एबीएन एडिटोरियल डेस्क (गुरबचन सिंह)। भारत सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में अपनी पांच फीसदी हिस्सेदारी का विनिवेश कर रही है। कंपनी का नियंत्रण भारत सरकार के पास रहेगा। यह संभव है कि भारत सरकार समय के साथ इसमें कुछ और हिस्सेदारी बेचे। ऐसा प्रतीत होता है कि बिक्री की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजमार्ग जैसी परियोजनाओं के लिए भी किया जाएगा। यदि ऐसा होता भी है तो क्या यह सब आर्थिक दृष्टि से उचित प्रतीत होता है? एलआईसी जैसे संस्थान संभवत: कई लोगों के दिल के करीब होते हैं। बहरहाल, आर्थिक दृष्टि से इस पर नजर डालने पर कमजोरी नजर आएगी। अक्सर कहा जाता है कि कारोबार करना सरकार का काम नहींं है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत सरकार को प्रासंगिक कानूनों में संशोधन करने के बाद एलआईसी का निजीकरण कर देना चाहिए। उसे कंपनी पर से नियंत्रण भी त्याग देना चाहिए और नियंत्रण हिस्सेदारी को सही कीमत पर निजी क्षेत्र के किसी उचित खरीदार के हवाले कर देना चाहिए। जबकि शेष हिस्सेदारी को चरणबद्ध तरीके से निवेशकों को बेच देना चाहिए। यह सच है कि एलआईसी ने समय के साथ काफी स्थायी ढंग से वृद्धि हासिल की है। यही कारण है कि अब यह इतनी बड़ी कंपनी बन चुकी है। हालांकि इसकी तथाकथित सफलता का ज्यादातर श्रेय बीमा कारोबार पर इसके आधी सदी के एकाधिकार को दिया जाता है। परंतु वह किस्सा तो कब का समाप्त हो चुका है। पहले धीरे-धीरे बदलाव नजर आना शुरू होगा और उसके बाद एक स्तर पर तेज परिवर्तन दिखाई देने लगेगा। इसलिए अब निजीकरण करने का वक्त आ गया है। अब इससे संबंधित पुराने अनुभवों पर एक नजर डालते हैं। सरकारी बैंकों में भी विनिवेश किया गया था लेकिन उनका निजीकरण नहीं किया गया। इसके नतीजे न तो करदाताओं के लिए अच्छे रहे और न ही अर्थव्यवस्था के लिए। दूसरी ओर जिन मामलों में हमने सही तरीके से निजीकरण किया वहां अनुभव काफी बेहतर रहा। अब एलआईसी के निजीकरण का समय आ गया है लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। सरकार ने एलआईसी को पूरे भारत में कारोबार का एकाधिकार दिया था। अब जरा इस बात पर इस पर विचार कीजिए कि इसकी जगह हर राज्य सरकार की अपनी अलग एलआईसी होती और उस राज्य में उसका एकाधिकार होता। ऐसी स्थिति में उस कंपनी को होने वाला मुनाफा और बाजार पूंजीकरण राज्यों के बीच साझा होता। अब समय आ गया है कि इसमें सुधार किया जाए तथा प्रस्तावित निजीकरण से होने वाली प्राप्तियों को राज्यों के साथ साझा किया जाए। परंतु इसकी एक और वजह भी है। यह सही है कि कारोबार करना सरकार का काम नहीं है लेकिन कुछ ऐसी सार्वजनिक वस्तुएं तथा सेवाएं प्रदान करना निश्चित रूप से सरकार का ही काम है जिन्हें मुहैया कराने में निजी क्षेत्र विफल हो जाता है- यानी जहां सही मायनों में बाजार विफलता का परिदृश्य बनता है। अब कई ऐसी सार्वजनिक वस्तुएं एवं सेवाएं हैं जिनमें सुधार और विस्तार की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि केवल भारत सरकार इसमें शामिल है बल्कि इसमें राज्यों की सरकारें भी शामिल हैं। दोनों को पैसे की आवश्यकता भी रहती है। यहां मैं तीन बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करूंगा- पुलिस, न्यायपालिका और कर प्रशासन। देश की आबादी के साथ तुलना करें तो हमारी पुलिस व्यवस्था का आकार कम है। इसमें सुधार करने तथा इसका विस्तार करने की जरूरत एकदम स्पष्ट है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि न्यायपालिका के बुनियादी ढांचे तथा मानव संसाधन में बहुत अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। हम सभी इस बात से परिचित हैं कि कैसे मानव संसाधन में कमी के चलते अदालतों में मामले लंबे चलते हैं। अब कर प्रशासन की बात करते हैं। हमारे देश में कर-जीडीपी अनुपात कम है। इसकी एक अहम वजह यह है कि सार्वजनिक प्रशासन ने ज्यादा से ज्यादा कर जुटाने के उद्देश्य से शोध, नियोजन तथा प्रशासनिक मशीनरी में पर्याप्त निवेश नहीं किया है। बिना उच्च कर दरों तथा प्रताड?ा के कर बढ़ाना संभव ही नहीं रह गया है। उच्च कर-जीडीपी अनुपात बड़े सार्वजनिक व्यय का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह व्यय शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर किया जा सकता है। ये वस्तुएं उत्कृष्ट होती हैं और इन पर व्यय भेदभाव से रहित और उत्पादक हो सकता है। ज्यादा और बेहतर सार्वजनिक सेवाएं अधिक से अधिक लोगों को आर्थिक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए प्रेरित करती हैं और यह काम सुरक्षित तथा सहज तरीके से किया जाता है। इससे सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी में भी इजाफा होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि उक्त व्यय पर हमें सामाजिक प्रतिफल प्राप्त होता है। एक अन्य उपमा पर विचार करते हैं, भले ही वह आंशिक रूप से लागू होती है। निजी क्षेत्र में लंबे समय के दौरान, कई निवेशकों ने टाटा स्टील में पैसा लगाया और उन निवेशकों से कम प्रतिफल हासिल किया जिन्होंने टीसीएस में निवेश किया था। हालांकि टाटा स्टील की तथाकथित भौतिक परिसंपत्तियां टीसीएस की तुलना में कहीं अधिक थीं। इसी प्रकार भारत सरकार और एक हद तक जनता भी, सार्वजनिक सेवाओं पर व्यय से अधिक लाभान्वित हो सकती है। यह लाभ राजमार्ग जैसी परियोजनाओं पर किए गए व्यय से होने वाले लाभ से अधिक हो सकता है। वास्तव में राजमार्ग आर्थिकी के संदर्भों के अनुसार हमेशा सार्वजनिक वस्तुओं की श्रेणी में नहीं गिने जाते। अत्यधिक सहजीकरण की लागत पर एक राजमार्ग पर निजी कारोबारी नियमों के तहत टोल की वसूली कर सकता है ताकि लागत निकालने के अलावा कुछ लाभ कमा सके। सैद्धांतिक तौर पर अक्सर यहां बाजार विफलता की स्थिति नहीं बनती है। जबकि सार्वजनिक सेवाओं के मामले में ऐसा नहीं होता। आखिर में, केवल विनिवेश करने के बजाय एलआईसी का निजीकरण करना अधिक महत्त्वपूर्ण है। बिक्री से हासिल होने वाली धनराशि का इस्तेमाल बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार और उनकी स्थिति में सुधार के काम में किया जाना चाहिए। यह काम उन सेवाओं के क्षेत्र में करना जरूरी है जो उत्पादक सेवाओं की श्रेणी में आती हैं, जिन्हें केवल सरकार ही मुहैया करा सकती है तथा जो आम आदमी के लिए अधिक से अधिक उपयोगी होती हैं। (लेखक स्वतंत्र अर्थशास्त्री एवं भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, दिल्ली केंद्र के अतिथि प्राध्यापक हैं)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (देबंजना चौधरी)। पावर फॉर आॅल 2022 एनर्जी एक्सेस ट्रेंड एक इंडिकेटर है जो आने वाली चीजों का