विचार

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Published / 2021-10-03 14:30:50
पहचान की राजनीति से ही भविष्य के मुद्दे साधने की जुगत में सोरेन

एबीएन डेस्क, रांची। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से करारी हार का सामना करना पड़ा। झामुमो ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन किया था। भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास अपनी सीट भी नहीं जीत सके। राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा में अकेले झामुमो के पास 30 सीट हैं। अगर भाजपा अपनी 25 सीट के साथ सरकार बनाने की जुगत भी लगाए तो इसके लिए पर्याप्त दलबदल संभव नहीं है। राज्य में ऐसा दूसरी बार होगा जब कोई सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी। राज्य के मुख्यमंत्री और झामुमो नेता हेमंत सोरेन ने हाल ही में कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो भ्रमित करने वाले हैं। पिछले चुनाव प्रचार के दौरान सोरेन ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था। यह वादा अभी तक लंबित है। इसके बजाय सरकार ने पिछले महीने एक कानून पारित किया जिसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि सरकारी और निजी क्षेत्रों की नौकरियों में 75 प्रतिशत आरक्षण स्थानीय लोगों के लिए होगा। इन नौकरियों की वेतन सीमा 30,000 रुपये प्रतिमाह है। इस आय सीमा और इससे कम वेतन पर राज्य से बाहर के उम्मीदवारों के लिए केवल 25 प्रतिशत रिक्तियां ही होंगी। इस पर कोई भी एतराज नहीं जता रहा है क्योंकि निजी क्षेत्र का भी कहना है कि वे इन रिक्तियों को स्थानीय लोगों के माध्यम से भर रहे हैं।झारखंड में पहचान की एक मजबूत भावना है। पहले सबको एकजुट करने वाला कारक, विदेशी (दिकु), गैर-आदिवासी ही था। प्रारंभ में झारखंड के आदिवासियों ने मुगल वंश और अंग्रेजों द्वारा अपनी समृद्ध भूमि और जंगलों पर कब्जा करने के प्रयासों का पुरजोर तरीके से विरोध किया। लेकिन आदिवासी उस वक्त हाशिये पर थे जब हिंदू व्यापारी और मुस्लिम किसान यहां आए। इसके बाद ही यहां कानून-व्यवस्था और आधुनिक प्रशासन की स्थापना हुई। ब्रितानी हुकूमत और उससे जुड़े तंत्र ने इन आदिवासियों को कंगाल बनाने की प्रक्रिया आसान कर दी। प्रशासन का कामकाज दिकुओं द्वारा देखा जाता था और आदिवासी कागजी मुद्रा से वाकिफ ही नहीं थे। उनके गांव, मुख्य रूप से मुस्लिम जमींदारों के हाथों में चले गए जो जंगल में अपनी पहुंच बनाने के साथ ही वहां रहने वाले समुदायों का इस्तेमाल सस्ते श्रमिकों के रूप में करना चाहते थे। स्वतंत्र भारत ने इन समुदायों के लिए जो भी पेशकश की वह उनकी बेहतरी के लिए बहुत कम था। हालांकि मिशनरी यहां रह गए और आदिवासियों ने हिंदू धर्म और देवताओं के अपने संस्करण को नष्ट करने के प्रयासों का विरोध करना जारी रखा जो जीवित आदिवासी नेताओं के आदर्श पर आधारित थे। इनके अंदर यह अहसास बढ़ता गया कि जब तक उनकी पहचान को विशिष्ट तौर पर मान्यता नहीं दी जाती तब तक उनकी स्थिति में सुधार नहीं होगा और इसके लिए उन्हें स्वशासन और अपने प्रांत की आवश्यकता थी। झामुमो की शुरुआत 1973 में एक युवा शिबू सोरेन ने की थी। राज्य में बाहरी लोगों यानी दिकु की मौजूदगी केे साथ ही आदिवासी पहचान को भी जोड़कर रखा गया। लेकिन धीरे-धीरे, युवा आदिवासियों ने महसूस किया कि दिकु का विरोध करने की तुलना में उनका साथ देना अधिक लाभदायक था। इस तरह के सहयोग का एक नतीजा मधु कोड़ा और खदान पट्टा घोटाला था। लेकिन अब एक और खतरा मंडरा रहा है और यह झारखंड में भाजपा का बढ़ता दावा है। पार्टी के पास मैदान में उतारने के लिए नेता के तौर पर राज्य में एक विश्वसनीय चेहरा भले ही न हो लेकिन यह विचार अपने आप में ही अहम है कि आप हिंदू और आदिवासी दोनों हो सकते हैं और यह जोर पकड़ रहा है। आदिवासियों के बीच विभाजन के साथ, झामुमो को एक व्यापक पहचान की अधिक आवश्यकता है जो एक ऐसे व्यक्ति के प्रति उपयुक्त है जो न तो हिंदू है, न ही मुस्लिम बल्कि झारखंडी है। झारखंड विधानसभा में नमाज कक्ष बनाने का विवाद उसी कवायद का हिस्सा है। सरकार ने पिछले महीने घोषणा की थी कि मुस्लिम विधायकों को एक अलग कमरा आवंटित किया जाएगा ताकि वे उस आवंटित जगह में नमाज पढ़ सकें। यह कदम इस तथ्य को मान्यता देने से भी जुड़ा था कि झारखंड में मुसलमान राज्य की व्यापक पहचान का हिस्सा बन गए हैं और उनके साथ झारखंडी के तौर पर और मुस्लिम होने के नाते भी वैसा ही बरताव होना चाहिए और अकेले झामुमो ही उनके हितों की रक्षा सुनिश्चित कर सकती है। इस कदम का भाजपा ने जमकर विरोध किया और उनकी पार्टी के विधायकों ने मांग की थी कि उन्हें हनुमान चालीसा पढऩे के लिए एक अलग कमरा दिया जाए। इसका मुसलमानों पर गहरा असर हो सकता है। फिलहाल झारखंड विधानसभा के चार मुस्लिम विधायकों में से दो कांग्रेस और दो झामुमो के हैं। राजमहल विधानसभा सीट पर जहां मुस्लिम आबादी अच्छी है वहां दो मुस्लिम उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा और भाजपा को जीत मिल गई क्योंकि मुस्लिम समुदाय के मतों में विभाजन हो गया। सोरेन और झामुमो को स्पष्ट रूप से इसी बात की चिंता है क्योंकि ऐसा ही कुछ अन्य जगहों पर भी हो सकता है।अकेले मुस्लिम पहचान को बढ़ावा देने में अपने खतरे हैं। हालांकि झामुमो ऐसा नहीं करने जा रही है। हाल ही में, जब मुस्लिम समुदाय ने पैगंबर की तस्वीर को पाठ्यपुस्तक में शामिल किए जाने का विरोध किया तब सरकार ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। पुस्तक के इस अध्याय को तुरंत हटा दिया गया। आने वाले दिनों में हिंदू, मुस्लिम या आदिवासी से एक नई राजनीतिक दूरी बरतने की उम्मीद की जा सकती है और उसकी जगह रांची से मुझे झारखंडी होने पर गर्व है जैसे संदेश को बढ़ावा दिया जा सकता है। यही हेमंत सोरेन की भविष्य की राजनीति का नुस्खा होने जा रहा है।

