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Published / 2022-03-25 13:32:06
डूबती सरकारी दूरसंचार कंपनियों का कड़वा सच...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्याम पोनप्पा)। यह भारत में दूरसंचार क्षेत्र और मोबाइल फोन की विकास कहानी शुरू होने के पहले की बात है। उस समय दूरसंचार क्षेत्र अटकी हुई हालत में था। करीब 15 दूरसंचार आॅपरेटर ऊंचे लाइसेंस शुल्क के बोझ, उपभोक्ताओं की सीमित संख्या और तगड़ी प्रतिद्वंद्विता में फंसे हुए थे। भारी कर्ज तले दबे आॅपरेटरों के पास अधिक राजस्व कमाने के लिए नेटवर्क स्थापित करने के पैसे भी नहीं बचे थे। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी टीम ने उद्योग जगत एवं पेशेवरों के साथ मिलकर साहसिक कदम उठाया और उसका जादुई नतीजा निकला। कुछ रचनात्मक नीतियां लागू करने से दूरसंचार जगत में जबरदस्त वृद्धि का रास्ता खुला और बाजार एवं व्यवहार में व्यापक बदलाव भी आए। इस दिशा में घटनाक्रम की शुरुआत 1998 में हुई जब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने दूरसंचार क्षेत्र की समस्याओं पर गौर करने का निर्णय लिया। आईसीआईसीआई और औद्योगिक लागत एवं कीमत ब्यूरो की तरफ से किए गए अध्ययनों पर गौर करने के बाद पीएमओ ने सरकार के भीतर और बाहर के पेशेवरों, उद्योग जगत के हितधारकों और वित्तीय संस्थानों से सलाह-मशविरा किया। इस तरह एनटीपी-99 का खाका तैयार हुआ। भले ही ये नीतियां सर्वोत्कृष्ट नहीं थीं क्योंकि उद्देश्य-उन्मुख प्रक्रियाओं के साथ राजनीतिक अनुकूलन का भी मेल था लेकिन एक बुनियादी प्रगति यह थी कि सरकार ने लाइसेंस के लिए लगाई बोली पर अग्रिम भुगतान के बजाय अर्जित राजस्व के हिस्से के तौर पर आॅपरेटरों से ही शुल्क एकत्रित किए। यह एक मुश्किल राजनीतिक निर्णय था क्योंकि लोगों के बीच यह गलत धारणा थी इसे आॅपरेटरों को मुफ्त में ही दे दिया गया। लेकिन अदालत में घसीटे जाने के बावजूद सरकार अपने फैसले पर अडिग रही और नतीजों ने साबित कर दिया कि यह फैसला पूरी तरह से सार्वजनिक हित में लिया गया था। वैसे राजस्व में सरकारी हिस्सेदारी काफी अधिक रखे जाने से शुरूआत में उतनी सफलता नहीं मिली। लेकिन वर्ष 2004 में हुई दो घटनाओं ने हालात बदल दिए। अर्जित राजस्व में सरकार की हिस्सेदारी को घटाकर आठ फीसदी कर दिया गया और किसी कॉल के लिए कॉलर एवं रिसीवर दोनों को भुगतान करने के बजाय सिर्फ कॉलर पर ही उसका बोझ डालने का फैसला लिया गया। इस कदम से मांग एवं आपूर्ति दोनों को ही बढ़ावा मिला और मोबाइल फोन की संख्या में विस्फोटक वृद्धि का रास्ता तैयार हो गया। नतीजा यह हुआ कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते एवं सबसे आकर्षक बाजारों में से एक बन गया। आगे चलकर सरकार ने नीलामी को बोली से कहीं अधिक राजस्व हिस्सेदारी के जरिये इकट्ठा कर लिया। ऐसा होने के बावजूद यह बात समझ से बाहर है कि आगे की सरकारों ने अपना राजस्व बढ़ाने के लिए दूरसंचार क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया और इसे पतन की राह पर डाल दिया। आज का दूरसंचार संकट काफी कुछ 1998 जैसा ही है। हमारी नियामकीय नीतियों का परिणाम शुल्क दरों को लेकर जंग छिड़े एवं अपने पड़ोसी को गरीब बनाने की रणनीति के रूप में सामने आया। ऐसा तब है जब अधिकतर लोगों को अच्छी एवं भरोसेमंद सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस तरह भारत में दूरसंचार सेवाओं की दरें बेहद कम होने की वजह से लंबे समय तक नहीं टिक सकती हैं। उच्चतम न्यायालय के उस फैसले ने दूरसंचार आॅपरेटरों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं जिसमें स्पेक्ट्रम धारकों पर पिछली तारीख से समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) लगाने के सरकारी रुख को सही बताया है। मौजूदा सरकार को वाजपेयी सरकार की तरह कदम उठाने के लिए संकल्प जुटाने की जरूरत है। दूरसंचार क्षेत्र एवं अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए सरकार को एक क्रांतिकारी हस्तक्षेप करना होगा। स्पेक्ट्रम उपयोग के लिए नीलामी शुल्क के बजाय राजस्व-हिस्सेदारी का तरीका अपनाया जाए। वर्ष 1999 में भी स्पेक्ट्रम लाइसेंस शुल्क के लिए राजस्व हिस्सेदारी का रास्ता अपनाया गया था। ऐसा होने पर स्पेक्ट्रम का महज सरकारी राजस्व के बजाय संपर्क एवं प्रगति के एक सार्वजनिक संसाधन के तौर पर अधिक तर्कसंगत उपयोग हो सकेगा। अतिरिक्त स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क खत्म कर देने से विकास एवं वृद्धि के लिए संचार सेवाएं मुहैया कराई जा सकेगी और बाकी दुनिया की तुलना में भारत में क्षमता की खामी भी सुधार सकेगी। अगर अत्यधिक लाभ होता है या फंड को अनुचित राह पर डाला जाता है तो एक अप्रत्याशित लाभ का प्रावधान भी रखा जा सकता है। नई तकनीकों को लागू करने वाली नीतियां लागू हों। मसलन, गूगल पिक्सल फोन का नवीनतम संस्करण भारत में इसलिए नहीं जारी किया जा सका है कि यहां पर 60 गीगाहर्ट्ज सीमित बैंडविड्थ पर ही उपलब्ध है। इसी तरह 5जी तकनीक के मामले में भारत पहले ही पिछड़ चुका है और स्पेक्ट्रम संपर्क में बड़ा बदलाव लाए बगैर उसे 5जी का लाभ उठाने में वर्षों लगेंगे। बढ़े हुए उत्पादन के लिए ब्रॉड बैंड मुहैया कराने के लिए स्पेक्ट्रम पूलिंग की जाए। इसे भू-स्थिति डेटाबेस चालित साझा स्पेक्ट्रम के जरिये अंजाम दिया जा सकता है जैसा कि यूरोप में लाइसेंसशुदा साझा स्पेक्ट्रम (एलएसए) या अमेरिका में प्राधिकृत साझा स्पेक्ट्रम (एएसए) के दौरान हुआ है। संभवत: स्पेक्ट्रम साझेदारी को ढांचागत क्षेत्र के प्रति कंसोर्टियम नजरिया और डिलीवरी के लिए बिना बंडल एवं उपयोग-आधारित लागत अपनाया जाए। नेटवर्क विकास एवं प्रबंधन जैसे आधारभूत ढांचे को सेवा से अलग कर ऐसा किया जा सकता है। एक और संभावना यह है कि दो-तीन एकीकृत कंसोर्टियम मौजूद हों जिसमें से हरेक के पास अपना आधारभूत ढांचा हो। इसके लिए अधिक पूंजी निवेश की जरूरत होगी।दूरसंचार कारोबार में विविध सरकारी एजेंसियां शामिल होती हैं, मसलन दूरसंचार विभाग, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, ट्राई, वित्त और कानून मंत्रालय के अलावा राज्य सरकारें भी इसका हिस्सा होती हैं।मोबाइल टेलीफोनी के बगैर काम करना आज अविश्वसनीय नजर आता है। अपने लाभ के लिए दूरसंचार का इस्तेमाल करने वाले नेताओं के बजाय मौजूदा संदर्भों में ये मौके वर्षों तक छूट जाने की संभावना है, जब तक कि सरकार ठोस कार्रवाई का साहस एवं संकल्प न दिखाए।

Published / 2022-03-22 17:32:30
ऊर्जा का मूल्य बढ़ाकर खपत घटाइये...

