एबीएन डेस्क। वर्तमान में देश में लगभग 40 श्रम कानून लागू हैं। सरकार ने इन्हें समेट कर 4 लेबर कोड में संकलित कर दिया है। इन नये कानूनों को एक अप्रैल से लागू होना था, जिसे सरकार ने चुनाव के कारण कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया है। चुनाव के बाद इन्हें शीघ्र ही लागू किये जाने की पूरी संभावना है। इन लेबर कोड को बनाने के पीछे सरकार की मंशा श्रम कानूनों को सरल करने की थी, जिससे कि देश के उद्यमियों के लिए श्रमिकों को रोजगार देना आसान हो जाए और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अधिक संख्या में रोजगार उत्पन्न हो सकें। लेबर कोड के प्रावधानों में कुछ श्रमिकों के पक्ष में हैं तो कुछ उनके विपरीत हैं। जैसे यदि किसी श्रमिक को कोई आरोप लगाकर मुअत्तल किया जाता है तो अब व्यवस्था कर दी गयी है कि 90 दिन में उसकी जांच पूरी की जायेगी। पूर्व में ग्रेच्युटी कई वर्षों के बाद लागू होती थी, जिसे अब एक वर्ष के बाद लागू कर दिया गया है। अल्पकाल के लिए रखे गये श्रमिकों को अब वे सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी जो स्थाई श्रमिकों को उपलब्ध हैं। ये प्रावधान श्रमिकों के हित में हैं।इसके विपरीत उद्यमों को बंद करने अथवा श्रमिकों की छंटनी करने के लिए पूर्व में 100 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों के लिए सरकार से अनुमति लेनी जरूरी थी। अब इसे 300 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों पर लागू किया गया है। 100 से 300 श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों को सरकार से अनुमति लेने से मुक्त कर दिया गया है। यह श्रमिकों के विपरीत है। इस प्रकार नया लेबर कोड मिश्रित है। देखना यह है कि नये लेबर कोड से रोजगार उत्पन्न करने को कितना प्रोत्साहन दिया जाएगा? इसके लिए हमें समझना होगा कि उद्यमी द्वारा रोजगार किन परिस्थितियों में उत्पन्न किये जाते हैं। उद्यमी को सस्ता माल बनाना होता है, जिससे कि वह बाजार में अपना माल बेच सके। सस्ता माल बनाने के लिए जरूरी है कि वह उत्पादन में श्रम की लागत को कम करे। उसके लिए जरूरी है कि वह श्रम की उत्पादकता बढ़ाये, यानी एक श्रमिक से ही पूर्व की तुलना में अधिक उत्पादन कराए। जैसे एक श्रमिक पूर्व में 10 मीटर कपड़ा एक दिन में बुनाई करता था वही श्रमिक यदि अब 20 मीटर कपड़ा बुनाई करने लगे तो उद्यमी की उत्पादन लागत कम हो जाती है और वह बाजार में अपने सस्ते माल को बेच पाता है। लेकिन अधिक उत्पादन करने के कारण अब कम श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। मान लीजिये पूर्व में उद्यमी प्रतिदिन 100 मीटर कपड़ा एक दिन में बेच पाता था और वह 10 मीटर प्रति श्रमिक की दर से 10 श्रमिकों को रोजगार देता था। उत्पादकता बढ़ाने के बाद उसी 100 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए अब 20 मीटर प्रति श्रमिक की दर से उसे केवल पांच श्रमिकों की जरूरत होगी। इस प्रकार सस्ते माल और रोजगार के बीच सीधा अन्तर्विरोध है। यदि माल सस्ता बनाते हैं तो रोजगार कम होते है। चीन का माडल इससे भिन्न था जो विशेष परिस्थितियों में लागू हुआ था। चीन ने श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ अपने बाजार का भारी विस्तार किया। जैसे मान लीजिये पूर्व में चीन में एक श्रमिक 10 मीटर कपड़े की बुनाई करता था, उत्पादकता बढ़ाने के बाद वह 20 मीटर कपड़ा बुनने लगा। लेकिन इसी अवधि में चीन का बाजार 100 मीटर से बढ़कर 400 मीटर हो गया तो 400 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए बढ़ी हुई उत्पादकता के बावजूद 20 श्रमिकों की जरूरत पड़ेगी। 20 श्रमिक 20 मीटर कपड़ा प्रतिदिन बुनेंगे तब 400 मीटर कपड़े का उत्पादन होगा। इस प्रकार यदि बाजार का भारी विस्तार होता रहे तो श्रमिक की उत्पादकता के बढ़ने के साथ-साथ रोजगार भी बढ़ सकते हैं। लेकिन यह विशेष परिस्थिति थी जब चीन ने विश्व बाजार पर अपना प्रभुत्व बनाया था। यदि बाजार का तीव्र विस्तार न हो तो उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के बढ़ने की संख्या निश्चित रूप से घटेगी। कटु सत्य यह है कि यदि श्रम की उत्पादकता बढ़ाई जाती है तो सीमित बाजार होने के कारण रोजगार घटते हैं और यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जाती है तो उद्यमी के लिए श्रम के स्थान पर मशीन का उपयोग करना लाभप्रद हो जाता है और पुन: रोजगार में गिरावट आती है। इन दोनों कठिन विकल्पों के बीच हमें श्रम की उत्पादकता तो बढ़ानी ही पड़ेगी। यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जायेगी तो उद्यमी स्वचालित मशीनों का उपयोग करेगा और श्रमिक पूरी तरह बाजार से बाहर हो जाएगा। श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के दो प्रमुख उपाय हैं। एक यह कि उत्तम मशीनों का उपयोग किया जाये, जिससे कि उसी कुशलता के स्तर का श्रमिक अधिक उत्पादन कर सके। दूसरा यह है कि श्रमिक की कुशलता में विस्तार किया जाए। अक्सर उद्योगों में देखा जाता है कि श्रमिक पूरी तत्परता और मनोयोग से काम नहीं करते। वर्तमान श्रम कानून में व्यवस्था है कि यदि कोई उद्यमी श्रमिक को बर्खास्त करना चाहे तो उसे प्राकृतिक न्याय के अनुरूप उसकी सुनवाई करनी होती है और उसके बाद श्रम न्यायालय में उसका विवाद चलता है, जिस भय के कारण उद्यमी अक्सर श्रमिक को रखना ही नहीं चाहते। लेबर कोड ने श्रम कानून की इस बाधा को दूर नहीं किया है। पश्चिमी देशों में उद्यमी को छूट है कि वह अपनी मर्जी से श्रमिकों को रख सकता है अथवा बर्खास्त कर सकता है। इसलिए पश्चिमी देशों में उद्यमी के लिए कुशल श्रमिक को रखना और अकुशल श्रमिक को बर्खास्त करना, दोनों ही आसान हैं। श्रम कानून में इस दिशा में कोई सुधार नहीं किया गया है। इसलिए यह लेबर कोड नये रोजगार उत्पन्न करने में सहायक नहीं होगा। अपने देश के श्रमिक चीन आदि देशों के श्रमिकों की तुलना में अकुशल हैं और उनकी कुशलता में सुधार करने के लिए लेबर कोड असफल है। ऐसे में अपने देश में श्रम की उत्पादकता न्यून स्तर पर बनी रहेगी, उद्यमी अधिकाधिक मशीनों का उपयोग करते रहेंगे और हमारे श्रमिकों के रोजगार के अवसर घटते ही जायेंगे। इस दिशा में लेबर कोड में मूल चिन्तन बदलने की जरूरत है।
सरहुल झारखंड में मनाया जाने वाला किया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। इस त्योहार को झारखंड में जनजातियों के साथ सदानों में भी मनाने की परंपरा है। इसमें मुख्यत: साल वृक्ष की पूजा होती है। पूजा में सखुए का फूल प्रयोग में लाया जाता है। यह त्योहार स्थान विषेष पर अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है परंतु विगत कुछ दषकों से त्योहार में एक रूपता लाने के लिए विषेष रूप चैत महीने के शुुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने लगा है। सरहुल पर्व के दिन षोभायात्रा निकालने की परंपरा भी चल पड़ी है। सरहुल पर्व चैत महीने (मार्च-अप्रैल) के पहली तिथि से षुरू होकर बैशाख पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इसे झारखंड की प्राय: प्रत्येक जनजातियों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। कुड़ुख में खद्दी, मुण्डारी में बा, सथाली में बाहा, खड़िया में जंकोर और हो में बाह्य पर्व कहते हैं। हो की बाह्य, मुंडारी की बा, संथाल की बाहा, खड़िया की जंकोर, एवं कुड़ुख की खद्दी पर्व का अर्थ सरई फूल है। इस तरह कहा जा सकता है कि सरहुल फूलों का त्योहार है। यह प्रकृति के नव स्वरूप के उत्सव का त्योहार है। यहाँ की जनजातीय समुदाय में इस त्योहार के बाद ही नये फल-फूल का सेवन आरंभ होता है। यह जनजातियों के लिए नव वर्ष है। इस त्योहार के साथ ही जनजातीय समुदाय में नव वर्ष का आगाज भी होता है। हो समुदाय सरहुल पर्व की षुरूआत होली के आस पास से ही करता है। इस समुदाय में सरहुल पूजा में अपने पूर्वजों की भी पूजा की जाती है। पूर्वजों की पूजा के साथ आम और महुआ फूल की भी पूजा करते हैं। पूजा के बाद ही नये फलों का सेवन आरंभ होता है। हो समुदाय में सरहुल पर्व के अवसर पर युवक-युवतियां एक साथ जोड़ कर नृत्य