Published / 2021-09-30 12:48:24
टाना भगत के रूप में आज भी गांधी जिंदा हैं...

एबीएन डेस्क। दक्षिण अफ्रीका में सत्य और अहिंसा के सफल परीक्षण के पश्चात महात्मा गांधी 1915 में भारत लौटे। इसी समय झारखंड (तब बिहार का हिस्सा) के चिंगरी गांव में एक चिंगारी फैली जो टाना भगत आंदोलन के नाम से देश के इतिहास में दर्ज है। नियति ने इस आंदोलन का बापू के सत्य और अहिंसा से ऐसा संगम प्रस्तुत कर दिया कि टाना भगत स्वाधीनता संग्राम के अमिट हस्ताक्षर बन गये। टाना भगत आंदोलन के प्रणेता जतरा उरांव का जन्म 1888 ई में गुमला जिले के बिष्णुपुर थाने के चिंगरी नवाटोली गांव में हुआ। तंत्र-मंत्र के प्रशिक्षण के बीच उन्हें आत्म बोध हुआ। 14 अप्रैल 1914 को उन्हों ने घोषणा की कि उरांव जनजाति के देवता, धर्मेश ने उनको संदेश दिया है कि वे (जतरा) राजा बनेंगे, उनके राज्य में उनके अनुयायी ही रह पाएंगे। उनको न माननेवाले गुंगे हो जाएंगे। उनकी मुख्य शिक्षा थी; भूत-प्रेत, झाड़-फूंक आदि अंध विश्वासों का परित्याग, बलि प्रथा निषेध, मांस मदिरा का त्याग, दूसरी जाति और सरकार की नौकरी की मनाही, घरेलू तथा कृषि उपकरणों एवं आभूषणों का नदी में प्रवाह तथा उरांव देवता धर्मेश की उपासना। 1915 तक इस आंदोलन का प्रसार हजारीबाग और पलामू जिलों में हो गया और 1916 में इसकी आंच जलपाईगुड़ी के चायबागानों में पहुंच गयी जहां बड़ी संख्या में उरांव मजदूर रहते थे। तब इन्हें दबाया गया। जतरा भगत के निधन के बाद देवमनिया, शीबू, माया, बलराम, भीखू नामक शिष्यों ने अपने अपने क्षेत्रों मंय उनके आंदोलन का नेतृत्व किया। फलस्वरूप रांची, लोहरदगा गुमला पलामू और हजारीबाग के करीब ढाई लाख उरांव इस आंदोलन से जुड़ गए। मार्च 1919 में शीबू, माया, सुकरा, सिंघा और देविया को गिरफ्तार कर सजा दी गयी फिर भी आंदोलन का अंत नहीं हुआ। असहयोग आंदोलन के समय से टाना भगत आंदोलन गांधीजी के प्रभाव में आने लगा। कांग्रेस के विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में अनेक टाना भगत पलामू जिले से गांधीजी को सुनने के लिए पैदल ही कलकत्ता पहुंच गए। 1921 के प्रारंभ में जब असहयोग आंदोलनकारी रांची, सेन्हा, मधुकम, इटकी ओरमाझी, कोकर, गुमला, कुरु, तमाड़, बुंडू आदि ग्रामों में सभा करने लगे तो ब्रिटिश अधिकारियों के कान खड़े हुए। रांची एसपी ने उपायुक्त को लिखा, पंद्रह दिनों की अवधि में 15 सभाएं हो चुकी हैं और तीन होने वाली हैं। मेरा अनुमान है कि इससे तीव्र गति से आक्रोश फैलेगा। इसे रोकने के लिए धरा 144 पर्याप्त नहीं। मांडर, कुरु और लोहरदगा की सभाओं पर प्रतिबंध लगा। पुन: 9 मार्च 1921 को रांची के उपायुक्त ने छोटानागपुर के कमिश्नर को लिखा कि असहयोग आंदोलन से जुड़कर टाना भगतों ने अपने आंदोलन को नया जीवन प्रदान किया है। 12 अप्रैल 1921 को टाना भगतों के गढ़, कुरु में करीब तीन हजार लोगों की सभा को रामटहल ब्रह्मचारी और मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया। लोगों को चरखा चलाने, शराब न पीने और हिंसा से दूर रहने का संदेश दिया गया। गांधी के वशीभूत ये टाना भगत अब झारखंड में कांग्रेस की ताकत बन गए। खादी पहनना, कांग्रेस के झंडे के साथ मीलों पैदल चलकर कांग्रेस की सभा में भाग लेना, गांधीजी और कांग्रेस के संदेशों को जन जन तक पहुंचाना इनकी दिन चर्या में शामिल हो गया। 1922 की गया कांग्रेस में कुल 800 प्रतिनिधि गया पहुंचे जिनमें भरी संख्या में टाना भगत और मुंडा शामिल थे। करीब 400 भगत और अन्य आदिवासी तो बहंगियों में हांडी और जलावन लेकर पैदल ही चले गए। 1922 में बापू की गिरफ्तारी के बाद जब असहयोग कार्यकताओं के खिलाफ दमन का दौर शुरू हुआ तो बेरो थाना और कुछ अन्य स्थानों पर टाना भगत भी उसके शिकार हुए। 1925 में गांधीजी बिहार प्रांतीय कांग्रेस के पुरुलिया सम्मलेन में पधारे वहां से उनकी छोटानागपुर यात्रा शुरू हुई। चक्रधरपुर और चाईबासा में जनसभाओं को संबोधित कर वह रांची के लिए रवाना हुए होगए। रास्ते में वह थोड़ी देर के लिए खूँटी में रुके जहाँ उनकी भेंट मुंडा और टाना भगतों से हुई जिनकी सादगी और निर्दोषता देख कर वे मंत्रमुग्ध हो गए। बापू के शब्दों में, वे खादी में विश्वास करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों चरखा चलाते हैं और स्वनिर्मित खादी पहनते हैं। कई लोग कंधों पर चरखा लिए मीलों पैदल चलकर आए थे। मैं ने सभास्थल पर करीब 400 भगतों को देखा जो लगन से चरखा चला रहे थे। 1926 में कांग्रेस का राष्टीय सप्ताह समारोह (6-13अप्रैल) हो या खादी प्रदर्शनी (5अक्टूबर,आर्य समाज हॉल, रांची) टाना भगत हर जगह होठों पे गांधी और हाथों में तिरंगा लेकर मौजूद रहते थे। 1927 में साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन में (रांची, दिसंबर) टाना भगतों ने भाग लिया तो 1928 की कलकत्ता कांग्रेस में करीब 150 टाना भगत उपस्थित हुए। राजनीतिक घटनाओं से परिपूर्ण वर्ष 1930 में 26 जनवरी को रांची में सदर हॉस्पिटल के समीप पी सी मित्र के नेतृत्व में टाना भगतों ने स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन किया। रांची में इसी वर्ष जून में 40 भगतों ने बिना अनुमति के जुलूस निकालकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन में शिरकत की और आठ भगतों ने गिरफ्तारी दी। 1940 की रामगढ़ कांग्रेस में टाना भगतों ने गांधीजी को 400 रु की थैली समर्पित कर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया तो भारत छोडो आंदोलन का इतिहास भी इनकी की चर्चा के बिना अधूरा है। 18 और 22 अगस्त 1942 को टाना भगतों की टोली ने क्रमश: विष्णुपुर थाने को जलाया और इटकी के समीप रेल की पटरियां उखाड़ दीं। 23 अगस्त को चमरा भगत और गोवा भगत भाषण देते हुए गिरफ्तार हुए तो 24 और 28 अगस्त को क्रमश: डाक सामग्री छीनने और बेरमो थाने पर कब्जा करने के आरोप में कुछ टाना भगतों की गिरफ्तारी हुई। इन टाना भगतों के दो ही आदर्श थे जतरा भगत और महात्मा गांधी। जतरा आश्विन शुक्ल अष्टमी को धरती पर आए पर उनके भगतों को उनकी अंगरेजी जन्म तिथि ज्ञात नहीं थी तो उन्होंने 2 अक्टूबर को ही गांधीजी और जतरा भगत का जन्म दिवस मानना शुरू किया। राष्ट्रपिता के जन्म दिवस पर टाना भगतों के दोनों आदर्शों को श्रद्धांजलि...

