विचार

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Published / 2022-04-05 14:46:33
विराट जीत में संघ-जनसंघ से भाजपा तक की भूमिका...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिवशंकर उरांव)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कल अपना 41वां स्थापना दिवस मनायेगी। 6 अप्रैल, 1980 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में जनसंघ से निकले लोगों ने भारतीय जनता पार्टी बनाई। वाजपेयी और लंबे अरसे तक पार्टी में उनकी परछाई बनकर रहे पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मिलकर पार्टी को 1984 में दो सीट से 1998 में 182 सीटों तक ला खड़ा कर दिया था। हिंदुत्व और राम जन्मभूमि के एजेंडे पर आगे बढ़ी बीजेपी ने 2014 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत का स्वाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चखा। 2014 में बीजेपी ने 282 सीटों पर जीत दर्ज की थी तो वहीं 2019 में उसकी सीटों का आंकड़ा 300 पार चला गया था। भारत को एक समर्थ राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ भाजपा का गठन 6 अप्रैल, 1980 को नई दिल्ली के कोटला मैदान में आयोजित एक कार्यकर्ता अधिवेशन में किया गया, जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेयी निर्वाचित हुए। आज तीन दशक बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किसी एक पार्टी को देश की जनता ने पूर्ण बहुमत दिया है तथा भारी बहुमत से भाजपा नीत राजग सरकार केन्द्र में विद्यमान है। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर देश में एक नया राजनीतिक षड्यंत्र रचा जाने लगा। सरदार पटेल के देहावसान के पश्चात कांग्रेस में नेहरू का अधिनायकवाद प्रबल होने लगा। गांधी और पटेल दोनों के ही नहीं रहने के कारण कांग्रेस नेहरूवाद की चपेट में आ गई तथा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा पर लापरवाही, राष्ट्रीय मसलों जैसे कश्मीर आदि पर घुटनाटेक नीति, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारतीय हितों की अनदेखी आदि अनेक विषय देश में राष्ट्रवादी नागरिकों को उद्विग्न करने लगे। नेहरूवाद तथा पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर भारत के चुप रहने से क्षुब्ध होकर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ स्वयंसेवकों ने भी प्रतिबंध के दंश को झेलते हुए महसूस किया कि संघ के राजनीतिक क्षेत्र से सिद्धांतत: दूरी बनाये रखने के कारण वे अलग-थलग तो पड़े ही, साथ ही संघ को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता देश में महसूस की जाने लगी। फलत: भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर, 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में हुई। नेहरू के अधिनायकवादी रवैये के फलस्वरूप डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां उनकी रहस्यपूर्ण स्थिति में मृत्यु हो गई। एक नई पार्टी को सशक्त बनाने का कार्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गया। भारत-चीन युद्ध में भी भारतीय जनसंघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेहरू की नीतियों का डटकर विरोध किया। 1967 में पहली बार भारतीय जनसंघ एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में भारतीय राजनीति पर लम्बे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, जिससे कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय हुई। सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निरंकुश होती जा रही कांग्रेस सरकार के विरूद्ध देश में जन-असंतोष उभरने लगा। गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन के साथ बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हो गया। कांग्रेस ने इन आंदोलनों के दमन का रास्ता अपनाया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया तथा देशभर में कांग्रेस शासन के विरूद्ध जन-असंतोष मुखर हो उठा। 1971 में देश पर भारत-पाक युद्ध तथा बांग्लादेश में विद्रोह के परिप्रेक्ष्य में बाह्य आपातकाल लगाया गया था जो युद्ध समाप्ति के बाद भी लागू था। उसे हटाने की भी मांग तीव्र होने लगी। जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने जनता की आवाज को दमनचक्र से कुचलने का प्रयास किया। परिणामत: 25 जून, 1975 को देश पर दूसरी बार आपातकाल भारतीय संविधान की धारा 352 के अंतर्गत आंतरिक आपातकाल के रूप में थोप दिया गया। देश के सभी बड़े नेता या तो नजरबंद कर दिये गए अथवा जेलों में डाल दिए गये। समाचार पत्रों पर सेंसर लगा दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक राष्ट्रवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर एक नये राष्ट्रीय दल जनता पार्टी का गठन किया गया। विपक्षी दल एक मंच से चुनाव लड़े तथा चुनाव में कम समय होने के कारण जनता पार्टी का गठन पूरी तरह से राजनीतिक दल के रूप में नहीं हो पाया। आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई तथा जनता पार्टी एवं अन्य विपक्षी पार्टियां भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। पूर्व घोषणा के अनुसार 1 मई, 1977 को भारतीय जनसंघ ने करीब 5000 प्रतिनिधियों के एक अधिवेशन में अपना विलय जनता पार्टी में कर दिया। जनता पार्टी का प्रयोग अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। दो-ढाई वर्षों में ही अंतर्विरोध सतह पर आने लगा। भारतीय जनसंघ से जनता पार्टी में आये सदस्यों को अलग-थलग करने के लिए दोहरी-सदस्यता का मामला उठाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध रखने पर आपत्तियां उठायी जानी लगीं। यह कहा गया कि जनता पार्टी के सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं बन सकते। 