नहीं करते हैं। लड़के सिर्फ वाद्य-यंत्रों के माध्यम से युवतियों का साथ देते हैं। रांची वीमेंस कॉलेज के हो भाषा के सहायक प्राध्यापक विजय सिंह गागराई ने बताया कि हो जनजातियों में बाह्य पर्व का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने सरहुल पर्व पर हो समुदाय में गाया जाने वाला एक गीत बताया- एलागो सारजोम बाड़ा एलागो नाड़ादुन बेन, देलागो सारजोम बाड़ा देलागो नोसोरेन बेन ओअ: दोको सरिल तडा देलागो नोसोरेन बेन रचा दोको गुरि: तडा एलागो नाड़ादुन बेन लुकु बुड़ा गोआरितना देलागो नोसोरेन बेन लुकु बुड़ि गेरंतना एलागो नाड़ादुन बेन।। संथाल समुदाय में भी सरहुल पर्व होली के आस पास से ही अरंभ होता है। जाहेर में नायके सरहुल पूजा संपादित करते हैं। पूजा के बाद एक साथ मिलकर नृत्य किया जाता है। संथालों में भी सरहुल के बाद ही नये फल-फूलों का सेवन किया जाता है। खड़िया समुदाय में सरहुल पर्व होली के दिन ही मनाया जाता है। कालो (पुजारी) पूजा संपन्न कराते हैं। इसके बाद प्रसाद के रूप में लेटो (खिचड़ी) ग्रहण किया जाता है। खड़िया समुदाय में सखुए के फूल को जंकोर कहते हैं और पेड़ को दारू कहा जाता है। मुण्डा समुदाय में भी होली के बाद से ही सरहुल मनाया जाता है। पहान पुजा कराते हैं। इस समुदाय में भी सरहुल के दिन लेटो खाया जाता है। कुड़ुख समुदाय में सरहुल पर्व का बड़ा ही महत्व है। फागुन कटने के बाद इस समुदाय के लोग सरहुल पर्व मनाना प्रारंभ करते हैं। कुड़ुख समुदाय में बैषाख पूर्णिमा तक सरहुल पर्व मनाय जाता है। इस त्योहार को धरती और सूर्य के विवाह के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार सृष्टि से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए कुड़ुख समुदाय के लोग इस त्योहार को खेखे़ल बेंज्जा कहते हैं। सरहुल पूजा से पहले इस समुदाय में नये फल-फूलों के सेवन पर प्रतिबंध रहता है। इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है। इस त्योहार में सखुए फूल का बड़ा महत्व है। उरांव समुदाय में सखुए के फूल को नौर पूंप कहा जाता है। उराँव समुदाय में सरहुल से संबंधित एक गीत इस प्रकार है- हरे टोड़ंग नू एंदेर पूंप पूंइदा गोटा टोड़ंग पंडरू इथिरिई हरे टोड़ंग नू नौर पंूप पंूइदा गोटा टोड़ंग पंडरू इथिरिई सरहुल प्रकृति से जुड़ा एक महान पर्व है। यह सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस त्योहार की प्रसांगिकता आज कोरोना महामारी के दौर में और भी अधिक हो गयी है। जब पूरा विश्व कोरोना महामारी के भयंकर परिणाम से जूझ रहा है तो यह त्योहार हमें प्रकृति की गोद में लौटने को कह रहा है। सरहुल के पहले नये फल-फूलों का सेवन नहीं करके आदिवासी समुदाय पर्यावरण की रक्षा का बहुत बड़ा संदेश देते हैं। जब तक फूल, पत्ते और फल बालिग नहीं हो जाते हैं तब तक यह समुदाय इनका सेवन करना अपराध मानता है। जियो और जीने दो के सिद्धांत का इससे उत्तम उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। पेड़-पौधों के महत्व को इनके पूर्वज हजारों साल पहले समझ गये थे। इसका उत्तम उदाहरण हजारों वर्ष पहले से मनाया जाने वाला यह सरहुल पर्व है। पूरी दुनिया में पर्यावरण की सुरक्षा, सरंक्षण, विकास और जीवन मूल्यों में शामिल किये जाने की यह बड़ी परम्परा का वाहक परम्परा है। इस पर्व के महत्व को सबसे पहले आदिवासी समाज ने ही समझा था। पर्यावरण ही जीवन श्रोत है इस बात का संदेश सरहुल ही देता है। झारखंड का यह प्रमुख पर्व है जिसे कोरोना काल में हम जितनी सादगी से मनायेंगे उतना ही बेहतर संदेश जाएगा। (लेखक नागपुरी विभाग, गोस्सनर कॉलेज रांची के विभागध्यक्ष हैं।)
एबीएन डेस्क। डॉ भीमराव आंबेडकर ने 1938 में मनमाड रेलवे वर्कर्स कॉन्फ्रेंस में कहा था, मुझे धर्म के प्रति युवाओं की बढ़ती उदासीनता को देख कर पीड़ा होती है। धर्म कोई अफीम नहीं है। जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। मुझमें जो कुछ भी अच्छा है या मेरी शिक्षा से समाज का जो भी भला होता है, मैं उसका श्रेय अपने अंदर की धार्मिक भावनाओं को देता हूं। यह कथन उन लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है जो कि आंबेडकर को पढ़े बिना आंबेडकरवाद का अनुसरण करते हैं। ये स्थिति इसलिए है क्योंकि भारत के वामपंथी आंबेडकरवादी कार्यकतार्ओं ने उन्हें धर्म के विरोधी के रूप में चित्रित कर रखा है। जबकि आंबेडकर कार्ल मार्क्स जैसे नहीं थे। इसलिए एक व्यक्ति बिना किसी विरोधाभास के एक ही साथ तीनों हो सकता है एक हिंदू, एक राष्ट्रवादी और एक आंबेडकरवादी। यह बात उस वैचारिक कथानक के बिल्कुल विपरीत है. जो कि एक झूठे विचार की वकालत करता है कि आंबेडकर के विचार और राष्ट्रवाद एक साथ नहीं रह सकते। आंबेडकर ने धर्म को बहुत महत्व दिया था, और यह बात उनकी विरासत पर एकाधिकार की हसरत रखने वाले साम्यवादियों की आज की पीढ़ी को रास नहीं आएगी.शांतिपूर्ण विरोध के जरिए दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश की हिमायत करना आंबेडकर की विशेषता थी। तमिलनाडु में पेरियार के अनुयायी बड़ी अस्पष्टता की स्थिति निर्मित करते हैं। जबकि एक तरफ तो वे हिंदू प्रतिष्ठानों के तर्कहीन उन्मूलन का समर्थन करते हैं, पर साथ ही वे आंबेडकरवादी होने का दावा भी करते हैं। अपने जीवन के निर्णायक चरण में आंबेडकर धर्मांतरण के सवाल से जूझ रहे थे। धर्मशास्त्र संबंधी गहन विद्वता के मद्देनजर, वह तमाम भारतीय धर्मों की ताकतों और कमजोरियों को लेकर आश्वस्त थे। कोई दृढ़ कारण जरूर रहा होगा कि बहुत सोच-विचार और विभिन्न धार्मिक नेताओं से चर्चा के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे आमतौर पर हिंदू धर्म की ही एक शाखा के रूप में देखा जाता है। क्या वह इस्लाम या ईसाई जैसे गैर-भारतीय धर्म को अपनाने के संभावित परिणामों से बचना चाहते थे? सामाजिक इतिहासकारों को इस सवाल पर रोशनी डालनी चाहिए, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आंबेडकर के विचार जाति संघर्ष की उपज थे। उनका जीवन इस निरंतर संघर्ष का प्रमाण है। पर जाति के खिलाफ अपने वैचारिक रुख के कारण आंबेडकर को पूर्वाग्रहों का भी सामना करना पड़ा, यहां तक कि साम्यवादियों से भी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की केंद्रीय कमेटी ने 1952 में आंबेडकर की अगुआई वाले संगठन अनुसूचित जाति महासंघ (एससीएफ) के खिलाफ एक विशेष प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि आर्थिक बेहतरी और सामाजिक बराबरी की आकांक्षा को उनके साम्राज्य-समर्थक और अवसरवादी नेता डॉ. आंबेडकर ने एक विकृत और अवरोधकारी रूप दे दिया है, जिन्होंने कि उनको एससीएफ में सांप्रदायिक और जाति-विरोधी हिंदुओं के तौर पर संगठित किया है। चुनाव के साथ भयादोहन भी आता है आरक्षण, हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के लिए संवैधानिक गारंटियों को लेकर। पर, ये कांग्रेस पार्टी ही है जिसने स्वतंत्रता सेनानी और दलितों के सबसे बड़े नेताओं में से एक बाबू जगजीवन राम को कभी भी पार्टी या सरकार में सम्मानजनक पद नहीं दिया. आखिरकार, जगजीवन राम को पार्टी से अलग होना पड़ा था। वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और अंतत: जनसंघ समर्थित जनता पार्टी सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने। एक दलित नेता के रूप में बाबू जगजीवन राम वामपंथियों के कथानक में फिट नहीं बैठते थे, क्योंकि वह एक समर्पित हिंदू थे। जिन्होंने हिंदू धर्म में रहते हुए इसकी बुराइयों का मुकाबला करने के विकल्प को चुना। कांशीराम और मायावती ने भी किसी अन्य धर्म को नहीं अपनाया। दलित आस्थावान हिंदू होते हैं। परंतु, भारतीय राजनीतिक इतिहास में किसी राष्ट्रीय दल की कमान संभालने वाला पहला दलित बंगारू लक्ष्मण बने, जो 2000 से 2001 तक भाजपा के अध्यक्ष रहे थे. भाजपा की ही अगुआई वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में जीएमसी बालायोगी, एक वकील, लोकसभा का पहला दलित स्पीकर बने थे। और एक बार फिर भाजपा ने ही रामनाथ कोविंद के रूप में भारत को पहला दलित राष्ट्रपति दिया। (भारत के दसवें राष्ट्रपति केआर