संकेत दे रहा है, जब भारत ने 2022 का केंद्रीय बजट पेश किया। बजट का आवंटन कई ट्रेंड्स के साथ जुड़ता है और यह इक्विटी-आधारित अक्षय ऊर्जा रणनीति और वित्तपोषण पर आधारित होता है। भारत ने इस साल जब अपना केंद्रीय बजट पेश किया, तो इसने स्वच्छ ऊर्जा उपक्रमों और उनके दायरे के लिए आशा जगायी है। सीओपी 26 (कॉप 26) में भारत ने कोयले और अन्य जीवाश्म के संदर्भ में फेजिंग आउट के बजाय फेजिंग डाउन की घोषणा की। यानी कोयले या जीवाश्म का इस्तेमाल कम करने की तरफ इशारा किया। अक्षय ऊर्जा जैसे समाधान सरकार की योजनाओं, नीतियों और रणनीतियों में मुख्य रूप से होने की भी उम्मीद है। केंद्रीय वित्त मंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कम से कम अगले दो दशकों के लिए स्वच्छ ऊर्जा मुख्य एजेंडा होगा। इधर एनर्जी एक्सेस ट्रेंड्स 2022 की रिपोर्ट भी भारत के लिए उसी की ओर इशारा करती है। इलेक्ट्रिक वाहनों और सोलर सेल से लेकर हाइड्रोजन प्लांट में बड़े निवेश तक में राजनीतिक मंशा यह है कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता से स्थायी समाधान की ओर बढ़ा जाए। यह बहुत जरूरी है कि हरित ऊर्जा उत्पादन को तत्काल बढ़ावा दिया जाए, केवल स्थांतरण के लिए रणनीति बने और यह सुनिश्चत किया जाए कि हरित क्षेत्र में ऐसे समुदायों के लिए भी नौकरियां हो, जिनतक आम तौर पर सुविधाएं नहीं पहुंच पाती हैं और जो वंचित हैं। 2022 के एनर्जी एक्सेस ट्रेंड उसी इसी दिशा को दर्शा रहे हैं, जिस तरफ दुनिया जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दूर करने के लिए बढ़ रही है। महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की कमी की वजह से अक्षय क्षेत्र में महिलाओं के सामने आ रही सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां कैसे बढ़ जाती हैं, यह भी देखा जा रहा है। महिलाओं की इन चुनौतियों को ध्यान में रख कर सरकारी नीति और योजनाओं को बनाने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण महिलाएं और लड़कियां असमान रूप से प्रभावित हैं और उन्हें अभी भी समान अवसर नहीं मिल सका है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। ऐसा इसलिए है कि दुनिया के अधिकांश गरीबों में महिलाएं ज्यादा है और अपनी आजीविका के लिए उन प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा निर्भर हैं, जो जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में हैं। विकासशील देशों में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं और पुरुष विशेष रूप से उस समय कमजोर होते हैं, जब वे अपनी आजीविका के लिए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर होते हैं। उनके उपर चूल्हे पर खाना पकाने के लिए पानी, भोजन और संसाधनों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी होती है। इस दौरान ने सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करते हैं। 2022 में डीआरई के क्षेत्र में लैंगिक समानता के मामले में कुछ बेहतर होने की उम्मीद है, लेकिन यह उतना नहीं है, जितना होना चाहिए। डीआरई के अनुकूल नीतियों ने ऐसे फंडिंग तक का रास्ता दिखा दिया है, जो महिलाओं की उद्यमशीलता कौशल को शामिल करता है। भले ही उडश्कऊ-19 का यह प्रकोप जारी रहे और 2022 में लॉकडाउन डीआरई क्षेत्र को धीमा कर दे, लेकिन डीआरई ने इतिहास में काफी लचीलापन दिखाया है। भारत के निर्माण में बेहतर सफर और आत्मानिर्भर भारत की राह में ऊर्जा उद्यमियों और एमएसएमई की प्रमुख भूमिका होगी। यह रिपोर्ट कई देशों के साथ अपने डीआरई रोडमैप को व्यवस्थित करने के एक सिल्वर लाइनिंग को भी प्रकाश में लाती है। एशिया-पेसिफिक देश विशेष रूप से डीआरई कथा को आगे बढ़ाते हैं और अब वे ऊर्जा स्थांतरण निवेश स्तर पर विश्व के शीर्ष 10 देशों में से चार चार स्थानों पर कायम हैं। इस सूची में भारत और दक्षिण कोरिया चीन और जापान के साथ शामिल हो गए हैं। ब्लूमबर्ग एनईएफ की एक रिपोर्ट से पता चला है कि 2021 में ऊर्जा स्थांतरण में वैश्विक निवेश 755 बिलियन डॉलर था। यह बढ़ते जलवायु लक्ष्यों और योजनाओं पर काम कर रहे देशों के लिए और खास कर एशिया-पेसिफिक देशों के लिए नया रिकॉर्ड था। रिपोर्ट के अनुसार विश्व स्तर पर पूर्वी अफ्रीका और एशिया बाहर हैं। यह दिलचस्प है कि ट्रेंड्स सर्वे के जवाब देने वालों का अनुमान है कि भारत की अगली क्रांति बाइक और ई-रिख्शा जैसे दो और तीन पहिया वाहनों के उपयोग के क्षेत्र में होगी। ई-मोबिलिटी ट्रेंड डीआरई क्षेत्र की क्षमता को प्रदर्शित करता है और बताता है कि यह कैसे कमजोर समुदायों को जोड़कर उनकी आजीविका और मुख्य धारा से उनके जुड़ाव को बेहतर कर रहा है। आज जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी संघर्ष कर रही है, भारत में स्वच्छ ऊर्जा मोड उद्यमियों और समुदायों दोनों के लिए समान रूप से जीवन का एक नया आयाम प्रदान कर रहा है। (अनुसंधान से पता चलता है कि अभी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है, लेकिन यह भी बताता है कि तेज गति से विकास निश्चित है)। सरकार समर्थित योजनाओं के कारण भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन बढ़ रहा है। इस वर्ष और भी अधिक राज्यों में सार्वजनिक परिवहन व्यव्सथाओं और असंगठित परिवहन क्षेत्रों में भी इलेक्ट्रिक वाहनों के होने की संभावना है। प्रोडक्टिव यूज आॅफ रेनेवेबल एनर्जी 2022 में भी चलन में होगा। यह खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण और स्वास्थ्य सेवाओं को सुगम बनाने में गेम-चेंजर साबित होगा। कृषि और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में कोल्ड चेन प्रभावी रहेगा। अभी भी जब महामारी लगातार तीसरे वर्ष फैल रही है, ऐसे में एसडीजी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के साथ समान रूप से टीकाकरण देश की प्राथमिकता होगी। जब देश के कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे डीआरई को घोषणापत्रों में शामिल किया जाता है और यह सुशासन के लिए एक बेंचमार्क बन जाता है। एसएमई गवाह बनेगी कि विकास और योजनाएं ही ग्रामीण के साथ शहरी आबादी को आॅफ-ग्रिड नवीकरणीय समाधान प्रदान कराने में सक्षम होगी। बेहतर राजकोषीय नीतियां, कम सीमा शुल्क, और वास्तविक विकास से जुड़ी हुई राजनीतिक मंशा से लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त, अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को उम्मीद है कि न केवल बजट में बल्कि राज्य-विशिष्ट योजनाओं और नीतियों में भी टैक्स से राहत मिलेगा ताकी हरित प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहन मिल सके। ट्रेंड्स की रिपोर्ट बताती है कि वित्त मंत्री के