एबीएन डेस्क (भरत झुनझुनवाला)। यूक्रेन के युद्ध ने ईंधन तेल की समस्या को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। कुछ माह पूर्व विश्व बाजार में कच्चे तेल का दाम 80 रुपए प्रति बैरल था जो बढ़कर वर्तमान में 110 रुपये हो गया है। आगे इसके 150 डॉलर तक चढ़ने की संभावना बन रही है। ऐसी परिस्थिति में वर्तमान में पेट्रोल का दाम 100 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 130 रुपये प्रति लीटर तक होने की संभावना है। हमारे लिए यह संकट है; क्योंकि हम अपनी खपत का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करते हैं। यूक्रेन युद्ध अथवा ऐसे ही अन्य संकट के कारण यदि तेल की सप्लाई कम हो गई और इसके दाम बढ़ गए तो हमारी पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। हमारे पास ऊर्जा के दूसरे स्रोत भी नहीं हैं। तेल यूं ही कम है। कोयला हमारे पास लगभग आने वाले 150 वर्ष की सामान्य जरूरत के लिए है परंतु जैसे-जैसे हम कोयले का खनन करते हैं वैसे-वैसे उसकी गुणवत्ता कम होती जाती है और इसलिए हम वर्तमान में ही कोयले का भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं। यूरेनियम भी अपने देश में कम है, जिसके कारण हम परमाणु ऊर्जा नहीं बना सकते हैं। हमारे पास केवल दो स्रोत बचते हैं- सोलर एवं हाइड्रो पॉवर। सोलर के विस्तार के लिए सरकार ने प्रभावी कदम उठाए हैं और इसमें तेजी से वृद्धि भी हुई है परंतु आकलनों के अनुसार इस तीव्र वृद्धि के बावजूद 2050 में सोलर ऊर्जा से हम केवल अपनी 14 प्रतिशत जरूरतों की पूर्ति कर सकेंगे। इसलिए सोलर पॉवर हमारी ऊर्जा सुरक्षा का स्तंभ नहीं बन सकता है। हाइड्रो पॉवर की भी सीमा है क्योंकि तमाम नदियों के ऊपर बंपर से बंपर जुड़े हुए हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट पहले ही लग चुके हैं। बची हुई नदियों के ऊपर हम हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट लगा भी दें तो भी इनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भारी हैं। जैसे पाया गया है कि हाइड्रो पावर के बड़े तालाबों में मच्छर पैदा होते हैं और उन क्षेत्रों में मलेरिया का प्रकोप अधिक होता है। पानी की गुणवत्ता का ह्रास होता है। नदी का सौंदर्य जाता रहता है। मछलियां मरती हैं और जैव विविधता समाप्त होती है। अतः जब हम हाइड्रो पॉवर बनाते हैं तो हमारे जीवन स्तर पर एक साथ दो विपरीत प्रभाव पड़ते हैं। एक तरफ हमें बिजली उपलब्ध होती है, जिससे जीवन स्तर में सुधार होता है तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य, पानी और सौंदर्य का ह्रास होता है जिससे हमारे जीवन स्तर में गिरावट आती है। अंतत: हाइड्रो पॉवर से कोई विशेष लाभ होता है ऐसा नहीं दिखता। फर्क सिर्फ इतना है कि हाइड्रो पॉवर से बनी हुई ऊर्जा का उपयोग अमीर ज्यादा करते हैं जबकि पर्यावरणीय दुष्प्रभाव आम आदमी पर अधिक पड़ता है। इसलिए देश के लिए हानिप्रद होते हुए भी हाइड्रो पॉवर को बढ़ाया जा रहा है परंतु इससे हमारी ऊर्जा सुरक्षा स्थापित नहीं होती क्योंकि इसकी सीमा है। एक और घरेलू स्रोत बायो डीजल अथवा एथेनॉल का है। यहां संकट खाद्य सुरक्षा का है। जब हम खेती की जमीन पर बायो डीजल बनाने के लिए गन्ने का उत्पादन बढ़ाते हैं तो उसी अनुपात में गेहूं, चावल और अन्य फल, सब्जी का उत्पादन घटता है जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है। पानी का भी संकट बनता है क्योंकि गन्ने के उत्पादन में गेहूं की तुलना में लगभग 10 गुना पानी अधिक प्रयोग होता है। लगभग संपूर्ण देश में भूमिगत जल का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है जिसके कारण हम बायो डीजल का उत्पादन भी नहीं बढ़ा सकेंगे। परमाणु ऊर्जा की भी समस्या है क्योंकि यूरेनियम अपने देश में है ही नहीं। इसका एक विकल्प थोरियम है। लेकिन थोरियम से यूरेनियम बनाने में हम फिलहाल बहुत पीछे हैं। चीन इसी वर्ष थोरियम से चलने वाले एक प्रायोगिक परमाणु रिएक्टर को शुरू करने जा रहा है जबकि हम केवल अभी ड्राइंग बोर्ड पर ही सीमित हैं। इसलिए अगले 20-30 वर्षों में हम थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा बनाएंगे इसकी संभावना नहीं के बराबर है। इस परिस्थिति में हम ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाकर किसी भी तरह से अपनी ऊर्जा सुरक्षा स्थापित नहीं कर सकते हैं। हमारे पास केवल एक उपाय है कि हम अपनी खपत को कम करें। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में बताया गया कि विश्व के ऊपरी 10 प्रतिशत लोग 50 प्रतिशत ऊर्जा की खपत करते हैं। अतः यदि हम ऊर्जा के दाम में भारी वृद्धि करें तो इसका अधिक प्रभाव ऊपरी वर्ग पर पड़ेगा और यदि इस पर लगाए गए टैक्स का उपयोग हम आम आदमी के हक में करें तो आम आदमी के जीवन स्तर पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। जितना अधिक खर्च उसके द्वारा महंगी ऊर्जा की खरीद में किया जाएगा उससे ज्यादा लाभ उसे सार्वजनिक सुविधाओं जैसे बस की उपलब्धता से हो सकता है। इसलिए सरकार को तेल और बिजली दोनों पर भारी "ऊर्जा सुरक्षा" टैक्स आरोपित करना चाहिए। इनके दाम में भारी वृद्धि करनी चाहिए। तेल पर प्रति लीटर और बिजली पर प्रति यूनिट का ऊर्जा सुरक्षा टैक्स लागू कर देना चाहिए। साथ-साथ जिस प्रकार आम आदमी पार्टी ने जनता को 300 यूनिट तक की बिजली की खपत मुफ्त करा दी है उसे सम्पूर्ण देश में लागू करना चाहिए जिससे आम आदमी पर तेल और बिजली के बढ़े हुए दाम का प्रभाव न पड़े। ऊर्जा सुरक्षा स्थापित करने का दूसरा उपाय है कि हम मैन्युफैक्चरिंग के आधार "मेक इन इंडिया" को बढ़ाने के स्थान पर सेवा क्षेत्र के आधार पर "सर्वड फ्रॉम इंडिया" के विस्तार पर ध्यान दें। बताते चलें कि 100 रुपये की आय बनाने में जितनी ऊर्जा मैन्युफैक्चरिंग में लगती है उसका केवल दसवां हिस्सा सेवा क्षेत्र में लगता है। सेवा क्षेत्र में सॉफ्टवेयर, संगीत, ट्रांसलेशन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आते हैं जहां पर कम ऊर्जा में अधिक उत्पादन किया जाता है। यदि हम अपनी आय को सेवा क्षेत्र से हासिल करें तो हम कम ऊर्जा में अधिक आय हासिल कर सकते हैं। अतः सरकार को उत्पादित माल जैसे कार, एल्यूमीनियम, स्टील आदि के निर्यात पर भी भारी निर्यात टैक्स लगाना चाहिए, जिससे इनका उत्पादन कम हो और देश में ऊर्जा की खपत कम हो। साथ-साथ सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहन देना चाहिए जिससे कि हम कम ऊर्जा में भी पर्याप्त आय को हासिल कर सकें। ऊर्जा का संकट आगे गहराने की स्थिति है। इस दिशा में सरकार को शीघ्र कदम उठाने चाहिए। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

