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सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहीं इलेक्ट्रिक गाड़ियां!
Published / 2024-03-09 22:21:59
सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहीं इलेक्ट्रिक गाड़ियां!

पेट्रोल-डीजल से ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहनों से होता है प्रदूषण, चौंकाने वाली स्टडी में बतायी वजह एबीएन नॉलेज डेस्क। रिसर्च रिपोर्ट कहती है, गैस से चलने वाली कारों के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीकल के ब्रेक और टायर 1850 गुना ज्यादा प्रदषण फैलाते हैं। स्टडी इसलिए चौंकाती है क्योंकि अब तक माना जाता रहा है कि पेट्रोल और डीजल के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीहल प्रदूषण के मामले में ज्यादा सुरक्षित हैं।आमतौर पर माना जाता है कि इलेक्ट्रिक वाहन पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं क्योंकि इनसे प्रदूषण कम फैलता है, लेकिन इस पर हुई रिसर्च रिपोर्ट चौंकाती है। एमिशन डाटा का एनालिसिस करने वाली फर्म एमिशन एनालिटिक्स ने एक स्टडी करायी। स्टडी में यह पता करने की कोशिश की गयी कि गैस और दूसरे ईधन के मुकाबले ईवी यानी इलेक्ट्रिक व्हीकल पर्यावरण के लिए कितने सुरक्षित है।रिसर्च के नतीजों में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। रिसर्च रिपोर्ट कहती है, गैस से चलने वाली कारों के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीकल के ब्रेक और टायर 1850 गुना ज्यादा प्रदषण फैलाते हैं। स्टडी इसलिए चौंकाती है क्योंकि अब तक माना जाता रहा है कि पेट्रोल और डीजल के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीहल प्रदूषण के मामले में ज्यादा सुरक्षित हैं। ये ग्रीन हाउस गैसों का कम उत्सर्जन करते हैं। लेकिन नई रिसर्च ने इस पर खुलासे किये हैं। इसके साथ ही इनकी वजह भी बताई है। क्यों ईवी हवा को जहरीला बनाती है एमिशन एनालिटिक्स की रिपोर्ट कहती है, इलेक्ट्रिक वाहनों का वजन ज्यादा होता है। वजन ज्यादा होने के कारण इसके टायर जल्दी घिसते हैं। यानी तेजी से इनकी उम्र घटती है। ये हवा में नुकसान पहुंचाने वाले केमिकल रिलीज करते हैं। ज्यादातर टायर क्रूड आॅयल से निकले सिंथेटिक रबर से तैयार किए जाते हैं। ये प्रदूषण की वजह बनते हैं। पेट्रोल इंजन के मुकाबले एश् की बैटरी ज्यादा भारी होती है। यह अतिरिक्त वजन ही ब्रेक और टायर पर पड़ता हैऔर इनकी उम्र तेजी से कम होती है। रिसर्च रिपोर्ट में टेस्ला के मॉडल और फोर्ड एफ-150 लाइटनिंग का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि दोनों ही गाड़ियों में करीब 1800 पाउंड की बैटरी लगी है। पेट्रोल कार के मुकाबले इन इलेक्ट्रिक वाहनों में लगी आधे टन की इस बैटरी से 400 गुना अधिक उत्सर्जन होता है। इस तरह सुरक्षित माने जाने वाले इलेक्ट्रिक वाहन भी प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं। इसलिए और ज्यादा फैलता है प्रदूषण रिसर्च रिपोर्ट में इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाली बैटरी पर चिंता जतायी गयी है। कहा गया है कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के बैटरी को डिकम्पोज करना भी जरूरी है। अगर बैटरी को ठीक से खत्म नहीं किया जाता है तो पर्यावरण के लिए खतरा बढ़ता है। इसलिए ईवी की बैटरी भी अहम पहलू है। इससे पहले हुई रिसर्च में बैटरी को डिकम्पोज करने के लिए बरती जाने वाली लापरवाही को पर्यावरण के लिए खतरा बताया जा चुका है। इस तरह कहा जा सकता है कि पर्यावरण के लिए अब तक सुरक्षित माने जाने वाले ईवी उतने भी सुरक्षित नहीं हैं, इनको लेकर जितना दावा किया जाता है। यही वजह है कि इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर हुई यह स्टडी चौंकाती है और पर्यावरण को सुरक्षित बनाने की दिशान में अलर्ट भी करती है।