नारायणन एक दलित-ईसाई थे.) इस समय सर्वाधिक दलित सांसद भाजपा से ही हैं। आंबेडकर ने लिखा था, जातीय रूप से हर व्यक्ति परस्पर भिन्न है। एकरूपता का आधार तो सांस्कृतिक एकता है। इस बात को मानते हुए, मैं यह कहना चाहूंगा कि सांस्कृतिक एकता में कोई भी देश भारतीय प्रायद्वीप की बराबरी नहीं कर सकता है। इस संदर्भ में संस्कृति की बारीकी से व्याख्या करने पर हमारी कालातीत सभ्यतामूलक अंत:चेतना सामने आती है जो कि युगों की कसौटी पर खरी उतरी है। आंबेडकर की बुनियाद भारतीय सभ्यता और संस्कृति में थी। ये भी कहा जाता है कि आंबेडकर संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव के पक्ष में थे। वह हमारी सांस्कृति समृद्धि का हवाला देते रहते थे। मौजूदा वक़्त आंबेडकर के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं के ईमानदार विश्लेषण का है। और आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) उनकी विरासत को लेकर एक नया, निष्पक्ष और रचनात्मक सार्वजनिक संवाद शुरू करने का उचित अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर आंबेडकर की पकड़, चीन को लेकर उनकी चेतावनी, और अर्थशास्त्र में उनकी असाधारण विद्वता को मौजूदा पीढ़ी के सामने लाया जाना चाहिए। आंबेडकर को मात्र सामाजिक न्याय का योद्धा और एक विशिष्ट दलित नेता के रूप में देखना उनकी विरासत के साथ बड़ा अन्याय होगा।
एबीएन डेस्क। पिछले लंबे समय से एनपीए (नॉन परफार्मिंग एस्सेट्स) की समस्या से जूझ रहे बैंकों की मुश्किलों को आसान करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। फरवरी माह में केन्द्रीय बजट में सुझाया गया एस्सेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी), यानी बैड बैंक का प्रावधान भी उसी शृंखला में इस समस्या के समाधान का एक और प्रयास कहा जा सकता है। सबसे पहले सरकार इन्सालवेंसी एवं बैंकरप्सी (आईबीसी) एक्ट लेकर आई और पहली बार दिवालियापन के लिए कोई ठोस कानूनी पहल की गई। माना गया कि इससे ईज आफ डूईंग बिजनेस में सुधार होगा, क्योंकि नुकसान के कारण देनदारिया चुका नहीं पाने की स्थिति में परिसंपत्तियों को आसानी से बेचकर व्यक्ति छुटकारा पा सकता है, लेकिन साथ ही इसका लाभ यह था कि बैंकों के लिए भी अपनी बैलेंस शीट साफ रखना संभव हो पाएगा। उसके उपरांत देखा गया कि पिछली सरकारों के समय दिए गए कर्ज की अदायगी में कोताही होने के कारण बैंकों की आर्थिक हालत बिगड़ने के कारण उन्हें पूंजीगत मदद की भी जरूरत है। ऐसे में अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में होने के कारण उनकी पूंजीगत जरूरतों की पूर्ति हेतु भी सरकार को ही मदद देनी जरूरी थी। केन्द्र ने पिछले वर्षों में अपने खजाने से अभी तक 2.5 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है ताकि बैंकों के घाटे की भरपाई हो सके। हालांकि इन सभी प्रयासों से बैंकों को डूबने से तो बचा लिया गया, लेकिन उनकी एनपीए की समस्या बदस्तूर बनी रही। हालांकि बैंकों के एनपीए जो 2017-18 तक आते-आते 11.2 प्रतिशत तक पहुंच गए थे, सितंबर 2020 तक वे 7.5 प्रतिशत तक कम हो गए थे, लेकिन पिछले वर्ष में कोविड महामारी के कारण व्यवसायों को नुकसान के चलते ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि सितंबर 2021 तक वे फिर से बढ़ जाएंगे। रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के हवाले से पता चलता है कि वे 13.5 प्रतिशत तक भी बढ़ सकते हैं। हालांकि कोर्ट के आदेश के अनुसार जिन ऋणों की अदायगी कोरोना के चलते आगे बढ़ा दिया गया था, उच्चतम न्यायालय ने उन ऋणों को एनपीए घोषित करने के लिए रोक लगा दी थी, लेकिन अब चूंकि न्यायालय ने इस रोक को हटा दिया है, अब बैंकों को उन ऋणों जिनकी वापसी नहीं हो रही, को एनपीए घोषित करना पड़ेगा। इससे एनपीए की प्रमाण में भारी वृद्धि हो सकती है। जानकारों का मानना है कि कोविड के कारण उत्पन्न अन्य समस्याओं का भी प्रभाव एनपीए पर पड़ सकता है। वर्ष 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों की एनपीए की समस्या से निपटने के लिए एआरसी यानी बैड बैंक का प्रस्ताव रखा है। बैंकों की विषम एनपीए स्थिति के चलते पहले से ही बैड बैंक का प्रस्ताव आर्थिक जगत से जुड़े लोगों की ओर से आ रहा था। चूंकि भविष्य में एनपीए की समस्या बढ़ सकती है, ऐसे में बैड बैंक की अवधारणा और उससे जुड़े अन्य पहलुओं की जांच जरूरी हो जाती है कि क्या बैड बैंक बैंकों को उनकी समस्याओं से निजात दिला सकेगा। बैड बैंक की अवधारणा विदेशों से आई है। गौरतलब है कि जब अमेरिका में 2007-08 में बैंक धराशायी हो रहे थे, उस समय अमेरिका के राजस्व विभाग ने बैंकों के उन ऋणों को खरीद लिया, जिनकी वापसी नहीं हो पा रही थी। बाद में बाजार स्थितियां ठीक होने के बाद उन्हें बाजार में बेहतर कीमत पर बेच दिया। पूर्ण लॉकडाउन की तरफ न बढ़े देश लगभग वैसा ही कदम भारत सरकार भी उठाने जा रही है, जिसे एआरसी का नाम दिया गया है। यह कंपनी सेक्यूरटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन एंड एनफोर्समेंट और सेक्यूरिटीज इंटरेस्ट एक्ट (सरफायेसी एक्ट) 2002 के अंतर्गत स्थापित होगी। इस एआरसी की स्थापना हेतु उस कंपनी के पास स्वयं स्वामित्व की 100 करोड़ की राशि का फंड होना जरूरी है। जिन दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को यह कंपनी खरीदेगी, उसके 15 प्रतिशत के बराबर उसके पास पूंजी अनुपात का होना जरूरी होगा। यह एआरसी बैंकों के पास दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को उचित कीमत पर खरीदेगी। बैंकों को उस परिसंपत्ति के मूल्य का 15 प्रतिशत नकद प्राप्त होगा और शेष 85 प्रतिशत राशि उसे बॉन्ड और ऋण पत्र के रूप में प्राप्त होगी, जिसकी देयता अधिकतम 6 वर्ष की होगी। अपने कार्य को करने हेतु एआरसी डिबेंचर और बॉन्ड तो जारी कर ही सकता है, इसके साथ वह प्रतिभूति (सिक्योरिटी) रसीद भी जारी कर सकता है। सिक्योरिटी रसीद धारक के पास उस वित्तीय परिसंपत्ति का अधिकार होगा। वित्त की मदद से बैड बैंक (एआरसी) दबावग्रस्त ऋणों को खरीद सकेगा। इन दबावग्रस्त ऋणों को बट्टे पर खरीदने के बाद एआरसी के पास वो तमाम अधिकार होंगे जो बैंक के पास थे। यानी वह उन ऋणों का पुनर्गठन या पुनर्निर्धारण कर सकता है, समाधन कर सकता है, ऋणी के व्यवसाय को बेच सकता है या लीज पर दे सकता है अथवा प्रबंधन को बदल सकता है, लेकिन इस प्रकार की कार्यवाही को अंजाम देने के लिए ऋण दाताओं के 75 प्रतिशत और एआरसी की सहमति जरूरी होगी। यदि ऋण प्रतिभूति रहित है तो ऐसी हालत में ऋणी पर मुकदमा करने का भी अधिकार एआरसी के पास रहेगा। यह भी प्रश्न उठता है कि इंसोलवेंसी और बैकरप्सी कोड और एआरसी में अंतर क्या है? दोनों में ही अंतोत्गत्वा उद्देश्य एनपीए से छुटकारा पाना ही है, लेकिन समझना होगा कि आईबीसी उधारी के समाधान के लिए बनाया गया है। गौरतलब है कि आईबीसी से पहले इस काम को वर्षों लग जाते थे। दूसरी तरफ एआरसी का मकसद एनपीए ऋणों को बेचकर बैंकों की बैलेंस शीट को जल्द साफ करने का है, लेकिन देखा जाए तो दोनों के माध्यम से बैंकों की समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि बैड बैंक से भी एनपीए की समस्या का समाधान नहीं होने वाला। अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में हैं और एआरसी भी सरकारी स्वामित्व में होंगे। लेकिन समझना होगा कि बैंकों के आत्मविश्वास को बढ़ाने हेतु उनके एनपीए का हस्तांतरण दूसरी संस्था को करना एक अच्छा कदम हो सकता है।
