एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संध्या चौधरी उर्वशी)। हम हनुमान के विचार के बिना श्री राम के बारे में नहीं सोच सकते या अर्जुन को याद किये बिना श्रीकृष्ण का स्मरण नहीं कर सकते। इसी प्रकार ईसा तथा संतपाल की तरह बुध तथा आनंद की बात है। यही संबंध श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद के बीच है। क्योंकि यदि एक जलस्रोत था तो दूसरा इस जल स्रोत का प्रवाह रूप झरना था। श्री राम कृष्ण के लिए ईश्वर एक तथ्य तथा एक वास्तविकता थी। उन्हें ईश्वर के बारे में वाद-विवाद करने की आवश्यकता नहीं थी। वे विश्वास पूर्वक ईश्वर की पुष्टि कर सकते थे। भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के शिखर थे। उनका दृष्टिकोण वैश्विक उनकी अनुभूति सर्वस्पर्शी, सर्व समावेशक थी। उनके विचार आज भी भारतीय जनमानस पर विद्यमान हैं। एक अच्छा वक्ता होने के कारण लोगों के दिलों को बखूबी जीत लेते थे।आज भी इनके विचार अतुल्य और धरोहर के रूप में भारतीय युवाओं में विद्यमान हैं। सचमुच वे एक विद्वान पुरुष के रूप में ही नहीं, बल्कि एक अच्छे शिष्य के रूप में भी अपनी छवि भारतीय जनमानस में युवाओं में बहुत लोकप्रिय हैं। स्वामी विवेकानंद श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रधान छात्र, उनके अत्यंत प्रिय शिष्य, उनके महानतम उत्तराधिकारी, उनके यथार्थ भाष्यकार तथा अत्यंत दक्ष कार्यवाहक भी थे। सन 1893 की मई में स्वामी जी शिकागो में सितंबर में होने वाली विश्व धर्म महासभा में भाग लेने के लिए भापचलित जलयान से रवाना हुए। उन्हें औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया। उनका नाम प्रतिनिधियों की सूची में शामिल नहीं किया गया था। कुछ कठिनाई के पश्चात उन्हें धर्म महासभा में सम्मिलित होने का अवसर मिल गया। सम्मिलित न होने देने की किसी भी कठिनाई की तुलना में वे कहीं अधिक प्रदीप्त प्रतिभा संपन्न थे। परंतु तब यह प्रथम वक्तव्य में ही दिग्विजय की बात थी, जब गरिमापूर्ण सभा को संबोधित करने की उनकी बारी आई। तब वे उषाकाल के सूर्य की भांति उठे तथा अमेरिका की बहनों और भाइयों यह शब्द कहे। उस हार्दिक पुकार ने विश्व धर्म महासभा तथा पश्चिमी जगत को मंत्र मुग्ध कर दिया। वे संकीर्णता में जकड़े धर्म पंथों तथा बौने मत वादों से ऊपर उठकर समन्वय तथा सार्वभौमिकता के बारे में बोले। उनका संदेश मानो दम घुटे लोगों के लिए जीवन स्वास था।व्याख्यान करते हुए पश्चिमी देशों के निवासियों को शिक्षित करते तथा उन्हें भारतीय दर्शन के अध्ययन में सहायता करते हुए कई मास तक अमेरिका में रहे। तत्पश्चात वे इंग्लैंड तथा यूरोप गए। दो संस्कृति के बीच आपसी समझ के लिए सेतु बने। सन 18 सो 97 में स्वामी स्वामी जी भारत लौटे। समूचा राष्ट्र एकीकृत होकर उनके स्वागत के लिए उठा।भारतीय जनता ने उन्हें आदि शंकराचार्य के नूतन अवतार के रूप में पाया, जो मातृभूमि को ओजपूर्ण तथा जीवन शक्ति से स्फूर्ति करने को उठ खड़ा हुआ था। स्वामी जी ने अपने देशवासियों को भारतीय राष्ट्रीय आदर्श त्याग के महान आदर्श का स्मरण कराया। उन्होंने भारतीयों के हृदयों में यह बात प्रविष्ट करा दी कि भारत में जन्म प्राप्ति परम सौभाग्य की बात है तथा उन्हें बताया कि किस प्रकार आध्यात्मिक संस्कृति ही भारत के अनश्वर अस्तित्व का रहस्य है। उन्होंने भारत को प्रबुद्ध भारत बना दिया। परंतु वे सलाह देने या उपदेश देने तक ही सीमित नहीं रहे। एक कुशल संगठनकर्ता थे।उन्होंने अपने गुरुदेव के लक्ष्य को निरंतरता को सुनिश्चित बनाए रखने के लिए एक संगठन की स्थापना करनी चाही। इसलिए उन्होंने रामकृष्ण मठ तथा मिशन की स्थापना की, जिसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेलूर मठ है। इस संस्था का उद्देश्य है "आत्मनो मोक्षार्थ जगद्विताय च" अर्थात अपनी मुक्ति एवं संसार का कल्याण भी। स्वामी विवेकानंद अभी 40 वर्ष के भी नहीं हुए थे कि वे महासमाधि में लीन हो गए। परंतु उनकी आयु की गणना सौर वर्षों के आधार पर नहीं होनी चाहिए ।लगभग एक दशक के लोकाप्रित कार्य से ही उन्होंने मानस चेतना में ऐसे विचार आरोपित कर दिए, जिनके संपूर्ण क्रियान्वयन के लिए डेढ़ हजार वर्ष लग सकते हैं। उनके जीवन कार्य का एक तो भारतीय पक्ष है तथा दूसरा अंतर्राष्ट्रीय पक्ष है। इन दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान बेजोड़ है। (लेखिका संध्या चौधरी उर्वशी, कचहरी झारखंड रांची की निवासी हैं। वह एमए मनोविज्ञान तथा कत्थक नृत्यांगना शिक्षिका हैं। उनकी गायन में भी रूचि है। इसके अलावा वह समाजसेविका, अनेक सम्मान से सम्मानित, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन साझा संकलन इत्यादि से विभूषित हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। हम जिस शहद को गुणवत्तापूर्ण समझकर उसका सेवन करते हैं उसमें चीनी मिली हुई है। इस मिलावट का पता इसलिए नहीं लग पाता क्योंकि चीन की कंपनियों ने ऐसा शुगर सीरप बनाया है जो भारतीय प्रयोगशालाओं में शहद की शुद्धता की जांच में खरा उतरता है। कोविड-19 महामारी के कारण हम सब की सेहत पहले ही खतरे में है। इस बीच शहद की खपत भी बढ़ी है क्योंकि यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और इसे अपने एंटीआॅक्सीडेंट और ऐंटी-माइक्रोबॉयल गुणों के लिए भी जाना जाता है। परंतु हम शहद के स्थान पर चीनी का सेवन कर रहे हैं जो हमारे खिलाफ जाएगा क्योंकि चीनी वजन बढ़ाती है। इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि औसत से अधिक वजन वाले लोगों में कोविड-19 से जुड़ी दिक्कतों का खतरा अधिक है। इसका अर्थ यह भी है कि मधुमक्खीपालन करने वालों को आय का नुकसान हो रहा है। यदि वे कारोबार से बाहर हो जाते हैं तो मधुमक्खियां भी नदारद हो जाएंगी और साथ ही उनकी परागण सेवा भी। यदि मधुमक्खियां एक पौधे से दूसरे पौधे तक पराग ले जाना बंद कर देंगी तो खाद्य उत्पादकता में कमी आएगी। यह मिलावट आपराधिक है। मैं अनुमान लगा सकती हूं कि इस खुलासे पर उद्योग जगत की प्रतिक्रिया क्या होगी। वे कहेंगे कि उनके द्वारा तय मानकों का पालन किया जा