विचार

View All
Published / 2022-02-05 16:05:40
खत्म करें भेदभाव, देश की आधी आबादी को भी है जॉब का हक...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ रेणु सिंह)। राजपथ पर सीमा भवानी का करतब देखकर पूरे देश का हौसला बढ़ा जब बीएसएफ की महिला बटालियन ने हैरत अंगेज कारनामें दिखलाये। इस साल के शुरू में खबर आई कि सार्वजनिक क्षेत्र की एक दिग्गज कंपनी तेल और प्राकृतिक गैस निगम के इतिहास में पहली बार एक महिला ने अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक का कार्य भार संभाला है। इसके पहले देश के कुछ बैंकों में सर्वोच्च पद पर भी महिलाएं रही हैं। छिटपुट ऐसे और उदाहरण भी हैं। इन सबसे लग सकता है कि भारत के कार्यबल में महिलाओं को वह स्थान हासिल है जिसकी कि वे हकदार हैं, पर यहां जो उदाहरण गए हैं, वे नियम कम अपवाद ज्यादा हैं। जैसे तमाम और मामलों में भारत कई विकासशील देशों से पीछे है, वैसे ही कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भी देश की स्थिति उत्साहजनक नहीं है। देश जिन बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है, उनमें बेरोजगारी निश्चित रूप से एक है। देश में बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हैं, पर इन बेरोजगार लोगों में महिलाओं का अनुपात ज्यादा है। और तो और, सभी रोजगारशुदा लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने की बजाय घटती जा रही है। चाहे सामाजिक समानता के नजरिए से देखें या मानवाधिकारों के नजरिए से, देश के कार्यबल में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व न होना एक गंभीर चिंता का विषय है। देश को आजादी मिलने के साथ जिस भारत की कल्पना की गई थी, करीब पचहत्तर वर्ष बाद की स्थिति भी इससे मेल नहीं खाती। लैंगिक समानता के मामले में भी हम अभी पीछे हैं। इस असमानता के कारणों की तलाश में हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। समाज का पुरुष प्रधान स्वरूप बना हुआ है और कहीं न कहीं यह दृष्टिकोण भी मौजूद है कि महिलाओं को उनका अधिकार देकर उन पर अहसान किया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक और व्यवहार विज्ञानी यह बात बार-बार दोहराते रहे हैं कि प्रतिभा पुरुष और महिला में भेद नहीं करती। किसी भी प्रयोग में यह नहीं सिद्ध हुआ है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम बुद्धिमान होती हैं, बल्कि कई ऐसी भूमिकाएं बताई गई हैं जिनमें महिलाओं का प्रदर्शन बेहतर पाया गया है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जिनमें महिलाओं की क्षमता पर विश्वास कर उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए और उन्होंने इसे बखूबी पूरा कर के दिखाया। बिना किसी आधार के महिलाओं को कमजोर अथवा अक्षम मान लेना कहीं न कहीं अपरिपक्व सोच को ही इंगित करता है। यह सोच बदल रही है, पर उस गति से नहीं जितनी कि होनी चाहिए। महिलाओं की स्थिति में व्यापक सुधार तभी होगा जब यह सोच भी पूरी तरह से सुधर जाए। यदि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी जनसंख्या में उनके अनुपात के अनुरूप नहीं है तो मुख्यत: यह सामाजिक कारणों से है। तमाम शोधों और अध्ययनों में बताया गया कि किसी भी देश की समृद्धि तथा उसकी अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने के लिए उसमें महिलाओं की पूरी भागीदारी होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ का भी कहना है कि सतत विकास तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए लैंगिक समानता जरूरी है। सभी प्रगतिशील संगठनों में मानव संसाधन के लिए विविधीकरण तथा समावेशन संबंधी नीतियां लागू की हैं। इसका मकसद जनशक्ति में सभी वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व और कमजोर लोगों को भी मौका देने से है। इसके अच्छे परिणाम निकले हैं और कारपोरेट जगत में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, पर देश में उपलब्ध कार्यबल से सीमित संख्या में ही लोगों को बड़ी कंपनियों तथा फर्मों में रोजगार मिल सकता है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में रोजगार नहीं है। विगत दो दशकों में भारत में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति बेहतर हुई है। प्रजनन दर में गिरावट आई है। विश्व भर में इन कारणों से पारिश्रमिक युक्त कार्यों में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि होना देखा गया है, पर भारत में ऐसा नहीं हो रहा। कार्यबल में जितनी महिलाएं जुड़ रही हैं, उससे कहीं अधिक कार्यबल से बाहर आ रही हैं। वैसे देखा जाए तो बैंकों में ठीक-ठाक संख्या में महिलाएं कार्य करती दिख जाएंगीं, महानगरों तथा बड़े शहरों के रेलवे काउंटरों पर भी उनकी थोड़ी बहुत मौजूदगी है, कुछ हवाई जहाज भी उड़ा रही हैं, पर महिलाएं बस कंडक्टर, टैक्सी और आटो रिक्शा चालक जैसी भूमिकाओं में शायद ही दिखती हैं। बीते समय में भारत में ई-कारोबार का काफी विस्तार हुआ है। घर बैठे सामान, जिसमें तैयार खाना भी शामिल है, मंगाने वालों में पुरुष भी हैं और महिलाएं भी। लेकिन ऐसा कभी नहीं देखने को मिलता कि सामान घर पर पहुंचाने वाली एक महिला हो। कारखानों में भी चाहे वहां गाड़ियां बनती हों अथवा उर्वरक जैसी कोई अन्य सामग्री, महिलाओं की संख्या नगण्य ही है। हां, ऐसी तस्वीरें जरूर दिख जाती हैं जिनमें महिलाएं घड़ी या मोबाइल फोन फैक्टरी में काम कर रही होती हैं। पर