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क्या सचमुच मिल गयी दूसरी धरती...
Published / 2023-09-17 09:27:59
क्या सचमुच मिल गयी दूसरी धरती...

यहां महासागर और जीवन भी, नासा को मिले संकेएबीएन नॉलेज डेस्क। इस नई खोज ने वैज्ञानिकों को भविष्य की रिसर्च के लिए प्रेरित किया है और सोलर सिस्टम के बारे में उनकी समझ को काफी हद तक बदल दिया है। कुछ खगोल वैज्ञानिक मानते हैं कि ये घटना एक्सोप्लैनेट पर जीवन की तलाश की दिशा में एक नयी उम्मीद जगाती है।अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने एक दूसरी धरती को खोज निकाला है, जहां पानी से भरा समुद्र होने के संकेत भी मिले हैं। नासा ने दावा किया है कि उसके जेम्स वेब टेलीस्कोप ने इस कारनामे को अंजाम दिया है।इस टेलीस्कोप ने सौर मंडल के बाहर एक सुदूर ग्रह यानि एक्सोप्लैनेट का निरीक्षण किया है और इसके डेटा से पता चलता है कि इस दूसरी धरती की सतह पानी से ढकी हो सकती है। वैज्ञानिकों ने इस एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल के भीतर मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड की मौजूदगी का पता लगाया है।धरती से 8.6 गुना बड़ा नया गोलाअनुमान है कि ये गोला धरती से तकरीबन 8.6 गुना बड़ा है- जो पृथ्वी और नेप्च्यून के आकार के बीच है। हाइड्रोजन से भरपूर वातावरण के नीचे एक जलीय महासागर की मौजूदगी के भी कयास लगाये जा रहे हैं। इसके साथ ही इस ग्रह पर एक ऐसा रसायन मिला है जो संभावित जीवन की तरफ इशारा करता है।जेम्स वेब टेलिस्कोप से मिले संकेतों से पता चलता है कि के2-18 बी एक हाइसीन एक्सोप्लैनेट हो सकता है, जहां हाइड्रोजन से भरपूर वातावरण है और इसके महासागर से ढंका भी हो सकता है। नासा ने अपनी वेबसाइट पर जानकारी दी है कि इस रहने लायक इलाके वाले एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल की खासियत के बारे में शुरुआती जानकारी हबल स्पेस टेलीस्कोप के जरिये मिली है।इस नई खोज ने वैज्ञानिकों को भविष्य की रिसर्च के लिए प्रेरित किया है और सोलर सिस्टम के बारे में उनकी समझ को काफी हद तक बदल दिया है। कुछ खगोल वैज्ञानिक मानते हैं कि ये घटना एक्सोप्लैनेट पर जीवन की तलाश की दिशा में एक नई उम्मीद जगाती है।यहां नया महासागर होने की उम्मीदके2-18बी रहने लायक इलाके में ठंडे और छोटे से तारे के2-18 की परिक्रमा करता है, जो हमारी धरती से 120 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। के2-18 बी जैसे सुदूर ग्रह यानि एक्सोप्लैनेट सौर मंडल की किसी भी चीज से बेहद अलग हैं, जिनका आकार धरती और नेपच्यून के बीच है। नासा के वैज्ञानिक कहते हैं कि सौर मंडल के नजदीक मौजूद न ग्रहों की कमी की वजह से इन्हें अक्सर कम अहमियत दी जाती है। हालांकि इनके वायुमंडल को लेकर खगोल वैज्ञानिकों के बीच सक्रिय बहस होती है।इन नतीजों के बारे में जानकारी देने वाले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के खगोलशास्त्री निक्कू मधुसूदन ने बताया कि परंपरागत रूप से, इस एक्सोप्लैनेट पर जीवन की खोज मुख्य तौर पर छोटे चट्टानी ग्रहों पर केंद्रित रही है। लेकिन बड़े हाइसीन एक्सोप्लैनेट वायुमंडलीय धारणा के लिए बेहद अनुकूल हैं।यहां मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड की मौजूदगी और अमोनिया की कमी इसी वैज्ञानिक सोच को मज़बूत करती है कि के2-18 बी में हाइड्रोजन से लैस वातावरण के नीचे एक जलीय महासागर भी हो सकता है।नासा के केपलर स्पेस टेलीस्कोप ने पहली बार साल 2015 में के2-18 बी की खोज की थी, और तब से लेकर अब तक की गयी रिसर्च ने इसमें जीवन की संभावना की तरफ इशारा किया है। 2019 में, शोधकर्ताओं ने हबल स्पेस टेलीस्कोप का इस्तेमाल करके यह पता लगाया कि के2-18बी के वायुमंडल में पानी की भाप है।