4 अप्रैल, 1980 को जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति ने अपने सदस्यों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य होने पर प्रतिबंध लगा दिया। पूर्व के भारतीय जनसंघ से संबद्ध सदस्यों ने इसका विरोध किया और जनता पार्टी से अलग होकर 6 अप्रैल, 1980 को एक नये संगठन भारतीय जनता पार्टी की घोषणा की। इस प्रकार भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। आज भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है। विश्व में भारत को सम्मान दिला हम सब के दिलों पर राज कर रही है। भारतीय जनता पार्टी एक सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु निरंतर सक्रिय है। पार्टी की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की है जो आधुनिक दृष्टिकोण से युक्त एक प्रगतिशील एवं प्रबुद्ध समाज का प्रतिनिधित्व करता हो तथा प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति तथा उसके मूल्यों से प्रेरणा लेते हुए महान ह्यविश्वशक्तिह्ण एवं ह्यविश्व गुरूह्ण के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हो। इसके साथ ही विश्व शांति तथा न्याययुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए विश्व के राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखे। भाजपा भारतीय संविधान में निहित मूल्यों तथा सिद्धांतों के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित राज्य को अपना आधार मानती है। पार्टी का लक्ष्य एक ऐसे लोकतान्त्रिक राज्य की स्थापना करना है जिसमें जाति, सम्प्रदाय अथवा लिंगभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय, समान अवसर तथा धार्मिक विश्वास एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो। भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म-मानवदर्शन को अपने वैचारिक दर्शन के रूप में अपनाया है। साथ ही पार्टी का अंत्योदय, सुशासन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास एवं सुरक्षा पर भी विशेष जोर है। पार्टी ने पांच प्रमुख सिद्धांतों के प्रति भी अपनी निष्ठा व्यक्त की, जिन्हें पंचनिष्ठा कहते हैं। ये पांच सिद्धांत (पंच निष्ठा) हैं-राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय अखंडता, लोकतंत्र, सकारात्मक पंथ-निरपेक्षता (सर्वधर्मसमभाव), गांधीवादी समाजवाद (सामाजिक-आर्थिक विषयों पर गांधीवादी दृष्टिकोण द्वारा शोषण मुक्त समरस समाज की स्थापना) तथा मूल्य आधारित राजनीति। उपलब्धियां : श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अपनी स्थापना के साथ ही भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गई। बोफोर्स एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पुन: गैर-कांग्रेसी दल एक मंच पर आये तथा 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। वी.पी. सिंह के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया। इसी बीच देश में राम मंदिर के लिए आंदोलन शुरू हुआ। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए रथयात्रा शुरू की। राम मंदिर आंदोलन को मिले भारी जनसमर्थन एवं भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर आडवाणी जी की रथयात्रा को बीच में ही रोक दिया गया। फलत: भाजपा ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। और वीपी सिंह सरकार गिर गई तथा कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बने। आने वाले आम चुनावों में भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ता गया। इसी बीच नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस तथा कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकारों का शासन देशपर रहा, जिस दौरान भ्रष्टाचार, अराजकता एवं कुशासन के कईं कीर्तिमान स्थापित हुए। 1996 के आम चुनावों में भाजपा को लोकसभा में 161 सीटें प्राप्त हुईं। भाजपा ने लोकसभा में 1989 में 85, 1991 में 120 तथा 1996 में 161 सीटें प्राप्त कीं। भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा सरकार ने 1996 में शपथ ली, परन्तु पर्याप्त समर्थन के अभाव में यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई। इसके बाद 1998 के आम चुनावों में भाजपा ने 182 सीटों पर जीत दर्ज की और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने शपथ ली। परन्तु जयललिता के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के कारण सरकार लोकसभा में विश्वासमत के दौरान एक वोट से गिर गई, जिसके पीछे वह अनैतिक आचरण था, जिसमें उड़ीसा के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिररिधर गोमांग ने पद पर रहते हुए भी लोक सभा की सदस्यता नहीं छोड़ी तथा विश्वासमत के दौरान सरकार के विरूद्ध मतदान किया। कांग्रेस के इस अवैध और अनैतिक आचरण के कारण ही देश को पुन: आम चुनावों का सामना करना पड़ा। 1999 में भाजपा 182 सीटों पर पुन: विजय मिली तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 306 सीटें प्राप्त हुईं। एक बार पुन: श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा-नीत राजग की सरकार बनी। भाजपानीत राजग सरकार ने श्री अटल बिहारी के नेतृत्व में विकास के अनेक नये प्रतिमान स्थापित किये। पोखरण परमाणु विस्फोट, अग्नि मिसाइल का सफल प्रक्षेपण, कारगिल विजय जैसी सफलताओं से भारत का कद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ऊंचा हुआ। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य में नयी पहल एवं प्रयोग, कृषि, विज्ञान एवं उद्योग के क्षेत्रों में तीव्र विकास के साथ-साथ महंगाई न बढ़ने देने जैसी अनेकों उपलब्धियां इस सरकार के खाते में दर्ज हैं। भारत-पाक संबंधों को सुधारने, देश की आंतरिक समस्याओं जैसे नक्सलवाद, आतंकवाद, जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तर पूर्व के राज्यों में अलगाववाद पर कईं प्रभावी कदम उठाए गये। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सुदृढ़ कर सुशासन एवं सुरक्षा को केन्द्र में रखकर देश को समृद्ध एवं समर्थ बनाने की दिशा में अनेक निर्णायक कदम उठाये गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राजग शासन ने देश में विकास की एक नई राजनीति का सूत्रपात किया। 10 साल पार्टी ने विपक्ष की सक्रिय और शानदार भूमिका निभाई। 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी, जो आज ह्यसबका साथ, सबका विकासह्ण की उद्घोषणा के साथ गौरव सम्पन्न भारत का पुनर्निर्माण कर रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा लगभग 11 करोड़ सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गयी है। 26 मई, 2014 को श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की। मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने कम समय में ही अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने विश्व में भारत की गरिमा को पुन:स्थापित किया, राजनीति पर लोगों के विश्वास को फिर से स्थापित किया। अनेक अभिनव योजनाओं के माध्यम से नए युग की शुरूआत की। अन्त्योदय, सुशासन, विकास एवं समृद्धि के रास्ते पर देश बढ़ चला है। आर्थिक और सामाजिक सुधार सुरक्षित जीवन जीने का मार्ग उपलब्ध करा रहे हैं। किसानों के लिये ऋण से लेकर खाद तक की नयी नीतियां जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, आदि ने कृषि के तीव्र विकास की अलख जगायी है। ये नया युग है सुशासन का। चाहे आदर्श ग्राम योजना हो, स्वच्छता अभियान या फिर योग के सहारे भारत को स्वथ्य बनाने का अभियान, इन सभी कदमों से देश को एक नयी ऊर्जा मिली है। भाजपा की मोदी सरकार ने ह्यमेक इन इंडियाह्ण, ह्यस्किल इंडियाह्ण, अमृत मिशन, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं से भारत को आधुनिक और सशक्त बनाने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है। जनधन योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी अनेक योजनाएं देश में एक नयी क्रांति का सूत्रपात कर रही हैं। भाजपा सरकार ने देशवासियों को विश्व की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना का उपहार दिया है। (लेखक अनुसूचित जन जाति मोर्चा झारखंड भाजपा के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2022-04-04 15:37:06
आर्थिक बदहाली के कुचक्र में पश्चिम बंगाल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अशोक लाहिड़ी)। पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने 2022-23 का आम बजट पेश कर दिया है और यह उपयुक्त समय है जब हम राज्य की अर्थव्यवस्था की स्थिति, वित्तीय सेहत तथा सरकार के नीतिगत रुझान पर नजर डालें। प्रति व्यक्ति आय की रैंकिंग के हिसाब से देखें तो पश्चिम बंगाल सन 1980 में 25 राज्यों के बीच सातवें स्थान से फिसलकर 2018-19 में 29 राज्यों में 21वें स्थान पर आ गया था। सन 1950 और 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल की तुलना महाराष्ट्र और तमिलनाडु से होती थी, अब आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्य उसके समतुल्य हैं। पश्चिम बंगाल की तट रेखा लंबी है और उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा भूटान और बांग्लादेश से मिलती है।औद्योगिक और कारोबारी केंद्र के रूप में भी उसका समृद्ध इतिहास रहा है। ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल की सरकार तात्कालिक खपत की वस्तुओं के लिए खरीद और व्यय की नीति को जारी रखे हुए है। मार्च के अंत में उसका बकाया कर्ज 2021 के 4.82 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2022 में 5.29 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। 2023 में यह और अधिक बढ़कर 5.86 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। राज्य का कर्ज-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात भी राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम में उल्लिखित 25 फीसदी की सीमा से काफी अधिक है। पंजाब के साथ-साथ राजस्व व्यय में उसकी ब्याज भुगतान की हिस्सेदारी भी उच्चतम में है। सन 2022-23 के बजट अनुमान में अपनी 48 फीसदी प्राप्तियों के लिए पश्चिम बंगाल केंद्र सरकार से मिलने वाली कर अंतरण राशि तथा अनुदान पर निर्भर रहेगा। शेष 33 फीसदी हिस्सा उधारी से आएगा। यह अनुपात बहुत ज्यादा है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में कर अंतरण तथा अनुदान पर निर्भरता केवल 21 फीसदी है जबकि उधारी 27 फीसदी है। व्यय के मोर्चे पर महामारी के साथ राज्य सरकार ने पूंजीगत आवंटन पर सब्सिडी और हस्तांतरण को तरजीह दी। सरकार ने इस सब्सिडी और हस्तांतरण को यह कहते हुए उचित ठहराया कि इससे मांग बढ़ी और जरूरतमंदों और वंचितों की मदद की गई। 2022-23 (बजट अनुमान) में महामारी के धीमा पड?