Published / 2021-09-16 13:57:28
भारत के सपनों को पूरा करने के लिए जरूरी हैं नरेन्द्र मोदी : रघुवर दास

एबीएन डेस्क। 26 मई 2014 की शाम राष्ट्रपति भवन में दूधिया रंग के सफेद कुरते-पायजामे पर घी के रंग की सदरी पहने जिस व्यक्ति ने नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली उसने कभी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने का काम किया था। यह तथ्य भारत के लोकतंत्र की मजबूती को बयान करने के साथ-साथ इस शख्सियत के कठोर परिश्रम, राजनीतिक कौशल और जन प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। श्री नरेंद्र मोदी उस नेता को बेदखल करके आए थे, जो अपनी शानदार शैक्षणिक और अकादमिक उपलब्धियों के लिए जाने जाते थे। मगर ऐसा क्या था, जो लोगों ने उन्हें हटा कर एक ऐसे नेता को बड़ा बहुमत देकर चुना जो शैक्षणिक-अकादमिक उपलब्धियों के लिए नहीं जाना जाता था। दरअसल इस नेता का सेवाभाव और जवाबदेही लेने के लिए आगे खड़ा होना उसे खास बनाता था। 2014 की उस शाम से लेकर अब तक यह यात्रा लगातार जारी है और एक के बाद एक फैसले लेकर मोदी ने अपने मतदाताओं को आश्वस्त किया है कि उन्हें जिस कार्य के लिए चुना गया है वे उसे तत्परता से कर रहे हैं। हालांकि इसके बहुत पहले श्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा शुरू हो चुकी थी। 2001 में जब गुजरात में एक बड़ा भूकंप आया था और पूरा गुजरात पस्त हुआ पड़ा था, तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए। लेकिन उन्होंने अपनी प्रशासनिक कुशलता दिखाते हुए विश्वकर्मा की तरह बेहद कम समय में गुजरात को दोबारा से खड़ा किया। मुख्यमंत्री बने कुछ ही महीने हुए थे कि गुजरात दंगों की आग में बुरी तरह से झुलस गया। यह कोई पहली बार नहीं था अपितु गुजरात में सांप्रदायिक झड़पों का लंबा इतिहास रहा था। यह उसी की एक कड़ी थी। लेकिन उनके कड़े प्रशासन ने इसके बाद किसी दंगे की पुनरावृत्ति नहीं होने दी। दंगों के दौर से निकाल कर उन्होंने गुजरात को शानदार बिजनेस समिट दिए। वे पहले भारतीय मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने विदेशों में बसे भारतवंशियों की ताकत को पहचाना और राज्य के विकास में उनकी एक सक्रिय भूमिका तय की। वाइब्रेंट गुजरात समिट से वे प्रवासी भारतीयों को आकर्षित करते रहे। आज जबकि वे प्रधानमंत्री हैं उनकी यह ताकत बनी हुई है और विदेशों में बसे भारतीय वहां नए भारत के दूत बने हुए हैं। यही नहीं, जिन मुद्दों पर भारत का राजनीतिक वर्ग में डर कर बात भी नहीं करता था, उन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने निर्भय होकर काम किया और उनके हर साहसिक काम के लिए जनता से पुरस्कार भी मिला। उन्होंने धारा 370 जैसे देश विरोधी अनुच्छेद को समाप्त किया। तो सदियों से अटके पड़े राम-मंदिर के मुद्दे के भी समाधान में बड़ी भूमिका निभाई। सबसे बड़ी बात है कि बिना किसी हिंसा के यह दोनों कार्य संपन्न हुए। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने विकास सबका, तुष्टिकरण किसी का नहीं की नीति का अनुसरण किया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद तीन तलाक पर कानून इसी की एक कड़ी थी, जिसके कारण मुस्लिमों के एक बड़े तबके का विशेषकर महिलाओं का विश्वास और वोट उन्हें मिला। इस प्रकार उन्होंने भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में एक समावेशी सरकार दी और सबका साथ सबका विकास का नारा बुलंद किया, जो अब सबका विश्वास और सबका प्रयास से आगे बढ़ेगा। मोदी की दृष्टि ऐसी रही है जिसमें हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ है। वे जहां पूंजी का सृजन कर रहे हैं, तो वहीं समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों को सीधे आर्थिक लाभ, जनकल्याणकारी योजनाएं और सुविधाएं देकर उन्हें भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे श्री नरेंद्र मोदी एक देश के रूप में भारत के उन अधूरे सपनों को पूरा कर रहे हैं जो हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने कभी देखे थे। स्वच्छता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना था। डॉ राममनोहर लोहिया देश की महिलाओं को धुआं रहित जीवन देना चाहते थे। स्वच्छ भारत, उज्ज्वला योजना, मुद्रा लोन देश की किस्मत संवर रही है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौरान जिस तरह से उन्होंने गरीब वर्ग की रोजी-रोटी का ध्यान रखा है वह आपदा को अवसर में बदलने की तरह था। जब श्रमिक शहर छोड़ कर गांवों की ओर पलायन कर