बजट का बड़ा हिस्सा अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा क्षमता, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ग्रीन बॉन्ड के लिए आवंटित है। बजट में आवंटित किए गए ग्रीन बॉन्ड से मिलने वाली धनराशि का उपयोग उन परियोजनाओं पर किए जाने की उम्मीद है, जो अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को कम करने में मदद करेगी। ट्रेंड्स की रिपोर्ट कहता है कि घरेलू विनिर्माण करना भारत के लिए चर्चा का विषय होगा। हालांकि भारत देश के अंदर ह्यफेजिंग आउटह्ण के नैरेटिव को अच्छी तरह जोड़ सकता है, लेकिन इस साल डीआरई क्षेत्र के बढ़ने की उम्मीद है। रिन्युएबल क्षेत्र भारत के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए प्रमुख बिल्डिंग ब्लॉक्स में से एक है और इज आॅफ डुइंग बिजनेस प्रभावी होगा। जरूरी है कि भारत की ऊर्जा स्थांतरण की कहानी को चार्ट करने के लिए एक नई गति बनायी जाए। भारत में यह सब होते हुए पूरा विश्व करीब से देखेगा। (लेखिका इंडिया पावर फॉर आॅल की कंट्री डायरेक्टर हैं।)
टीम एबीएन। हिंदी भारत मां की बिंदी है। यह मात्र राजभाषा या राष्ट्रभाषा नहीं है, अपितु यह भारत मां की अस्मिता है। यह भारत बिंदी है। हिंदी नवलेखन शिविर 35 भारत मां की इसी बिंदी के प्रचार प्रसार का मूर्त रूप है। अंग्रेजी में पैर के लिए केवल एक शब्द लेग है, जबकि हिन्दी में अनेक : छू लो तो चरण, अड़ा दो तो टांग, धंस जाए तो पैर, फिसल जाए तो पांव, आगे बढ़ाना हो तो कदम, राह में चिह्न छोड़े तो पाद,बाप की हो तो लात, गधे की हो तो दुलती, घुंघरू बांध लो तो पग, खाने के लिए लंगडी और खेलने के लिए लंगड़ी। है न हमारी हिंदी नायाब, लाजबाब और कामयाब। इसीलिए तो हम कहते हैं कोटि कोटि कंठों की भाषा, जन-मन की मुखरित अभिलाषा। हिंदी है पहचान हमारी, हिंदी हम सब की परिभाषा।। मंगलवार को यह बातें रांची विश्वविद्यालय पीजी हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ जे बी पांडेय ने कहीं। वे राजेंद्र विश्वविद्यालय बलांगीर और केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आठ दिवसीय नव लेखन शिविर के उद्घाटन सत्र में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हिंदी विश्व के 140 देशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है। यह हिन्दी की सामर्थ्य का द्योतक है।नव लेखन शिविर की अध्यक्षता कर रहे राजेंद्र विश्वविद्यालय बलांगीर के कुलपति डॉक्टर यू.बी महापात्रा ने कहा कि नव लेखन शिविर से नवयुवकों को नवलेखन की प्रेरणा प्राप्त होगी, लेकिन हमारी सलाह है कि नव लेखन से पहले आज की पीढ़ी को खूब पढ़ना चाहिए, बगैर पढ़े सोचे विचारे नव सृजन संभव नहीं है।आज की पीढी अध्ययन से विमुख हो रही है,नव लेखन शिविर उन्हें अध्ययनोभिमुख करेगा ऐसा विश्वास है। नवलेखन शिविर के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए केंद्रीय हिंदी निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ शैलेश विडालिया ने कहा कि केंद्रीय हिंदी निदेशालय की स्थापना 1 मार्च 1960 को भारत सरकार के द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य हिंदी का प्रचार प्रसार करना है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा वर्ष भर में कई योजनाएं चलाई जाती हैं, जिसमें छात्रों का यात्रा भ्रमण, अतिथि व्याख्यान माला आयोजन, शब्दकोश निर्माण, पत्रिका का प्रकाशन और लेखन शिविर का आयोजन आदि प्रमुख हैं।प्राय: अहिंदी भाषा भाषी क्षेत्रों में नव लेखन शिविर का आयोजन किया जाता है। इस शिविर के माध्यम से नव युवकों को साहित्य की विभिन्न विधाओं यथा कविता, कहानी, नाटक उपन्यास निबंध आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण टिप्स दिए जाते हैं। इस अवसर पर हिंदी विशेषज्ञ के रूप में डॉ जे के शर्मा (संबलपुर)और डॉ सीमा असीम सक्सेना (बरेली) ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए। इस शिविर में उड़ीसा एवं झारखंड के रांची विश्वविद्यालय केअनेक प्रशिक्षुओं ने हिस्सा लिया। कुल 30 प्रतिभागी सम्मिलित हुए, जिसमें 10 रांची विश्वविद्यालय से हैं(दयानन्द राय,अशोक कुमार प्रमाणिक, अंगद प्रमाणिक, लाल मोहन महतो,उमा शंकर महतो, राम कुमार प्रसाद, प्रियंका कुमारी, आरती कुमारी) शेष उडीसा के हैं। कार्यक्रम का श्री गणेश सुश्री स्वरूपा सिंह एवं अशोक कुमार प्रमाणिक ने सरस्वती वंदना से किया। आगत अतिथियों का भव्य स्वागत एवं संचालन विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ संजय कुमार सिंह ने तथा धन्यवाद ज्ञापन केंद्रीय हिंदी निदेशालय के लेखापाल विनोद शर्मा ने किया। इस अवसर पर डा जे बी पाण्डेय ने डा शैलेश विडालिया,डा संजय कुमार सिंह,डा सुजाता दास, डा सीमा असीम सक्सेना, डा जे के शर्मा , विनोद शर्मा, स्वरूपा सिंह को कुलपति के कर कमलों से राष्ट्र सृजन अभियान द्वारा प्रदत करोना कर्मवीर सम्मान तथा शाल ओढ़ाकर सम्मानित कराया। राष्ट्रगान से कार्यक्रम का समापन हुआ।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज)। देश के बुनियादी ढांचे की विकास यात्रा के पिछले तीन दशकों में परियोजना कार्यान्वयन के लिए धन जुटाने की खातिर गहन प्रयास हुए हैं। इस दिशा में न केवल बजट परिव्यय में वृद्धि की गई, बल्कि संस्थागत वित्त पोषण कार्यक्रमों की शृंखला भी शुरू की गई। सबसे पहली थी वर्ष 1987 में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज। इसके बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनैंस कंपनी (1997), इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी (2006), नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड इनवेस्टमेंट फंड (2015) और नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्क्चर ऐंड डेवलपमेंट (2021) आई। सार्वजनिक-निजी साझेदारी का ढांचा भी स्थापित किया गया। इससे पहले के समय में क्षेत्र-विशिष्ट वित्त पोषण कार्यक्रम चलाए गए थे। इनमें ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (1969), आवास एवं शहरी विकास निगम (1970), पावर फाइनैंस कॉरपोरेशन (1986) और भारतीय रेलवे वित्त निगम (1986) शामिल हैं। पिछले दो दशकों में कई निजी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और निजी इक्विटी फंड भी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के वित्त पोषण में काफी सक्रिय हो गए हैं। कई वैश्विक दीर्घकालिक संस्थागत निवेशक भी आ गए हैं। पूंजी बाजार उपकरणों की एक नई पीढ़ी वजूद में आई-जैसे रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स। अब भारत लगभग 22 लाख करोड़ रुपये की वार्षिक बुनियादी ढांचागत वित्त पोषण क्षमता को साकार रूप