एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कनिका दत्ता)। पिछले सप्ताह की दो खबरों पर गौर करें। पहली यह कि घाटे में चल रही अक्षय ऊर्जा कंपनी सुजलॉन एनर्जी ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी पावर फाइनैंस कॉपोर्रेशन से 4,200 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की मांग की है। दूसरी खबर में जीवाश्म ईंधन वाली दिग्गज कंपनी बीपी ने आठ वर्षों में अपना उच्चतम मुनाफा दर्ज किया है। सुजलॉन के संकट और बीपी के अच्छे मुनाफे के बीच का अंतर काफी कुछ बयां कर रहा है। सुजलॉन का घाटा बढ़ने की असली वजह, परिचालन से जुड़ी दिक्कतों मसलन कच्चे माल की लागत बढंने परियोजनाओं की भरमार दिखने के साथ ही पवन ऊर्जा पर शुल्क का दबाव बढ़ है। जबकि बीपी को, यूक्रेन में भू-राजनीतिक संकट की वजह से तेल और गैस की कीमतों में आई तेजी का फायदा उठाने का मौका मिला है। सुजलॉन ने पर्यावरण, समाज और संचालन (ईएसजी) में निवेश करने का शुरूआती रुझान दिखाया था। इसकी नाकामी ईएसजी निवेश से जुड़े जोखिमों को भी उजागर करती है। हालांकि इस निवेश की रफ्तार जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के बाद बढ़ी है। इस विंड टर्बाइन निमार्ता कंपनी का 6,640 करोड़ रुपये का कर्ज है और इसमें आईडीएफसी पीई, ओलिंपस और एशिया क्लाइमेट पार्टनर्स जैसी ब्लू-चिप निजी इक्विटी कंपनियों और यहां तक कि सन फार्मा के दिलीप सांघवी की दिलचस्पी भी थी। अमेरिका में इसकी सहायक कंपनी ने दिवालिया होने की अर्जी दी है और कंपनी ने सरकारी राहत पैकेज की मांग की है। दुनिया भर में ईएसजी में निवेश को वैश्विक निवेश की निरंतरता के संदर्भ में देखा जा सकता है जिसमें 21वीं सदी के शुरूआती दौर के लेखा से जुड़ी धोखाधड़ी जैसे कि एनरॉन, वर्ल्डकॉम, फ्रेडी मैक, एआईजी जैसे मामलों में तेजी आई। शीत युद्ध के दौर में साम्यवाद पर पूंजीवाद की जीत के लगभग एक दशक बाद हुए ये घोटाले स्वतंत्र उद्यमों के अनैतिक पक्ष की याद दिलाते हैं। दावोस और अन्य वैश्विक वार्ता मंचों की चर्चा, पूंजीवाद को बचाने के तरीकों पर केंद्रित रही और इसके तहत ही उभरते बाजारों में ऐसे निवेश पर जोर देने की बात हुई जिसमें मुनाफा कमाने के साथ ही अच्छा काम भी किया जाए। मसलन गरीबी दूर करने जैसे अभियान के लिए अनुकंपा या उदार पूंजी और प्रभाव निवेश की धारणाएं उभरींं। इन अवधारणाओं के मुताबिक पूंजीवाद को केवल मुनाफे की ताकत नहीं बनना चाहिए, बल्कि बेहतर सामाजिक प्रभाव का एक स्रोत भी होना चाहिए। बिल गेट्स इस अवधारणा के शुरूआती समर्थकों में थे। सामुदायिक विकास के मकसद से अनुकंपा वाली पूंजी की विशाल मात्रा वैश्विक बाजारों में आ गई जिससे गरीब देशों में स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचे और शिक्षा पर केंद्रित प्रभाव डालने वाले निवेश फंड का दायरा बढ़ा। नए युग के पूंजीपतियों ने प्रबंधन गुरु सी के प्रह्लाद से प्रमाणित सिद्धांत हासिल किया। उन्होंने, दि फॉर्च्यूून एट दि बॉटम आॅफ द पिरामिड लिखा जिसमें गरीबों की मदद करने और मुनाफा कमाने के लिए तर्क दिया गया। कई केस स्टडी में गरीबों की मदद करने वाला हिस्सा दरअसल लाभ कमाने के हिस्से के बाद का विचार प्रतीत होता है। हैरानी की बात यह है कि 2008 के वित्तीय संकट ने पुनर्विचार का मौका नहींं दिया जबकि यह संकट ही पिरामिड के निचले स्तर के ग्राहकों को ज्यादा आवास ऋण देने की वजह से पैदा हुआ था। इस संकट ने लेखा-जोखा और जवाबदेही से जुड़े पुराने जोखिम को फिर से जगजाहिर किया। यही बात सामुदायिक विकास या पर्यावरण के विकास में असर डालने वाले निवेश पर भी लागू हुई। ये निवेश उन देशों में किए गए जहां कमजोर कानून या कानून की उपस्थिति न के बराबर थी और संस्थागत शासन तंत्र के साथ-साथ बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था। अब ऐसे हालात में यह कैसे निर्धारित किया जाए कि गरीबों का एक अस्पताल या एक बिजली संयंत्र उस उदार और अनुकंपा वाली पूंजी की सफलता का परिचायक था? इसका जवाब स्पष्ट नहीं था और इसी वजह से विश्व स्तरीय फजीर्वाड़ा करने वाले अबराज कैपिटल के पाकिस्तानी संस्थापक आरिफ नकवी जैसे लोगों के लिए दरवाजे खुल गए। वैश्विक गरीबी को खत्म करने के लिए पहले पूंजी निवेश और मुनाफा बनाने की इस सम्मोहक कहानी ने बिल गेट्स, एडगर ब्रॉनफमैन, जॉन केरी, प्रिंस चार्ल्स, क्लॉज श्वाब, बैंक आॅफ अमेरिका, मैकिंजी, केपीएमजी, हैमिल्टन लेन, विश्व बैंक के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की सरकारों को भी बेवकूफ बनाया। अबराज ने भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, घाना, तुर्की और कई अन्य देशों की कल्याणकारी परियोजनाओं के लिए शीर्ष वैश्विक निवेशकों से पूंजी जुटाई और इसके लिए वैसी फर्जी कहानी बुनी गई जो दुनिया के अमीर निवेशक सुनने के लिए और निवेश के लिए भी तैयार थे। हालांकि ऐसा नहीं है कि ईएसजी फंड का पूरा उद्गम ही फर्जी है। लेकिन तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन के एजेंडे के समर्थन से वास्तव में ईएसजी निवेश में तेजी आती है जो असरदार निवेश तो है लेकिन साथ ही इसमें सतर्कता का स्तर बढ?ा चाहिए। पिछले साल मई में अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने एक ईएसजी-केंद्रित जोखिम वाली चेतावनी जारी की जो अपर्याप्त खुलासा, भ्रामक दावों और ईएसजी निवेश विश्लेषण की अपर्याप्त जानकारी के संकेत देती है। यह एक समस्या है। दूसरी समस्या बदलने वाली राष्ट्रीय नीतियां हैं, विशेष रूप से उभरते बाजारों में जहां निवेश का अंदाजा लगाना मुश्किल है। उदाहरण के लिए, भारत में विनियमित ऊर्जा मूल्य निर्धारण की लंबे समय से दिख रही समस्याएं अक्षय ऊर्जा कारोबार में जटिलता की परतों को जोड़ती हैं। इसी तरह ज्यादा जीवाश्म ईंधन का उपयोग करने वाली कंपनियां अक्षय ऊर्जा से मिलने वाली बिजली में मामूली निवेश या कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व वाली परियोजनाओं पर जोर देना चाहती हैं ताकि ईएसजी पूंजी हासिल की जा सके।