रहे थे, तब उनके श्रम का रचनात्मक प्रयोग करते हुए रिकॉर्ड संख्या में प्रधानमंत्री आवास योजना के घर बनाए गए। महामारी आई और कई देशों की समृद्धि लेकर चली गई, लेकिन मोदी के नेतृत्व में भारत ने न केवल कम समय में टीका बनाया बल्कि इसे सबके लिए मुफ्त और सुलभ भी किया। सबको अहसास हुआ कि इस मुश्किल घड़ी में सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी है। पिछड़ा वर्ग आयोग को संविधानिक दर्जा, राज्यों को ओबीसी पहचान का अधिकार, मेडिकल-नीट के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण और केंद्रीय मंत्रिमंडल में ओबीसी के मंत्रियों की अभूतपूर्व सर्वाधिक संख्या देकर प्रधानमंत्री मोदी ने इनकी भागीदारी सुनिश्चित की। उधर, इक्कसवीं सदी के भारत को अपने सपनों और जरूरतों को पूरा करने के लिए जिस तरह के शिक्षा नीति की आवश्यकता थी, उसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लाकर पूरा कर दिया है। कौशल विकास पर जोर, भारतीय भाषाओं के विकास पर ध्यान देकर भारत की शिक्षा व्यवस्था पर लगे मैकाले के शाप का शमन भी कर दिया है। माननीय प्रधानमंत्री जी का झारखंड से गहरा लगाव रहा है। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिया गया, तो आज मोदी जी उस झारखंड को संवारने का काम कर रहे हैं। उनके शासनकाल से पहले शायद ही झारखंड को इतना महत्व मिला हो। वे प्रधानमंत्री बनने के बाद 12 बार (चुनावी सभाओं को छोड़कर) झारखंड के दौरे पर आयें हैं। झारखंड से उन्होंने देश को कई बड़ी योजनाओं की सौगात दी। इसमें सबसे प्रमुख है आयुष्मान भारत। स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए मील का पत्थर साबित हो रही इस योजना का शुभारंभ उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा की पावन धरा से ही किया। इसके अलावा प्रधानमंत्री मानधन योजना, खुदरा व्यापारिक एवं स्वरोजगार पेंशन योजना की शुरुआत भी झारखंड से की गयी। ग्राम स्वराज योजना के तहत ग्राम उदय से भारत उदय अभियान का समापन जमशेदपुर से किया। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए भी उन्होंने रांची को चुनकर विश्व पटल पर पहचान दिलायी। उन्होंने झारखंड को दोनों हाथों से सौगातें दी। झारखंड के हर गांव-घर में शौचालय हो या 70 सालों से सुदूर गांवों में बिजली पहुंचानी हो। मोदी जी ने हमेशा झारखंड को प्राथमिकता दी। इसके अलावा स्वास्थ्य क्षेत्र में उपेक्षित झारखंड को पांच मेडिकल कॉलेज, देवघर में एम्स समेत अन्य सौगातें दीं। वहीं आइआइटी, सिपेट, इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट, केंद्रीय विद्यालय, एकलव्य विद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय, खेल यूनिवर्सिटी, रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय आदि से शैक्षणिक व्यवस्था मजबूत की। संथाल के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए साहेबगंज में गंगा नदी पर मल्टीमॉडल टर्मिनल शुरू कर झारखंड को दुनिया से सीधा जोड़ दिया। अब झारखंड से बंग्लादेश व अन्य पड़ोसी देशों के लिए जलमार्ग से यातायात शुरू हो गया है। पवित्र नगरी देवघर में जल्द ही हवाई अड्डा, मलूटी के मंदिरों का कायाकल्प, सिंदरी खाद कारखाने का पुनरुद्धार, राज्य में वर्षों से अटकी पड़ी रेल परियोजनाओं को गति भी मोदी जी के कारण ही मिली है। 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल जी के द्वारा शिलान्यास किये गये एनटीपीसी के उत्तरी कर्णपुरा पावर प्लांट 16 वर्षों के बाद लोकार्पण हो या वर्ष 1970 से फाइलों में बन रहे मंडल डैम का 2019 में शिलान्यास का काम यह साबित करता है कि वे कितना रम कर काम करते हैं। उनके झारखंड के प्रति स्नेह की सूची काफी लंबी है। मोदी के नेतृत्व में सरकार ने मीलों का सफर तय किया है। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने देश में मूलभूत सुविधाओं पर जोर दिया, तो दूसरे कार्यकाल में देश व देशवासियों को आर्थिक रूप से समृद्ध करने का काम कर रहे हैं। लेकिन देश हित और जनहित में कई लक्ष्य छूना बाकी है। इस नरेंद्र का आदर्श एक अन्य नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी) का यह प्रेरक वचन है, उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक कि लक्ष्य न प्राप्त हो जाए। ये लक्ष्य है भारत को विश्व गुरु बनाना। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि भारत की जनता इस महान विजन वाले मजबूत प्रधानमंत्री को अपना समर्थन जारी रखे। (लेखक झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

