर है। इसके सेवन से विटामिन बी1, विटामिन बी2, विटामिन बी5 प्रचुर मात्रा में मिलती है। इसके रस के सेवन से आयरन की कमी दूर होती है। साथ ही अनिद्रा, एसिडिटी, अपच, गैस, पेट फूलना, जोड़ों के दर्द, आम वात, गठिया, त्वचा के रोग, धातु रोग, स्त्री और पुरुष दोनों में लाभकारी होता है। बालों का झड़ना, मधुमेह, मोटापा, थायराइड, त्वचा की झुर्रियों में भी लाभदायक है और ये एंटी एजिंग है। मतलब बुढ़ापे को दूर करता है। आंखों की रोशनी अगर कम हो रही हो, तो इसका सेवन लगातार करने से अत्यंत लाभकारी साबित हो सकती है। इसके रस के कुल्ला करने से दांतों के पायरिया और मुंह के छालों में भी लाभकारी है। कुल मिलाकर ये जयंती अमृत तुल्य है। - डा. पीएन पाण्डेय, दक्ष आयुर्वेद, रांची।
भारत में दृश्य नहीं होगा यह ग्रहणएबीएन नॉलेज डेस्क। अक्टूबर का महीने बेहद खास माना जा रहा है, क्योंकि इस महीने साल का आखिरी सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। साल का दूसरा और आखिरी सूर्य ग्रहण 14 अक्टूबर दिन शनिवार को आश्विन अमावस्या के दिन कन्या राशि और चित्रा नक्षत्र में लगेगा। इस दिन सर्व पितृ अमावस्या भी है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रहण को महत्वपूर्ण खगोलीय घटनाओं में गिना जाता है और इसे आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस बार लगने वाला सूर्य ग्रहण वलयाकार होगा। यह ग्रहण 14 अक्टूबर को रात 08 बजकर 34 मिनट से शुरू होगा और रात 02 बजकर 25 मिनट पर समाप्त हो जायेगा। यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इस ग्रहण का सूतक काल नहीं माना जायेगा। यह ग्रहण कन्या राशि और चित्रा नक्षत्र में होगा। लेकिन इस सूर्य ग्रहण का प्रभाव राशि चक्र की सभी 12 राशियों पर पड़ेगा।
चंद्रयान 3 के रोवर प्रज्ञान ने वह काम कर दिया है जिसकी हमें उम्मीद थी, इसरो प्रमुख ने दी बड़ी जानकारीएबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख एस. सोमनाथ ने बृहस्पतिवार को कहा कि उनके चंद्र मिशन चंद्रयान-3 के रोवर प्रज्ञान ने वह काम कर दिया है जो इससे किए जाने की अपेक्षा की गयी थी और यदि यह वर्तमान निष्क्रिय अवस्था (स्लीप मोड) से सक्रिय होने में विफल रहता है तो भी कोई समस्या नहीं होगी। वह गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में सोमनाथ मंदिर दर्शन करने गये थे और इसके बाद यहां संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी अब एक्सपीओसैट या एक्स-रे पोलरिमीटर उपग्रह प्रक्षेपण के लिए तैयारी कर रही है और यह प्रक्षेपण नवंबर या दिसंबर में किया जा सकता है।चंद्रमा पर वर्तमान में प्रज्ञान के सुप्तावस्था या निष्क्रिय अवस्था में होने की स्थिति पर इसरो प्रमुख ने कहा कि चंद्रमा पर तापमान शून्य से लगभग 200 डिग्री सेल्सियस नीचे जाने पर अत्यधिक प्रतिकूल मौसम के कारण इसके इलेक्ट्रॉनिक सर्किट यदि क्षतिग्रस्त नहीं हुए हैं, तो यह फिर से सक्रिय हो जायेगा। उन्होंने कहा कि यदि यह सक्रिय नहीं हुआ तो भी ठीक है क्योंकि रोवर ने वह काम कर दिया है जो इससे करने की अपेक्षा की गयी थी। इसरो ने पिछले सप्ताह कहा था कि चंद्रमा पर सुबह होने के साथ ही चंद्रयान-3 के सौर ऊर्जा से संचालित लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान के साथ संपर्क स्थापित कर इन्हें फिर से सक्रिय करने का प्रयास कर रहा है ताकि वे वैज्ञानिक प्रयासों को जारी रख सकें। चंद्रमा पर रात होने से पहले, लैंडर और रोवर दोनों क्रमशः चार और दो सितंबर को निष्क्रिय अवस्था में चले गये थे। सोमनाथ ने