एआई के बढ़ते वर्चस्व से संकट में नौकरियां
Published / 2024-03-08 13:51:24
एआई के बढ़ते वर्चस्व से संकट में नौकरियां

इस बड़े सेक्टर की नौकरियां खाने को तैयार एआई जानें कैसे बचेंगी नौकरियांएबीएन सेंट्रल डेस्क। दुनिया के कारोबार में अपने पैर तेजी से जम रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई लोगों को बेरोजगार कराने की कगार पर है। जहां इस टेक्नाॅलजी का ढेरों फायदें है वहीं इसके नुकसान से आम आदमी का जीवन खतरे में है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जहां साइबर ठगी के मामले बढ़ गये हैं। वहीं इसने डीप फेक जैसे नए फ्रॉड के तरीकों से लाखों की जिंदगी को जोखिम में डाल दिया है।वहीं, एक्सपर्ट्स ने बड़े पैमाने पर एआई से नौकरियां जाने की आशंका जतायी है।खासतौर पर आईटी इंडस्ट्री की संस्था नासकॉम के चेयरमैन राजेश नांबियार ने चेतावनी और चिंता जाहिर करते हुए बताया  कि इससे सबसे बड़ा खतरा बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग यानी बीपीओ सेक्टर पर है।  बीपीओ सेक्टर में नौकरियों परएआई से संकटअगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने बीपीओ सेक्टर में नौकरियों की जगह लेना शुरू कर दिया तो कई लोगों की नौकरियां खत्म हो जायेंगी। हालांकि राजेश नांबियार ने कहा है कि इससे भारतीय टेक इंडस्ट्री के मुख्य आधार सॉफ्टवेयर सर्विस इंडस्ट्री के कर्मचारियों को ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। हालांकि देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाले 250 अरब डॉलर के भारतीय टेक सेक्टर की नौकरियों पर भी एआई का असर जरूर पड़ेगा।  जानें कैसे बचेगी नौकरीनांबियार के मुताबिक, अगर आईटी सेक्टर में लोगों को नौकरी बचानी है तो उन्हें एआई का इस्तेमाल करना सीखना होगा। इसी वजह से ज्यादातर आईटी सर्विस देने वाली कंपनियां अपने कर्मचारियों को एआई में ट्रेन करने के लिए निवेश कर रही हैं। कंपनियों को पता है कि आने वाले समय में अपने क्लाइंट्स की डिमांड को आसानी से पूरा करने के लिए एआई का सहारा लेना पड़ेगा। नांबियार ने कहा कि जेनरेटिव एआई ऑफिस वाली नौकरियों पर ज्यादा असर डालेगा। हर कंपनी इस एआई तकनीक का इस्तेमाल कर अपनी लागत घटायेगी और मुनाफा ज्यादा बटोरेगी। उन्होंने कहा कि एआई आने वाले 5-10 सालों में काफी पैर पसार लेगी।  इतना ही नहीं ब्रोकरेज में इक्विटी एनालिस्ट या statistician की नौकरी पर एआई संकट पैदा कर सकता है।

जानें क्या है अंडरवाटर मेट्रो
Published / 2024-03-06 21:59:09
जानें क्या है अंडरवाटर मेट्रो