े के साथ व्यय के हिस्से के रूप में सब्सिडी के गति वर्ष के 2021-22 (संशोधित अनुमान) के सात फीसदी से घटकर चार फीसदी रह जाने का अनुमान है। जबकि पूंजीगत व्यय में ऐसा ही इजाफा होगा। सब्सिडी 2021-22 में 10,955 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) से बढ़कर 2021-22 में 18,720 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) तक पहुंच गई थी। उसके भी 2022-23 में घटकर 10,935 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) रहने का अनुमान है। सरकार ने रूपश्री, शिल्पसाथी और आनंदधारा आदि नामों से करीब 50 सब्सिडी और हस्तांतरण योजनाएं शुरू की हैं। यह जानना उपयोगी होगा कि सरकार कौन सी योजनाओं को बंद करना या संक्षिप्त करना चाहती है ताकि 2021-22 का अनुभव दोहराने से बचा जा सके। उस वक्त सब्सिडी आवंटन में बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में 70 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ था। सरकार के पूंजीगत व्यय में अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता बढ़ाने वाले आवंटन तथा कर्ज को दोबारा चुकाना शामिल है। आर्थिक नजरिये से देखें तो पूंजीगत आवंटन एक अहम चर है। 2021-22 में बजट अनुमान तथाा संशोधित अनुमान के बीच के चरण में सब्सिडी में इजाफे के बीच पूंजीगत आवंटन में कमी आई और यह 32,774 करोड़ रुपये के बजट अनुमान से घटकर संशोधित अनुमान मेंं 19,355 करोड़ रुपये रह गया। पूंजीगत आवंटन के बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में कटौती की बात करें तो इसमें भारी कमी आई और सामाजिक सेवाओं के लिए यह 12,818 करोड़ रुपये से कम होकर 8,245 करोड़ रुपये रह गया। जबकि कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों तथा ग्रामीण विकास एवं विशेष क्षेत्रों के कार्यक्रम में यह 6,183 करोड़ रुपये से कम होकर 1,744 करोड़ रुपये रह गया। इतने कम पूंजीगत आवंटन के साथ इस बात में संदेह ही है कि सरकार के पास भौतिक और सामाजिक अधोसंरचना के लिए जरूरी पूंजी है भी या नहीं। सन 2012-13 और 2018-19 के बीच 2013-14 और 2015-16 को छोड़ दिया जाए तो हर वर्ष प्रदेश का जीएसडीपी देश की तुलना मेंं धीमी गति से बढ़ा। जीएसडीपी 12.8 फीसदी बढ़ने की आशा है जबकि शेष देश का जीडीपी केवल 9.2 फीसदी बढ़ रहा है। यहां तीन बुनियादी प्रश्न हैं। पहला, विकसित देशों के उलट क्या पश्चिम बंगाल मांग की बाधा या आपूर्ति की दिक्कतों से जूझ रहा है? दूसरा, मांग में इजाफे का कितना हिस्सा देश के अन्य राज्यों को जाता है और कितना राज्य के लिए लाभदायक होता है? तीसरा, राज्य में आबादी के उच्च घनत्त्व को देखते हुए जीएसडीपी तेजी से कैसे बढ़ रहा है जबकि औद्योगिक गतिविधियों में कोई बढ़ोतरी नहीं दिख रही? समस्या तब पैदा होती है जब ऐसी राहत राजनीतिक लाभ और वोट खरीदने के लिए गैर जरूरतमंद लोगों को दी जाती है। यह काम दीर्घावधि के विकास की लागत पर तथा राज्य के सामाजिक और भौतिक ढांचे की अनदेखी करके किया जाता है। सब्सिडी और हस्तांतरण के नाकाबिल लोगों के पास जाने की समस्या पर नियंत्रण केवल तभी आ सकता है जब लाभार्थी चयन में पारदर्शिता बरती जाए। सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे में अहम निवेश किया जाना चाहिए ताकि औद्योगीकरण की गति बढ़ाई जा सके। केवल उसके माध्यम से ही राज्य में लोगों को सार्थक रोजगार दिलाया जा सकेगा। ध्यान रहे देश के प्रति वर्ग किलोमीटर 382 के जनसंख्या घनत्व की तुलना में पश्चिम बंगाल में प्रति वर्ग किलोमीटर 1,082 लोग रहते हैं। औद्योगीकरण के लिए किफायती बुनियादी ढांचे की जरूरत है और सन 1990 के दशक में प्रदेश की वाम मोर्चा सरकार के नई आर्थिक नीति पेश करने के बाद एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मशविरा कंपनी ने इस विषय में संकेत किया था। परंतु हस्तांतरण और सब्सिडी की नीतियों के साथ और तेज औद्योगीकरण की बुनियाद के बिना स्थायित्व नहीं हासिल होगा और अनचुकता बिलों और अधूरे वादों के साथ राजकोषीय संकट ही सामने आएगा।

Published / 2022-04-01 13:51:30
देवभूमि से समान नागरिक संहिता की शुरुआत...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। उत्तराखंड के पुन: मुख्यमंत्री बने पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह राज्य में एक समान नागरिक आचार संहिता को लागू करने के अपनी पार्टी भाजपा के चुनावी फैसले को लागू करने का इरादा जाहिर किया है उसका देश के सभी राज्यों में बिना आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह के स्वागत किया जाना चाहिए। समान नागरिक आचार संहिता का मुद्दा आज एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल, यह मुद्दा आज का नहीं है, यह अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के नजरिये से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित में चिन्तन, निर्णय एवं क्रियान्वयन की अपेक्षा है। भले ही भाजपा के लिये यह चुनावी मुद्दा रहा हो, लेकिन इसको लागू करने की अपेक्षा सभी जाति, धर्म, वर्ग, भाषा के लोगों के हित में है। हां, इसे लागू करने का साहस एवं दूरदर्शिता भाजपा और उसके नेता प्रदर्शित कर रहे हैं, यह स्वागतयोग्य है। इसे मजहब या साम्प्रदायिकता की राजनीति से ऊपर उठ कर पूरे देश की सामाजिक समरसता के नजरिये से देखा जाना चाहिए। संवैधानिक दृष्टि से भी यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है क्योंकि भारत का संविधान धर्म या जाति-बिरादरी अथवा स्त्री-पुरुष या क्षेत्रीय पहचान की परवाह किये बिना प्रत्येक नागरिक को एक समान अधिकार देता है। उत्तराखंड के पुन: मुख्यमन्त्री बने पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह राज्य में एक समान नागरिक आचार संहिता को लागू करने के अपनी पार्टी भाजपा के चुनावी फैसले को लागू करने का इरादा जाहिर किया है उसका देश के सभी राज्यों में बिना आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह के स्वागत किया जाना चाहिए। भारत विविधताओं से भरा देश है। यहाँ विभिन्न पंथों व पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग रहते हैं। इन सबके शादी करने, बच्चा गोद लेने, जायदाद का बंटवारा करने, तलाक देने व तलाक उपरांत तलाकशुदा महिला के जीवनयापन हेतु गुजारा भत्ता देने आदि के लिए अपने-अपने धमार्नुसार नियम, कायदे व कानून हैं। इन्हीं नियमों, कायदे व कानूनों को पर्सनल लॉ कहते हैं। अंग्रेज जब भारत आए और उन्होंने यह विविधता देखी, तो उस समय उन्हें लगा पूरे देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक समान नागरिक आचार संहिता बनानी आवश्यक है। जब उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की तो हर धर्मों के लोगों ने इसका विरोध किया। ऐसे में उन्होंने लम्बे समय तक यहां अपने पांव जमाये रखने के लिए किसी से उलझना ठीक नहीं समझा। इन परिस्थितियों में 1860 में उन्होंने इंडियन पैनल कोड तो लागू किया पर इंडियन सिविल कोड नहीं। यानि एक देश-एक दंड संहिता तो लागू की, लेकिन एक देश-एक नागरिक संहिता लागू करने का जिम्मेदारी एवं साहसपूर्ण काम नहीं किया। उसके बाद बनी सरकारों ने तो अंग्रेजों की सोच एवं नीतियों का ही अनुसरण किया, इसलिये उन्होंने भी अपने राजनीतिक हितों के लिये इसे लागू नहीं किया। जबसे नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए राष्ट्र को नया उजाला एवं सांसें दी हैं। भले ही वह कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने का साहसिक एवं सूझबूझ भरा निर्णय हो या तीन तलाक का मुद्दा। कांग्रेस सरकारों ने हिन्दू एवं अन्य धर्मों को कमजोर करने एवं मुस्लिमों को संख्याबहुल बनाने के लिये अपने हित को सर्वोपरि माना। अपनी इन्हीं गलत नीतियों एवं संकीर्ण राजनीति के कारण कांग्रेस लगातार कमजोर होते होते अब एकदम रसातल में जा चुकी है। आजादी के बाद जिस तरह मुस्लिम सम्प्रदाय के लोगों को उनकी मजहब की पहचान के आधार पर उनके धार्मिक कानूनों को मान्यता देने का प्रावधान किया गया वह देश की आन्तरिक एकता व समरसता में व्यवधान पैदा करने वाला था। सभी मत-मजहब वालों के लिए तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार, विवाह की आयु, बच्चों को गोद लेने और विरासत संबंधी नियम एक समान बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि इन सभी मामलों में एक जैसे नियम बन जाते हैं तो समान नागरिक संहिता का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। इसकी शुभ शुरुआत देवभूमि से हो रही है, यह सुखद संकेत है। तथ्य यह भी है कि गोवा में समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है और वहां सभी समुदायों के लोग रहते हैं। आखिर जो व्यवस्था गोवा में बिना किसी बाधा के लागू है, वह शेष देश में क्यों नहीं लागू हो सकती? प्रश्न यह भी है कि जब अन्य कई लोकतांत्रिक देशों में तुर्की, सूडान, इंडोनेशिया, मलेशिया, बांग्लादेश, इजिप्ट और पाकिस्तान में समान नागरिक संहिता लागू है तो भारत में उसका विरोध क्यों होता है? देश के अनेक मुस्लिम संगठनों ने आजादी के आन्दोलन में सहयोग एवं सहभागिता ही नहीं की, बल्कि भारत के बंटवारे का विरोध भी किया था। लेकिन आजाद भारत में इन संगठनों ने भी कभी मुसलमानों को भारत की राष्ट्रीय धारा में मिलने की प्रेरणा नहीं दी और उनकी मजहबी पहचान को खास रुतबा दिये जाने की ही कोशिशें करते हुए सर्वाधिक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी को इसके उपाय सुझाये। सबसे दुखद यह है कि 1947 में मजहब के आधार पर ही मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र पाकिस्तान बनाये जाने के बावजूद हमने अपनी राष्ट्रीय नीति में परिवर्तन नहीं किया और इसके उलट उन्हीं प्रवृत्तियों व मानसिकता को मुल्ला-मौलवियों व मुस्लिम उलेमाओं की मार्फत संरक्षण दिया गया जिन्होंने भारत के बंटवारे तक में अहम भूमिका निभाई थी। जिसकी वजह से भारत में मुसलमानों की राजनैतिक पहचान एक वोट बैंक के रूप में बनती चली गई और मुस्लिम तुष्टीकरण का अघोषित एजेंडा चल पड़ा।देश में बहुसंख्य हिंदू लगातार अल्पसंख्य होने की कगार पर अग्रसर होता रहा। सोचने वाली बात तो यह है कि कांग्रेस ने भी मुसलमानों को वोट बैंक से अधिक नहीं समझा और अपने स्वार्थ के लिये उनका इस्तेमाल किया। इससे इस समुदाय के लोगों का आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परिवेश हमेशा पिछड़ा ही रहा। अब मोदी सरकार न केवल इस वर्ग के लोगों का जीवनस्तर ऊपर उठाने की कोशिश कर रही है, बल्कि उन्हें उन्नत जीवनशैली भी दे रही है। इंडियन पैनल कोड 1860 की धारा 494 के अनुसार कोई भी स्त्री या पुरुष एक विवाह के रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकता। दूसरी ओर मुस्लिम पुरुष 4 शादियां कर सकता है। सीआरपीसी 1973 की धारा 125 के अनुसार तलाकशुदा पत्नी पति से आजन्म गुजारा भत्ता लेने की हकदार है। मुस्लिम महिलाओं के लिए ऐसा नहीं है। शाहबानो केस इसका उदाहरण है। इसी तरह बाल विवाह निषेध अधिनियम 1929 के अनुसार बाल विवाह अपराध है, परन्तु मुस्लिम समाज के लिए यह अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। ईसाई विवाह अधिनियम 1872, ईसाई तलाक अधिनियम 1869 भी पुराने हैं व हिन्दू विवाह अधिनियम से अलग हैं। ये विषमताएं देश की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्नचिन्ह हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत का समान आचार संहिता पर बहुत ही तर्कसंगत दृष्टिकोण है। इस मुद्दे को लेकर संघ और भाजपा पर अत्यंत संकीर्ण, सांप्रदायिक