कुल मिला कर विनिर्माण क्षेत्र में नियोजित महिलाओं की संख्या काफी कम है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कुछ वर्ष पहले एक महत्त्वपूर्ण आदेश जारी कर तीन सौ करोड़ रुपए सालाना बिक्री वाली सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक स्वतंत्र महिला निदेशक का होना अनिवार्य कर दिया था। इसके अलावा बाजार पूंजीकरण के हिसाब से देश की शीर्ष एक हजार सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक महिला सदस्य को नियुक्त करने की अनिवार्यता भी की गई थी, जो स्वतंत्र निदेशक भी हो। लेकिन इन अपेक्षाओं को पूरा करने कंपनियों को काफी मुश्किलें आर्इं। कई कंपनियां तो इसके लिए मन से तैयार नहीं थीं और उन्होंने खानापूरी करने के लिए इस आदेश का पालन किया तो कुछ कंपनियों के प्रवर्तकों ने अपने सगे संबंधियों में से किसी महिला को निदेशक बना कर छुट्टी पा ली। सेबी का यह आदेश कंपनियों के प्रबंधन वर्ग में लैंगिक विविधता लाने के लिए था, पर आदेश के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में कई स्तरों पर साबित हो गया कि कई कंपनियां नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी के प्रति कितनी उदासीन हैं और साथ ही यह भी कि इतनी विशाल आबादी वाले देश में आसानी से इतनी महिलाएं नहीं मिल सकीं जिन्हें निदेशक नियुक्त किया जा सके। व्यक्ति हो या देश, उसकी सफलता इसमें मानी जाती है कि उसमें निहित संभावनाएं उभर कर आएं और इन संभावनाओं का भरपूर उपयोग हो। यदि कार्यबल में महिलाओं के लिए नए द्वार खुलते हैं तो इससे तमाम महिलाओं में निहित संभावनाओं को फलीभूत करने का मार्ग प्रशस्त होगा और हम अपने राष्ट्र की आबादी में मौजूद संभावनाओं का लाभ उठा सकेंगे। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को नए सिरे से आगे आना होगा।

Published / 2022-02-04 14:17:50
अलग झारखंड राज्य के अटल आंदोलनकारी थे लाल रणविजय नाथ शाहदेव

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। स्वतंत्रता तेहें चाही लाल लहूक धार जैसी देश-भक्ति से ओत-प्रोत कविता रचने वाले नागपुरी कवि, गीतकार और आंदोलनकारी लालरण विजयनाथ शाहदेव ने झारखंड राज्य के पुनर्गठन में सक्रिय भूमिका निभायी थी। उनके मन में अलग राज्य के लिए आंदोलन करने की प्रबल इच्छा खरसावां की शहादत भूमि से जागृत हुई थी। जब वे अपने पिताजी पालकोट गढ़ के राजा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के साथ 1952 ई. में सरायकेला खरसावां शहीद स्थल देखने गये थे। वहीं पर शहीद स्थल की पावन माटी को मुट्ठी में लेकर कसम खायी कि झारखंडियों के लिए अलग राज्य की लड़ाई लडेंगे। इस बीच मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के घर अक्सर राजाडेरा करमटोली आया करते थे। अंतत: उनसे प्रभावित होकर औपचारिक रूप से झारखंड पार्टी में 1957 ई. में शामिल हुए और झारखंड आंदोलन में कूद पड़े। वे इसके लिए वीर रस के नागपुरी गीतों और कविताओं की रचनाएं करने लगे। उनकी रचनाएं लोगों के रोंगटे खड़े कर देने वाली होती थीं। हास्य कविता और व्यंग्य कविता लेखन में पकड़ अच्छी थी। एक बार रांची के टैगोर हिल में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने व्यंग्य हास्य कविता गांधीक नाम बेइच के आपन पेट भरू प्रस्तुत किया था, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। उनकी जागरण कविता - नरसिंघा बाजी आब फिर नागपुर देस में आमजनों के बीच खूब लोकप्रिय हुआ। उन्होंने 500 से अधिक गीत और कविताओं की रचना की हैं, जिनमें 250 से अधिक आकाशवाणी रांची से प्रसारित हुई हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव हिंदी फिल्मी गाना भी गाते थे। उनकी पत्नी श्यामा देवी को नागपुरी गीत उतने पसंद नहीं थे। इसलिए प्रारंभ में वे अपनी धर्म पत्नी को हिंदी फिल्मी गाना गाकर सुनाते थे। उन्होंने बकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की थी। आरंभ में वे नागपुरी में नहीं अपितु हिंदी में गायन करके अपने दोस्तों का मनोरंजन करते थे। गजल में उनकी पकड़ थी। पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के भी शौकीन थे। गीत-गोविंद के साथ-साथ उनका मन अलग राज्य के लिए रमा हुआ था। सो इसे में रत रहते थे। 1963 ई. में जब झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हुआ, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरू के समक्ष विरोध किया था। उनके नेतृत्व में 21 जलाई 1963 ई. में बहुबाजार में विशाल सभा आयोजित की गयी। इस सभा में झारखंड पार्टी को बनाये रखने का निर्णय लिया गया। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के नेतृत्व में ही 27, 28 एवं 29 सितंबर को वीरमित्रापुर में विशाल जुलूस निकाला गया। अलग राज्य के लिए आंदोलन करने के कारण उन्हें 3 जून 1968 ई. में जेल भी जाना पड़ा। झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय करने के बाद जब जयपाल सिंह मुंडा पुन: झारखंड पार्टी में आना चाहते थे, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव उनसे कहा था - आगे गुरू रहंय, आब गरू बटे गेलंय। इसे सुनकर मरांग गोमके भी ठहाका लगाकर हंस पड़े थे और लाल रणविजय नाथ से वादा किया था - मोंय घुरत हों, मोंय आवत हों। आब दोहरायके आंदोलन खड़ा करब। हालांकि इस वचन को देने के बाद जयपाल सिंह मुंडा की अचानक मृत्यु हो गयी। लाल रण विजय नाथ शाहदेव अलग राज्य के लिए 1977 ई. में तात्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से अलग राज्य पर हुई वार्ता में शामिल हुए। उसके बाद 1999 ई. में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हुई अलग राज्य वार्ता में भी शरीक थे। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के अलग राज्य झारखंड नाम के लिए उनके समक्ष मजबूती से तर्कपूर्ण विचार रखा और इसी नाम अलग राज्य का गठन भी हुआ। लाल रणविजय नाथ शाहदेव नागपुरी कला संगम के निदेशक और नागपुरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने पझरा और नागपुरी पत्रिका का संपादन किया। उनकी कुछ प्रकाशित पुस्तकें और पत्रिकाएं हैं जिनमें पूजा कर फूल 1984, खोता नागपुरी काव्य 1985, खुखड़ी रूगड़ा संपादन 1985, पझरा पत्रिका 1985, जागी जवानी चमकी बिजुरी 1986 शामिल हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव को कई सम्मान भी मिले। झारखंड विधान सभा स्थापना के अवसर पर 22 नवंबर 2017 को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। दूरदर्शन सम्मान 2011, नागपुरी संस्थान पिठोरिया से 2014 में स्वर्ण सम्मान, 2014 में प्रफुल्ल सम्मान, 2015 में लोक सेवा समिति से झारखंड रत्न सम्मान मुख्य रूप से शामिल है। ऐसे अलग राज्य के आंदोलन में अटल रहने वाले वीर माटी पुत्र लाल रणविजय नाथ शाहदेव का जन्म पांच फरवरी 1940 ई. में हुआ। उनके पिता का नाम छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव और माता का नाम सीता देवी था। उनका विवाह श्यामा देवी से 1959 ई. में हुआ। उनके तीन बच्चे हैं निर्मला देवी, अजय नाथ शाहदेव और राजश्री सिंहदेव। भले ही लाल रणविजय नाथ शाहदेव अलग राज्य का सपना साकार कर इस धराधाम से 18 मार्च 2019 में विदा हो गये, किंतु हमारे लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। (लेखक गोस्सनर कॉलेज, रांची के सहायक प्राध्यापक हैं)।

Published / 2022-02-03 17:13:59
समाचार प्रकाशन जगत और डिजिटलीकरण...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनीता कोहली)। क्या विज्ञापनों की फंडिंग वाले समाचार पढ़ने वाले पाठकों को केवल फर्जी और असत्य खबरें मिलनी चाहिए? क्या सबस्क्रिप्शन वाली खबरों का उभार अच्छी पत्रकारिता को सुशिक्षित और अच्छी आर्थिक स्थिति वाले लोगों तक सीमित करता है? क्या यह समाचारों की सामूहिक खोज और खपत को समाप्त करता है और लोकतंत्र को क्षति पहुंचाता है? आॅक्सफर्ड स्थित रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी आॅफ जर्नलिज्म (आरआईएसजे) का द डिजिटल न्यूज प्रोजेक्ट आॅनलाइन खबरों की पड़ताल करके पत्रकारिता और कारोबार उनके असर का आकलन करता है। इस महीने के आरंभ में उसने एक रिपोर्ट जर्नलिज्म, मीडिया ऐंड टेक्रॉलजी ट्रेंड्स ऐंड प्रिडिक्शंस 2022 जारी की। 52 देशों के 246 संपादकों, मुख्य कार्याधिकारियों और डिजिटल नेतृत्वकतार्ओं ने कहा कि वे 2022 में अपनी कंपनी की संभावनाओं को लेकर आश्वस्त हैं। आरआईएसजे के वरिष्ठ शोध सहायक निक न्यूमैन ने कहा, प्रकाशकों का यह भरोसा एक हद तक इसलिए भी है क्योंकि कोविड-19 महामारी के दौरान सबस्क्रिप्शन और सदस्यता मॉडल लगातार गति पकड़ते रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स के अब 84 लाख सबस्क्रिप्शन हैं जिसमें 76 लाख डिजिटल हैं। शुरूआत में ऐसा करने वाली कई कंपनियों का डिजिटल राजस्व अब प्रिंट राजस्व को पीछे छोड़ चुका है। अब कई बड़े ब्रांड को भविष्य के लिए एक स्थायी राह नजर आ रही है। लेकिन कई छोटे डिजिटल प्रकाशक मसलन स्लोवाकिया में डेनिक, मलेशिया में मलयसियाकिनी और डेनमार्क में जेटलैंड भी ऐसा कर सकते हैं। न्यूमैन 2012 से ही इस रिपोर्ट का समन्वय कर रहे हैं। भारत में भी ऐसा ही हो रहा है। द न्यूज मिनिट्स, द क्विंट, द हिंदू और टाइम्स इंटरनेट जैसी शुरूआत में ही बदलाव करने वाली कंपनियां सबस्क्रिप्शन राजस्व पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र को सूचित करने वाली गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता करने में हजारों जमीनी रिपोर्टर, ढेर सारा समय और पैसा लगता है। लंबे समय तक प्रकाशकों ने विज्ञापनों पर भरोसा किया। समाचार पत्रों का 70-80 फीसदी राजस्व अभी भी वहीं से आता है। इंटरनेट के जोर पकड़ने के बाद भी प्रिंट माध्यम का प्रसार और राजस्व दोनों बढ़ते जा रहे हैं। यह बात इसे 1.38 लाख करोड़ रुपये के भारतीय मीडिया और मनोरंजन कारोबार का सबसे अधिक मुनाफे वाला क्षेत्र बनाती है। कॉम्सकोर के आंकड़ों के मुताबिक भारत की 20 शीर्ष में से 18 समाचार वेबसाइट बड़े विरासती ब्रांड हैं। टाइम्स आॅफ इंडिया, एनडीटीवी या द इंडियन एक्सप्रेस तथा अन्य ब्रांड को बड़ी तादाद में आॅनलाइन दर्शक और पाठक मिलते हैं। परंतु इसका आधे से अधिक हिस्सा गूगल तथा फेसबुक से आता है। फरवरी 2021 में भारत में 46.8 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे और गूगल की पहुंच इन तमाम लोगों तक है। फेसबुक का आंकड़ा थोड़ा कम यानी 43.6 करोड़ लोगों का है। आश्चर्य नहीं कि 2020 में 23,500 करोड़ रुपये के डिजिटल राजस्व में 90 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी इन दोनों की रही। यानी बाकी बचे सैकड़ों डिजिटल प्रकाशकों के लिए केवल 10 फीसदी हिस्सा बचा। ऐसे में नियामकों का ध्यान जाना लाजिमी था। आॅस्ट्रेलिया और फ्रांस में गूगल को प्रकाशकों को भुगतान करने के लिए मजबूर किया गया। भारत में भी प्रकाशकों ने हाल ही