आदित्य एल1 ने चौथी बार सफलतापूर्वक कक्षा परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी की
Published / 2023-09-15 14:43:39
आदित्य एल1 ने चौथी बार सफलतापूर्वक कक्षा परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी की

एबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य का अध्ययन करने के लिए भारत के पहले अंतरिक्ष-आधारित मिशन आदित्य एल1 ने शुक्रवार तड़के चौथी बार सफलतापूर्वक पृथ्वी की एक कक्षा से अन्य कक्षा में प्रवेश किया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने यह जानकारी दी। अंतरिक्ष एजेंसी से एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा- चौथी बार पृथ्वी की कक्षा परिवर्तन की प्रक्रिया (ईबीएन-4) को सफलतापूर्वक निष्पादित किया गया। मॉरीशस, बेंगलुरु, एसडीएससी-एसएचएआर और पोर्ट ब्लेयर में इसरो के ग्राउंड स्टेशनों ने इस अभियान के दौरान उपग्रह की निगरानी की। आदित्य एल1 की वर्तमान कक्षा 256 किलोमीटर x 121973 किलोमीटर है। इसरो ने कहा कि कक्षा परिवर्तन की अगली प्रक्रिया ट्रांस-लैग्रेजियन पॉइंट 1 इंसर्शन (टीएल1आई) -19 सितंबर को देर रात लगभग दो बजे निर्धारित है। आदित्य-एल1 पहली भारतीय अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला है जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर सूर्य-पृथ्वी के पहले लैग्रेंजियन बिंदु (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा से सूर्य का अध्ययन करने वाली है। पृथ्वी की कक्षा परिवर्तन की पहली, दूसरी और तीसरी प्रक्रिया क्रमशः तीन, पांच और 10 सितंबर को सफलतापूर्वक की गयी थी। पृथ्वी के चारों ओर आदित्य-एल1 की 16-दिवसीय यात्रा के दौरान यह प्रक्रिया की जा रही है, जिसके दौरान आदित्य-एल1 अपनी आगे की यात्रा के लिए आवश्यक गति प्राप्त करेगा। पृथ्वी से जुड़े कक्षा परिवर्तन की चार प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद आदित्य-एल1 अगले ट्रांस-लैग्रेंजियन1 सम्मिलन की कक्षा में प्रवेश की प्रक्रिया से गुजरेगा, जो एल1 लैग्रेंज बिंदु के आसपास गंतव्य के लिए अपने लगभग 110-दिवसीय प्रक्षेप पथ की शुरुआत करेगा। एल1 पृथ्वी और सूर्य के बीच एक संतुलित गुरुत्वाकर्षण स्थान है।

आदित्य एल-1 ने सूरज की तरफ बढ़ाया तीसरा कदम
Published / 2023-09-10 14:45:31
आदित्य एल-1 ने सूरज की तरफ बढ़ाया तीसरा कदम

इसरो ने आज सुबह दी अच्छी खबरएबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य अध्ययन के लिए भेजे गये भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पहले सौर खोजी मिशन आदित्य-एल1 ने सफलतापूर्वक तीसरी कक्ष में प्रवेश कर लिया है। इसरो ने बताया कि रविवार तड़के 02.30 बजे इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क ने आदित्य एल 1 सफलतापूर्वक अगली कक्ष में पहुंचाया। अभियान के दौरान मॉरीशस, बेंगलुरु, एसडीएससी-शार और पोर्ट ब्लेयर में इसरो के ग्राउंड स्टेशनों ने उपग्रह पर नजर बनाये रखी गयी। उन्होंने बताया कि नई कक्ष 296 किमी गुणा 71767 किलोमीटर है। अगली चौथी कक्ष में प्रवेश के लिए 15 सितंबर तड़के का समय निर्धारित किया गया है। बता दें कि भारत ने 2 सितम्बर को अपने पहले सूर्य मिशन आदित्य एल-1 को सूर्य और अंतरिक्ष के अध्ययन के लिए प्रक्षेपित किया था। यह सूर्य मिशन पृथ्वी के सबसे नजदीक इस तारे की निगरानी करेगी और सोलर विंड जैसे अंतरिक्ष के मौसम की विशेषताओं का अध्ययन करेगा।

