एबीएन एडिटोरियल डेस्क (पवन)। भारत के गणतंत्र का, सारे जग में मान है, दशकों से खिल रही, उसकी अदभुत शान हैं। 26 जनवरी 1950 को, हमारा देश भारत संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, और लोकतांत्रिक, गणराज्य के रुप में घोषित हुआ। गणतंत्र दिवस मनाने का मुख्य कारण यह है कि इस दिन हमारे देश का संविधान प्रभाव में आया था।26 जनवरी 1950 के दिन भारत सरकार अधिनियम को हटाकर भारत के नवनिर्मित संविधान को लागू किया गया। इसलिए उस दिन से 26 जनवरी के इस दिन को भारत में गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। यह भारत के तीन राष्ट्रीय पर्वों में से एक है। इस दिन पहली बार 26 जनवरी 1930 में पूर्ण स्वराज का कार्यक्रम मनाया गया। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत से पूर्ण आजादी के प्राप्ति का प्रण लिया गया था। इस दिन का सबसे विशेष कार्यक्रम परेड का होता है, जिसे देखने के लिए लोगों में काफी उत्साह होता है। यह वह कार्यक्रम होता है, जिसके द्वारा भारत अपने सामरिक तथा कूटनीतिक शक्ति का भी प्रदर्शन करता है और विश्व को यह संदेश देता है कि हम अपने रक्षा में सक्षम है। आज हमारा संविधान विभन्न बीमारियों से ग्रसित हो गया है। भ्रष्टाचार, बलात्कार, प्रदूषण, जनसंख्या नियंत्रण जैसे अनेक समस्याओं ने भारत मां को लहूलुहान कर दिया है। आज भी हमारा गणतंत्र कितनी ही कंटीली झाड़ियों में फंसा हुआ प्रतीत होता है। अनायास ही हमारा ध्यान गणतंत्र की स्थापना से लेकर क्या पाया, क्या खोया के लेखे-जोखे की तरफ खींचने लगता है। इस ऐतिहासिक अवसर को हमने मात्र आयोजनात्मक स्वरूप दिया है, अब इसे प्रयोजनात्मक स्वरूप दिये जाने की जरूरत है। इस दिन हर भारतीय को अपने देश में शांति, सौहार्द और विकास के लिये संकल्पित होना चाहिए। बीआर अंबेडकर ने भी समस्याओ के समाधान हेतु कानून लाने के बारे में कहा था- कानून व व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़ने लगे तो दवा जरुर देनी चाहिए। अपनी ममता से देश का बचपन संवारने वाली महिलाओ के साथ हो रहे अनेक प्रकार की हिंसा से उन्हें घायल कर दिया जाता है। एक तरफ लड़किया भारत का नाम विश्व मंच पर रौशन कर रही है वहीं दूसरी ओर महिलाओं का बलात्कार किया जाता है, तेजाब फेंक उन्हें झुलसाया जाता है और दहेज के लिए मार दिया जाता है। क्या सच में संविधान में जो अधिकार महिलाओं को मिले है उनको अब तक मिल पाया है? सात दशक बाद भी सवालों का परचम लहराती हुई नारी पूरे भारत के सामने जबाब के लिए खड़ी है। प्रश्न यह है कि नारी के उदर से जन्म लेकर उसकी गोद मे मचल कर, माता की ममता, बहन की स्नेह, प्रेयसी का प्यार तथा पत्नी का समर्पण पा कर भी पुरूष नारी के प्रति पाषाण कैसे बन गया? आखिर विवशता की आग में कब तक जलती रहेगी महिलाएं! तमाम चीजें सवाल बनकर संविधान के समक्ष खड़ा है। कब तक महिलाओ को वो सामाजिक अधिकार मिलेगा जो संविधान ने दिए हैं? राजनीतिक व्यवस्था से समाज में चुस्त, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित कानून बनाया जाए और प्रत्येक नागरिक चाहे जो कोई हो बेरोजगार या अमीर, सेवादार या किसान सब अपनी प्रत्यक्ष संपत्ति जायदाद का खुलासा करें कि जो भी चल-अचल धन है वही है और अप्रत्यक्ष कहीं भी देश या विदेश में मिलने पर जब्त होगा तो सजा मिलेगी। हमारी ज्यादातर प्रतिबद्धताएं व्यापक न होकर संकीर्ण होती जा रही हैं जो कि राष्ट्रहित के खिलाफ हैं। राजनैतिक मतभेद भी नीतिगत न रह व्यक्तिगत होते जा रहे हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अंकित सिंह)। देश नेताजी का 125वां जन्मोत्सव मना रहा है। दुनिया के इतिहास में नेताजी जैसा कोई दूसरा व्यक्ति अब तक सामने नहीं आया जिसने ब्रितानी सरकार को बुरी तरह पराजित किया। आज देश उन्हें याद कर रहा है स्मरण कर रहा है। उनकी भव्य प्रतिमा दिल्ली में लगाने की तैयारी चल रही है। नेताजी की एक भव्य प्रतिमा का अनावरण दिल्ली में किया जाएगा, जो स्थान अंग्रेज वायसराय के मूर्ति हटाने के बाद खाली थी और महत्वपूर्ण स्थान पर थी। मोदी सरकार का फैसला, अब 23 जनवरी से शुरू होगा गणतंत्र दिवस समारोह, सुभाष चंद्र बोस की जयंती भी इसमें शामिल होगी। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसी को लेकर ममता बनर्जी को पत्र लिखा है। अपने पत्र में राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस का योगदान प्रत्येक भारतीय के लिए अविस्मरणीय है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर होने वाली झांकी हर साल आकर्षण का केंद्र रहती हैं। इनमें विभिन्न राज्यों की झांकी शामिल होती हैं। इस बार पश्चिम बंगाल की झांकी को अवसर नहीं मिल पाया है। इसी को लेकर ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर आरोप लगा रही हैं। ममता बनर्जी ने गणतंत्र दिवस परेड से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 125 वीं जयंती वर्ष पर उनके और आजाद हिंद फौज के योगदान से जुड़़ी पश्चिम बंगाल की झांकी को बाहर करने के केंद्र के फैसले पर हैरानी जता दी। ममता बनर्जी ने तो यह भी कह दिया कि झांकी को हटाया जाना स्वतंत्रता सेनानियों का कद घटाने और उनके महत्व को कमतर करने के समान है। दूसरी ओर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर हमला किया। अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि पश्चिम बंगाल के लोगो, इसके सांस्कृतिक विरासत और हमारे महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह अपमान है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का दावा इससे बिल्कुल अलग है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसी को लेकर ममता बनर्जी को पत्र लिखा है। अपने पत्र में राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की आजादी के लिए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का योगदान प्रत्येक भारतीय के लिए अविस्मरणीय है। इसी भावना को सर्वोपरि रखते