और समाज-विरोधी दृष्टिकोण का आरोप लगता रहा है। जबकि मोहन भागवत का दृष्टिकोण एकदम स्पष्ट है कि जो भारत में पैदा हुआ और जो भी भारत का नागरिक है, वह हिंदू है। हिंदू होने और भारतीय होने में कोई फर्क नहीं है। समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर भी मोहन भागवत की राय है कि सर्वसम्मति के बिना इसे लागू करना उचित नहीं होगा। उत्तराखंड पूरे देश में देवभूमि के नाम से जाना जाता है, यह अध्यात्म की अलौकिक भूमि है, जहां सद्भावना एवं सौहार्द इंसानों में ही नहीं, जीव-जंतुओं एवं पशु-पक्षियों तक में व्याप्त है। संकीर्णता से ऊपर उठ कर जो किसी भी व्यक्ति में ईश्वर की सर्व व्यापी निरंकार सत्ता का बोध कराती है। ईश्वर की पृथ्वी पर इस निकटता को केवल सनातन या हिन्दू दर्शन अथवा इस धरती से उपजे अन्य धर्म दर्शन ही बताते हैं। अत: बहुत आवश्यक है कि इस देवभूमि में सभी नागरिकों का आचरण एक समान ही हो और सभी के लिए सामाजिक नियम एक समान हों। वैसे गौर से देखा जाये तो 2000 में उत्तराखंड बनने से पहले और बाद में भी इसकी पर्वतीय जनसंख्या में खासा परिवर्तन आया है और पहाड़ों पर मुस्लिम जनसंख्या में खासा इजाफा हुआ है। उत्तराखंड में मदरसों की संख्या तक में अभिवृद्धि हो रही है। जब धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होगा तो देश सही मायने में धर्मनिरपेक्ष बनेगा। विभिन्न समुदायों के बीच एकता की भावना पैदा होगी। एक ही विषय पर कम कानून होने से न्यायतंत्र को भी फैसले देने में आसानी होगी। कई मुस्लिम देशों जैसे टर्की व ट्यूनिशिया आदि ने भी शरीयत से हटकर नागरिक कानून बनाये हैं। मुस्लिम समाज को मुख्य धारा में आने व अपने सामाजिक उत्थान के लिए सरकार पर समान नागरिक आचार संहिता लागू करने के लिए दबाव बनाना चाहिए। राजनीतिक दलों एवं विभिन्न राज्य सरकारों को भी मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक ना मानते हुए तुष्टीकरण की नीतियों से ऊपर उठ कर सामाजिक समरसता व हर वर्ग के उत्थान के लिए काम करना चाहिए।

Published / 2022-03-31 13:04:02
रक्षा क्षेत्र में निजी निवेश की संभावना और उसके लाभ

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (जीबीएस शास्त्री)। कोविड-19 के कारण गत छह माह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्रालय के चुनिंदा अधिकारी उद्योग जगत के लोगों से वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिये ही रूबरू हुए हैं। अधिकारियों ने 2014 के बाद किए गए रक्षा नीति सुधारों के बारे में बात की। उनका कहना है कि ये सुधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के नारे के अनुरूप रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने वाले हैं। अधिकारी रक्षा क्षेत्र की 101 वस्तुओं की नकारात्मक आयात सूची, नई रक्षा अधिग्रहण नीति 2020 (डीएपी 2020) का जिक्र करते हुए स्वदेशीकरण पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि नई रक्षा उत्पादन एवं निर्यात संवर्द्धन नीति (डीपीईपीपी 2020) की मदद से सालाना रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर 26 अरब डॉलर पहुंचाया जाएगा और हर वर्ष 5 अरब डॉलर के हथियार निर्यात किए जाएंगे। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा उद्योग कॉरिडोर दो स्थापित किए जाएंगे। वे देश के रक्षा उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के उदारीकरण का भी जिक्र करते हैं। गत 17 सितंबर को उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग ने रक्षा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को उन कंपनियों के लिए 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी (स्वचालित रास्ते के जरिये) कर दिया जो नए लाइसेंस चाहती हैं। महज 13 दिन बाद 30 सितंबर को रक्षा मंत्रालय ने नई रक्षा खरीद नीति 2020 (डीएपी 2020) जारी कर दी जिसमें संशोधित एफडीआई सीमा का जिक्र नहीं था। नई नीति में कहा गया कि किसी कंपनी को भारतीय नागरिक के स्वामित्व वाला माना जाएगा जब उसमें 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिक या भारतीय कंपनी के पास होगी। यानी एफडीआई की अधिकतम सीमा 49 फीसदी होगी। डीएपी 2020 में कंपनी अधिनियम 2013 में परिभाषित उपायों का भी हवाला दिया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विभिन्न श्रेणियों में रक्षा निविदाओं में भाग लेने वाली कंपनियों का नियंत्रण भारतीय नागरिकों के हाथ में ही रहे। नीति में कहा गया है, नियंत्रण में अधिकांश निदेशकों की नियुक्ति का अधिकार या प्रबंधन पर नियंत्रण या नीतिगत निर्णयों पर नियंत्रण जिसमें उनकी अंशधारिता या प्रबंधन अधिकार अथवा अंशधारक समझौते या वोटिंग समझौते शामिल होंगे। इस विरोधाभास से कुछ सवाल उठते हैं : एफडीआई की सीमा को बढ़ाकर 74 फीसदी करने के पीछे इरादा क्या था? क्या 49 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली भारतीय कंपनियों के साथ अलग व्यवहार होगा और 74 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के साथ अलग? अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियां भारतीय रक्षा क्षेत्र में 74 फीसदी निवेश क्यों करेंगी जबकि कंपनी को भारतीय माना भी नहीं जाएगा और वे भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित श्रेणी में बोली भी नहीं लगा सकेंगी। रक्षा एफडीआई नीति सन 2001 में निजी क्षेत्र को मंजूरी के समय से ही उद्देश्य विहीन नजर आती है। रक्षा और विमानन क्षेत्र में 2001 से अब तक कुल एफडीआई बमुश्किल 3,454 करोड़ रुपये है। इसमें से 2,133 करोड़ रुपये