Published / 2022-03-22 14:00:21
बिहार की गौरवमयी गाथा : 110वीं जयंती पर अपने गौरव की ओर लौटता बिहार...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधीर शर्मा)। 22 मार्च 2022 को, जब बिहार राज्य अपनी स्थापना की 110वीं जयंती को बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाने जा रहा है, तब लगभग 12.88 करोड़ बिहारियों की आंखों के सामने कई अच्छी यादों का पिटारा, सफलता की गाथा और विकास की दुर्लभ यात्रा का इतिहास होगा, जिसके लिए वे जश्न मना सकते हैं, साझा कर सकते हैं और गर्व महसूस कर सकते हैं। लेकिन, इन सबके बीच लगभग 12.88 करोड़ जीवंत बिहारियों और बिहार सरकार के सामने करोड़ों डॉलर का यह अहम सवाल होगा कि- ज्ञान की यह पवित्र भूमि कब अवसरों और समाधान की भूमि बनेगी? बिहार दिवस हर साल 22 मार्च को ब्रिटिश शासन द्वारा राज्य को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करने के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। 21 मार्च, 1912 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी गवर्नर थॉमस गिब्सन कारमाइकल द्वारा बंगाल को चार प्रांतों- बंगाल, उड़ीसा, बिहार और असम में विभाजित करने की घोषणा की गई थी। बाद में 1936 में, ओडिशा को बिहार से अलग कर दिया गया था और पुनः वर्ष 2000 में झारखंड राज्य बनाया गया था। 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सुशासन बाबू नीतीश कुमार के पदभार संभालने के बाद फिर से यह दिन बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा और इसे सबसे पहले वर्ष 2010 में बड़े पैमाने पर मनाया गया था। बिहार दिवस का उत्सव, केवल बिहार राज्य और भारत में ही सीमित नहीं है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोप, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमरीका और त्रिनिदाद जैसे अन्य देशों में रहने वाले बिहारी प्रवासी भी इस दिन को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। इस वर्ष बिहार दिवस का थीम (विषय) बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी योजना, जल जीवन हरियाली और नल-जल योजना पर केंद्रित है। यह थीम बिहार सरकार द्वारा लोगों में वार्षिक वर्षा की घटती दर, कई जिलों में घटते जल स्तर, जल सुरक्षा के लिए खतरा और राज्य भर में हरियाली के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए रखा गया है। सोशल मीडिया के युग में, जहां लगभग हर कोई हर विषय पर विशेषज्ञ बन गया है और एक राष्ट्र के रूप में हम आभासी जगद-गुरु के सुनहरे दौर से गुजर रहे हैं। यह मुझे याद दिलाता है, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार हरिशंकर परसाई (1924-1995) जी के एक प्रचलित उद्धरण का, हम मानसिक रूप से दोगले नहीं तिगले हैं। संस्कारों से सामन्तवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध-पूंजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं। बिहार को समझने के लिए, हमें "द बिहार फाइल्स" को समझना होगा, जो विभिन्न आयामों के माध्यम से बिहार के आख्यानों के इर्द-गिर्द घूमती है। यह उसी तर्ज पर है, जैसे अभी पूरा भारत "द कश्मीर फाइल्स" की लहर से गुजर रहा है, और सबका अपना आख्यान और सत्य है, जो धारणा और प्रकाशिकी की राजनीति के बीच छिपा हुआ है। कुछ बुद्धिजीवियों ने बिहार को रुकतापुर की संज्ञा दे दी, यानि ऐसी जगह जहां विकास के पहिये जाम हो गए। हालांकि, यह लगभग हर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विकास सूचकांकों में बिहार राज्य के साल दर साल खराब या सबसे खराब प्रदर्शन के अनुरूप भी है- फिर चाहे वह सतत विकास लक्ष्य सूचकांक हो, भोजन, कपड़े, आवास, स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं से संबंधित सूचकांक हों, प्रशासन के सभी स्तरों में मौजूद बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, प्रशासन और शासन और सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में जवाबदेही, नैतिकता, सत्यनिष्ठा और जवाबदेही का अभाव, व्यापार करने में आसानी में चुनौतियां, आम बिहारियों की सुरक्षा और आबादी के हाशिए पर रहने वाले वर्ग- जैसे कि महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, एलजीबीटी की भलाई। इन सभी ने अंततः राज्य को बीमारू श्रेणी या तथाकथित रुक्तापुर में में धकेल दिया। बॉलीवुड के सिल्वर स्क्रीन, मीडिया और गैर-सूचित कथाओं ने भी पिछले कुछ वर्षों में बिहार के बारे में कई नकारात्मक धारणाएं पैदा की हैं। भगवान बुद्ध, भगवान महावीर और गणितज्ञ आर्यभट्ट की पवित्र और ज्ञानी भूमि के रूप में बिहार, भारतीय सभ्यता की पालना, माता सीता की जन्मभूमि, भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की जन्मभूमि ये सभी अच्छे और सकारात्मक पहलू छिपे हुए हैं। और इसकी जगह भारत का सबसे पिछड़ा राज्य, बेरोजगार युवाओं की फौज वाला प्रांत, भूखे और कुपोषित बच्चों वाला राज्य जैसे आख्यानों ने ले लिया। अधिकांश भारतीयों की नज़र में आधुनिक बिहार का एकमात्र सकारात्मक पहलू यह है कि बिहार सबसे अधिक संख्या में सिविल सेवा अधिकारियों, वैज्ञानिकों और अभियंता का घर भी है। अब आगे क्या और कैसे बने बिहार : अपने 110वें जन्मदिन के मौके पर, बिहार को कई सवालों के जवाब देने और शासन और प्रशासनिक घाटे और विकासात्मक असमानताओं से जुड़ी चुनौतियों को हल करने के लिए कई विकासात्मक आयामों में आगे बढ़ना है। फिर चाहे, वो आर्थिक हल, युवाओं को बल या युवा शक्ति-बिहार की प्रगति, नीति की आकांक्षा हो, जो सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी के मिश्रित दृष्टिकोण से ही संभव है। इस दिशा में, बिहार उद्योग संघ के साथ उद्योग विभाग, बिहार सरकार द्वारा हाल ही में संपन्न बिहार स्टार्ट अप कॉन्क्लेव (12 मार्च 2022) का आयोजन एक स्वागत योग्य कदम है और इसमें बिहार को स्टार्ट-अप कैपिटल में बदलने की क्षमता है, यदि इस प्रक्रिया में शामिल प्रत्येक हितधारक अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम प्रयास करते हैं और इसके