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। आखिरकार रूस ने यूक्रेन पर जोरदार हमला किया है। लेकिन पुतिन कभी कमजोर और दरिद्र रूस के राष्ट्रपति थे। लेकिन पुतिन चुपचाप कब खुद को और रूस को शक्तिशाली बना लिये, इसका एहसास न विश्व को हुआ न अमेरिका समेत नाटो को। रूस को इस स्थिति में लाने के पहले एक बार पीछे मुड़ कर देखना भी आवश्यक है। क्या आज का भारत भी इससे कुछ सीख सकता है? नब्बे के दशक में सोवियत संघ का टूटना एक ऐतिहासिक घटना थी। तब हम भारतीय यह भी नहीं समझ पाये थे कि रूसी राष्ट्रपति गौर्बाच्यौफ नायक हैं या खलनायक गौर्बाच्यौफ से राजीव गांधी की बहुत घनिष्ठता थी। तब एक कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमें राजीव गांधी को गरीब सुदामा और गोर्बाच्यौफ को कृष्ण की दिखाया गया था।दरिद्र राजीव भारत महोत्सव की पोटली लिये अमीर गोर्बाच्यौफ से मिलने मास्को पहुंचे हुये हैं। इसके बाद एकाएक सोवियत संघ टूट गया। यूक्रेन, बेलारूस, जार्जिया, सभी अलग होकर स्वतंत्र देश बन गये। जिस रूस की धमक ऐसी थी कि उसने मुजाहिदिनों वाले अफगानिस्तान में डॉ नजीबुल्ला को राष्ट्रपति बना कर कम्युनिस्ट शासन की स्थापना कर रखी थी वह खुद एक झटके में कमजोरी निरीह सा दिखने लगा। रूस का टूटना कमजोर होना शीतयुद्ध की समाप्ति मानी गयी। इसे अमेरिका और नाटो के विजय के तौर पर देखा गया। सोवियत संघ टूट गया इसके बाद भी रूस की बार बार फजीहत होती रही। नाटो और अमेरिका ने उसे बार-बार धमकाया। सोवियत संघ के प्रभाव वाले पूर्वी यूरोपीय देशों में क्रांति हुई रोमानिया में तानाशाह निकोलाइ चुसेस्कू की एक जनक्रांति के बाद गोली मार कर हत्या कर दी गयी। रूस की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी थी। सोवियत संघ के टूटने के बाद बोरिस येल्तसीन राष्ट्रपति बने थे। वह पहले से ही गोर्बाच्यौफ के कट्टर विरोधी थे। येल्तसीन एक तुनकमिजाज और सनकी किस्म के व्यक्ति थे। वह शराब के नशे में अपने आर्मी बैंड को खुद निर्देशित करते हुए कई तरह की धुनें बजवाने लगते थे। रूस में लोगों को मुख्य भोजन ब्रेड तक पर आफत हो गयी थी। एकाएक आर्थिक स्थिति इतनी जर्जर होगयी थी कि वहां के राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को फटे जूते और ड्रेस में खेलना पड़ा। कभी रूस की हॉकी टीम मजबूत हुआ करती थी ओलंपिक तक में उन्होंने भारत को हराया था, सुल्तान अजलान शाह टूर्नामेंट जीता था लेकिन सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस की स्थिति ऐसी हो गयी कि खिलाड़ियों को पहनने के लिए बूट और जर्सी तक नसीब नहीं थे। तब का एक दिलचस्प वाकया है कि उनकी हॉकी टीम भारत आयी तो भारतीय खिलाड़ियों से हॉकी स्टिक मांग कर ले गयी। सोवियत संघ से टूटने के बाद सबसे रूस के अलावा सबसे बड़े देश यूक्रेन ने परमाणु संयत्रों और सामनों के लिये छीना झपटी शुरू कर दी। कभी अमेरिका को चुनौती देने वाले येल्तसीन ने भारत को अमेरिका के डर से क्रायोजेनिक इंजन नहीं दिया। तब इस घटना से भारत में यही संदेश गया कि रूस अब एक दीन-हीन कमजोर देश बन चुका है। रूस को सुदंर वेश्या वाला देश कहा जाने लगा। येल्तसीन का स्वास्थ्य गिरने के साथ ही उनके उत्तराधिकारी पुतिन घोषित हुये और जब पुतिन रूस के राष्ट्रपति बने तब प्रांरभ में उन्हें भी कोई बहुत करिश्माई राष्ट्रपति नहीं माना गया। अपनी सत्ता को निष्कंटक बनाने के लिए पुतिन ने बंद कमरे में रूस के बड़े माफिया और सफेदपोशों से मुलाकात की और देश के कई खुफिया बातों को उनसे शेयर किया, पर पुतिन केजीबी के लिए डेढ़ दशक तक जासूसी कर चुके थे और उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। तब से लेकर अब तक पुतिन ने चुपचाप रूस को कहां से लाकर कहां खड़ा कर दिया इसका किसी को भान तक नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि दो दशक कब पार हो गये और रूस की सामरिक शक्ति फिर से चुनौती देने लायक कब तैयार हो गयी इसका अहसास न अमेरिका को हुआ न नाटो वाले यूरोपीय देशों को। भारत का झुकाव भी कुछ समय के लिये अमेरिका के प्रति ज्यादा रहा। संभवत: भारत को रूस एक कमजोर मित्र नजर आ रहा था। जबकि इस दरम्यान पुतिन रूस की सत्ता में अपने आपको निरंकुशता से काबिज कर चुके हैं। उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से भी रूस में कोई चुनौती नहीं दे सकता। विरोधियों को शातिर तरीके से ठिकाने लगा दिया जाता है। एकाएक रूस ने दो साल पहले ही अपनी शक्ति का अहसास कराया जब विश्व के सभी प्रमुख मुल्कों के राष्ट्रध्यक्ष आस्ट्रेलिया में किसी कार्यक्रम में एकत्र हुए जिसमें पुतिन भी थे तो चुपचाप एक रूसी सैन्रू पनडुब्बी पूरे आयुध के साथ आस्ट्रेलिया के समुद्र में चक्कर काटने लगा। बाद में जब अमेरिका समेत यूरोप के अन्य देशों ने इस पर आपत्ति जतायी तो रूसी नौसेना के प्रवक्ता ने कहा कि हमें कोई नहीं रोक सकता। हमारे राष्ट्रपति जहां रहेंगे हम उनकी सुरक्षा में वहां पहुंच जायेंगे। इस वाकये के बाद रूस ने अपने हाव भाव से पूरे विश्व को एक तरह से चुनौती पेश करनी शुरू कर दी। आज पुतिन किसी शातिर की तरह पेश आ रहे हैं। अजरबैजान और आर्मिनिया के युद्ध में रूस ने अपने स्वार्थ को सर्वोपरिरखा। सुरक्षा का वादा करने के बाद भी आर्मिनियाको अजरबैजान के हाथों पिटने दिया। बेलारूस में जनाक्रोश के बावजूद राष्ट्रपति लुकाशेंको को सत्ता में बनाये रखा। ताजा यूक्रेन संकट से पहले भी पुतिन ने उससे क्रिमिया को छीन लिया है और अब नाटो और उसके नेतृत्वकर्ता अमेरिका को पुतिन उनकी औकात बता रहे हैं। एस 400 और एस500 जैसी एंटी मिसाइलें बना कर रूस अमेरिका और विश्व को डरा रहा है। पुतिन चीन से दोस्ती कर अमेरिकी खेमे को संकट में डाल चुके हैं। आज अमेरिका और नाटो सिर्फ तमाशाई है, ये सिर्फ तरह तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते हैं जिससे पुतिन निबट लेंगे। पुतिन अपनी शर्तों पर जो चाहें सो कर सकते हैं। अफगानिस्तान में बाइडेन की नीतियों से अमेरिका की जबरदस्त हार हुई। अब पुतिन अमेरिका को खुली चुनौती दे रहे हैं। देखना है अब अमेरिका सहित नाटो देश क्या कर पाते हैं?