आज कक्षा बदलने की पहली प्रक्रिया पूरी करेगा आदित्य एल-1
Published / 2023-09-03 16:08:41
आज कक्षा बदलने की पहली प्रक्रिया पूरी करेगा आदित्य एल-1

जानें सूरज तक पहुंचने के पहले चरण पर सबकुछएबीएन नॉलेज डेस्क। इसरो ने जानकारी दी है कि उसका सूर्य मिशन आदित्य एल1 अपनी पहली कक्षा में बदलाव करेगा। इसरो रविवार को सुबह करीब 11.45 बजे पहली अर्थ बाउंड फायरिंग करेगा। इससे पहले शनिवार को इसरो ने पीएसएलवी सी57 लॉन्च व्हीकल से आदित्य एल1 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से हुई। यह मिशन भी चंद्रयान-3 की तरह पहले पृथ्वी की परिक्रमा करेगा और फिर यह तेजी से सूरज की दिशा में उड़ान भरेगा।पृथ्वी की कक्षा में 16 दिन बितायेगा आदित्य एल1इसरो ने बताया कि आदित्य एल1 ने पावर जेनरेट करना शुरू कर दिया है। अर्थ बाउंड मैनुवर्स की मदद से यह फायरिंग की जायेगी। इससे आदित्य एल1 अपनी कक्षा बदलकर अगली कक्षा में प्रवेश करेगा। आदित्य एल1 पृथ्वी की कक्षा में 16 दिन बितायेगा। इस दौरान पांच बार इसकी कक्षा बदलने के लिए अर्थ बाउंड फायरिंग की जायेगी।110 दिन बाद लैग्रेंजियन पॉइंट पर पहुंचेगा आदित्य एल1110 दिन की यात्रा के बाद आदित्य एल1 लैग्रेजियन-1 पॉइंट पर पहुंचेगा। लैग्रेंजियन-1 पॉइंट पहुंचने के बाद आदित्य एल1 में एक और मैनुवर किया जायेगा, जिसकी मदद से आदित्य एल1 को एल1 पॉइंट के हेलो ऑर्बिट में स्थापित किया जायेगा। यही से आदित्य एल1 सूरज की स्टडी करेगा। यह लैग्रेंजियन पॉइंट सूरज की दिशा में पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर है।आदित्य एल1 के साथ सात पेलोड भेजे गये हैं, जो सूरज का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इनमें से चार पेलोड सूरज की रोशनी का अध्ययन करेंगे। वहीं बाकी तीन सूरज के प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करेंगे। इससे पहले इसरो ने सफलतापूर्वक चांद की सतह पर चंद्रयान-3 मिशन के लैंडर को उतारकर इतिहास रच दिया है। ऐसा करने वाला भारत दुनिया का अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बन गया है।

स्लीप मोड में भेजा गया रोवर
Published / 2023-09-03 00:02:08
स्लीप मोड में भेजा गया रोवर

22 सितंबर को मिलेगा अगला अपडेटइसरो ने दी ताजा जानकारीएबीएन नॉलेज डेस्क। इसरो ने शनिवार को रोवर को स्लीप मोड में भेज दिया है। अगला अपडेट अब 22 सितंबर को मिलेगा। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने यह जानकारी दी। इसरो ने सोशल मीडिया एक्स पर कहा कि रोवर ने अपना कार्य पूरा कर लिया। इसे अब सुरक्षित रूप से पार्क किया गया है और स्लीप मोड में सेट किया गया है। एपीएक्सएस और लिब्स पेलोड बंद हैं। इन पेलोड से डेटा लैंडर के माध्यम से पृथ्वी पर प्रेषित किया जाता है। फिलहाल, बैटरी पूरी तरह चार्ज है। सौर पैनल 22 सितंबर, 2023 को अपेक्षित अगले सूर्योदय पर प्रकाश प्राप्त करने के लिए उन्मुख है। रिसीवर चालू रखा गया है। असाइनमेंट के दूसरे सेट के लिए सफल जागृति की आशा! अन्यथा, यह हमेशा भारत के चंद्र राजदूत के रूप में वहीं रहेगा। इससे पहले इसरो चीफ ने प्रमुख एस सोमनाथ ने कि चंद्रमा पर भेजे गये चंद्रयान-3 के रोवर और लैंडर ठीक से काम कर रहे हैं और चूंकि चंद्रमा पर अब रात हो जायेगी इसलिए इन्हें निष्क्रिय किया जायेगा। सोमनाथ ने कहा कि लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान अब भी काम कर रहे हैं और हमारी टीम अब वैज्ञानिक साजो-सामान के साथ ढेर सारा काम कर रही है। उन्होंने कहा कि अच्छी खबर यह है कि लैंडर से रोवर कम से कम 100 मीटर दूर हो गया है और हम आने वाले एक या दो दिन में इन्हें निष्क्रिय करने की प्रक्रिया शुरू करने जा रहे हैं, क्योंकि वहां (चांद पर) रात होने वाली वाली है। अब तक चंद्रयान-3 के रोवर प्रज्ञान पर लगे एक उपकरण ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सतह में गंधक होने की स्पष्ट रूप से पुष्टि की है। इसरो ने यह भी कि कहा कि उपकरण ने उम्मीद के मुताबिक एल्युमीनियम, कैल्शियम, लौह, क्रोमियम, टाइटेनियम, मैंगनीज, सिलिकॉन और ऑक्सीजन का भी पता लगाया है।