बाद प्रत्येक स्तर पर लगातार और उचित अनुवर्ती कार्रवाई करते हैं। जब भारत ने 2016 में अपनी स्टार्ट-अप नीति लागू की, तो बिहार देश का पहला राज्य था, जिसने 10 लाख रुपये के सिड कोष (फंड) के साथ शुरुआत की। इसके अलावा, एक विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण पर ध्यान देना, प्रवासी भारतीयों (बिहारी) को निवेश बोर्ड में रखते हुए, नौकरशाही लालफीताशाही को दरकिनार करने के लिए एक जवाबदेह और पारदर्शी फास्ट ट्रैक अनुमोदन तंत्र भी ब्रेन-ड्रेन (प्रतिभा पलायन) को रोकेगा और रिवर्स ब्रेन-ड्रेन की संस्कृति को चालू करेगा। राज्य में अनछुए और कम ज्ञात पर्यटन स्थलों को ध्यान में रखते हुए पर्यटन क्षेत्र में निवेश पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कदम, वैश्विक महामारी कोविड -19 के पहली और दूसरी लहरों से सबक लेते हुए स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे (प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल) में निवेश, शिक्षा प्रणाली का एक पूर्ण ओवरहाल, प्रवास और प्रवासी श्रमिकों के लिए स्थायी एंटी-डॉट तैयार करना ताकी उन्हे देश के दूसरे राज्यों से बार बार धक्का और गाली खाकर घर आना न पडे़, अन्य सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए शराबबंदी जैसी मजबूत नीति, और महत्वाकांक्षी सात निश्चय योजनाओं (2.0) के वास्तविक कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना, आदि से हीं आत्मनिर्भर बिहार बनाया जा सकता है।

Published / 2022-03-21 14:56:04
हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार की दर अधिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (महेश व्यास)। कोविड-19 महामारी का प्रसार रोकने के लिए 2020 में लगी पाबंदी (लॉकडाउन) के बाद भारतीय श्रम बल में शिक्षा स्तर के आधार पर काफी बदलाव आया है। कम पढ़े-लिखे लोगों के समूह को रोजगार का अधिक नुकसान हुआ है। अधिक पढ़े-लिखे लोगों की भी नौकरियां गईं। स्नातक एवं स्नातकोत्तर उत्तीर्ण लोग अब भी रोजगार छिनने की त्रासदी से उबर नहीं पाए हैं। दूसरी तरफ उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त लोगों को अधिक रोजगार मिले हैं। कम और अधिक पढ़े-लिखे दोनों तरह के लोगों को नुकसान हुआ है, मगर इन दोनों श्रेणियों के बीच आने वाले लोगों को लाभ हुआ है। कोविड महामारी आने तक स्नातक एवं स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त लोगों की नौकरियां बनी रहीं। ऐसे लोगों की संख्या 2016-17 में 5.15 करोड़ थी जो 2017-18 में बढ़कर 5.29 करोड़ हो गई। वर्ष 2018-19 में यह संख्या और बढ़कर 5.43 करोड़ हो गई। 2019-20 में इनकी संख्या कम जरूर हुई थी मगर वर्ष के अंत में ऐसे लोगों की संख्या 5.4 करोड़ हो गई। श्रम बल में स्नातकोत्तर तक पढ़े लोगों की संख्या 2016-17 में 12.5 प्रतिशत से बढ़कर 2018-19 में 13.4 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2019-20 में यह कम होकर 13.2 प्रतिशत रह गई। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियां बढ़कर 5.56 करोड़ हो गई। कोविड महामारी के दस्तक देने से ठीक पहले का यह आंकड़ा था। लॉकडाउन के तत्काल प्रभाव के रूप में 1 करोड़ से अधिक स्नातक एवं स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियां चली गईं। इनकी नौकरियों की संख्या जून 2020 में समाप्त तिमाही में 4.49 करोड़ हो गई। मगर शुरू में स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियों पर असर नहीं हुआ इसलिए कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी थोड़ी अधिक बढ़कर 13.7 प्रतिशत हो गई। मगर यह बढ़त अस्थायी ही थी। लॉकडाउन का पूर्ण और दीर्घ असर सितंबर 2020 में समाप्त हुई तिमाही में नजर आया। स्नातकोत्तर पास लोगों के रोजगार कम होकर 4.37 करोड़ रह गए और कुल श्रमबल में इनकी हिस्सेदारी इस तिमाही के दौरान कम होकर 11.1 प्रतिशत रह गई। यह वास्तव में भारत में श्रमबल का हिस्सा रहे लोगों की शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ी गिरावट थी। हालांकि इसमें धीरे-धीरे सुधार हो रहा है मगर यह पर्याप्त नहीं है। दिसंबर 2021 की तिमाही तक 12.2 प्रतिशत स्तर पर भारत के कार्यबल में स्नातकोत्तर पास लोगों की हिस्सेदारी अप्रैल 2020 से पूर्व के 13.7 प्रतिशत से काफी खराब थी। फरवरी 2022 तक भारतीय श्रम बल में 5.03 करोड़ स्नातक और स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त लोग थे। यह फरवरी 2020 के 5.73 करोड़ स्नातकोत्तर पास लोगों की संख्या में 70 लाख कम है। दूसरी तरफ श्रमबल में ऐसे लोग हैं जिनकी शिक्षा उच्चतर माध्यमिक से भी कम है। उन्होंने दसवीं की परीक्षा भी उत्तीर्ण नहीं की थी। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में श्रम बल में उनकी हिस्सेदारी 54.5 प्रतिशत थी। दिसंबर 2021 की तिमाही तक उनकी हिस्सेदारी कम होकर 49 प्रतिशत रह गई। सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के इस समूह के लिए जोखिम भी अधिक हैं। जून 2020 तिमाही में इन लोगों की नौकरियों में 30 प्रतिशत की तेज गिरावट आ गई। इसके बाद जब अगली तिमाही में लॉकडाउन लगभग पूरी तरह हटा लिया गया तो इस समूह में रोजगार में 31 प्रतिशत तेजी आई। इस समूह में रोजगार अनौपचारिक होता है इस वजह से इनती तेजी आई। मगर चुनौतियां अब भी कायम हैं। सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के इस समूह में रोजगार में लगातार गिरावट आई है। फरवरी 2022 में जिन लोगों ने अपनी दसवीं परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी उनमें रोजगार की संख्या 19.28 करोड़ थी। फरवरी 2020 की तुलना में यह 11.6 प्रतिशत कम थी। यह गिरावट इसी अवधि के दौरान आई 2.2 की कुल गिरावट की तुलना में कहीं अधिक है। रोजगार में लगातार आई कमी के दौर में फायदा उन लोगों को हुआ जिन्होंने 10वीं या 12वीं की परीक्षा पास की थी। इस समूह में रोजगार और कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी महामारी से पहले भी लगातार बढ़ रही थी। वर्ष 2016-17 में उनकी हिस्सेदारी कुल रोजगार में 27.9 प्रतिशत थी। 2017-18 में यह बढ़कर 29.7 प्रतिशत हो गई। 2018-19 में यह 30.5 प्रतिशत और 2019-20 में यह 31.3 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2020-21 में उच्च माध्यमिक उत्तीर्ण लोगों की संख्या 38 प्रतिशत हो गई। यह बढ़ोतरी अचानक एवं तेज थी। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी 31.8 प्रतिशत थी। अप्रैल-जून 2020 के दौरान यह हिस्सेदारी 39 प्रतिशत हो गई। तब से यह हिस्सेदारी 37 से 39 प्रतिशत के बीच रही है। पाबंदी जब चरम पर थी तो उच्च विद्यालय उत्तीर्ण लोगों में रोजगार बरकरार रहने की दर अधिक रही। अप्रैल 2020 में सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों (जिन्होंने दसवीं कक्षा की परीक्षा भी पास नहीं की थी) के समूह में रोजगार दर 38 प्रतिशत कम हो गई और स्नातकोत्तर पास लोगों के मामले में यह 20 प्रतिशत तक फिसल गई। उच्च विद्यालय (हाई स्कूल) पास लोगों के मामले में यह गिरावट 17 प्रतिशत के साथ थोड़ी कम रही। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि हाई स्कूल तक शिक्षा रखने वाले लोगों ने रोजगार के मामले में अधिक तेजी से वापसी की। जून 2020 में समाप्त हुई तिमाही में सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के बीच रोजगार 30 प्रतिशत कम हो गया और स्नातकोत्तर तक शिक्षा रखने वाले लोगों में यह 19 प्रतिशत कम हो गया। मगर हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार में केवल 1 प्रतिशत गिरावट आई। फरवरी 2022 में हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार फरवरी 2020 की तुलना में रोजगार 18 प्रतिशत अधिक था। दूसरी तरफ, सबसे कम पढ़े-लिखे और स्नातकोत्तर पास लोगों में फरवरी 2020 के स्तर की तुलना में रोजगार का स्तर 12 प्रतिशत कम था। स्नातक पास लागों में बेरोजगारी दर सबसे अधिक यानी 19 प्रतिशत से अधिक रही है। अगर इस तथ्य को ऊपर के विश्लेषण के संदर्भ में देखें तो हाई स्कूल से अधिक शिक्षा के बाद नौकरी मिलने की संभावना कम हो जाती है। (लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)

Published / 2022-03-15 12:43:26
आजादी के 75 साल बाद बढ़ती उम्मीद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। आजादी की पचहरवीं वर्षगांठ मनाने की ओर अग्रसर होते हुए नया भारत बनाने, भारत को नये सन्दर्भों के साथ संगठित करने, राष्ट्रीय एकता को बल देने की चचार्एं सुनाई दे रही है। इसकी आवश्यकता इसलिये महसूस की जा रही है क्योंकि हम आजाद हो गये, लेकिन हमारी मानसिकता एवं विकास प्रक्रिया अभी भी गुलामी की मानसिकता को ओढ़े हैं। शिक्षा से लेकर शासन व्यवस्था की समस्त प्रक्रिया अंग्रेजों की थोपी हुई है, उसे ही हम अपनाये जा रहे हैं। जीवन का उद्देश्य इतना ही नहीं है कि सुख-सुविधापूर्वक जीवन व्यतीत किया जाये, शोषण एवं अन्याय से धन पैदा किया जाये, बड़ी-बड़ी भव्य अट्टालिकाएं बनायी जाये और भौतिक साधनों का भरपूर उपयोग किया जाये। उसका उद्देश्य है- निज संस्कृति को बल देना, उज्ज्वल आचरण, सात्विक वृत्ति एवं स्व-पहचान। भारतीय जनता के बड़े भाग में राष्ट्रीयता एवं स्व-संस्कृति की कमी महसूस हो रही है। राष्ट्रीयता के बिना राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिये आजादी की पचहरवें वर्ष के आयोजनों का लक्ष्य है नया भारत-सशक्त भारत निर्मित करना। अपनी पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा-सूत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक, संघ के प्रचारक एवं शिक्षाविद् सुनील अंबेडकर ने नया भारत निर्मित करने की आवश्यकता उजागर करते हुए उसके इतिहास में सच्चाई के प्रतिबिम्बों को उभारने पर बल दिया है। भारत के इतिहास को धूमिल किया गया, धुंधलाया गया है, अन्यथा भारत का इतिहास दुनिया के लिये एक प्रेरणा है, अनुकरणीय है। क्योंकि भारत एक ऐसा शांति-अहिंसामय देश है जिसका न कोई शत्रु है और न कोई प्रतिद्वंद्वी। सम्पूर्ण दुनिया भारत की ओर देख रही है, उसमें विश्व गुरु की पात्रता निरन्तर प्रवहमान रही है, हमने कोरोना महामारी के एक जटिल एवं संघर्षमय दौर में दुनिया के सभी देशों के हित-चिन्तन का भाव रखा, सबका साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास मंत्र के द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया कि वसुधैव कुटुम्बकम- दुनिया एक परिवार है, का भारतीय दर्शन ही मानवता का उजला भविष्य है। इसी विचार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आगे बढ़ रहा है, वह एक अनोखा और दुनिया का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। यह भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे मुखर, सबसे प्रखर आवाज है। देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता उसका मूल उद्देश्य है। जैसे-जैसे संघ का वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रभाव देश और दुनिया में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हिंदुत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पित इस संगठन के बारे में जानने और समझने की ललक लोगों के बीच बढ़ती जा रही है। इस विशाल संगठन के विभिन्न विषयों पर विचार तथा इसकी कार्यप्रणाली से आमजन परिचित होना चाहते हैं। अंबेडकर की पुस्तक संघ से जुड़ी जिज्ञासाओं का प्रभावी, प्रासंगिक एवं तथ्यपरक विवेचन करती है। एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होते हुए भी संघ ने भारतीय राजनीति की दिशा को राष्ट्रीयता की ओर कैसे परिवर्तित किया है, यह समझने के लिए भी यह पुस्तक पढ़ना आवश्यक है। भारत की हिंदू अस्मिता, हिंदू समाज की उत्पत्ति व संघटन, विवाह, माता-पिता द्वारा संतान का पालन-पोषण, आपसी सौहार्द, सामाजिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता, आर्थिक स्थितियां, कृषि, जीवनशैली तथा ऐसे ही अन्य अनेक विषयों पर इसमें मुक्त भाव से चर्चा की गई है। भारत का विश्वगुरु के रूप में अभ्युदय एक महत्वपूर्ण प्रश्न रहा जिसकी विवेचना लेखक ने समग्र रूप से प्रस्तुत पुस्तक में की है, जो आजादी के पचहरवें वर्ष की आयोजना का मूल केंद्र है। राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व का अभियान लोकव्यापी बना और उसके वैचारिक पक्ष को समृद्ध बनाने में जिन लोगों का योगदान रहा उनमें डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार, एमएस गोलवाकर, वीर सावरकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय प्रमुख हंै। जो नये भारत के आदर्श पात्र एवं कर्णधार हैं। राजनीतिक स्वार्थों एवं संकीर्णताओं के चलते अब तक उनको उचित सम्मान नहीं