हुए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी के जन्मदिवस, 23 जनवरी के दिन को पराक्रम दिवस के रूप में घोषित किया है। इसके साथ ही राजनाथ सिंह ने कहा कि अब से हर बार गणतंत्र दिवस समारोह की शुरूआत नेताजी के जन्मदिवस 23 जनवरी से शुरू होकर 30 जनवरी को समापन किया जाएगा। वर्तमान सरकार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और पश्चिम बंगाल के सभी स्वाधीनता सेनानियों के प्रति कृतज्ञ है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने 1943 में निर्वासन में बनी नेताजी की सरकार की 75वीं वर्षगांठ 2018 में बड़ी धूमधाम से मनाई थी। यह हमारी सरकार थी जिसने गणतंत्र दिवस परेड में आजाद हिंद फौज के जीवित सैनिकों को शामिल किया और उनका अभिनंदन किया। इस बीच, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रदेश इकाई के प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि उनकी पार्टी कभी भी देशभक्तों और प्रतीकों पर राजनीति नहीं करती। उन्होंने कहा, कुछ तकनीकी कारणों से अस्वीकार किया गया होगा। हमारी सरकार और भाजपा नेताजी के अपार योगदान के बारे में अवगत है और हम उन्हें अपने आदर्श और राष्ट्रीय नायक के रूप में देखते हैं। भाजपा कभी भी नेताजी जैसे देशभक्तों पर राजनीति नहीं करती। तृणमूल कांग्रेस इस मामले का राजनीतिकरण कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में, बनर्जी ने बोस और उनकी आजाद हिंद फौज पर आधारित राज्य की झांकी को अस्वीकार करने पर आश्चर्य व्यक्त किया था। झांकी में रवींद्रनाथ टैगोर, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद और श्री अरबिंदो जैसे अन्य बंगाली प्रतीक भी शामिल थे।
एबीएन डेस्क (पवन पांडेय)। राजनीति की सबसे अच्छी बात यह है कि यह कभी ठहरती नहीं है। नहीं तो हम जैसे टीकाकारों को संन्यास लेने पर मजबूर होना पड़ेगा, या समय बिताने के लिए गोल्फ खेलना सीखना होगा, जो वैसे तो एक ही बात हो सकती है। आइये सबसे पहले तो यह देखें कि क्या ठहर चुका है और क्या अभी भी उबल रहा है। अपने दूसरे कार्यकाल के लगभग आधे रास्ते पर पहुंच चुके नरेंद्र मोदी के दबदबे में स्थिरता आ चुकी है। यह निर्विवाद है। जो अभी उबलने के क्रम में है, वह है उनकी प्रमुख और स्थायी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पार्टी और यह सिर्फ पंजाब के बारे में नहीं है। ये दोनों ही कथन सही हैं, लेकिन असल कहानी कहीं ज्यादा जटिल है। यही भारतीय राजनीति को रुचिकर बनाती है। सबसे पहले तो, क्या मोदी की अपराजेयता स्थिर और अभेद्य है, टाइटेनियम के सांचे में ढली हुई, जैसा हम पूर्व में कहते रहे हैं? ऐसा प्रतीत होगा यदि आप इसी प्वाइंट पर टिके रहते हैं। यहां तक कि इंडिया टुडे के नवीनतम मूड ऑफ द नेशन पोल (जिसे मोदी के लिए एक झटका माना जा रहा था) ने भी उन्हें लोकसभा में आधे के आंकड़े से थोड़ा ही पीछे रखा था। उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए सौ के करीब सीटों पर सिमटा नजर आ रहा है। क्रिकेट की भाषा में राजनीति की बात करें तो यह किसी सामान्य खिलाड़ी के लिए किसी वन डे में 40वें ओवर में 2 विकेट पर 200 के स्कोर जैसा होगा और बाकी 30 रन आपको 60 गेंदों पर बनाने हैं। अपने 50 ओवर का खेल पूरा करें, और अपने घर में जमे रहें। मोदी उस तरह के खिलाड़ी नहीं हैं, जो कि हमने हाल ही में उनकी गतिविधियों में देखी। तेजी से स्पष्ट तौर पर महसूस किया है। हर घर नल से जल कार्यक्रम को स्लीक, शॉर्ट, सोशल मीडिया फ्रेंडली वीडियो के साथ जोरशोर से प्रचार के अगले चरण में पहुंचा दिया गया है। अब कूड़े के पहाड़ हटाने के आह्वान के साथ स्वच्छ भारत अभियान को भी 2.0 वर्जन में बदला जा चुका है। भारत के हर शहर में अपने-अपने अवांछित हिमालय या अरावली या घाट वाले कूड़े के पहाड़ होते हैं। चूंकि हम दिल्ली को बेहतर जानते हैं, इसलिए कल्पना कर सकते हैं कि अगर भलस्वां और गाजीपुर के धुंधलके पहाड़ आंखों के सामने से हट जाएं तो इसका कितना असर पड़ेगा। ध्रुवीकरण और पुलवामा ने तो मदद की लेकिन मोदी और अमित शाह जानते हैं कि 2019 में उनकी जीत जहां मतदाताओं की आकांक्षाएं न्यूनतम थी, उनमें एक सबसे बड़ा फैक्टर रसोई गैस, ग्रामीण आवास सहायता, शौचालय और मुद्रा ऋण योजनाओं पर कुशलता से अमल किया जाना था। 2024 के लिए पानी और स्वच्छता को वे अपना वाहक बना रहे हैं। वे जानते हैं कि हमेशा की तरह सीमा पर किसी कार्रवाई, खासकर पाकिस्तान के साथ के बजाये चीन को लेकर मौजूदा नई तस्वीर अंतिम चरण में राष्ट्रवादी भावनाओं में उछाल ला सकती है। विपक्ष की तरफ से कोई भी जमीनी स्तर पर मोदी की योजनाओं के प्रदर्शन पर सवाल नहीं उठा रहा है। कोई भी विपक्षी नेता या कार्यकर्ता गड़बड़ियों या घोटालों का पता लगाने, शिकायत करने वालों की सूची तैयार करने, उनकी आवाज बुलंद करने के लिए गांव-गांव की खाक नहीं छान रहा। कोई भी नहीं।विपक्षवाद तो बेचारे, संकटग्रस्त न्यूज मीडिया को आउटसोर्स कर दिया गया है और यहां तक कि जब कोई साहस दिखाकर कुछ गड़बड़ियां उजागर करता है और पब्लिश करता है। अगर नीतीश कुमार यूपीए-जदयू के मुख्यमंत्री होते और भाजपा विपक्ष में होती, तो वह इसे नीतीश का चारा घोटाला बनाने की ही कोशिश करती। आप जायज कारणों से यह पूछ सकते हैं कि यदि यह सब सच है तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि हमारी राजनीति में वास्तव में कहीं ठहर चुकी है? आइए इस परत को थोड़ा खोलें और देखें कि मैं खुद अपनी ही बात को काट क्यों नहीं रहा हूं। अगर भाजपा उत्तर प्रदेश में नहीं जीतती है या फिर कम अंतर से ही जीतती है, तो यह कुछ ऐसा होगा कि आप लक्ष्य पर नजर रखते हुए आराम से खेल रहे हों और 40 से 42 ओवरों में अचानक चार विकेट गिर जाएं या फिर ये 2024 के मूड को भी बदल सकता है। इसी तरह, जब हम राज्यों की बात करते है, जिसमें उत्तराखंड और मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी शामिल हैं, तो हम किसी म्युनिसपलिटी की अहमियत को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन बृहन्मुंबई नगर निगम महज म्युनिसपलिटी नहीं है। अगर शिवसेना और उसके सहयोगी दलों को हराकर भाजपा इसे जीत लेती है तो राज्य में महा विकास अघाड़ी की सरकार बैसाखी पर आ जाएगी। भाजपा को तब भरोसा हो जाएगा कि भारत के दूसरे सबसे बड़े राजनीतिक राज्य (48 लोकसभा सीटें) को उसने अपने लिए सुरक्षित कर लिया है। लेकिन अगर शिवसेना बीएमसी में बाजी मार लेती है तो यह इस बात का संकेत होगा कि भाजपा विरोधी ताकतें महाराष्ट्र में उसके पूर्व सहयोगी के नेतृत्व में मजबूत हो रही हैं। यह 45वें ओवर में एक और विकेट गिरने जैसी स्थिति होगी। भाजपा को कोई और बात इतना परेशान नहीं करेगी। लेकिन अगर कांग्रेस नेतृत्व पंजाब फिर से जीत लेता है तो गांधी भाई-बहन की तरफ से बड़े बदलावों और पार्टी की सफाई की कवायद को स्वीकार्यकता और सराहना मिलेगी। राजनीति में सब कुछ उसी का है जो खेल में जीते। किसी भी स्थिति में, चाहे जो भी कांग्रेस से बाहर चला जाए, गांधी परिवार के पास अपने लगभग 20 प्रतिशत मूल राष्ट्रीय वोट को बचाए रखने का एक बेहतर मौका होगा। यह भाजपा के लिए बुरी खबर होगी। उसे पंजाब की परवाह नहीं है, लेकिन वह अब भी मानती है कि अगर कोई पार्टी विश्वसनीय तरीके से उसे चुनौती दे सकती है तो वह कांग्रेस ही है। कृपया ध्यान दें कि जिन राज्यों में कांग्रेस गिनती के नाम पर महज सिफर या फिर नगण्य ही रह गई है, वहां भी भाजपा के प्रचारक ज्यादातर कांग्रेस पर ही निशाना साधते हैं। यहां तक कि उत्तर प्रदेश, जहां मौजूदा हाल में कांग्रेस को दहाई के आंकड़े तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा, वहीं योगी आदित्यनाथ का मुख्य निशाना है। यही हाल जम्मू-कश्मीर का है। हालांकि, अब यह संभव नहीं लग रहा, लेकिन पंजाब में जीत राहुल को वो दे सकती है जिसकी दो दशक की उनकी राजनीति में खासी कमी रही है, एक अदद चुनावी जीत। उत्तर प्रदेश की सफलता—2009 में लोकसभा की 21 सीटों पर जीत—ही उनकी एकमात्र स्पष्ट छाप बनी हुई है। उन्हें अब पंजाब में जीत की सख्त जरूरत है, कुछ और नहीं तो, उसे स्वीकार्यता मिलने के लिए जिसे आज व्यापक स्तर पर उनका नाराजगीपूर्ण, तर्कशून्य दखल माना जाता है। लेकिन कांग्रेस अगर पंजाब को खो देने के अपने अथक और साहसिक प्रयास में सफल हो जाती है और इसी तरह बिखरना जारी रखती है, तो वो पार्टी को पूरी तरह खत्म कर सकती है। क्योंकि मध्य प्रदेश में तो यह पहले से काफी कमजोर है, वहीं राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी अपने ही मोल लिए खतरों के भंवर में फंसी है। 2022 के मुकाबले के निर्णायक चरण में भाजपा के लिए यह प्रतिद्वंद्वी की तरफ से 46वें ओवर में दो कैच छोड़ दिए जाने की तरह ही होगा। अगर आपको लगता है कि मैं क्रिकेट और राजनीति को मिलाने में अति कर रहा हूं, तो आप इसके लिए इस तथ्य को दोष दे सकते हैं कि जब मैं यह सब लिख रहा हूं तब साथ में आईपीएल मैच भी देख रहा हूं। इसीलिए तो मैं इससे भी आगे जा सकता हूं। क्या होगा अगर कोई राजनीतिक दल एक स्पोर्ट फ्रेंचाइजी हो? जैसा कि हम जानते हैं कि सबसे अधिक पैसे वाली फ्रैंचाइची को बेस्ट खिलाड़ी, कोच, प्रशिक्षक मिलते हैं। मैं सिर्फ मुंबई इंडियंस कह सकता था, लेकिन क्या होगा अगर कोई फ्रैंचाइज़ी हारती रहे, गुटबाजी में डूबी रहे और अपने प्रशंसकों को निराश और प्रायोजकों को हताश करती रहे?फिर होता यह है कि खिलाड़ी, प्रशंसक और प्रायोजक तीनों कहीं और ही ध्यान देने लगते हैं। फ्रैंचाइजी या तो खरीद ली जाती है, या खुद ही खत्म हो जाती है। एक टीम अभी उसी स्थिति में नजर आ रही है, लेकिन मैं उसके नाम का उल्लेख नहीं करना चाहूंगा क्योंकि लीग अभी जारी है। मुझे तो बस उसकी पोशाक का गुलाबी रंग बहुत पसंद है। वास्तव में अभी जो कुछ पक रहा है, वो है विपक्ष की राजनीति। राजनीतिक महत्वाकांक्षा कभी खत्म नहीं होती। भाजपा को भूल जाइए, उसके कट्टर विरोधी भी अब कांग्रेस को आसानी से अपने हाथ आ जाने वाली कमजोर फ्रेंचाइजी मानने लगे हैं। आम आदमी पार्टी दिल्ली में अपना पूरा वोट सोख लिया है और अब पंजाब पर नजरें टिकाए है। मोदी की सबसे सफल और प्रतिबद्ध विरोधी ममता बनर्जी एक के बाद एक हर छोटे राज्य में अपनी पुरानी पार्टी के बचे-खुचे अवशेष जमा कर रही हैं। कल त्रिपुरा, आज गोवा, कल मेघालय। अब देखते हैं कि इस सबके बीच अमरिंदर और धीरे-धीरे बढ़ते समूह-23 के लिए कैसे जगह बनती है। यह अविश्वसनीय है जिस तरह विपक्ष भाजपा के बजाये खुद को ही इतना ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। एक-दूसरे को खत्म कर देने की इस उल्लेखनीय कवायद में वामपंथी (केरल में) और कांग्रेस (कन्हैया कुमार) भी एक-दूसरे के नेताओं को अपने खेमे में ला रहे हैं। चूंकि मैं अभी भी क्रिकेट की भाषा में तर्क के साथ यह लेख पूरा करना चाहता हूं, तो उस शानदार लाइन पर लौटता हूं (वह जॉन अरलॉट थे या राम गुहा?) जब अजीत वाडेकर की टीम इंडिया ने 1974 में लॉर्ड्स में 42 रन पर आलआउट होकर अपनी दूसरी पारी समेट दी थी। उन्होंने कहा था कि जब तीस के करीब स्कोर पर सात विकेट गिर चुके थे, तब संकट की इस घड़ी में एकनाथ सोलकर का अपना छक्का क्रिस ओल्ड के हाथों में थमा देना, सबसे ज्यादा बेतुका काम था।