Published / 2021-09-14 13:36:03
हिंदी की अपनी ताकत है, वह आगे बढ़ रही है...

एबीएन डेस्क। राष्ट्रभाषा के विकास के मूल्यांकन का दिन है। हिंदी बेचारी न हो वैचारिक विमर्श में बनी रहे यह आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी के कठोर प्रहार से अंग्रेजी को बचाने का सार्थक प्रयास का भी दिन है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक तथ्य यह भी है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए। बोलने वालों की संख्या के अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। लेकिन उसे अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है। यह और भी कम होती जा रही। इसके साथ ही हिन्दी भाषा पर अंग्रेजी के शब्दों का भी बहुत अधिक प्रभाव हुआ है और कई शब्द प्रचलन से हट गए और अंग्रेजी के शब्द ने उसकी जगह ले ली है। जिससे भविष्य में भाषा के विलुप्त होने की भी संभावना अधिक बढ़ गई है। इस कारण ऐसे लोग जो हिन्दी का ज्ञान रखते हैं या हिन्दी भाषा जानते हैं, उन्हें हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिन्दी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सकें। लेकिन लोग और सरकार दोनों ही इसके लिए उदासीन दिखती है। हिन्दी तो अपने घर में ही दासी के रूप में रहती है। हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता? इसके ऐसे हालात आ गए हैं कि हिन्दी दिवस के दिन भी कई लोगों को ट्विटर पर हिन्दी में बोलो जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ रहा है। मैं हिंदी माध्यम से पढ़ी। अंग्रेजी सहित भाषाओं के महत्व को समझती हूं। क्षेत्रिय भाषाओं का भी सम्मान मेरे दिल में है। इसके अलावा जो वर्ष भर हिन्दी में अच्छे विकास कार्य करता है और अपने कार्य में हिन्दी का अच्छी तरह से उपयोग करता है, उसे पुरस्कार द्वारा सम्मानित किया जाता है। कई लोग अपने सामान्य बोलचाल में भी अंग्रेजी भाषा के शब्दों का या अंग्रेजी का उपयोग करते हैं, जिससे धीरे धीरे हिन्दी के अस्तित्व को खतरा पहुंच रहा है। यहां तक कि वाराणसी में स्थित दुनिया में सबसे बड़ी हिन्दी संस्था आज बहुत ही खस्ता हाल में है। इस कारण इस दिन उन सभी से निवेदन किया जाता है कि वे अपने बोलचाल की भाषा में भी हिन्दी का ही उपयोग करें। इसके अलावा लोगों को अपने विचार आदि को हिन्दी में लिखने भी कहा जाता है। चूंकि हिन्दी भाषा में लिखने हेतु बहुत कम उपकरण के बारे में ही लोगों को पता है, इस कारण इस दिन हिन्दी भाषा में लिखने, जाँच करने और शब्दकोश के बारे में जानकारी दी जाती है। हिन्दी भाषा के विकास के लिए कुछ लोगों के द्वारा कार्य करने से कोई खास लाभ नहीं होगा। इसके लिए सभी को एक जुट होकर हिन्दी के विकास को नए आयाम तक पहुँचाना होगा। हिन्दी भाषा के विकास और विलुप्त होने से बचाने के लिए यह अनिवार्य है। राष्ट्रभाषा सप्ताह या हिन्दी सप्ताह 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस से एक सप्ताह के लिए मनाया जाता है। इस पूरे सप्ताह अलग अलग प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन विद्यालय और कार्यालय दोनों में किया जाता है। इसका मूल उद्देश्य हिन्दी भाषा के लिए विकास की भावना को लोगों में केवल हिन्दी दिवस तक ही सीमित न कर उसे और अधिक बढ़ाना है। इन सात दिनों में लोगों को निबंध लेखन, आदि के द्वारा हिन्दी भाषा के विकास और उसके उपयोग के लाभ और न उपयोग करने पर हानि के बारे में समझाया जाता है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी के प्रति लोगों को उत्साहित करने हेतु पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है। जिसमें कार्य के दौरान अच्छी हिन्दी का उपयोग करने वाले को यह पुरस्कार दिया जाता है। यह पहले राजनेताओं के नाम पर था, जिसे बाद में बदल कर राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार और राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार कर दिया गया। राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार लोगों को दिया जाता है जबकि राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति आदि को दिया जाता है। यह पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को दिया जाता है। इसमें दस हजार से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को 2 लाख रुपये द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रुपये और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये मिलता है। साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रुपये प्रदान किए जाते हैं। पुरस्कार प्राप्त सभी लोगों को स्मृति चिह्न भी दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाना है। इस पुरस्कार योजना के तहत कुल 39 पुरस्कार दिये जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि को उसके द्वारा हिन्दी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिन्दी भाषा का उपयोग करने से है। हिंदी कई माध्यमों से विश्व में फैल भी रही है और समझी भी जा रही है। सात सुरों की महक और धमक का प्रवाह जारी ही रहेगा। कम से कम हम हिन्दुस्तानी हिंदी में हस्ताक्षर करने का कष्ट तो उठा ही सकते हैं एक निष्ठा के साथ। (लेखिका डॉ मेरी ग्रेस उर्सूलाइन इंटर कॉलेज, रांची की प्राचार्या हैं।)