एबीएन डेस्क (डॉ नीलम महेंद्र)। कर प्रणाली की बात करें तो मनुस्मृति और वेदों से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसका स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित उल्लेख मिलता है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में राजा के द्वारा लिए गए कर एवं राजस्व पद्धति की व्याख्या राजा के शासन संबंधी सेवाओं के वेतन के रूप में किया गया था। वैदिक काल में भी ग्राम वासियों द्वारा कृषि एवं पशु संपति पर एक निर्धारित राशि बलि के रूप में चुकाई जाती थी। कृषकों से प्राप्त राशि को बलि तथा विक्रय वस्तु से प्राप्त राशि को शुल्क कहा जाता था जो सामान्यत: उसके मूल्य का छटवां अथवा आठवां हिस्सा होता था। वहीं कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी विस्तारपूर्वक राजकीय आय के स्रोतों का वर्णन किया गया है। मौर्यकाल में भू राजस्व समेत अनेक शुल्क नगरवासियों पर लगाए जाते थे जैसे,1. षड भाग: छठवें अंश के रूप में प्राप्य राज कर 2. सेना भक्त: युद्धकाल में राज्यादेश से प्रजा जनों द्वारा प्राप्त खाद्य पदार्थ 3. बलि: करों के अतिरिक्त अन्य उपहार के रूप में प्राप्त धन4. कर: अधीनस्त राजाओं से मिलने वाला कर5. उत्संग: उत्सव आदि अवसरों पर भेंट स्वरूप प्राप्त वस्तुएं 6. पाश्व: नियत कर से अधिक की वसूली 7. पारीहीणक: पशुओं द्वारा खेत आदि की हुई हानि के कारण पशु स्वामी को दिए गए अर्थ दंड से उपलब्ध धन8. औपयानिक: राजा को उपहार में प्राप्त धन 9. कौष्टयेक: खुदाई से सहसा प्राप्त धन।करों की इतनी वृहद व्याख्या करने के साथ साथ कौटिल्य ने राजा और प्रजा दोनों के लिए यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य कर आदि का अधिकारी है तो प्रजा के प्रति उसके कर्तव्य भी हैं। और प्रजा कर देने के लिए कर्तव्यबद्ध है तो उसके अधिकार भी हैं, अगर राजा कर लेने के बाद भी अपने कर्तव्यों का ठीक से निर्वहन नहीं करता तो प्रजा उसके प्रति अपनी निष्ठा छोड़ सकती है। मध्यकालीन भारत में विभिन्न रियासतों का वर्चस्व था जो अपने अपने हिसाब से प्रजा से कर लेती थीं। सल्तनत काल से लेकर मुगल काल मेँ यह कर छठवें हिस्से से बढ़कर आय के आधे हिस्से तक पहुंच गया था। आधुनिक भारत में आयकर प्रणाली 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार पर आए वित्तीय संकट के कारण 1860 में अंग्रेजों द्वारा लाई गई थी। मजेदार बात यह है कि भारत के तत्कालीन ब्रिटिश वित्तमंत्री जेम्स विल्सन ने भी आयकर की शुरूआत करते हुए मनु को उदृत किया था। 1886 में भारत में इनकम टैक्स एक्ट पास हुआ था तब से उसमें कई बार बदलाव किए गए। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात 1918 में फिर 1922 में नया एक्ट लाया गया। स्वतंत्र भारत में वर्तमान में जो आयकर कानून चल रहा है वो 1 अप्रैल 1962 को लागू किया गया था। भारत में दो प्रकार के कर लिए जाते हैं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर। 2017 में जीएसटी लागू कर के अप्रत्यक्ष करों में क्रांतिकारी बदलाव लाकर कर सुधारों की तरफ एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया था। प्रत्यक्ष करों में भी सरकार हर बजट में कुछ बदलाव करती रहती है। लेकिन इसके बावजूद जब विश्व के देशों की टैक्स कंपेटेटिव इंडेक्स 2020 की रिपोर्ट आती है तो 36 देशों की इस सूची में न्यूजीलैंड, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, जर्मनी और पुर्तगाल जैसे देशों के नाम हैं लेकिन भारत का कोई स्थान नहीं है। जब व्यक्तिगत आयकर वसूलने वाले देशों से तुलना की जाती है तो वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में यह 37%, न्यूजीलैंड में 39% और भारत में 35.88% है। जीएसटी की बात की जाए तो भारत में 28% के साथ यह 140 देशों की तुलना में सबसे ज्यादा है 27 % के साथ दूसरे स्थान पर अर्जेंटिनिया है जबकि यूके और फ्रांस में यह 20% तो सिंगापुर में 7% है।
एबीएन डेस्क। हर साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। इस साल भी हमने यह दिन मनाया और पानी की महत्ता स्वीकार की। विश्व जल दिवस इस लिहाज से भी अलग था कि जलवायु परिवर्तन अपने शबाब पर है। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा-जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा-जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे। हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरूआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब ‘ला-नीना’ के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है। बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढ़ने के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है। दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी। तीसरा, साफ है कि गर्मी बढ़ने से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें। सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षाजल को इकट्ठा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है। फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी। हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाड़ने की बात है।
(डॉ नीतू नवगीत)। हिंदी साहित्य के इतिहास में महापंडित राहुल सांकृत्यायन यात्रा वृतांत या यात्रा साहित्य के जनक या पितामह माने जाते हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दाहा गांव में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था। इनके पिता गोवर्धन पांडे धार्मिक विचारों वाले एक किसान थे। बाल्यकाल में ही इनकी माता कुलवंती देवी का निधन हो गया था। अत: इनका पालन-पोषण इनके ननिहाल में ही हुआ। राहुल जी के बचपन का नाम केदारनाथ पांडे था। बालक केदार के नाना रामशरण पाठक थे जो फौज में 12 साल नौकरी कर चुके थे। फौजी नाना बालक केदार को दिल्ली, शिमला, नागपुर, हैदराबाद, अमरावती, नासिक इत्यादि जगहों के अनगिनत यात्रा संस्मरण सुनाया करते थे। कहते हैं- बाल्यकाल के संस्कार जीवन पर्यंत स्थायी रह जाते हैं। यहीं से बालक केदार के मन में यात्रा के प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया। उनके अंत:करण में यात्रा की ललक, यात्रा के प्रति प्रेम अंकुरित करने में ख्वाजा मीर दर्द के शेर की महती भूमिका रही-सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहां? इस शेर के संदेश ने बालक केदार के मन में बेहद गहरा, बेहद अमिट प्रभाव डाला और इसके बाद इनके घुमक्कड़ी जीवन का सूत्रपात हुआ। राहुल जी की पाठशाला और विश्वविद्यालय यही घुमक्कड़ी जीवन था। उनका मानना था कि घुमक्कड़ी मानव मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ अपने क्षितिज विस्तार का भी साधन है। उन्होंने कहा भी था-कमर बांध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है। राहुल जी ने अपनी यात्रा के अनुभवों को आत्मसात करते हुए घुमक्कड़ शास्त्र भी रचा। वह एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में थे और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गई तो वे विद्रोही हो गए। उनका संपूर्ण जीवन अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है। मात्र 11 वर्ष की आयु में जब उनका विवाह जबरन संतोषी नामक बालिका से करवा दिया गया तो वह घर के विद्रोही हो गए। इस विवाह की प्रतिक्रिया में राहुल जी ने किशोरावस्था में ही गृह त्याग कर दिया। घर से भागकर वे बनारस चले आए और फिर वहां से परसा मठ (जिला छपरा, बिहार) में जाकर साधु बन गए । लेकिन सत्यानुरागी राहुल ने जब मठ में रहने वाले साधु और महंतो का आडंबरपूर्ण जीवन देखा तो वहां भी विद्रोही बन गए । घुमक्कड़ी स्वभाव भी उनके प्रयाण का कारण बना । 14 वर्ष की अवस्था में वे कोलकाता भाग आए। ताउम्र गतिशील बने रहे। बड़ी ही निर्भीकता से आगे बढ़ते रहे। उनके मन में न तो कोई दुविधा थी और न अनिश्चय का कुहासा । राहुल जी घुमक्कड़ी के बारे में कहते हैं- मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया दु:ख में हो या सुख में, सभी समय यदि सहारा पाती है तो घुमक्कड़ों की ओर से। प्राकृतिक आदम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। और इनकी बातें अक्षरश: सत्य है। आदि काल में धार्मिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए घुमक्कड़ी स्वभाव वाले लोगों ने लंबी-लंबी यात्राएं की। तब परिवहन के साधन इतने विकसित नहीं थे । उन लोगों ने पैदल चलकर या घोड़ा गाड़ी और बैलगाड़ी जैसे वाहनों की मदद से अपनी यात्राएं पूरी की। नौका यात्रा ने घुमक्कड़ी को आसान बनाया।