इसका निर्माण कब शुरू हुआ और खासियत क्या है? तस्वीरों से जानियेएबीएन सेट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को पश्चिम बंगाल के दौरे पर रहे। इस दौरान पीएम ने राजधानी कोलकाता में 15,400 करोड़ रुपये की कई कनेक्टिविटी परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। अपने दौरे में पीएम मोदी ने छह नयी मेट्रो ट्रेनों को हरी झंडी दिखायी। इसमें भारत की पहली अंडरवॉटर मेट्रो रेल परियोजना भी शामिल है।  आइये तस्वीरों में जानते हैं कोलकाता में शुरू की गयी अंडरवॉटर मेट्रो रेल परियोजना क्या है? इसका निर्माण कब शुरू हुआ था? परियोजना कहां से कहां तक के लिए है? इसकी खासियत क्या है?  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कोलकाता में अंडरवाटर मेट्रो ट्रेन को हरी झंडी दिखायी गयी। यह परियोजना हावड़ा मैदान और एस्प्लेनेड के बीच चालू हुई है।  इसके साथ भारत में नदी के नीचे पहली सुरंग भी यातायात के लिए खुल जाएगी। उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री ने अंडरवॉटर मेट्रो रेल की सवारी भी की। अंडरवाटर मेट्रो रेल ईस्ट-वेस्ट मेट्रो गलियारा का हिस्सा है। कोलकोता में इस गलियारे का काम 2009 में शुरू हुआ। मार्च 2024 में भारत की पहली अंडरवॉटर मेट्रो रेल सेवा शुरू हो गई। अंडरवाटर मेट्रो में यात्रियों को कई सुविधाएं मिलेंगी। टिकट के दाम 5 रुपये से लेकर 50 रुपये तक होंगे।ईस्ट-वेस्ट मेट्रो गलियारा परियोजना के तहत हुगली नदी के नीचे हावड़ा मैदान मेट्रो स्टेशन बना है। स्टेशन सतह से 33 मीटर नीचे बना हावड़ा मैदान भारत का सबसे गहरा मेट्रो स्टेशन है।

खगोलविदों की उपलब्धि है तीन नया चंद्रमा
Published / 2024-02-25 20:48:07
खगोलविदों की उपलब्धि है तीन नया चंद्रमा

खगोलविदों ने अरुण-वरुण ग्रहों के आसपास खोजे 3 नये चंद्रमा एबीएन नॉलेज डेस्क। खगोलविदों को हमारे सौर मंडल में तीन ऐसे चंद्रमा दिखे हैं जो पहले अज्ञात थे। इनमें से दो चंद्रमा वरुण और एक चंद्रमा अरुण के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। हवाई और चिली में शक्तिशाली भूमि-आधारित दूरबीनों का उपयोग करके दूर स्थित इन छोटे चंद्रमाओं को देखा गया और अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ के लघु ग्रह केंद्र ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की। इसी के साथ वरुण के चारों ओर चक्कर लगा रहे चंद्रमा की ज्ञात संख्या 16 और अरुण के चारों ओर घूम रहे चंद्रमा की ज्ञात संख्या 28 हो गयी है। इस खोज में मदद करने वाले वाशिंगटन स्थित कार्नेगी इंस्टीट्यूशन फॉर साइंस के खगोलशास्त्री स्कॉट शेपर्ड ने बताया कि वरुण के नए चंद्रमाओं में से एक की ज्ञात कक्षीय यात्रा अब तक सबसे लंबी है। उन्होंने बताया कि छोटे बाह्य चंद्रमा को सूर्य से सबसे दूर स्थित विशाल बर्फीले ग्रह वरुण के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में लगभग 27 साल लगते हैं। उन्होंने बताया कि अरुण की परिक्रमा कर रहा नया चंद्रमा इस ग्रह के चंद्रमाओं में संभवत: सबसे छोटा है और इसका अनुमानित व्यास केवल पांच मील (आठ किलोमीटर) है। उन्होंने कहा, हमें लगता कि अभी ऐसे कई और छोटे चंद्रमा हो सकते हैं, जिनकी खोज की जानी बाकी है। बता दें कि इससे पहले  नासा/ जेपीएल सोलर सिस्टम डायनेमिक्स टीम के अनुसार, हमारे सौर मंडल में ग्रहों की परिक्रमा करने वाले चंद्रमाओं की वर्तमान संख्या 290 है इनमें पृथ्वी के लिए एक चंद्रमा; मंगल ग्रह के लिए दो, बृहस्पति पर 95, शनि पर 146,  यूरेनस पर  27, नेप्च्यून पर 14 और बौने ग्रह प्लूटो के लिए 5 है।

सफलता के नित नये आयाम गढ़ रहा इसरो
Published / 2024-02-22 22:09:53
सफलता के नित नये आयाम गढ़ रहा इसरो