रहा है। दलील आएगी कि कई बड़े ब्रांड प्रयोगशाला परीक्षण में पास हुए हैं तो उन्हें मिलावटी कैसे कहा जाएगा। परंतु हम कह सकते हैं और इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इसके लिए व्यापक जांच हुई। इससे यही पता चलता है कि खाद्य बाजार अब आसान नहीं रहा। हर मोड़ पर मेरे सहयोगियों को लगा कि अब आगे कुछ नहीं हो पाएगा। जब हमने सुना कि मधुमक्खीपालक रोजगार गंवा रहे हैं तो सबको पता था कि ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन कोई कहना नहीं चाह रहा था। कोई भी चीन की कंपनियों और शुगर सीरप का नाम नहीं लेना चाह रहा था। लेकिन इन कंपनियों या इस रहस्यमय सीरप की मिलावट का कोई सबूत नहीं था। मई में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने शुगर सीरप के आयातकों को निर्देश जारी किए और कहा कि ऐसे प्रमाण मिले हैं कि शहद में ऐसे सीरप की मिलावट की जा रही है। उसने खाद्य आयुक्तों से कहा कि वे निगरानी बढ़ाएं। एफएसएसएआई ने जिन शुगर सीरप का जिक्र किया था उनका उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय के आयात-निर्यात आंकड़ों में कोई उल्लेख नहीं मिलता। परंतु इस बारे में आवाज उठाई जाती रही। फरवरी में सरकार ने आयातित शहद के लिए अतिरिक्त प्रयोगशाला जांच अनिवार्य कर दी। इस जांच का नाम है- न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी (एनएमआरएस)। हम जानते थे कि इस जांच का इस्तेमाल उस समय किया जाता है जब शहद में शुगर सीरप मिलाए जाने की आशंका हो। ऐसा इसलिए कि यह आसानी से पकड़ में नहीं आ सकता। यह हमारी सेहत से जुड़ा मामला है। हम इसे ऐसे ही जाने नहीं दे सकते। हमारी कोशिश तब कामयाब हुई जब हमें ऐसी चीनी कंपनियों की वेबसाइट मिलीं जो खुले आम ऐसा सीरप बेच रही थीं जो जांच को धता बता सकती थीं। तब हमें समझ में आया गया कि यह एक धंधा बन चुका है। पहली मिलावट में पौधों (मक्का और गन्ना) से हासिल होने वाले शुगर सीरप का इस्तेमाल किया गया जो सी 4 फोटोसिंथेसिस का इस्तेमाल करता था। जब यह पकड़ में आने लगा तो सी 3 पौधों यानी चावल तथा चुकंदर से हासिल नए तरह की मिठास का इस्तेमाल शुरू किया गया। परंतु विज्ञान की मदद से शहद में इसकी मिलावट भी पकड़ में आ गई। अब आॅनलाइन चीनी पोर्टल पर कंपनियों का दावा है कि उन्होंने ऐसे तरीके तलाश लिए हैं जो सी 3 और सी 4 शुगर टेस्ट को पास कर सकते हैं। ये वही कंपनियां थीं जो भारत में फ्रक्टोस सीरप निर्यात करतीं। लेकिन हम भारत में उनके अंतिम उपभोक्ता का पता नहीं लगा पाए। ये सीरप कई तरह के औद्योगिक इस्तेमाल के लिए आयात किए जाते हैं। यानी सरसरी तौर पर यह वैध कारोबार था। जब हमने इस सीरप का एक नमूना खरीदा तो देखा कि चीनी कंपनियां इसे बेचने के लिए बहुत उत्सुक हैं। उन्हे पता था कि भारतीय तंत्र, खासकर सीमाशुल्क विभाग कैसे काम करता है। एक कंपनी ने हमें नमूना पेंट पिगमेंट के नाम पर भेजा। हमने गत वर्ष ध्यान दिया था कि फ्रक्टोस सीरप का आयात कम हो रहा है। सूत्रों ने बताया कि भारतीयों ने चीन से उक्त तकनीक खरीद ली है। हमने पता लगाया कि और पता चला कि बाजार में यह आॅल पास सीरप के नाम से उपलब्ध है यानी ऐसा सीरप जो हर जांच में सफल साबित हो। हमने इसे प्रयोगशाला में जांचा और यह वाकई पास हो गया। अब यह घातक धंधा हमारे सामने खुल चुका था। हमने जिन 13 प्रसिद्ध ब्रांड की एनएमआरएस तकनीक से जांच की उनमें से अधिकांश विफल रहे। जबकि ये शहद ब्रांड 2020 में शुरू एफएसएसएआई के नए मानकों में पास हो गए थे। हमने जिस जर्मन प्रयोगशाला में नमूनों की जांच कराई, उसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन नमूनों में शुगर सीरप मिला हुआ है। शहद में मिलावट की हमारी रिपोर्ट सामने आने के बाद उद्योग जगत की ओर से हमें किताबी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। इनमें वही बातें कही जा रही हैं जो दुनिया भर के बिजनेस स्कूल में पढ़ाई जाती हैं। शब्दाडंबर रचकर उपभोक्ताओं को भ्रमित करना और अपने उत्पादों को साफ और सुरक्षित बताने का प्रयास करना। परंतु उपभोक्ता भी जागरूक हैं। शहद अन्य उत्पादों की तरह नहीं है। इसे अनुपूरक पोषक आहार के रूप में लिया जाता है। इसमें औषधीय गुण होते हैं और इसलिए चीनी मिलाने का अर्थ है स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना। हमें पता है कि उद्योग जगत ताकतवर है लेकिन हम यह भी मानते हैं हमारा स्वास्थ्य और मधुमक्खियों का अस्तित्व दांव पर लगा है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। 2021 में देश में अनाज उत्पादन 30.86 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो कि एक रिकॉर्ड है। पिछले कुछ वर्षों के खाद्यान्न उत्पादन के भारतीय ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो भारत अपनी बढ़ती जनसंख्या को आराम से खिला सकता है और साथ ही साथ चावल और गेहूं का निर्यात भी कर सकता है। लेकिन इसके लिए भारत को कृषि क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाना होगा। पिछले सात दशकों में भारतीय कृषि ने कई मील के पत्थर पार किये हैं। हरित क्रांति, पावर जेनरेशन, बुनियादी सुविधाओं और कृषि क्षेत्र में नवीन ज्ञान तकनीक अपनाकर भारत ने इस क्षेत्र में प्रगति की है। किंतु आज भी किसानों की औसत मासिक आय इस समय 10,218 है जो 2002 में 2115 की तुलना में अधिक है। पर संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में किसानों की औसत मासिक आय "10000 से भी कम है। देश के 50.2% किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है लेकिन देश के बहुत से किसान बेहाल है इसी के चलते पिछले कुछ समय में देश में कई बार किसान आंदोलनों ने जोर पकड़ा है। देश में कृषि भूमि का मालिकाना हक को लेकर विवाद सबसे बड़ा है ।असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान आवाज उठाते रहे हैं। जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों के पास है। किसानों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उन्हें फसल पर सही मूल्य नहीं मिलता, वहीं किसानों को अपना माल बेचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कोई किसान सहकारी केंद्र पर किसी उत्पाद को बेचना चाहे तो उसे गांव के अधिकारी से कागज चाहिए होगा। ऐसे में कई बार कम पढ़े लिखे किसानों को औने- पौने दामों पर अपना माल बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। अच्छी फसल के लिए अच्छे बीजों का होना बेहद जरूरी है। लेकिन सही वितरण तंत्र ना होने के चलते छोटे किसानों की पहुंच में यह महंगे और अच्छे बीज नहीं आ पाते हैं। इसके चलते उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता और फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। भारत का अधिकांश किसान मानसून की अनिश्चितता से प्रभावित है। पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में सिंचाई के अच्छे इंतजाम हैं। लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां कृषि मानसून पर निर्भर है। इसके इतर भूमिगत जल के गिरते स्तर ने भी लोगों की समस्याओं में इजाफा किया है। तमाम मानवीय कारणों से तथा कुछ प्राकृतिक कारण किसानों की परेशानी को बढ़ा देते हैं। वर्षा जल से होने वाला मिट्टी का क्षरण होता है। इसके चलते मिट्टी अपनी उर्वरता खो देती है। मशीनों और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रयोग बड़े किसान करने में सक्षम हैं। लेकिन छोटे और सीमांत किसान पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि आधुनिक कृषि यंत्रों, खाद, कीटनाशक आदि का अधिक प्रयोग भी दीर्घ काल के लिए घातक है। भारत के ग्रामीण इलाकों में भंडारण की सुविधाओं की कमी है। ऐसे में किसानों पर जल्द फसल का सौदा करने का दबाव होता है और कई बार किसान औने-पौने दामों में फसल का सौदा कर लेते हैं। भारतीय कृषि की तरक्की में एक बड़ी बाधा अच्छी परिवहन व्यवस्था की कमी भी है। किसी भी व्यवसाय को पनपने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। तकनीकी विस्तार ने इस आवश्यकता को और बढ़ा दिया है? लेकिन इस क्षेत्र में पूंजी की कमी बनी हुई है। छोटे किसान महाजनों व्यापारियों से ऊंची दरों पर कर लेते हैं। पिछले कुछ सालों में किसानों ने बैंकों से भी कर लेना शुरू किया है लेकिन हालात नहीं बदले हैं। किसानों की कर्ज माफी पर हाय-तौबा मचाने वाले अर्थशास्त्री उद्योगपतियों की कर्ज माफी और लाखों करोड़ रुपये के एनपीए पर क्यों मौन हो जाते हैं? कितना दुर्भाग्य है कि भारत में प्रतिवर्ष 10,000 से अधिक किसान आत्महत्या करते हैं। 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की है। वर्ष 2019 में महाराष्ट्र में 2680, कर्नाटक में 1331, आंध्रप्रदेश में 1019, तेलंगाना में 628 और पंजाब में 239 किसानों ने आत्महत्या की थी। 2020 में किसानों की आत्महत्या के मामले 4 प्रतिशत बढ़े हैं। अनेक कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी को कानूनी मान्यता देकर विश्व को राह दिखाना चाहिए। क्योंकि अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे आधुनिक देशों के साथ पूरे विश्व के किसानों की हालत वर्तमान में अच्छी नहीं है। उन्हें अपने फसलों का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा है। एमएसपी की अनिवार्यता को लेकर यह दावा करना कि इससे सरकार पर 12 से 17 लाख करोड़ का बोझ आएगा। तथ्यात्मक रूप से गलत है यह सोचने वाली बात है कि जब केंद्र सरकार वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर कर्मचारियों का वेतन बढ़ाती है और उस पर 2 से ढाई लाख करोड़ का बोझ हो जाता है तब इस तरह के तर्क अप्रासंगिक हैं। फिर इस बात को नजरंदाज क्यों किया जा रहा है कि एम एस पी पर खरीदे गए सारे अनाज का सरकार मुफ्त वितरण तो नहीं करती, उसकी कुछ मात्रा बेचती भी है। फिर जनवितरण प्रणाली और मनरेगा आदि में लोगों को अनुदानित मूल्य पर अनाज उपलब्ध कराकर सरकार स्वयं इसका श्रेय लेती है तो किसानों को उनकी ऊपज का लाभ दायक मूल्य देने में इसे क्या परेशानी है ।इसी तरह मंडियों की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। किसानों को मंडी के पास जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, बल्कि मंडी को किसानों के नजदीक लाने की जरूरत है पूरे देश में महज 7000 मंडियां हैं जबकि 40000 मंडियों की जरूरत है। इसी तरह सहकारी व्यवस्था को भी आगे लाया जाना चाहिए। पंजाब व हरियाणा में किसानों की आय अधिक है क्योंकि यहां अधिकांश खरीद एमएसपी पर होती है, जबकि पंजाब में बिकने के लिए बिहार जैसे राज्यों से अनाज जाता है। इस बार हम किसानों की खुशहाली में अपने स्तर से भी योगदान देने का संकल्प लें। कृषि व्यवसाय तथा किसानों का सम्मान करें तथा प्याज और टमाटर के भाव बढ़ने पर नाक-भौंह न सिकौडें। सरकार,आम जनता तथा किसानों को मिलकर मुंशी प्रेमचंद के इस कथन को गलत सिद्ध करने के लिए प्रयास करना होगा। भारतीय किसान गरीबी में जन्म लेता है, गरीबी में जीता है और गरीबी मेंही इस दुनिया को छोड़ देता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्ष 1947 से अब तक 29 लोग वित्त मंत्री रह चुके हैं। इनमें से केवल के सी नियोगी ही ऐसे अकेले वित्त मंत्री रहे जो बजट नहीं पेश कर पाए। इसकी वजह यह है कि वह 1949 में केवल एक महीने के ही लिए वित्त मंत्री रहे थे। उसके बाद उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ ही कांग्रेस छोड़ दी। इन 29 वित्त मंत्रियों में से तीन लोगों- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए खुद ही एक-एक बार बजट पेश किया था। चार वित्त मंत्री ऐसे रहे जो आगे चलकर देश के प्रधानमंत्री भी बने। इनमें मोरारजी देसाई, चरण सिंह, वी पी सिंह और मनमोहन सिंह शामिल हैं। एक और सिंह- जसवंत सिंह भी वित्त मंत्री रहे लेकिन छह तमिल इस पद को संभाल चुके हैं। हालांकि निर्मला सीतारमण से पहले सिर्फ पांच वित्त मंत्री ही ऐसे रहे हैं जिन्हें बेहद असामान्य हालात का सामना करना पड़ा। यह लेख इस पहलू पर गौर करेगा कि इन लोगों ने किस तरह चुनौती का सामना किया। संक्षेप में कहें तो चार वित्त मंत्री मुश्किल दौर से उबारने में सफल रहे। उन्होंने नाटकीय ढंग से पूरे देश का मिजाज ही बदलकर रख दिया। केवल 1957 में ही वित्त मंत्रालय संभाल रहे शख्स पर हालात भारी पड़े। यहां पर मैं यह जोड?