Published / 2021-09-14 06:41:39
शाह ने हिंदी दिवस की दी शुभकामनाएं...बोले-मूल कार्यों में राजभाषा का भी उपयोग करें लोग...

एबीएन डेस्क। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देशवासियों से मूल कार्यों में अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी का प्रयोग करने का संकल्प लेने की अपील की। शाह ने हिंदी दिवस के मौके पर मंगलवार को देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए एक ट्वीट किया कि हिंदी दिवस के अवसर पर मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि मूल कार्यों में अपनी मातृभाषा के साथ राजभाषा हिंदी का उत्तरोत्तर प्रयोग करने का संकल्प लें। मातृभाषा व राजभाषा के समन्वय में ही भारत की प्रगति समाहित है। आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। बता दें कि संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया था और इसके बाद से हर वर्ष इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Published / 2021-09-08 15:47:51
हिंदी नवजागरण के अग्रदूत थे भारतेंदु हरिश्चंद्र...

एबीएन डेस्क। काल के कपाल पर नई लकीर खींचने के लिए लंबी उम्र की नहीं बल्कि बड़े हौसले की आवश्यकता होती है। आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह और हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन छोटा रहा। वह मात्र 35 सालों तक ही जीवित रहे । बहुत ही कम समय मिलने के बावजूद उन्होंने हिंदी साहित्य की बड़ी सेवा की और उसे नई राह पर लाकर खड़ा कर दिया। भक्ति काल के बाद हिंदी साहित्य का रीतिकाल आया, जिसमें जनता से जुड़ी बातें हाशिए पर डाल दी गईं और राजा-महाराजाओं की कपोल कल्पित दस्तानों पर कविताएं लिखी जा रही थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने साहित्य को रीतिकाल की कपोल कल्पना से बाहर निकाला और साहित्य को समाज सुधार एवं राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाए जाने पर जोर दिया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, भारतेंदु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य संतों की कुटिया से निकलकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुंच गया था। उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ उसे दरबारीपन से निकालकर लोकजीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 बनारस के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनका मूल नाम हरिश्चन्द्र था और भारतेन्दु उनकी उपाधि थी। भारतेन्दु आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी थियेटर के भी पितामह कहे जाते हैं। उनके पिता गोपाल चंद्र एक कवि थे। वह गिरधर दास के नाम से कविता लिखा करते थे। भारतेन्दु जब 5 वर्ष के हुए तो मां का साया सर से उठ गया और जब 10 वर्ष के हुए तो पिता का भी निधन हो गया। भारतीय नवजागरण की मशाल थामने वाले भारतेंदु ने अपनी रचनाओं के जरिए गऱीबी, गुलामी और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। सिर्फ पैंतीस वर्ष की उम्र पाने वाले भारतेंदु की अनेक विधाओं पर पकड़ थी। वे एक गद्यकार, कवि, नाटककार, व्यंग्यकार और पत्रकार थे। उन्होंने बाल विबोधिनी पत्रिका, हरिश्चंद्र पत्रिका और कविवचन सुधा पत्रिकाओं का संपादन किया। भारतेन्दु ने सिर्फ 18 वर्ष की उम्र में कविवचनसुधा पत्रिका निकाली, जिसमें उस वक्त के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं प्रकाशित होती थीं। हिंदी में नाटकों की शुरूआत भारतेन्दु हरिश्चंद्र से मानी जाती है। नाटक भारतेन्दु के समय से पहली भी लिखे जाते थे, लेकिन बाकायदा तौर पर खड़ी बोली में नाटक लिखकर भारतेन्दु ने हिंदी नाटकों को नया आयाम दिया। भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरूआत बांग्ला के विद्यासुंदर (1867) नाटक के अनुवाद से हुई। तेज याददाश्त और स्वतंत्र सोच रखने वाले भारतेन्दु कई भारतीय भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने अपनी मेहनत से संस्कृत, पंजाबी, मराठी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती भाषाएं सीखीं। हालांकि, अंग्रेजी उन्होंने बनारस में उस दौर के मशहूर लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द से सीखी।  एक दौर में भारतेन्दु की लोकप्रियता शिखर पर थी, जिससे प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने उन्हें 1880 में भारतेंदु की उपाधि दी। भारतेन्दु के विशाल साहित्यिक योगदान के कारण 1857 से 1900 तक के काल को भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है। 6 जनवरी 1885 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज करवट ले रहा था। यूरोपीय लोगों के संपर्क और सामंती व्यवस्था से मुक्ति की प्रक्रिया एक साथ चल रही थी। राजा राममोहन राय, रामकृष्ण परमहंस, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले सहित अनेक समाज सुधारक स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह आदि की वकालत कर रहे थे तो सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध भी कर रहे थे। समाज में आ रहे बदलाव की आहट साहित्यिक क्षेत्र में भी सुनाई देना स्वाभाविक था। भारतेंदु हरिश्चंद्र नई चेतना के अग्रदूत के रूप में सामने आए और उन्होंने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्व से युक्त रचनाएं की। आर्थिक असमानता, ग्रामीण समाज में गरीबी, पराधीनता, अमानवीय शोषण आदि को उन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं का विषय बनाया। स्वयं तो लगातार लिखा ही, सैंकड़ों दूसरे लोगों को भी लिखने और सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए प्रेरित किया। जब वह 18 वर्ष के थे तो उन्होंने कवि वचन सुधा पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। 23 वर्ष की अवस्था में उन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन और 24 वर्ष की अवस्था में स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बाला बोधिनी पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। पूरे देश के लोगों को इन पत्रिकाओं में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होंने तदीय समाज की स्थापना की। नाटक हो, निबंध हो, कहानी हो या आलोचना, सर्वत्र उन्होंने पुराने ढांचे के अवयवों के खिलाफ काम किया जो समय के अनुकूल नहीं रह गए थे। राजनीतिक स्वाधीनता की चाहत तो वह रखते ही थे, मनुष्य की एकता, समानता और भाईचारा को भी उन्होंने समान महत्व दिया। अपने समकालीन साहित्यकारों को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने साहित्य को सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना से युक्त किया। अंधेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, भारत दुर्दशा, जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने प्रगतिशील आधुनिक समाज की परिकल्पना करते हुए दुर्भावना एवं भेदभाव आधारित व्यवस्था की समाप्ति की कामना की। 9 सितंबर को भारतेंदु हरिश्चंद्र की 171वीं जयंती है। उनको याद करना एक ऐसे मनीषी को याद करना है, जिन्होंने हिंदी साहित्य को नए भाव बोध की जमीन पर उतारते हुए लोक को राजसत्ता से अधिक महत्व दिया, जिन्होंने बढ़ते ब्रिटिश आभामंडल को चुनौती देते हुए पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं का नारा बुलंद किया, जिन्होंने दकियानूसी विचारों को चुनौती दी और पाश्चात्य जगत के सुंदर विचारों को साहित्य एवं समाज में स्थान दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र एक ऐसे महामानव थे जिन्होंने साहित्य और संस्कृति के माध्यम से बेहतर समाज की रचना के लिए अपना पूरा जीवन और पुरखों का लगभग पूरा धन समर्पित कर दिया।