विक्रम और प्रज्ञान को विश्राम देने की तैयारी में जुटा इसरो
Published / 2023-09-02 22:32:05
विक्रम और प्रज्ञान को विश्राम देने की तैयारी में जुटा इसरो

इसरो-चंदयान विश्राम हम लैंडर और रोवर को विश्राम देने की प्रक्रिया में हैं : एस सोमनाथ एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) प्रमुख एस सोमनाथ ने शनिवार का कहा कि चंद्रयान -3 मिशन से जुड़ी टीम विक्रम लैंडर और रोवर को विश्राम देने की प्रक्रिया में है। इसरो प्रमुख ने आज भारत के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट आदित्य एल 1 को सफलतापूर्वक पृथ्वी की इच्छित कक्षा में स्थापित किये जाने के बाद श्रीहरिकोटा में इसरो वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहा- हम दोनों (विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर) को विश्राम देने की प्रक्रिया पर काम कर रहे हैं। इसरो प्रमुख ने कहा कि लैंडर के भीतर रखकर भेजे गये रोवर ने सफलतापूर्वक चंद्रमा की सतह पर कदम रखने के बाद 100 मीटर तक चहलकदमी की है। लैंडर को चंद्रमा पर शिवशक्ति बिंदु पर उतारे जाने के बाद इस हिस्से पर अंधेरा होने से पहले कुछ दिनों का काम और बाकी है। उन्होंने कहा कि विक्रम और प्रज्ञान अंधेरे में रहते हुए अपने सौर पैनलों को बिजली बनाने से रोक देंगे और अगर 14 दिन बाद भी वह काम कर पाये तो यह बोनस होगा। उल्लेखनीय है कि इसरो के वैज्ञानिकों ने 23 अगस्त को चंद्रयान-3 को चांद के दक्षिणी घ्रुव पर उतार कर नया इतिहास रच दिया। दुनिया का कोई भी देश चांद की इस कठिन सतह पर नहीं पहुंचा है। इसके अलावा इसरो ने अपने पहले सूर्य मिशन के तहत आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित करके अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है। इसरो सूत्रों के मुताबिक 23 घंटे 40 मिनट की उल्टी गिनती समाप्त होने के साथ ही आज पूर्वाह्न 11:50 बजे पीएसएलवी-सी57 के जरिए शार रेंज से प्रक्षेपित आदित्य एल-1 को अब पृथ्वी की निचली कक्ष में स्थापित कर दिया गया है। इसी के साथ ही 125 दिनों की लंबे सफर में सूर्य के बाहरी वातावरण का अध्ययन करने का सिलसिला शुरू हो गया। उन्होंने बताया कि मिशन नियंत्रण केंद्र के वैज्ञानिक पूरे अभियान पर नजर रखे हुए हैं।

इसरो ने स्थापित किया माइलस्टोन...
Published / 2023-09-02 18:52:12
इसरो ने स्थापित किया माइलस्टोन...