में गूगल को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के समक्ष तलब कराया था। इस बीच वर्षों तक आॅफलाइन प्रकाशन ने डिजिटल वृद्धि को प्रभावित किया। महामारी ने उस मॉडल को नष्ट कर दिया। पाठकों की तादाद में तेजी से इजाफा होने के बावजूद विज्ञापन राजस्व में भारी गिरावट आई। ऐसे में प्रकाशकों के लिए अपने भविष्य को बचाने का एक ही तरीका था कि वे भुगतान तय करें। फिलहाल भारत में समाचार वेबसाइटों के करीब 10 लाख सबस्क्राइबर हैं। मनोरंजन जगत के ओटीटी प्लेटफॉर्मों के 10 करोड़ से अधिक सबस्क्राइबर हैं। समाचार प्रकाशकों को उन आंकड़ों तक पहुंचने के लिए कई वर्ष लगेंगे तथा तकनीक और सामग्री पर बहुत पैसा खर्च करना होगा। क्या सबस्क्राइबर संख्या में यह इजाफा सूचनाओं को एक खास दायरे के लोगों तक सीमित कर देगा? क्या यह आम जनता को अलगोरिद्म आधारित, स्वतंत्र समाचार के भरोसे छोड़ देता है जिसका इस्तेमाल राजनीतिक दल तथा अन्य समूह झूठी खबरों को हथियार बनाने और समाज का ध्रुवीकरण करने में करते हैं? न्यूमैन की रिपोर्ट सूचना की असमानता का मुद्दा उठाती है और इससे निपटने के लिए दुनिया भर में हो रहे कुछ प्रयोगों की ओर संकेत करती है। दक्षिण अफ्रीका में डेली मैवरिक की सदस्यता चुकाने वाली की हैसियत पर आधारित है। पुर्तगाल में आठ मीडिया घरानों के 20,000 से अधिक नि:शुल्क डिजिटल सबस्क्रिप्शन की फंडिंग के लिए लॉटरी फंडिंग का इस्तेमाल किया गया। भारत में कई नई समाचार वेबसाइट पाठकों से सहयोग या दान (सबस्क्रिप्शन नहीं) की मांग करती हैं। कुछ अन्य ज्यादा विज्ञापनों के लिए प्रयोग करते हैं। देश के सबसे बड़े समाचार एग्रीगेटरों में से एक इनशॉर्ट्स ने 2019 में पब्लिक नामक एक ओपन प्लेटफॉर्म शुरू किया। 2021 के आरंभ तक इस पर 60,000 क्रिएटर थे जिनमें वार्ड मेंबर, सांसद, विधायक तथा सैकड़ों छोटे कस्बों के स्थानीय निवासी शामिल हैं जिन्होंने इस पर स्थानीय घटनाओं के छोटे-छोटे वीडियो और खबरें डालीं। गत वर्ष इनशॉर्ट्स के 7.5 करोड़ विशिष्ट उपयोगकतार्ओं में से 80 प्रतिशत पब्लिक के माध्यम से आए। मार्च 2021 में कंपनी के 102 करोड़ रुपये के राजस्व में इसकी अहम भूमिका रही। न्यूमैन यह भी कहते हैं कि टिकटॉक या शॉर्ट वीडियो पर समाचारों को लेकर युवा श्रोताओं/दर्शकों की भिड़ंत होगी। लेकिन यह आसानी से झूठी खबरों का गढ़ बन सकता है। इस सवाल का जवाब आसान नहीं है कि समाचार पत्रकारिता के टूटे हुए मॉडल की जगह कौन लेगा। सबस्क्रिप्शन अच्छा रुझान है लेकिन विज्ञापन समर्थित हर समाचार कूड़ा नहीं है। कई ऐसे ब्रांड हैं, जहां मालिकों के पास यह दृष्टि और रीढ़ मौजूद है कि वे अच्छी पत्रकारिता कर सकें।

Published / 2022-02-02 12:53:21
नि:स्वार्थ प्रेम और बदलती मानसिकता

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सिंधु मिश्रा)। हम सब अपनी मयार्दाएं जानते हैं, हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है और इन मयार्दाओं में रहते हुए रिश्ते निभाने के तरीके अलग अलग होते हैं, जो हमारे संस्कारों और तौर तरीकों पर निर्भर करता है। चंद रिश्तों की मिसाल यहां आपको देना चाहूंगी, सास-बहू, ससुर-दामाद, बेटा-बेटी, बेटी-बहू, ननद-भाभी, जेठानी-देवरानी, कुछ चुनिंदा रिश्तों की ही बात की है मैंने। क्या हम इन रिश्तों में आज नि:स्वार्थ प्रेम देख सकते हैं? शायद हां और ना। दोनों ही जवाब आपके पास होंगे। जरा देखें अपने आसपास, नि:स्वार्थ प्रेम पर टिके उन रिश्तों को। क्या सचमुच नि:स्वार्थ प्रेम दिखाई देता है? इनके बीच क्या ईर्ष्या, द्वेष, जैसी भावनाएं नहीं नजर आती हैं? अमूमन इन रिश्तों में छोटी-छोटी बातों पर भी गंभीर हालात बन जाते हैं। आरोप-प्रत्यारोप की कड़ियां तैयार होने लगती हैं और ऐसे रिश्ते सिर्फ नाम के रिश्ते रह जाते हैं। अक्सर उन रिश्तों में दरारें आ जाती हैं, जिसने रिश्तों की मर्यादाएं न समझी। न ही उस अनुसार आचरण किया, दोष हमेशा हम नए रिश्तों और हमारी आज की पीढ़ी को देते हैं, पर ऐसा नहीं है आज की पीढ़ी पर दोषारोपण करने के पूर्व हम अपने संस्कारों और अपने विचारों को भी सुसंस्कृत करें और देखें आखिर कहाँ हमसे चूक हो रही है? क्यों हमारा प्रेम नि:स्वार्थ होने की जगह स्वार्थीपन की ओर हमें लिए जा रहा है? आखिर क्यों बिखर जाते हैं ये रिश्ते?क्यों हम एकाकी जीवन जीने की ओर अग्रसर होते हैं? आत्ममंथन आज की जरूरत बनती जा रही है, मां-बाप, बड़े बुजुर्ग और तमाम वो रिश्ते जिनमें बिखराव आ रहे हैं। सभी अपने स्वार्थ की नहीं बल्कि रिश्तों के महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करने की कृपा करें, आपसी तालमेल और नि:स्वार्थ प्रेम को जीवन में स्थान दें और मानसिकता को स्वस्थ रखें, तभी हम सफलता की उन मापदंडों को पूरा करते हुए खुशहाल जीवन जी सकेंगे। धन्यवाद! (लेखिका दहेजमुक्त झारखंड की राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

Published / 2022-02-01 15:56:26