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। केंद्रीय बजट में ऐसी नीतिगत घोषणाओं पर जोर बढ़ता जा रहा है जिनका लक्ष्य है वृद्धि को प्रोत्साहन देना। इस बीच बुनियादी ढांचा क्षेत्र की अपेक्षाएं भी इस रुझान के अनुरूप हो चुकी हैं। आइए बात करते हैं नौ ऐसी बातों की जो इस क्षेत्र को गति देने के लिए जरूरी हैं। आवंटन: सन 2021-22 के बजट में 5.54 लाख करोड़ रुपये की राशि की प्रतिबद्धता जताई गई थी। यह 2020-21 के 4.39 लाख करोड़ रुपये से 26 फीसदी अधिक थी। बुनियादी ढांचे पर सार्वजनिक व्यय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाला प्रमुख कारक है। ऐसे में कुल आवंटन में 25 फीसदी इजाफे की आशा करना ठीक है यानी यह राशि करीब 7 लाख करोड़ रुपये हो जानी चाहिए। अन्य फंडिंग विकल्पों के साथ मिलाकर देखें तो वित्तीय क्षमता राष्ट्रीय अधोसंरचना पाइपलाइन के 22 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष के निवेश लक्ष्य के करीब पहुंच सकती है। इसमें सार्वजनिक इकाइयों की ओर से निवेश, नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (एनएबीएफआईडी) का वितरण, बुनियादी व्यय में राज्यों का योगदान, देसी और विदेशी पूंजी तथा राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन की प्रक्रियाएं आदि शामिल हैं। एनएबीएफआईडी का परिचालन: इसका घोषित इरादा अप्रैल 2022 से ऋण देने का है। इसके लिए बजट में बताना होगा कि शुरूआती इक्विटी पूंजी यानी 20,000 करोड़ रुपये तथा 5,000 करोड़ रुपये के एकबारगी अनुदान की क्या स्थिति है। वैश्विक फंडिंग बढ़ाने के लिए 0.1 फीसदी का सॉवरिन गारंटी शुल्क, दीर्घावधि के पूंजी प्रदाताओं के लिए 10 वर्ष की आयकर छूट, लागत के बचाव के लिए विशेष प्रावधान आदि शामिल हैं। म्युनिसिपल बॉन्ड : रिजर्व बैंक ने 30 नवंबर 2021 को एक रिपोर्ट में कहा कि देश के शहरों और कस्बों की वित्तीय स्थिति गहरे दबाव में है जिससे उन्हें व्यय में कटौती करनी पड़ रही है। ऐसे में म्युनिसिपल बॉन्ड को प्रोत्साहित करना अहम है। बजट में कई उपायों पर विचार किया जा सकता है। इनमें ब्याज अनुदान, कर रियायत, ऋण में इजाफा आदि शामिल हैं। दुनिया भर में म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार फंडिंग का स्थापित जरिया हैं। अमेरिका में इस बाजार का आकार 4 लाख करोड़ डॉलर है। श्योरिटी बॉन्ड : विनिर्माण क्षेत्र में बैंक गारंटी पर बहुत जोर दिया जाता है। वहां मांगे जाने वाली नकदी के मार्जिन तथा बैंकों का गारंटी के लिए अन्य शर्तों पर बहुत जोर होता है। कई मामलों में मौजूदा बैंक गारंटी की सीमा का पूरा इस्तेमाल हुआ और बैंक अब उसे बढ़ाने से इनकार कर रहे हैं। भारतीय बीमा नियामक ने हाल में एक कार्य पत्र जारी किया है जिसमें कहा गया है कि बैंक गारंटी की जगह बीमा कंपनियां श्योरिटी बॉन्ड जारी करें। केंद्रीय बजट यह स्पष्ट संकेत दे सकता है कि 2022-23 में श्योरिटी बॉन्ड जारी किए जाएंगे। सार्वजनिक खरीद में सुधार : अब तक की सबसे अहम घोषणओं में से एक 29 अक्टूबर 2021 को जारी वित्त मंत्रालय की सरकारी खरीद और परियोजना प्रबंधन संबंधी अधिसूचना थी। इसने काम के ठेकों के लिए एल 1 राज (कम लागत वाली निविदा को बोली देने) समाप्त करने, समय पर भुगतान के निर्देश देने और सरकार द्वारा मध्यस्थता के मामलों में हार का मान रखने की प्रक्रिया शुरू की। इससे सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया का नया युग शुरू हुआ। केंद्रीय बजट को इन सुधारों का भी श्रेय लेना चाहिए और यह भरोसा दिलाना चाहिए कि नए मानकों को कड़ाई से लागू किया जाएगा तथा राज्यों को साथ लिया जाएगा। फिलहाल यह अधिसूचना केवल केंद्र की खरीद संस्थाओं तक सीमित है। हाइड्रोजन मिशन : सन 2021-22 के बजट में 800 करोड़ रुपये की राशि हाइड्रोजन मिशन के लिए अलग रखी गई है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि हरित हाइड्रोजन ही दुनिया का भविष्य है। उन्होंने राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन की घोषणा करते हुए कहा था कि देश को हरित हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात का केंद्र बनाना होगा। हाइड्रोजन का इस्तेमाल उद्योगों, परिवहन और बिजली के उपकरणों में किया जाएगा। बजट में इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने के उपायों पर भी विचार करना चाहिए। ऐसे संयंत्रों की स्थापना में निवेश तथा इलेक्ट्रोलाइजर्स के निर्माण पर उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। रेलवे बजट : नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रेलवे के वित्त संबंधी हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि परिचालन अनुपात सही वित्तीय प्रदर्शन नहीं दशार्ता। इसके मुताबिक 2019-20 में इसके 98 रहने की बात कही गई लेकिन अगर पेंशन भुगतान पर वास्तविक व्यय देखें तो यह 114 था। अतीत में सुरक्षा, रखरखाव आदि विभिन्न मदों पर बुकिंग व्यय का मसला भी रहा है। यह सुखद है कि हालिया नीतिगत घोषणाओं में नए रेल मंत्री ने परिचालन अनुपात को पारदर्शी बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। सीमेंट के लिए जीएसटी स्लैब : सीमेंट आम आदमी की आवश्यकता की वस्तु है। बड़े पैमाने पर बुनियादी निर्माण की जरूरत का सामान है। बजट में विचार होना चाहिए कि इस पर 28 फीसदी जीएसटी लगे या नहीं। देश में 65 फीसदी से अधिक सीमेंट आम लोग इस्तेमाल करते हैं। इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलना इस क्षेत्र की परेशानी है। सार्वजनिक काम की लागत कम करने और छोटे निर्माण में राहत मिलने से आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा भले ही अल्पावधि में राजस्व कुछ कम हो। एसईजेड और सीईजेड : विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) बीते वर्षों में अतार्किक हो चुके हैं। आशा है कि उन्हें प्रासांगिक बनाने के लिए नई नीतियां घोषित की जाएंगी। करीब चार तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) बनाने की अवधारणा भी राजनीतिक-नौकरशाही क्षेत्र में जोर पकड़ रही है। इनसे निर्यात को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी माहौल मिलेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव अब भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। विधानसभा चुनाव से पहले यादव परिवार की बहू का भाजपा में शामिल होना अखिलेश यादव के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। अपर्णा के भाजपा में जाने का सियासी लिहाज से भले ही सपा पर कोई बड़ा असर ना हो, लेकिन परिवार में इस टूट ने छवि की लड़ाई में अखिलेश को पीछे धकेल दिया है। हालांकि, अखिलेश ने अपर्णा के भाजपा में शामिल होने पर उन्हें बधाई दी। कहा कि नेता जी ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की थी। कुछ दिनों पहले भाजपा सरकार के मंत्रियों और विधायकों को तोड़कर अखिलेश ने जो संदेश देने की कोशिश की थी, अब उससे बड़ा संदेश भाजपा ने यादव परिवार को तोड़ कर दे दिया है। अपर्णा के भाजपा में शामिल होने के बाद एक बार फिर परिवार की लड़ाई घर की दहलीज पार कर बाहर आ गई है। अखिलेश सरकार के कार्यकाल के अंतिम दिनों जिस तरह परिवार में कलह मची और परिवार बिखरा उसका असर चुनावी नतीजों में दिखाई दिया था। एक बार फिर 2022 विधानसभा चुनाव से पहले मुलायम परिवार में टूट के बाद उस समझौते की चर्चा हो रही है, जो परिवार को एक रखने के लिए करीब 16-17 साल पहले हुआ था। मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना यादव की परिवार में एंट्री के साथ ही परिवार में बगावत शुरू हो गई थी। वरिष्ठ पत्रकार मुकेश अलख बताते हैं कि तब अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम से विद्रोह कर दिया था। बेहद नाराज अखिलेश मुलायम की हर बात अनसुनी करने लगे थे। पिता और पुत्र के बीच बढ़ती दूरियां कम कर परिवार को एक साथ लाने की जिम्मेदारी अमर सिंह ने उठाई थी। उन्होंने न सिर्फ साधना यादव को परिवार में एंट्री दिलाई, बल्कि अखिलेश यादव को भी मनाया। इस दौरान परिवार को साथ रखने को एक समझौता भी हुआ। उस समझौते के मुताबिक पिता की राजनीतिक विरासत के इकलौते वारिस अखिलेश यादव होंगे, जबकि साधना के बेटे प्रतीक यादव कभी भी राजनीति में नहीं आएंगे। इतना ही नहीं उस वक्त जो प्रॉपर्टी थी, उसे भी दोनों भाइयों में बराबर-बराबर बांटा गया। परिवार के बेहद करीब रहे लोगों का दावा है कि पार्टी में उस वक्त यह भी तय हुआ था कि साधना यादव के परिवार का खर्चा समाजवादी पार्टी उठाएगी। प्रतीक यादव लगातार कहते हैं कि वो कभी राजनीति में नही आएंगे। हालांकि,जब भी सवाल अपर्णा के राजनीतिक भविष्य को लेकर होता,वह कहते कि इसका फैसला नेता जी,यानी मुलायम सिंह यादव और खुद अपर्णा कर सकती हैं। एक पत्रकार की बेटी अपर्णा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हमेशा से रही है। वह परिवार की दूसरी बहू डिंपल यादव की तरह पार्टी में अधिकार चाहती थीं। अपर्णा की इसी जिद की वजह से मुलायम सिंह यादव ने 2017 में अपर्णा को पार्टी का टिकट दिलवाया था, लेकिन अपर्णा चुनाव हार गईं। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव नहीं चाहते थे कि वो चुनाव जीतें। परिवार के करीबियों का मानना है कि इस बार अखिलेश ने फैसला कर लिया था कि ना तो अपर्णा को टिकट देंगे और ना ही कहीं जाने से रोकेंगे। खबर है कि अखिलेश यादव ने इस बार परिवार के किसी भी सदस्य को टिकट ना देने का फैसला किया है। राजनीति में करियर बनाने को अधीर अपर्णा के लिए यह फैसला बेहद परेशानी वाला था। माना जाता है कि इसके बाद ही अपर्णा भाजपा के संपर्क में आईं और अब पार्टी में शामिल हो गई हैं। 2014 के बाद से ही अपर्णा यादव प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करने लगी थीं। 2017 में योगी सरकार बनने के बाद भी अपर्णा ने कई बार उट योगी से मुलाकात की। इतना ही नहीं,उन्होंने कई बार ऐसे बयान भी दिए जिनसे अखिलेश यादव की फजीहत हुई। राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटाने वालों को अखिलेश ने चंदाजीवी कहा था,जबकि अपर्णा ने राम मंदिर के लिए 11 लाख रुपए का दान दिया था। परिवार के करीबियों का मानना है कि इस बार अखिलेश ने फैसला कर लिया था कि ना तो अपर्णा को टिकट देंगे और ना ही कहीं जाने से रोकेंगे। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में एंट्री लेने के साथ ही अपर्णा यादव बीजेपी की पोस्टर गर्ल बन गईं हैं। बीजेपी ने मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू को पोस्टर पर जगह देते हुए कानून व्यवस्था पर विपक्ष को जवाब दिया है। इस पोस्टर में अपर्णा के अलावा हाल ही में बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) में गए स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी और सांसद संघमित्रा मौर्य को भी शामिल किया गया है। बीजेपी नेता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा ने पोस्टर ट्वीट करते हुए लिखा, योगी सरकार ने यूपी को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाया। सुरक्षा जहां बेटियां वहां। इससे पहले यूपी बीजेपी चीफ स्वतंत्र देव सिंह ने भी मुख्यमंत्री योगी और जेपी नड्डा के साथ अपर्णा की मुलाकात की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, बेटियां वहां, सम्मान और सुरक्षा जहां। बीजेपी ने इस पोस्टर के सहारे कई निशाने साधे हैं। एक तरफ पार्टी ने अखिलेश यादव को जवाब दिया तो दूसरी तरफ हाल ही में सपा में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को भी घेरा है। स्वामी प्रसाद मौर्य खुद सपा में चले गए हैं,लेकिन बदायूं से बीजेपी के टिकट पर सांसद उनकी बेटी संघमित्रा मौर्य ने साफ कर दिया है कि वह बीजेपी में ही रहेंगी। बीजेपी ने इस पोस्टर से एक तरफ सपा को घेरा तो दूसरी तरफ चुनाव से पहले महिला सुरक्षा के मुद्दे पर आधी आबादी को साधने की कोशिश की है। समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने पर अपर्णा यादव को बधाई और शुभकामनायें देते हुये कहा,हमें इस बात की खुशी है कि समाजवादी विचारधारा का विस्तार हो रहा है। उम्मीद है कि हमारी विचारधारा वहां भी संविधान और लोकतंत्र को बचायेगी। गौरतलब है कि पिछले चुनाव में अपर्णा को सपा के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से लड़ाया गया था। वह भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गयी थीं। चुनाव में भाजपा के टिकट पर इसी सीट से उनके चुनाव लड़ने की संभावना है। सपा से टिकट नहीं मिलने के कारण ही अपर्णा द्वारा भाजपा में शामिल होने के पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अखिलेश ने कहा, नेता जी (मुलायम सिंह यादव) ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की। टिकट