देने के लिए भली-भांति तैयार है, जो राष्ट्र का घोषित लक्ष्य है। इस क्षमता को मोटे तौर पर केंद्रीय बजट परिव्यय (7 लाख करोड़ रुपये), राज्यों की ओर से संयुक्तनिवेश (6 लाख करोड़ रुपये), सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अतिरिक्त बजट संसाधनों (2 लाख करोड़ रुपये), नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (3 लाख करोड़ रुपये) तथा घरेलू और विदेशी निजी पूंजी (4 लाख करोड़ रुपये) से निर्मित माना जा सकता है। इसलिए अब जोर अनिवार्य रूप से जमीनी स्तर पर दक्ष कार्रवाई अर्थात समय पर परियोजना कार्यान्वयन पर होना चाहिए। हालांकि वित्त पोषण क्षमता के नितांत विपरीत परियोजना कार्यान्वयन के संबंध में जमीनी हकीकत काफी खराब है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की दिसंबर 2021 तक की नवीनतम सूचना में 1,679 परियोजनाएं शामिल हैं। ये केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाएं हैं, जिनमें से प्रत्येक की लागत 150 करोड़ रुपये या अधिक है। इनमें 10 क्षेत्र-सड़क, रेलवे, बिजली, पेट्रोलियम, शहरी विकास, कोयला, पानी, परमाणु ऊर्जा, इस्पात और दूरसंचार शामिल हैं। इनमें से 11 परियोजनाएं निर्धारित समय से आगे हैं, 292 निर्धारित समय पर हैं, 541 विलंबित हैं और फिर 835 ऐसी परियोजनाएं हैं, जहां न तो चालू होने का वर्ष और न ही पूरा होने की अपेक्षित तिथि उपलब्ध है। रिपोर्ट के अनुसार इन 1,679 परियोजनाओं के कार्यान्वयन की कुल मूल लागत 22.3 लाख करोड़ रुपये थी, लेकिन अब अनुमानित लागत करीब 26.68 लाख करोड़ रुपये है, जो 4.38 लाख करोड़ रुपये की अधिक लागत को दशार्ती है। यह मूल लागत का 20 प्रतिशत है। नवंबर तक इन सभी परियोजनाओं पर लागत का लगभग 48 प्रतिशत भाग व्यय किया जा चुका है। 4.38 लाख करोड़ रुपये की यह अधिक लागत वित्त वर्ष 22 के बजट में प्रस्तावित 5.54 लाख करोड़ रुपये के संपूर्ण बुनियादी ढांचागत परिव्यय की 79 प्रतिशत राशि है। राज्य सरकारों के नियंत्रण वाली विशाल परियोजनाओं की स्थिति उपलब्ध नहीं है। और अधिक कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेपों में से एक संभवत: वर्ष 2013 की गर्मियों में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा स्थापित परियोजना प्रबंधन समूह (पीएमजी) था। इसके लिए यह अनिवार्य था कि अवरुद्ध परियोजनाओं के लगभग 17 लाख करोड़ रुपये की राशि छुड़ाई जाए और यह कथित तौर पर करीब सात लाख करोड़ रुपये की औद्योगिक और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को फिर से आगे बढ़वाने में सक्षम था। भले ही पीएमजी को मंत्रिमंडल सचिवालय में एक विशेष प्रकोष्ठ के रूप में स्थापित किया गया था, लेकिन बाद में इसे वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया था। वर्ष 2019 में पीएमजी को उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के साथ मिला दिया गया था। अब इसे प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग-इन्वेस्ट इंडिया सेल के रूप में जाना जाता है। इसके तहत ईसुविधा परियोजना प्रबंधन प्रणाली सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की विशाल परियोजनाओं के डेटाबेस की निगरानी करती है। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस ऐंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) भी है। वर्ष 2015 में शुरू किया गया यह मंच केंद्र सरकार के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों और परियोजनाओं के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारा चिह्नित परियोजनाओं की भी समीक्षा करता है। बढ़ती समस्या को स्वीकार हुए नीति आयोग और भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) ने अक्टूबर, 2020 में राष्ट्रीय कार्यक्रम एवं परियोजना प्रबंधन नीति ढांचे की शुरूआत की थी, जिसका लक्ष्य भारत में बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के कार्यान्वयन के तरीके में आमूलचूल सुधार लाना था। इसकी प्रमुख सिफारिशों में शामिल हैं-(1) क्यूसीआई के अंतर्गत नैशनल इन्स्टीट्यूट फॉर चार्टर्ड प्रोग्राम ऐंड प्रोजेक्ट प्रोफेशनल्स की स्थापना करना (2) कार्यान्वयन के सर्वोत्तम क्रियाकलापों का इंडियन इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉडी आॅफ नॉलेज नामक का एक तकनीकी भंडार विकसित करना (3) परियोजना कार्यान्वयन के पेशेवरों के लिए चार-स्तरीय प्रमाणन प्रणाली और (4) क्षमता निर्माण कार्यक्रम। आखिर में प्रौद्योगिकी-संचालित दो हालिया मंच-आॅनलाइन मंजूरी और अनुमति के लिए नैशनल सिंगल विंडो सिस्टम तथा गति शक्ति परियोजना कार्यान्वयन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए शक्तिशाली उपकरण हैं। इसलिए अब हमारे पास परियोजना कार्यान्वयन में चिरकालीन विलंब की समस्या को हल करने के लिए संस्थागत स्वरूपों का एक समूह है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनिता खांडेकर)। पिछले पखवाड़े ईद का त्योहा8र बहुत बुरे समय में आया। देश महामारी से जूझ रहा है और हमारे चारों तरफ इतना दुख और कष्ट फैला हुआ है कि जश्न मनाने जैसा कोई भाव ही नहीं आता। सलमान खान अभिनीत फिल्म राधे ऐसे ही माहौल में रिलीज हुई। महामारी खत्म होने का इंतजार करने के बाद आखिरकार फिल्म को ओटीटी जी 5 पर रिलीज किया गया। आश्चर्य नहीं कि दर्शकों और आलोचकों ने इसकी जमकर आलोचना की। शायद फिल्म बुरी है लेकिन ओटीटी पर रिलीज करने से इसकी हालत और बिगड़ गई। राधे जैसी फिल्म ईद के सप्ताहांत पर रिलीज होकर खूब भीड़ बटोरती है। यह पुराने जमाने की सिंगल स्क्रीन फिल्मों जैसी है जहां दर्शक खूब शोरशराबा करते हैं। जब आप इसे 249 रुपये में ऐसे दर्शकों को बेचते हैं जिनकी पसंद नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो ने बदल दी है तो इसका नाकाम होना तय है। परंतु चूंकि यह सलमान खान की फिल्म है इसलिए इसे बड़ी तादाद में दर्शक मिलेंगे और विदेशों में रिलीज, टेलीविजन अधिकारों तथा जी के साथ हुए सौदे से यह न केवल लागत वसूल करेगी बल्कि पैसे भी कमाएगी। परंतु इसकी कमजोर रिलीज में न केवल देश का मिजाज बल्कि फिल्म उद्योग की कमजोरी भी रेखांकित होती है। गत वर्ष देश के सिनेमा राजस्व का दोतिहाई हिस्सा गंवाना पड़ा। महामारी के कारण सन 2019 के 19,100 करोड़ रुपये से घटकर यह 7,200 करोड़ रुपये रह गया। महामारी के कारण थिएटर सबसे पहले बंद हुए और सबसे बाद में खुले। टिकट बिक्री घटकर 40 करोड़ रुपये रह गई जो 2019 की तुलना में एक तिहाई से भी कम थी। इस आंकड़े में भी ज्यादातर पहली तिमाही से है जब लॉकडाउन नहीं लगा था। सात लाख लोगों को रोजगार देने वाले इस उद्योग के काम करने वाले लाखों दैनिक श्रमिकों