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मृत्युंजय दीक्षित)। अगर कटटरपंथियों के दबाव में आकर उनकी यह मांग एक मान ली गयी तो उनकी डिमांड और बढ़ती जायेगी। विद्यालयों में बच्चों के बीच समानता बढ़ाने के लिए यूनिफार्म का प्रावधान किया गया है। कुछ तत्व इस बात को अनदेखा कर इस्लाम के नाम पर हंगामा कर रहे हैं। कर्नाटक में उडुप्पी के एक छोटे से स्कूल से प्रारम्भ हुआ हिजाब विवाद अब एक बड़ा और विकराल रूप ले चुका है। देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन करके विवाद को और गहरा करने का प्रयास किया जा रहा है। जब विश्व के कई देशों ने मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया है, तब भारत में इस्लामिक कटटरपंथियों द्वारा हिजाब आंदोलन खड़ा कर देना एक राजनैतिक साजिश लग रही है जो प्रथम दृष्टया विपक्षी दलों का काम लग रहा है किन्तु इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश होने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। अब कर्नाटक के स्कूल की छह लड़कियों के पीछे के कट्टरपंथियों ने कमान संभल ली है। कर्नाटक से लेकर हैदराबाद और जयपुर तक तथा दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर बंगाल के मुर्शिदाबाद तक और उप्र के अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय तक सभी जगह हिजाब समर्थक गोलबंद होकर सड़कों पर निकल आये हैं। यह प्रदर्शन तब हो रहे हैं जबकि कर्नाटक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी मामले की सुनवाई चल रही है। जिस तरह सेक्युलर दलों ने हिजाब विवाद को लपका तथा आग में घी डाल कर भड़काने का काम किया वो आश्चर्यचकित करने वाला है, कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र के मालेगांव तक इनकी भूमिका आग लगा दो, रोटी सेक लो वाली दिखाई दे रही है। महाराष्ट्र में एआईएएम, शरद पवार की एनसीपी ने तो मुस्लिम समाज की महिलाओें व कटटरपंथियों को भड़काकर हिजाब डे तक बना डाला है। एआईएएम नेता ओवैसी यहां तक बौखला गये हैं कि वह कह रहे हैं कि जब तक हिजाब नहीं तब तक किताब नहीं, वह यह भी कह रहे हैं कि एक दिन एक हिजाबी देश की प्रधानमंत्री भी बनेगी। यह पूरा का पूरा घटनाक्रम एक बहुत बडी साजिश है जिसे तथाकथित सेकुलर राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने के लिए अंजाम दे रहे हैं। यही कारण है कि विपक्ष हिजाब विवाद की आड़ में मोदी सरकार, भाजपा व संघ के खिलाफ नये सिरे से नफरत फैला रहा और मुसलमानों का तुष्टिकरण करने के लिए खूब बयानबाजी कर रहा है। हिजाब विवाद को राजनैतिक रंग देने और नफरत की आग को भड़काने के लिए सोशल मीडिया का भी खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो जारी किये गये हैं जिसमें जिसमें कुछ मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनकर क्रिकेट खेल रही हैं और कहीं फुटबाल और हॉकी खेल रहीं हैं। एक मुस्लिम महिला चिकित्सक का वीडियो आया जो हिजाब पहनकर हास्पिटल जा रही है और मरीजों को देख रही है। बिना हेलमेट राइडिंग करती और ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर भद्दे इशारे करती बुर्कानशीनों के वीडियो भी आ रहे हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मत है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बहुत सी मुस्लिम महिलाएं व युवतियां जो तीन तलाक कानून से बहुत खुश हैं तथा जिन गरीब मुस्लिम महिलाओं को उज्ज्वला योजना का लाभ मिला है, फ्री राशन मिला है आवास मिला है और सुरक्षा मिली है वे बीजेपी को वोट देने जा रही थीं अत: ऐसे में वातावारण को खराब कर उन महिलाओं को वोट देने से रोकने के लिए यह आंदोलन खड़ा किया गया है। अगर कट्टरपंथियों के दबाव में आकर उनकी यह मांग एक मान ली गयी तो उनकी डिमांड और बढ़ती जायेगी। विद्यालयों में बच्चों के बीच समानता बढ़ाने के लिए यूनिफार्म का प्रावधान किया गया है। कुछ तत्व इस बात को अनदेखा कर इस्लाम के नाम पर हंगामा कर रहे हैं। क्या इन लोगों को पता नहीं है कि भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। इस अनिवार्यता के बावजूद आज भी देशकी 66 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं निरक्षर हैं। इसी मजहबी कट्टरता ने मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर को इतना नीचे रखा। बेटियों को घरों से निकलने नहीं दिया जाता। दूसरा उन पर बुर्के को लाद दिया जाता था। बेटियों को सिर से पांव तक बेडियों की तरह जकड़ दिया गया। आज केंद्र सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत शिक्षा के लिए विशेष प्रारंभ किये हैं जिसके सुखद परिणाम प्राप्त हो रहे थे लेकिन मुस्लिम समाज के कुछ ठेकेदारों और उनके हमराह राजनैतिक दलों को यह बात पसंद नहीं आ रही है। उडुप्पी जिले का एक हिजाब विवाद आज पत्थरबाजी व हिंसक प्रदर्शनों में बदल गया है। दिल्ली के शाहीन बाग में नारा-ए-तकदीर व अल्लाह हू अकबर के नारे गूंज रहे हैं। बुर्कानशीं मुस्लिम लड़की कटटरपंथियों की पोस्टर गर्ल बन बन चुकी है। पाकिस्तान, तुर्की से उसे बधाई मिल रही है और तो और मलाला जैसे लोग उसके समर्थन में ट्वीट कर रहे हैं। इस बवाल से देश में जिहाद, अलगाववाद व इस्लामिक कट्टरता की फैक्टरी कहलायी जाने वाली संस्था एसडीपीआई, पीएफआई की संलिप्तता जगजाहिर हो गई है। हिजाब की आड़ में भारत में दंगे की आग को भड़काने की साजिश भी बेनकाब हो चुकी है। इस आग को भड़काने में पाक खुफिया एंजेसी आईएसआई व सिख फार जस्टिस जैसे संगठनों की भूमिका सामने आ रही है।कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डी के शिवप्रसाद व कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भडकाऊ ट्वीट किये। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने देशमें गृहयुद्ध छिडने की बात कह दी। कांग्रेस सहित सभी दल एक बार फिर तुष्टिकरण के चलते नीचता पर उतर आये हैं। उप्र में एक सपा नेता ने हिजाब पर विवादित बयान दिया कि हिजाब पर हाथ डालने वालों का हाथ काट देंगे, आखिर यह लोग चाहते क्या हैं। स्पष्ट है कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दल एसडीपीआई, पीएफआई तथा आईएसआई व सिख फार जस्टिस जैसे संगठनों का सहारा लेकर चुनाव में है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में विश्व मितव्ययिता दिवस केवल बचत का ही दृष्टिकोण नहीं देता है बल्कि यह नियंत्रित इच्छा, आवश्यकता एवं उपभोग की आवश्यकता व्यक्त करता है। जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता देता है। इसी में विश्व की अनेक समस्याओं को समाधान निहित है और इसी में हमने कोरोना महाव्याधि से मुक्ति का मार्ग पाया है। असल में कोरोना महामारी ने जीवन को नये रूप में निर्मित करने की स्थितियां खड़ी की है, जिसका आधार मितव्ययिता एवं संयम ही है। जिसने इच्छाएं सीमित रखी, वह कभी दु:खी नहीं होगा। क्योंकि वह इस सचाई को जानता है कि इच्छा को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। तभी तो महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। मितव्ययिता भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है। सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए उसका बहुत बड़ा महत्व है। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में जैसे-जैसे मितव्ययिता का दृष्टिकोण धुंधला होता जारहा है, कोरोना महामारी, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्रकृति दोहन, आतंकवाद, युद्ध, संघर्ष की स्थितियों बढ़ती जा रही है। यदि मितव्ययिता का संस्कार लोकजीवन में आत्मसात हो जाये तो समाज, राष्ट्र एवं विश्व में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण हो सकता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा भी है कि अगर तुम जितना कमाते हो और उससे कम खर्च करते हो तो तुम्हारे पास पारस पत्थर है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान में पहला अंतर्राष्ट्रीय मितव्ययिता सम्मेलन आयोजित किया गया था और उसी में एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर विश्व मितव्ययिता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिन दुनिया भर में बचत करने को प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है। मेरी दृष्टि में यह दिवस कोरा बचत का दिवस नहीं है, बल्कि यह अर्थ के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एवं संयममय जीवनशैली को अपनाने का दिवस है। जबकि दुनिया में अनियंत्रित इच्छाओं को बल दिया जा रहा है, जिसका परिणाम क्या होगा? इच्छापूर्ति के लिये, आवश्यकता को बढ़ाने और उसे पूरा करने के लिये हिंसा अनिवार्य हो जाती है। नया उपभोक्तावाद एक प्रकार से नई हिंसा यानी कोरोना महामारियों का उपक्रम है। हिंसा, प्रतिस्पर्धा, सत्ता की दौड़ एवं आर्थिक साम्राज्य को इससे नया क्रूर आकार मिला है। क्योंकि अर्थ की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, भोग-विलास एवं स्वार्थ से जोड़ दिया है। समस्या सामने आई- पदार्थ कम, उपभोक्ता ज्यादा। व्यक्तिवादी मनोवृत्ति जागी। स्वार्थों के संघर्ष में अन्याय, शोषण एवं अनैतिकता होने लगी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई तो दूसरी ओर गरीबी एवं अभाव की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में जलने लगा, तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गई। आदमी-आदमी से असुरक्षित हो गया। फ्रांसीसी विचारक विचारक ज्यां बोद्रियो ने आधुनिक उपभोक्तावाद की मीमांसा करते हुए कहा है कि पहले वस्तु आती है तो वह सुख देने वाली लगती है। अंत में वह दु:ख देकर चली जातीहै। पहले वह भली लगती है, किन्तु अंत में बुरी साबित होती है। आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये मितव्ययिता जरूरी है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने मितव्ययिता के लिये ही वीआईपी कल्चर पर नियंत्रण लगाया है। सामाजिक और राष्ट्रीय संपदा का अर्थहीन अतिरिक्त भोग और दूसरी तरफ अनेक-अनेक व्यक्ति जीवन की मौलिक और अनिवार्य अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए भी तरसते रहते हैं। एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं, दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। यह आर्थिक विषमता निश्चित ही सामाजिक विषमता को जन्म देती है। जहां विषमता है, वहां निश्चित हिंसा है। इस हिंसा का उद्गम है, पदार्थ का अतिरिक्त संग्रह, व्यक्तिगत असीम भोग, अनुचित वैभव प्रदर्शन, साधनों का दुरुपयोग। सत्ता का दुरुपयोग भी विलासितापूर्ण जीवन को जन्म देता है। जनता के कुछ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के खून-पसीने की कमाई से किस कदर ऐशोआराम एवं भोग की जिन्दगी जीते हैं, यह भी सोचनीय है। किसके पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व इस बात का है कि अर्थ के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है तथा उसका उपयोग किस दिशा में हो रहा है। प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है। प्रश्न उठता है कि ये चकाचौंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित विश्व-व्यवस्था समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये विश्व मितव्ययिता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है। मितव्ययिता का महत्व शासन की दृष्टि से ही नहीं व्यक्ति एवं समाज की दृष्टि से भी है। हमारे यहां प्राचीन समाज में