मेगास्थनीज,ह्नवेनसांग,फाहयान,अलबरूनी, इब्नबतूता, अमीर खुसरो, माकोर्पोलो, सेल्यूकस निकेटर इत्यादि ऐसे घुमक्कड़ हुए जिनके द्वारा लिखे या बयान किए गए यात्रा वृतांतों से घुमक्कड़ी साहित्य का संवर्धन हुआ। घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन बीसवीं सदी की उपज थे । तब देश गुलाम था। ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी संक्रमण काल के दौर से गुजर रहे थे। राहुल जी इन सब से अप्रभावित न रह सके। राहुल जी अप्रतिम प्रतिभा संपन्न थे । वे साधु थे, बौद्ध भिक्षु थे, यायावर थे, इतिहासज्ञ थे, पुरातत्ववेदा थे और साहित्यकार भी थे । वह अलग-अलग राहों पर चले पर सत्य का अन्वेषण नहीं छोड़ा। कलम को भी सदैव साथ रखा। उन्होंने अपनी यात्राओं का विवरण लिखा, नाटक लिखे, कथाएं लिखीं। उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं। शायद ही उनका नाम कभी बिना विशेषण के लिया गया हो। महापंडित, शब्दशास्त्री, त्रिपिटकाचार्य, अन्वेषक,, कथाकार, निबंध लेखक, अन्वेषक, आलोचक, कोषकार , अथक यात्री और भी ना जाने कितने शब्द उनके नाम से ठीक पहले जोड़े गए हैं। राहुल जी की कृतियों की सूची भी काफी लंबी है । आपको हिंदी भाषा और साहित्य की बहुमुखी सेवा करने का गौरव प्राप्त है । इनका अध्ययन जितना विशाल था, साहित्य सृजन उतना ही विराट। राहुल जी 36 एशियाई और यूरोपीय भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने लगभग 150 ग्रंथों का प्रणयन किया। सन 1927 ईस्वी में उनके साहित्य के जीवन का प्रारंभ हुआ। उनके द्वारा लिखी गई कहानियां हैं- 1. सतमी के बच्चे2. वोल्गा से गंगा 3. बहुरंगी मधुपुरी4. कनैला की कथा उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे- 1. बाइसवीं सदी जीने के लिए 2. सिंह सेनापति3. जय यौधेय 4. भागो नहीं दुनिया बदलो 5. मधुर स्वप्न 6. राजस्थान निवास 7. विस्मृत यात्री 8. दिवो दास अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में मेरी जीवन यात्रा, दर्शन दिग्दर्शन, घुमक्कड़ शास्त्र,किन्नर देश में, दिमागी गुलामी, यात्रा के पन्ने, एशिया के दुर्गम भूखंडों में ... इत्यादि प्रसिद्ध हैं। मेरी लद्दाख यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा, तिब्बत में सवा वर्ष, रूस में पच्चीस मास, मेरी यूरोप यात्रा इत्यादि उनके द्वारा लिखे गए अप्रतिम यात्रा वृतांत हैं । सरदार पृथ्वी सिंह, नए भारत के नए नेता आदि उनके द्वारा लिखी गई जीवनियाँ हैं । राहुल सांकृत्यायन एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे । बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिंदी साहित्य में युगांतरकारी माना जाता है। इस महती कार्य के लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक का भ्रमण किया था। (लेखिका साहित्यकार सह लोक गायिका हैं।) लावा उन्होंने मध्य एशिया और काकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं । राहुल जी जीवन पर्यंत दुनिया की सैर करते रहे। इस सैर में सुविधा-असुविधा का कोई प्रश्न ही नहीं था। जहां जो साधन उपलब्ध हुए, उन्हें स्वीकार कर लिया। वे अपने अध्ययन और अनुभव का दायरा बढ़ाते रहे । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ज्ञान के अगाध भंडार थे राहुल जी। वह कहा करते थे कि उन्होंने ज्ञान को सफर में नाव की तरह लिया है बोझ की तरह नहीं। ज्ञान की खोज में देश-विदेश की यात्रा करते रहना ही राहुल जी की जीवनचर्या थी । राहुल जी का पूरा जीवन साहित्य को समर्पित था। साहित्य रचना के मार्ग को उन्होंने बहुत पहले से चुन लिया था। सत्यव्रत सिन्हा के शब्दों में-"वास्तविक बात तो यह है कि राहुल जी किशोरावस्था पार करने के बाद ही लिखना शुरू कर दिए थे। जिस प्रकार उनके पाँव नहीं रुके, उसी प्रकार उनके हाथ की लेखनी भी नहीं रूकी। उनकी लेखनी की अजस्र धारा से विभिन्न विषयों के प्राय: 150 से अधिक ग्रंथ प्रणीत हुए ।" राहुल जी के यात्रा साहित्य की सबसे प्रमुख विशेषता है- उनकी वर्णन शैली । यह इतनी आकर्षक है कि पाठक भी लेखक के संग-संग भ्रमण करने लगता है। राहुल जी की प्रमुख कर्मस्थली तिब्बत ही रही । तिब्बत से उनका अत्यंत गहरा और भावनात्मक लगाव रहा है। यही कारण है कि उन्होंने चार बार तिब्बत की यात्रा की । 1929 में राहुल जी ने तिब्बत की पहली यात्रा की। 1930 में उन्हें महापंडित की उपाधि मिली। श्रीलंका में प्रव्रज्या ग्रहण कर वह रामोदर सांकृत्यायन से राहुल सांकृत्यायन बने । 1934 में उन्होंने तिब्बत की दूसरी यात्रा की जबकि तिब्बत की तीसरी यात्रा 1936 ईस्वी में की थी । तिब्बत की अंतिम और चौथी यात्रा उन्होंने 1938 ईस्वी में की। राहुल जी द्वारा लिखे गए यात्रा वृतांत सिर्फ स्मृतियाँ नहीं हैं बल्कि एक मिटती जाती दुनिया का अभिलेखन है। जैसा किसी कवि ने कहा है- हाथों में पता नहीं कि रबर है कि पेंसिल है। जितना भी लिखता हूं उतना ही मिटता है। हिंदी और हिमालय को राहुल जी ने बहुत प्यार दिया। उन्हीं के अपने शब्दों में- "मैं ने नाम बदला, वेशभूषा बदली, खानपान बदला, संप्रदाय बदला; लेकिन हिंदी के संबंध में मेरे विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया ।" राहुल जी के विचार आज बेहद प्रासंगिक हैं। उनकी उक्तियां सूत्र रूप में हमारा मार्गदर्शन करती हैं । हिंदी को खड़ी बोली का नाम भी राहुल जी ने ही दिया था। इतना ही नहीं ललित कला अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने बताया कि राहुल सांकृत्यायन पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने पहली बार किसी भारतीय भाषा में मध्य एशिया का इतिहास लिखा है। उनके द्वारा लिखी गई दोहाकोष और अथातो घुमक्कड़ भी हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। राहुल जी ने न सिर्फ दुर्गम भूखंडों की यात्राएं की अपितु उनका बेहद वृतांत तक लिख डाला। जरा सोचिए! किसी अनजान देश में अनजान रास्तों से गुजरते हुए जाना। इतना ही नहीं उनके सभ्यता-संस्कृति को आत्मसात करते हुए उनकी कहानियां लिखना । कितना रोमांचक रहा होगा। उस अनजान देश के खंडहर, टूटे-फूटे महल, नदी, पर्वत, जंगल,झरने इत्यादि क्या कथाएं कहती हैं, किस पुरातन इतिहास में जोड़ती है यह सब ढूंढना कोई सहज कार्य नहीं है। राहुल जी के यात्रा वृत्तांत को समझने के लिए उनकी तिब्बत यात्रा को समझना नितांत आवश्यक है । प्रथम तिब्बत यात्रा राहुल जी सन 1929-30 में करते हैं । उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नहीं थी ।प फिर भी राहुल जी दृढ़संकल्पित थे कि उन्हें तिब्बत जाना ही है। इसलिए उन्होंने 1929 में बौद्ध धर्म अंगीकार करने के बाद नेपाल के रास्ते एक भीखमंगे के छद्म वेश में तिब्बत की यात्रा की। तिब्बत की राजधानी ल्हासा की ओर जाने वाले दुर्गम रास्तों का वर्णन उसने बहुत ही रोचक शैली में किया है। इस यात्रा वृतांत से हमें उस समय के तिब्बती समाज की जानकारी मिलती है। नेपाल से तिब्बत जाने का मुख्य रास्ता फरि-कलिंड़पोड़्ग उस वक्त नहीं खुला था।फरि-कलिंड़पोड़्ग सिर्फ व्यापारिक ही नहीं सैनिक रास्ता भी था। इसलिए राहुल जी को जगह-जगह फौजी चौकियों और किले भी मिले जिनमें कभी चीनी पलटन रहा करती थी । ऐसे ही परित्यक्त एक किले में राहुल जी चाय पीने के लिए ठहरे। वे कहते हैं कि तिब्बत में यात्रियों के लिए बहुत सी तकलीफें भी है और कुछ आराम की बातें भी। सन् 1929 में जब भारत गुलाम था उस वक्त हम मानसिक रूप से भी कई बेड़ियों में जकड़े हुए थे। भारत में जब धर्म की राजनीति चरम पर थी, पर्दा प्रथा प्रचलन में था, स्त्रियों को आजादी नहीं थी; उस समय भी तिब्बत की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थी । वहां जाति-पाति, छुआछूत का सवाल ही नहीं था और ना औरतें पर्दा ही करती थीं। लेखक को डाँड़ा थोंड़्ला पार करना था । यह सबसे खतरनाक रास्ता था । 