का काम छूट गया। फिक्की-ईवाई की रिपोर्ट के अनुसार 1,000 से 1,500 सिंगल स्क्रीन थिएटर बंद हुए। मल्टीप्लेक्स भी अच्छी स्थिति में नहीं हैं। सिनेमाघर खुले ही थे कि दूसरी लहर ने तबाही मचा दी। अमेरिका के रीगल और एएमसी की तरह अगर भारत में भी कुछ मल्टीप्लेक्स शृंखला बंद होती हैं तो आश्चर्य नहीं। पूरे भारत का टीकाकरण होने में कम से कम एक वर्ष लगेगा। केवल तभी सिनेमाघर पूरी तरह खुल सकेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में वे ही सबसे अहम हैं। बिना सिनेमा घरों के भारतीय सिनेमा दोबारा खड़ा नहीं हो सकता। सन 2019 में भारतीय फिल्मों की 19,100 करोड़ रुपये की आय में 60 फीसदी भारतीय थिएटरों से आई। किसी फिल्म को थिएटर में कैसी शुरूआत मिलती है, इससे ही तय होता है कि टीवी, ओटीटी और विदेशों में उसकी कैसी कमाई होगी। सन 2019 एक अच्छा वर्ष था और उस वर्ष प्रसारकों ने फिल्म अधिकारों के लिए 2,200 करोड़ रुपये खर्च किए जो कुल कारोबार का 12 फीसदी था। प्रसारक नेटवर्क को इससे 7,700 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व मिला। परंतु प्रसारक टीवी को यह कमाई तभी होती है जब फिल्म का प्रदर्शन थिएटर में अच्छा हो। ये दोनों माध्यम आम जनता से संबद्ध हैं। अगर थिएटर पूरी तरह नहीं खुले तो यह पूरी व्यवस्था काम नहीं करेगी। डिजिटल या ओटीटी माध्यम 60 फीसदी कारोबार की जगह नहीं ले सकते। ध्यान रहे गत वर्ष फिल्मों का डिजिटल राजस्व दोगुना हो गया लेकिन कारोबार फिर भी 60 फीसदी कम रहा। ऐसा लगता है कि लोग भी थिएटरों में वापस जाना चाहते हैं। मास्टर (तमिल), ड्रैकुला सर या चीनी (बांग्ला), जाठी रत्नालू (तेलुगू), कर्णन (तमिल), द प्रीस्ट (मलयालम) आदि फिल्मों ने सन 2020 में और 2021 के आरंभ में बॉक्स आॅफिस में अच्छा प्रदर्शन किया। सवाल यह है कि अगर तेलुगू, तमिल या मलयालम फिल्मों का प्रदर्शन अच्छा है तो राधे को पहले क्यों नहीं रिलीज किया गया? क्योंकि हिंदी रिलीज पूरे देश में होती है। यह जरूरी होता है कि कई राज्यों में फिल्म रिलीज हो। कुल राजस्व का 40-50 फीसदी हिस्सा केवल दिल्ली और मुंबई से आता है। विदेशों से भी बहुत राजस्व मिलता है। जबकि तमिल फिल्म केवल तमिलनाडु में और तेलुगू फिल्म तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में रिलीज होती है। प्रोड्यूसर्स गिल्ड आॅफ इंडिया के अध्यक्ष सिद्धार्थ राय कपूर कहते हैं कि ये फिल्में केवल राज्य विशेष में चलती हैं। ऐसे में हिंदी ही फिल्म राजस्व का सबसे बड़ा हिस्सा लाती है। जब तक महामारी समाप्त नहीं होती बड़े पैमाने पर हिंदी रिलीज मुश्किल है। दुनिया भर में अवेंजर्स, मिशन इंपॉसिबल या बॉन्ड शृंखला की फिल्मों में यह ताकत है कि वे दर्शकों को सिनेमाहॉल में खींच सकें। यह बात भारत के लिए भी सही है। बाहुबली (तेलुगू, तमिल), केजीएफ (कन्नड़), वार (हिंदी) या सोरारी पोत्रु (तमिल) जैसी फिल्मों के लिए दर्शक थिएटर जाएंगे जबकि सीयू सून अथवा जोजी (मलयालम) अथवा रामप्रसाद की तेरहवीं (हिंदी) जैसी फिल्में ओटीटी मंच के लिए हैं। यानी टीकाकरण के अलावा थिएटरों में बड़ी और शानदार फिल्मों की जरूरत होगी ताकि हालात सामान्य हो सकें। ऐसा होता नहीं दिखता। धर्मा प्रोडक्शन के सीईओ अपूर्व मेहता कहते हैं, फिल्म अनुबंध का कारोबार है। इसमें कई लोग लंबे समय तक एक साथ काम करते हैं और सावधानी बरतनी होती है। हम इस माहौल में 200-300 करोड़ रुपये की फिल्म की योजना नहीं बना सकते। यही कारण है कि हम ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिनका बजट कम हो। यानी कारोबारी एक दुष्चक्र में फंस गया है जो तभी समाप्त होगा जब शूटिंग और बाहरी शेड्यूल शुरू हो। ऐसा शायद 2022 के अंत में या 2023 में हो। अभी कुछ कहना मुश्किल है कि तब हालात कैसे होंगे। बात केवल बड़े सितारों की नहीं है। यह हजारों लेखकों, तकनीशियनों, सहायक कलाकारों, स्टूडियो में काम करने वालों की भी बात है। हालांकि औद्योगिक संगठन और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास जारी हैं लेकिन हिंदी, मलयालम, तमिल, बांग्ला आदि अनेक क्षेत्रों के सिनेमा से जुड़े लोग अपना पेशा बदल चुके हैं। कारोबार शायद समाप्त न हो लेकिन संभव है यह अपने पुराने दिनों की छाया भर रह जाए।
बन एडिटोरियल डेस्क (विनोद बसंल)।भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। किन्तु इस अनिवार्यता के बावजूद दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में भी देश की कुल जनसंख्या का 36.90 फीसदी हिस्सा आज भी निरक्षर है। मुस्लिमों में तो यह निरक्षरता दर 42.7 फीसदी है। यदि महिलाओं की बात करो तो ये आंकड़े और भी भयावय हैं। देश की 66 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं आज भी निरक्षर हैं। उच्च शिक्षा में तो इनकी भागीदारी मात्र 3.56 प्रतिशत ही है जो कि अनुसूचित जातियों के अनुपात 4.25 प्रतिशत से भी कम हैं। क्या कभी सोचा है कि ये सब आखिर क्यों है? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एक तो हमारे राजतन्त्र की शिक्षा के प्रति उदासीनता, दूसरा संसाधनों का अभाव तथा ऊपर से धार्मिक कट्टरता ने मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर को सबसे नीचे रखा। अचानक विरोध क्यों : 2022 के प्रथम माह में ही कर्नाटक में उडुप्पी के एक छोटे से स्कूल में प्रारम्भ हुआ अनावश्यक विवाद, जिहादियों या यूं कहें कि कुछ कट्टरपंथियों की हट के चलते कुछ ही दिनों में बागलकोट में पत्थरबाजी तक कैसे ब दल गया जहां के स्थानीय प्रशासन को वहां धारा 144 तक लगानी पड़ी।.... राज्य सरकार को अपने सभी शिक्षण संस्थान तीन दिन के लिए बंद करने पड़े। कुछ अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली के शाहीन बाग में भी नारा ए तकदीर-अल्लाह हु अकबर फिर से गूंजा। कुछ मंत्रियों के बयान आए तो वहीं विपक्षी दल इस मामले को संसद तक ले गया। उधर, देश में जिहाद, अलगाववाद व इस्लामिक कट्टरता की फैक्टरी कहलाई जाने वाली संस्था पीएफआई की संलिप्तता भी जग-जाहिर हो गई। अब बात करते हैं विद्यालय व उसके नियमों की। तो हम सभी को पता है कि विद्यालय में प्रवेश से पूर्व एक फॉर्म भरवाया जाता है कि मैं विद्यालय के सभी नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करूंगा तथा उसके उल्लंघन पर दंड का भागी बनूंगा। इन नियमों में विद्यालय के निर्धारित गणवेश (यूनिफॉर्म) की बात भी होती है। साथ ही संभवतया हम सभी ने कभी न कभी (चाहे भूलवश ही सही) गणवेश के किसी अंग की न्यूनता के लिए दंड भी भुगता होगा। किन्तु कभी किसी विद्यार्थी को हिजाब, बुर्का या गोल टोपी में नहीं देखा होगा। होना भी नहीं चाहिए। विद्यालय समता, समानता व एकरूपता के केंद्र