किसे मिलना है, यह क्षेत्र, जनता और आंतरिक सर्वेक्षण पर निर्भर करता है। यह किसी एक व्यक्ति का फैसला नहीं होता है। उन्होंने मौजूदा दौर में चल रहे दल बदल के बारे में कहा कि सपा में जो लोग आये उनका व्यापक जनाधार है। चुनाव में सपा का कोई अन्य दल अब मुकाबला नहीं कर सकता है। अपर्णा के साथ हमेशा खड़े दिखने वाले शिवपाल सिंह यादव का अगला कदम क्या होगा? अब इसको लेकर भी चर्चा होने लगी है। कहा जा रहा है कि 2016 में चाचा-भतीजे में हुए विवाद में अपर्णा, चाचा शिवपाल के साथ थी। अपर्णा हमेशा कहती थीं कि वो वही करेंगी जो नेता जी और चाचा शिवपाल कहेंगे। खबर यह है कि अपर्णा अपनी महत्वाकांक्षा के चलते परिवार में अलग-थलग पड़ गई थीं। इस फैसले पर मुलायम और शिवपाल दोनों ने कुछ भी नहीं कहा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आरके सिन्हा)। बीते कुछ समय के दौरान दो महत्वपूर्ण और सकारात्मक घटनाएं देश की कूटनीति के मोर्चे पर सामने आईं। इनका संबंध भारत के चिर शत्रु पड़ोसियों क्रमश: चीन और पाकिस्तान से है। इन दोनों के साथ भारत के बेहद खराब रिश्ते पिछले साठ दशकों से चलते ही रहे हैं। बीते कुछेक महीनों के दौरान सीमा पर गोलीबारी से लेकर युद्ध जैसे हालात भी बने। जब सारी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही थी तब भारत को चीन से अपनी हजारों किलोमीटर लंबी सीमा पर दो-दो हाथ करना पड़ रहा था। पहले डोकलाम और फिर लद्दाख में दोनों देशों के सैनिकों के बीच तेज झड़पें भी हुईं। दोनों ओर से अनेकों जाने भी गयी। बहरहाल, विगत बीस फरवरी को भारत-चीन कोर कमांडर स्तर की बैठक का 10वां दौर निर्णायक रहा। इसमें दोनों पक्षों की सीमा पर अग्रिम फौजों की वापसी पर आपसी सहमति बन गई। उसके बाद से स्थितियां अचानक से बेहतर होती दिखाई दे रही हैं। चीन ने भी कहीं न कहीं समझ लिया है कि भारत से पंगा लेना उचित नहीं होगा। भारत 2021 के स्वाभिमानी राष्ट्रवादी मोदी का भारत बन चुका है क चीन को जब यह लगा कि उसने कोई हरकत की तो उसे लेने के देने प़ड़ जाएंगे, इसलिए उसने अपनी फौजों को पीछे करना या हटाना चालू कर दिया है। चीन ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के भारत-चीन संबंधों को सुधारने के सुझावों का संज्ञान भी लिया है। याद रखा जाना चाहिए कि द्विपक्षीय संबंधों में तनाव का कारण सीमा विवाद ही रहता है। अब यह उम्मीद बंधी हैं कि मतभेदों को दूर करने के लिए सकारात्मक प्रयासों का सिलसिला जारी रहेगा। भारत को आशा है कि चीन मतभेदों को दूर करके व्यवहारिक सहयोग को बढ़ावा देने का काम करेगा। बेशक, लद्दाख में पिछले वर्ष हुई घटनाओं ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। भारत और चीन के संबंध ऐसे दोराहे पर पहुंच गए थे जहां आपसी टकराव ही एकमात्र रास्ता दिखता था। अब दोनों देशों को वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी का कड़ाई से पालन और सम्मान करना होगा। इसके साथ ही चीन को यह अच्छी तरह समझ लेना होगा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत को यथास्थिति को बदलने का चीन का कोई भी एकतरफा प्रयास स्वीकार्य नहीं है। यदि अब बात होगी तो 1962 के पूर्व की स्थिति पर ही बात होगी क दोनों देशों का सीमा पर चल रहे विवाद के बहुत दूरगामी असर हो रहे थे। भारत सरकार ने चीन से आने वाले सभी निवेशों पर रोक लगा दी थी, साथ ही 200 से अधिक चीनी ऐप्स पर सुरक्षा का कारण बता कर पाबंदी लगा दी गई थी, जिनमे लोकप्रिय ऐप टिकटोक, वीचैट और वीबो आदि भी शामिल थे। हालांकि यह भी सच है कि दोनों पड़ोसियों के बीच द्विपक्षीय व्यापार आगे बढता ही रहा। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पिछले साल भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 77.7 अरब डॉलर का था। चीन ने 2013 से 2020 के बीच भारत में 2.174 अरब डॉलर निवेश किया था। हालांकि यह राशि भारत में विदेशी निवेश का एक छोटा हिस्सा है। भारत-चीन में तनाव बढ़ने से वे चीनी नागरिक भी खासे परेशान रहे जो भारत में रहकर कारोबार कर रहे थे। अगर भारत- चीन के बीच तनाव घटा तो दूसरी तरफ भारत का पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम संबंधी समझौता भी हो गया। इससे तो निश्चित रूप से दक्षिण एशिया में शांति एवं स्थिरता की दिशा में एक बेहतर माहौल बनेगा। हालांकि एक राय यह भी है कि भारत-चीन के बीच समझौता होते ही पाकिस्तान कांपने लगा था। उसे लगने लगा था कि अगर उसका स्थायी मित्र चीन भी भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है तो उसे भी अपनी रणनीति तत्काल बदल ही लेनी चाहिए। वर्ना पाकिस्तान तो लगातार भारत की आंख में उंगली देकर लड़ने की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान के कर्णधार भूल रहे थे कि वे भारत से तो पहले हुई सभी जंगों में घुटने पर आ गए थे। फिर भी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पिटते भी रहते हैं और दूर जाकर गली देने से बाज नहीं आते थे। बहहराल, भारत-पाकिस्तान के बीच हुए समझौते का स्वागत होना चाहिए। भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का सख्ती से पालन करने पर सहमत हुए हैं और यह समझौता 25 फरवरी से प्रभावी भी हो गया है। दक्षिण एशिया में शांति एवं स्थिरता के लिए जरूरी है कि दोनों देश अपने मसले आपस में मिलकर हल करें। पाकिस्तान को अपनी जनता के हितों के बारे में भी सोचना होगा। वह भारत से स्थायी दुश्मनी नहीं रख सकता। इसमें उसे सिर्फ नुकसान ही होगा। अब एक उदाहरण लें। वह कोरोना संक्रमण के टीके चीन से ले रहा है। हालांकि उसे उन टीकों को भारत से लेना चाहिए था। सारे संसार को पता है कि कोरोना पर विजय पाने में भारत ने दुनिया को संजीवनी बूटी दी है। भारत से कोरोना के टीके संसार के अनेकों छोटे-बड़े देश ले रहे हैं। इनमें कनाडा और ब्राजील भी हैं। कोरोना का टीका ईजाद करके भारत ने सिद्ध कर दिया है वह मानव जाति की सेवा के लिए वचनबद्ध है। अगर पाकिस्तान भी भारत से