टाटा की हुई एयर इंडिया, सबका लाभ-सबका साथ...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (टीएन नाइनन)। एयर इंडिया के निजीकरण के चौतरफा स्वागत के बीच भी यह मानना होगा कि इसके साथ कुछ न कुछ गड़बड़ रही है। हमारे देश में अरुण शौरी आज भी उन शर्तों से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे हैं जिन पर एयर इंडिया से कम महत्त्वपूर्ण सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया गया था। यहां एक बात ध्यान देने लायक है कि कर्मचारियों के एक धड़े द्वारा चिंता जताने तथा वाम दलों के एक हिस्से की ओर से कुछ शोरशराबे के अलावा समूचे राजनीतिक वर्ग में से किसी ने इस विमानन सेवा की बिक्री की आलोचना नहीं की है। कर्मचारी भी मोटे तौर पर राहत महसूस कर रहे होंगे क्योंकि उनका वेतन निरंतर मिलता रहेगा। एयर इंडिया बीते करीब 15 वर्ष से लगातार घाटे में चल रही है। संभव है अन्य सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन भी इतना खराब रहा हो लेकिन कोई सरकारी कंपनी इतनी बुरी स्थिति में नहीं पहुंची कि उसका घाटा लाख करोड़ रुपये के आसपास हो गया हो। एयर इंडिया का समग्र घाटा लगभग 80,000 करोड़ रुपये और उसका रोज का घाटा 20 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका था। ऐसे में एक कट्टर वामपंथी के लिए भी यह जाहिर सी बात थी कि यह विमानन कंपनी अब उड़ान भरने की स्थिति में नहीं रह गई थी। कंपनी का कारोबारी निपटान तय था। इसके साथ तमाम कठिनाइयां भी जुड़ी हुई थीं। उदाहरण के लिए खाली एयरपोर्ट स्लॉट, 100 से अधिक खराब रखरखाव वाले विमानों से निजात, इससे पहले कि वे हवाई अड्डों पर खड़े-खड़े जंग खा जाएं तथा कर्मचारियों को जरूरी लाभ के साथ सेवा समाप्ति देना। संक्षेप में कहें तो अफरा-तफरी और बड़े पैमाने पर शर्मिंदगी। एक बार जब टाटा ने एयर इंडिया को उबारने की पहल की तो सरकार ने राहत महसूस की। इसकी एक झलक तब मिली जब विमानन कंपनी को टाटा को सौंपे जाने के दिन प्रधानमंत्री ने टाटा समूह के चेयरमैन से औपचारिक मुलाकात की। वित्त मंत्रालय के कर्मचारियों ने इस विषय पर काम किया कि करीब 61,000 करोड़ रुपये के बाकी रह गए कर्ज का निपटान कैसे होगा। इस बीच सरकार के पास 14,000 करोड़ रुपये मूल्य की गैर विमानन परिसंपत्तियां रह गई हैं तथा बिक्री का कुल नकद मूल्य 2,700 करोड़ रुपये (विमानन कंपनी का कुल मूल्य 18,000 करोड़ रुपये लगा जिसमें बकाया कर्ज घटाकर 2,700 करोड़ रुपये की राशि बची) रहा। बकाया 44,000 करोड़ रुपये की राशि को बट्टेखाते में डाले जाने को सबके लिए बेहतर स्थिति के रूप में पेश किया गया जो कि उपलब्ध विकल्पों के मुताबिक उचित भी है। ऐसा सौदा जिसे लेकर खरीदार और विक्रेता दोनों पक्ष खुश हों, वह हमें इस विमानन कंपनी और इसके हालिया इतिहास के बारे में भी काफी कुछ बताता है। टाटा समूह द्वारा इस सौदे में रुचि लेने के बाद सरकार की प्रसन्नता समझी जा सकती है लेकिन ऐसे मौके पर किसी को उस व्यक्ति से भी टिप्पणी लेनी चाहिए जो इस विमानन कंपनी को पतन के रास्ते पर डालने के बाद एकदम खामोश है। वह व्यक्ति हैं मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल के नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल। एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय कराने पर पटेल ने ही जोर दिया था। इसके नतीजे बहुत त्रासद हुए क्योंकि इससे अनुमानित लक्ष्य नहीं हासिल हुए। ढेर सारे विमान खरीदने के आॅर्डर देने के लिए भी उन पर सवाल उठे क्योंकि इससे कंपनी कर्ज में डूब गयी और फिर उबर नहीं सकी। एक निजी विमानन कंपनी के आगमन के बाद प्रमुख मार्गों के अहम स्लॉट को खाली कराए जाने को लेकर भी तमाम बातें हुईं। विजय माल्या जो एक समय अपनी (अब बंद हो चुकी) विमानन कंपनी को अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर उड़ाना चाहते थे, उन्होंने सार्वजनिक रूप से मंत्री पर आरोप लगाया कि वह एक अन्य विमानन कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। इस पर नाराज पटेल ने प्रतिक्रिया दी थी कि माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस अर्हता नहीं हासिल कर सकी। अब एयर इंडिया टाटा समूह की घाटे वाली कंपनियों में नजर आएगी। एन चंद्रशेखरन के नेतृत्व में समूह के परिचालन में जबरदस्त सुधारों के बावजूद अगर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को छोड़ दिया जाए तो समूह गत तीन वर्ष से घाटे में है। इस वर्ष हालात बदल सकते हैं क्योंकि टाटा स्टील इस्पात की बढ़ती कीमतों की बदौलत टीसीएस से अधिक मुनाफा कमा रही है। अगर एयर इंडिया कुछ समय तक घाटे में भी रहती है तो भी घाटे का आकार कम हो जाएगा। ब्याज का बोझ कम होगा और बकाया कर्ज की लागत कम होगी। समूह की दूसरी विमानन कंपनी के साथ तालमेल करने से यात्रियों की तादाद बढ़ाई जा सकेगी। एक फायदा यह भी हो सकता है कि शायद सरकार के मंत्री अब टाटा पर सार्वजनिक हमले न करें। दरअसल, करीब 69 साल बाद आधिकारिक तौर पर टाटा समूह के हाथों में एयर इंडिया की कमान आ गई है। इस बात की पुष्टि टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने की है। एविएशन इंडस्ट्री में कितनी हिस्सेदारी: इस अधिग्रहण प्रक्रिया के बाद भारत की एविएशन इंडस्ट्री में टाटा समूह का दबदबा बढ़ गया है। टाटा समूह की अब तीन एयरलाइन- विस्तारा, एयर एशिया और एयर इंडिया हो गई है। -टाटा समूह को एयर इंडिया में शत प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है। -विस्तारा एयरलाइन, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड और सिंगापुर एयरलाइंस लिमिटेड (एसआईए) का एक ज्वाइंट वेंचर है। इसमें टाटा संस की 51 फीसदी हिस्सेदारी है तो सिंगापुर एयरलाइन का स्टेक 49 फीसदी है। -अगर एयर एशिया की बात करें तो इसमें टाटा संस की हिस्सेदारी 83.67 फीसदी है। एविएशन इंडस्ट्री में कहां है टाटा: नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) के आंकड़ों के मुताबिक, एयरएशिया, विस्तारा और एयर इंडिया की डोमेस्टिक एयरलाइन इंडस्ट्री में करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आंकड़ों की मानें तो डोमेस्टिक एयरलाइन में एयर इंडिया 13.4 फीसदी, विस्तारा 8.1 फीसदी, एयरएशिया इंडिया 3.3 फीसदी की हिस्सेदार है।