हैं। ना कि जाति, मत-पंथ, भाषा-भूषा या खान-पान के आधार पर अलगाववाद के अड्डे। उडुपी की ये छात्राएं गत अनेक वर्षों से उसी विद्यालय में बिना किसी शिकायत के शांति से पढ़ रही थीं। फिर जिस विद्यालय में अचानक हिजाब का उदय हुआ वह तो था ही सिर्फ छात्राओं का जहां, लड़कों का प्रवेश ही वर्जित है। तो फिर हिजाबी पर्दा किस से और क्यों? इस पर एक प्रश्न के जवाब में एक विरोध करने वाली मुस्लिम बेटी ने बगलें झांकते हुए कहा कि एकाध शिक्षक तो पुरुष हैं हीं इसलिए हिजाब जरूरी है। सोचिए... जिस विद्यार्थी की गुरुजनों के प्रति ऐसी दुर्जनों वाली सोच हो तो उसके विद्या अध्ययन का क्या अर्थ? खैर! ये गलती उस बेटी की नहीं अपितु, उसे बहलाने, फुसलाने, भड़काने व उकसाने वाले उस कट्टरपंथी धडे की है जो कभी चाहता ही नहीं था कि मुस्लिम बेटियां कभी घर की चार दीवारी पार कर अपना जीवन अच्छे से जी सकें। वे तो उन्हें अपने पैरों की जूती, मर्दों की खेती व मनोरंजन का साधन से अतिरिक्त कुछ समझता ही नहीं। इस सारे षड्यंत्र के पीछे देश की उस कट्टर इस्लामिक जिहादी संस्था पीएफआई की उपस्थिति भी साफ तौर पर स्पष्ट हो चुकी है जिसके विरुद्ध अलगाववादी व आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी - एनआईए जांच एजेंसी जांच कर रही है और जो देशभर में इस्लामिक कट्टरता और अराजकता फैलाने में लिप्त है। इसकी छात्र विंग कैंपस फ्रंट आॅफ इंडिया का बयान भी मीडिया में आ चुका। यह संयोग है या षड्यंत्र, ये आप तय करें किन्तु यह तथ्य और सत्य है कि जैसे ही कॉंग्रेस ने कट्टरपंथियों की चाल के समर्थन में ट्वीट करना प्रारम्भ किया पाकिस्तान से भी उसी स्वर में अनेक तालियां बजने लगीं। एक ओर जहां कभी कट्टरपंथियों का विरोध व विद्यार्थियों का समर्थन करने वाली पाकिस्तानी नोबल विजेता मलाला, जिसने हलाला पर भी कभी मुंह नहीं खोला, हिजाब का हिसाब मांगने लगी। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के अनेक मंत्री, नेता व वहां की पूर्व प्रधानमन्त्री की बेटी भी इस हिजाब जिहाद की समर्थक बन ट्वीट पर टूट पड़ीं। कांग्रेस के ट्वीट पर पाकिस्तान ताली ना बजाए ऐसा कैसे हो सकता था। ये कट्टरपंथी हर चीज को शरीयत के पैमाने से नापने लग जाते हैं लेकिन हकीकत में शरीयत उनके हलक से भी नीचे कभी नहीं उतरा। वैसे भी यह भारत है जो, संविधान से चलता है ना कि शरीयत की नसीहतों से। जिसकी आड़ में मुस्लिम महिलाओं को हलाला, तीन तलाक, बहु-विवाह, बहु बच्चे, बाल-विवाह, हिजाब व बुर्के जैसी अनंत बेड़ियों में जकड़ के रखा जाता है। उन्हें मदरसों में मौलवियों के पास तो जाने की छूट है किन्तु मस्जिदों में नहीं? वे मुस्लिम मर्दों को खुश करने की साधन तो होती हैं किन्तु कभी मुल्ला, मौलवी या काजी नहीं बन सकतीं। मोदी सरकार से पूर्व तो पुरुष के बिना महिलाओं को हज तक की अनुमति नहीं थी। पुत्रियों को संपत्ति में अधिकार आज तक नहीं। अपने ही दत्तक पुत्रों से पर्दा कैसा? उन्हें संपत्ति में अधिकार क्यों नहीं? जो लोग इस्लाम को वैज्ञानिक व प्रगतिशील बताते हैं उनके लिए ये बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। यदि उनको विरोध ही करना था तो इन बुराईयों व अत्याचारों के विरुद्ध बिगुल फूंकतीं। वैसे जिन लड़कियों ने हिजाब के लिए विद्यालय में जिहाद किया उनके वे फोटो व वीडियो भी आजकल सोशल मीडिया में खूब वायरल हैं जिनमें वे स्वयं फटी जींस टी-शर्ट में बिना किसी स्कार्फ, हिजाब या बुर्के के सार्वजनिक स्थानों पर मस्ती करते हुए नजर आ रही हैं किन्तु विद्यालयों में..? क्या विद्यालय में घुसते ही उनका इस्लाम खतरे में आ जाता है? (लेखक विहिप से जुड़े हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)
एबीएन उडिटोरियल डेस्क (विनोद बंसल)। भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। किन्तु इस अनिवार्यता के बावजूद दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में भी देश की कुल जनसंख्या का 36.90 फीसदी हिस्सा आज भी निरक्षर है। मुस्लिमों में तो यह निरक्षरता दर 42.7 फीसदी है। यदि महिलाओं की बात करो तो ये आंकड़े और भी भयावय हैं। देश की 66 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं आज भी निरक्षर हैं। उच्च शिक्षा में तो इनकी भागीदारी मात्र 3.56 प्रतिशत ही है जो कि अनुसूचित जातियों के अनुपात 4.25 प्रतिशत से भी कम हैं। क्या कभी सोचा है कि ये सब आखिर क्यों है? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एक तो हमारे राजतन्त्र की शिक्षा के प्रति उदासीनता, दूसरा संसाधनों का अभाव तथा ऊपर से धार्मिक कट्टरता ने मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर को सबसे नीचे रखा। पहले तो बेटियों को घर से ही नहीं निकलने दिया जाता। दूसरा उन पर बुर्के को लाद दिया जाता है। अकेले घर से बाहर पाँव नहीं, मोबाइल नहीं, शृंगार नहीं, मनोरंजन नहीं, पर-पुरुष से बात नहीं, इत्यादि अनेक फतवे थोप दिए जाते हैं। जिसके कारण पहले तो उनके परिजन ही विद्यालय नहीं भेजते और यदि ऐसा हो भी जाए तो ये बंधन बेटियों के पाँवों को बेड़ियों की तरह जकड़े रहते हैं। बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत वर्तमान केंद्र सरकार ने अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बेटियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास प्रारंभ किए। जिनका प्रतिफल बेटियों की सुरक्षित व सहज शिक्षा के रूप में सामने आ रहा है। आज चारों ओर के परीक्षा परिणामों पर नजर डालें तो बेटियां सर्वाधिक अंक प्राप्त कर मेरिट में सबसे ऊंचे पायदान पर दृष्टिगोचर हो रही हैं। यह एक सुखद अनुभूति तो है किन्तु अभी जब हम लक्ष्य से कोसों दूर हैं तभी अचानक उन बेटियों की शिक्षा पर अचानक कुछ कट्टरपंथियों का पुन: आक्रमण पीड़ादायी लगता है। अचानक विरोध क्यों : 2022 के प्रथम माह में ही कर्नाटक में उडुप्पी के एक छोटे से स्कूल में प्रारम्भ हुआ अनावश्यक विवाद, जिहादियों या यूं कहें कि कुछ कट्टरपंथियों की हट के चलते कुछ ही दिनों में बागलकोट में पत्थरबाजी तक कैसे ब दल गया जहां के स्थानीय प्रशासन को वहां धारा 144 तक लगानी पड़ी।.... राज्य सरकार को अपने सभी शिक्षण संस्थान तीन दिन के लिए बंद करने पड़े। कुछ अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली के शाहीन बाग में भी नाराएतकदीर-अल्लाहहुअकबर फिर से गूंजा। कुछ मंत्रियों के बयान आए तो वहीं विपक्षी दल इस मामले को संसद तक ले गया। उधर, देश में जिहाद, अलगाववाद व इस्लामिक कट्टरता की फैक्टरी कहलाई जाने वाली संस्था पीएफआई की संलिप्तता भी जग-जाहिर हो गई। बच्चों के विवाद में सर्वप्रथम राहुल गांधी कूदे जिसने उसको मुस्लिम व महिला