आगामी मिशन के बारे में कहा कि इसरो अब एक्सपीओसैट या एक्स-रे पोलरिमीटर उपग्रह के लिए तैयारी कर रहा है। उन्होंने कहा- यह एक्सपोसैट तैयार है और इसे हमारे पीएसएलवी रॉकेट के जरिए प्रक्षेपित किया जायेगा। हमने अभी तक किसी तारीख की घोषणा नहीं की है, लेकिन इसका प्रक्षेपण नवंबर या दिसंबर में किया जा सकता है। सोमनाथ ने कहा कि एक और मिशन इन्सैट-3डीएस की भी तैयारी है, जो एक जलवायु उपग्रह है और जिसे दिसंबर में प्रक्षेपित किया जायेगा। उन्होंने कहा कि फिर हम एसएसएलवी डी3 का प्रक्षेपण करेंगे। जैसा कि आप जानते हैं यह हमारा लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान है। यह तीसरा प्रक्षेपण है। यह प्रक्षेपण नवंबर या दिसंबर में किया जायेगा। इसके बाद नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार या निसार की बारी आयेगी। इसे अगले साल फरवरी में प्रक्षेपित किया जायेगा। उन्होंने कहा कि गगनयान मिशन के परीक्षण यान डी1 का प्रक्षेपण अक्टूबर में किया जायेगा।
Google 25th Birthdayबदल गया Logo! अब Google नहीं G25gle है नयी पहचान?एबीएन नॉलेज डेस्क। आज गूगल 25 साल का हो गया है, जिसे सेलिब्रेट करने के लिए एक खास तरह का डूडल तैयार किया गया है। इसमें आप Google को G25gle के तौर पर देख सकते हैं। इन 25 सालों में Google ने खुद इंटरनेट की दुनिया के सबसे बड़े नाम के तौर पर पेश किया। आज बच्चा-बच्चा गूगल का नाम जानत है। ये अब महज एक सर्च इंजन से कई ज्यादा बढ़कर लोगों की जरूरत बन गया है, मगर क्या आप जानते हैं कि गूगल का असल नाम Google था ही नहीं...। जी हां...।ये तो महज एक गलती थी, जिसे बाद में कभी सुधारा ही नहीं गया। असल में 1998 से शुरू हुआ गूगल, पहले BackRub नाम से शुरू किया जाना था। उस वक्त इसके दोनों फाउंडर लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन, अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे थे। दोनों ने मिलकर इस सर्च इंजन को तैयार किया और 4 सितंबर 1998 को इसकी शुरुआत कर दी।एक गलती से शुरू हुआ Googleहालांकि तब के BackRub (आज Google) को जब रजिस्टर कराने की बारी आयी, तो दोनों ने इसका नाम GOOGOL रखने का फैसला किया, जो एक गणित टर्म है, जिसका अर्थ है 1 और 00 यानी 100. मगर सबसे बड़ी गलती यहीं हुई, दरअसल रजिस्ट्रेशन के दौरान गलती से GOOGOL का नाम Google कर दिया गया।कुछ समय के लिए लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन इसे लेकर परेशान हुए, मगर फिर उन्हें समझ आया कि गूगल बोलने में काफी आसान है, साथ ही ये लोगों के जुबान पर जल्दी चढ़ता है और लंबे समय तक याद रहता है, लिहाजा इसका नहीं गूगल ही रहने देने का फैसला किया गया।
इसरो सिग्नल भेजता रहा-नहीं जागे विक्रम-प्रज्ञान, क्या खत्म हो गया मिशन चंद्रयान-3?एबीएन नॉलेज डेस्क। चंद्रयान-3 के लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान चांद के साउथ पोल पर हैं। पिछले 4 सितंबर को ही इसरो ने इन्हें स्विच ऑफ कर दिया था, ताकि चांद पर नयी सुबह होने पर इनसे फिर काम लिया जा सके, शुक्रवार को इसरो ने लगातार सिग्नल भेजे, लेकिन अभी तक लैंडर और रोवर ने इन्हें रिसीव नहीं किया है।चंद्रयान-3 मिशन का अगला पड़ाव इसरो के लिए मुश्किल भरा नजर आ रहा है। चांद की सतह पर सो रहे लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान अब तक जाग नहीं सके हैं।