मितव्ययिता के महत्व को स्वीकार किया जाता था। किसी सामान की बबार्दी नहीं की जाती थी और उसे उपयुक्त जगह पहुंचा दिया जाता था। भोग विलास में पैसे नहीं खर्च किए जाते थे, पर दान, पुण्य किए जाने का प्रचलन था। पुण्य की लालच से ही सही, पर गरीबों को खाना खिला देना, अनाथों को रहने की जगह देना, जरूरतमंदों की सहायता करना जैसे काम लोग किया करते थे। पर आज का युग स्वार्थ से भरा है, अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सुंदर महंगे कपडे़ पहनना, फ्लाइट में घूमना, भोग विलास में आपना समय और पैसे जाया करना आज के नवयुवकों की कहानी बन गयी है। दूसरों की मदद के नाम से ही वे आफत में आ जाते हैं, अपने माता-पिता तक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते, दाई-नौकरों और स्टाफ को पैसे देने में कतराते हैं, पर अपने शौक मौज के पीछे न जाने कितने पैसे बर्बाद कर देते हैं। अपने मामलों में उन्हें मितव्ययिता की कोई आवश्यकता नहीं होती, पर कंपनी का खर्च घटाने में और दूसरों के मामले में अवश्य की जाती है। क्या मितव्ययिता का सही अर्थ यही है ? जैन धर्म में आदर्श गृहस्थ की जिस जीवनशैली का प्रतिपादन हुआ है, उसमें मितव्ययिता पर बहुत बल दिया गया है पर आज उसका जागरूकता के साथ अनुसारण करने वाले बहुत थोड़े हैं। भगवान महावीर ने व्यक्तिगत स्वामित्व का सीमाकरण और उपभोग का सीमाकरण-ये दोनों दर्शन दिये। इसी से समाज सुखी, स्वस्थ और शांत जीवन जीता रहा है। महात्मा गांधी के विचारों पर भी महावीर एवं जैन धर्म का गहरा प्रभाव था। जैनत्व के संयम प्रधान आदर्शों का उन्होंने अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा से अनुसरण किया था। महामात्य चाणक्य एक प्रसिद्ध संत हुए हैं। वे अपने स्थान पर रात्रि में लिख रहे थे। उस समय उनके पास दो दिये जल रहे थे। कुछ जिज्ञासु व्यक्ति उनसे मिलने आये। उनके बैठते ही संत ने एक दिया बुझा दिया। उन्होंने संत से पूछा-आपने ऐसा क्यों किया? चाणक्य ने कहा-लिखने के लिए अधिक उजाले की आवश्यकता होती है। आप लोगों से ज्ञान-चर्चा तो थोड़ी रोशनी में भी हो जाएगी। संत के इस व्यवहार से उन्हें एक नई पे्ररणा प्राप्त हुई। आज पानी और बिजली के अ्रभाव की चर्चा सारे राष्ट्र में हो रही है, पर दूसरी ओर सड़कों पर जगह-जगह नल खुले रहते हैं। इस दिशा में सरकार और जनता दोनों में ही जागरूकता का अभाव है। इसी प्रकार बिजली का भी दुरुपयोग होता रहता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रभात झा)। माओवादियों का अभी भी बस्तर के 37% इलाके पर कब्जा है (बस्तर आकार में केरल राज्य से बड़ा है)। लेकिन उनके आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि मध्य भारत के वनवासी लोगों ने अपना विचार बदल दिया है और अब उन्होंने माओवादी आंदोलन से अपनी सहमति वापस ले ली है। भारत में माओवादी आंदोलन किसानों और भूमि अधिकारों के लिए एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। लेकिन 50 साल बाद यह केवल वन क्षेत्रों तक ही सीमित है और आज 99% लड़ाके आदिवासी हैं। यह सही समय है जब माओवादी उन आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने की कोशिश करें जिन्होंने पिछले 40 वर्षों में उनके आंदोलन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। माओवादियों के लिए आदिवासी का कर्ज चुकाने का समय अब आ गया है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में केंद्रित माओवादी संघर्ष को समाप्त करने के लिए यदि बातचीत से समाधान होना है, तो भारत के माओवादी, नेपाली माओवादियों से कुछ सीख ले सकते हैं। मुझे करीब बीस साल पहले नेपाली माओवादी नेताओं से मिलना याद है जब मैं बीबीसी के साथ काम करता था। उनके नोएडा और बैंगलोर में गुप्त ठिकाने हुआ करते थे और बिना नंबर प्लेट के एंबेसडर कारों में वे हमसे मिलने आते थे। एक दिन मैंने उनमें से कुछ से पूछा, कृपया मुझे बताओ कि ये चल क्या रहा है? आप लोग नेपाल में क्रांति की बात करते हैं, वहां चल रहे युद्ध में सैकड़ों आम लोग मर रहे हैं, और यहां आप नेतागण भारतीय राजधानी में ब्यूरो के वाहनों में घूम रहे हैं! उन्होंने शांति से उत्तर दिया था, हम आज नेपाल के लगभग 80% हिस्से को नियंत्रित करते हैं। लेकिन हम यह भी समझ चुके हैं कि भारत हमें कभी भी काठमांडू पर कब्जा नहीं करने देगा। अमेरिका सुनिश्चित करेगा कि ऐसा न हो। इसलिए हम दूसरे सर्वश्रेष्ठ की तलाश कर रहे हैं जो हासिल किया जा सकता है। उन्होंने समझाया कि जनयुद्ध की रणनीति की तरह, संयुक्त मोर्चा भी माओ द्वारा दी गई एक रणनीति है। ठीक यही अगले कुछ वर्षों में काठमांडू की सड़कों पर तब तक नजर आया था जब तक शांति वार्ता के परिणामस्वरूप नेपाल के लिए एक धर्मनिरपेक्ष और परिपक्व लोकतंत्र नहीं बन गया, जिसमें माओवादियों की प्रमुख भूमिका थी। उसके बाद से नेपाल धरती पर स्वर्ग नहीं बन गया है लेकिन बेवजह हजारों लोगों की जान लेने वाली हिंसा का अंत हुआ है। भारत में अब भी कुछ कट्टर माओवादी नेता किसी भी कीमत पर बस्तर जैसे आधार इलाकों में क्रांति की लौ को तब तक जलाए रखना चाहते हैं, जब तक कि पूंजीवाद अपने ही वजन तले धराशायी नहीं हो जाता, पर अब यह भी लग रहा है उनके ही कुछ नेता संयुक्त मोर्चे की बदली हुई रणनीति के तहत गठबंधन बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। भारतीय राज्य सिलगेर (जहां उन्होंने एक पुलिस शिविर का विरोध कर रहे निहत्थे लोगों को मारा था) तथा उस जैसी अन्य जगहों पर भी अनुशासनहीन सैनिकों को दंडित न कर लोगों को जबरदस्ती माओवादियों की ओर और धकेल रहे हैं। पर उन्हीं जगहों पर नीति में बदलाव घोषित किए बिना ही माओवादी इन अवसरों का इस्तेमाल आदिवासियों के हितों के साथ खुद को जोड़कर एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए कर रहे हैं। सिलगेर जैसी जगहों पर ओवरग्राउंड संगठनों के प्रेस नोट अक्सर शुद्ध हिंदी में सैद्धांतिक विवरणों के साथ (स्वयं माओवादियों की शैली के समान) लिखे जाते हैं जो किसी ग्रामीण आदिवासी युवा के लिए लिखना साधारण रूप से मुश्किल है जो इन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं। आंदोलन संवैधानिक अधिकारों के साथ सड़क और पुलिस शिविर का भी विरोध करते हैं। वे माओवादियों के लिए कठिन सवाल कभी नहीं उठाते जैसे मुखबिर होने के आरोप में आदिवासियों की हो रही नियमित हत्याओं का मामला। लेकिन फिर भी सिलगेर की तरह के ये आंदोलन बहुत ही स्वागत योग्य संकेत हैं जिनके साथ काम किया जाना चाहिए। माओवादियों का अभी भी बस्तर के 37% इलाके पर कब्जा है (बस्तर आकार में केरल राज्य से बड़ा है)। 