अधिकारों से जोड़ने की कुचेष्टा की। उसके बाद मंगलवार को कर्नाटक के प्रदेश कोंग्रेस अध्यक्ष डी के शिवकुमार ने एक झूठे ट्वीट के द्वारा हिन्दूओं पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक कॉलेज में तिरंगे को उतारकर भगवा लहरा दिया जो तिरंगे का अपमान है। जबकि, उसी दिन शिवमोगा के ही पुलिस अधीक्षक श्री बीएम लक्ष्मी प्रसाद ने साफ तौर पर कहा कि पोल पर तिरंगा था ही नहीं। इसमें तिरंगे का अपमान कहां से हुआ। वास्तव में तो कॉंग्रेस की चिढ़ भगवा और भगवा-धारियों से है। यह एक बार पुन: स्थापित हो गया। हिजाबियों की तरफ से न्यायालय में कॉन्ग्रेसी ही तो लड़ रहे हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व राम द्रोही कपिल सिब्बल तो शुक्रवार को इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ही पहुंच गए जैसे कि वे तीन तलाक व बाबरी के लिए लड़े। इसके अतिरिक्त इस्लामिक जिहादियों व कथित सेकलक्यूलरिस्टों की टूल किट गैंग द्वारा भी पूरे देश में अराजकता का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। अब बात करते हैं विद्यालय व उसके नियमों की। तो हम सभी को पता है कि विद्यालय में प्रवेश से पूर्व एक फॉर्म भरवाया जाता है कि मैं विद्यालय के सभी नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करूंगा तथा उसके उल्लंघन पर दंड का भागी बनूंगा। इन नियमों में विद्यालय के निर्धारित गणवेश (यूनिफॉर्म) की बात भी होती है। साथ ही संभवतया हम सभी ने कभी-ना-कभी (चाहे भूलवश ही सही) गणवेश के किसी अंग की न्यूनता के लिए दंड भी भुगता होगा। किन्तु कभी किसी विद्यार्थी को हिजाब, बुर्का या गोल टोपी में नहीं देखा होगा। होना भी नहीं चाहिए। विद्यालय समता, समानता व एकरूपता के केंद्र हैं। ना कि जाति, मत-पंथ, भाषा-भूषा या खान-पान के आधार पर अलगाववाद के अड्डे। उडुपी की ये छात्राएं गत अनेक वर्षों से उसी विद्यालय में बिना किसी शिकायत के शांति से पढ़ रही थीं। फिर जिस विद्यालय में अचानक हिजाब का उदय हुआ वह तो था ही सिर्फ छात्राओं का जहां, लड़कों का प्रवेश ही वर्जित है। तो फिर हिजाबी पर्दा किस से और क्यों? इस पर एक प्रश्न के जवाब में एक विरोध करने वाली मुस्लिम बेटी ने बगलें झाँकते हुए कहा कि एकाध शिक्षक तो पुरुष हैं हीं इसलिए हिजाब जरूरी है। सोचिए! जिस विद्यार्थी की गुरुजनों के प्रति ऐसी दुर्जनों वाली सोच हो तो उसके विद्या अध्ययन का क्या अर्थ? खैर! ये गलती उस बेटी की नहीं अपितु, उसे बहलाने, फुसलाने, भड़काने व उकसाने वाले उस कट्टरपंथी धडे की है जो कभी चाहता ही नहीं था कि मुस्लिम बेटियां कभी घर की चार दीवारी पार कर अपना जीवन स्वच्छंदता से जी सकें। वे तो उन्हें अपने पैरों की जूती, मर्दों की खेती व मनोरंजन का साधन से अतिरिक्त कुछ समझता ही नहीं। इस सारे षड्यंत्र के पीछे देश की उस कट्टर इस्लामिक जिहादी संस्था पीएफआई की उपस्थिति भी साफ तौर पर स्पष्ट हो चुकी है जिसके विरुद्ध अलगाववादी व आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी - एनआईए जांच एजेंसी जांच कर रही है और जो देशभर में इस्लामिक कट्टरता और अराजकता फैलाने में लिप्त है। इसकी छात्र विंग कैंपस फ्रंट आॅफ इंडिया का बयान भी मीडिया में आ चुका। यह संयोग है या षड्यंत्र, ये आप तय करें किन्तु यह तथ्य और सत्य है कि जैसे ही कॉंग्रेस ने कट्टरपंथियों की चाल के समर्थन में ट्वीट करना प्रारम्भ किया पाकिस्तान से भी उसी स्वर में अनेक तालियां बजने लगीं। एक ओर जहां कभी कट्टरपंथियों का विरोध व विद्यार्थियों का समर्थन करने वाली पाकिस्तानी नोबल विजेता मलाला, जिसने हलाला पर भी कभी मुंह नहीं खोला, हिजाब का हिसाब मांगने लगी। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के अनेक मंत्री, नेता व वहां की पूर्व प्रधानमन्त्री की बेटी भी इस हिजाब जिहाद की समर्थक बन ट्वीट पर टूट पड़ीं। कॉंग्रेस के ट्वीट पर पाकिस्तान ताली ना बजाए ऐसा कैसे हो सकता था! ये कट्टरपंथी हर चीज को शरीयत के पैमाने से नापने लग जाते हैं लेकिन हकीकत में शरीयत उनके हलक से भी नीचे कभी नहीं उतरा। वैसे भी यह भारत है जो, संविधान से चलता है ना कि शरीयत की नसीहतों से। जिसकी आड़ में मुस्लिम महिलाओं को हलाला, तीन तलाक, बहु-विवाह, बहु बच्चे, बाल-विवाह, हिजाब व बुर्के जैसी अनंत बेड़ियों में जकड़ के रखा जाता है। उन्हें मदरसों में मौलवियों के पास तो जाने की छूट है किन्तु मस्जिदों में नहीं? वे मुस्लिम मर्दों को खुश करने की साधन तो होती हैं किन्तु कभी मुल्ला, मौलवी या काजी नहीं बन सकतीं। मोदी सरकार से पूर्व तो पुरुष के बिना महिलाओं को हज तक की अनुमति नहीं थी। पुत्रियों को संपत्ति में अधिकार आज तक नहीं! अपने ही दत्तक पुत्रों से पर्दा कैसा? उन्हें संपत्ति में अधिकार क्यों नहीं? जो लोग इस्लाम को वैज्ञानिक व प्रगतिशील बताते हैं उनके लिए ये बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। यदि उनको विरोध ही करना था तो इन बुराईयों व अत्याचारों के विरुद्ध बिगुल फूंकतीं। किन्तु शायद यदि किसी ने ऐसा किया तो उसका अंजाम भी लोगों ने देखा है। वैसे जिन लड़कियों ने हिजाब के लिए विद्यालय में जिहाद किया उनके वे फोटो व वीडियो भी आजकल सोशल मीडिया में खूब वायरल हैं जिनमें वे स्वयं फटी जींस टी-शर्ट में बिना किसी स्कार्फ, हिजाब या बुर्के के सार्वजनिक स्थानों पर मस्ती करते हुए नजर आ रही हैं किन्तु विद्यालयों में..। क्या विद्यालय में घुसते ही उनका इस्लाम खतरे में या जाता है! खैर! अब सीबीएसई ने अपनी फाइनल परीक्षाओं की तिथि घोषित कर दी है। आगामी 26 अप्रेल से वे परीक्षाएं देश भर में होने वाली हैं। अब विद्यार्थियों को स्वयं को राजनीति या कट्टरपंथियों का मुहरा बनने की बजाय अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गणवेश तो पहनना ही पड़ेगा इसी में सब की भलाई भी है। हम 21वीं सदी के नागरिक हैं जो अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। हमें किसी टूलकिट गैंग का हिस्सा नहीं अपितु अच्छे अंकों के साथ उत्तम परीक्षा परिणाम प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करना है। संघर्ष हो तो पढ़ाई के लिए व नंबरों के लिए। वास्तविकता तो यह है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों को देश में एकता या एकरूपता पच नहीं रही। वे बारंबार अपनी अलग पहचान चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मुस्लिम बेटियाँ अशिक्षित रह कर उनके उत्पीड़न की शिकार बनी रहें। उनका एक ही एजेंडा है जो विभाजन के समय जिन्ना की मुस्लिम लीग ने दिया था। लड़ के लिया है पाकिस्तान, हंस के लेंगे हिंदुस्तान। आज हिजाब, कल बुरखा, परसों नमाज, फिर मस्जिद, मदरसा, हलाल और