16-17 हजार फीट की ऊंचाई होने के कारण दोनों तरफ मीलों तक कोई गांव-गिराव नहीं था । डाकुओं का भी वह मनपसंद जगह था क्योंकि जो स्थान निर्जन सुनसान हो, वहां डकैत भी छुपे रहते हैं । लेकिन लेखकों जहां भी खतरा महसूस होता, वह कुची-कुची (दया-दया) एक पैसा कह कर भीख मांगने लगते । लेखक घोड़े पर सवार होकर डाँड़े के ऊपर पहुंच जाते हैं । वे समुद्र तल से 17-18 हजार फीट ऊंचे खड़े थे । सर्वोच्च स्थान पर डाँड़े के देवता का स्थान था जो पत्थरों के ढेर, जानवरों के सिंगों और रंग-बिरंगे कपड़े की झंडियों से सजाया गया था । डाँड़े से उतराई करते हुए लेखक टिंड़री के मैदान में पहुंचते हैं । वहां लेखक एक मंदिर में पहुंचते हैं जहां कंजूर यानी बुद्धवचन का अनुवाद हो रहा था और वहां 103 पोथियाँ रखी हुई थी । लेखक कहते हैं कि मेरा आसन भी वहां लगा । वह बड़े-मोटे कागज पर अच्छे अक्षरों में लिखी हुई थी । एक-एक पोथी 15-15 सेर से कम नहीं रही होगी । इस तरह हम देखते हैं कि लेखक हस्त लिपियों की खोज कितनी पीड़ा उठाकर करते हैं । 21वीं सदी के इस दौर में जब संचार क्रांति के साधनों ने समग्र विश्व को एक ग्लोबल विलेज में परिवर्तित कर दिया है एवं इंटरनेट द्वारा ज्ञान का समूचा संसार क्षणभर में एक क्लिक पर सामने उपलब्ध हो, ऐसे में यह अनुमान लगाना कि कोई व्यक्ति दुर्लभ ग्रंथों की खोज में हजारों मील दूर पहाड़ों और नदियों के बीच भटकने के बाद उन ग्रंथों को खच्चरों पर लादकर अपने देश में लाए , बहुत ही रोमांचक लगता है। राहुल जी ने यह कहा भी है कि पहली बार जब वे तिब्बत में प्रवेश कर रहे थे तो उन्हें उतने ही कष्टों का सामना करना पड़ा था जितना कि हनुमान जी ने लंका प्रवेश में किया था । करीब सात-आठ हजार फुट की ऊंचाई पर जब लेखक यात्रा कर रहे थे तो उन्हें लाल, गुलाबी और सफेद कई रंग के फूलों वाले बुरांश के पेड़ मिले थे । बुरास को वहां अशोक भी कहा जाता है लेकिन हमारे यहां के अशोक के वृक्ष बुरांश से अलग हैं । अंग्रेजी में बुरांश को रोडेन्ड्रन कहा जाता है । लेखक कहते हैं कि एक वृक्ष तो अपने फूलों से ढका हुआ इतना सुंदर मालूम हो रहा था कि उसे देखने के लिए मैं ठहर गया । कैमरे से फोटो लिया । लेकिन फोटो में रंग कहां से आ सकता था । उस समय ब्लैक एंड वाइट फोटो ही लिए जा सकते थे । इस तरह राहुल जी जंगल, वनस्पति, पहाड़, पर्वत, मैदान के अतिरिक्त वहां की विवाह संस्था का भी जिक्र करते हैं । वे कहते हैं कि पहाड़ हरे-भरे जंगलों से परिपूर्ण थे । वृक्षों में छोटी बांसी, बंज, ओक और देवदार जातीय वृक्ष बहुत थे । वह कहते हैं कि वहां का जंगल इसलिए भी सुरक्षित रह गया क्योंकि वहां जनवृद्धि का कोई डर नहीं है । तिब्बती लोगों में पांडव विवाह होता है यानी सभी भाइयों का एक विवाह होता है । यदि एक पीढ़ी में दो भाई हैं, दूसरी पीढ़ी में दस तो तीसरी पीढ़ी में फिर दो-तीन हो जाने की संभावना है । इस प्रकार न तो वहां पर घर बढ़ता है और नहीं खेत- संपत्ति बँटती है । आदमियों के न बढ़ने से जंगल काट कर नए खेतों को आबाद करने की आवश्यकता भी नहीं होती है । लेखक बताते हैं कि नेपाल के इधर के पहाड़ों में तिब्बत का नमक चलता है जो सस्ता भी होता है । नेपाली लोग अपनी पीठ पर मक्की, चावल या कोई भी अनाज लादकर ञेनम पहुंचते हैं और वहां से नमक लेकर लौट जाते हैं । वे आगे कहते हैं कि इधर के गांव में हर जगह बौद्ध चैत्य या मंत्र खुदे हुए पत्थरों की दीवारें रहती हैं । नमक लादे लोग इन्हीं चैत्यों और मांडियों में शौच जाते हैं ।. बस्ती के आसपास तो गंदगी का ठिकाना ही नहीं है । ञेनम के पास पहुंचते ही उन्हें एवरेस्ट पर्वत भी दिखाई पड़ा । पुस्तकों की खोज करते-करते लेखक सस्क्या की ओर पहुंचे । वे रास्ते में मक्खन वाला नमकीन चाय पीते हैं । चाय के साथ सत्तू खाने की भी परंपरा रही है । थुकपा उन्हें बहुत पसंद आता है । थुकपा के बारे में वह बताते हैं कि वह एक तरह की पतली खिचड़ी है । यह हमारे यहां की खिचड़ी से बिल्कुल अलग है । हमारे यहां की खिचड़ी में दाल चावल इत्यादि डाले जाते हैं किंतु थुकपा में अन्न की जगह सत्तू, मूली या आलू, मांस और हड्डी, चर्बी, नमक-प्याज जैसी चीजें अधिक पानी में डालकर घंटों पकाई जाती है । फिर कटोरों में लेकर उसे गरमा गरम किया जाता है । चर्बी मांस और प्याज डालकर दो-तीन घंटे पकाया गया हो तो बहुत स्वादिष्ट होता है, इसमें संदेश नहीं । बड़े घरों में तो इसे 5-5, 6- 6 घंटे चूल्हे पर रखकर छोड़ा जाता है । चूल्हों पर एक साथ पांच बर्तन रखे जा सकते हैं । इसलिए ज्यादा इंधन खर्च होने का सवाल ही नहीं है । यह गरमा गरम थुकपा चीनी मिट्टी के कटोरे में रात में सोने से पहले भी पीना पसंद करते हैं। तिब्बत में सत प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि वह मांस बहुत सुलभ है । बड़े घरों में सूखा मांस हमेशा तैयार रहता है । क्योंकि किसी मेहमान की खातिरदारी के लिए मांस आवश्यक चीज है । सूखा होने पर उसे पकाने की आवश्यकता नहीं समझी जाती । इसलिए उसके दो एक बड़े टुकड़े एक ऊंचे पांव की तस्करी पर रखकर नमक और चाकू के साथ मेहमान के सामने रख दिए जाते हैं । इसके साथ ही लकड़ी के सुंदर सत्तू दान में सत्तू और सुंदर चीनी प्याला चाय के लिए रखा जाता है । जाड़ा आरंभ होने से पहले ही भेड़ या याक जैसे पशुओं को मार कर रख लिया जाता है क्योंकि जाड़ों के आरंभ होने पर वहां घास और दूसरे चारों की कमी हो जाती है । जिसके कारण पशु दुर्बल होने लगते हैं । तिब्बती पंचांग का चौथा महीना शाक्य माह के आने पर उस समय प्राणी हिंसा करना बुरा समझा जाता है । यह बुद्ध के जन्म,निर्वाण और बुद्धत्व प्राप्ति का महीना होने के कारण बहुत पुण्य माना जाता है । सन 1934 में राहुल जी ने तिब्बत की दूसरी यात्रा की थी। इसका वर्णन हमें पत्रों के रूप में दिखाई पड़ता है । वह अपने परम मित्र आनंद जी को पत्र लिखते हैं और बड़ी ही सूक्ष्मता से अपनी यात्रा के विविध पहलुओं से उन्हें अवगत कराते हैं । एक पत्र में वह लिखते हैं- प्रिय आनंद जी, कलिमपोंग से लहासा तक वही पुराना रास्ता था । इसलिए उसके बारे में विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं थी । लहासा 2 महीने 11 दिन रहा । इस बीच में विनय पिटक के अनुवाद और विज्ञप्ति के कुछ भाग को संस्कृत में करने के अतिरिक्त दो महत्वपूर्ण तालपत्र के संस्कृत ग्रंथों अभिसमयालंकार टीका और वादन्याय टीका को खोज पाने का सौभाग्य मिला । ( यह उनकी खोजी प्रवृत्ति को दशार्ती है ।) दोनों पुस्तकों के फोटो ले लिए । एक कॉपी अपने पास रख नेगेटिव सहित एक-एक प्रति पटना में श्री जायसवाल जी के पास भेज दी है । अबकी बार यहां भिक्षुओं तथा गृहस्थों के नाना प्रकार के वस्त्र, आभूषण भी संग्रह कर रहा हूं । तिब्बत में चित्रकला पर एक लेख लिख चुका हूं जो किसी हिंदी पत्र में भेज दूंगा- सचित्र । साथ ही यहां के चित्रकारों के सभी रंग, उनके बनाने का ढंग, तूलिका आदि का संग्रह किया है । तिब्बती भाषा की दूसरी तीसरी पुस्तकों को छापने के लिए कोलकाता भेजा था, रास्ते में उसी थैले में किसी ने शराब रख दी, जिससे भींग कर पुस्तक के कितने ही भाग अपाठ्य हो गए । विनयपिटक के हिंदी अनुवाद को भी आदमी के हाथ गयाची (डाकखाना) जहां कि अंग्रेजी डाकखाना है, भेजा है । देखिए, सकुशल पहुंच जाए तब । नहीं तो योगिनी-डाकिनी के मुल्क में कहीं फिर बोतल लुढ़क गई तो वह भी राम-राम सत्य । अपने राम ने तो कसम खा रखी है यानी लेखक ने कसम खा रखी है कि यदि लिखी हुई कोई पुस्तक एक बार गुम या नष्ट हो जाए तो फिर उसमें हाथ नहीं लगाना । हां तो फेम्बो की यात्रा की क्यों जरूरत पड़ी । 