शुक्रवार को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की ओर से इसे लगातार वेकअप सिग्नल भेजे गये, लेकिन अभी तक इन सिग्नलों को रिसीव नहीं किया गया है। इसरो ने हार न मानने की बात कही है और इस बात का ऐलान किया है कि वह लगातार कोशिश में जुटा रहेगा। चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग के बाद चंद्रयान-3 के लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर ने चांद पर पूरा एक दिन बिताया। इस दौरान विक्रम और प्रज्ञान के साथ गये पेलोड ने इसरो तक चांद की सतह के बारे में कई जानकारियां भेजीं। इसरो वैज्ञानिकों के मुताबिक चंद्रयान-3 मिशन का उद्देश्य पूरा हो चुका है। अब कोशिश ये है कि विक्रम और प्रज्ञान को एक बार फिर जगाकर अतिरिक्त जानकारियां जुटायी जायें, जिससे आने वाले चंद्र मिशनों में लाभ मिले। हालांकि अभी ये कोशिश सफल होते नहीं दिख रही है। चांद पर एक दिन धरती के 14 दिन के बराबर होता है। 23 अगस्त को चंद्रयान-3 का लैंडर विक्रम ने चांद के साउथ पोल पर सफल लैंडिंग कर ली थी। उसके बाद से तकरीबन 11 दिन तक रोवर ने चांद की सतह से खनिजों, भूकंपीय गतिविधियों और प्लाज्मा के बारे में कई अहम जानकारियां इसरो को उपलब्ध करायी। इस मिशन को 7 सितंबर तक के लिए डिजाइन किया गया था।हालांकि 3 दिन पहले ही इसरो ने विक्रम और लैंडर को स्विच ऑफ कर दिया था, ताकि इसमें बैटरी बाकी रहे और 14 दिन की रात के बाद जब चांद पर फिर सवेरा हो, तो इन्हें फिर एक्टिव कर दिया जाये। शुक्रवार को इसरो ने यही कोशिश की, जो नाकाम रही।
चंद्रयान-3 :चांद के दक्षिण ध्रुव पर सूर्योदय के बाद बढ़ीं उम्मीदेंएबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने चंद्रयान-3 मिशन के विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर के साथ फिर से संपर्क स्थापित करने की तैयारी कर रहा है। लैंडर और रोवर को पिछले पंद्रह दिनों से स्लीप मोड में रखा गया है। हालांकि, शिव शक्ति पॉइंट पर सूरज की रोशनी आने के साथ ही उनके परिचालन स्थितियों में सुधार होने की उम्मीद है।रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसरो ने बताया कि चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र में चंद्रयान-3 लैंडिंग साइट पर सूर्योदय हो गया है और वे बैटरी के रिचार्ज होने का इंतजार कर रहे हैं। अधिकारियों ने बताया कि उन्हें विक्रम लैंडर और प्रज्ञान के साथ फिर से संचार स्थापित होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि सूर्योदय मिशन के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है क्योंकि यह लैंडर और रोवर को अपना काम जारी रखने लिए आवश्यक गर्मी प्रदान करेगा। इसरो ने कहा है कि वे 22 सितंबर को संचार प्रयासों को शुरू करने से पहले तापमान के एक निश्चित स्तर से ऊपर बढ़ने का इंतजार करेंगे। 14 जुलाई, 2023 को लॉन्च किया गया चंद्रयान -3 मिशन पहले ही महत्वपूर्ण मील के पत्थर हासिल कर चुका है। इसने भारत को चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाले चौथे देश और चंद्र के दक्षिणी ध्रुव के पास ऐसा करने वाला पहला देश बनाया। मिशन का प्राथमिक उद्देश्य इस वैज्ञानिक रूप से पेचीदा क्षेत्र का पता लगाना है। माना जाता है कि इसमें पर्याप्त मात्रा में जमा हुआ पानी है।विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर 23 अगस्त को अपनी लैंडिंग के बाद से विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने चंद्रमा के आयनमंडल में इलेक्ट्रॉन घनत्व को मापा है और चंद्र सतह का तापमान रीडिंग लिया है। प्रज्ञान रोवर ने चंद्रमा की सतह पर विक्रम लैंडर की पहली छवि भी कैप्चर की। हालांकि, चंद्र रात ने परिचालन को रोक दिया क्योंकि सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों की बैटरी सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में अपने सिस्टम को चालू रखने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नहीं थीं। चंद्रमा की सुबह के साथ इसरो को उम्मीद है कि यदि इलेक्ट्रॉनिक्स सर्द रात में जीवित रहने में सक्षम होते हैं तो मिशन अपने अभूतपूर्व अन्वेषण को फिर से शुरू कर सकता है।