Published / 2021-09-05 04:31:12
Teachers Day 2021: डॉ. राधाकृष्णन ने अपना जन्मदिन अध्यापकों को क्यों समर्पित किया

एबीएन डेस्क। पूरा देश हर साल पांच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाता है। यह दिन भारत के पहले उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उन्होंने ने ही इस दिन को शिक्षकों को समर्पित करने की इच्छा जाहिर की थी। भारत में 5 सितंबर का दिन शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है। इस मौके पर देशभर में बच्चे अपने शिक्षकों के प्रति अलग-अलग तरह से अभिवादन प्रकट कर रहे हैं। एक शिक्षक का अर्थ आमतौर पर किसी ऐसे व्यक्ति से लगाया जाता है, जिसके पास अपने क्षेत्र में ज्ञान का भंडार हो या वह अनुभवी हो। इसका सीधा सा अर्थ है कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने उम्र के कई पड़ावों में ज्ञानर्जन किया है, वही असली शिक्षक है। हालांकि, धीरे-धीरे यह धारणा या तो बदल रही है या इसे चुनौती दी जा रही है। अमर उजाला पेश कर रहा है ऐसे ही छह युवाओं के नाम जिन्होंने कम उम्र के बावजूद अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और पूरी दुनिया को सीख देकर खुद को शिक्षक के तौर पर पेश किया।