मिला, अब संघ एवं भाजपा इसके लिये प्रयासरत है, जो नये भारत की बुनियाद को मजबूती देने के लिये आवश्यक है। न केवल व्यक्ति, परिवार बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व के संदर्भ में इन भारत निमार्ताओं ने आरएसएस का गहन और विस्तृत विश्लेषण करते हुए जो विचार दिए, उन्हीं विचारों को इस पुस्तक में संकलित कर हिंदुत्व अस्मिता एवं सुदृढ़ भारत का नया आलोक बिखेरा गया है। इस पुस्तक में सुनील आंबेकर ने हिंदुत्व की विशद् विवेचना करते हुए आरएसएस का विभिन्न संदर्भों- व्यक्ति, समाज, धर्म, शिक्षा एवं संस्कृति के साथ तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक संघ को परम प्रतिष्ठा देती है क्योंकि संभवत: इतनी सहज और सरल अभिव्यक्ति में संघ की गूढ़ एवं गहन विवेचना का यह अपना एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत पुस्तक में संघ के प्रति जन दृष्टिकोण एवं संघ का राष्ट्र निर्माण में योगदान का समन्वित प्रस्तुतीकरण है। भारत के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में संघ अनुभव करता है कि यहां बहुत से राजनीतिक दल होंगे किंतु वे सब प्राचीन भारतीय परंपरा एवं आध्यात्मिक धरोहर का सम्मान करेंगे। आधारभूत मूल्य तथा हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं के संबंध में एकमत होंगे। मतभेद तो होंगे लेकिन ये केवल देश के विकास के प्रारूपों के संदर्भ में ही होंगे। वहीं संघ के भविष्य के बारे में पुस्तक कहती है कि जब भारतीय समाज समग्र रूप में संघ के गुणों से युक्त हो जाएगा, तब संघ तथा समाज की दूरी समाप्त हो जाएगी। उस समय संघ संपूर्ण भारतीय समाज के साथ एकाकार हो जाएगा और एक स्वतंत्र संगठन के रूप में इसके अस्तित्व की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। संघ देश के समक्ष चुनौतियों को लेकर भी अत्यंत गंभीर है। इनमें इस्लामी आतंकवाद, नक्सलवाद अवैध घुसपैठ, हिंदुओं की घटती जनसंख्या, हिंदुओं का धर्मांतरण जैसे विषय शामिल हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह पुस्तक, जो संघ से परिचित हैं उनकी समझ एवं सोच को परिष्कृत करेगी।

Published / 2022-03-13 16:13:45
चार राज्यों की सफलता के बाद गुजरात में पीएम मोदी की रणभेरी

एबीएन डेस्क (अदिति फडणीस-विनय उमरजी)। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों में से चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जीत दर्ज करने के एक दिन बाद बगैर कोई समय गंवाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के दौरे पर गुजरात की सड़कों पर उतरे। इस राज्य में साल के अंत में चुनाव होने हैं। प्रधानमंत्री ने अहमदाबाद से पार्टी के चुनाव अभियान की प्रभावी शुरुआत शुक्रवार को कर दी। इसे एक आकस्मिक फैसला कहा जा सकता है क्योंकि भाजपा की राज्य इकाई को यात्रा आयोजित करने के लिए बहुत कम समय मिला। लेकिन फिर भी सड़कों पर भारी भीड़ दिखी क्योंकि मोदी फूलों से भरी एक खुली कार में सवार होकर रोडशो करते हुए हाथ हिला रहे थे। उनके रोड शो की शुरुआत हवाई अड्डे से लेकर गांधीनगर में भाजपा के राज्य मुख्यालय कमलम तक हुई जो हवाई अड्डे से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। मोदी ने पंचायत निकायों के एक लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों की रैली को भी संबोधित किया। वह नवरंगपुरा के सरदार पटेल स्टेडियम में शनिवार को खेल महाकुंभ 2022 में उपस्थित रहेंगे और राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। रोडशो के भाजपा मुख्यालय तक पहुंचने के वक्त तक "जय श्री राम", "भारत माता की जय" के नारे लगते सुनाई दे रहे थे। उनके सम्मान में एक विशाल रंगोली तैयार की गई थी और संतों और संन्यासियों की तर्ज पर भगवा रंग के कपड़े पहने प्रधानमंत्री ने अर्घ्य दिया। मोदी ने लोगों से खचाखच भरे सभा स्थल पर पंचायत प्रमुखों से कहा, गांव कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने में सफल रहे हैं। मैं ग्राम प्रधानों को उनके प्रयासों के लिए बधाई देता हूं। मैं देश के किसानों को भी बधाई देता हूं कि उनकी वजह से महामारी के दौरान खाद्य आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन के दौरान महात्मा गांधी और सरदार पटेल का जिक्र भी किया। प्रधानमंत्री ने कहा, गुजरात, बापू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की धरती है। बापू हमेशा ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भर गांवों की बात करते थे। आज, जब हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं ऐसे में हमें ग्रामीण विकास के बापू के सपने को पूरा करना चाहिए। उन्होंने गुजरात के एकमात्र प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का उल्लेख नहीं किया। उन्होंने कहा, ग्राम स्वराज के सपने को पूरा करने के लिए एक मजबूत पंचायती राज बुनियादी ढांचा महत्त्वपूर्ण है। सभी पंचायत सदस्य और सरपंच इस उद्देश्य को हासिल करने की दिशा में काम कर रहे हैं। गुजरात में 2021 में पंचायत चुनाव आयोजित किए गए थे, हालांकि आधिकारिक तौर पर ये चुनाव दलों से इतर तर्ज पर लड़े गए थे लेकिन जिन अधिकांश उम्मीदवारों ने जीत हासिल की वे भाजपा के सदस्य हैं। भाजपा ने सभी 31 जिला पंचायतों के साथ-साथ 231 तालुका पंचायतों में से 196 और 81 नगरपालिकाओं में से 74 में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। राज्य में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केवल एक नगरपालिका और 18 तालुका पंचायतों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया जबकि एआईएमआईएम और आम आदमी पार्टी (आप) ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कांग्रेस जिन पंचायतों में सत्ता में थी वहां भी हार गई। इस बीच, दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि आप गुजरात चुनाव भी उसी तर्ज पर लड़ने के लिए तैयार है जैसे कि उसने पंजाब में खुद को संगठित किया था और कहा कि दिल्ली और पंजाब मॉडल को गुजरात में भी दोहराया जाएगा।

Published / 2022-03-11 16:47:26