इसरो की एक और सफलता, पृथ्वी की जियोसिंक्रोनस कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हुआ इनसैट-3डीएस एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बताया है कि इनसैट 3डीएस सैटेलाइट सफलतापूर्वक पृथ्वी की जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थापित हो गया है। इसरो ने बताया कि सभी चार लिक्विड एपोजी मोटर फायरिंग पूरी हो गयी हैं। अब सैटेलाइट के आर्बिट टेस्टिंग लोकेशन पर 28 फरवरी 2024 तक पहुंचने की उम्मीद है। जियोसिंक्रोनस कक्षा में एक नाक्षत्र दिवस 23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकेंड के बराबर होता है। जिसमें सैटेलाइट की कक्षा पृथ्वी के घूर्णन के समान हो जाती है। ये कक्षा गोलाकार या गैर-गोलाकार प्रकार की हो सकती है।  इसरो की सैटेलाइट इनसैट-3डीएस को बीती 17 फरवरी को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था। इनसैट-3डीएस को जीएसएलवी एफ-14 लॉन्च व्हीकल से अंतरिक्ष में भेजा गया था। जीएसएलवी-एफ14 को नॉटी बॉय के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल इस जीएसएलवी के 40 फीसदी लॉन्च असफल रहे हैं। यही वजह है कि इस रॉकेट का नाम नॉटी बॉय पड़ गया है। इनसैट-3डीएस से होंगे ये फायदे इनसैट 3डीएस सैटेलाइट एक मौसम उपग्रह है, जो इनसैट-3डी सैटेलाइट का उन्नत स्वरूप है। इनसैट-3डीएस सैटेलाइट की मदद से मौसम संबंधी और प्राकृतिक आपदाओं की सटीक जानकारी मिल सकेगी। इनसैट-3डीएस से समुद्र की सतह और इसके तापमान के मौसम पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया जा सकेगा। साथ ही इनसैट 3डीएस की मदद से डेटा संग्रह प्लेटफॉर्म्स  से डेटा का संग्रह किया जा सकेगा। इनसैट-3डीएस की पूरी फंडिंग भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने की है। इस सैटेलाइट से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय मौसम विभाग, नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फॉरकास्टिंग, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी, नेशनल इंस्टीट्यूट आफ  ओसीन टेक्नोलॉजी, इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओसीन इनफोर्मेशन सर्विस और कई अन्य  एजेंसियों को इनसैट-3डीएस से फायदा मिलेगा।

होली पर चन्द्र ग्रहण का साया, पर भारत में नहीं दिखेगा
Published / 2024-02-17 23:26:40
होली पर चन्द्र ग्रहण का साया, पर भारत में नहीं दिखेगा

अबकी होली पर चंद्र ग्रहण; क्या सूतक के कारण सुबह नहीं खेला जायेगा रंग? एबीएन नॉलेज डेस्क। हिन्दू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है। इसके अगले दिन होली का त्योहार होता है। साल 2024 में होली का त्योहार 25 मार्च को मनाया जायेगा। लेकिन, इस बार की होली कुछ खास है। होली के दिन ही 2024 का पहला चंद्र ग्रहण भी लगेगा, जिसका प्रभाव पर्व पर नजर आने वाला है।हिंदी पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि यानी 25 मार्च 2024 सोमवार को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगेगा। यह चंद्र ग्रहण सुबह 10 बजकर 23 मिनट से शुरू होगा, जो दोपहर 3 बजकर 2 मिनट तक रहेगा। ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि साल का पहला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देने वाला है। लेकिन, इसका प्रभाव 12 राशि के ऊपर जरूर अवश्य पड़ेगा।यह राशि रहे सावधानहोली के दिन चंद्र ग्रहण कन्या राशि में लगने जा रहा है। इस राशि में राहु पहले से ही विराजमान हैं। इसके चलते कन्या राशि को चंद्र ग्रहण के दिन संभल कर रहने की जरूरत है।।चोट-चपेट की संभावनाएं ज्यादा बढ़ जायेंगी और स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।भारत में दिखाई नहीं देगा चंद्र ग्रहणज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस चंद्र ग्रहण को भारत में नहीं देखा जा सकेगा, जिस कारण से इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा। सूतक मान्य नहीं होने से इसका प्रभाव होली के त्योहार पर नहीं पड़ेगा, इसलिए आप बिना किसी चिंता के होली का त्योहार मना सकते हैं। हालांकि, राशि अनुसार इसका प्रभाव मान्य होगा।