ा चाहूंगा कि निर्मला इस समय जिस संकट का सामना कर रही हैं उसकी गहनता पिछले सभी संकटों के जोड़ के बराबर है। 1947- विभाजन के बाद पहला बजट 20 नवंबर, 1947 को पेश किया गया था। कमोबेश समूचा बजट ही रेलवे को समर्पित किया गया था। भगवान ही बता सकते हैं कि सरकार के दिमाग में आखिर क्या चल रहा था। 1957- यह कांग्रेस के अवाडी अधिवेशन के बाद का पहला बजट था। कम वृद्धि, बढ़ी हुई मुद्रास्फीति और तेजी से कम होते संतुलन पर काबू पाने चुनौती थी। इससे निपटने के लिए कांग्रेस ने अवाडी अधिवेशन में अर्थव्यवस्था की उल्लेखनीय उपलब्धियों पर ध्यान देने और भारी उद्योगों में बड़े पैमाने पर निवेश करने का फैसला किया था। इसके लिए धन जुटाने के इरादे से सरकार ने दूसरी पंचवर्षीय योजना में करों में भारी वृद्धि कर दी। 1970- छह बड़े संकटों के बाद पेश हुआ यह पहला बजट था। 1962 में चीन के साथ जंग, 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध, 1965 और 1966 में लगातार दो साल आए सूखे, 1966 के अवमूल्यन और 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो चुका था। 1970 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपना अकेला बजट पेश किया था। यह अर्थव्यवस्था में राज्य की संलिप्तता में भारी विस्तार का एक ब्लूप्रिंट था। इसने देश की मनोदशा ही पूरी तरह बदल दी। मतदाता इस बात से काफी खुश थे कि धनी लोगों से खूब कर वसूला जा रहा है। 1985- यह बजट अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पेश किया गया था। वित्त मंत्री वी पी सिंह ने करों एवं शुल्कों में कटौती की, औद्योगिक लाइसेंस प्रक्रिया को सरल बनाया और संसाधनों के समुचित आवंटन के लिए बाजार की तरफ संकोच-भरी निगाह डाली। उन्होंने घाटे के लिए बड़े पैमाने पर वित्त का प्रावधान रखा जिसका परिणाम 1991 के भुगतान संतुलन संकट के रूप में सामने आया। 1991- भुगतान संतुलन संकट के बाद का यह पहला बजट था। वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने रुपये का भारी अवमूल्यन किया, औद्योगिक लाइसेंसिंग को लगभग खत्म कर दिया और निर्यात सब्सिडी में कटौती की थी। सीमा शुल्क एवं उत्पाद शुल्क दोनों में कटौती की गई, प्रत्यक्ष करों को तर्कसंगत बनाया गया और विदेशी निवेश का दिल खोलकर स्वागत किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि देखते-ही-देखते पूरा माहौल ही बदल गया। एक बार फिर ऐसा मौका आया है कि 2021 का बजट देश के डिस्क-आॅपरेटिंग सिस्टम को बदल सके। इस मौके को किसी भी हाल में गंवाना नहीं चाहिए। मेरी राय में पहला बिंदु यह होगा कि बजट को उसके आर्थिक परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाए जिससे हम 1970 में भटक गए थे। सियासत का जरिया बन चुके पुनर्वितरण पर जोर देना बंद कर देना चाहिए क्योंकि इसके नतीजे नकारात्मक रहे हैं। बुनियादी रवैये में बदलाव के लिए सरकार को खुलकर यह स्वीकार करना होगा कि देश को संपन्न एवं अच्छी आर्थिक हैसियत वाले लोगों की जरूरत है क्योंकि यही लोग खर्च, बचत एवं निवेश करते हैं। आर्थिक वृद्धि के इन चालकों को दरकिनार करने की प्रवृत्ति पर हमेशा के लिए लगाम लगनी चाहिए। इसके लिए व्यक्तिगत आयकर को उसी तरह नीचे लाना होगा जैसे कॉपोर्रेट कर के मामले में किया गया है। यहां पर मैं आपके समक्ष एक बेतुका एवं शर्मनाक आंकड़ा रखता हूं। कॉपोर्रेट कर से प्राप्त राजस्व व्यक्तिगत आयकर से प्राप्त राजस्व से थोड़ा ही अधिक है। इन दोनों का अनुपात क्रमश: 52 फीसदी एवं 48 फीसदी है। इतना ही नहीं, सरकार व्यक्तिगत आयकर के रूप में जो भी राजस्व अर्जित करती है उससे भी अधिक राशि अपने काफी हद तक नकारात्मक उत्पादक कर्मचारियों के वेतन और कोई भी योगदान नहीं देने वाले लोगों को पेंशन देने पर खर्च कर देती है। इससे भी बुरी बात यह है कि वह इनके भुगतान के लिए भारी उधारी भी लेती है। अब भीड़ को कम करने पर चर्चा करनी होगी। आगामी बजट अगर सतत रूप से वृद्धि को बहाल रखना चाहता है तो उसे धनी एवं समृद्ध लोगों की जेब में पहले से अधिक रकम छोड़ी होगी। आयकर की केवल दो दरें होनी चाहिए: 30 लाख रुपये तक सालाना आय पर 10 फीसदी और उससे अधिक आय वाले लोगों पर 25 फीसदी की दर से कर लगाया जाए। अगर मनमोहन सिंह जुलाई 1991 में हमें ईस्ट इंडिया कंपनी को भुलाने की स्थिति में ला सके तो निर्मला सीतारमण को भी नेहरूवादी कराधान को भूलने की जरूरत है। जीएसटी में सुधार का रैला अब बंद हो, कर के दर कम से कम करने, सरकारी खर्च की दिशा सही रखने की जरूरत बजट से हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रो पीके आर्य)। नवोन्मेष के वर्तुल लहक रहे हैं, पुनश्च: एक और वर्ष स्वागत की दहलीज पर खड़ा मुस्कुरा रहा है। हम सब उसके लिए गहरे अहोभावों से पूरित हैं, आशाओं की कोंपलें फूट रही हैं। पुराने और अप्रिय को विस्मृत करने को मन उतावला है, नूतन के प्रति नए रोमांच का संचार जीवन के प्रति पुलक पैदा करता है। निजी जीवन से इतर समाज और राष्ट्र के बारे मिलने वाले संदेश हृदय को आह्लादित करते हैं कि चलो कुछ भी हो हमारा भविष्य नवोत्थान के स्वर्णिम शिखरों की ओर देखकर प्रसन्न और आनंदित तो है। हर जाता हुआ वर्ष कुछ शुभ कुछ अशुभ छोड़ता ही है। 