कोरोना का टीका लेता तो वह एक बेहतर संदेश देता। भारत की तरफ से तो पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाए जाने की पहल हमेशा से होती ही रही है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को भारत ने उनकी हालिया श्रीलंका यात्रा के दौरान भारतीय सीमा से गुजरने की इजाजत देकर रिश्तों को एक नई दिशा देने की कोशिश की। पर इमरान खान बाज कहां आए। वे श्रीलंका में जाकर भी यही कहते रहे कि भारत-पाकिस्तान के बीच सिर्फ कश्मीर ही एकमात्र मसला है। अब भारत को उन्हें कायदे से बता देना चाहिए कि बेहतर यही होगा कि पाकिस्तान कश्मीर के उन इलाकों को भारत को तत्काल सौंप दे जो उसने बेशर्मी से कब्जा किया हुआ हैं। तभी तो भारत भी दोनों देशों के संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाने में अहम रोल अदा करेगा। इसके साथ ही पाकिस्तान बिना और किसी नुक्ताचीनी के मुंबई हमलों के गुनाहगारों को कठोर दंड भी दे। अगर वह इन दोनों कदमों को अविलंब उठा ले तो भारत-पाकिस्तान आदर्श पड़ोसी की तरह से रह सकते हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नीरज दुबे)। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा यह न्यू इंडिया है तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि यह न्यू पाकिस्तान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान छेड़ा तो इमरान खान भी अब पाकिस्तान को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। दरअसल, पाकिस्तान अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति लेकर सामने आया है जिसमें भारत सहित अन्य निकटतम पड़ोसियों के साथ शांति स्थापित करने और पाकिस्तान को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया है। वैसे बम धमाकों और गोलीबारी के लिए आतंकवादियों को प्रशिक्षित करते रहने वाले पाकिस्तान के मुंह से शांति की बात अजीब लगती है लेकिन यह वास्तविकता है कि पाकिस्तान ने राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में लिखित रूप में शांति पर बल दिया है। वैसे पाकिस्तान की किसी बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि पूरी दुनिया गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र तक को आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई का आश्वासन देने के बावजूद कैसे पाकिस्तान आतंकवादियों का महिमामंडन करता है और उनको हर तरह की सुविधा प्रदान करता है। अब पाकिस्तान का मन शांति ढूंढ़ रहा है तो इसका कारण उसकी खराब आर्थिक हालत है। पौराणिक कथाओं के लिहाज से देखें तो आपने कई बार पढ़ा होगा कि कोई राक्षस या दैत्य किसी को अपना आहार बनाने के लिए अपना वेष बदल कर सामाजिक दिखने का प्रयास करता है लेकिन जैसे ही उसे मौका मिलता है वह अपना असली रूप दिखा देता है। यही बात पाकिस्तान के साथ भी लागू होती है। आज पाई-पाई को तरस रहा पाकिस्तान शांति की बात तो कर रहा है लेकिन जैसे ही उसका पेट भरेगा, वह अशांति मचाने पर उतारू हो जायेगा। अपनी करतूतों की सजा भुगत रहे पाकिस्तान को दुनिया के बड़े देशों ने आर्थिक मदद देना बंद कर दिया है और चीन तथा खाड़ी देशों से उसने इतना उधार ले रखा है कि वह चुकाये नहीं चुक रहा। एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में शामिल पाकिस्तान चाहता है कि किसी तरह प्रतिबंध हट जायें और फिर से उस पर डॉलर बरसने लगें। इसलिए पाकिस्तान के नये पैंतरे से दुनिया को सावधान रहने की जरूरत है। जहां तक पाकिस्तान की ओर से की जा रही शांति की बात है तो आपको बता दें कि इससे पहले नवाज शरीफ ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से बढ़ाये गये दोस्ती के हाथ को थामा था। अटलजी की लाहौर यात्रा के बाद उम्मीद जगी थी कि क्षेत्र में शांति आयेगी लेकिन पाकिस्तान का असल सच यह है कि भले वहां की सरकार भारत से दोस्ती की बात सोच भी ले लेकिन पाकिस्तान के असली हुक्मरान यानि वहां की सेना भारत विरोधी रवैया कभी त्याग नहीं सकती। इसीलिए यदि पाकिस्तान सरकार भारत के साथ अच्छे रिश्तों की बात कर रही है तो समझ जाइये कि दाल में जरूर कुछ काला है। पाकिस्तान एक ओर तो कह रहा है कि वह अगले सौ साल तक भारत के साथ कोई उठापटक नहीं चाहता लेकिन सीमा पार उसने 400 आतंकवादियों को भारत में घुसपैठ के लिए तैयार रखा है। पाकिस्तान एक ओर भारत के साथ शांति चाहने की बात कह रहा है वहीं भारत के आंतरिक मुद्दों पर अनावश्यक हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आ रहा। पाकिस्तान एक ओर भारत से अच्छे रिश्ते चाहने की बात कह रहा है तो वहीं दूसरी ओर चीन के साथ मिलकर भारत विरोधी साजिशें रचने में लगा है। पाकिस्तान अगर सौ साल तक भारत से अच्छे रिश्ते की सोच भी रहा है तो उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि पिछले 75 सालों के दौरान वह अपनी हर बुरी हरकत के लिए हिन्दुस्तान से बुरी तरह पिटता रहा है। जहां तक पाकस्तान की पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की बात है तो आपको बता दें कि 100 पन्नों की इस रिपोर्ट में पाकिस्तान को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया है यानि आर्थिक सुरक्षा को मजबूत बनाने पर सबसे ज्यादा जोर है। आश्चर्यजनक रूप से इसमें सैन्य ताकत पर केंद्रित एक आयामी सुरक्षा नीति की बजाय आर्थिक सुरक्षा को केंद्र में रखा गया है। देखना होगा कि इस नीति पर पाकिस्तानी सेना की क्या प्रतिक्रिया रहती है। इमरान खान पाकिस्तान की सेना की मदद से ही प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं इसलिए अगर वह सेना के पर कतरेंगे तो उनके खिलाफ बगावत भी हो सकती है। इस रिपोर्ट को जारी करते हुए इमरान खान ने कहा भी है कि पाकिस्तान के जन्म से ही एक आयामी सुरक्षा नीति रही जिसमें सैन्य ताकत पर फोकस था, लेकिन अब इसमें बदलाव कर पहली बार राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित किया गया है। बता दें कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का