कल नॉटी बॉय सैटेलाइट की लॉन्चिंग करेगा इसरो
Published / 2024-02-17 20:49:06
कल नॉटी बॉय सैटेलाइट की लॉन्चिंग करेगा इसरो

इसरो कल फिर रच सकता है इतिहास एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक के बाद एक सफलता हासिल कर रहा है। आज (शनिवार 17 फरवरी) इसरो एक बार फिर से इतिहास रचने जा रहा है। दरअसल, इसरो आज मौसम के बगड़ते मिजाज का पता लगाने वाले एक उपग्रह को लॉन्च करने जा रहा है। इस सैटेलाइट का कमसद मौसम की सटीक जानकारी देना है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस सैटेलाइट का नाम आईएनएसएटी- 3डीएस है। जिसे नॉटी बॉय के के उपनाम से भी जाना जाता है। इस उपग्रह की लॉन्चिंग जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल से की जायेगी। शाम 5.35 बजे होगी लॉन्चिंग इसरो के मुताबिक, रॉकेट जीएसएलवी-एफ14 आज यानी शनिवार शाम 5.35 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरेगा। लॉन्चिंग के करीब 20 मिनट बाद जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर आर्बिट  में तैनात हो जायेगा। इस रॉकेट का ये 16वां मिशन होगा। जिसे स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है जो क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल करके आज 10वीं बार उड़ान भरेगा।  पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित है मिशन जानकारी के मुताबिक, इनसैट-3 डीएस उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित किए जाने वाला तीसरी पीढ़ी का मौसम विज्ञान उपग्रह का अनुवर्ती मिशन है। जिसे भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित किया गया है। इसरो ने इस संबंध में एक्स पर एक ट्वीट कर कहा कि जीएसएलवी-एफ14/इनसैट-3डीएस मिशन: 17 फरवरी, 2024 को 17.35 बजे प्रक्षेपण के लिए 27.5 घंटे की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है।

आज क्या जरूरी है ?
Published / 2024-02-15 20:18:56
आज क्या जरूरी है ?