2021 भी अपवाद न था, लेकिन कोविड की दूसरी लहर जिसमें आॅक्सीजन की किल्लत मची, लंबे अरसे तक भूलेगी नहीं। कोविड के सभी प्रकोपों ने हर बार जीवन को नए सिरे से समझने में मदद की है। इस आपदा का एक सुखद पक्ष यह है कि यह हमें आत्मावलोकन का अवसर दे रहा है। जिंदगी आज भी अपने विविध रंगों में पूरे वेग से चल रही है। कोविड के प्रहार का अर्थव्यवस्था पर भी असर है। लंबे अरसे से अपने स्वरूप के उद्धार को प्रतीक्षारत अयोध्या और बनारस के भाग्य जगे हैं। देश अपने स्वरूप और स्वाभिमान की एक स्वर्णिम यात्रा पर चल निकला है। नरों में कुछ इंद्र अपनी सार्थकता को उपलब्ध हुए हैं तो कुछ योगियों की साध तपकर प्रकट हो रही है। अंग्रेजी में एक कहावत है मैन बिहाइंड द कैमरा अब आने वाला समय तय कर देगा कि मैन बिहाइंड द पॉलिटिक्स भारत अपनी स्थिति और शक्ति के एक नए आयाम को संस्पर्श कर रहा है। आते वर्ष में भारत का प्रभुत्व समग्र रुपेण विस्तारित होता दिख रहा है। देश नव उत्थान के नूतन शिखरों की ओर पूरी शान से बढ़ रहा है। अवधेश कुमार का लेख : शीर्ष देश बनने की उम्मीद जाते वर्ष में नरेंद्र मोदी एक दूरदर्शी नेता के रूप में उभरे हैं। इस वर्ष बोए गए बीज आते वर्ष में पुष्पित पल्लवित होने प्रारम्भ होंगे। अमेरिका के साथ अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों में भारतीय कूटनीति छिपी है। वियतनाम के साथ भारत का गठजोड़ चीन पर दबाव बनाने के लिए काफी है। प्राय: ऐसा होता है कि विश्व में सभी देशों की सभी देशों से नहीं पटती पहली बार यह देखने को मिल रहा है कि भारत का चीन और पाकिस्तान को छोड़कर कोई शत्रु नहीं। वैश्विक पटल पर भारत की स्वीकार्यता सभी देशों के मध्य एक नए वैश्विक सम्बंध का ताना-बाना बुनती दिखाई दे रही है। बहुत से कयासों को पीछे छोड़ते हुए कोरोना के मामले में भी भारत अन्य अनेक विकसित देशों से अच्छी स्थिति में है। भारत ने दवाई बनाने से लेकर उसके प्रयोग तक में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। बहुत मामूली से नुकसान के साथ हमें हंसता देख समूचा विश्व हतप्रभ है। वियतनाम ने चीन के दक्षिणी छोर पर तेल निकालना शुरू कर दिया है। यह तेल भारत को भेजा जाता है। भारत की रिलायंस कंपनी वहां कार्यरत है। अमेरिका का वियतनाम पर बढ़ता वर्चस्व भारत के लिए सुखद संकेत है। भारत की सीमाओं पर खासकर चीनी क्षेत्र में भारतीय सैन्य दबदबा बढ़ा है। 1962 के बाद पहली बार लिपुलेख दर्रे तक भारतीय सड़क मार्ग एकदम दुरुस्त है। जो किसी भी चीनी हिमाकत का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पर्याप्त है। कैलाश मानसरोवर मार्ग विशेषकर उत्तराखंड, तिब्बत और नेपाल सीमा पर भारत की आज जो स्थिति है, वह पहले कल्पना की बात थी। जब लाकडाउन में सभी गतिविधियां लगभग स्िथर थी तब हमारे सैनिक वहां नवनिर्माण के नए अध्याय रच रहे थे। प्रमोद जोशी का लेख : उम्मीदों पर हावी असमंजस चीन ने सियाचिन दर्रे पर मानवीय दल को हटाकर अपने रोबोट दस्ते नियुक्त किए हैं, जबकि भारतीय सैनिक माइनस 40 तापमान में भी वहां गिद्धा पा रहे हैं। चीन और अमेरिका का भारत में 15 अरब डालर निवेशित है। भारत के लिए यह एक विन विन स्थिति है। जबकि पाकिस्तान अपनी गरीबी की पराकाष्ठा पर है। अफगनिस्तान की सीमा के निकट ईरान में भारतीय सेना ने जो पोर्ट बनाया है वह बहुआयामी उद्देश्यों की पूर्ति करेगा। अब ईरान भारत से सीधे व्यापार और अन्य कार्यों हेतु स्वतंत्र है। भारत ने सऊदी अरब की मदद से पाकिस्तान में सेक्शन 2ए और 3 ए रद्द कराके पुन: पाकिस्तान को विभाजन के कगार पर ला खड़ा किया है। अब पाक चार हिस्सों में विभक्त होगा। सबसे पहले पीओके भारत में विलय होगा। रूस और जापान जैसी दो महाशक्तियों का भारत से जुड़ाव गहराया है, इसका परिणाम यह निकलेगा कि भारत पहले एशिया और बाद में दुनिया के सर्वाधिक शक्तिशाली देशों में गिना जाएगा। यदि चीन हांगकांग में अपनी शक्ति दिखाता है तो भारत चीन अधिकृत कश्मीर को कब्जे में करने को तैयार है, ताकि उसकी सीपीईसी योजना को बाधित किया जा सके। अमेरिका भारत को सहर्ष एमटीसी आर समूह में शामिल कर चुका है, अब जल्दी ही भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह को अपने प्रभुत्व में ले लेगा। बुरे से बुरे वक़्त में भी कुछ न कुछ अच्छा और श्रेष्ठ होता ही है। यह नियति का नियम है। जिस समय हिंदुत्व पर कुल्हाड़ा चल रहा था और प्रतिदिन सैकड़ों किलो जनेऊ और चोटियां तोलकर धर्मांतरण किया जा रहा था, उसी समय हनुमान चालीसा और रामचरितमानस की रचना हुई। कोविड काल में जब अन्य अनेक देश अपने अस्तित्व और भविष्य से जूझ रहे थे उसी समय भारत में नव आधुनिकीकरण की ठंडी बयार बह रही थी। सीमाओं और नगरों में शानदार सड़कों और सुविधाओं का निर्माण हो रहा था। आते वर्ष में विकास कार्यों की यह गति बरकरार रही तो हमें शीघ्र ही उन्नत राष्ट्र के नागरिक होने का सुखद एहसास होगा। भारत पर 200 साल तक राज करने वाले ब्रिटेन में आहूत 53 देशों की सभा में भारत के प्रधानमंत्री को महाध्यक्ष बनाना बहुत बड़े परिवर्तन की ओर संकेत करता है। यूएन मानवाधिकार परिषद में सदस्यता हेतु भारत को मात्र 97 मतों की आवश्यकता थी मिले 188 यह पहले कभी संभव न था। शादी और सियासत के बीच घमासान जब दुनिया के सर्वाधिक शक्तिशाली देशों की सूची जारी हुई तो भारत उसमें चौथे नम्बर पर आया, हमसे आगे अमेरिका, रूस और चीन हैं। जिस जीएसटी को लेकर इतना हो हल्ला था उसका मासिक कलेक्शन एक लाख करोड़ को पार कर गया। नए ऊर्जा सौर संयंत्र लगाने में अमेरिका और जापान को पीछे छोड़कर भारत आगे आन खड़ा हुआ। भारत की जीडीपी 8.2 है जबकि चीन की 6.7 और अमेरिका की 4.2 ही है। जल थल और गगन तीनों क्षेत्रों में सुपरसोनिक मिसाइल दागने वाला पहला देश बना भारत। इन उपलब्धियों की सूची बहुत लम्बी है जो भारत को उसके उन्नत शिखर की ओर अग्रसर कर रही है। हम सुनते आए हैं कि भारत विश्वगुरु था। अब हम पुन: उसी ओर अग्रसर हैं। इतनी विषमताओं के बीच भी भारत जिस तरह से उभर रहा है उसे देखकर सारी दुनिया ठगी सी खड़ी है। आते वर्ष में जनसंख्या नियंत्रण समेत अन्य अनेक महत्वपूर्ण बिल देश को एक नयी दिशा देंगे। इन्हीं सुखद नवीनताओं की पदचाप के साथ सभी को नववर्ष शुभ और अतिशय मंगलकारी हो! ॐ स्वस्ति अस्तु...