यहां महासागर और जीवन भी, नासा को मिले संकेएबीएन नॉलेज डेस्क। इस नई खोज ने वैज्ञानिकों को भविष्य की रिसर्च के लिए प्रेरित किया है और सोलर सिस्टम के बारे में उनकी समझ को काफी हद तक बदल दिया है। कुछ खगोल वैज्ञानिक मानते हैं कि ये घटना एक्सोप्लैनेट पर जीवन की तलाश की दिशा में एक नयी उम्मीद जगाती है।अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने एक दूसरी धरती को खोज निकाला है, जहां पानी से भरा समुद्र होने के संकेत भी मिले हैं। नासा ने दावा किया है कि उसके जेम्स वेब टेलीस्कोप ने इस कारनामे को अंजाम दिया है।इस टेलीस्कोप ने सौर मंडल के बाहर एक सुदूर ग्रह यानि एक्सोप्लैनेट का निरीक्षण किया है और इसके डेटा से पता चलता है कि इस दूसरी धरती की सतह पानी से ढकी हो सकती है। वैज्ञानिकों ने इस एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल के भीतर मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड की मौजूदगी का पता लगाया है।धरती से 8.6 गुना बड़ा नया गोलाअनुमान है कि ये गोला धरती से तकरीबन 8.6 गुना बड़ा है- जो पृथ्वी और नेप्च्यून के आकार के बीच है। हाइड्रोजन से भरपूर वातावरण के नीचे एक जलीय महासागर की मौजूदगी के भी कयास लगाये जा रहे हैं। इसके साथ ही इस ग्रह पर एक ऐसा रसायन मिला है जो संभावित जीवन की तरफ इशारा करता है।जेम्स वेब टेलिस्कोप से मिले संकेतों से पता चलता है कि के2-18 बी एक हाइसीन एक्सोप्लैनेट हो सकता है, जहां हाइड्रोजन से भरपूर वातावरण है और इसके महासागर से ढंका भी हो सकता है। नासा ने अपनी वेबसाइट पर जानकारी दी है कि इस रहने लायक इलाके वाले एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल की खासियत के बारे में शुरुआती जानकारी हबल स्पेस टेलीस्कोप के जरिये मिली है।इस नई खोज ने वैज्ञानिकों को भविष्य की रिसर्च के लिए प्रेरित किया है और सोलर सिस्टम के बारे में उनकी समझ को काफी हद तक बदल दिया है। कुछ खगोल वैज्ञानिक मानते हैं कि ये घटना एक्सोप्लैनेट पर जीवन की तलाश की दिशा में एक नई उम्मीद जगाती है।यहां नया महासागर होने की उम्मीदके2-18बी रहने लायक इलाके में ठंडे और छोटे से तारे के2-18 की परिक्रमा करता है, जो हमारी धरती से 120 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। के2-18 बी जैसे सुदूर ग्रह यानि एक्सोप्लैनेट सौर मंडल की किसी भी चीज से बेहद अलग हैं, जिनका आकार धरती और नेपच्यून के बीच है। नासा के वैज्ञानिक कहते हैं कि सौर मंडल के नजदीक मौजूद न ग्रहों की कमी की वजह से इन्हें अक्सर कम अहमियत दी जाती है। हालांकि इनके वायुमंडल को लेकर खगोल वैज्ञानिकों के बीच सक्रिय बहस होती है।इन नतीजों के बारे में जानकारी देने वाले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के खगोलशास्त्री निक्कू मधुसूदन ने बताया कि परंपरागत रूप से, इस एक्सोप्लैनेट पर जीवन की खोज मुख्य तौर पर छोटे चट्टानी ग्रहों पर केंद्रित रही है। लेकिन बड़े हाइसीन एक्सोप्लैनेट वायुमंडलीय धारणा के लिए बेहद अनुकूल हैं।