11 दिन में इसरो के दो बड़े मिशन चांद-सूरज पर इसरो ने वो किया जो दुनिया नहीं कर पायीएबीएन नॉलेज डेस्क। इसरो ने चांद पर चंद्रयान-3 के सफल लैंडिंग का ऐलान किया। चांद के साउथ पोल में जहां कोई देश नहीं पहुंच पाया था, वहां भारत पहली बार पहुंचा। विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर ने 23 अगस्त से ही अपना काम शुरू कर दिया और पिछले 10 दिनों में कई ऐसी खोज की हैं, जो दुनिया के लिए एक अचंभा है। पूरी दुनिया इसरो की इस सफलता के आगे नतमस्तक हो गयी थी, नासा से लेकर दुनिया की अन्य बड़ी एजेंसियों ने करफड को सलाम ठोका था। भारत चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा, दक्षिणी पोल पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बना था। इसरो जैसा कोई नहीं इसरो एक ऐसा संस्थान है, जिस पर पूरी दुनिया निगाहें रखती हैं। मंगलयान, चंद्रयान और अब सूर्ययान की सफलताओं ने इसके कद को और भी बढ़ा कर दिया है। दुनिया की कई बड़ी एजेंसियां अपने बड़े मिशनों में अंतर रखती हैं, क्योंकि तैयारी के लिए वक्त चाहिए और बाकी भी चीजें देखनी होती हैं। लेकिन इसरो ने सीमित संशाधनों के बाद कई ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं, जिसने इतिहास रचा है। 11 दिनों के भीतर ही एक लैंडिंग और एक लॉन्चिंग इसका पुख्ता सबूत भी देता है। ऐसे सूरज की ओर बढ़ा आदित्य एल-1 इन सफलताओं की वजह से ही आज दुनिया की कई बड़ी एजेंसियां और देश इसरो की मदद लेते हैं। भारत ने कई बार दूसरे देशों के सैटेलाइट अपनी तरफ से लॉन्च किये हैं, क्योंकि अन्य देशों के पास इतना अनुभव नहीं है इसलिए इसरो की मदद ली जाती है।इसके अलावा कई देश अपने अहम मिशन में भी इसरो को साझेदार बनाते हैं, जिसका ताजा उदाहरण चंद्रयान-4 होने वाला है। चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग के बाद जापान भारत के साथ मिलकर चंद्रयान-4 पर काम करने वाला है। इसरो के आदित्य एल-1 मिशन से जुड़ी जानकारी : सूरज का अध्ययन करने के लिए इसरो ने आदित्य एल-1 मिशन लॉन्च किया है। 2 सितंबर को इसने उड़ान भरी और करीब 4 महीने के भीतर ये एल-1 पॉइंट पर पहुंचेगा। सूरज और पृथ्वी के बीच एल-1 एक ऐसा पॉइंट है, जहां से सूरज पर लगातार नजर रखी जा सकती है और उसकी आग से भी बचा जा सकता है। ये पृथ्वी से करीब 15 लाख किमी। दूर है। 400 करोड़ रुपये के बजट वाले इस प्रोजेक्ट से सूरज की कोरोना लेयर, वहां के वायुमंडल, एल-1, सूरज की किरणों, वहां के भूत और भविष्य से जुड़ी जानकारियों का अध्ययन करने का मौका मिलेगा।

जानें क्या है आदित्य-एल-1 मिशन
Published / 2023-09-02 16:02:37
जानें क्या है आदित्य-एल-1 मिशन