5 लाख से अधिक लोग उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहते हैं। लेकिन उनके आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि मध्य भारत के वनवासी लोगों ने अपना विचार बदल दिया है और अब उन्होंने माओवादी आंदोलन से अपनी सहमति वापस ले ली है। पिछले साल मार्च में दूसरी कोरोना लहर से पहले अबूझमाड़ से रायपुर शांति पदयात्रा के दौरान माओवादियों ने अपने प्रेस नोट में संकेत दिया था कि अगर उनके कुछ शीर्ष नेताओं को जेल से रिहा कर दिया जाता है, तो वे बातचीत में उनका नेतृत्व कर सकते हैं। इसे नंबर 2 माओवादी नेता प्रशांत बोस ने अपनी गिरफ्तारी से पहले एक साक्षात्कार में दोहराया था। बोस जैसे कट्टरवादी से इस तरह का वक्तव्य आना एक आश्चर्य की बात थी। सरकार को इन प्रस्तावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देनी चाहिए और अगर बातचीत होनी है, तो माओवादियों के पास भारतीय आदिवासियों के पास मौजूदा उपलब्ध संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करवाने के लिए बात करना एक आसान रास्ता होगा। भारतीय संविधान आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन के नारे में समाहित कुछ विशेष अधिकार देता है, लेकिन 75 वर्षों के बाद भी ये अधिकांश अधिकार केवल कागजों पर ही हैं। मध्य भारत में शांति के बोनस के साथ, माओवादियों के माध्यम से भारतीय आदिवासियों को भारतीय संविधान का हक दिलाने का राज्य के लिए भी यह एक अच्छा अवसर है। भारत में माओवादी आंदोलन किसानों और मुख्य रूप से भूमि अधिकारों के लिए एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। लेकिन 50 साल बाद यह केवल वन क्षेत्रों तक ही सीमित है और आज 99% लड़ाके आदिवासी हैं। यह सही समय है जब माओवादी उन आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने की कोशिश करें जिन्होंने पिछले 40 वर्षों में उनके आंदोलन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। माओवादियों के लिए आदिवासियों का कर्ज चुकाने का समय अब आ गया है। राज्य की एक अति हिंसक कार्रवाई, को सहन करना कठिन होगा। वे कुछ वैसा ही कर सकते हैं जैसा श्रीलंका ने लिट्टे को कुचलने के लिए किया था।
एबीएन डेस्क (टीएन नाइनन)। मिस्र का काहिरा विश्वविद्यालय जो धीरे-धीरे और अधिक इस्लामिक हो गया है, उसके बाहर एक युवा मुस्लिम महिला की एक सदी पुरानी प्रतिमा लगी है जिसमें वह महिला अपना नकाब उठा रही है। यह चित्र इस बात का प्रतीक है कि वह महिला पितृसत्तात्मक परंपरा द्वारा उस पर थोपे गए मानसिक तथा अन्य प्रकार के प्रतिबंधों से आजादी हासिल कर रही है। ऐसे में यह दलील देना मुश्किल है कि हिजाब पहनना इस्लाम की हिदायतों का पालन है। खेद की बात यह है कि भारत में रुझान काहिरा की उस मूर्ति के संदेश के उलट है जिसे मिस्र के जागरण के रूप में देखा जाता है। देश में बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं रूढि़वादी पहनावा अपना रही हैं। वे ऐसी जगहों पर भी ऐसा पहनावा पहनती हैं जहां पहले हिजाब या बुरका पहनने की परंपरा नहीं थी। उदारवादी यानी धर्मनिरपेक्ष मानसिकता के सामाजिक प्रगतिशील लोग जो बुनियादी तौर पर मानवतावादी हैं, वे इस रुझान से चिंतित होंगे क्योंकि वे धार्मिकता के सार्वजनिक प्रदर्शन में किसी भी इजाफे के खिलाफ हैं। यह ऐसा रुझान है जो किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। परंतु उनको यह स्वीकार करना होगा कि हिजाब वैसे ही पहचान का प्रतीक है जैसे कि सिख पुरुषों की पगड़ी। जब स्कूलों और कॉलेज परिसरों में पगड़ी पहनने या माथे पर तिलक लगाने की इजाजत है तो क्या हिजाब पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है? यदि नहीं तो क्या यही दलील बुरके पर भी लागू होती है? इस बहस का मैदान बहुत फिसलन भरा और ढलान वाला है। कुछ समाज दूसरों की तुलना में अधिक ईश्वर केंद्रित होते हैं। भारत भी इस दिशा में बढ़ रहा है। क्या यह एक विविधता वाले और विभिन्न धर्मानुयायियों वाले देश के लिए अच्छा है? शायद नहीं। क्या इसके हल के लिए कठोर धर्म निरपेक्षता की गुंजाइश है? एक बार फिर शायद नहीं। हालांकि हर प्रकार के गणवेश (स्कूलों अथवा सशस्त्र बलों में) इसीलिए होते हैं ताकि भेद को न्यूनतम किया जा सके लेकिन उनमें कुछ लचीलापन होता है- अलग-अलग तरह की दाढ़ियां भी एक मुद्दा है। ऐसा कोई जवाब नहीं है जो हर किसी के लिए सही हो। मेरा उद्देश्य ऐसे क्षेत्र में दखल देने का नहीं है जहां अधिक जानकार लोग मौजूद होंगे। इसके बजाय हमें इस बहस पर ध्यान देना होगा कि समाज की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। निश्चित तौर पर महिला शिक्षा और कार्यस्थल पर उनकी भागीदारी बढ़ाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता अन्य तमाम धर्मों की महिलाओं की तुलना में कम है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी यही स्थिति है-आबादी के अनुपात में मुस्लिमों की भागीदारी सबसे कम है। आंकड़ों में सुधार हो रहा है लेकिन अभी काफी प्रगति करनी है। ऐसे में यह बात स्वागत करने लायक है कि मुस्लिम बच्चियां और युवतियां स्कूल और कॉलेज जाने को लेकर उत्सुक हैं और खुद को बेहतर जीवन के लिए तैयार कर रही हैं। ऐसे में