बुल्डोजर मंत्र के सामने सपा गई चूक...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अतुल सिन्हा)। उत्तर प्रदेश में डबल इंजन और बुल्डोजर का मंत्र कुछ इस कदर सिर चढ़कर बोला कि विपक्षी गठबंधन के सपने चकनाचूर हो गए। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग पूरी तरह फेल हुई तो प्रियंका गांधी का लड़की हूं, लड़ सकती हूं का जबरदस्त अभियान फ्लॉप हो गया। बेशक समाजवादी पार्टी एक मजबूत विपक्ष बनकर जरूर उभरने में कामयाब रहा। अगर आपने अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी के अभियानों और सभाओं की भीड़ देखी होगी और खासकर अखिलेश यादव के हौसले देखे होंगे तो यह मानना मुश्किल हो रहा होगा कि आखिर नतीजे ऐसे कैसे आ गए। लेकिन भाजपा की जो कार्यशैली रही है और जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम दिग्गज नेताओं ने खुद को यूपी पर केन्द्रित किया है, उससे ये नतीजे बहुत हैरत नहीं पैदा करते। दरअसल, पिछले कई सालों से यूपी की सियासत एक खास दिशा में चलती रही है और अगर आप भाजपा की रणनीतियों पर गौर करें तो उसका सबसे बड़ा रणक्षेत्र यही प्रदेश रहा है। बेशक राम मंदिर और अयोध्या अब विवादास्पद या चुनावी मुद्दा न रहा हो, लेकिन मंदिर की राजनीति और हिन्दुत्व की प्रयोगशाला में भाजपा ने इस प्रदेश में अपनी पुख्ता जमीन जरूर तैयार कर ली है। उसे सबसे बड़ा फायदा अगर मिला है तो वह है यहां के बिखरे हुए और कमजोर विपक्ष का। सपा के दागदार अतीत और बसपा की लगातार कमजोर होती जमीन, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की बदहाली और इन तमाम पार्टियों से लोगों का तेजी से मोहभंग, भाजपा के लिए हमेशा से फायदेमंद रहा है। बतौर विपक्ष अगर देखें तो इस बार समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर से खड़े होने की कोशिश जरूर की है। चुनाव से पहले के गठबंधन की जो रणनीति बनी थी बेशक उस पर कई सवाल अब उठेंगे और उसकी खामियों का भी विश्लेषण जरूर होगा। लेकिन इतना तो जरूर है कि जब विपक्ष इतने खेमों में बंटा हो और सबके अपने-अपने अहंकार हों तो भला आप भाजपा जैसी पार्टी को सत्ता से कैसे उखाड़ सकते हैं। यूपी के चुनावी गणित कम पेचीदा नहीं हैं। जातिगत आधार पर देखें या धर्म-संप्रदाय के आधार पर, यहां मुख्य मुद्दे हर बार कहीं न कहीं गुम हो जाते हैं और वोटों का ध्रुवीकरण इन आपसी बयानबाजियों और आरोपों-प्रत्यारोपों के भावनात्मक जाल में उलझ कर रह जाता है। यूपी में जिस विपक्ष को कोरोना में सरकार की नाकामी, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्या, छुट्टा पशु से त्रस्त किसान, लखीमपुर कांड या महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे अहम लग रहे थे, वहीं भाजपा के लिए इनकी कोई अहमियत नहीं थी। विपक्ष लगातार लोगों में ये अवधारणा बनाने की कोशिश करता रहा कि योगी सरकार तमाम मोर्चों पर नाकाम रही है, वहीं योगी और उनकी टीम डबल इंजन, विकास की गाथाएं, सरकारी योजनाओं के लाभ को अंतिम आदमी तक पहुंचाने के साथ गुंडों, दंगइयों पर बुल्डोजर चलाने के साथ-साथ वाराणसी, अयोध्या और अन्य धर्मस्थलों के कायाकल्प की बात करते रहे। बेशक उनके लाभार्थियों ने उनकी बात सुनी और उन्हें दोबारा मौका दे दिया। लेकिन अब ये अहम सवाल है कि क्या इन नतीजों की रोशनी में हमें सपा या विपक्ष को एकदम कमजोर या असरहीन मान लेना चाहिए? क्या इसे 2024 में मोदी को वॉकओवर देने वाले नतीजे के तौर पर देखा जाना चाहिए? या फिर इससे सीख लेकर विपक्ष को नए और धारदार तरीके से अपनी रणनीति तैयार करने के तौर पर देखा जाना चाहिए। बेशक भाजपा ने यूपी में इतिहास रचा है। पहली बार प्रदेश में कोई सरकार दोबारा बनी है। इसने कई मिथक भी तोड़े हैं लेकिन पिछली बार की तुलना में देखें तो अखिलेश यादव की सपा को भी लोगों ने नकारा नहीं है। पिछली बार जहां विपक्ष सत्ता पक्ष के आगे कहीं नहीं ठहरता था, वहां इस बार वह एक मजबूत ताकत के तौर पर जरूर उभरा है। कांग्रेस को जरूर आत्ममंथन करने की जरूरत है कि आखिर उनकी स्टार महासचिव और लोगों से सीधा कनेक्ट करने वाली, भावनात्मक तौर पर जुड़ने की कोशिश करने वाली प्रियंका गांधी को भी लोगों ने क्यों ठुकरा दिया और क्यों अब कांग्रेस का वजूद इस नई पीढ़ी के नेतृत्व में लगातार खतरे में पड़ता दिख रहा है। अगर अब भी कांग्रेस अपने नेतृत्व में बदलाव और संगठन की खामियों को लेकर गंभीर नहीं हुई तो आने वाले कुछ राज्यों के चुनावों के साथ-साथ 2024 में उसकी हालत और खस्ता हो सकती है। यूपी तो एक बानगी भर है। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग अब आम लोगों को या उनके तथाकथित वोट बैंक को कमरे में बंद होकर नहीं पसंद आ रही। न तो उनमें वो धार बची, न सियासत करने का वो जज्बा। ऊपर से उनके भाजपा के साथ दोस्ताना रिश्तों की चर्चा और आने वाले वक्त में उपराष्ट्रपति बनने की महत्वाकांक्षा। अब पता नहीं भाजपा के साथ भीतर ही भीतर उनकी क्या बात हुई कि उन्होंने पूरी पार्टी को ही दांव पर लगा दिया। ऐसे में अब भी अगर यूपी के लोगों के लिए उम्मीद की कोई किरण हैं तो वे थोड़े-बहुत अखिलेश यादव ही हैं। बेशक इस बार अखिलेश यादव ने अपने गठबंधन और प्रत्याशियों के चयन में कई रणनीतिक गलतियां कीं, जिसका खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। सपा के दागदार इतिहास को दोहराते हुए उन्होंने एक बार फिर ऐसे ही कई दागदार उम्मीदवार उतारने की गलती की। अपने सहयोगियों में न तो राष्ट्रीय लोकदल को सही प्रतिनिधित्व दे पाए और चाचा शिवपाल यादव को खुश करने के चक्कर में अपने ही कुछ लोगों को नाराज होने से भी नहीं बचा पाए। इससे कम से कम उन्हें पचास सीटों का नुकसान तो हुआ ही। जाहिर है ये सपा की अंदरूनी चिंता का विषय है और अखिलेश की टीम इसकी समीक्षा करेगी। लेकिन फिलहाल तो अगले पांच साल एक बार फिर योगी आदित्यनाथ और भाजपा के खाते में चले गए। जाहिर है हर पार्टी अपनी हार की रणनीतिक खामियों की समीक्षा करेगी, कुछ समय बाद फिर से उठ खड़ी भी होगी। कुछ का मोहभंग होगा तो कुछ फिर से सत्ताधारी पार्टी की तरफ दौड़ लगाएंगे, लेकिन सियासत में जंग कभी खत्म नहीं होती। खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश और सत्ता के दांवपेंच कभी कम नहीं होते। फिलहाल, यूपी में जश्न का माहौल है। भाजपा की जबरदस्त कामयाबी के बीच अब सबकी निगाह साल 2024 के इंतजार में है।

Published / 2022-03-09 16:08:31