फिर...। विभाजनकारियों के ये षड्यन्त्र अब सफल नहीं होने वाले। ये अफगानिस्तान नहीं जहां बेटियों को शिक्षा से वंचित किया जाए। हम एक-एक बेटी को शिक्षित व जागरूक नागरिक बनाएंगे चाहे वे किसी भी मत-पंथ, संप्रदाय, भाषा-भूषा या क्षेत्र की हो। (लेखक विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। रैंकिंग इसलिए प्रदान की जाती हैं ताकि सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत किया जा सके। परंतु ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे यह संकेत निकलता है कि चीजों को कैसे बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इसलिए जब केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय कहता है कि वह राज्यों के पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार को इस आधार पर रैंकिंग देगा कि वे पर्यावरण संबंधी मंजूरी किस गति से देते हैं तो दरअसल इससे यही पता चलता है कि उसका पूरा ध्यान परियोजनाओं को मंजूरी मिलने पर केंद्रित है, न कि आकलन की गुणवत्ता अथवा यह सुनिश्चित करने पर कि विकास परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव को कम किया जा सके। आप कह सकते हैं कि इसमें लगने वाला समय निगरानी का संकेतक नहीं है तथा मंत्रालय का नोटिस केवल आकलन समितियों को जवाबदेह बनाने तथा यह सुनिश्चित करने पर आधारित है कि परियोजनाओं में अनावश्यक देरी न हो। परंतु यह इतना आसान नहीं है। तथ्य यह है कि रैंकिंग पर्यावरण आकलन के पहले से तैयार ताबूत में आखिरी कील है। बीते एक दशक या उसके आसपास के समय में एक के बाद एक विभिन्न सरकारों ने व्यवस्थित ढंग से उस निर्णय प्रक्रिया को छिन्नभिन्न किया है जो आकलन या जांच-परख की इजाजत देती थी। यह हास्यास्पद है और मेरी नजर में मंत्रालय के इस निर्देश ने उसकी खुद की बनायी प्रक्रिया व्यवस्था की अवमानना की व्यवस्था कर दी है। पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) की शुरूआत 1994 में हुई थी जब विकास परियोजनाएं कम थीं और प्रक्रिया को किसी तरह की चुनौती नहीं दी जाती थी। सन 2000 के दशक से गड़बड़ी की शुरुआत हुई जब परियोजना निर्माण को जांच पड़ताल की इस व्यवस्था में शामिल किया गया। इसमें दो राय नहीं कि विनिर्माण खासकर बड़े पैमाने पर बनने वाली आवासीय, बुनियादी ढांचा अथवा वाणिज्यिक परियोजनाओं का पर्यावरण पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। उनमें पानी का इस्तेमाल होता है, गंदा पानी उत्पन्न होता है, यातायात बढ़ता है और ठोस कचरा भी निकलता है। दिक्कत यह थी कि पूरी व्यवस्था को कभी उन्नत नहीं बनाया गया ताकि परियोजनाओं के निर्माण के साथ तालमेल बिठाया जा सके। इसकी वजह से परियोजनाओं में देरी होने लगी और लेनदेन की लागत में इजाफा हुआ, दूसरे शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार होने लगा। इसलिए 2006 में मंत्रालय ने काम राज्यों को विकेंद्रीकृत और आउटसोर्स कर दिया। उसने केंद्रीय स्तर की व्यवस्था को राज्य स्तर पर अपनाया तथा राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार गठित किए। परियोजनाओं के लिए ए, बी, बी1 और बी2 जैसी श्रेणियां बनायी गईं। इस दौरान विवेकाधिकार की पूरी गुंजाइश रखी गई। कुल मिलाकर जांच परख की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तथा विकास परियोजनाएं भी पर्यावरण के अनुपालन के मामले में ज्यादा बेहतर नहीं हुईं। कुल मिलाकर ईआईए की कवायद अधिक पेचीदा साबित हुई। मैं ऐसा क्यों कह रही हूं? जरा इस बात पर विचार कीजिए कि मौजूदा प्रक्रिया कितनी खामी से भरी हुई है। परियोजना शुरू करने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह ईआईए को अंजाम देने वाले सलाहकार को पैसे चुकाए। यह बात केंद्र अथवा राज्य के पर्यावरण प्रभाव आकल प्राधिकार द्वारा मंजूर संदर्भों पर आधारित होती है। ए श्रेणी की परियोजनाएं केंद्र के पास जाती हैं जबकि बी श्रेणी की परियोजनाएं राज्यों को जाती हैं। अब ऐसी परियोजनाएं बी 1 (विस्तृत आकलन जरूरी) श्रेणी की हैं या बी 2 (विस्तृत आकलन की जरूरत नहीं) श्रेणी की, यह तय करने का काम राज्यों का है। समिति कार्य क्षेत्र का दायरा तय कर सकती है, ज्यादा सूचना मांग सकती है या उसे खारिज कर सकती है। इसके बाद ईआईए किया जाता है। इसके लिए कम से कम 12 सक्रिय क्षेत्र विशेषज्ञों एवं प्रबंधन तथा निगरानी योजनाओं की आवश्यकता होती है। मसौदा ईआईए अंग्रेजी में है और इसका संक्षिप्त रूप क्षेत्रीय भाषाओं में है। इसे सार्वजनिक मशविरे के लिए प्रस्तुत किया जाता है। सार्वजनिक सुनवाई के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया है जो स्थानीय आपत्तियों की सुनवाई के लिए अहम होगी। इसके बाद मामला आकलन समिति के पास जाता है जिसे मसौदे को परखना होता है, और अधिक सूचना जुटानी होती है और इसे सशर्त स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। सच यह है कि परियोजनाओं को शायद ही कभी नकारा जाता है। हमने जुलाई 2015 से अगस्त 2020 तक प्रस्तुत 3,100 परियोजनाओं का विश्लेषण किया। केवल तीन फीसदी परियोजनाएं ऐसी थीं जिनकी अनुशंसा नहीं की गई। ये परियोजनाएं भी जरूरी सूचनाओं के साथ वापस आ जाएंगी। परंतु इस प्रक्रिया में परियोजना शुरू करने वालों से कई बार कहा जाता है कि वे और अधिक आंकड़े और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। आखिर में, समिति परियोजना को मंजूरी प्रदान करती है और ज्यादातर मामलों में वे कुछ ऐसी शर्तों के साथ खुद को बचा लेते हैं जिनकी शायद कभी निगरानी नहीं की जाएगी। मंजूरी के बाद समितियों को परियोजना के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है। उनका काम मंजूरी के साथ ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद निगरानी का काम मंत्रालय के सीमित कर्मचारियों वाले क्षेत्रीय कार्यालयों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इतने सशक्त नहीं होते हैं कि वे प्रभाव की निगरानी कर सकें क्योंकि यह मंजूरी पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अधीन दी जाती है, न कि हवा या पानी के लिए बने कानूनों के तहत। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दोहराव होता है, जांच की कमी होती है और यह सुनिश्चित करने का कोई इरादा नहीं होता है कि परियोजना क्रियान्वयन के समय पर्यावरण के हितों का ध्यान रखा जाए। ऐसे में जब हम मंजूरियों की इस ध्वस्त व्यवस्था का बचाव करते हैं तो इससे पर्यावरण बनाम विकास की गलत बहस को बढ़ावा मिलता है। हकीकत में पर्यावरण के हित पहले ही हाशिये पर डाले जा चुके हैं और विकास बेलगाम हो चुका है।
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