Published / 2021-08-31 13:28:13
वैश्विक सनातन मूल्यों को समृद्ध करता विहिप

एबीएन डेस्क। विश्व हिंदू परिषद ने पूज्य संतो के आदेश से विश्व का सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा अहिंसक जनांदोलन प्रारंभ की। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अनतर्गत देश के साढ़े तीन लाख गांवों में श्रीरामशिला पूजन हुई। 9 नवंबर 1989 को श्री कामेश्वर चौपाल जी के हाथों राम मन्दिर का शिलान्यास किए। 30 अक्टूबर,1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री की गर्वोक्ति को चूर कर हजारों कारसेवकों ने रामजी की नगरी में प्रवेश किया परन्तु अवध की इस पावन धरती पर रामभक्त्तों ने जल्लाद सरकार के द्वारा चलाए गए गोली खाकर अपने पवित्र रक्त से लाल करते हुए हिंदू समाज के लिए सैकड़ों कारसेवक सर्वोच्च बलिदान दे दिए। गीता जयंती (6 दिसंबर,1992) को देशभर से एकत्रित कारसेवक के आंखों में मन्दिर निर्माण का संकल्प ने न्यायालय का अवरोध को परवाह किए बगैर 1528 से हिन्दू पौरुष को चुनौती दे रहा कलंक का प्रतीक ढांचा कारसेवकों के कोप से ढह गया। यह हिंदू समाज का शौर्यावतार था। उसी दिन से टाट के मन्दिर में विराजमान रामलला, प्रस्तावित मंदिर के 60 प्रतिशत पत्थर और गांव-गांव से पूजित शिलाएं भव्य राममंदिर निर्माण की प्रतीक्षा श्रीअयोध्या जी में कर रहीं थीं। परिषद ने जागरण के महाभियान के साथ साथ कानूनी लड़ाई भी लड़ी। 30 सितम्बर, 2010 को न्यायालय ने भी रामलला की जन्मभूमि यही है यह मान तो लिया लेकिन जन्मभूमि का विभाजन कर दिया। हिंदू समाज को नैतिक विजय तो मिली लेकिन जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सका। देश की सर्वोच्च अदालत में अपील हुई। 6 वर्ष तक मामला जस का तस। एक बार तो न्यायालय ने यह तक कह दिया यह विषय हमारी प्राथमिकता में नहीं है। पूज्य संतो ने एक बार पुन: आह्वान किया हिन्दू समाज को। देश में 5 विराट सहित सैकड़ों हिन्दू सम्मेलन हुये। 25 नवम्बर 2018 को रामलला की नगरी में एक बार फिर आन्दोलन के प्रारंभिक काल का दृश्य दिखाई पड़ा। जनज्वार उमड़ा। हिन्दू ने अपनी प्राथमिकता बता दी राम जी के जन्मस्थान पर ही भव्य मंदिर बने। अंतत: वह शुभ घड़ी आ ही गयी मुख्य न्यायाधीश गोगोई जी की अध्यक्षता में खण्ड पीठ ने सर्वसम्मत निर्णय सुनाया जहां रामलला टाट के मन्दिर में विराजमान हैं, वही रामलला की जन्मभूमि है। मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया। 76 लड़ाइयों में हमारे लाखों पुरखों के बलिदान का सुफल हिंदू हृदय सम्राट माननीय अशोक सिंघल जी के प्रेरक नेतृत्व, महंथ अवैद्यनाथ जी,परमहंस रामचन्द्र दास जी जैसे हजारों पूज्य संतो के मार्गदर्शन का सुफल हिन्दू समाज के त्याग, साधना व बलिदान का सुफल 5 अगस्त, 2020 को भव्य मंदिर का भूमिपूजन से हुई। विगत 1000 वर्ष में हिंदू समाज के सबसे बड़ी विजय का महापर्व और हिंदू के स्वर्ण युग का पुनरारंभ हुआ। हमारी पीढ़ी भाग्यवान है, हम इस सुदिन के साक्षी रहे। विहिप के अह्वान पर 1996 में काश्मीर के आतंकवादियों की विरोध के चुनौतियों को स्वीकार कर लाखों हिंदुओं की अमरनाथ यात्रा, 2007 में श्रीरामसेतु को बचाने हेतु सड़क पर उतरना, बुढ़ा अमरनाथ यात्रा करना इत्यादि कई बड़े जनआंदोलन हुआ है। महर्षि देवल, परशुरामाचर्य, स्वामी रामानंद तथा स्वामी दयानन्द की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए विश्व हिंदू परिषद अपने स्थापना काल से ही धर्मांतरित बंधुओं के घर वापसी के सत्कार्य में लगा है। मठ मंदिर,अर्चक-पुरोहित तीर्थ और संस्कृत की पुनर्प्रतिष्ठा का कार्य भी परिषद् सफलता पूर्वक कर रहा है। गिरिवासी वनवासी अंचलों में अपने बंधुओं के बीच 1 लाख से अधिक एकल विद्यालयों के माध्यम से सेवा कार्य में निरंतर लगा हुआ ह। प्रतिवर्ष हजारो गोवंश की रक्षा, जेहादियों के चंगुल से हिंदू बहनों को मुक्त कराने सहित अनेक धर्मिक व सांस्कृतिक जनजागरण का कार्य निरन्तर चलाया जा रहा है। कर्नाटक स्थित हिंदू सम्मेलन में पूज्य संतगणों और पूज्य श्री गुरुजी की उपस्थिति में पूज्य संतों द्वारा हिंदू समाज में पराधीनता के लंबे कालखंड के दुष्परिणाम से व्याप्त अश्पृश्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारीत किए गए जो हिन्दू समाज के लिये ऐतिहासिक क्षण था। पूज्य संतो ने घोषणा की कि छुआछूत शास्त्रसम्मत नहीं, जन्म के आधार पर कोई बड़ा अथवा छोटा नहीं, कोई पावन नहीं, कोई अपवित्र नहीं, हम सब ऋषिपुत्र हैं, भारतमाता की सन्तान हैं व सहोदर भाई हैं। यहां हम हिंदू समाज को हिंदव: सोदरा: सर्वे,न हिन्दू पतितो भवेत। मम दीक्षा हिन्दू रक्षा,मम मन्त्र समानता।। एवं धर्मो रक्षति रक्षित: ध्येयवाक्य मिला। विश्व भर में निवास कर रहे हिन्दू समाज को जाति, मत, पंथ, भाषा, भौगोलिकसीमा से ऊपर उठकर आग्रही, संगठित, सशक्त, श्रद्धालु, अपने पूर्वज परम्परामान्यता - मानबिन्दुओं पर गौरव रखने वाले तथा इनकी पुनर्प्रतिष्ठा करने के लिये सर्वस्व न्योछावर करने का संकल्प लेने वाले हिन्दू को खड़ा करना विश्व हिन्दू परिषद मुख्य उद्देश्य है। विहिप के द्वारा गोवंशरक्षा, अपने ही देश में हिन्दू शरणार्थी, बांग्लादेशी घुसपैठिये, जेहादी आतंकवाद, लव जेहाद, नक्सलवाद, विदेशी धन से ईसाईकरण, सिमटती पतिपावनी गंगा तथा पर्यटन केंद्र में बदलता देवतात्मा हिमालय , मुस्लिम तुष्टिकरण, एक ही देश में दो विधान आदि विषयों पर निरन्तर चिन्तन कर समाधान के मार्ग ढुंढे जा रहे है तथा चुनौतियों का सामना करने के लिए अनथक श्रम कर गिरिवासी, वनवासी, नगरवासी,ग्रामवासी हिन्दू समाज में से लक्षाधिक कार्यकर्त्ता खड़ा कर गांव- गांव तक संगठन के तंत्र को फैला रहा है। झारखंड प्रांत के सभी पंचायतों में विहिप स्थापना दिवस कार्यक्रम 6 सितम्बर, 2021 तक मनाया जायेगा।

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