Published / 2022-01-31 14:37:30
कर सुधार के नाम पर प्रताड़ना बंद हो...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (देवाशीष)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2020 में पारदर्शी कराधान के तहत तीन संरचनात्मक कर सुधारों की घोषणा की थी। इन घोषणाओं में फेसलेस असेसमेंट, फेसलेस अपील और करदाता संहिता शामिल थे। मगर वास्तविकता कुछ और है। पेचीदा आयकर नियमों, त्रुटिपूर्ण आॅनलाइन आयकर रिटर्न (आईटीआर) प्रक्रिया और दोषपूर्ण फेसलेस टैक्स असेसमेंट्स से प्रधानमंत्री के कर सुधार उपहास का विषय बन गए हैं। शुरूआत तब हुई जब आॅनलाइन आईटीआर दाखिल करने में करदाताओं को भारी परेशानी उठानी पड़ी। सनदी लेखाकारों (चार्टर्ड अकाउंटेंट्स) के अनुसार कर पोर्टल में लॉग इन करने से लेकर आईटीआर जमा करने तक लगभग सभी चरणों में परेशानी पेश आ रही थी और रिफंड के मद में रकम भी गलत दर्शायी जा रही थी। कर पोर्टल पर आईटीआर दाखिल होने और इनका सत्यापन होने के बाद भी कभी-कभी यह अपुष्ट बताया जाता है। कुछ मामलों में रिटर्न भरने के एक सप्ताह बाद भी आईटीआर, प्राप्ति सूचना या फॉर्म 10-आईई डाउनलोड करना संभव नहीं हो रहा था। कई फॉर्म भरने में बार-बार मशक्कत करनी पड़ रही थी। सनदी लेखाकारों के शब्दों में प्रक्रिया पूरी करने के लिए तकनीकी जुगाड़ का सहारा लेना पड़ता है। इसके बाद भी परेशाानियों का तांता लगा रहा। नए करदाता और उनके डिजिटल हस्ताक्षर स्वीकार नहीं हो रहे हैं और आधार क्रमांक से सत्यापन के लिए वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) भी काम नहीं करता है। जून के अंत से शुरू हुई यह दुरूह प्रक्रिया आईटीआर जमा करने की आखिरी तारीख 31 दिसंबर आते-आते और बढ़ गई। सनदी लेखाकारों ने टैक्स पोर्टल पर अपने खराब अनुभवों का जिक्र सोशल मीडिया पर करना शुरू कर दिया। मगर सरकार की तरफ से आई प्रतिक्रिया संतुष्ट करने वाली नहीं थी। राजस्व सचिव ने तो जोर देकर कहा कि कर पोर्टल बिल्कुल ठीक ढंग से काम कर रहा है। उन्होंने इसके लिए अब तक जमा आईटीआर की संख्या का हवाला दिया। पिछले वर्ष कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बीच सरकार ने नया आॅनलाइन कर पोर्टल शुरू किया था। इसके लिए सरकार ने इन्फोसिस को करोड़ों रुपये दिए थे। सनदी लेखाकारों का कहना है कि नए पोर्टल की बिल्कुल जरूरत नहीं थी। पुराना पोर्टल कुछ त्रुटियों के साथ भी बेहतर ढंग से काम कर रहा था। ये त्रुटियां ऐसी थीं जो आसानी से दूर कर ली गईं या इनका कोई न कोई उपाय खोज लिया गया था। सनदी लेखाकार अमित पटेल ने कहा, नए पोर्टल पर कुछ भी जमा करना लगभग पत्थर पर घास उगाने जैसा लग रहा था। जब करदाताओं ने पेश आ रहीं परेशानियों का जिक्र किया तो सरकार ने शुरू में उन पर ध्यान नहीं दिया। प्रधानमंत्री ने स्वयं अपरोक्ष रूप से जता दिया कि सरकार की किसी पहल पर सवाल उठाने वाले लोग नकारात्मक सोच रखते हैं। जब शिकायतों का सिलसिला नहीं थमा तो प्रधानमंत्री ने सांकेतिक तौर पर सार्वजनिक रूप से इन्फोसिस को डांट लगा दी। अगस्त 2021 के अंत में इन्फोसिस ने वादा किया था कि कुछ दिनों में कर पोर्टल की खामियां दुरुस्त कर ली जाएंगी। इसके बाद भी 8 जनवरी को सनदी लेखाकारों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को उन परेशानियों की एक फेहरिस्त भेजी जिनका सामना उन्हें हरेक दिन करना पड़ रहा था। किसी भी नए सॉफ्टवेयर के विकास के साथ कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जुड़ी होती हैं। इनमें शुरूआत से पहले पूर्ण परीक्षण और शुरूआत के बाद प्रतिक्रियाओं के आधार पर त्रुटियों का निपटारा आदि शामिल हैं। मगर आश्चर्य की बात है कि तकनीक को अधिक महत्त्व देने वाली सरकार ने नया कर पोर्टल शुरू करने से पहले इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। आधार और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली की शुरूआत भी इसी लचर रवैये के साथ की गई थी। किसी परियोजना के साथ फॉलबैक आॅप्शन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है। इसका आशय है कि अगर नई प्रणाली ठीक ढंग से काम नहीं कर रही है तो पुरानी प्रणाली दोबारा इस्तेमाल में लाई जाती है। मगर आश्चर्य की बात यह है कि पुराना आईटी पोर्टल समाप्त किया जा चुका है। अब अस्थायी रूप से भी पुरानी प्रणाली की तरफ लौटना संभव नहीं रह गया है। नियोजन एवं क्रियान्वयन पर अक्सर अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार ने नई प्रणाली में विसंगतियां आने की स्थिति में कोई दूसरा विकल्प तैयार नहीं रखा था। क्या इन्फोसिस ने निजी क्षेत्र के किसी ग्राहक को ऐसी त्रुटिपूर्ण प्रणाली दी होती? और क्या बिना समुचित जांच के ग्राहक ने ऐसी किसी प्रणाली के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया होता? मगर कड़ाई से पेश आने के बजाय सरकार का रवैया इन्फोसिस के साथ पहले की तरह ही सामान्य है। हमें यह बात भी याद रखनी चाहिए कि इन्फोसिस ने कंपनियों द्वारा कर जमा करने के लिए एक अन्य बहु-उद्देश्यीय सरकारी पोर्टल-एमसीए21 शुरू किया है। वास्तव में यह एक रहस्य प्रतीत होता है कि लोगों में