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की असली परीक्षा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सूरज शाहदेव)। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर दुनियाभर की नजर है।युध्द से पहले एक आशंका थी कि कही यह तीसरा विश्व युद्ध की शुरूआत न कर दे। लेकिन रूस के यूक्रेन में आक्रमण के बाद अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देश यूक्रेन का साथ दे रहे है। तो वही दूसरी तरफ रशियन संगठन के 11 देशों के सेना मिलकर इस युद्ध मे भाग ले रहे है। यूक्रेन के साथ साथ पूरे विश्व को लगता था की अगर रूस यूक्रेन पर हमला करेगा तो नाटो देश की सेना यूक्रेन के साथ मिलकर रूसी सेना के साथ लड़ेंगे लेकिन जो नजारा देखने को मिल रहा है वह सोच से उलट है। ये नाटो के देश सिर्फ बन्दर घुड़की दे रहे थे सैन्य मदद से पूरी तरह से पीछे हट गए है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तो अपने सेना भेजने से साफ इंकार कर दिया है। रूस ने साफ साफ कहा है कि जो भी देश यूक्रेन के पक्ष में लड़ने आएगा उसे गंभीर अंजाम भुगतने पड़ेंगे। अभी भारत के सामने बड़ी चुनौती है कि आखिर वह इस मसले पर क्या रुख अख्तियार करे। दरअसल रूस भारत का लंबे समय से मित्र देश रहा है और अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक महत्ता का देश है। लिहाजा भारत दोनों में से किसी भी देश के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेगा। भारत शुरू से ही गुटनिरपेक्ष देश रहा है।प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूएसएसआर का गठन किया गया था और यूक्रेन भी इसका हिस्सा था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने नाटो का गठन किया। और 1945 से लेकर 1991 तक लगातार रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चलता रहा। इस युद्ध मे कोई सेना नही कोई हथियार नही बल्कि मीडिया और बयानों के माध्यम से रूस को कमजोर करने की कोशिश होती रही। अमेरिका लगातार रूस को तोड़कर कमजोर करने की कोशिश में रहा। आखिरकार अमेरिका को यह सफलता 1991 में मिल ही गया और रूस से लगभग 15 देश अलग हो गए जिसमे यूक्रेन भी शामिल था। ब्लादिमीर पुतिन जब रूस के प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बने तब से वे लगातार रूस को मजबूत करने की कोशिश करते रहे जो देश रूसी संगठन से अलग हो गए थे उन्हें फिर से अपने साथ लाने में सफल हो गए। लेकिन 2010 में जब यूक्रेन ने रूस का विरोध करके नाटो में शामिल होने की कवायद शुरू की तो रूस नाराज हो गया। रूस-यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में तब शुरू हुआ जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का कीव में विरोध शुरू हुआ. यानुकोविच को रूस का समर्थन हासिल था जबकि प्रदर्शनकारियों को अमेरिका और ब्रिटेन का. बगावत के चलते फरवरी 2014 में यूक्रेन के राष्ट्रपति यानुकोविच को देश छोड़कर रूस में शरण लेनी पड़ी थी। रूस ने 2014 में यूक्रेन के एक आइलैंड क्रीमिया पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया। तब यूक्रेन और रसिया के बीच तनाव और बढ़ गया। वास्तव में रूस नही चाहता है कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो। नाटो एक सैन्य समूह है जिसमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश शामिल हैं। अब रूस के सामने चुनौती यह है कि उसके कुछ पड़ोसी देश पहले ही नाटो में शामिल हो चुके हैं। इनमें एस्टोनिया और लातविया जैसे देश हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे। अब अगर यूक्रेन भी नाटो का हिस्सा बन गया तो रूस हर तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिर जाएगा और अमेरिका जैसे देश उस पर हावी हो जाएंगे। अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जाता है और रूस भविष्य में उस पर हमला करता है तो समझौते के तहत इस समूह के सभी 30 देश इसे अपने खिलाफ हमला मानेंगे और यूक्रेन की सैन्य सहायता भी करेंगे। रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन ने एक बार कहा था कि यूक्रेन को खोना रूस के लिए एक शरीर से अपना सिर काट देने जैसा होगा। यही कारण है कि रूस नाटो में यूक्रेन के प्रवेश का विरोध कर रहा है। यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। जब 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस पर हमला किया गया तो यूक्रेन एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहां से रूस ने अपनी सीमा की रक्षा की थी। अब अगर यूक्रेन नाटो देशों के साथ चला गया तो रूस की राजधानी मास्को, पश्चिम से सिर्फ 640 किलोमीटर दूर होगी। फिलहाल यह दूरी करीब 1600 किलोमीटर है।इसे लेकर ही रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन नही चाहते थे कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो और रूस के लिए खतरा बने। अब इन दोनों देशों के बीच छिड़ी जंग में पूरी दुनिया की नजर भारत के रुख पर है। अमेरिका सहित यूरोपियन देश चाहते है कि भारत रूस की आलोचना करे। लेकिन भारत अपनी सुरक्षा हित को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेगा। भारत का सम्बंध रूस के साथ बहुत ही अच्छा है। भारत की 55 प्रतिशत सैन्य उपकरण रूस से ही आयात होते है। रूस जरूरत के समय खुल कर भारत का साथ देता रहा है। रूस भारत और चीन विवाद के बीच तटस्थ रुख अपनाया है। 1998 का परमाणु परीक्षण हो या फिर कश्मीर का मसला हो रूस हमेशा भारत के पक्ष में रहा है। ऐसे समय मे अगर भारत रूस के खिलाफ जाएगा तो चीन रूस के और नजदीक आएगा जो भारत के लिए खतरनाक हो सकता है।अत: भारत कभी अपने मित्र देश को नाराज नही करना चाहेगा। अभी पिछले 10 सालों से अमेरिका के साथ भी भारत का सम्बंध बहुत ही प्रगाढ़ हुआ है। अमेरिका भारत के साथ मिलकर क्वाड का गठन किया है जिसमे अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया एवम भारत शामिल है। इस क्वाड का गठन एशिया में चीन कि बढ़ती प्रभाव के खिलाफ किया गया है। अमेरिका भी अच्छी तरह से जानता है कि दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत एक बहुत ही अहम देश है अत: अमेरिका भी भारत को नाराज नही करना चाहेगा। जिस प्रकार से चीन और पाकिस्तान रूस के साथ अपना सम्बन्ध को मजबूत बनाने में लगे हुए है इसको लेकर भी भारत सतर्क है। यूक्रेन और रूस के मामले में भारत कोई भी फैसला लेगा तो इस बात पर भी गौर जरूर करेगा। अत: भारत रूस एवम अमेरिका दोनों को ही नाराज नही करना चाहेगा।

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