10 वीं सदी से 13 वीं सदी तक कितने ही अच्छे-अच्छे विद्वान इस प्रदेश में हुए । मेरे एक विद्वान मित्र का कहना है कि फेम्बो या फेन् बो हमेशा तंत्र मंत्र से बगावत करता रहा है । रावण की लंका में विभीषण के समान दीपंकर पंडित शर-बा तो तंत्र मंत्र के कठोर विरोधी थे । मालूम हुआ कि दसवीं से 13 वीं शताब्दी तक के कितने ही विहार हैं जिनमें रेड़िड़् में तो निश्चित ही थोड़ी सी ताल पत्र की पुस्तकों के होने की बात बतलाई गई है । वस्तुत: यही कारण है इधर आने का । जब पुस्तकों के लिए आना ही था तो उसके लिए विशेष तैयारी करनी जरूरी थी । यात्रा हेतु इस बार वह भीखमंगे का छद्म वेश नहीं, सामने से पूरी तैयारी के साथ तिब्बत में प्रवेश की योजना बनाते हैं । सबसे पहले तो सभी पुराने मठों के लिए पुस्तकें दिखाने हेतु वह भोट सरकार से चिट्ठी प्राप्त कर लेते हैं । चिट्ठियों के बाद दूसरा प्रश्न था साथी और सवारी का । साथियों में गे से के अतिरिक्त एक फोटोग्राफर की आवश्यकता थी । सौभाग्य से लहासा के फोटोग्राफर श्री लक्ष्मी रत्न ने चलना स्वीकार कर लिया । डाकू एवं चोरों से रक्षा हेतु एक और साथी इन-ची मिन-ची जुड़े । एक पिस्तौल बंदूकधारी थे । एक अन्य साथी जुड़े जो अच्छे चित्रकार हैं तथा इतिहास और न्याय शास्त्र की अच्छी जानकारी भी रखते हैं । कहसुन कर राहुल जी ने उनके भी गले में एक सात गोली का पिस्तौल एवं कारतूसों की माला लटका दी । सवारी के लिए खच्चरों की व्यवस्था भी हो गई थी । छ:. खच्चरों की व्यवस्था साहू पूर्णमान ने कर दी । खच्चरों के सरदार थे सो- नम ग्यलन छन थे । इस तरह हम देखते हैं कि यात्रा हेतु राहुल जी की पूरी तैयारी तात्कालिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए की गई थी । सभी साथी एक दूसरे के साथ मस्ती करते हुए आगे बढ़ते हैं । फोटोग्राफर लक्ष्मी रतन को लोग नाती-ला के नाम से जानते हैं । दरअसल उनकी नानी उन्हें नाती कहती थी और भोट वासियों ने उन्हें नाती-ला बना दिया । अब बुढ़ापे तक उसे नाती-ला ही रहना है । नाती-ला को इस बात से बहुत ऐतराज था । इसलिए सभी उन्हें नाती-ला कहकर चिढ़ाते थे । इस तरह घुमक्कडों की छोटी सी टोली लक्ष्य प्राप्ति हेतु हंसते-गाते निकल पड़ती है । ये सभी लहासा से उत्तर की ओर जाते हैं। चांग की ओर, सक्य की ओर एवं ञेनम की ओर, नेपाल की ओर राहुल सांकृत्यायन यात्राएं करते हैं । और बहुत ही लाभप्रद मनोरंजक यात्रा वृतांत भी लिखते हैं । अब थोड़ा सा जिक्र लद्दाख यात्रा का भी कर लिया जाए । कश्मीर के रास्ते लद्दाख जाकर जब वे वापस लौट रहे थे तो हमेशा की तरह वह आनंद जी के नाम चिट्ठी लिखते हैं । उनके द्वारा लिखी गई चिट्ठी हमें वहां के लोगों की सभ्यता-संस्कृति, रहन-सहन वेशभूषा, मठों एवं भौगोलिक क्षेत्र एवं जलवायु से लगातार जोड़ती रही। लेखक हमें बताते हैं कि लद्दाख में पित्तोक, ठिक्-से, रिजोंड्ं और लि-कीर यह प्रधान गोलूपा यानी पीली टोपी वाले मठ हैं । लि-कीर का कोई अवतारी लामा नहीं है । यह 11वीं शताब्दी में स्थापित हुआ था । बाकी तीन मठों के अधिपति अवतारी लामा होते हैं जिन्हें लद्दाख में कुशोक कहते हैं । पित्तोक का अशोक 15-16 वर्ष का बालक है जो आजकल लहासा में पढ़ रहा है । रिजोंड्ं का कुशोक तो तीन चार वर्ष का बच्चा है । ठिक्-से के वर्तमान अशोक की जीवनी नाना चित्र-विचित्र घटनाओं से परिपूर्ण है । ठिक-से के कुशोक का बाप एक बड़ा राज कर्मचारी है । अकेला पुत्र होने पर भी मठ के अधिकार के लोभ से या अवतारवाद के मायाजाल में पढ़कर बाप ने लड़के को कुशोक बनने के लिए दे दिया । लड़कपन तो जैसे-तैसे कुछ पढ़ते, कुछ खेलते बीता । जब यौवन में प्रवेश हुआ, तब उसे अपने पर काबू रखना भारी हो गया । पहले छुप-छुपकर स्त्री और शराब का दौर चलता था, पीछे खुलकर । साथ में सिगरेट भी पीने लगा जिसका पीना भोट देशीय उन लामाहों के लिए अक्षम्य अपराध समझा जाता है जो दिन रात छड़ यानी शराब के गर्क में रहते हैं । मठ के भिक्षुओं और गृहस्थों को बुरा लगने लगा । किंतु करते क्या । वह तो एक पुरातन सिद्ध पुरुष का अवतार था । धीरे-धीरे उसने मठ की चीजें बेचनी शुरू कर दी । मारपीट हुई, मुकदमा हुआ । अंत में उसे लद्दाख छोड़ देना पड़ा । मठ के अधिकारियों के बीच जब अवतार को लेकर विचार-विमर्श हो रहा था तो लेखक राहुल सांकृत्यायन ने भी अपने विचार रखे । उनका कहना था- अब अवतार को तिलांजलि दो । पाँच समझदार लड़कों को अच्छी तरह पढ़ाओ । जो अधिक योग्य होगा वही कुशोक होगा । लेखक आगे कहते हैं कि हां तो सभी ने कहा किंतु हां पर अमल होगा इसका मुझे जरा भी विश्वास नहीं । उन्हें वहां की एक और घटना दु:खद मालूम होती है । वे कहते हैं कि सभी खच्चर वालों के साथ लद्दाखी लोग बुरा बर्ताव करते हैं । उन्हें भोटा भोटा कह कर पुकारना तो आम बात है, उन्हें मां बहन की गाली भी दे देते हैं । लेखक कहते हैं कि जब हम लाचा लुड़्ला के उस पार ठहरे थे, तब रात के आठ-नौ बजे एक बूढ़ा लद्दाखी राहगीर डेरा देखकर ठहरने के लिए आया । बेचारा बोली भी नहीं समझता था । तंबू में नहीं, बाहर एक कोने में सोना चाहता था । किंतु उसे गाली दे दे, डंडे मारने का डर दिखा कर वहां से भगाया गया । मैंने सारी जमात की मनोवृति देखकर कुछ नहीं कहा । किंतु दु:ख मुझे बड़ा हुआ । लोग कह रहे थे कि चोर है और भी इसके साथी होंगे । मैं सो गया । रात को मैंने स्वप्न देखा कि कुछ भोटिया चोर मेरे बॉक्स को उठा ले गए । जिसमें मंझिम निकाय का अनुवाद और 4 भोट भाषा की पुस्तकें हैं । मैंने कहा- वही मेरी तीन मास की कमाई है । और चोरों को इससे कुछ फायदा नहीं । अंत में सोते ही टटोलकर पास में वह बक्से को महसूस किया तो दु:स्वप्न हटा । इस तरह हम देखते हैं कि राहुल जी वहां के लोगों की मानसिक प्रवृत्ति भी बीच-बीच में हमें बताते रहते हैं । इसके साथ-साथ वहां की स्त्रियों की वेशभूषा एवं रास्ते में आने वाले गांव का जिक्र भी करते हैं । "पूरे एक सप्ताह के बाद आज दोपहर बारह बजे पहला घर देखने को मिला । यह दर्जा गांव था । अब आसपास पहाड़ों पर काफी देवदार के वृक्ष थे । गांव में यहां भी लद्दाख वाले सफेदे और वीरी के वृक्ष मौजूद थे । सिर्फ घर का ढंग ही लद्दाखी नहीं था, बल्कि थोड़ा नीचे मैंने कुछ स्त्रियों को फीरोजो के सपार्कार लद्दाखी शिरोभूषण पिर-क को भी पहने देखा । आगे एक स्त्री को पीठ पर बोझा ले गुजरते देखा । उसकी नाक में सोने की दुअन्नी भर लॉन्ग भी पड़ी थी । मैं तो समझने लगा कि सारे लाहुल में स्त्रियों ने आभूषणों में लद्दाखी पि-रक और लॉन्ग को अपनाया है किंतु आगे देखने से पता चला कि लद्दाख की पि-रक सिर्फ दारचा गांव में ही है ।" उन्होंने देखा कि फसलों की कटाई ढुलाई करने वाले जो स्त्री पुरुष हैं, वह अपनी मेहनत को हल्की करने के लिए स्वर में स्वर मिलाकर बारी-बारी से कुछ गाते जा रहे हैं । कोईलों के स्वदेशी इन स्त्री पुरुषों के कंठों में भी कुछ असर है । राह में राहुल जी को लाखों वर्षों तक टूट-टूट कर जमा होती पहाड़ी चट्टानों का ढेर भी मिलता है और वे उस ढेर का इतिहास भी मालूम कर लेते हैं । बहुत पहले इसी स्थान पर एक बड़ा गांव था, जिसमें 100 घर थे। एक दिन गांव के सारे लोग एकत्र हो भोज कर रहे थे । उसी समय बड़े लाचा की ओर से कोई वृद्ध आया। उसे साधारण भोटिया समझकर सभी लोगों ने उसका तिरस्कार कर पंक्ति से बाहर निकाल दिया । लेकिन सबसे अंत में एक लड़का बैठा हुआ था। उसने बूढ़े को अपना आसन दे अपने से पहले स्थान पर बैठाया। भोज और छड़ के बाद वृद्ध अंतर्ध्यान हो गया। लोगों ने नाच-गाना चालू कर दिया उसी समय एक भारी तूफान आया और उस तूफान में लाखों भारी- भारी चट्टाने पहाड़ से गिरने लगी। सारा गांव उसके नीचे दब गया। तूफान ने उस लड़के को उड़ा कर दरिया पार कर दिया था। उसकी संतान अब भी मौजूद है और शायद यह ऐतिहासिक घटना भी उसी की परंपरा से सुनी गई है। ऐसा माना जाता था कि इन स्थानों पर एक जबरदस्त भूत रहने लगा। वह दिन-दोपहर को आदमी को पकड़ कर खा जाता था। उस तरफ इक्के-दुक्के निकलने वाले आदमी त्राहिमाम करते जाते थे। आस-पास के गांव वाले कितने ही पूजा पाठ, तंत्र मंत्र करके हार गए लेकिन वह भूत काबू नहीं आया । दो-तीन वर्ष पूर्व हेमिस (लद्दाख) मठ के महंत कुशग स्तग सङ्ग् रसपा इधर से आए और मंत्र से भूत को बांध दिया। तब से उस भूत ने न तो किसी को सताया और न हीं उसे निकलते ही किसी ने देखा। राहुल जी कहते हैं कि पहली घटना से नष्ट हुए गांव के प्राणियों के लिए मुझे अफसोस ही हुआ, किंतु दूसरे भूत की बात सुनकर तो मेरी आत्मा रोम-रोम से अपने मित्र कुशक् तक सङ्ग् रस् पा को आशीर्वाद देने लगा- ह्लयदि वह भूत कहीं खुला होता तो मेरी क्या हालत होती ! शायद मेरे हाथ का लिखा हुआ पत्र तुम्हें नहीं मिल पाता। सबसे अधिक अफसोस तो मुझे सुकखु लाल के घोड़ों के लिए होता जिसपर मैं सवार था। क्या जाने भूखे भूत का पेट सिर्फ सवार से नहीं भरता। लेखक की ये बातें सच में पाठकों को गुदगुदा जाती हैं । यात्रा संस्मरण को, यात्रा वृतांत को और भी रोचक बना डालती है। राहुल सांकृत्यायन के यात्रा साहित्य में दो प्रकार की दृष्टि देखने को मिलती हैं। पहले प्रकार में यात्राओं का केवल सामान्य वर्णन है। और दूसरे प्रकार की यात्रा सहित को शुद्ध साहित्यिक कहा जा सकता है। दूसरे प्रकार के यात्रा साहित्य में राहुल सांकृत्यायन ने स्थान के साथ-साथ अपने समय को भी लिपिबद्ध किया है। उदाहरणस्वरूप, बाकू से ईरान के लिए जब राहुल जी प्रस्थान करते हैं तो बड़े प्रेम से अपना स्वानुभव पाठकों के साथ साझा करते हैं। वे कहते हैं कि ह्ल11 सितंबर 1935 ई को हमारा जहाज खुलने वाला था। हम अपने सामान के साथ 2:30 बजे बंदर पर पहुंचे। रूस में सभी काम योग्यता होने पर सभी के लिए खुले हुए हैं। बड़े से बड़े पद के लिए भी नहीं स्त्री पुरुष का ख्याल है, न एशियाई या यूरोपियन का ख्याल। कस्टम आॅफिसर एशियाई थे और फारसी जानते थे। उन्होंने बड़ी शिष्टतापूर्वक हमारा सामान देखा। रुपयों को भी गिन कर देख लिया। थोड़ी देर बाद हम अपने जहाज में पहुंचे। वे आगे कहते हैं कि पहले-पहल सोवियत के जहाज को देखने का मौका मिला। जहाज का नाम फोमिन था। वह दूसरे दर्जे के यात्री थे और बाकू से पहलवी तक उन्हें $19 (लगभग ?50) देना पड़ा। किराए में दो वक्त का भोजन भी शामिल था।