पहनावे के व्यक्तिगत चयन के कठिन विषय पर बहस सही नहीं लगती। कार्यस्थल पर महिलाओं की मौजूदगी भी इससे जुड़ा हुआ विषय है। काम कर रही या काम करने की इच्छुक महिलाओं में तमाम समुदायों की महिलाओं की तादाद 30 फीसदी से घटकर 20 फीसदी रह गई है। जबकि पुरुषों के मामले में यह 80 फीसदी से घटकर 75 फीसदी हुई है। यह महामारी के पहले का आंकड़ा है। बीते दो वर्षों में इन दोनों आंकड़ों में और अधिक गिरावट आई होगी। मुस्लिम महिलाओं की हिस्सेदारी सभी महिलाओं के 20 फीसदी के स्तर से भी कम होने की संभावना है। मामला चाहे शिक्षा हासिल करने का हो या आजीविका के लिए काम करने का, मुस्लिम महिलाओं को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। इससे उन्हें तमाम व्यक्तिगत और सामाजिक लाभ हासिल होंगे। इससे अन्य बातों के अलावा वे कम बच्चों को जन्म दे सकती हैं। उन पर अक्सर ज्यादा बच्चे पैदा करने का इल्जाम थोपा जाता है। अंत में गरीबी। श्रमिकों की अधिकता वाले देश में एक व्यक्ति की आय परिवार को गरीबी रेखा के ऊपर रखने के लिहाज से बेहद कम है। रोजगार भी पहले से अधिक अनिश्चित हो गया है। महिलाओं का काम करना अतिरिक्त आय के अलावा परिवार को सुरक्षा प्रदान करता है। कई रोजगारपरक गतिविधियां तमाम समुदायों की महिलाओं को आकर्षित करती हैं- कपड़ा फैक्टरियां और इलेक्ट्रॉनिक असेंबली इकाइयां इसके दो उदाहरण हैं। यह पारंपरिक महिला केंद्रित पेशों मसलन शिक्षण और नर्सिंग से अलग है। केरल ने दिखाया है कि कैसे ये क्षेत्र महिलाओं की आजादी का उदाहरण बन सकते हैं। इस बीच अध्ययन दर्शाते हैं कि आदिवासी, मुस्लिम और दलितों में गरीबी सबसे अधिक है। इन समुदायों की महिलाओं को शिक्षित बनाना और रोजगार प्रदान करना सामाजिक बेहतरी के लिए जरूरी है। यह आर्थिक दृष्टि से भी अनिवार्य कदम है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधांशु कुमार)। किसानों के खून-पसीने से उगाये और करदाताओं की मेहनत की कमाई से खरीदे गए अनाज के बड़ी मात्रा में उचित भंडारण के अभाव में बर्बाद होने की खबरें हर साल आती हैं। इसके बावजूद बारिश में भीगने तथा पक्षियों व अन्य जीवों द्वारा अनाज के ढेरों की बबार्दी की खबरें हर साल अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। लेकिन प्रबंधन से जुड़ा तंत्र व निगरानी करने वाला प्रशासन इस मुद्दे पर संवेदनहीन बना रहता है। इसी तरह की आपराधिक लापरवाही की नवीनतम घटना करनाल में नजर आई जहां खुले में पड़े अनाज से भरी बोरियों के ढेर बारिश में खराब होते देखे गये। जाहिर है यह अनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित होना होगा। बहुत संभव है कि अनाज की बबार्दी की जवाबदेही से बचने के लिये खराब अनाज भी गुपचुप तरीके से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिये भेजी जाने वाली अनाज की खेप में खपा दिया जाये। यह विडंबना ही है कि गुणवत्ता से भरपूर अनाज उत्पादन के लिये अग्रणी पंजाब और हरियाणा में ऐसे तमाम मामले प्रकाश में आ रहे हैं। जबकि जवाबदेही तय करके और रखरखाव की उचित व्यवस्था करके इस मौसमी परिवर्तन से होने वाले नुकसान को टाला भी जा सकता है। यह विडंबना ही है कि कई राज्य खाद्यान्न संकट से जूझ रहे हैं और वहीं दूसरी ओर हजारों टन अनाज बारिश व धूप में पड़ा हुआ सड़ता रहता है। इन राज्यों में गुणवत्ता निरीक्षण के दौरान कई ऐसे मामले प्रकाश में आते रहे हैं। निस्संदेह, यह आपराधिक लापरवाही से होने वाली राष्ट्रीय क्षति भी है। इस अनाज को उगाने में कृषक के श्रम के अलावा बिजली-पानी व भूमि की उर्वरता की लागत भी शामिल होती है। अनाज के बर्बाद होने ये घटक भी व्यर्थ चले जाते हैं जो सही मायनों में राष्ट्रीय संसाधनों की क्षति ही है, जिसे भंडारण की क्षमता के विस्तार और जवाबदेही तय करके टाला भी जा सकता है। जिस देश में कुपोषण व भुखमरी के आंकड़े पड़ोस के गरीब मुल्कों से अधिक हों, वहां लाखों टन अनाज यूं ही जाया चला जाये, इससे ज्यादा दुखद स्थिति कुछ और नहीं हो सकती। जटिल परिस्थितियों के बीच लाखों बोरी अनाज को बारिश में भीगने देना, चूहों, पक्षियों तथा कीड़ों द्वारा अखाद्य बनाना देश के नीति-नियंताओं पर सवालिया निशान लगाता है। यह विडंबना ही है कि जो देश आजादी से पहले सदियों तक अकाल व सूखे की वजह से खाद्यान्न संकट से जूझता रहा हो, वहां अन्न की शर्मनाक तरीके से बबार्दी जारी है। आजादी के बाद भी ऐसे संकट आये कि हमें आयातित गेहूं के लिये अमेरिका का मुंह ताकना पड़ा था। हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्रदान की। लेकिन हमें इस उपलब्धि को यूं ही नहीं गंवाना चाहिए। हमें इस अनाज को भुखमरी व कुपोषण के खिलाफ सशक्त हथियार बनाना चाहिए। गत वर्ष मई में जब गेहूं की खरीद एक सार्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई थी तो केंद्र सरकार ने जुलाई के अंत तक दो प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्यों पंजाब व हरियाणा में सौ फीसदी वैज्ञानिक भंडारण का आश्वासन दिया था, लेकिन करनाल का मामला बताता है कि दावे हकीकत नहीं बने हैं। इस मामले में उच्चतम स्तर पर दोषियों की जवाबदेही तय करते हुए सख्त कार्रवाई की जाए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनायक चटर्जी)। देश के बुनियादी ढांचे की विकास यात्रा के पिछले तीन दशकों में परियोजना कार्यान्वयन के लिए धन जुटाने की खातिर गहन प्रयास हुए हैं। इस दिशा में न केवल बजट परिव्यय में वृद्धि की गई, बल्कि संस्थागत वित्त पोषण कार्यक्रमों की शृंखला भी शुरू की गई। सबसे पहली थी वर्ष 1987 में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज। इसके बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनैंस कंपनी (1997), इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी (2006), नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड इनवेस्टमेंट फंड (2015) और नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्क्चर ऐंड डेवलपमेंट (2021) आई। सार्वजनिक-निजी साझेदारी का ढांचा भी स्थापित किया गया। इससे पहले के समय में क्षेत्र-विशिष्ट वित्त पोषण कार्यक्रम चलाए गए थे। इनमें ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (1969), आवास एवं शहरी विकास निगम (1970), पावर फाइनैंस कॉरपोरेशन (1986) और भारतीय रेलवे वित्त निगम (1986) शामिल हैं। पिछले दो दशकों में कई निजी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और निजी इक्विटी फंड भी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के वित्त पोषण में काफी सक्रिय हो गए हैं। कई वैश्विक दीर्घकालिक संस्थागत निवेशक भी आ गए हैं। पूंजी बाजार उपकरणों की एक नई पीढ़ी वजूद में आई-जैसे रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स। अब भारत लगभग 22 लाख करोड़ रुपये की वार्षिक बुनियादी ढांचागत वित्त पोषण क्षमता को साकार रूप देने के लिए भली-भांति तैयार है, जो राष्ट्र का घोषित लक्ष्य है। इस क्षमता को मोटे तौर पर केंद्रीय बजट परिव्यय (7 लाख करोड़ रुपये), राज्यों की ओर से संयुक्तनिवेश (6 लाख करोड़ रुपये), सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अतिरिक्त बजट संसाधनों (2 लाख करोड़ रुपये), नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (3 लाख करोड़ रुपये) तथा घरेलू और विदेशी निजी पूंजी (4 लाख करोड़ रुपये) से निर्मित माना जा सकता है। इसलिए अब जोर अनिवार्य रूप से जमीनी स्तर पर दक्ष कार्रवाई अर्थात समय पर परियोजना कार्यान्वयन पर होना चाहिए। हालांकि वित्त पोषण क्षमता के नितांत विपरीत परियोजना कार्यान्वयन के संबंध में जमीनी हकीकत काफी खराब है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की दिसंबर 2021 तक की नवीनतम सूचना में 1,679 परियोजनाएं शामिल हैं। ये केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाएं हैं, जिनमें से प्रत्येक की लागत 150 करोड़ रुपये या अधिक है। इनमें 10 क्षेत्र-सड़क, रेलवे, बिजली, पेट्रोलियम, शहरी विकास, कोयला, पानी, परमाणु ऊर्जा, इस्पात और दूरसंचार शामिल हैं। इनमें से 11 परियोजनाएं निर्धारित समय से आगे हैं, 292 निर्धारित समय पर हैं, 541 विलंबित हैं और फिर 835 ऐसी परियोजनाएं हैं, जहां न तो चालू होने का वर्ष और न ही पूरा होने की अपेक्षित तिथि उपलब्ध है। रिपोर्ट के अनुसार इन 1,679 परियोजनाओं के कार्यान्वयन की कुल मूल लागत 22.3 लाख करोड़ रुपये थी, लेकिन अब अनुमानित लागत करीब 26.68 लाख करोड़ रुपये है, जो 4.38 लाख करोड़ रुपये की अधिक लागत को दशार्ती है। यह मूल लागत का 20 प्रतिशत है। नवंबर तक इन सभी परियोजनाओं पर लागत का लगभग 48 प्रतिशत भाग व्यय किया जा चुका है। 4.38 लाख करोड़ रुपये की यह अधिक लागत वित्त वर्ष 22 के बजट में प्रस्तावित 5.54 लाख करोड़ रुपये के संपूर्ण बुनियादी ढांचागत परिव्यय की 79 प्रतिशत राशि है। राज्य सरकारों के नियंत्रण वाली विशाल परियोजनाओं की स्थिति उपलब्ध नहीं है और अधिक कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेपों में से एक संभवत: वर्ष 2013 की गर्मियों में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा स्थापित परियोजना प्रबंधन समूह (पीएमजी) था। इसके लिए यह अनिवार्य था कि अवरुद्ध परियोजनाओं के लगभग 17 लाख करोड़ रुपये की राशि छुड़ाई जाए और यह कथित तौर पर करीब सात लाख करोड़ रुपये की औद्योगिक और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को फिर से आगे बढ़वाने में सक्षम था। भले ही पीएमजी को मंत्रिमंडल सचिवालय में एक विशेष प्रकोष्ठ के रूप में स्थापित किया गया था, लेकिन बाद में इसे वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया था। वर्ष 2019 में पीएमजी को उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के साथ मिला दिया गया था। अब इसे प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग-इन्वेस्ट इंडिया सेल के रूप में जाना जाता है। इसके तहत ईसुविधा परियोजना प्रबंधन प्रणाली सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की विशाल परियोजनाओं के डेटाबेस की निगरानी करती है। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस ऐंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) भी है। वर्ष 2015 में शुरू किया गया यह मंच केंद्र सरकार के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों और परियोजनाओं के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारा चिह्नित परियोजनाओं की भी समीक्षा करता है। बढ़ती समस्या को स्वीकार हुए नीति आयोग और भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) ने अक्टूबर, 2020 में राष्ट्रीय कार्यक्रम एवं परियोजना प्रबंधन नीति ढांचे की शुरूआत की थी, जिसका लक्ष्य भारत में बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के कार्यान्वयन के तरीके में आमूलचूल सुधार लाना था। इसकी प्रमुख सिफारिशों में शामिल हैं- (1) क्यूसीआई के अंतर्गत नैशनल इन्स्टीट्यूट फॉर चार्टर्ड प्रोग्राम ऐंड प्रोजेक्ट प्रोफेशनल्स की स्थापना करना (2) कार्यान्वयन के सर्वोत्तम क्रियाकलापों का इंडियन इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉडी आॅफ नॉलेज नामक का एक तकनीकी भंडार विकसित करना (3) परियोजना कार्यान्वयन के पेशेवरों के लिए चार-स्तरीय प्रमाणन प्रणाली और (4) क्षमता निर्माण कार्यक्रम। आखिर में प्रौद्योगिकी-संचालित दो हालिया मंच-आॅनलाइन मंजूरी और अनुमति के लिए नैशनल सिंगल विंडो सिस्टम तथा गति शक्ति परियोजना कार्यान्वयन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए शक्तिशाली उपकरण हैं। इसलिए अब हमारे पास परियोजना कार्यान्वयन में चिरकालीन विलंब की समस्या को हल करने के लिए संस्थागत स्वरूपों का एक समूह है।
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