यहां मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड की मौजूदगी और अमोनिया की कमी इसी वैज्ञानिक सोच को मज़बूत करती है कि के2-18 बी में हाइड्रोजन से लैस वातावरण के नीचे एक जलीय महासागर भी हो सकता है।नासा के केपलर स्पेस टेलीस्कोप ने पहली बार साल 2015 में के2-18 बी की खोज की थी, और तब से लेकर अब तक की गयी रिसर्च ने इसमें जीवन की संभावना की तरफ इशारा किया है। 2019 में, शोधकर्ताओं ने हबल स्पेस टेलीस्कोप का इस्तेमाल करके यह पता लगाया कि के2-18बी के वायुमंडल में पानी की भाप है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य का अध्ययन करने के लिए भारत के पहले अंतरिक्ष-आधारित मिशन आदित्य एल1 ने शुक्रवार तड़के चौथी बार सफलतापूर्वक पृथ्वी की एक कक्षा से अन्य कक्षा में प्रवेश किया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने यह जानकारी दी। अंतरिक्ष एजेंसी से एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा- चौथी बार पृथ्वी की कक्षा परिवर्तन की प्रक्रिया (ईबीएन-4) को सफलतापूर्वक निष्पादित किया गया। मॉरीशस, बेंगलुरु, एसडीएससी-एसएचएआर और पोर्ट ब्लेयर में इसरो के ग्राउंड स्टेशनों ने इस अभियान के दौरान उपग्रह की निगरानी की। आदित्य एल1 की वर्तमान कक्षा 256 किलोमीटर x 121973 किलोमीटर है। इसरो ने कहा कि कक्षा परिवर्तन की अगली प्रक्रिया ट्रांस-लैग्रेजियन पॉइंट 1 इंसर्शन (टीएल1आई) -19 सितंबर को देर रात लगभग दो बजे निर्धारित है। आदित्य-एल1 पहली भारतीय अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला है जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर सूर्य-पृथ्वी के पहले लैग्रेंजियन बिंदु (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा से सूर्य का अध्ययन करने वाली है। पृथ्वी की कक्षा परिवर्तन की पहली, दूसरी और तीसरी प्रक्रिया क्रमशः तीन, पांच और 10 सितंबर को सफलतापूर्वक की गयी थी। पृथ्वी के चारों ओर आदित्य-एल1 की 16-दिवसीय यात्रा के दौरान यह प्रक्रिया की जा रही है, जिसके दौरान आदित्य-एल1 अपनी आगे की यात्रा के लिए आवश्यक गति प्राप्त करेगा। पृथ्वी से जुड़े कक्षा परिवर्तन की चार प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद आदित्य-एल1 अगले ट्रांस-लैग्रेंजियन1 सम्मिलन की कक्षा में प्रवेश की प्रक्रिया से गुजरेगा, जो एल1 लैग्रेंज बिंदु के आसपास गंतव्य के लिए अपने लगभग 110-दिवसीय प्रक्षेप पथ की शुरुआत करेगा। एल1 पृथ्वी और सूर्य के बीच एक संतुलित गुरुत्वाकर्षण स्थान है।
इसरो ने आज सुबह दी अच्छी खबरएबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य अध्ययन के लिए भेजे गये भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पहले सौर खोजी मिशन आदित्य-एल1 ने सफलतापूर्वक तीसरी कक्ष में प्रवेश कर लिया है। इसरो ने बताया कि रविवार तड़के 02.30 बजे इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क ने आदित्य एल 1 सफलतापूर्वक अगली कक्ष में पहुंचाया। अभियान के दौरान मॉरीशस, बेंगलुरु, एसडीएससी-शार और पोर्ट ब्लेयर में इसरो के ग्राउंड स्टेशनों ने उपग्रह पर नजर बनाये रखी गयी। उन्होंने बताया कि नई कक्ष 296 किमी गुणा 71767 किलोमीटर है। अगली चौथी कक्ष में प्रवेश के लिए 15 सितंबर तड़के का समय निर्धारित किया गया है। बता दें कि भारत ने 2 सितम्बर को अपने पहले सूर्य मिशन आदित्य एल-1 को सूर्य और अंतरिक्ष के अध्ययन के लिए प्रक्षेपित किया था। यह सूर्य मिशन पृथ्वी के सबसे नजदीक इस तारे की निगरानी करेगी और सोलर विंड जैसे अंतरिक्ष के मौसम की विशेषताओं का अध्ययन करेगा।
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