ह्ण राहुल जी बताते हैं कि रूस की तरह ईरान में भी मिल की जगह किलोमीटर का इस्तेमाल होता है। कैस्पियन के किनारे वाला ईरान का यह प्रांत जिलान बहुत ही हरा भरा है। इसके हरे-भरे जंगल, बड़े-बड़े वृक्ष लहलहाते चावल के खेत बड़े सुंदर मालूम होते थे। ईरानी तो इसके प्राकृतिक सौंदर्य पर इतने मुग्ध हैं कि इसे हिंद कोचक यानी छोटा हिंदुस्तान नाम दे रखा है। इन्हीं बातों में इसकी उत्तर बिहार से समानता है। मकानों की छतें अधिकतर फूस की हैं। गांव में अभी कोट-पतलून धीरे-धीरे आ रहा है और उसी के अनुसार मेज-र्सी भी। इस प्रांत में पहुंचकर एक बार भारत याद आने लगा।
एबीएन डेस्क। कोविड-19 संक्रमण के नए मामलों में लगातार इजाफे ने आर्थिक स्थितियों में सुधार को लेकर खतरा बढ़ा दिया है। आशा तो यही है कि वायरस पर जल्दी नियंत्रण कर लिया जाएगा और यह आर्थिक गतिविधियों को अधिक प्रभावित नहीं करेगा। परंतु देश के नीति निमार्ताओं के लिए सिर्फ वायरस ही चुनौती नहीं है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जो परिस्थितियां बन रही हैं वे नीतिगत क्षेत्र की जटिलताएं बढ़ा सकती हैं। उदाहरण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताजे मासिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ऐसे बॉन्ड निवेशक सुधार की प्रक्रिया को क्षति पहुंचा सकते हैं जो मुद्रास्फीति बढ़ाने वाली मौद्रिक या राजकोषीय नीतियों की स्थिति में बॉन्ड बिकवाली करते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आरबीआई प्रतिफल में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है लेकिन हालात नियंत्रित करने में दोनों पक्षों की भूमिका होती है। हालिया दिनों में बॉन्ड प्रतिफल में इजाफा हुआ है और मुद्रा की बढ़ी हुई लागत सुधार की प्रक्रिया को बाधित कर सकती है। परंतु आरबीआई का आकलन कुछ हद तक अतिरंजित लगता है। प्रतिफल के पीछे कुछ बुनियादी वजह हैं और केंद्रीय बैंक को आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है। सरकारी ऋण में भी काफी इजाफा हुआ है और वह निकट भविष्य में भी ऊंचे स्तर पर बना रह सकता है। मूल मुद्रास्फीति फरवरी में छह फीसदी के स्तर पर पहुंच गई और बढ़ती जिंस कीमतें शीर्ष दर को एक बार फिर बढ़ा सकती हैं। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि भारत इकलौता बाजार नहीं है जहां उधारी लागत बढ़ रही है। 10 वर्ष के अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल 2020 के निचले स्तर से 100 आधार अंक बढ़ चुका है। अमेरिका में उच्च प्रतिफल का असर वैश्विक वित्तीय तंत्र पर पड़ेगा। भारतीय बाजार भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। ऐसी चिंताएं हैं कि अमेरिका में 1.9 लाख करोड़ डॉलर का अतिरिक्त प्रोत्साहन कीमतों में इजाफा कर सकता है। अर्थशास्त्री लॉरेंस समर्स ने हाल ही में द वॉशिंगटन पोस्ट में एक आलेख में लिखा...ऐसी संभावना है कि सामान्य मंदी की स्थिति के बजाय द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर के स्तर का वृहद आर्थिक प्रोत्साहन ऐसा मुद्रास्फीतिक दबाव बनाएगा जो पीढि?ों से नहीं देखा गया हो। परंतु अमेरिकी फेडरल रिजर्व फिलहाल चिंतित नहीं है। फेड के चेयरमैन जेरोम पॉवेल का मानना है कि कीमतों में इजाफा अस्थायी होगा। पॉवेल के चिंतित न होने की वजह है। वर्ष 2007-08 के वित्तीय संकट के बाद से ही मुद्रास्फीति अधिकांश समय 2 फीसदी के स्तर के नीचे बनी रही। इसके अलावा फेडरल रिजर्व कुछ समय के लिए उसे 2 फीसदी के दायरे से ऊपर जाने दे सकता है ताकि बीते वर्षों की कम कीमत की भरपाई हो सके। इससे वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ेगी। बाजारों को यह पता नहीं कि फेड किस समय क्या कदम उठाएगा। इसके अतिरिक्त प्रश्न यह भी है कि यदि मुद्रास्फीति फेड के अनुमान से बहुत अधिक ऊपर चली गई तो क्या होगा? विगत एक वर्ष में फेड की बैलेंस शीट करीब दोगुनी हो चुकी है और ऋण की लागत कम रखने के लिए वह निरंतर परिसंपत्तियां खरीद रहा है। चूंकि राजकोषीय हस्तक्षेप के आकार की तुलना दूसरे विश्वयुद्घ से की जा रही है इसलिए नतीजों पर ध्यान देना भी अहम है। फेडरल रिजर्व बैंक आॅफ सेंट लुइस ने गत वर्ष एक नोट में कहा था कि फेड ने सन 1942 में प्रतिफल को सीमित किया था ताकि उधारी लागत कम रखी जा सके। परंतु घाटे के लगातार बढ़ते रहने के कारण फेड ने सरकारी बॉन्ड एकत्रित करना जारी रखा। सन 1947 तक मुद्रास्फीति बढ़कर 17 फीसदी हो गई थी। आखिरकार सन 1951 में मुद्रास्फीति के 20 फीसदी का स्तर पार करने के बाद प्रतिफल को लक्षित करना बंद किया गया। यह जरूरी नहीं है कि मुद्रास्फीति उसी तरह बढ़ेगी। जापान में 2016 से प्रतिफल को निशाना बनाया जा रहा है लेकिन वहां कीमतें नहीं बढ़ीं। परंतु जापान जैसी मुद्रास्फीति अमेरिका और शेष विश्व के लिए अधिक दिक्कत खड़ी कर सकते हैं। हालात अनिश्चित हैं जिससे बॉन्ड बाजारों में अनिश्चितता बढ़ रही है। परंतु एक बात तय है कि अमेरिका पहले जताए अनुमानों की तुलना में तेज वृद्घि हासिल करेगा। इसका अलग प्रभाव होगा। मसलन अमेरिका में उच्च वृद्घि पूंजी आकर्षित करेगी और डॉलर को मजबूत करेगी। इससे शेष विश्व में हालात तंग हो सकते हैं। वृद्घि और वित्तीय स्थिरता को भी जोखिम उत्पन्न हो सकता है। जिन उभरते बाजारों ने अल्पावधि के डॉलर वाला कर्ज लिया है उन्हें भी दिक्कत हो सकती है। यकीनन भारत 2013 से बेहतर स्थिति में है। आरबीआई ने 2020 में अतिरिक्त विदेशी पूंजी की मदद से भंडार बनाकर बेहतर किया। इससे बाहरी मोर्चे पर अस्थिरता का प्रबंधन हो सकेगा। अमेरिका में बॉन्ड प्रतिफल का सामान्य होना भारत में पूंजी की आवक और ऋण लागत को भी प्रभावित करेगा। वृहद आर्थिक स्थिरता के क्षेत्र में भारत की स्थिति कमजोर कड़ी है। अमेरिका में उच्च वृद्घि जिंस कीमतों को प्रभावित कर सकती है और मुद्रास्फीति बढ़ा सकती है। ऐसे में आरबीआई को कई चुनौतियों का सामना करना होगा। उसे मुद्रा बाजार की अस्थिरता का प्रबंधन करना होगा, सरकार की बढ़ी उधारी और मुद्रास्फीति के दबावों से निपटना होगा तथा आर्थिक स्थिति बहाल करनी होगी। आने वाले महीनों में घरेलू और अंतररार्ष्ट्रीय आर्थिक हालात को देखते हुए विरोधाभासी हालात बन सकते हैं। अर्थशास्त्री रॉबर्ट शिलर द्वारा एकत्रित आंकड़ों के अनुसार 10 वर्ष का अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल सन 1871 से ही औसतन 4.5 फीसदी रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में प्रतिफल अपेक्षाकृत कम रहा है क्योंकि मुद्रास्फीति कम रही लेकिन भारी राजकोषीय प्रोत्साहन, केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट में तेजी से विस्तार, मांग में इजाफा और बचत के कारण मजबूत पारिवारिक स्थिति से हालात बदल सकते हैं। ऐसे में वैश्विक वित्तीय बाजार में सही मायनों में तांडव देखने को मिल सकता है।
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