एबीएन नॉलेज डेस्क अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है : इंटेलिजेंट वही है जो अपने आप को बदलना जानता है। समय के साथ बदलना जरूरी है। जो समय के साथ नहीं चलते वे पीछे छूट जाते हैं। कई क्षेत्रों में अपने आप को बदलने की सख्त जरूरत है। आज पढ़ाई और करियर से संबंधित बदलाव के बारे में बात कर रहा हूं। इस पर गौर करें।पढ़ाई : आज का दौर स्पेशलाइजेशन का है। कुछ भी पढ़ लेने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, भले ही आप टॉपर क्यों न हों। परंपरागत विषयों में ग्रेजुएशन करके कोई फायदा नहीं है। ट्वेल्थ के बाद बहुत सोच समझकर जॉब ओरिएंटेड कोर्स करना चाहिए ताकि ग्रेजुएशन के बाद व्यक्ति कमाने के योग्य बन सके। आर्गेनाइजेशन : छात्रों की पूरी कोशिश होनी चाहिए कि वे टॉप रैंकिंग एजुकेशनल आॅगेर्नाइजेशन से ट्वेल्थ के बाद की पढ़ाई करें। तभी उनको सही प्लेसमेंट मिलेगा और अच्छी सैलरी भी। कहीं से कुछ भी पढ़ लेना समय और पैसे की बबार्दी है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट यहां तक कि सिम्पसल ग्रैजुएशन भी बहुत अच्छे आॅगेर्नाइजेशन से करें। डिग्री : 12वीं की डिग्री के बाद तभी पढ़ाई करें जब आपको पढ़ाई में मन लगता हो। पढ़ाई में मन नहीं लगता, तो ऐसे करियर की तलाश करें, जिसमें पढ़ाई कम, प्रैक्टिकल, फील्ड वर्क, ट्रेंनिंग ज्यादा हो। डिप्लोमा कोर्स करें। ऐसी पढ़ाई जिसके बाद नौकरी मिलने की गुंजाइश हो। नॉलेज: आजकल सिर्फ सर्टिफिकेट और डिग्री से कुछ नहीं होता। आपको मन लगाकर पढ़ाई करनी चाहिए। बिना नॉलेज के आप कोई प्रतियोगिता परीक्षा, इंटरव्यू नहीं निकाल सकते। बिना नॉलेज के आजकल एक साधारण सी प्राइवेट नौकरी भी नहीं मिलती। इसलिए जैसे-तैसे सिर्फ डिग्री हासिल करने वाली पढ़ाई न करें। पढ़ना है तो मन लगाकर पढ़ना है।  स्मार्टनेस : अच्छे रिजल्ट के साथ-साथ आपको स्मार्ट होना जरूरी है। आपका कम्युनिकेशन स्किल अच्छा होना चाहिए। याद रखें 85% सफलता हमारे स्मार्टनेस और अच्छे कम्युनिकेशन स्किल के बल पर मिलती है।  शुरू से ही पढ़ाई के साथ-साथ अपने कम्युनिकेशन स्किल्स पर ध्यान दें। स्कूल-कॉलेज में होने वाले सारे कल्चरल और एजुकेशनल इवेंट्स में भाग लें। पेरेंट्स सिर्फ पढ़ो-पढ़ो वाली सोच से बाहर निकलें। पढ़ाई के साथ-साथ अपने बच्चों को एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। सरकारी नौकरी : सरकारी नौकरी की तैयारी के पीछे 10-15 साल गवां देना सरासर बेवकूफी है। इसकी तैयारी 10वीं या 12वीं के बाद ही शुरू कर दें। ग्रेजुएशन तक अपनी तैयारी पूरी कर लें। ग्रेजुएशन के बाद कोई पार्ट टाइम अर्थात 6 घंटा वाला काम जरुर करें। पैसे का उपार्जन करें, अपना अनुभव बढ़ायें। 2 घंटा नियमित रूप से प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्नों को सॉल्व करें। 3 साल तक प्रतियोगिता परीक्षा दें। होता है तो ठीक, नहीं तो अपना रास्ता बदलें।   आज करियर की कमी नहीं है। सैकड़ों करियर हैं। कमी है जानकारी की। जरूरत है परंपरागत सोच से बाहर आने की।  मूल मंत्र : लियो टॉलस्टॉय ने कहा है - हर कोई दुनिया बदलने की सोचता है, कोई अपने आप को नहीं बदलता। आज का समय है, अपने आप को बदलने का। आज का युग है- ज्ञान और स्पेशलाइजेशन का। स्मार्टनेस और बोल्डनेस का। अच्छे कम्युनिकेशन स्किल्स का। 12वीं के बाद सोच समझकर जॉब ओरिएंटेड कोर्स करें, अच्छे आॅगेर्नाइजेशन से करें। तभी चूमेगी सफलता आपके कदम।

जानें क्या है स्वास्तिक का अर्थ
Published / 2024-01-23 14:17:47
जानें क्या है स्वास्तिक का अर्थ

एबीएन नॉलेज डेस्क। स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वास्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। सु का अर्थ अच्छा, अस का अर्थ सत्ता या अस्तित्व और क का अर्थ कर्त्ता या करने वाले से है। इस प्रकार स्वास्तिक शब्द का अर्थ हुआ अच्छा या मंगल करने वाला। अमरकोश में भी स्वस्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - स्वास्तिक, सर्वतोऋद्ध अर्थात् सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो। इस प्रकार सवास्तिक शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है। स्वास्तिक शब्द की निरुक्ति है- स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः अर्थात् कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।स्वास्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएं होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएं अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे स्वास्तिक कहते हैं। यही शुभ चिह्न है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएं पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे वामावर्त स्वस्तिक कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही वामावर्त स्वस्तिक अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गयी है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। मंगलकारी प्रतीक चिह्न स्वस्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिह्न अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल- प्रतीक माना जाता रहा है। विघ्नहर्ता गणेश की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ भी शुभ लाभ, स्वास्तिक तथा बहीखाते की पूजा की परम्परा है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसीलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वस्तिक को ही अंकित किया जाता है।स्वास्तिक गणेशजी का ही स्वरूपघर के मुख्य दरवाजे पर स्वास्तिक मुख्य द्वार के ऊपर मध्य में और शुभ और लाभ बाईं और दाईं तरफ लिखते हैं। स्वास्तिक की दोनों अलग-अलग रेखाएं गणपति जी की पत्नी रिद्धि-सिद्धि को दर्शाती हैं।

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