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत समेत 100 से अधिक देशों तक फैल चुके कोरोना के नए वैरिएंट ओमक्रोन के चलते ब्रिटेन में विश्व की पहली मौत हुई है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इसकी पुष्टि की है। नए वेरिएंट की बढ़ती रफ्तार को थामने के लिए आज विश्व में जहां नाना तरह के उपाय खोजे जा रहे हैं, वहीं कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका असर बहुत ही कम होगा। आईआईटी कानपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता पद्मश्री प्रोफेसर मनिंद्र अग्रवाल का कहना है कि देश में तीसरी लहर का आना तय है। इसका प्रभाव दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक दिखने लगेगा। जनवरी के अंतिम और फरवरी के पहले सप्ताह की शुरुआत में ओमिक्रोन चरम पर होगा। कैंसर होना भी अपने आप में एक तरह का म्यूटेशन है। फर्क सिर्फ इतना है कि कैंसर की वजह से हम बीमार होते हैं और वायरस म्यूटेशन अपने बचाव के लिए करता है। कोरोना वायरस में भी यही हुआ है। इंसान के शरीर में जब इम्युनिटी डेवलप होने लगती है, चाहे वह नेचरल से हो या वैक्सीन से बनने वालीङ्घ इससे पार पाना वायरस के लिए मुश्किल हो जाता है। ऐसे में खुद को बचाए रखने के लिए कोरोना अपना रंगरूप बदलने लगता है। अब तक कोरोना में कई हजार म्यूटेशन हो चुके हैं, लेकिन ज्यादातर ऐसे म्यूटेशन थे जो जल्द ही स्वत: खत्म हो गए। हां, डेल्टा, डेल्टा प्लस और ओमिक्रोन जैसे कुछ मजबूत वैरिएंट्स लंबे समय के लिए रह जाते हैं और हमारे लिए समस्या पैदा करते हैं। अब तक कोरोना के डेल्टा प्लस वेरियंट में सबसे ज्यादा 25 म्यूटेशन हुए थे, लेकिन ओमीक्रोन में 50 से भी ज्यादा म्यूटेशन हुए हैं। इनमें से 30 से ज्यादा म्यूटेशन तो सिर्फ इसके स्पाइक प्रोटीन के स्ट्रक्चर में ही हुए हैं। कहा जा रहा है कि इसी वजह से यह ज्यादा जल्दी इंफेक्शन फैलाता है। कोरोना के नए वैरिएंट को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। यह लेख लिखे जाने तक भारत में ओमिक्रोंन के 500 मामले सामने आ चुके हैं तो सभी के कान खड़े हो गए हैं। इन मामलों के अलावा इनके संपर्क में आए कई लोग भी कोरोना संक्रमित हो गए हैं, लेकिन वह ओमिक्रोन वैरिएंट से संक्रमित हैं या डेल्टा वेरिएंट या किसी अन्य से यह अभी साफ नहीं हो पाया है। सभी के सैंपल जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए भेजे गए हैं। डॉक्टरों का मानना है कि ओमिक्रोन वैरिएंट कोरोना के डेल्टा वैरिएंट से पांच गुना ज्यादा संक्रामक है। जिस तेजी से यह दक्षिण अफ्रीका से निकलकर दुनियाभर में फैला है, उससे यह तो स्पष्ट है कि यह बेहद संक्रामक है। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह वैरिएंट कितना घातक है। ओमिक्रोन को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच यह जानना भी जरूरी है कि इस वैरिएंट के संक्रिमितों में कैसे लक्षण दिखाई देते हैं। मेट्रो हॉस्पिटल फरीदाबाद में कार्यरत डॉ। भवेश ठाकुर ने बताया है कि चूंकि उनके पास इसके मरीज अभी आए नहीं हैं, लेकिन इसकी संक्रमकता अधिक ही है। इसलिए यह तेजी से फैल रहा है। लेकिन, इसकी मारक क्षमता कितनी है और इस पर हमारी दोनो डोज का कितना असर होगा इसकी अभी कोई जानकारी नहीं है। फिलहाल जो जानकारी है, उसके अनुसार सरकार इसके रोकथाम के लिए पूरी तरह सक्षम है। सरकार के निर्देश भी अस्पतालों में आ चुके हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बचाव का सबसे सुरक्षित उपाय यही है कि आप मास्क पहनें और शारीरिक दूरी का पालन करें। कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रोंन धीरे-धीरे अपने पैर पसारने लगा है। पूरी दुनिया में इसके मामले तेजी से बढ़ने लगे हैं। भारत में इसके मामले सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है। कोरोना की पिछली लहर में डेल्टा वैरिएंट ने यहां भारी तबाही मचाई थी। डेल्टा से संक्रमित होने के बाद सांस लेने में दिक्कत, तेज बुखार, कमजोरी, खाने का स्वाद और सुगंध का पता नहीं चलने जैसे कुछ लक्षण दिखाई दे रहे थे। हालांकि, ओमिक्रोन के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं हैं। ओमिक्रोन वैरिएंट के लक्षण काफी अलग हैं। इसके लक्षण के बारे में कहा जा रहा है कि यह अब तक के सभी वैरिएंट में सबसे ज्यादा संक्रामक है। इसके अब तक जितने भी मरीज मिले हैं, उनमें कोविड-19 के आम लक्षण नहीं पाए गए हैं। किसी में भी फ्लू जैसी समस्या नहीं देखी गई है, जबकि डेल्टा में सबसे प्रमुख लक्षण यही था। जिस डॉक्टर ने पहली बार ओमिक्रोन के बारे में पूरी दुनिया को बताया था, उनके अनुसार इस वैरिएंट के मरीजों में कोविड के क्लासिक लक्षण नहीं थे। ओमीक्रोन के संदर्भ में दक्षिण अफ्रीकी स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इस महामारी से संक्रमित कई लोगों में हल्के लक्षण दिख रहे हैं या नहीं दिख रहे हैं। इन्ही लोगों से संक्रमण फैल रहा है। अभी तक जो बातें सामने आईं हैं, उससे साफ लग रहा हैं कि 70 से 80 फीसद लोगों में लक्षण नहीं दिख रहे हैं और लोगों को यह सामान्य सर्दी-खांसी लग रहा है। लक्षण गंभीर भी नहीं है, क्योंकि लोगों को सुगंध जाने या आॅक्सीजन की कमी जैसी समस्या भी नहीं हो रही है। भारत में रविवार को कोविड-19 के ओमिक्रोन के 17 और मामले सामने आए जिनमें नौ मामले राजस्थान की राजधानी जयपुर में, सात महाराष्ट्र के पुणे जिले में और एक मामला दिल्ली का है। इसके साथ ही देश में ओमिक्रोन के मामलों की कुल संख्या 23 हो गई है। जो लोग संक्रमित पाए गए हैं, उनमें से अधिकतर हाल में अफ्रीकी देशों से आए हैं या इस तरह के लोगों के संपर्क में थे। इसके साथ ही चार राज्यों और राष्ट्रीय राजधानी में ज्यादा संक्रामक वैरिएंट के मामले सामने आए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 की तीसरी लहर जनवरी-फरवरी में आ सकती है। उन्होंने कहा कि यदि हर कोई मास्क पहनता है, तो इसे रोका जा सकता है। केंद्र सरकार के अनुसार जिन देशों को खतरे वाले देशों की सूची में डाला गया है उनमें ब्रिटेन सहित यूरोपीय देश, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, बोत्सवाना, चीन, मॉरिशस, न्यूजीलैंड, जिम्बाब्वे, सिंगापुर, हांगकांग, इजराइल शामिल हैं। यदि हमारा देश खतरे वाले देशों से बाहर है तो निश्चित रूप से यह हमारी सजगता और सरकार की दूरदर्शिता है। अच्छी बात यह बताई जा रही है भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में सरकार ने पिछले दिनों हुए महामारी को ध्यान में रखते हुए देश की आधी आबादी को पूरी खुराक लगा दी गई है। लेकिन, महामारी तो विकट परिस्थितियों वाली होती ही है जिसे दुनिया ने पिछले दिनों देखा है। इसलिए इस बार वैज्ञानिकों की शोध के बाद इस बात को बहुत ही गंभीरता से लिया है कि यदि हम स्वयं अपना बचाव करते रहेंगे तो संभव है कि ओमिक्रोन नामक इस महामारी से अपने जीवन की रक्षा हम कर सकेंगे। समस्या जरूर बहुत बड़ी है, लेकिन जीवन रक्षा का भार केवल सरकार का ही नहीं, अपना भी है। हमें इसका ध्यान रखना ही होगा। आरोप—प्रत्यारोप का समय नहीं है। इसलिए सतर्क रहें, सावधानी बरतें।