वास्तविक मसौदा गोपनीय श्रेणी में बना रहेगा। इस नीति के मुख्य बिंदुओं में राष्ट्रीय सामंजस्य, आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करना, रक्षा एवं क्षेत्रीय अखंडता, आंतरिक सुरक्षा, बदलती दुनिया में विदेश नीति और मानव सुरक्षा शामिल हैं। इसके अलावा पाकिस्तान ने देखा कि जब उसके बुरे समय में किसी ने उसकी आर्थिक मदद नहीं की तो उसने अब आर्थिक रूप से मजबूत बनने का संकल्प लिया है और इसलिए उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था मजबूत होगी तो अतिरिक्त संसाधन उत्पन्न होगे जिन्हें बाद में और सैन्य ताकत बढ़ाने और मानव सुरक्षा के लिए उपयोग में लाया जायेगा। जहां तक इस नीति में भारत से संबंधों की बात है तो मीडिया रिपोर्टों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक, इसमें जम्मू-कश्मीर को द्विपक्षीय संबंध के केंद्र में रखा गया है और भारत के लिए कहा गया है कि वह सही से कार्य करें और लोगों की बेहतरी के लिए क्षेत्रीय संपर्क से जुड़ें। इस नीति में कहा गया है कि पाकिस्तान भारत सहित अपने सभी पड़ोसियों के साथ शांति चाहता है और कश्मीर मुद्दे के समाधान के बिना भी नयी दिल्ली से कारोबार के रास्ते को खुला रखना चाहता है। देखना होगा कि भारत की इस पर क्या प्रतिक्रिया रहती है। इसके अलावा भारत के संबंध में इस नीति में भ्रामक सूचना, हिंदुत्व और घरेलू राजनीतिक फायदे के लिए आक्रामकता के इस्तेमाल को हिन्दुस्तान से अहम खतरा बताया गया है। जहां तक पाकिस्तान को हिंदुत्व से डर लगने की बात है तो कमाल की बात यह है कि हिंदुओं पर अपने देश में जुल्म ढाने वाले, उनके मंदिरों को तोड़ने वाले, उनके अधिकारों को छीनने वाले और हिंदुत्व का मजाक बनाने वाले पाकिस्तान को असल में हिंदुत्व से डर लगता है। बहरहाल, जहां तक भारत और पाकिस्तान के वर्तमान संबंधों की स्थिति की बात है तो आपको याद दिला दें कि पठानकोट वायुसेना बेस पर पड़ोसी देश के आतंकवादियों द्वारा 2016 में किए गए हमले के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध बिगड़े थे। उसके बाद उरी में भारतीय सेना के शिविर सहित अन्य प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों और भारत की ओर से दिये गये करारे जवाबों ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को और बिगाड़ दिया।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। अब कोरोना का तीसरा लहर अप्रत्याशित है। इस लहर में भी परीक्षा कोरोना के नियमों का पालन करते हुए सही समय पर हो यह आवश्यक है। लेकिन यह तीसरा साल है जब छात्रों व शिक्षक का सीधा संवाद कम हो रहा है। ऐसे में छात्रों की शिक्षा और परीक्षा के साथ उनके करियर के अतिरिक्त बल, मनोबल की आवश्यकता है। आज छात्र शिक्षक, अभिभावक या काउंसलर से अपने भविष्य के बारे में बात करने लगते हैं। वह चुने हुए क्षेत्र में ही करियर बनाना चाहते हैं। यह अच्छी बात है लेकिन उनके जीवन में व्यावसायिक डिग्री लेने के लिए छह से दस वर्ष का समय महत्वपूर्ण होता है। इन वर्ष में ही उनका वास्तविक करियर बनता है। इसमें वे संबंधित संस्थान, करियर और डिग्री लेते हैं। इसके बाद वे जॉब्स में जाते हैं या अपना व्यापार करते हैं। आज एक से एक रोजगार और करियर की संभावना बन रही है। प्रचलित क्षेत्र जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग, सिविल सर्विस, सहित रिटेल, आईटी और अन्य कई परम्परागत और नए करियर की संभावनाए सामने हैं। करियर की भरमार है और बेहतर शिक्षण संस्थान भी है जो पढ़ाई के साथ प्लेसमेंट भी कराते हैं। आवश्यकता है कि दसवीं के बाद से ही उन संस्थानों और करियर की जानकारी लेना आंरभ करे दे। आज इंटरनेट पर सभी जानकारी उपलब्ध है। हर समाचार पत्र और मैग्जीन इसकी सूचना देते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि वे इस बात की जांच कर लें कि जिस संस्थान में काम कर रहे हैं उनकी मान्यता है या नहीं। जान बूझकर भी गलत जानकारी दी जाती है। विज्ञापन से भ्रमित होने से बचे और अपने स्रोतों से भी संस्थानों के बारे में जानकारी हासिल कर लें जिससे उनका करियर सुरक्षित रहे और बेहतर बने। इससे समय और धन दोनों का सदुपयोग हो पाता है और करियर बेहतर बनता है। मानसिक शक्ति कितना जरुरी : अंग्रेजी में एक शब्द है मेंटल कमिटमेंट। इसे हम हिंदी में मानसिक शक्ति भी कहते है। यह सफलता के लिए बेहद आवश्यक गुण है। अगर आपमें मानिकस शक्ति, या ठहराव नहीं है तो आप लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते। आखिर यह मेंटल कमिटमेंट है क्या? मेरे कार्यालय में जब हम दोपहर में भोजन करते हैं तब हमारे मुस्लिम सहयोगी हमारे साथ होने के बाद भी एक बूंद पानी तक नहीं पीते हैं उनकी भोजन में कोई रूचि नहीं होती है। उनकी खाने के प्रति जो रोजा के दिनों में अरूचि होती है वह मेंटल कमिटमेंट का एक बड़ा उदाहरणहै। यह कमिटमेंट शतप्रतिशत होना चाहिए यानि 100 प्रतिशत। अगर हमारी दृढ़ता में दो प्रतिशत की कमी हो जाए और यह 98 प्रतिशत भी जो जाए तो परिणाम में भारी अंतर आ जाएगा। अगर आप अपनी दृढ़ता से समझौता करेंगे तो आप कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं। अगर यही हाल रहा और बार-बार आप अपने कमिटमेंट से समझौता करते रहे तो परिणाम शून्य हो जाएगा। जिनकी मानसिक शक्ति उच्च शिखर पर होती है विपरीत स्थिति में यही मानसिक शक्ति उनके जीवन में बड़ा काम का साबित होता है। जिस प्रकार रोजदार अपने नियमों के प्रति दृढता के साथ होता है वैसे हम सभी को अपनी सफलता के लिए दृढ़ रहना चाहिए। यह दृढ़ता सौ प्रतिशत होना चाहिए। सौ फिसदी दृढ़ता और 99 प्रतिशत दृढ़ता में अंतर होता है। विशेषकर युवाओं को अपने जीवन में उंचें सपने पालते हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि आपने अगर एक बार भी समझौता किया तो संभव है कि आपको बार-बार समझौता करना होगा। (लेखक उर्सूलाइन इंटर कॉलेज की प्राचार्या हैं।)
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