विचार

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Published / 2022-02-15 14:03:17
आखिर कब पूरी होंगी देश की अधिकांश योजनाएं...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज)। देश के बुनियादी ढांचे की विकास यात्रा के पिछले तीन दशकों में परियोजना कार्यान्वयन के लिए धन जुटाने की खातिर गहन प्रयास हुए हैं। इस दिशा में न केवल बजट परिव्यय में वृद्धि की गई, बल्कि संस्थागत वित्त पोषण कार्यक्रमों की शृंखला भी शुरू की गई। सबसे पहली थी वर्ष 1987 में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज। इसके बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनैंस कंपनी (1997), इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी (2006), नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड इनवेस्टमेंट फंड (2015) और नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्क्चर ऐंड डेवलपमेंट (2021) आई। सार्वजनिक-निजी साझेदारी का ढांचा भी स्थापित किया गया। इससे पहले के समय में क्षेत्र-विशिष्ट वित्त पोषण कार्यक्रम चलाए गए थे। इनमें ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (1969), आवास एवं शहरी विकास निगम (1970), पावर फाइनैंस कॉरपोरेशन (1986) और भारतीय रेलवे वित्त निगम (1986) शामिल हैं। पिछले दो दशकों में कई निजी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और निजी इक्विटी फंड भी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के वित्त पोषण में काफी सक्रिय हो गए हैं। कई वैश्विक दीर्घकालिक संस्थागत निवेशक भी आ गए हैं। पूंजी बाजार उपकरणों की एक नई पीढ़ी वजूद में आई-जैसे रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स। अब भारत लगभग 22 लाख करोड़ रुपये की वार्षिक बुनियादी ढांचागत वित्त पोषण क्षमता को साकार रूप देने के लिए भली-भांति तैयार है, जो राष्ट्र का घोषित लक्ष्य है। इस क्षमता को मोटे तौर पर केंद्रीय बजट परिव्यय (7 लाख करोड़ रुपये), राज्यों की ओर से संयुक्तनिवेश (6 लाख करोड़ रुपये), सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अतिरिक्त बजट संसाधनों (2 लाख करोड़ रुपये), नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (3 लाख करोड़ रुपये) तथा घरेलू और विदेशी निजी पूंजी (4 लाख करोड़ रुपये) से निर्मित माना जा सकता है। इसलिए अब जोर अनिवार्य रूप से जमीनी स्तर पर दक्ष कार्रवाई अर्थात समय पर परियोजना कार्यान्वयन पर होना चाहिए। हालांकि वित्त पोषण क्षमता के नितांत विपरीत परियोजना कार्यान्वयन के संबंध में जमीनी हकीकत काफी खराब है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की दिसंबर 2021 तक की नवीनतम सूचना में 1,679 परियोजनाएं शामिल हैं। ये केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाएं हैं, जिनमें से प्रत्येक की लागत 150 करोड़ रुपये या अधिक है। इनमें 10 क्षेत्र-सड़क, रेलवे, बिजली, पेट्रोलियम, शहरी विकास, कोयला, पानी, परमाणु ऊर्जा, इस्पात और दूरसंचार शामिल हैं। इनमें से 11 परियोजनाएं निर्धारित समय से आगे हैं, 292 निर्धारित समय पर हैं, 541 विलंबित हैं और फिर 835 ऐसी परियोजनाएं हैं, जहां न तो चालू होने का वर्ष और न ही पूरा होने की अपेक्षित तिथि उपलब्ध है। रिपोर्ट के अनुसार इन 1,679 परियोजनाओं के कार्यान्वयन की कुल मूल लागत 22.3 लाख करोड़ रुपये थी, लेकिन अब अनुमानित लागत करीब 26.68 लाख करोड़ रुपये है, जो 4.38 लाख करोड़ रुपये की अधिक लागत को दशार्ती है। यह मूल लागत का 20 प्रतिशत है। नवंबर तक इन सभी परियोजनाओं पर लागत का लगभग 48 प्रतिशत भाग व्यय किया जा चुका है। 4.38 लाख करोड़ रुपये की यह अधिक लागत वित्त वर्ष 22 के बजट में प्रस्तावित 5.54 लाख करोड़ रुपये के संपूर्ण बुनियादी ढांचागत परिव्यय की 79 प्रतिशत राशि है। राज्य सरकारों के नियंत्रण वाली विशाल परियोजनाओं की स्थिति उपलब्ध नहीं है। और अधिक कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेपों में से एक संभवत: वर्ष 2013 की गर्मियों में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा स्थापित परियोजना प्रबंधन समूह (पीएमजी) था। इसके लिए यह अनिवार्य था कि अवरुद्ध परियोजनाओं के लगभग 17 लाख करोड़ रुपये की राशि छुड़ाई जाए और यह कथित तौर पर करीब सात लाख करोड़ रुपये की औद्योगिक और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को फिर से आगे बढ़वाने में सक्षम था। भले ही पीएमजी को मंत्रिमंडल सचिवालय में एक विशेष प्रकोष्ठ के रूप में स्थापित किया गया था, लेकिन बाद में इसे वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया था। वर्ष 2019 में पीएमजी को उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के साथ मिला दिया गया था। अब इसे प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग-इन्वेस्ट इंडिया सेल के रूप में जाना जाता है। इसके तहत ईसुविधा परियोजना प्रबंधन प्रणाली सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की विशाल परियोजनाओं के डेटाबेस की निगरानी करती है। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस ऐंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) भी है। वर्ष 2015 में शुरू किया गया यह मंच केंद्र सरकार के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों और परियोजनाओं के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारा चिह्नित परियोजनाओं की भी समीक्षा करता है। बढ़ती समस्या को स्वीकार हुए नीति आयोग और भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) ने अक्टूबर, 2020 में राष्ट्रीय कार्यक्रम एवं परियोजना प्रबंधन नीति ढांचे की शुरूआत की थी, जिसका लक्ष्य भारत में बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के कार्यान्वयन के तरीके में आमूलचूल सुधार लाना था। इसकी प्रमुख सिफारिशों में शामिल हैं-(1) क्यूसीआई के अंतर्गत नैशनल इन्स्टीट्यूट फॉर चार्टर्ड प्रोग्राम ऐंड प्रोजेक्ट प्रोफेशनल्स की स्थापना करना (2) कार्यान्वयन के सर्वोत्तम क्रियाकलापों का इंडियन इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉडी आॅफ नॉलेज नामक का एक तकनीकी भंडार विकसित करना (3) परियोजना कार्यान्वयन के पेशेवरों के लिए चार-स्तरीय प्रमाणन प्रणाली और (4) क्षमता निर्माण कार्यक्रम। आखिर में प्रौद्योगिकी-संचालित दो हालिया मंच-आॅनलाइन मंजूरी और अनुमति के लिए नैशनल सिंगल विंडो सिस्टम तथा गति शक्ति परियोजना कार्यान्वयन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए शक्तिशाली उपकरण हैं। इसलिए अब हमारे पास परियोजना कार्यान्वयन में चिरकालीन विलंब की समस्या को हल करने के लिए संस्थागत स्वरूपों का एक समूह है।

Published / 2022-02-14 16:09:50
कोविड से फिल्म उद्योग को हुआ बड़ा नुकसान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनिता खांडेकर)। पिछले पखवाड़े ईद का त्योहा8र बहुत बुरे समय में आया। देश महामारी से जूझ रहा है और हमारे चारों तरफ इतना दुख और कष्ट फैला हुआ है कि जश्न मनाने जैसा कोई भाव ही नहीं आता। सलमान खान अभिनीत फिल्म राधे ऐसे ही माहौल में रिलीज हुई। महामारी खत्म होने का इंतजार करने के बाद आखिरकार फिल्म को ओटीटी जी 5 पर रिलीज किया गया। आश्चर्य नहीं कि दर्शकों और आलोचकों ने इसकी जमकर आलोचना की। शायद फिल्म बुरी है लेकिन ओटीटी पर रिलीज करने से इसकी हालत और बिगड़ गई। राधे जैसी फिल्म ईद के सप्ताहांत पर रिलीज होकर खूब भीड़ बटोरती है। यह पुराने जमाने की सिंगल स्क्रीन फिल्मों जैसी है जहां दर्शक खूब शोरशराबा करते हैं। जब आप इसे 249 रुपये में ऐसे दर्शकों को बेचते हैं जिनकी पसंद नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो ने बदल दी है तो इसका नाकाम होना तय है। परंतु चूंकि यह सलमान खान की फिल्म है इसलिए इसे बड़ी तादाद में दर्शक मिलेंगे और विदेशों में रिलीज, टेलीविजन अधिकारों तथा जी के साथ हुए सौदे से यह न केवल लागत वसूल करेगी बल्कि पैसे भी कमाएगी। परंतु इसकी कमजोर रिलीज में न केवल देश का मिजाज बल्कि फिल्म उद्योग की कमजोरी भी रेखांकित होती है। गत वर्ष देश के सिनेमा राजस्व का दोतिहाई हिस्सा गंवाना पड़ा। महामारी के कारण सन 2019 के 19,100 करोड़ रुपये से घटकर यह 7,200 करोड़ रुपये रह गया। महामारी के कारण थिएटर सबसे पहले बंद हुए और सबसे बाद में खुले। टिकट बिक्री घटकर 40 करोड़ रुपये रह गई जो 2019 की तुलना में एक तिहाई से भी कम थी। इस आंकड़े में भी ज्यादातर पहली तिमाही से है जब लॉकडाउन नहीं लगा था। सात लाख लोगों को रोजगार देने वाले इस उद्योग के काम करने वाले लाखों दैनिक श्रमिकों का काम छूट गया। फिक्की-ईवाई की रिपोर्ट के अनुसार 1,000 से 1,500 सिंगल स्क्रीन थिएटर बंद हुए। मल्टीप्लेक्स भी अच्छी स्थिति में नहीं हैं। सिनेमाघर खुले ही थे कि दूसरी लहर ने तबाही मचा दी। अमेरिका के रीगल और एएमसी की तरह अगर भारत में भी कुछ मल्टीप्लेक्स शृंखला बंद होती हैं तो आश्चर्य नहीं। पूरे भारत का टीकाकरण होने में कम से कम एक वर्ष लगेगा। केवल तभी सिनेमाघर पूरी तरह खुल सकेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में वे ही सबसे अहम हैं। बिना सिनेमा घरों के भारतीय सिनेमा दोबारा खड़ा नहीं हो सकता। सन 2019 में भारतीय फिल्मों की 19,100 करोड़ रुपये की आय में 60 फीसदी भारतीय थिएटरों से आई। किसी फिल्म को थिएटर में कैसी शुरूआत मिलती है, इससे ही तय होता है कि टीवी, ओटीटी और विदेशों में उसकी कैसी कमाई होगी। सन 2019 एक अच्छा वर्ष था और उस वर्ष प्रसारकों ने फिल्म अधिकारों के लिए 2,200 करोड़ रुपये खर्च किए जो कुल कारोबार का 12 फीसदी था। प्रसारक नेटवर्क को इससे 7,700 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व मिला। परंतु प्रसारक टीवी को यह कमाई तभी होती है जब फिल्म का प्रदर्शन थिएटर में अच्छा हो। ये दोनों माध्यम आम जनता से संबद्ध हैं। अगर थिएटर पूरी तरह नहीं खुले तो यह पूरी व्यवस्था काम नहीं करेगी। डिजिटल या ओटीटी माध्यम 60 फीसदी कारोबार की जगह नहीं ले सकते। ध्यान रहे गत वर्ष फिल्मों का डिजिटल राजस्व दोगुना हो गया लेकिन कारोबार फिर भी 60 फीसदी कम रहा। ऐसा लगता है कि लोग भी थिएटरों में वापस जाना चाहते हैं। मास्टर (तमिल), ड्रैकुला सर या चीनी (बांग्ला), जाठी रत्नालू (तेलुगू), कर्णन (तमिल), द प्रीस्ट (मलयालम) आदि फिल्मों ने सन 2020 में और 2021 के आरंभ में बॉक्स आॅफिस में अच्छा प्रदर्शन किया। सवाल यह है कि अगर तेलुगू, तमिल या मलयालम फिल्मों का प्रदर्शन अच्छा है तो राधे को पहले क्यों नहीं रिलीज किया गया? क्योंकि हिंदी रिलीज पूरे देश में होती है। यह जरूरी होता है कि कई राज्यों में फिल्म रिलीज हो। कुल राजस्व का 40-50 फीसदी हिस्सा केवल दिल्ली और मुंबई से आता है। विदेशों से भी बहुत राजस्व मिलता है। जबकि तमिल फिल्म केवल तमिलनाडु में और तेलुगू फिल्म तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में रिलीज होती है। प्रोड्यूसर्स गिल्ड आॅफ इंडिया के अध्यक्ष सिद्धार्थ राय कपूर कहते हैं कि ये फिल्में केवल राज्य विशेष में चलती हैं। ऐसे में हिंदी ही फिल्म राजस्व का सबसे बड़ा हिस्सा लाती है। जब तक महामारी समाप्त नहीं होती बड़े पैमाने पर हिंदी रिलीज मुश्किल है। दुनिया भर में अवेंजर्स, मिशन इंपॉसिबल या बॉन्ड शृंखला की फिल्मों में यह ताकत है कि वे दर्शकों को सिनेमाहॉल में खींच सकें। यह बात भारत के लिए भी सही है। बाहुबली (तेलुगू, तमिल), केजीएफ (कन्नड़), वार (हिंदी) या सोरारी पोत्रु (तमिल) जैसी फिल्मों के लिए दर्शक थिएटर जाएंगे जबकि सीयू सून अथवा जोजी (मलयालम) अथवा रामप्रसाद की तेरहवीं (हिंदी) जैसी फिल्में ओटीटी मंच के लिए हैं। यानी टीकाकरण के अलावा थिएटरों में बड़ी और शानदार फिल्मों की जरूरत होगी ताकि हालात सामान्य हो सकें। ऐसा होता नहीं दिखता। धर्मा प्रोडक्शन के सीईओ अपूर्व मेहता कहते हैं, फिल्म अनुबंध का कारोबार है। इसमें कई लोग लंबे समय तक एक साथ काम करते हैं और सावधानी बरतनी होती है। हम इस माहौल में 200-300 करोड़ रुपये की फिल्म की योजना नहीं बना सकते। यही कारण है कि हम ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिनका बजट कम हो। यानी कारोबारी एक दुष्चक्र में फंस गया है जो तभी समाप्त होगा जब शूटिंग और बाहरी शेड्यूल शुरू हो। ऐसा शायद 2022 के अंत में या 2023 में हो। अभी कुछ कहना मुश्किल है कि तब हालात कैसे होंगे। बात केवल बड़े सितारों की नहीं है। यह हजारों लेखकों, तकनीशियनों, सहायक कलाकारों, स्टूडियो में काम करने वालों की भी बात है। हालांकि औद्योगिक संगठन और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास जारी हैं लेकिन हिंदी, मलयालम, तमिल, बांग्ला आदि अनेक क्षेत्रों के सिनेमा से जुड़े लोग अपना पेशा बदल चुके हैं। कारोबार शायद समाप्त न हो लेकिन संभव है यह अपने पुराने दिनों की छाया भर रह जाए।

Published / 2022-02-11 17:59:37
अलगाववादी षडयंत्र का शिकार होतीं बेटियां...

बन एडिटोरियल डेस्क (विनोद बसंल)।भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। किन्तु इस अनिवार्यता के बावजूद दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में भी देश की कुल जनसंख्या का 36.90 फीसदी हिस्सा आज भी निरक्षर है। मुस्लिमों में तो यह निरक्षरता दर 42.7 फीसदी है। यदि महिलाओं की बात करो तो ये आंकड़े और भी भयावय हैं। देश की 66 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं आज भी निरक्षर हैं। उच्च शिक्षा में तो इनकी भागीदारी मात्र 3.56 प्रतिशत ही है जो कि अनुसूचित जातियों के अनुपात 4.25 प्रतिशत से भी कम हैं। क्या कभी सोचा है कि ये सब आखिर क्यों है? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एक तो हमारे राजतन्त्र की शिक्षा के प्रति उदासीनता, दूसरा संसाधनों का अभाव तथा ऊपर से धार्मिक कट्टरता ने मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर को सबसे नीचे रखा। अचानक विरोध क्यों : 2022 के प्रथम माह में ही कर्नाटक में उडुप्पी के एक छोटे से स्कूल में प्रारम्भ हुआ अनावश्यक विवाद, जिहादियों या यूं कहें कि कुछ कट्टरपंथियों की हट के चलते कुछ ही दिनों में बागलकोट में पत्थरबाजी तक कैसे ब दल गया जहां के स्थानीय प्रशासन को वहां धारा 144 तक लगानी पड़ी।.... राज्य सरकार को अपने सभी शिक्षण संस्थान तीन दिन के लिए बंद करने पड़े। कुछ अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली के शाहीन बाग में भी नारा ए तकदीर-अल्लाह हु अकबर फिर से गूंजा। कुछ मंत्रियों के बयान आए तो वहीं विपक्षी दल इस मामले को संसद तक ले गया। उधर, देश में जिहाद, अलगाववाद व इस्लामिक कट्टरता की फैक्टरी कहलाई जाने वाली संस्था पीएफआई की संलिप्तता भी जग-जाहिर हो गई। अब बात करते हैं विद्यालय व उसके नियमों की। तो हम सभी को पता है कि विद्यालय में प्रवेश से पूर्व एक फॉर्म भरवाया जाता है कि मैं विद्यालय के सभी नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करूंगा तथा उसके उल्लंघन पर दंड का भागी बनूंगा। इन नियमों में विद्यालय के निर्धारित गणवेश (यूनिफॉर्म) की बात भी होती है। साथ ही संभवतया हम सभी ने कभी न कभी (चाहे भूलवश ही सही) गणवेश के किसी अंग की न्यूनता के लिए दंड भी भुगता होगा। किन्तु कभी किसी विद्यार्थी को हिजाब, बुर्का या गोल टोपी में नहीं देखा होगा। होना भी नहीं चाहिए। विद्यालय समता, समानता व एकरूपता के केंद्र हैं। ना कि जाति, मत-पंथ, भाषा-भूषा या खान-पान के आधार पर अलगाववाद के अड्डे। उडुपी की ये छात्राएं गत अनेक वर्षों से उसी विद्यालय में बिना किसी शिकायत के शांति से पढ़ रही थीं। फिर जिस विद्यालय में अचानक हिजाब का उदय हुआ वह तो था ही सिर्फ छात्राओं का जहां, लड़कों का प्रवेश ही वर्जित है। तो फिर हिजाबी पर्दा किस से और क्यों? इस पर एक प्रश्न के जवाब में एक विरोध करने वाली मुस्लिम बेटी ने बगलें झांकते हुए कहा कि एकाध शिक्षक तो पुरुष हैं हीं इसलिए हिजाब जरूरी है। सोचिए... जिस विद्यार्थी की गुरुजनों के प्रति ऐसी दुर्जनों वाली सोच हो तो उसके विद्या अध्ययन का क्या अर्थ? खैर! ये गलती उस बेटी की नहीं अपितु, उसे बहलाने, फुसलाने, भड़काने व उकसाने वाले उस कट्टरपंथी धडे की है जो कभी चाहता ही नहीं था कि मुस्लिम बेटियां कभी घर की चार दीवारी पार कर अपना जीवन अच्छे से जी सकें। वे तो उन्हें अपने पैरों की जूती, मर्दों की खेती व मनोरंजन का साधन से अतिरिक्त कुछ समझता ही नहीं। इस सारे षड्यंत्र के पीछे देश की उस कट्टर इस्लामिक जिहादी संस्था पीएफआई की उपस्थिति भी साफ तौर पर स्पष्ट हो चुकी है जिसके विरुद्ध अलगाववादी व आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी - एनआईए जांच एजेंसी जांच कर रही है और जो देशभर में इस्लामिक कट्टरता और अराजकता फैलाने में लिप्त है। इसकी छात्र विंग कैंपस फ्रंट आॅफ इंडिया का बयान भी मीडिया में आ चुका। यह संयोग है या षड्यंत्र, ये आप तय करें किन्तु यह तथ्य और सत्य है कि जैसे ही कॉंग्रेस ने कट्टरपंथियों की चाल के समर्थन में ट्वीट करना प्रारम्भ किया पाकिस्तान से भी उसी स्वर में अनेक तालियां बजने लगीं। एक ओर जहां कभी कट्टरपंथियों का विरोध व विद्यार्थियों का समर्थन करने वाली पाकिस्तानी नोबल विजेता मलाला, जिसने हलाला पर भी कभी मुंह नहीं खोला, हिजाब का हिसाब मांगने लगी। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के अनेक मंत्री, नेता व वहां की पूर्व प्रधानमन्त्री की बेटी भी इस हिजाब जिहाद की समर्थक बन ट्वीट पर टूट पड़ीं। कांग्रेस के ट्वीट पर पाकिस्तान ताली ना बजाए ऐसा कैसे हो सकता था। ये कट्टरपंथी हर चीज को शरीयत के पैमाने से नापने लग जाते हैं लेकिन हकीकत में शरीयत उनके हलक से भी नीचे कभी नहीं उतरा। वैसे भी यह भारत है जो, संविधान से चलता है ना कि शरीयत की नसीहतों से। जिसकी आड़ में मुस्लिम महिलाओं को हलाला, तीन तलाक, बहु-विवाह, बहु बच्चे, बाल-विवाह, हिजाब व बुर्के जैसी अनंत बेड़ियों में जकड़ के रखा जाता है। उन्हें मदरसों में मौलवियों के पास तो जाने की छूट है किन्तु मस्जिदों में नहीं? वे मुस्लिम मर्दों को खुश करने की साधन तो होती हैं किन्तु कभी मुल्ला, मौलवी या काजी नहीं बन सकतीं। मोदी सरकार से पूर्व तो पुरुष के बिना महिलाओं को हज तक की अनुमति नहीं थी। पुत्रियों को संपत्ति में अधिकार आज तक नहीं। अपने ही दत्तक पुत्रों से पर्दा कैसा? उन्हें संपत्ति में अधिकार क्यों नहीं? जो लोग इस्लाम को वैज्ञानिक व प्रगतिशील बताते हैं उनके लिए ये बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। यदि उनको विरोध ही करना था तो इन बुराईयों व अत्याचारों के विरुद्ध बिगुल फूंकतीं। वैसे जिन लड़कियों ने हिजाब के लिए विद्यालय में जिहाद किया उनके वे फोटो व वीडियो भी आजकल सोशल मीडिया में खूब वायरल हैं जिनमें वे स्वयं फटी जींस टी-शर्ट में बिना किसी स्कार्फ, हिजाब या बुर्के के सार्वजनिक स्थानों पर मस्ती करते हुए नजर आ रही हैं किन्तु विद्यालयों में..? क्या विद्यालय में घुसते ही उनका इस्लाम खतरे में आ जाता है? (लेखक विहिप से जुड़े हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

Published / 2022-02-11 13:30:04
हिजाब या अलगाववादी षडयंत्र...

एबीएन उडिटोरियल डेस्क (विनोद बंसल)। भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। किन्तु इस अनिवार्यता के बावजूद दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में भी देश की कुल जनसंख्या का 36.90 फीसदी हिस्सा आज भी निरक्षर है। मुस्लिमों में तो यह निरक्षरता दर 42.7 फीसदी है। यदि महिलाओं की बात करो तो ये आंकड़े और भी भयावय हैं। देश की 66 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं आज भी निरक्षर हैं। उच्च शिक्षा में तो इनकी भागीदारी मात्र 3.56 प्रतिशत ही है जो कि अनुसूचित जातियों के अनुपात 4.25 प्रतिशत से भी कम हैं। क्या कभी सोचा है कि ये सब आखिर क्यों है? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एक तो हमारे राजतन्त्र की शिक्षा के प्रति उदासीनता, दूसरा संसाधनों का अभाव तथा ऊपर से धार्मिक कट्टरता ने मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर को सबसे नीचे रखा। पहले तो बेटियों को घर से ही नहीं निकलने दिया जाता। दूसरा उन पर बुर्के को लाद दिया जाता है। अकेले घर से बाहर पाँव नहीं, मोबाइल नहीं, शृंगार नहीं, मनोरंजन नहीं, पर-पुरुष से बात नहीं, इत्यादि अनेक फतवे थोप दिए जाते हैं। जिसके कारण पहले तो उनके परिजन ही विद्यालय नहीं भेजते और यदि ऐसा हो भी जाए तो ये बंधन बेटियों के पाँवों को बेड़ियों की तरह जकड़े रहते हैं। बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत वर्तमान केंद्र सरकार ने अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बेटियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास प्रारंभ किए। जिनका प्रतिफल बेटियों की सुरक्षित व सहज शिक्षा के रूप में सामने आ रहा है। आज चारों ओर के परीक्षा परिणामों पर नजर डालें तो बेटियां सर्वाधिक अंक प्राप्त कर मेरिट में सबसे ऊंचे पायदान पर दृष्टिगोचर हो रही हैं। यह एक सुखद अनुभूति तो है किन्तु अभी जब हम लक्ष्य से कोसों दूर हैं तभी अचानक उन बेटियों की शिक्षा पर अचानक कुछ कट्टरपंथियों का पुन: आक्रमण पीड़ादायी लगता है। अचानक विरोध क्यों : 2022 के प्रथम माह में ही कर्नाटक में उडुप्पी के एक छोटे से स्कूल में प्रारम्भ हुआ अनावश्यक विवाद, जिहादियों या यूं कहें कि कुछ कट्टरपंथियों की हट के चलते कुछ ही दिनों में बागलकोट में पत्थरबाजी तक कैसे ब दल गया जहां के स्थानीय प्रशासन को वहां धारा 144 तक लगानी पड़ी।.... राज्य सरकार को अपने सभी शिक्षण संस्थान तीन दिन के लिए बंद करने पड़े। कुछ अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली के शाहीन बाग में भी नाराएतकदीर-अल्लाहहुअकबर फिर से गूंजा। कुछ मंत्रियों के बयान आए तो वहीं विपक्षी दल इस मामले को संसद तक ले गया। उधर, देश में जिहाद, अलगाववाद व इस्लामिक कट्टरता की फैक्टरी कहलाई जाने वाली संस्था पीएफआई की संलिप्तता भी जग-जाहिर हो गई। बच्चों के विवाद में सर्वप्रथम राहुल गांधी कूदे जिसने उसको मुस्लिम व महिला अधिकारों से जोड़ने की कुचेष्टा की। उसके बाद मंगलवार को कर्नाटक के प्रदेश कोंग्रेस अध्यक्ष डी के शिवकुमार ने एक झूठे ट्वीट के द्वारा हिन्दूओं पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक कॉलेज में तिरंगे को उतारकर भगवा लहरा दिया जो तिरंगे का अपमान है। जबकि, उसी दिन शिवमोगा के ही पुलिस अधीक्षक श्री बीएम लक्ष्मी प्रसाद ने साफ तौर पर कहा कि पोल पर तिरंगा था ही नहीं। इसमें तिरंगे का अपमान कहां से हुआ। वास्तव में तो कॉंग्रेस की चिढ़ भगवा और भगवा-धारियों से है। यह एक बार पुन: स्थापित हो गया। हिजाबियों की तरफ से न्यायालय में कॉन्ग्रेसी ही तो लड़ रहे हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व राम द्रोही कपिल सिब्बल तो शुक्रवार को इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ही पहुंच गए जैसे कि वे तीन तलाक व बाबरी के लिए लड़े। इसके अतिरिक्त इस्लामिक जिहादियों व कथित सेकलक्यूलरिस्टों की टूल किट गैंग द्वारा भी पूरे देश में अराजकता का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। अब बात करते हैं विद्यालय व उसके नियमों की। तो हम सभी को पता है कि विद्यालय में प्रवेश से पूर्व एक फॉर्म भरवाया जाता है कि मैं विद्यालय के सभी नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करूंगा तथा उसके उल्लंघन पर दंड का भागी बनूंगा। इन नियमों में विद्यालय के निर्धारित गणवेश (यूनिफॉर्म) की बात भी होती है। साथ ही संभवतया हम सभी ने कभी-ना-कभी (चाहे भूलवश ही सही) गणवेश के किसी अंग की न्यूनता के लिए दंड भी भुगता होगा। किन्तु कभी किसी विद्यार्थी को हिजाब, बुर्का या गोल टोपी में नहीं देखा होगा। होना भी नहीं चाहिए। विद्यालय समता, समानता व एकरूपता के केंद्र हैं। ना कि जाति, मत-पंथ, भाषा-भूषा या खान-पान के आधार पर अलगाववाद के अड्डे। उडुपी की ये छात्राएं गत अनेक वर्षों से उसी विद्यालय में बिना किसी शिकायत के शांति से पढ़ रही थीं। फिर जिस विद्यालय में अचानक हिजाब का उदय हुआ वह तो था ही सिर्फ छात्राओं का जहां, लड़कों का प्रवेश ही वर्जित है। तो फिर हिजाबी पर्दा किस से और क्यों? इस पर एक प्रश्न के जवाब में एक विरोध करने वाली मुस्लिम बेटी ने बगलें झाँकते हुए कहा कि एकाध शिक्षक तो पुरुष हैं हीं इसलिए हिजाब जरूरी है। सोचिए! जिस विद्यार्थी की गुरुजनों के प्रति ऐसी दुर्जनों वाली सोच हो तो उसके विद्या अध्ययन का क्या अर्थ? खैर! ये गलती उस बेटी की नहीं अपितु, उसे बहलाने, फुसलाने, भड़काने व उकसाने वाले उस कट्टरपंथी धडे की है जो कभी चाहता ही नहीं था कि मुस्लिम बेटियां कभी घर की चार दीवारी पार कर अपना जीवन स्वच्छंदता से जी सकें। वे तो उन्हें अपने पैरों की जूती, मर्दों की खेती व मनोरंजन का साधन से अतिरिक्त कुछ समझता ही नहीं। इस सारे षड्यंत्र के पीछे देश की उस कट्टर इस्लामिक जिहादी संस्था पीएफआई की उपस्थिति भी साफ तौर पर स्पष्ट हो चुकी है जिसके विरुद्ध अलगाववादी व आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी - एनआईए जांच एजेंसी जांच कर रही है और जो देशभर में इस्लामिक कट्टरता और अराजकता फैलाने में लिप्त है। इसकी छात्र विंग कैंपस फ्रंट आॅफ इंडिया का बयान भी मीडिया में आ चुका। यह संयोग है या षड्यंत्र, ये आप तय करें किन्तु यह तथ्य और सत्य है कि जैसे ही कॉंग्रेस ने कट्टरपंथियों की चाल के समर्थन में ट्वीट करना प्रारम्भ किया पाकिस्तान से भी उसी स्वर में अनेक तालियां बजने लगीं। एक ओर जहां कभी कट्टरपंथियों का विरोध व विद्यार्थियों का समर्थन करने वाली पाकिस्तानी नोबल विजेता मलाला, जिसने हलाला पर भी कभी मुंह नहीं खोला, हिजाब का हिसाब मांगने लगी। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के अनेक मंत्री, नेता व वहां की पूर्व प्रधानमन्त्री की बेटी भी इस हिजाब जिहाद की समर्थक बन ट्वीट पर टूट पड़ीं। कॉंग्रेस के ट्वीट पर पाकिस्तान ताली ना बजाए ऐसा कैसे हो सकता था! ये कट्टरपंथी हर चीज को शरीयत के पैमाने से नापने लग जाते हैं लेकिन हकीकत में शरीयत उनके हलक से भी नीचे कभी नहीं उतरा। वैसे भी यह भारत है जो, संविधान से चलता है ना कि शरीयत की नसीहतों से। जिसकी आड़ में मुस्लिम महिलाओं को हलाला, तीन तलाक, बहु-विवाह, बहु बच्चे, बाल-विवाह, हिजाब व बुर्के जैसी अनंत बेड़ियों में जकड़ के रखा जाता है। उन्हें मदरसों में मौलवियों के पास तो जाने की छूट है किन्तु मस्जिदों में नहीं? वे मुस्लिम मर्दों को खुश करने की साधन तो होती हैं किन्तु कभी मुल्ला, मौलवी या काजी नहीं बन सकतीं। मोदी सरकार से पूर्व तो पुरुष के बिना महिलाओं को हज तक की अनुमति नहीं थी। पुत्रियों को संपत्ति में अधिकार आज तक नहीं! अपने ही दत्तक पुत्रों से पर्दा कैसा? उन्हें संपत्ति में अधिकार क्यों नहीं? जो लोग इस्लाम को वैज्ञानिक व प्रगतिशील बताते हैं उनके लिए ये बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। यदि उनको विरोध ही करना था तो इन बुराईयों व अत्याचारों के विरुद्ध बिगुल फूंकतीं। किन्तु शायद यदि किसी ने ऐसा किया तो उसका अंजाम भी लोगों ने देखा है। वैसे जिन लड़कियों ने हिजाब के लिए विद्यालय में जिहाद किया उनके वे फोटो व वीडियो भी आजकल सोशल मीडिया में खूब वायरल हैं जिनमें वे स्वयं फटी जींस टी-शर्ट में बिना किसी स्कार्फ, हिजाब या बुर्के के सार्वजनिक स्थानों पर मस्ती करते हुए नजर आ रही हैं किन्तु विद्यालयों में..। क्या विद्यालय में घुसते ही उनका इस्लाम खतरे में या जाता है! खैर! अब सीबीएसई ने अपनी फाइनल परीक्षाओं की तिथि घोषित कर दी है। आगामी 26 अप्रेल से वे परीक्षाएं देश भर में होने वाली हैं। अब विद्यार्थियों को स्वयं को राजनीति या कट्टरपंथियों का मुहरा बनने की बजाय अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गणवेश तो पहनना ही पड़ेगा इसी में सब की भलाई भी है। हम 21वीं सदी के नागरिक हैं जो अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। हमें किसी टूलकिट गैंग का हिस्सा नहीं अपितु अच्छे अंकों के साथ उत्तम परीक्षा परिणाम प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करना है। संघर्ष हो तो पढ़ाई के लिए व नंबरों के लिए। वास्तविकता तो यह है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों को देश में एकता या एकरूपता पच नहीं रही। वे बारंबार अपनी अलग पहचान चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मुस्लिम बेटियाँ अशिक्षित रह कर उनके उत्पीड़न की शिकार बनी रहें। उनका एक ही एजेंडा है जो विभाजन के समय जिन्ना की मुस्लिम लीग ने दिया था। लड़ के लिया है पाकिस्तान, हंस के लेंगे हिंदुस्तान। आज हिजाब, कल बुरखा, परसों नमाज, फिर मस्जिद, मदरसा, हलाल और फिर...। विभाजनकारियों के ये षड्यन्त्र अब सफल नहीं होने वाले। ये अफगानिस्तान नहीं जहां बेटियों को शिक्षा से वंचित किया जाए। हम एक-एक बेटी को शिक्षित व जागरूक नागरिक बनाएंगे चाहे वे किसी भी मत-पंथ, संप्रदाय, भाषा-भूषा या क्षेत्र की हो। (लेखक विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

Published / 2022-02-10 15:58:40
पर्यावरण संबंधी मंजूरी की व्यवस्था ध्वस्त...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। रैंकिंग इसलिए प्रदान की जाती हैं ताकि सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत किया जा सके। परंतु ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे यह संकेत निकलता है कि चीजों को कैसे बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इसलिए जब केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय कहता है कि वह राज्यों के पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार को इस आधार पर रैंकिंग देगा कि वे पर्यावरण संबंधी मंजूरी किस गति से देते हैं तो दरअसल इससे यही पता चलता है कि उसका पूरा ध्यान परियोजनाओं को मंजूरी मिलने पर केंद्रित है, न कि आकलन की गुणवत्ता अथवा यह सुनिश्चित करने पर कि विकास परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव को कम किया जा सके। आप कह सकते हैं कि इसमें लगने वाला समय निगरानी का संकेतक नहीं है तथा मंत्रालय का नोटिस केवल आकलन समितियों को जवाबदेह बनाने तथा यह सुनिश्चित करने पर आधारित है कि परियोजनाओं में अनावश्यक देरी न हो। परंतु यह इतना आसान नहीं है। तथ्य यह है कि रैंकिंग पर्यावरण आकलन के पहले से तैयार ताबूत में आखिरी कील है। बीते एक दशक या उसके आसपास के समय में एक के बाद एक विभिन्न सरकारों ने व्यवस्थित ढंग से उस निर्णय प्रक्रिया को छिन्नभिन्न किया है जो आकलन या जांच-परख की इजाजत देती थी। यह हास्यास्पद है और मेरी नजर में मंत्रालय के इस निर्देश ने उसकी खुद की बनायी प्रक्रिया व्यवस्था की अवमानना की व्यवस्था कर दी है। पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) की शुरूआत 1994 में हुई थी जब विकास परियोजनाएं कम थीं और प्रक्रिया को किसी तरह की चुनौती नहीं दी जाती थी। सन 2000 के दशक से गड़बड़ी की शुरुआत हुई जब परियोजना निर्माण को जांच पड़ताल की इस व्यवस्था में शामिल किया गया। इसमें दो राय नहीं कि विनिर्माण खासकर बड़े पैमाने पर बनने वाली आवासीय, बुनियादी ढांचा अथवा वाणिज्यिक परियोजनाओं का पर्यावरण पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। उनमें पानी का इस्तेमाल होता है, गंदा पानी उत्पन्न होता है, यातायात बढ़ता है और ठोस कचरा भी निकलता है। दिक्कत यह थी कि पूरी व्यवस्था को कभी उन्नत नहीं बनाया गया ताकि परियोजनाओं के निर्माण के साथ तालमेल बिठाया जा सके। इसकी वजह से परियोजनाओं में देरी होने लगी और लेनदेन की लागत में इजाफा हुआ, दूसरे शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार होने लगा। इसलिए 2006 में मंत्रालय ने काम राज्यों को विकेंद्रीकृत और आउटसोर्स कर दिया। उसने केंद्रीय स्तर की व्यवस्था को राज्य स्तर पर अपनाया तथा राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार गठित किए। परियोजनाओं के लिए ए, बी, बी1 और बी2 जैसी श्रेणियां बनायी गईं। इस दौरान विवेकाधिकार की पूरी गुंजाइश रखी गई। कुल मिलाकर जांच परख की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तथा विकास परियोजनाएं भी पर्यावरण के अनुपालन के मामले में ज्यादा बेहतर नहीं हुईं। कुल मिलाकर ईआईए की कवायद अधिक पेचीदा साबित हुई। मैं ऐसा क्यों कह रही हूं? जरा इस बात पर विचार कीजिए कि मौजूदा प्रक्रिया कितनी खामी से भरी हुई है। परियोजना शुरू करने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह ईआईए को अंजाम देने वाले सलाहकार को पैसे चुकाए। यह बात केंद्र अथवा राज्य के पर्यावरण प्रभाव आकल प्राधिकार द्वारा मंजूर संदर्भों पर आधारित होती है। ए श्रेणी की परियोजनाएं केंद्र के पास जाती हैं जबकि बी श्रेणी की परियोजनाएं राज्यों को जाती हैं। अब ऐसी परियोजनाएं बी 1 (विस्तृत आकलन जरूरी) श्रेणी की हैं या बी 2 (विस्तृत आकलन की जरूरत नहीं) श्रेणी की, यह तय करने का काम राज्यों का है। समिति कार्य क्षेत्र का दायरा तय कर सकती है, ज्यादा सूचना मांग सकती है या उसे खारिज कर सकती है। इसके बाद ईआईए किया जाता है। इसके लिए कम से कम 12 सक्रिय क्षेत्र विशेषज्ञों एवं प्रबंधन तथा निगरानी योजनाओं की आवश्यकता होती है। मसौदा ईआईए अंग्रेजी में है और इसका संक्षिप्त रूप क्षेत्रीय भाषाओं में है। इसे सार्वजनिक मशविरे के लिए प्रस्तुत किया जाता है। सार्वजनिक सुनवाई के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया है जो स्थानीय आपत्तियों की सुनवाई के लिए अहम होगी। इसके बाद मामला आकलन समिति के पास जाता है जिसे मसौदे को परखना होता है, और अधिक सूचना जुटानी होती है और इसे सशर्त स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। सच यह है कि परियोजनाओं को शायद ही कभी नकारा जाता है। हमने जुलाई 2015 से अगस्त 2020 तक प्रस्तुत 3,100 परियोजनाओं का विश्लेषण किया। केवल तीन फीसदी परियोजनाएं ऐसी थीं जिनकी अनुशंसा नहीं की गई। ये परियोजनाएं भी जरूरी सूचनाओं के साथ वापस आ जाएंगी। परंतु इस प्रक्रिया में परियोजना शुरू करने वालों से कई बार कहा जाता है कि वे और अधिक आंकड़े और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। आखिर में, समिति परियोजना को मंजूरी प्रदान करती है और ज्यादातर मामलों में वे कुछ ऐसी शर्तों के साथ खुद को बचा लेते हैं जिनकी शायद कभी निगरानी नहीं की जाएगी। मंजूरी के बाद समितियों को परियोजना के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है। उनका काम मंजूरी के साथ ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद निगरानी का काम मंत्रालय के सीमित कर्मचारियों वाले क्षेत्रीय कार्यालयों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इतने सशक्त नहीं होते हैं कि वे प्रभाव की निगरानी कर सकें क्योंकि यह मंजूरी पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अधीन दी जाती है, न कि हवा या पानी के लिए बने कानूनों के तहत। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दोहराव होता है, जांच की कमी होती है और यह सुनिश्चित करने का कोई इरादा नहीं होता है कि परियोजना क्रियान्वयन के समय पर्यावरण के हितों का ध्यान रखा जाए। ऐसे में जब हम मंजूरियों की इस ध्वस्त व्यवस्था का बचाव करते हैं तो इससे पर्यावरण बनाम विकास की गलत बहस को बढ़ावा मिलता है। हकीकत में पर्यावरण के हित पहले ही हाशिये पर डाले जा चुके हैं और विकास बेलगाम हो चुका है।

Published / 2022-02-09 14:11:43
डॉ गौंझू की रचनाओं में दिखती है झारखंड की संवेदना...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विजय केसरी)। डॉ गिरिधारी राम गौंझू की रचनाओं में झारखंड की संवेदना झलकती है। उनका संपूर्ण जीवन नागपुरी और हिंदी भाषा के उत्थान, विकास व प्रचार प्रसार में बीता था। उनकी रचनाओं में झारखंड की सोंधी महक मिलती है। नागपुरी भाषा के प्रति उनके लगाव को देखते बनता था। डॉ गिरधारी राम गौंझू का जन्म खूंटी स्थित बेलवादाग ग्राम में 5 दिसंबर 1949 को हुआ था। खूंटी में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने एमए, बीएड, एलएलबी और पीएचडी की। अब तक उनकी तीस के लगभग पुस्तकें प्रकाशित हैं। नए शोधार्थियों के लिए उनकी पुस्तकें एक नई राह की ओर मार्ग प्रशस्त करेंगी। बतौर एक प्राध्यापक उन्होंने एक अलग पहचान निर्मित की थी। उनकी सहजता, सरलता मृदुलता सदा विद्यार्थियों व मिलने जुलने वालों को याद आती रहेगी। उन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी जितना काम किया, सदा हिंदी अनुरागियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहेगा। डॉ गिरधारी राम गौंझू का खूंटी जैसे गांव में जन्म लेकर इस मुकाम तक पहुंचना कोई साधारण बात नहीं है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष किया था। विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के पश्चात वे नागपुरी भाषा विकास एवं हिंदी साहित्य सृजन के क्षेत्र में और जोर-शोर से जुट गए थे। 2021 में वे कोरोना महामारी की चपेट में आ गए और सदा सदा के लिए हम लोगों को छोड़ कर चले गए। उनका असमय जाना झारखंड के लिए एक अपूरणीय क्षति के समान है। 73 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने डॉ गिरधारी राम गौंझू को उनके नागपुरी, समग्र भाषा साहित्य सेवा के लिए पद्मश्री पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की। यह खबर जैसे ही झारखंड प्रांत पहुंची, झारखंड के शिक्षाविदों, समाजसेवियों, राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, शोधार्थियों एवं नागपुरी भाषा प्रेमियों ने खुले दिल से प्रशंसा की। गौंझू जी की नागपुरी के साथ हिंदी भाषा में भी समान रूप से पकड़ थी। वे एक शिक्षाविद के साथ समाज सेवी भी थे। वे हमेशा जरूरतमंदों की मदद किया करते थे। वे मित्रों के दुख सुख में हमेशा साथ दिया करते थे। झारखंड की लोक भाषा, कला- संस्कृति, नृत्य- संगीत विकास आदि के प्रति भी उनकी निष्ठा देखते बनती थी। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही नागपुरी और हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए लेखन से नाता जोड़ा लिया था। उनका यह नाता आजीवन बना रहा था। वे नियमित रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में झारखंड की कला संस्कृति,रहन -सहन, भाषा आदि से संबंधित लेख लिखा करते थे। उनकी सामग्रियां रांची सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स सम्मान प्रकाशित होती रहती थी। जहां तक ज्ञात है कि रांची से प्रकाशित हिंदी दैनिक रांची एक्सप्रेस में उनकी पहली रचना प्रकाशित हुई थी। प्रारंभिक दिनों में इनके कई महत्वपूर्ण आलेख इसी पत्र में प्रकाशित हुए थे। सभी लेख बहुत ही महत्वपूर्ण व शोध परक हैं। उनके लेखों का संकलन पुस्तक रूप में आ जाए तो यहां के सुधी पाठकों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक बन जाएगी। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की थी कि झारखंड अलग प्रांत का निर्माण जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था, राज्य की दिशा और दशा अच्छी नहीं है। फलस्वरुप यहां की भाषा, संस्कृति पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। प्रांत की इस दशा पर भी झारखंड के लेखकों को अपनी कलम चलानी चाहिए। उन्होंने राज्य की दिशा और दशा पर भी काफी कुछ लिखा था। उन्होंने समय पर मुझे उक्त सीरीज हेतु लेख भेज दिया था मैंने उनके लेख को सचित्र प्रकाशित किया था। लेख प्रकाशन के बाद उन्होंने मुझे बधाई दी थी। उनसे मेरी जब भी बातचीत हुई, उन्हें झारखंड की नहीं बेहद चिंता थी। झारखंड अलग प्रांत के संघर्ष में उन्होंने सौ से अधिक लेख इस आंदोलन को समर्पित किया था। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। वरिष्ठ पत्रकार संजय कृष्ण जी ने गिरिधारी राम गोंझू के संबंध में ठीक ही लिखा है कि वे एक सहज सरल, मृदुभाषी व्यक्ति थे। उनका अंदर और बाहर एक समान था। वे जब भी किसी से मिलते थे, उनके चेहरे की खुशी देखते बनती थी। वे जितना लिखते थे। उससे कहीं ज्यादा पढ़ते थे। उनकी रचनाओं में गहराई होती है। उनकी रचनाएं लोगों में आशा की किरण पैदा कर देतीं हैं। जब वे मंच से अपनी बातों को रखते थे। उनकी बातें भी गहराई होती थी। वे जिस विषय पर अपनी बातों को रखते थे। बहुत ही तन्मयता के साथ रखते थे। बिल्कुल विषयातर नहीं होते थे। वे गहराई के साथ अपनी बातों को रखते थे। लोग उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनते थे। झारखंड की लोक कला विकास, भाषा विकास और नृत्य विकास के प्रति उनकी रचनाएं निरंतर समय से संवाद करती रहेंगी। उन्हें गर्व था कि उनका जन्म एक झारखंडी परिवार में हुआ। वे झारखंड की रीति रिवाज को सहेजना चाहते थे। इसे आगे बढ़ाना चाहते थे। इस निमित्त उन्होंने असंख्य लेख लिखा जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित है। अब वे उम्र के जिस पड़ाव पर पहुंच चुके थे। उन्होंने लेखों का संकलन और संपादन प्रारंभ कर दिया था। लेकिन उनका यह कार्य अधूरा रह गया। उन्होंने जितना लिखा है, मेरी दृष्टि में पच्चास से अधिक पुस्तकें तैयार हो सकती हैं। लेकिन उनका यह कार्य अधूरा रह गया। झारखंड अलग प्रांत की लड़ाई में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। गिरिधारी राम गौंझू झारखंड के जाने-माने चिर परिचित लेखक थे। उनकी रचनाएं हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, खबर मन्त्र, देशप्राण सहित देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती थी।

Published / 2022-02-08 17:08:40
तेलंगा खड़िया ने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ दुलार कुल्लू)। वीर शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई को गुमला जिला अंतर्गत सिसई थाना के मुरगू ग्राम में हुआ था। उनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ढुलिया खड़िया और माता का नाम पेतो खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया और दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। तेलंगा खड़िया मूरगू ग्राम के जमीनदार तथा पाहन परिवार से संबंध रखते थे। उनके दादाजी सिरू खड़िया बहुत ही धार्मिक, साहित्यिक एवं सुलझे हुए सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। खड़िया भाषा में वीर, साहसी और अधिक बोलने वाले व्यक्ति को तेब्बलंगा कहा जाता है। वीर शहीद तेलंगा खड़िया बचपन से ही बहुत वीर, साहसी, कर्मठ एवं अधिक बोलने वाले थे। यही कारण रहा कि उनका नाम तेब्बलंगा से तेलंगा हुआ। तेलंगा खड़िया बिलुंग गोत्र से संबंध रखते थे। वैसे तो उनकी पढ़ाई लिखाई बहुत ही कम हुई थी, लेकिन वे सरल स्वभाव वाले ईमानदार, मिलनसार एवं कर्मठ समाज सेवी यक्ति थे। तेलंगा खड़िया का मुख्य पेशा कृषि एवं पशुपालन था। घरेलू कार्य को करते हुए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए अपने अनुयायियों को अखाड़े में तीर-धनुष तथा गद्दा चलाने की कला का प्रशिक्षण भी दिया करते थे। ग्राम मूरगू से पूर्व में स्थिति सिसई के अखाड़े में लोगों को एकत्रित कर युद्ध विद्या का प्रशिक्षण दिया करते थे। इनकी सेना की संख्या 9 सौ से 15 सौ तक थी। तेलंगा खड़िया के सैनिकों के संबंध में खड़िया भाषा में एक लोकगीत भी प्रचलित है- तेलंगा भैया बारियो चारियो कोना जाबे। नौ सै कड़म के मलि छोड़ाबे। उपर्युक्त गीत में बताया गया है कि तेलंगा भइया चारो ओर जाइएगा लेकिन नौ सौ सेना को कभी मत छोड़ियेगा। ये नौ सौ सैनिक तो तुम्हारे ही मूल सपना हैं। हे तेलंगा भइया नौ सौ सेना को कभी मत भूलियेगा इन्हें कभी मत छोड़ियेगा। तेलंगा के पिताजी छोटानागपुर के नागवंशी महाराजा रातूगढ़ के भंडारपाल थे। नागवंशी शासन काल में भंडापाल की पदवी बहुत ही इमानदार व्यक्ति को दी जाती थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि खड़िया जनजाति के लोग आरंभ से ही बहुत अधिक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ रहे हैं। तेलंगा खड़िया अपने पिता के साथ कभी-कभी महाराजा के दरबार में जाया करते थे। इस क्रम में सामाजिक एवं राजनीतिक बातों को सुनकर परिपक्व हुए। तेलंगा खड़िया आरंभ से ही शोषण और अत्याचार के सतत विरोधी थे। इससे मुक्ति के लिए वे गांव-गांव घूमकर जागृति उत्पन्न करने लगे। गांवों में जाकर ग्रामजूरी पंचायत की स्थापना करने लगे। उन्होंने 13 ग्रामजूरी पंचायत का गठन किया और अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए बिगूल फूंका। उनके द्वारा गठित 13 ग्रामजूरी की सूची भी अनुसंधान के बाद उपलब्ध हो चुका है। ये हैं- ग्राम मूरगाू सिसई, ग्रामजूरा, ग्राम डाइगढ़ नागर थाना सिसई, ग्राम देठौली थाना गुमला, ग्राम दुन्दरिया थाना गुमला, सोसो थाना गुमला, नीमटोली थाना गुमला, ग्राम बघिमा थाना पालकोट, ग्राम नाथपुर थाना पालकोट, ग्राम कुम्हारी थाना बसिया, ग्राम बेन्दोरा थाना चैनपुर, ग्राम कोलेबिरा थाना कोलेबिरा, ग्राम महाबुआंग थाना बानो। माना जाता है कि इसके अतिरिक्त भी ग्रामजूरी रहे होंगे जो अभी अज्ञात हैं। एक बार तेलंगा जब बसिया थाना में ग्रामजूरी पंचायत का गठन कर रहे थे तभी उन्हें अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तार करने के बाद उन्हें लोहरदगा जिला मुख्यालय के जेल में बंद कर दिया गया था। उन्हें पकड़वाने में जमीनदरों का हाथ था। इसका वर्णन भी खड़िया लोकगीत में मिलता है। यह लोकगीत है- लोहारदगाते जोरी बेरी ओबुसुतेमोय, साहेब हुकुम तेरोअ, जोरी बेरी ओबसुतेमोय, कटा रो ती, ते जोरी बेरी ओबसुतेमोय।। इस गीत में कहा गया है कि लोहरदगा में जोड़ा भर बेड़ी (हथकड़ी) पहनाते हैं। यह हुकूम साहब देते हैं। हाथ और पांव में जोड़ा भर बेड़ी पहनाते हैं। लोहरदगा जेल में कुछ दिन रखने के बाद तेलंगा खड़िया को कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि उन्हें 14 साल की कठोर सजा सुनायी गयी थी। इसका उल्लेख खड़िया लोककथा एवं लोकगीतों में भी मिलता है। एक गीत उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है- कहां कर राइज राजा , कहां का हिरा राजा, राजा भाई कलिकत्ता तेलंगा का डेरा राजा भाई कलिकत्ता तेंलेंगा का डेरा।। जसपुर कर राइज राजा नागपुरी कर हिरा राजा भाई कलिकता ..... बुडु कर कर राइज राजा, राजा भाईकलि ... पांच भाषा पांचों परगना, राजी तोरा के तेलेंगा न डोले देबे।। कलकत्ता जेल से छूटने के बाद तेलेंगा पुन: अपने गांव लौट आये और सिसई अखाड़े में अपने समर्थकों से मिले। आंदोलन के लिए विचार-विमर्श किये और फिर नये सिरे से उलगुलान करने में लग गये। तेलेंगा खड़िया अंग्रेजी हुकूमत को भारत से उखाड़ फेकने के लिए अजीवन संघर्ष किये। स्वतंत्रता आंदोलन उनके द्वारा दी गयी कुबार्नी को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। आज हम आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम मना रहे हैं, झारखंड की धरती में जन्मे तेलेंगा खड़िया जैसे प्रत्येक वीर सपूतों के संघर्षपूर्ण जीवन को संकलित कर प्रकाशित कराना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अंत में प्रेमधवन द्वारा शहीद फिल्म में लिखित गीत की पंक्तियां सहज ही याद आ जाती है- जलते भी गए कहते भी गये आजादी के परवाने जीना तो उसी का जीना है जो मरना देश पर जाने।। (लेखक मानवशास्त्री और खड़िया समाज के चिंतक हैं।)

Published / 2022-02-07 15:56:38
नागपुरी के यशस्वी कवि प्रफुल्ल राय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। झारखंड की रत्नगर्भा भूमि में जन्में प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी भाषा, साहित्य जगत के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र थे, जिनका कार्य हम सभी के लिए अनुकरणीय है। आज प्रफुल्ल कुमार राय को छोड़ कर नागपुरी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता है। नागपुरी भाषा साहित्य के विकास के लिए उन्होंने अथक श्रम किया। साहित्यकार के साथ-साथ प्रफुल्ल कुमार राय गायक, कुशल नेतृत्वकर्ता एवं प्रशासक भी थे। नागपुरी भाषा परिषद 1960 की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके वे सचिव भी थे। प्रफुल्ल कुमार राय अपनी मातृ भाषा नागपुरी के उत्थान के लिए वे अजीवन समर्पित रहे। प्रफुल्ल कुमार राय ने 1980 ई में जोहार नामक पत्रिका का संपादन किया। 1957 ई. में आकाशवाणी राँची केन्द्र की स्थापना के साथ ही जुड़े। उन्होंने आकाशवाणी राँची से नागपुरी गायन की परंपरा को आगे बढ़ाया। वे आधुनिक नागपुरी साहित्य के अग्रदूत थे। सोनझइर और रिंगचिंगिया नामक पुस्तक में उनकी कविताएं संकलित हैं। संकर गोटेक जिनगी प्रफुल्ल कुमार राय द्वारा लिखित नागपुरी की पहली उपन्यास है। उन्होंने डहर कविता से नागपुरी साहित्य में आधुनिक कविता को स्थापित किया। डहर उनकी पहली कविता है। इस कविता के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय संकट के समय एकता को बल प्रदान किया है। इस कविता की पृष्ठभूमि भारत-चीन युद्ध एवं भारत पाकिस्तान युद्ध रहा है। प्रफुल्ल कुमार राय ऐसे समय में उत्साह एवं जोश के साथ कह उठते हैं- एक राग दे हमरे एक हइ। एक राग दे हमरे जवान हइ। आउर सउबे जोर से दे- हमरे इंसान ही आउर सेहे तेहें जल्दी झगरा झंझट नई चाही,आउर सेहे तेहें कखनों चुप रइह जाही लेकिन इकर का मतलब हामरे डेरातही आउर अपमान खाय के भी हामरे सेराल हइहर्गिज नहीं कहियो नहीं। डहर नामक इस कविता के माध्यम से कवि प्रफुल्ल कुमार राय दार्शनिक ढंग से आधुनिकता को सामने रखते हैं। उनकी कविताओं में आधुनिक सोच और जोश का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आब नागपुरी चुप नी रही जैसी कविता के माध्यम से उन्होंने नागपुरी भाषियों को अपने हक अधिकार के लिए आगे आने का आह्वान किया। सोनझइर पुस्तक में संकलित लहरा नामक कहानी की कथा मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं को आकर्षक ढंग से व्यक्त करती है। वर्षा ऋतु के समय मानव मन उठने वाली वासनात्मक लहर का अंकन इस कहानी में बड़े ही कलात्मक ढंस से हुआ है। सोनझइर, लहरा, अवसरे नइ मिले बुझू आउर किलकिला, बिन बातक बात, एक चकता रउद, तिरलोचन आउर रिबेनटाप, पुस कर राइत, भाँपल कांदा, दांत, तिरफला, कंचन, सावित्री, बिसाहा, पंच, कांटी जैसी प्रसिद्ध कहानियाँ नागपुरी कहानी साहित्य के रत्न हैं। 2013 में लिखित संकर गोटेक जिनगी उपन्यास प्रफुल्ल कुमार राय की अमर कृति है। इस उपन्यास में उन्होंने 1934 से 1989 ई. तक के छोटानागपुर के परिवेश का चित्रण किया है। मेंजुर पांइख प्रफुल्ल कुमार राय की अप्रकाशित उपन्यास है। वे नागपुरी के युग प्रवर्तक लेखक थे। 1967 में प्रकाशित सोनझइर इनकी पहली प्रकाशित पुस्तक है और चिंगचिंगिया दूसरी पुस्तक है। कांटी, सिलइठ, गरम कोट, टफठेन, चांद आउर सुरूज, सुलेमान, नसीब, बेरा सिरे, तीन बात आदि कहानियाँ आकाशवाणी राँची से प्रसारित हुई है। बरता आउर नागपुरी गीत, बरखा बूँद, नागपुरी भासा कर उदगम उनकी प्रमुख निबंध हैं। ठाकुर विश्वनाथ शाही नागपुरी अनुदित और डोम्बारी पहार उनकी नाटक है। सहजीना, बेतला यात्रा और नगड़ी सम्मेलन उनकी यात्रा संस्मरण रचनाएँ हैं। मुक्त छंद इनकी नागपुरी कविताएँ पद्य साहित्य में मील का पत्थर साबित हुई इैं। बहथी बोहाथी, जनजाइत, तजबीज, गाँधी, अंधार राती, विभोर, फागुन-फागुन, बिसनाथ साही, उनकी प्रसद्धि कविताएँ हैं। शकुन्तला, चकित, पाइलकोट, कसमकस, बिजोग, नागपुर वंदना, छोट परिवार, पंद्रह अगस्त जैसी कुछ फुटकर गीतों की रचना भी उन्होंने की है। प्रफुल्ल कुमार राय को नागपुरी पद्य साहित्य का अनमोल मोती माना जाता है। वे नागपुरी के ऐसे गौरव शिखर हैं, जिसे काल का दीमक भी नहीं खा सकता है और इतिहास हीरे की तरह संजोये रखता है। प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी साहित्य के यशस्वी, लोकप्रिय साहित्य स्रष्टा, महान गायक और कुशल मार्गदर्शक थे। अपनी जिजिविषा से उन्होंने नागपुरी की गरिमा को आकाश मंडल तक विस्तृत किया। वे नागपुरी के यशस्वी कवि और गद्यकार थे। ऐसे महान रचनाकार का जन्म 8 फरवरी 1926 में हुआ था। इनका बचपन गरीबी में व्यतीत हुआ। उसके बावजूद उन्होंने गरीबी को मात देते हुए मैट्रिक की परीक्षा की। तत्पश्चात 12 फरवारी 1945 ई में गुमला के कलेक्टरी में प्रॉवेशनर के रूप में सरकारी नौकरी में योगदान दिया। इस नौकरी में वे 18 फरवरी 1959 तक कार्य किये। 19 फरवरी 1959 ई. को उन्होंने सीसीएल में सहायक के पद पर योगदान दिया और अपने मेहनत, लगन के बदौलत उच्च अधिकारी पद को प्राप्त किया। 1 मार्च 1984 ई. को वे सीसीएल के उच्च अधिकारी पद से सेवानिवृत हुए। नौकरी के क्रम में अपनी सादगी, वाकपटुता, कार्य के प्रति समर्पण व मिलनसार व्यक्तित्व के कारण प्रफुल्ल कुमार राय अपने सह-कर्मियों के बीच लोकप्रिय रहे। उनमें कार्य करने की लगन थी। वे सेवानिवृति के बाद राँची न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य करते रहे। साथ ही नागपुरी भाषा और साहित्य की समृद्धि के लिए कलम चलाते रहे। 7 फरवरी 1991 ई को प्रफुल्ल कुमार राय भले ही इस संसार को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गये लेकिन अपनी रचना एवं कर्म के कारण वे नागपुरी और झारखंडी समाज के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे। तुलसीदास के रामचरितमानस की इस पंक्ति से प्रभावित प्रफुल्ल कुमार राय ने इसे अजीवन अमल भी किया- कर्म प्रधान विश्वास करि राखा। जो जस करै तो तस चाखा।। (लेखक नागपुरी विभाग गोस्नर कॉलेज रांची के व्याख्याता हैं।)

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