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रशांत किशोर को रणनीतिकार कहा अवश्य जाता है लेकिन वह खुद को राजनीतिक सलाहकार कहलाना पसंद करते हैं। पिछले दिनों वह हमारे बातचीत पर आधारित शो आॅफ द कफ के लिए आए जहां। हमने उनसे एक ऐसा सवाल किया जो हमेशा हमारे जेहन में रहता है। हमने पूछा कि क्या उनकी कोई विचारधारा है? यह एक स्वाभाविक प्रश्न है क्योंकि वह नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी, कांग्रेस-सपा (उत्तर प्रदेश, 2017), एम के स्टालिन, वाई एस जगनमोहन रेड्डी, अमरिंदर सिंह समेत कई नेताओं के साथ काम कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि वह विचारधारा के स्तर पर नास्तिक नहीं हैं और हम उन्हें वाम-मध्यमार्गी कह सकते हैं। उन्होंने अपनी बात महात्मा गांधी का उदाहरण देकर समझाई। बाद में मैंने देखा कि उन्होंने ट्विटर पर अपने परिचय की शुरूआत इन शब्दों से की है, गांधी का सम्मान करें...। वामपंथी रुझान वाला मध्यमार्गी होने के उनके दावे ने हमें सोचने पर विवश कर दिया। यदि आज हम अन्य प्रमुख राजनेताओं से यही प्रश्न करें तो? यदि राहुल गांधी, ममता बनर्जी, आंध्र के जगन मोहन, तमिलनाडु के स्टालिन, तेलंगाना के केसीआर आदि नेताओं से उनकी विचारधारा पूछी जाए और अगर वे जवाब दें तो कमोबेश यही उत्तर मिलेगा। भारतीय राजनीति में अब हर कोई वाम रुझान का दम भरता है। कोई नहीं कहता कि वह दक्षिणपंथी विचारधारा का है। यहां एक दिलचस्प सवाल पैदा होता है कि नरेंद्र मोदी का जवाब क्या होगा? जाहिर है हम अनुमान ही लगा रहे हैं कि वह हममें से किसी को यह सीधा सवाल करने देंगे: आपकी विचारधारा क्या है प्रधानमंत्री महोदय? आप उनके प्रशंसक हों या आलोचक, पूरी संभावना है कि आपको लगे कि वह स्वयं को दक्षिणपंथी बताएंगे। बीते सात वर्ष यानी जब से मोदी-शाह की भाजपा सत्ता में आई है, दक्षिणपंथ पार्टी तथा उसके पीछे की वैचारिक शक्तियों के लिए व्यापक रूप से स्वीकार्य शब्द है। हमें देखना होगा कि क्या यह बात तथ्यों पर खरी उतरती है। आप तैयार रहिए क्योंकि मैं आपको बताऊंगा कि मोदी और उनकी भाजपा दक्षिणपंथी हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व नहीं करती। बल्कि यह वाम हिंदुत्व दर्शाती है। समय के साथ वाम-दक्षिण के भेद में घालमेल हो गया है। शासन के मामले में दक्षिणपंथ का पहला अर्थ है सामाजिक रूढ़िवाद, मजबूत धार्मिकता, कट्टर राष्ट्रवाद, आलोचना की कम गुंजाइश और अधिनायकवादी दृष्टि। इन सभी मानकों पर मोदी सरकार और मौजूदा भाजपा दक्षिणपंथी होने पर खरी उतरती है। परंतु हमें सामान्य विरोधाभास में नहीं उलझना है। भाजपा और मोदी अमेरिका के रिपब्लिकन और ब्रिटेन के कंजरवेटिव से अलग नहीं हैं। अब हम विवादित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। हम यह दलील कैसे दे रहे हैं कि मोदी-शाह-योगी की भाजपा विशुद्ध दक्षिणपंथी या हिंदू दक्षिणपंथी नहीं बल्कि वाम हिंदूवादी दल है? मोदी सरकार ने बीते सात से अधिक वर्षों में अर्थव्यवस्था को लेकर जो कदम उठाए हैं उन पर नजर डालिए। ऐतिहासिक संदर्भों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली भाजपा सरकार पर भी नजर डालिए। उसने सरकार को कारोबार से बाहर रखने और विनिवेश मंत्रालय स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई थी। सन 2014 में जब पार्टी सत्ता में लौटी तो आशा के अनुसार वह मंत्रालय वापस आना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालांकि अब वित्त मंत्रालय के अंतर्गत इसके लिए एक विभाग है जहां एक सचिव नियुक्त हैं। अब जाकर विनिवेश की बात होने लगी है लेकिन एयर इंडिया के अलावा ज्यादा कुछ हुआ नहीं है। निजीकरण के अन्य मामलों में बस बातें ही हो रही हैं या महज स्वामित्व हस्तांतरण। मसलन एक बड़ी सरकारी कंपनी द्वारा छोटी कंपनी का अधिग्रहण करना और सरकार द्वारा बड़े अंशधारक के रूप में घाटे की भरपाई किया जाना। अक्सर देखने में आता है कि सरकार जिस सरकारी उपक्रम का विनिवेश करना चाहती है उसमें एलआईसी या ओएनजीसी के माध्यम से हिस्सेदारी खरीद लेती है। सरकार को इससे पैसा मिलता है। हमारी शिकायत यह नहीं है कि उक्त राशि भारत की संचित निधि में गुम हो जाती है। यदि आप बाजार अर्थव्यवस्था में यकीन करते हैं तो आपको इस बात को लेकर शिकायत नहीं होगी कि एलआईसी या ओएनजीसी ने अपने मुनाफे से सरकार को लाभांश दिया। परंतु जब सरकार उन्हें अपनी परिसंपत्ति खरीदने पर विवश करती है तो जरूरी नहीं कि ये कंपनियां नीतिगत धारक या अल्पांश हिस्सेदार के हित में काम कर रही हों। हम यह नहीं कह रहे हैं कि वह हमेशा उनके खिलाफ होता है लेकिन तथ्य यही है कि इन कंपनियों के बोर्ड इन गैर सरकारी अंशधारकों के हितों को ध्यान में रखकर ही निर्णय नहीं कर रहे होते। यह वाम की विशेषता है, न कि दक्षिण की। वाम को बड़ी, महत्त्वाकांक्षी, कल्याण योजनाओं वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए जाना जाता है जिसमें राजस्व के बड़े हिस्से का पुनर्वितरण शामिल होता है। मोदी सरकार भी कमोबेश यही कर रही है। मनरेगा, ग्राम आवास, शौचालय निर्माण, उज्ज्वला योजना, किसानों और गरीबों को प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण से लेकर नि:शुल्क अनाज वितरण तक उसने ऐसा ही किया। क्या आपने ध्यान दिया है कि सरकार के बजट की आलोचना में विपक्ष कितनी खामोशी बरतता है? मौजूदा सरकार को लेकर अमीर समर्थक होने जैसे कुछ जुमले अवश्य कहे जाते हैं लेकिन इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि व्यक्तिगत स्तर पर लगने वाला कर सुधारों के बाद के दौर में इस समय उच्चतम है। वह लगभग 44 फीसदी है। प्राय: अमीरों के उपभोग की वस्तुओं पर लगने वाला 18 फीसदी जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर इसके अलावा है। वाम दल इसकी सराहना करेंगे। यकीनन वे चाहेंगे कि अमीरों पर और अधिक कर लगाया जाए। आशा है कि वे 97 फीसदी कर नहीं चाहेंगे जो इंदिरा गांधी के समाजवादी चरम दिनों में लगता था और जिसने देश में एक समांतर काली अर्थव्यवस्था की बुनियाद रखी थी। वामपंथियों को विस्तारवादी बड़ी और माई-बाप सरकार पसंद आती है। मोदी युग में हमारी सरकार के विस्तार पर ध्यान दीजिए। दिल्ली में एक के बाद एक बनते भवनों पर निगाह डालिए जो सरकार के बढ़ते आकार को समायोजित करने के लिए बन रहे हैं। अब नई सेंट्रल विस्टा परियोजना में नए भवनों की गुंजाइश बनेगी। वाजपेयी सरकार के साथ तुलना करें तो उन्होंने दिल्ली के केंद्र में स्थित घाटे में चल रहे लोधी होटल को बेचने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई थी। होटल जनपथ उससे भी बड़ा सरकारी उपक्रम था जिसे बेचने के बजाय कई सरकारी कार्यालयों में बदल दिया गया है। अशोक होटल के बगल में स्थित सम्राट होटल को बहुत पहले सरकारी भवन में बदल दिया गया था। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि नए लोकपाल (क्या आपको याद भी है कि हमारे यहां एक लोकपाल नियुक्त किया गया था) को भी इसकी एक मंजिल का आधा हिस्सा मिला है। हमारे कर एक पीढ़ी में सर्वोच्च स्तर पर हैं, हमारी सरकार दो पीढ़ियों में सबसे अधिक आकार की है और आकार कम होने का नाम नहीं ले रहा। हम अपनी कंपनियों का निजीकरण अक्सर एक सरकारी कंपनी को दूसरी के हाथों सौंपकर कर रहे हैं। अब हमारी सरकार यह तय कर रही है कि पूरा देश कोविड का कौन सा टीका लेगा, बूस्टर खुराक दी जाए या नहीं और भारत में क्या बेचा जा सकता है। वास्तविक रूप से मुक्त बाजार में कोवैक्सीन, कोविशील्ड, स्पूतनिक, फाइजर और मॉडर्ना के टीकों की दुकानें और खरीदार होते। कार बाजार में उपभोक्ता मारुति या मर्सिडीज का चयन कर सकते हैं लेकिन वे अपने लिए पसंदीदा टीका नहीं चुन सकते। क्यों? इसलिए कि हमारी सरकार दरअसल माई-बाप सरकार है। यह आर्थिक मामलों में दक्षिणपंथी सरकार नहीं है। दक्षिणपंथ केवल धर्म और राष्ट्रवाद के क्षेत्रों तक सीमित है। सरकार का शेष हिस्सा उतना ही वाम रुझान वाला है जितनी कि कांग्रेस या कोई अन्य राजनीतिक दल। यही वजह है कि हम मोदी-भाजपा की विचारधारा को हिंदू वाम विचार कहते हैं।
एबीएन डेस्क। जिस तरह परमेश्वर की सृजना नहीं हुई, ठीक उसी तरह प्रभु यीशू मसीह भी हैं, जिनका न तो कोई आदि है और न ही अंत। प्रभु यीशू मसीह के आने से 700 वर्ष पहले यशायाह नबी ने मसीह के बारे में भविष्यवाणी की थी जिसके बारे में पवित्र बाईबल में इस तरह लिखा गया है कि प्रभु अर्थात परमेश्वर तुम्हें एक निशान देगा। देखो एक कुंवारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी। वे उसका नाम इमानुएल रखेंगे। इस भविष्यवाणी की पुष्टि युहन्ना नबी ने मसीह के जन्म के समय की। युहन्ना नबी ने कहा शब्द देहधारी हुआ। शब्द का वर्णन मसीह के जन्म से हजारों वर्ष पहले लिखी गई पवित्र बाईबल में किया गया है। यहां शब्द प्रभु यीशू मसीह के लिए प्रयोग किया गया था। कैसर ओगस्तस की हुकूमत में यहूदिया के बादशाह हैरोदेस, जो अपने आप को परमेश्वर कहता था, अपनी प्रजा पर भारी अत्याचार कर रहा था। उस समय परमेश्वर ने उन मजलूम लोगों को हैरोदेस के जुल्मों से राहत दिलवाने, पाप से मुक्ति का मार्ग दिखलाने और स्वर्ग के राज्य के बारे में जागरूक करवाने के लिए अपने प्यारे बेटे (शब्द) यीशू मसीह को इस संसार में भेजा। प्रभु यीशू मसीह के जन्म के बारे में पवित्र बाईबल में इस तरह लिखा गया है : यीशू की माता मरियम की एक बढ़ई यूसुफ के साथ मंगनी हो चुकी थी और उनके इकट्ठे होने से पहले पवित्र आत्मा से मरियम गर्भवती पाई गई। उन दिनों जब मरियम गर्भवती थी तो कैसर ओगस्तस की हुकूमत की ओर से रायशुमारी के लिए यरूशलम के शहर बैतलहम जाकर अपना नाम लिखवाने के लिए कहा गया जिसके तहत मरियम और यूसुफ को वहां जाना पड़ा। वहां ठहरने के लिए कोई जगह न मिलने पर उनको तबेले में ठहरना पड़ा। वहां यीशू का जन्म हुआ। जब यीशू का जन्म हुआ तो आसमान पर एक रूहानी सितारा दिखाई दिया जिसकी रोशनी को देख कर सारा संसार जगमगा उठा। स रूहानी सितारे की चकाचौंध रोशनी को देखकर संसार की चारों दिशाओं से भविष्यवक्ताओं ने अपने ज्योतिष ज्ञान द्वारा पता लगाया कि वह हस्ती कहां पैदा हो सकती है। तो चारों ज्योतिषी अपने-अपने देश से उस महान हस्ती (यीशू) की तलाश में निकल पड़े। इस तलाश में रूहानी सितारे ने उनकी सहायता की। यीशू मसीह 33 वर्ष तक इस दुनिया में रहे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक आश्चर्यजनक कार्य किए। अंधों को आंखें दीं, मुर्दों को जिंदा किया, बीमारों को स्वस्थ किया। अगर प्रभु यीशू मसीह की शिक्षाओं पर नजर डाली जाए तो ये इतनी सरल हैं कि आम आदमी उनको ग्रहण करके अपना जीवन रूहानी बना सकता है। उन्होंने अपने इन उपदेशों में इंसान को अपने आपको पहचानने के लिए बहुत ही सरल ढंग से कहा कि हे इंसान, तू किसी की आंख का तिनका निकालने से पहले अपनी आंख का शहतीर देख अर्थात किसी के बारे में टिप्पणी करने से पहले अपने चरित्र पर नजर डाल। उन्होंने किसी को क्षमा कर देने को सबसे बड़ा धर्म कहा। उन्होंने एक सामरी औरत, जो उस समय की सबसे छोटी जाति कहलाती थी, से पानी पीकर ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने का संदेश दिया। उन्होंने सदैव ही प्रेम, आपसी भाईचारे और एकता का संदेश संसार को दिया इसलिए उनका जन्मोत्सव सारे संसार के लोगों द्वारा बहुत ही श्रद्धा व धूमधाम से मना रहा है। परमेश्वर ने संसार से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना इकलौता बेटा दे दिया ताकि हर एक जो उस पर विश्वास करे उसका नाश न हो बल्कि वह स्थायी जीवन प्राप्त करे।
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