सूर्य का अध्ययन जरूरी क्यों? जानें इसके बारे में सब कुछएबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक उतारकर इतिहास रचा। उत्साह से लबरेज राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी आज आदित्य-एल1 मिशन को लॉन्च करेगी।इस मिशन का उद्देश्य सूर्य का अध्ययन करना है।चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद अब दुनिया की नजर आदित्य-एल1 मिशन पर होगी। आदित्य-एल1 क्या है? मिशन के उद्देश्य क्या हैं? मिशन के घटक कौन-कौन से हैं? इसे कब और कहां से लॉन्च किया जायेगा? सूर्य का अध्ययन क्यों जरूरी है? आइए समझते हैं...पहले जानते हैं आदित्य-एल1 क्या है?आदित्य एल1 सूर्य का अध्ययन करने वाला मिशन है। इसके साथ ही इसरो ने इसे पहला अंतरिक्ष आधारित वेधशाला श्रेणी का भारतीय सौर मिशन कहा है। अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित करने की योजना है जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किमी दूर है।दरअसल, लैग्रेंजियन बिंदु वे हैं जहां दो वस्तुओं के बीच कार्य करने वाले सभी गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देते हैं। इस वजह से एल1 बिंदु का उपयोग अंतरिक्ष यान के उड़ने के लिए किया जा सकता है।मिशन के उद्देश्य क्या हैं?भारत का महत्वाकांक्षी सौर मिशन आदित्य एल-1 सौर कोरोना (सूर्य के वायुमंडल का सबसे बाहरी भाग) की बनावट और इसके तपने की प्रक्रिया, इसके तापमान, सौर विस्फोट और सौर तूफान के कारण और उत्पत्ति, कोरोना और कोरोनल लूप प्लाज्मा की बनावट, वेग और घनत्व, कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र की माप, कोरोनल मास इजेक्शन (सूरज में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोट जो सीधे पृथ्वी की ओर आते हैं) की उत्पत्ति, विकास और गति, सौर हवाएं और अंतरिक्ष के मौसम को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन करेगा।मिशन के घटक कौन-कौन से हैं?आदित्य-एल1 मिशन सूर्य का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए सात वैज्ञानिक पेलोड का एक सेट ले जायेगा। विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (वीईएलसी) सूर्य के वायुमंडल के सबसे बाहरी भाग यानी सौर कोरोना और सूरज में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोटों यानी कोरोनल मास इजेक्शन की गतिशीलता का अध्ययन करेगा।सोलर अल्ट्रा-वायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (एसयूआईटी) नामक पेलोड अल्ट्रा-वायलेट (यूवी) के निकट सौर प्रकाशमंडल और क्रोमोस्फीयर की तस्वीरें लेगा। इसके साथ ही SUIT यूवी के नजदीक सौर विकिरण में होने वाले बदलावों को भी मापेगा।आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (एएसपीईएक्स) और प्लाज्मा एनालाइजर पैकेज फॉर आदित्य (पीएपीए) पेलोड सौर पवन और शक्तिशाली आयनों के साथ-साथ उनके ऊर्जा वितरण का अध्ययन करेंगे।सोलर लो एनर्जी एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (SoLEXS) और हाई एनर्जी एल1 ऑर्बिटिंग एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (HEL1OS) विस्तृत एक्स-रे ऊर्जा रेंज में सूर्य से आने वाली एक्स-रे किरणों का अध्ययन करेंगे। वहीं, मैग्नेटोमीटर पेलोड को एल1 बिंदु पर दो ग्रहों के बीच के चुंबकीय क्षेत्र को मापने के लिए बनाया गया है।आदित्य-एल1 के सातों विज्ञान पेलोड की खास बात है कि ये देश में विभिन्न प्रयोगशालाओं द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित किये गये हैं। ये सभी पेलोड इसरो के विभिन्न केंद्रों के सहयोग से विकसित किये गये हैं।

नासा ने खोज निकाली लूना के क्रैश वाली जगह
Published / 2023-09-01 13:59:51
नासा ने खोज निकाली लूना के क्रैश वाली जगह

चांद पर कहां क्रैश हुआ था रूस का लूना-25, नासा ने खोज निकाली वह जगह!एबीएन नॉलेज डेस्क। चांद की सतह पर पहुंचने में भारत के चंद्रयान-3 और रूस के लूना-25 के बीच होड़ थी। चंद्रयान-3 से बाद में लॉन्च किया लूना-25 चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के दौरान क्रैश हो गया। अब अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने उस जगह का पता लगाने का दावा किया है, जहां लूना-25 क्रैश हुआ था। नासा ने गुरुवार को घोषणा की कि उसके लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (एलआरओ) अंतरिक्ष यान ने एक गड्ढा देखा है, जो रूस के लूनर मिशन लूना-25 का मलबा हो सकता है।रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने 21 अगस्त को लूना-25 के क्रैश हो जाने की खबर दी थी। नासा में एलआरओ टीमों ने अगले ही दिन साइट की तस्वीरें खींचने के लिए अंतरिक्ष यान को आदेश भेजे। क्रैश से पहले ली गई तस्वीरों और बाद में ली गयी तस्वीरों की तुलना करने पर उन्हें एक छोटा सा नया गड्ढा दिखाई दे रहा है। नासा ने दावा किया है कि यह संभवत: लूना-25 का मलबा हो सकता है। लूना-25 के दुर्घटनाग्रस्त होने की सटीक परिस्थितियां अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन रोस्कोस्मोस ने कहा कि लैंडिंग से पहले की कक्षा में जाने के दौरान अंतरिक्ष यान में जिस तरह की गति और बदलाव था, वह निर्धारित गति से काफी अलग था। चंद्रमा के लिए लॉन्च किये गये प्रोजेक्ट्स की गति को नियंत्रित करना काफी ज्यादा चैलेंज भरा काम होता है। चंद्रयान-2 से सीख लेकर चंद्रयान-3 कछुए की गति की तहर धीरे-धीरे चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में सक्षम हो पाया।

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