अपनी छवि को लेकर सतर्क और किसी तरह की चूक की स्थिति में जनता एवं संगठनों के खिलाफ कड़ाई से पेश आने वाली सरकार एक निजी कंपनी के साथ एक त्रुटिपूर्ण परियोजना देने पर भी ढिलाई से पेश आ रही है। ऐसा लगा था कि फेसलेस असेसमेंट से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा जाएगा। वास्तव में कई कर मामले तेजी से निपटाए गए और रिफंड भी कम से कम समय में पूरे कर दिए गए। मगर कुछ दूसरे मामलों में करदाताओं के लिए मुश्किलें बढ़ गईं। करदाताओं से कई अतिरिक्त जानकारियां मांगी गईं और इनका निपटारा करने के लिए उन्हें पर्याप्त समय भी नहीं दिया गया। यहां तक कि करदाताओं को उनका पक्ष रखने का अवसर तक नहीं दिया गया। नोटिस भी कई बार किसी दूसरे व्यक्ति के ई-मेल पर भेज दिए गए। फेसलेस असेसमेंट शुरू करने पहले व्यापक विचार नहीं किया गया। सनदी लेखाकार अमित के अनुसार अपील पर आवश्यक कदम उठाने जैसे कई काम रुक गए। कर पोर्टल से एक ही सूचनाएं बार-बार मांगी जा रही हैं। अगर कोई फाइनल टैब या पार्शियल टैब दबा कर अपना जवाब देता है तो भी अपील का निपटान नहीं होता है। कुछ महीनों बाद दूसरा नोटिस आ जाता है। सनदी लेखाकारों की शिकायत है कि अतिरिक्त कर की मांग में त्रुटि दूर नहीं की जा रही है बल्कि यह बकाया रिफंड से स्वत: ही काट लिया जाता है। अपील करदाताओं के पक्ष में जाने के बाद भी अतिरिक्त कर की मांग रिफंड से काट ली जाती है या समायोजित कर ली जाती है। त्रुटियां दूर करने के लिए करदाताओं के ज्यादातर आवेदनों पर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनके आवेदनों पर विचार करने का अधिकार केंद्रीय निपटान केंद्र (सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर) के पास है या किसी क्षेत्राधिकार अधिकारी के पास। सरकार ने पिछले साल कर पुनर्आकलन अंतिम तिथि के बाद शुरू किया था। न्यायालय ने अब ऐसा करने से आयकर विभाग को रोक दिया है। कर फॉर्म पेचीदा और लंबे होते जा रहे हैं, वहीं मामूली खामियों पर भी आयकर विभाग कड़ाई से पेश आ रहा है। वास्तविकता यह है कि कर प्रताड़ना और कर उगाही नई कर प्रणाली का हिस्सा बन गया है। इस वजह से कर विभाग नागरिकों के लिए स्थिति सहज बनाने के बजाय उन पर असहनीय बोझ डालता रहेगा और पारदर्शी कराधान एक खोखला नारा और उपहास का विषय बना रहेगा। (लेखक डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं)

Published / 2022-01-29 14:16:45
बदलती जीवनशैली और स्वार्थपरक सोच ने बढ़ायही मन-जीवन की जटिलताएं

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मोनिका शर्मा)। साथ और स्नेह की सुदृढ़ बुनियाद कहे जाने वाले परिवार में रिश्तों की रंजिशें और मन का अलगाव जानलेवा साबित हो रहा है। यह वाकई विचारणीय है कि अपनों का साथ हिम्मत देने के बजाय जिंदगी से हारने का कारण बन रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2020 में देश में 1,53,052 लोगों ने आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम उठाया है। यह आंकड़ा 2019 के के मुकाबले 10 प्रतिशत ज्यादा है, जिसका सीधा सा अर्थ है कि आत्महत्या की दर 8.7 प्रतिशत बढ़ गई है। इन दुखद आंकड़ों में गौर करने वाली बात यह है कि सबसे अधिक 33.6 प्रतिशत मामलों में पारिवारिक समस्याएं खुदकुशी की वजह बनी हैं। ऐसे सभी कारण पारिवारिक संबंधों की उलझनों, तलाक, अकेलापन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़े हैं। चिंतनीय है कि जो रिश्ते-नाते जीने का आधार और पारिवारिक अपनापन हर हालत में आशाओं की नींव को मजबूती देने वाले रहे, अब मन जीवन को थका रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों के मुताबिक आत्महत्या करने वालों में शादी से जुड़ी समस्याओं से 5 प्रतिशत और प्रेम संबंधों के चलते 4.4 प्रतिशत लोगों ने जीवन से मुंह मोड़ लिया है। इतना ही नहीं सामाजिक स्थिति से जुड़ी आत्महत्याओं में 66.1 फीसदी शादीशुदा थे और 24 प्रतिशत अविवाहित लोगों ने जीवन से हारने का रास्ता चुना। पारिवारिक जीवन से जुड़े हालात के तहत ही जीवनसाथी को खो चुके विधवा या विधुर लोगों में 1.6 प्रतिशत और तलाकशुदा लोगों में 0.5 फीसदी खुदखुशी के मामले सामने आए हैं। विचारणीय है कि पारिवारिक समस्याओं से जुड़े पहलू जीवन को हर मोर्चे पर प्रभावित करते हैं। साथ ही जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी तकलीफें भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पारिवारिक जीवन पर असर डालती हैं। ऐसे में भावनात्मक टूटन और व्यावहारिक उलझनों का जाल अनगिनत मुश्किलें खड़ी कर देता है। यही वजह है कि पारिवारिक समस्याओं से जीवन हारने वालों में गृहिणियां भी हैं और पेशेवर महिला-पुरुष भी। दिहाड़ी मजदूर भी हैं और युवा भी। हालांकि कारण अलग-अलग हैं पर समग्र रूप से ऐसी उलझनें घर-आंगन के परिवेश से ही जुड़ी हैं। जो कहीं न कहीं साथ, सहयोग और संबल के रीतते भाव की ओर भी इशारा करती हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2020 में बीमारी से 18 फीसदी, ड्रग्स की लत 6 प्रतिशत, कर्ज के चलते 3.4 प्रतिशत, बेरोजगारी से 2.3 फीसदी और परीक्षाओं में असफलता के कारण 1.4 प्रतिशत खुदकुशी के मामले सामने आए हैं। साफ है कि जिंदगी से मुंह मोड़ने वालों में हर उम्र के लोग शामिल हैं। ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं कि पारिवारिक सहयोग और संबल का भाव विद्यार्थियों से लेकर बेरोजगारी की परिस्थितियों से जूझ रहे वयस्कों तक, सभी के लिए अहम है, जबकि ऐसी अधिकतर घटनाओं के पीछे घर परिवार से मिलने वाला मानसिक दबाव और अपेक्षाएं भी आत्महत्या जैसा कदम उठाने की वजह बन रही हैं। दरअसल, बीते कुछ बरसों में पारिवारिक अलगाव, अपनों अपेक्षाएं और यहां तक कि घरेलू रंजिशें भी आत्महत्या का कारण बन रही हैं। करीबी रिश्तों में भी असंतोष की भावना पनप रही है। अपनों के साथ होकर भी अकेलेपन को जीने के हालात बन गए हैं। इतना ही नहीं पारिवारिक कलह के कारण हिंसा और हत्या के मामले भी देखने में आ रहे हैं। कहीं उपेक्षा का भाव तो कहीं अपेक्षाओं का बोझ, जीवन पर भारी पड़ रहा है। कभी पारिवारिक ताने-बाने में सांसारिक मुश्किलों की अपनों से शिकायत कर मन को संतोष मिल जाता था। आज अधिकतर लोग अपने ही आंगन में असंतोष, आक्रोश और उलाहनों की उलझनों में घिर गए हैं। ऐसे में अपनों से जुड़ी होने के बातें मन को ज्यादा घेरती हैं। भावनात्मक टूटन लाती हैं। कोरोना काल की आपदा ने मुश्किलों को भी बढ़ा दिया है। इन्सान को और अकेला कर किया है। नतीजतन, खुदकुशी के आंकड़ों में इजाफा हुआ तो हुआ ही है, सामाजिक-पारिवारिक मोर्चे पर भी तकलीफें बढ़ी हैं। यह कटु सच है कि बदलती जीवनशैली और स्वार्थपरक सोच ने मन-जीवन से जुड़ी जटिलताएं बढ़ा दी हैं। व्यक्तिगत स्तर पर जरूरतों की जगह इच्छाओं ने और सामुदायिक जुड़ाव का स्थान एकाकीपन की सोच ने ले लिया है। साथ ही बड़ी आबादी वाले हमारे देश में सामाजिक असमानता, बेरोजगारी और लैंगिक भेदभाव ने भी मानवीय जीवन से जुड़ी मुसीबतें बढ़ाई हैं। तकलीफदेह यह है कि सामाजिक हो या परिवेशगत, हर समस्या से जूझने में परिवार भी मददगार नहीं बन पा रहा है। सच तो यह है कि पारिवारिक स्तर पर ही उलझनों में घर बना लिया है। चिंता की बात यह भी है कि हालिया बरसों में यह जीवन का साथ छोड़ने का अहम कारण बन गया है। साल 2019 में भी आत्महत्या के चार बड़े कारणों में दो घर परिवार से जुड़े कारण ही थे। इनमें समग्र रूप से 29.2 लोगों ने पारिवारिक समस्याओं के चलते खुदकुशी की। दुखद है कि हमारे यहां कर्ज और बीमारी जैसे कारणों के चलते पूरे परिवार सामूहिक आत्महत्या जैसा कदम तक उठा रहे हैं। ऐसे में पारिवारिक मामलों में बढ़ती मुश्किलों को लेकर चेतना जरूरी हो चली है।

Published / 2022-01-29 09:50:35
पता नहीं कितने लोगों को स्वीकार्य होगी सीएम योगी की ये उपलब्धि...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। यूपी में बारी-बारी से सपा या बसपा की सरकारें भी दशकों से 2017 तक आती रही। उस दरम्यान यूपी की छवि में कोई बदलाव नहीं आया। पूरे देश का जनमानस यूपी को लेकर वही जड़ उदासीन रहता था। सपा सत्ता में आती थी और उसके गिने चुने वही माफिया, अतीक मुख्तार, आजम खान अपना वर्चस्व दिखाते थे। मुस्लिम तुष्टिकरण, बहुसंख्यकों का मानमर्दन, चिर प्रतिद्वंद्वी बसपा समर्थको को ठिकाने लगाने और विकास के नाम पर सैफई महोत्सव का काम चलता था। बसपा आती थी तो सिर्फ सत्ता का ब्रांड बदलता था। धंधा वही रहता। दलित शौर्य के नाम पर सरकारी खजाने से हाथी की मूर्ति और सरकारी वसूली, कमाई , रंगदारी और विरोधियों को ठिकाने लगाने और मायावती का बर्थडे का काम जारी रहता था। एक बार बसपा के उपद्रवियों ने रीता बहुगुणा जोशी के घर में आग लगा दी थी। तत्काल इसके बाद उपद्रवियों के नेतृत्वकर्ता इंतजार आब्दी को यूपी गन्ना बोर्ड का निदेशक बना कर मायावती ने पुरस्कृत किया था। इसमें कोई संशय नहीं कि सपा और बसपा सुप्रीमो ने अकूत दौलत भी कमाई। यूपी के विकास का कोई बड़ा काम नहीं हुआ। यूपी बीमारू राज्य ही रहा। झारखंड-बिहार की तरह यूपी भी मजदूर सप्लाई करने वाला राज्य बना रहा। 2017 में योगी के आने के बाद बदलाव तो हुआ। अपराध पर एक हद तक नियंत्रण भी दिख। एयरपोर्ट, सड़कें बनीं। निवेश और उद्योग का पुरजोर प्रयास हुआ। यूपी में तुष्टिकरण और वोट के कारण आपराधिक तत्वों को जो छूट मिली थी, उसे कुंद किया गया। सबसे बड़ी बात कि योगी ने यूपी की बहुसंख्यक जनता के हारे हुये मानस को फिर से चार्ज किया। वरना इसी यूपी में पाकिस्तान की जीत पर पाक की जर्सी में युवा सड़क पर जश्न मनाते थे। यूपी में रह रहे कश्मीरी छात्र पाक की हार पर तोड़-फोड़ करते थे और मुलायम अखिलेश इसका बचाव करते थे। योगी राज में बहुत कुछ एक झटके में बदला। यूपी एक तरह से खुद को बीमारू राज्य के चोले को उतार फेंकने की राह पर है। कोरोना के समय का एक आंकड़ा है कि सबसे बड़ी, घनी आबादी और अधूरी चिकित्सा सुविधा वाला यूपी अन्य सक्षम राज्यों से ज्यादा सफलतापूर्वक महामारी से निबटने में कामयाब रहा। योगी को धन दौलत नहीं चाहिये। वो अकूत धन का क्या करेंगे? योगी में अखिलेश और माया कुनबे की तरह कोई माया नहीं। आप खुद सोचिये तो 2017 के बाद के यूपी की एक अलग छवि बनती है । योगी इस बार फिर सत्तासीन होंगे या नहीं, ये मैं नहीं जानता। पर उनका विजयी होना यूपी के लिये अच्छा होगा। क्योंकि वो धन दौलत, पारिवारिक माया-मोह से निर्लिप्त है़। उनका लक्ष्य सिर्फ यूपी को विकास के रास्ते पर ले जाना है। बेशक वो हर हाल में अखिलेश, मायावती, मुलायम से बेहतर सीएम साबित हुये हैं। योगी किसी भी हाल में झुक नहीं सकते और न ही अपराधी, शत्रुओं को माफ करते हैं। आगे यूपी की जनता जानें...(लेखक पत्रकारिता विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची से जुड़े हैं।)

Page 56 of 68

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse