विचार

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Published / 2022-02-08 17:08:40
तेलंगा खड़िया ने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ दुलार कुल्लू)। वीर शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई को गुमला जिला अंतर्गत सिसई थाना के मुरगू ग्राम में हुआ था। उनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ढुलिया खड़िया और माता का नाम पेतो खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया और दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। तेलंगा खड़िया मूरगू ग्राम के जमीनदार तथा पाहन परिवार से संबंध रखते थे। उनके दादाजी सिरू खड़िया बहुत ही धार्मिक, साहित्यिक एवं सुलझे हुए सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। खड़िया भाषा में वीर, साहसी और अधिक बोलने वाले व्यक्ति को तेब्बलंगा कहा जाता है। वीर शहीद तेलंगा खड़िया बचपन से ही बहुत वीर, साहसी, कर्मठ एवं अधिक बोलने वाले थे। यही कारण रहा कि उनका नाम तेब्बलंगा से तेलंगा हुआ। तेलंगा खड़िया बिलुंग गोत्र से संबंध रखते थे। वैसे तो उनकी पढ़ाई लिखाई बहुत ही कम हुई थी, लेकिन वे सरल स्वभाव वाले ईमानदार, मिलनसार एवं कर्मठ समाज सेवी यक्ति थे। तेलंगा खड़िया का मुख्य पेशा कृषि एवं पशुपालन था। घरेलू कार्य को करते हुए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए अपने अनुयायियों को अखाड़े में तीर-धनुष तथा गद्दा चलाने की कला का प्रशिक्षण भी दिया करते थे। ग्राम मूरगू से पूर्व में स्थिति सिसई के अखाड़े में लोगों को एकत्रित कर युद्ध विद्या का प्रशिक्षण दिया करते थे। इनकी सेना की संख्या 9 सौ से 15 सौ तक थी। तेलंगा खड़िया के सैनिकों के संबंध में खड़िया भाषा में एक लोकगीत भी प्रचलित है- तेलंगा भैया बारियो चारियो कोना जाबे। नौ सै कड़म के मलि छोड़ाबे। उपर्युक्त गीत में बताया गया है कि तेलंगा भइया चारो ओर जाइएगा लेकिन नौ सौ सेना को कभी मत छोड़ियेगा। ये नौ सौ सैनिक तो तुम्हारे ही मूल सपना हैं। हे तेलंगा भइया नौ सौ सेना को कभी मत भूलियेगा इन्हें कभी मत छोड़ियेगा। तेलंगा के पिताजी छोटानागपुर के नागवंशी महाराजा रातूगढ़ के भंडारपाल थे। नागवंशी शासन काल में भंडापाल की पदवी बहुत ही इमानदार व्यक्ति को दी जाती थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि खड़िया जनजाति के लोग आरंभ से ही बहुत अधिक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ रहे हैं। तेलंगा खड़िया अपने पिता के साथ कभी-कभी महाराजा के दरबार में जाया करते थे। इस क्रम में सामाजिक एवं राजनीतिक बातों को सुनकर परिपक्व हुए। तेलंगा खड़िया आरंभ से ही शोषण और अत्याचार के सतत विरोधी थे। इससे मुक्ति के लिए वे गांव-गांव घूमकर जागृति उत्पन्न करने लगे। गांवों में जाकर ग्रामजूरी पंचायत की स्थापना करने लगे। उन्होंने 13 ग्रामजूरी पंचायत का गठन किया और अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए बिगूल फूंका। उनके द्वारा गठित 13 ग्रामजूरी की सूची भी अनुसंधान के बाद उपलब्ध हो चुका है। ये हैं- ग्राम मूरगाू सिसई, ग्रामजूरा, ग्राम डाइगढ़ नागर थाना सिसई, ग्राम देठौली थाना गुमला, ग्राम दुन्दरिया थाना गुमला, सोसो थाना गुमला, नीमटोली थाना गुमला, ग्राम बघिमा थाना पालकोट, ग्राम नाथपुर थाना पालकोट, ग्राम कुम्हारी थाना बसिया, ग्राम बेन्दोरा थाना चैनपुर, ग्राम कोलेबिरा थाना कोलेबिरा, ग्राम महाबुआंग थाना बानो। माना जाता है कि इसके अतिरिक्त भी ग्रामजूरी रहे होंगे जो अभी अज्ञात हैं। एक बार तेलंगा जब बसिया थाना में ग्रामजूरी पंचायत का गठन कर रहे थे तभी उन्हें अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तार करने के बाद उन्हें लोहरदगा जिला मुख्यालय के जेल में बंद कर दिया गया था। उन्हें पकड़वाने में जमीनदरों का हाथ था। इसका वर्णन भी खड़िया लोकगीत में मिलता है। यह लोकगीत है- लोहारदगाते जोरी बेरी ओबुसुतेमोय, साहेब हुकुम तेरोअ, जोरी बेरी ओबसुतेमोय, कटा रो ती, ते जोरी बेरी ओबसुतेमोय।। इस गीत में कहा गया है कि लोहरदगा में जोड़ा भर बेड़ी (हथकड़ी) पहनाते हैं। यह हुकूम साहब देते हैं। हाथ और पांव में जोड़ा भर बेड़ी पहनाते हैं। लोहरदगा जेल में कुछ दिन रखने के बाद तेलंगा खड़िया को कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि उन्हें 14 साल की कठोर सजा सुनायी गयी थी। इसका उल्लेख खड़िया लोककथा एवं लोकगीतों में भी मिलता है। एक गीत उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है- कहां कर राइज राजा , कहां का हिरा राजा, राजा भाई कलिकत्ता तेलंगा का डेरा राजा भाई कलिकत्ता तेंलेंगा का डेरा।। जसपुर कर राइज राजा नागपुरी कर हिरा राजा भाई कलिकता ..... बुडु कर कर राइज राजा, राजा भाईकलि ... पांच भाषा पांचों परगना, राजी तोरा के तेलेंगा न डोले देबे।। कलकत्ता जेल से छूटने के बाद तेलेंगा पुन: अपने गांव लौट आये और सिसई अखाड़े में अपने समर्थकों से मिले। आंदोलन के लिए विचार-विमर्श किये और फिर नये सिरे से उलगुलान करने में लग गये। तेलेंगा खड़िया अंग्रेजी हुकूमत को भारत से उखाड़ फेकने के लिए अजीवन संघर्ष किये। स्वतंत्रता आंदोलन उनके द्वारा दी गयी कुबार्नी को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। आज हम आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम मना रहे हैं, झारखंड की धरती में जन्मे तेलेंगा खड़िया जैसे प्रत्येक वीर सपूतों के संघर्षपूर्ण जीवन को संकलित कर प्रकाशित कराना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अंत में प्रेमधवन द्वारा शहीद फिल्म में लिखित गीत की पंक्तियां सहज ही याद आ जाती है- जलते भी गए कहते भी गये आजादी के परवाने जीना तो उसी का जीना है जो मरना देश पर जाने।। (लेखक मानवशास्त्री और खड़िया समाज के चिंतक हैं।)

Published / 2022-02-07 15:56:38
नागपुरी के यशस्वी कवि प्रफुल्ल राय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। झारखंड की रत्नगर्भा भूमि में जन्में प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी भाषा, साहित्य जगत के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र थे, जिनका कार्य हम सभी के लिए अनुकरणीय है। आज प्रफुल्ल कुमार राय को छोड़ कर नागपुरी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता है। नागपुरी भाषा साहित्य के विकास के लिए उन्होंने अथक श्रम किया। साहित्यकार के साथ-साथ प्रफुल्ल कुमार राय गायक, कुशल नेतृत्वकर्ता एवं प्रशासक भी थे। नागपुरी भाषा परिषद 1960 की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके वे सचिव भी थे। प्रफुल्ल कुमार राय अपनी मातृ भाषा नागपुरी के उत्थान के लिए वे अजीवन समर्पित रहे। प्रफुल्ल कुमार राय ने 1980 ई में जोहार नामक पत्रिका का संपादन किया। 1957 ई. में आकाशवाणी राँची केन्द्र की स्थापना के साथ ही जुड़े। उन्होंने आकाशवाणी राँची से नागपुरी गायन की परंपरा को आगे बढ़ाया। वे आधुनिक नागपुरी साहित्य के अग्रदूत थे। सोनझइर और रिंगचिंगिया नामक पुस्तक में उनकी कविताएं संकलित हैं। संकर गोटेक जिनगी प्रफुल्ल कुमार राय द्वारा लिखित नागपुरी की पहली उपन्यास है। उन्होंने डहर कविता से नागपुरी साहित्य में आधुनिक कविता को स्थापित किया। डहर उनकी पहली कविता है। इस कविता के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय संकट के समय एकता को बल प्रदान किया है। इस कविता की पृष्ठभूमि भारत-चीन युद्ध एवं भारत पाकिस्तान युद्ध रहा है। प्रफुल्ल कुमार राय ऐसे समय में उत्साह एवं जोश के साथ कह उठते हैं- एक राग दे हमरे एक हइ। एक राग दे हमरे जवान हइ। आउर सउबे जोर से दे- हमरे इंसान ही आउर सेहे तेहें जल्दी झगरा झंझट नई चाही,आउर सेहे तेहें कखनों चुप रइह जाही लेकिन इकर का मतलब हामरे डेरातही आउर अपमान खाय के भी हामरे सेराल हइहर्गिज नहीं कहियो नहीं। डहर नामक इस कविता के माध्यम से कवि प्रफुल्ल कुमार राय दार्शनिक ढंग से आधुनिकता को सामने रखते हैं। उनकी कविताओं में आधुनिक सोच और जोश का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आब नागपुरी चुप नी रही जैसी कविता के माध्यम से उन्होंने नागपुरी भाषियों को अपने हक अधिकार के लिए आगे आने का आह्वान किया। सोनझइर पुस्तक में संकलित लहरा नामक कहानी की कथा मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं को आकर्षक ढंग से व्यक्त करती है। वर्षा ऋतु के समय मानव मन उठने वाली वासनात्मक लहर का अंकन इस कहानी में बड़े ही कलात्मक ढंस से हुआ है। सोनझइर, लहरा, अवसरे नइ मिले बुझू आउर किलकिला, बिन बातक बात, एक चकता रउद, तिरलोचन आउर रिबेनटाप, पुस कर राइत, भाँपल कांदा, दांत, तिरफला, कंचन, सावित्री, बिसाहा, पंच, कांटी जैसी प्रसिद्ध कहानियाँ नागपुरी कहानी साहित्य के रत्न हैं। 2013 में लिखित संकर गोटेक जिनगी उपन्यास प्रफुल्ल कुमार राय की अमर कृति है। इस उपन्यास में उन्होंने 1934 से 1989 ई. तक के छोटानागपुर के परिवेश का चित्रण किया है। मेंजुर पांइख प्रफुल्ल कुमार राय की अप्रकाशित उपन्यास है। वे नागपुरी के युग प्रवर्तक लेखक थे। 1967 में प्रकाशित सोनझइर इनकी पहली प्रकाशित पुस्तक है और चिंगचिंगिया दूसरी पुस्तक है। कांटी, सिलइठ, गरम कोट, टफठेन, चांद आउर सुरूज, सुलेमान, नसीब, बेरा सिरे, तीन बात आदि कहानियाँ आकाशवाणी राँची से प्रसारित हुई है। बरता आउर नागपुरी गीत, बरखा बूँद, नागपुरी भासा कर उदगम उनकी प्रमुख निबंध हैं। ठाकुर विश्वनाथ शाही नागपुरी अनुदित और डोम्बारी पहार उनकी नाटक है। सहजीना, बेतला यात्रा और नगड़ी सम्मेलन उनकी यात्रा संस्मरण रचनाएँ हैं। मुक्त छंद इनकी नागपुरी कविताएँ पद्य साहित्य में मील का पत्थर साबित हुई इैं। बहथी बोहाथी, जनजाइत, तजबीज, गाँधी, अंधार राती, विभोर, फागुन-फागुन, बिसनाथ साही, उनकी प्रसद्धि कविताएँ हैं। शकुन्तला, चकित, पाइलकोट, कसमकस, बिजोग, नागपुर वंदना, छोट परिवार, पंद्रह अगस्त जैसी कुछ फुटकर गीतों की रचना भी उन्होंने की है। प्रफुल्ल कुमार राय को नागपुरी पद्य साहित्य का अनमोल मोती माना जाता है। वे नागपुरी के ऐसे गौरव शिखर हैं, जिसे काल का दीमक भी नहीं खा सकता है और इतिहास हीरे की तरह संजोये रखता है। प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी साहित्य के यशस्वी, लोकप्रिय साहित्य स्रष्टा, महान गायक और कुशल मार्गदर्शक थे। अपनी जिजिविषा से उन्होंने नागपुरी की गरिमा को आकाश मंडल तक विस्तृत किया। वे नागपुरी के यशस्वी कवि और गद्यकार थे। ऐसे महान रचनाकार का जन्म 8 फरवरी 1926 में हुआ था। इनका बचपन गरीबी में व्यतीत हुआ। उसके बावजूद उन्होंने गरीबी को मात देते हुए मैट्रिक की परीक्षा की। तत्पश्चात 12 फरवारी 1945 ई में गुमला के कलेक्टरी में प्रॉवेशनर के रूप में सरकारी नौकरी में योगदान दिया। इस नौकरी में वे 18 फरवरी 1959 तक कार्य किये। 19 फरवरी 1959 ई. को उन्होंने सीसीएल में सहायक के पद पर योगदान दिया और अपने मेहनत, लगन के बदौलत उच्च अधिकारी पद को प्राप्त किया। 1 मार्च 1984 ई. को वे सीसीएल के उच्च अधिकारी पद से सेवानिवृत हुए। नौकरी के क्रम में अपनी सादगी, वाकपटुता, कार्य के प्रति समर्पण व मिलनसार व्यक्तित्व के कारण प्रफुल्ल कुमार राय अपने सह-कर्मियों के बीच लोकप्रिय रहे। उनमें कार्य करने की लगन थी। वे सेवानिवृति के बाद राँची न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य करते रहे। साथ ही नागपुरी भाषा और साहित्य की समृद्धि के लिए कलम चलाते रहे। 7 फरवरी 1991 ई को प्रफुल्ल कुमार राय भले ही इस संसार को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गये लेकिन अपनी रचना एवं कर्म के कारण वे नागपुरी और झारखंडी समाज के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे। तुलसीदास के रामचरितमानस की इस पंक्ति से प्रभावित प्रफुल्ल कुमार राय ने इसे अजीवन अमल भी किया- कर्म प्रधान विश्वास करि राखा। जो जस करै तो तस चाखा।। (लेखक नागपुरी विभाग गोस्नर कॉलेज रांची के व्याख्याता हैं।)

Published / 2022-02-06 13:28:05
देश का स्वर विलीन...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (एनके मुरलीधर)। देश की आवाज स्वर कोकिला के जाने से वह आवाज संसार से चली गयी जिसका कोई जोड़ दुनिया में नहीं थी। उन्होंने कभी संगीत को व्यापार की दृष्टि से नही देखा। इतनी विविधिता वाला गायन का एक इतिहास संसार से चला गया। गायन की विविधता और श्रेष्ठ शैली के साथ संगीत की देवी स्वरूप लता जी ने जो लकीर खींच दी उसे सृष्टि के सजृनहार का एक उपहार मानकर हम सब अनंत काल तक संजोकर रखेंगे। एक दिव्य ज्योंति जो संगी और कला के क्षेत्र को लभगभ 80 साल तक आलोकित करती रही। जीवन संघर्ष के साथ सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई संगीतकारों ने तो आपको शुरू-शुरू में पतली आवाज के कारण काम देने से साफ मना कर दिया था। उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहां के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा। लता जी देश का स्वर थी, आवाज थी। अब यह स्वर विलीन हो गया। लता मंगेशकर जिस प्रकार दुनिया की संगीत प्रेमियों के लिये आस्था और समर्पण का राह आलोकित करती रहीं हैं उसका दूसरा कोई विकल्प की कल्पना नहीं की जा सकती है। उनका कद इतना बड़ा था कि पूरा राष्ट्र की के स्वर का प्रतिक बन गयी थी। आज हम कह सकते हैं कि देश का स्वर विलीन हो गया। यूनिवर्स ने देश को जो स्वर उपहार में दिया था उसे वापस ले लिया। आने वाली पीढ़ी शायद लता जी के कृति को विश्वास ही न कर सके। देश रत्न, भारत कोकिला की आवाज मानों राष्ट्र की संस्कृति थी जो अब शून्य में विलीन हो गयी है। पूरा राष्ट्र प्रकृति के नियम को लेकर शोकाकुल है। देश को अपनी लता दी पर अभिमान था, अभिमान है। देश के इतिहास में कभी न मिटने वाली हस्ताक्षर हैं लता दी।

Published / 2022-02-05 16:05:40
खत्म करें भेदभाव, देश की आधी आबादी को भी है जॉब का हक...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ रेणु सिंह)। राजपथ पर सीमा भवानी का करतब देखकर पूरे देश का हौसला बढ़ा जब बीएसएफ की महिला बटालियन ने हैरत अंगेज कारनामें दिखलाये। इस साल के शुरू में खबर आई कि सार्वजनिक क्षेत्र की एक दिग्गज कंपनी तेल और प्राकृतिक गैस निगम के इतिहास में पहली बार एक महिला ने अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक का कार्य भार संभाला है। इसके पहले देश के कुछ बैंकों में सर्वोच्च पद पर भी महिलाएं रही हैं। छिटपुट ऐसे और उदाहरण भी हैं। इन सबसे लग सकता है कि भारत के कार्यबल में महिलाओं को वह स्थान हासिल है जिसकी कि वे हकदार हैं, पर यहां जो उदाहरण गए हैं, वे नियम कम अपवाद ज्यादा हैं। जैसे तमाम और मामलों में भारत कई विकासशील देशों से पीछे है, वैसे ही कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भी देश की स्थिति उत्साहजनक नहीं है। देश जिन बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है, उनमें बेरोजगारी निश्चित रूप से एक है। देश में बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हैं, पर इन बेरोजगार लोगों में महिलाओं का अनुपात ज्यादा है। और तो और, सभी रोजगारशुदा लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने की बजाय घटती जा रही है। चाहे सामाजिक समानता के नजरिए से देखें या मानवाधिकारों के नजरिए से, देश के कार्यबल में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व न होना एक गंभीर चिंता का विषय है। देश को आजादी मिलने के साथ जिस भारत की कल्पना की गई थी, करीब पचहत्तर वर्ष बाद की स्थिति भी इससे मेल नहीं खाती। लैंगिक समानता के मामले में भी हम अभी पीछे हैं। इस असमानता के कारणों की तलाश में हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। समाज का पुरुष प्रधान स्वरूप बना हुआ है और कहीं न कहीं यह दृष्टिकोण भी मौजूद है कि महिलाओं को उनका अधिकार देकर उन पर अहसान किया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक और व्यवहार विज्ञानी यह बात बार-बार दोहराते रहे हैं कि प्रतिभा पुरुष और महिला में भेद नहीं करती। किसी भी प्रयोग में यह नहीं सिद्ध हुआ है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम बुद्धिमान होती हैं, बल्कि कई ऐसी भूमिकाएं बताई गई हैं जिनमें महिलाओं का प्रदर्शन बेहतर पाया गया है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जिनमें महिलाओं की क्षमता पर विश्वास कर उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए और उन्होंने इसे बखूबी पूरा कर के दिखाया। बिना किसी आधार के महिलाओं को कमजोर अथवा अक्षम मान लेना कहीं न कहीं अपरिपक्व सोच को ही इंगित करता है। यह सोच बदल रही है, पर उस गति से नहीं जितनी कि होनी चाहिए। महिलाओं की स्थिति में व्यापक सुधार तभी होगा जब यह सोच भी पूरी तरह से सुधर जाए। यदि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी जनसंख्या में उनके अनुपात के अनुरूप नहीं है तो मुख्यत: यह सामाजिक कारणों से है। तमाम शोधों और अध्ययनों में बताया गया कि किसी भी देश की समृद्धि तथा उसकी अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने के लिए उसमें महिलाओं की पूरी भागीदारी होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ का भी कहना है कि सतत विकास तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए लैंगिक समानता जरूरी है। सभी प्रगतिशील संगठनों में मानव संसाधन के लिए विविधीकरण तथा समावेशन संबंधी नीतियां लागू की हैं। इसका मकसद जनशक्ति में सभी वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व और कमजोर लोगों को भी मौका देने से है। इसके अच्छे परिणाम निकले हैं और कारपोरेट जगत में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, पर देश में उपलब्ध कार्यबल से सीमित संख्या में ही लोगों को बड़ी कंपनियों तथा फर्मों में रोजगार मिल सकता है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में रोजगार नहीं है। विगत दो दशकों में भारत में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति बेहतर हुई है। प्रजनन दर में गिरावट आई है। विश्व भर में इन कारणों से पारिश्रमिक युक्त कार्यों में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि होना देखा गया है, पर भारत में ऐसा नहीं हो रहा। कार्यबल में जितनी महिलाएं जुड़ रही हैं, उससे कहीं अधिक कार्यबल से बाहर आ रही हैं। वैसे देखा जाए तो बैंकों में ठीक-ठाक संख्या में महिलाएं कार्य करती दिख जाएंगीं, महानगरों तथा बड़े शहरों के रेलवे काउंटरों पर भी उनकी थोड़ी बहुत मौजूदगी है, कुछ हवाई जहाज भी उड़ा रही हैं, पर महिलाएं बस कंडक्टर, टैक्सी और आटो रिक्शा चालक जैसी भूमिकाओं में शायद ही दिखती हैं। बीते समय में भारत में ई-कारोबार का काफी विस्तार हुआ है। घर बैठे सामान, जिसमें तैयार खाना भी शामिल है, मंगाने वालों में पुरुष भी हैं और महिलाएं भी। लेकिन ऐसा कभी नहीं देखने को मिलता कि सामान घर पर पहुंचाने वाली एक महिला हो। कारखानों में भी चाहे वहां गाड़ियां बनती हों अथवा उर्वरक जैसी कोई अन्य सामग्री, महिलाओं की संख्या नगण्य ही है। हां, ऐसी तस्वीरें जरूर दिख जाती हैं जिनमें महिलाएं घड़ी या मोबाइल फोन फैक्टरी में काम कर रही होती हैं। पर कुल मिला कर विनिर्माण क्षेत्र में नियोजित महिलाओं की संख्या काफी कम है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कुछ वर्ष पहले एक महत्त्वपूर्ण आदेश जारी कर तीन सौ करोड़ रुपए सालाना बिक्री वाली सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक स्वतंत्र महिला निदेशक का होना अनिवार्य कर दिया था। इसके अलावा बाजार पूंजीकरण के हिसाब से देश की शीर्ष एक हजार सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक महिला सदस्य को नियुक्त करने की अनिवार्यता भी की गई थी, जो स्वतंत्र निदेशक भी हो। लेकिन इन अपेक्षाओं को पूरा करने कंपनियों को काफी मुश्किलें आर्इं। कई कंपनियां तो इसके लिए मन से तैयार नहीं थीं और उन्होंने खानापूरी करने के लिए इस आदेश का पालन किया तो कुछ कंपनियों के प्रवर्तकों ने अपने सगे संबंधियों में से किसी महिला को निदेशक बना कर छुट्टी पा ली। सेबी का यह आदेश कंपनियों के प्रबंधन वर्ग में लैंगिक विविधता लाने के लिए था, पर आदेश के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में कई स्तरों पर साबित हो गया कि कई कंपनियां नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी के प्रति कितनी उदासीन हैं और साथ ही यह भी कि इतनी विशाल आबादी वाले देश में आसानी से इतनी महिलाएं नहीं मिल सकीं जिन्हें निदेशक नियुक्त किया जा सके। व्यक्ति हो या देश, उसकी सफलता इसमें मानी जाती है कि उसमें निहित संभावनाएं उभर कर आएं और इन संभावनाओं का भरपूर उपयोग हो। यदि कार्यबल में महिलाओं के लिए नए द्वार खुलते हैं तो इससे तमाम महिलाओं में निहित संभावनाओं को फलीभूत करने का मार्ग प्रशस्त होगा और हम अपने राष्ट्र की आबादी में मौजूद संभावनाओं का लाभ उठा सकेंगे। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को नए सिरे से आगे आना होगा।

Published / 2022-02-04 14:17:50
अलग झारखंड राज्य के अटल आंदोलनकारी थे लाल रणविजय नाथ शाहदेव

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। स्वतंत्रता तेहें चाही लाल लहूक धार जैसी देश-भक्ति से ओत-प्रोत कविता रचने वाले नागपुरी कवि, गीतकार और आंदोलनकारी लालरण विजयनाथ शाहदेव ने झारखंड राज्य के पुनर्गठन में सक्रिय भूमिका निभायी थी। उनके मन में अलग राज्य के लिए आंदोलन करने की प्रबल इच्छा खरसावां की शहादत भूमि से जागृत हुई थी। जब वे अपने पिताजी पालकोट गढ़ के राजा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के साथ 1952 ई. में सरायकेला खरसावां शहीद स्थल देखने गये थे। वहीं पर शहीद स्थल की पावन माटी को मुट्ठी में लेकर कसम खायी कि झारखंडियों के लिए अलग राज्य की लड़ाई लडेंगे। इस बीच मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के घर अक्सर राजाडेरा करमटोली आया करते थे। अंतत: उनसे प्रभावित होकर औपचारिक रूप से झारखंड पार्टी में 1957 ई. में शामिल हुए और झारखंड आंदोलन में कूद पड़े। वे इसके लिए वीर रस के नागपुरी गीतों और कविताओं की रचनाएं करने लगे। उनकी रचनाएं लोगों के रोंगटे खड़े कर देने वाली होती थीं। हास्य कविता और व्यंग्य कविता लेखन में पकड़ अच्छी थी। एक बार रांची के टैगोर हिल में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने व्यंग्य हास्य कविता गांधीक नाम बेइच के आपन पेट भरू प्रस्तुत किया था, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। उनकी जागरण कविता - नरसिंघा बाजी आब फिर नागपुर देस में आमजनों के बीच खूब लोकप्रिय हुआ। उन्होंने 500 से अधिक गीत और कविताओं की रचना की हैं, जिनमें 250 से अधिक आकाशवाणी रांची से प्रसारित हुई हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव हिंदी फिल्मी गाना भी गाते थे। उनकी पत्नी श्यामा देवी को नागपुरी गीत उतने पसंद नहीं थे। इसलिए प्रारंभ में वे अपनी धर्म पत्नी को हिंदी फिल्मी गाना गाकर सुनाते थे। उन्होंने बकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की थी। आरंभ में वे नागपुरी में नहीं अपितु हिंदी में गायन करके अपने दोस्तों का मनोरंजन करते थे। गजल में उनकी पकड़ थी। पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के भी शौकीन थे। गीत-गोविंद के साथ-साथ उनका मन अलग राज्य के लिए रमा हुआ था। सो इसे में रत रहते थे। 1963 ई. में जब झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हुआ, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरू के समक्ष विरोध किया था। उनके नेतृत्व में 21 जलाई 1963 ई. में बहुबाजार में विशाल सभा आयोजित की गयी। इस सभा में झारखंड पार्टी को बनाये रखने का निर्णय लिया गया। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के नेतृत्व में ही 27, 28 एवं 29 सितंबर को वीरमित्रापुर में विशाल जुलूस निकाला गया। अलग राज्य के लिए आंदोलन करने के कारण उन्हें 3 जून 1968 ई. में जेल भी जाना पड़ा। झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय करने के बाद जब जयपाल सिंह मुंडा पुन: झारखंड पार्टी में आना चाहते थे, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव उनसे कहा था - आगे गुरू रहंय, आब गरू बटे गेलंय। इसे सुनकर मरांग गोमके भी ठहाका लगाकर हंस पड़े थे और लाल रणविजय नाथ से वादा किया था - मोंय घुरत हों, मोंय आवत हों। आब दोहरायके आंदोलन खड़ा करब। हालांकि इस वचन को देने के बाद जयपाल सिंह मुंडा की अचानक मृत्यु हो गयी। लाल रण विजय नाथ शाहदेव अलग राज्य के लिए 1977 ई. में तात्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से अलग राज्य पर हुई वार्ता में शामिल हुए। उसके बाद 1999 ई. में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हुई अलग राज्य वार्ता में भी शरीक थे। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के अलग राज्य झारखंड नाम के लिए उनके समक्ष मजबूती से तर्कपूर्ण विचार रखा और इसी नाम अलग राज्य का गठन भी हुआ। लाल रणविजय नाथ शाहदेव नागपुरी कला संगम के निदेशक और नागपुरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने पझरा और नागपुरी पत्रिका का संपादन किया। उनकी कुछ प्रकाशित पुस्तकें और पत्रिकाएं हैं जिनमें पूजा कर फूल 1984, खोता नागपुरी काव्य 1985, खुखड़ी रूगड़ा संपादन 1985, पझरा पत्रिका 1985, जागी जवानी चमकी बिजुरी 1986 शामिल हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव को कई सम्मान भी मिले। झारखंड विधान सभा स्थापना के अवसर पर 22 नवंबर 2017 को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। दूरदर्शन सम्मान 2011, नागपुरी संस्थान पिठोरिया से 2014 में स्वर्ण सम्मान, 2014 में प्रफुल्ल सम्मान, 2015 में लोक सेवा समिति से झारखंड रत्न सम्मान मुख्य रूप से शामिल है। ऐसे अलग राज्य के आंदोलन में अटल रहने वाले वीर माटी पुत्र लाल रणविजय नाथ शाहदेव का जन्म पांच फरवरी 1940 ई. में हुआ। उनके पिता का नाम छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव और माता का नाम सीता देवी था। उनका विवाह श्यामा देवी से 1959 ई. में हुआ। उनके तीन बच्चे हैं निर्मला देवी, अजय नाथ शाहदेव और राजश्री सिंहदेव। भले ही लाल रणविजय नाथ शाहदेव अलग राज्य का सपना साकार कर इस धराधाम से 18 मार्च 2019 में विदा हो गये, किंतु हमारे लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। (लेखक गोस्सनर कॉलेज, रांची के सहायक प्राध्यापक हैं)।

Published / 2022-02-03 17:13:59
समाचार प्रकाशन जगत और डिजिटलीकरण...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनीता कोहली)। क्या विज्ञापनों की फंडिंग वाले समाचार पढ़ने वाले पाठकों को केवल फर्जी और असत्य खबरें मिलनी चाहिए? क्या सबस्क्रिप्शन वाली खबरों का उभार अच्छी पत्रकारिता को सुशिक्षित और अच्छी आर्थिक स्थिति वाले लोगों तक सीमित करता है? क्या यह समाचारों की सामूहिक खोज और खपत को समाप्त करता है और लोकतंत्र को क्षति पहुंचाता है? आॅक्सफर्ड स्थित रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी आॅफ जर्नलिज्म (आरआईएसजे) का द डिजिटल न्यूज प्रोजेक्ट आॅनलाइन खबरों की पड़ताल करके पत्रकारिता और कारोबार उनके असर का आकलन करता है। इस महीने के आरंभ में उसने एक रिपोर्ट जर्नलिज्म, मीडिया ऐंड टेक्रॉलजी ट्रेंड्स ऐंड प्रिडिक्शंस 2022 जारी की। 52 देशों के 246 संपादकों, मुख्य कार्याधिकारियों और डिजिटल नेतृत्वकतार्ओं ने कहा कि वे 2022 में अपनी कंपनी की संभावनाओं को लेकर आश्वस्त हैं। आरआईएसजे के वरिष्ठ शोध सहायक निक न्यूमैन ने कहा, प्रकाशकों का यह भरोसा एक हद तक इसलिए भी है क्योंकि कोविड-19 महामारी के दौरान सबस्क्रिप्शन और सदस्यता मॉडल लगातार गति पकड़ते रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स के अब 84 लाख सबस्क्रिप्शन हैं जिसमें 76 लाख डिजिटल हैं। शुरूआत में ऐसा करने वाली कई कंपनियों का डिजिटल राजस्व अब प्रिंट राजस्व को पीछे छोड़ चुका है। अब कई बड़े ब्रांड को भविष्य के लिए एक स्थायी राह नजर आ रही है। लेकिन कई छोटे डिजिटल प्रकाशक मसलन स्लोवाकिया में डेनिक, मलेशिया में मलयसियाकिनी और डेनमार्क में जेटलैंड भी ऐसा कर सकते हैं। न्यूमैन 2012 से ही इस रिपोर्ट का समन्वय कर रहे हैं। भारत में भी ऐसा ही हो रहा है। द न्यूज मिनिट्स, द क्विंट, द हिंदू और टाइम्स इंटरनेट जैसी शुरूआत में ही बदलाव करने वाली कंपनियां सबस्क्रिप्शन राजस्व पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र को सूचित करने वाली गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता करने में हजारों जमीनी रिपोर्टर, ढेर सारा समय और पैसा लगता है। लंबे समय तक प्रकाशकों ने विज्ञापनों पर भरोसा किया। समाचार पत्रों का 70-80 फीसदी राजस्व अभी भी वहीं से आता है। इंटरनेट के जोर पकड़ने के बाद भी प्रिंट माध्यम का प्रसार और राजस्व दोनों बढ़ते जा रहे हैं। यह बात इसे 1.38 लाख करोड़ रुपये के भारतीय मीडिया और मनोरंजन कारोबार का सबसे अधिक मुनाफे वाला क्षेत्र बनाती है। कॉम्सकोर के आंकड़ों के मुताबिक भारत की 20 शीर्ष में से 18 समाचार वेबसाइट बड़े विरासती ब्रांड हैं। टाइम्स आॅफ इंडिया, एनडीटीवी या द इंडियन एक्सप्रेस तथा अन्य ब्रांड को बड़ी तादाद में आॅनलाइन दर्शक और पाठक मिलते हैं। परंतु इसका आधे से अधिक हिस्सा गूगल तथा फेसबुक से आता है। फरवरी 2021 में भारत में 46.8 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे और गूगल की पहुंच इन तमाम लोगों तक है। फेसबुक का आंकड़ा थोड़ा कम यानी 43.6 करोड़ लोगों का है। आश्चर्य नहीं कि 2020 में 23,500 करोड़ रुपये के डिजिटल राजस्व में 90 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी इन दोनों की रही। यानी बाकी बचे सैकड़ों डिजिटल प्रकाशकों के लिए केवल 10 फीसदी हिस्सा बचा। ऐसे में नियामकों का ध्यान जाना लाजिमी था। आॅस्ट्रेलिया और फ्रांस में गूगल को प्रकाशकों को भुगतान करने के लिए मजबूर किया गया। भारत में भी प्रकाशकों ने हाल ही में गूगल को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के समक्ष तलब कराया था। इस बीच वर्षों तक आॅफलाइन प्रकाशन ने डिजिटल वृद्धि को प्रभावित किया। महामारी ने उस मॉडल को नष्ट कर दिया। पाठकों की तादाद में तेजी से इजाफा होने के बावजूद विज्ञापन राजस्व में भारी गिरावट आई। ऐसे में प्रकाशकों के लिए अपने भविष्य को बचाने का एक ही तरीका था कि वे भुगतान तय करें। फिलहाल भारत में समाचार वेबसाइटों के करीब 10 लाख सबस्क्राइबर हैं। मनोरंजन जगत के ओटीटी प्लेटफॉर्मों के 10 करोड़ से अधिक सबस्क्राइबर हैं। समाचार प्रकाशकों को उन आंकड़ों तक पहुंचने के लिए कई वर्ष लगेंगे तथा तकनीक और सामग्री पर बहुत पैसा खर्च करना होगा। क्या सबस्क्राइबर संख्या में यह इजाफा सूचनाओं को एक खास दायरे के लोगों तक सीमित कर देगा? क्या यह आम जनता को अलगोरिद्म आधारित, स्वतंत्र समाचार के भरोसे छोड़ देता है जिसका इस्तेमाल राजनीतिक दल तथा अन्य समूह झूठी खबरों को हथियार बनाने और समाज का ध्रुवीकरण करने में करते हैं? न्यूमैन की रिपोर्ट सूचना की असमानता का मुद्दा उठाती है और इससे निपटने के लिए दुनिया भर में हो रहे कुछ प्रयोगों की ओर संकेत करती है। दक्षिण अफ्रीका में डेली मैवरिक की सदस्यता चुकाने वाली की हैसियत पर आधारित है। पुर्तगाल में आठ मीडिया घरानों के 20,000 से अधिक नि:शुल्क डिजिटल सबस्क्रिप्शन की फंडिंग के लिए लॉटरी फंडिंग का इस्तेमाल किया गया। भारत में कई नई समाचार वेबसाइट पाठकों से सहयोग या दान (सबस्क्रिप्शन नहीं) की मांग करती हैं। कुछ अन्य ज्यादा विज्ञापनों के लिए प्रयोग करते हैं। देश के सबसे बड़े समाचार एग्रीगेटरों में से एक इनशॉर्ट्स ने 2019 में पब्लिक नामक एक ओपन प्लेटफॉर्म शुरू किया। 2021 के आरंभ तक इस पर 60,000 क्रिएटर थे जिनमें वार्ड मेंबर, सांसद, विधायक तथा सैकड़ों छोटे कस्बों के स्थानीय निवासी शामिल हैं जिन्होंने इस पर स्थानीय घटनाओं के छोटे-छोटे वीडियो और खबरें डालीं। गत वर्ष इनशॉर्ट्स के 7.5 करोड़ विशिष्ट उपयोगकतार्ओं में से 80 प्रतिशत पब्लिक के माध्यम से आए। मार्च 2021 में कंपनी के 102 करोड़ रुपये के राजस्व में इसकी अहम भूमिका रही। न्यूमैन यह भी कहते हैं कि टिकटॉक या शॉर्ट वीडियो पर समाचारों को लेकर युवा श्रोताओं/दर्शकों की भिड़ंत होगी। लेकिन यह आसानी से झूठी खबरों का गढ़ बन सकता है। इस सवाल का जवाब आसान नहीं है कि समाचार पत्रकारिता के टूटे हुए मॉडल की जगह कौन लेगा। सबस्क्रिप्शन अच्छा रुझान है लेकिन विज्ञापन समर्थित हर समाचार कूड़ा नहीं है। कई ऐसे ब्रांड हैं, जहां मालिकों के पास यह दृष्टि और रीढ़ मौजूद है कि वे अच्छी पत्रकारिता कर सकें।

Published / 2022-02-02 12:53:21
नि:स्वार्थ प्रेम और बदलती मानसिकता

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सिंधु मिश्रा)। हम सब अपनी मयार्दाएं जानते हैं, हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है और इन मयार्दाओं में रहते हुए रिश्ते निभाने के तरीके अलग अलग होते हैं, जो हमारे संस्कारों और तौर तरीकों पर निर्भर करता है। चंद रिश्तों की मिसाल यहां आपको देना चाहूंगी, सास-बहू, ससुर-दामाद, बेटा-बेटी, बेटी-बहू, ननद-भाभी, जेठानी-देवरानी, कुछ चुनिंदा रिश्तों की ही बात की है मैंने। क्या हम इन रिश्तों में आज नि:स्वार्थ प्रेम देख सकते हैं? शायद हां और ना। दोनों ही जवाब आपके पास होंगे। जरा देखें अपने आसपास, नि:स्वार्थ प्रेम पर टिके उन रिश्तों को। क्या सचमुच नि:स्वार्थ प्रेम दिखाई देता है? इनके बीच क्या ईर्ष्या, द्वेष, जैसी भावनाएं नहीं नजर आती हैं? अमूमन इन रिश्तों में छोटी-छोटी बातों पर भी गंभीर हालात बन जाते हैं। आरोप-प्रत्यारोप की कड़ियां तैयार होने लगती हैं और ऐसे रिश्ते सिर्फ नाम के रिश्ते रह जाते हैं। अक्सर उन रिश्तों में दरारें आ जाती हैं, जिसने रिश्तों की मर्यादाएं न समझी। न ही उस अनुसार आचरण किया, दोष हमेशा हम नए रिश्तों और हमारी आज की पीढ़ी को देते हैं, पर ऐसा नहीं है आज की पीढ़ी पर दोषारोपण करने के पूर्व हम अपने संस्कारों और अपने विचारों को भी सुसंस्कृत करें और देखें आखिर कहाँ हमसे चूक हो रही है? क्यों हमारा प्रेम नि:स्वार्थ होने की जगह स्वार्थीपन की ओर हमें लिए जा रहा है? आखिर क्यों बिखर जाते हैं ये रिश्ते?क्यों हम एकाकी जीवन जीने की ओर अग्रसर होते हैं? आत्ममंथन आज की जरूरत बनती जा रही है, मां-बाप, बड़े बुजुर्ग और तमाम वो रिश्ते जिनमें बिखराव आ रहे हैं। सभी अपने स्वार्थ की नहीं बल्कि रिश्तों के महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करने की कृपा करें, आपसी तालमेल और नि:स्वार्थ प्रेम को जीवन में स्थान दें और मानसिकता को स्वस्थ रखें, तभी हम सफलता की उन मापदंडों को पूरा करते हुए खुशहाल जीवन जी सकेंगे। धन्यवाद! (लेखिका दहेजमुक्त झारखंड की राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

Published / 2022-02-01 15:56:26
टाटा की हुई एयर इंडिया, सबका लाभ-सबका साथ...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (टीएन नाइनन)। एयर इंडिया के निजीकरण के चौतरफा स्वागत के बीच भी यह मानना होगा कि इसके साथ कुछ न कुछ गड़बड़ रही है। हमारे देश में अरुण शौरी आज भी उन शर्तों से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे हैं जिन पर एयर इंडिया से कम महत्त्वपूर्ण सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया गया था। यहां एक बात ध्यान देने लायक है कि कर्मचारियों के एक धड़े द्वारा चिंता जताने तथा वाम दलों के एक हिस्से की ओर से कुछ शोरशराबे के अलावा समूचे राजनीतिक वर्ग में से किसी ने इस विमानन सेवा की बिक्री की आलोचना नहीं की है। कर्मचारी भी मोटे तौर पर राहत महसूस कर रहे होंगे क्योंकि उनका वेतन निरंतर मिलता रहेगा। एयर इंडिया बीते करीब 15 वर्ष से लगातार घाटे में चल रही है। संभव है अन्य सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन भी इतना खराब रहा हो लेकिन कोई सरकारी कंपनी इतनी बुरी स्थिति में नहीं पहुंची कि उसका घाटा लाख करोड़ रुपये के आसपास हो गया हो। एयर इंडिया का समग्र घाटा लगभग 80,000 करोड़ रुपये और उसका रोज का घाटा 20 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका था। ऐसे में एक कट्टर वामपंथी के लिए भी यह जाहिर सी बात थी कि यह विमानन कंपनी अब उड़ान भरने की स्थिति में नहीं रह गई थी। कंपनी का कारोबारी निपटान तय था। इसके साथ तमाम कठिनाइयां भी जुड़ी हुई थीं। उदाहरण के लिए खाली एयरपोर्ट स्लॉट, 100 से अधिक खराब रखरखाव वाले विमानों से निजात, इससे पहले कि वे हवाई अड्डों पर खड़े-खड़े जंग खा जाएं तथा कर्मचारियों को जरूरी लाभ के साथ सेवा समाप्ति देना। संक्षेप में कहें तो अफरा-तफरी और बड़े पैमाने पर शर्मिंदगी। एक बार जब टाटा ने एयर इंडिया को उबारने की पहल की तो सरकार ने राहत महसूस की। इसकी एक झलक तब मिली जब विमानन कंपनी को टाटा को सौंपे जाने के दिन प्रधानमंत्री ने टाटा समूह के चेयरमैन से औपचारिक मुलाकात की। वित्त मंत्रालय के कर्मचारियों ने इस विषय पर काम किया कि करीब 61,000 करोड़ रुपये के बाकी रह गए कर्ज का निपटान कैसे होगा। इस बीच सरकार के पास 14,000 करोड़ रुपये मूल्य की गैर विमानन परिसंपत्तियां रह गई हैं तथा बिक्री का कुल नकद मूल्य 2,700 करोड़ रुपये (विमानन कंपनी का कुल मूल्य 18,000 करोड़ रुपये लगा जिसमें बकाया कर्ज घटाकर 2,700 करोड़ रुपये की राशि बची) रहा। बकाया 44,000 करोड़ रुपये की राशि को बट्टेखाते में डाले जाने को सबके लिए बेहतर स्थिति के रूप में पेश किया गया जो कि उपलब्ध विकल्पों के मुताबिक उचित भी है। ऐसा सौदा जिसे लेकर खरीदार और विक्रेता दोनों पक्ष खुश हों, वह हमें इस विमानन कंपनी और इसके हालिया इतिहास के बारे में भी काफी कुछ बताता है। टाटा समूह द्वारा इस सौदे में रुचि लेने के बाद सरकार की प्रसन्नता समझी जा सकती है लेकिन ऐसे मौके पर किसी को उस व्यक्ति से भी टिप्पणी लेनी चाहिए जो इस विमानन कंपनी को पतन के रास्ते पर डालने के बाद एकदम खामोश है। वह व्यक्ति हैं मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल के नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल। एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय कराने पर पटेल ने ही जोर दिया था। इसके नतीजे बहुत त्रासद हुए क्योंकि इससे अनुमानित लक्ष्य नहीं हासिल हुए। ढेर सारे विमान खरीदने के आॅर्डर देने के लिए भी उन पर सवाल उठे क्योंकि इससे कंपनी कर्ज में डूब गयी और फिर उबर नहीं सकी। एक निजी विमानन कंपनी के आगमन के बाद प्रमुख मार्गों के अहम स्लॉट को खाली कराए जाने को लेकर भी तमाम बातें हुईं। विजय माल्या जो एक समय अपनी (अब बंद हो चुकी) विमानन कंपनी को अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर उड़ाना चाहते थे, उन्होंने सार्वजनिक रूप से मंत्री पर आरोप लगाया कि वह एक अन्य विमानन कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। इस पर नाराज पटेल ने प्रतिक्रिया दी थी कि माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस अर्हता नहीं हासिल कर सकी। अब एयर इंडिया टाटा समूह की घाटे वाली कंपनियों में नजर आएगी। एन चंद्रशेखरन के नेतृत्व में समूह के परिचालन में जबरदस्त सुधारों के बावजूद अगर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को छोड़ दिया जाए तो समूह गत तीन वर्ष से घाटे में है। इस वर्ष हालात बदल सकते हैं क्योंकि टाटा स्टील इस्पात की बढ़ती कीमतों की बदौलत टीसीएस से अधिक मुनाफा कमा रही है। अगर एयर इंडिया कुछ समय तक घाटे में भी रहती है तो भी घाटे का आकार कम हो जाएगा। ब्याज का बोझ कम होगा और बकाया कर्ज की लागत कम होगी। समूह की दूसरी विमानन कंपनी के साथ तालमेल करने से यात्रियों की तादाद बढ़ाई जा सकेगी। एक फायदा यह भी हो सकता है कि शायद सरकार के मंत्री अब टाटा पर सार्वजनिक हमले न करें। दरअसल, करीब 69 साल बाद आधिकारिक तौर पर टाटा समूह के हाथों में एयर इंडिया की कमान आ गई है। इस बात की पुष्टि टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने की है। एविएशन इंडस्ट्री में कितनी हिस्सेदारी: इस अधिग्रहण प्रक्रिया के बाद भारत की एविएशन इंडस्ट्री में टाटा समूह का दबदबा बढ़ गया है। टाटा समूह की अब तीन एयरलाइन- विस्तारा, एयर एशिया और एयर इंडिया हो गई है। -टाटा समूह को एयर इंडिया में शत प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है। -विस्तारा एयरलाइन, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड और सिंगापुर एयरलाइंस लिमिटेड (एसआईए) का एक ज्वाइंट वेंचर है। इसमें टाटा संस की 51 फीसदी हिस्सेदारी है तो सिंगापुर एयरलाइन का स्टेक 49 फीसदी है। -अगर एयर एशिया की बात करें तो इसमें टाटा संस की हिस्सेदारी 83.67 फीसदी है। एविएशन इंडस्ट्री में कहां है टाटा: नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) के आंकड़ों के मुताबिक, एयरएशिया, विस्तारा और एयर इंडिया की डोमेस्टिक एयरलाइन इंडस्ट्री में करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आंकड़ों की मानें तो डोमेस्टिक एयरलाइन में एयर इंडिया 13.4 फीसदी, विस्तारा 8.1 फीसदी, एयरएशिया इंडिया 3.3 फीसदी की हिस्सेदार है।

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