की राशि वित्त वर्ष 2014-15 के बाद आई। रक्षा मंत्रालय ने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को उदार बनाकर क्या हासिल किया जाना है। सन 2001 में 26 फीसदी से 2016 में इसे 49 फीसदी किया गया और फिर यह 74 फीसदी तक पहुंचा। एक ओर इसे आधुनिक सैन्य तकनीक को भारत लाने के तरीके के रूप में देखा गया (मंत्रालय ने कहा भी है कि उच्च तकनीक वाली परियोजनाओं में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत होगी) तो दूसरी ओर एफडीआई को उदार बनाने को रक्षा उत्पादन बढ़ाने के तरीके के रूप में भी देखा जा रहा है। भले ही यहां सस्ते और मंझोले तकनीकी उपकरण बनें जिन्हें वैश्विक उपकरण निमार्ता भारत में श्रम सस्ता होने के कारण बनाएं। रक्षा एफडीआई को 100 फीसदी तक बढ़ाने को लेकर दी गई दलील इस गलत धारणा पर आधारित है कि रक्षा उद्योग बाजार संचालित है। बल्कि सरकार उच्च गुणवत्ता वाले सैन्य उपकरणों के निर्माण पर कड़ा नियंत्रण रखती है। बल्कि जब कोई रक्षा कंपनी विनिर्माण को भारत स्थानांतरित करने में बेहतरी देखती है तो यह निर्णय भी उसका बोर्ड नहीं भारत सरकार की मंजूरी पर निर्भर है। उन्नत रक्षा क्षमताओं वाले देशों में विधायी ढांचा मसलन अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय शस्त्र व्यापार नियमन आदि रक्षा तकनीक से जुड़े मसले देखते हैं। रक्षा एफडीआई की सीमा बढ़ाने और उसे 100 फीसदी करने के पीछे दलील यह है कि इससे विनिर्माण को बढ़ाया जा सकता है, रोजगार उत्पन्न किए जा सकते हैं और उत्पादन कौशल में सुधार किया जा सकता है। यह कौशल मध्यम तकनीक वाले उत्पाद मसलन इलेक्ट्रॉनिक सर्किटरी, फ्यूज बॉक्स या विमानों का लैंडिंग गियर बनाने के काम आता है। हम अपनी रक्षा जरूरत का 55-60 फीसदी आयात करते हैं जिसमें अधिकांश रूस, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल से खरीदा जाता है। यदि इन देशों की कंपनियों को भारत में पूर्ण क्षमता वाली उत्पादन इकाइयां स्थापित करने दिया जाए तो बड़े आॅर्डर का अहम हिस्सा यहीं बन सकता है। इससे देश में उच्च गुणवत्ता वाली विनिर्माण इकाइयां तैयार होंगी, भले ही स्वामित्व विदेशियों का हो। आॅफसेट करारों के माध्यम से इस विकल्प को टटोला गया है लेकिन भविष्य की सभी प्रत्यक्ष विदेशी खरीद में यह शर्त जोड़ी जा सकती है कि वे भारत में पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई स्थापित करेंगे। देश के रक्षा बाजार में पहुंच को सशर्त बनाया जा सकता है। यानी केवल उनके लिए जो देश में लंबी अवधि तक टिक सकें। वैश्विक कंपनियों को पूर्ण स्वामित्व वाली या 74 फीसदी स्वामित्व वाली विनिर्माण इकाइयां भारत में स्थापित करने से उच्च प्रतिस्पर्धा का माहौल बनेगा और भारतीय निजी और सरकारी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी। शायद इससे देश के रक्षा उद्योग में तेजी आए और सामान्य से अलग उत्कृष्ट उत्पाद तैयार हों। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)

Published / 2022-03-30 17:47:57
आगे कैसी रहेगी मजबूत बैंकिंग क्षेत्र की राह...

एबीएन डेस्क (तमाल बंद्योपाध्याय)। भारतीय बैंकिंग जगत की शीर्ष हस्तियों में शामिल के वी कामत ने कुछ दिनों पहले कहा था कि भारतीय बैंकिंग उद्योग पिछले 50 वर्षों में परिसंपत्ति गुणवत्ता एवं पंूजी की मात्रा के लिहाज से बेहतरीन स्थिति में है। कई दूसरे लोग एवं रेटिंग एजेंसियों का भी यही आकलन है। फरवरी में इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च ने वित्त वर्ष 2023 के लिए देश के बैंकिंग क्षेत्र के परिदृश्य में संशोधन किया। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि पिछले कई दशकों में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र इस समय सर्वाधिक अच्छी स्थिति में है। एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष 2020 से बैंकिंग क्षेत्र में शुरू हुआ सुधार का सिलसिला अब भी जारी है। इस रेटिंग एजेंसी के अनुसार अप्रैल की शुरूआत से मुख्य वित्तीय मानदंडों में और सुधार होगा। वास्तव में नकदी की उपलब्धता कम होगी और ब्याज दरें बढ़ेंगी जिनसे बैंकों के ट्रेजरी लाभ पर असर होगा मगर ब्याज दरें बढ़ने से इस नुकसान की भरपाई हो जाएगी। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि निगमित ऋण बैंकों का कारोबार बढ़ाएंगे और वे इस मामले में खुदरा ऋणों की जगह ले लेंगे। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों का क्या कहना ह : मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र का परिदृश्य संशोधित कर नकारात्मक से स्थिर कर दिया है। इस रेटिंग एजेंसी का मानना है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी से ऋण आवंटन में 10-13 प्रतिशत इजाफा हो सकता है और परिसंपत्ति गुणवत्ता में भी सुधार होगा। इसके अनुसार बैंकों की पूंजी कोविड-19 महामारी से पूर्व की स्थिति से भी अधिक हो जाएगी। एजेंसी के अनुसार इन सभी अनुकूल बातों से बैंकों का मुनाफा बढ़ेगा। एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने नवंबर 2021 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र एक बार फर मुनाफे में आ गया है और उनकी स्थिति पूंजी के लिहाज से मजबूत हो गई है। एक अन्य रेंटिंग एजेंसी एसऐंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलीजेंस (वित्तीय सूचना सेवा इकाई) का कहना है कि भारत के बैंकिंग उद्योग में पर्याप्त पूंजी है और फंसे ऋणों में खासी कमी आई है। इस एजेंसी ने आरबीआई के एक सर्वेक्षण का हवाला दिया है जो निवेशकों में बढ़ते आत्मविश्वास और आने वाली तिमाहियों में उत्पादन में तेजी आने का संकेत देता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जून 2020 में परिसंपत्तियों पर प्रतिफल और सरकार नियंत्रित बैंकों की पूंजी में सुधार हुआ है। इससे पहले पिछले चार वर्षों से मुनाफा अनुपात नकारात्मक रहा था। इन सभी बातों से लगता है कि बैंकिंग क्षेत्र के लिए अब संभावनाएं कई गुना मजबूत लग रही हैं। सभी कह रहे हैं कि भारतीय बैंकिंग उद्योग इतनी अच्छी हालत में कभी नहीं था। क्या वाकई ऐसा है? मगर भारतीय बैंकिंग उद्योग को लेकर मेरी राय कुछ अलग है। इसमें कोई शक नहीं कि कुछ बैंकों को छोड़कर बैंकिंग प्रणाली की स्थिति में खासा सुधार हुआ है। कुछ ऐसे बैंक जरूर हैं जिन्होंने सूक्ष्म ऋण खंड में अधिक ऋण आवंटित किए हैं मगर फंसी परिसंपत्तियां नियंत्रण में हैं और पूंजी की भी कोई कमी नहीं है। इसके साथ ही ऋण की मांग में भी इजाफा हो रहा है। बैंकों के पास काफी नकदी है इसलिए वे ऋण देना चाह रहे हैं। मगर समस्या यहीं खड़ी हो जाती है। चालू वित्त वर्ष समाप्त होने ही वाला है और दौरान कई बैंक कंपनियों को बंद लिफाफा भेज रहे हैं। ये ऐसी कंपनियां हैं जो अपना मौजूदा ऋण किसी दूसरे बैंक या वित्तीय संस्थान में सस्ती ब्याज दरों पर स्थानांतरित कराना चाहती हैं। हाल में ही सार्वजनिक क्षेत्र की एक इकाई ने 10 वर्ष की परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड पर मिलने वाले प्रतिफल की तुलना में करीब 1.5 प्रतिशत अंक कम दर पर 15 वर्ष के लिए रकम जुटाई है। एक दूसरी इकाई ने 4 प्रतिशत से कुछ अधिक दर पर एक वर्ष के लिए रकम जुटाई है। कुछ बड़ी ऋण परियोजनाएं महंगे ऋण हटाकर दीर्घ अवधि के लिए ऋण ले रही हैं। वे करीब 7 प्रतिशत ब्याज दर पर 15 वर्षों के लिए ऋण ले रही हैं। बैंक ऐसे अवसरों पर दांव लगाने के लिए तैयार हैं क्योंकि निर्माण कार्य पूरा होने की वजह से नकदी प्रवाह में किसी तरह की बाधा आने की आशंका नहीं है। इस समय भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रीपो रेट 4 प्रतिशत और रिवर्स रीपो रेट 3.5 प्रतिशत हैं। मगर बैंक वैरिएबल रेट रविर्स रीपो नीलामी के तहत करीब 4 प्रतिशत ब्याज कमा सकते हैं। 4 प्रतिशत से अधिक ब्याज की पेशकश करने वाला कोई भी ऋण बैंकों को स्वीकार्य है। बैंकों से ऋण लेने वाली कंपनियां सस्ती दरों पर ऋण दूसरी जगह स्थानांतरित कर रही हैं। बैंकों के पास ऋण पर ब्याज के मसले पर मोल-भाव में शिरकत करने के आलवा कोई दूसरा विकल्प नहीं हैं। पहले कम दरों की पेशकश कर निजी बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से ग्राहक छीन लेते थे मगर अब स्थिति बदल चुकी है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बीच भी एक दूसरे के ग्राहक अपनी ओर खींचने की शुरूआत हो चुकी है। पहले ऐसी होड़ नहीं दिखी थी। बैंकिंग उद्योग को लेक इस नए उत्साह का नतीजा क्या होगा? बचतकर्ताओं को नुकसान हो रहा है क्योंकि कर कटौती के बाद महंगाई को मात देने के लिए पर्याप्त ब्याज वे नहीं अर्जित कर पाते हैं। बैंकों को भी नुकसान हो रहा है क्योंकि उनका ब्याज मार्जिन कमजोर हो रहा है। केवल उधार लेने वालों को लाभ मिल रहा है। मगर यह भी सच है कि जब किसी को सस्ती रकम मिलती है तो जोखिम लेने की उसकी क्षमता भी बढ़ जाती है। वे उत्साह में आकर वे निवेश के लिहाज से कमजोर परियोजनाओं में निवेश कर बैठते हैं जिन्हें लेकर उन्हें पछतावा होता है। सस्ती रकम बेजा इस्तेमाल का भी कारण बनती है। क्या हम बैंकिंग उद्योग को लेकर समय से पहले ही अति उत्साह का शिकार हो गए हैं?

Published / 2022-03-30 15:21:04
अब भारत से बेहतर संबंध चाहते हैं खाड़ी देश

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रह्ललाद सबनानी)। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र एवं फार्मा उद्योग के लिए भी अब संयुक्त अरब अमीरात के द्वार खुल जाएंगे। पहले विशेष रूप से फार्मा क्षेत्र को अपने उत्पाद संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात करने में बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता था। हाल ही में भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह एतिहासिक समझौता न केवल भारत और संयुक्त अरब अमीरात के द्विपक्षीय संबंधों को और भी मजबूती प्रदान करेगा बल्कि दोनों देशों के बीच विदेशी व्यापार को 100 अरब डॉलर के स्तर के ऊपर ले जाने में भी सहायक होगा। इस समय अमेरिका एवं चीन के बाद, संयुक्त अरब अमीरात भारत का तीसरा सबसे बड़ा विदेशी व्यापार का भागीदार है। भारत का किसी भी अरब देश (मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देश) के साथ यह पहला व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता है और इस समझौते के अंतर्गत दोनों देशों के बीच विभिन्न उत्पादों एवं सेवाओं का विदेशी व्यापार बढ़ाने के साथ ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा। साथ ही इस समझौते के अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे के साथ की जाने वाली आयात एवं निर्यात की वस्तुओं पर आयात शुल्क एवं कस्टम शुल्क आदि को कम करेंगे एवं विदेशी व्यापार में आने वाली अन्य कठिनाइयों को भी दूर करने का प्रयास करेंगे। वर्तमान में भारत एवं संयुक्त अरब अमीरात के बीच प्रतिवर्ष 60 अरब डॉलर का विदेशी व्यापार होता है तथा सेवा क्षेत्र में भी प्रतिवर्ष 15 अरब डॉलर का व्यापार होता है। संयुक्त अरब अमीरात एक तरह से भारत के लिए दक्षिण अफ्रीका का प्रवेश द्वार है एवं अफ्रीका आज आर्थिक क्षेत्र की दृष्टि से बहुत बड़ा बाजार है। अत: उक्त समझौते के बाद भारतीय उत्पादों को संयुक्त अरब अमीरात के बाजारों में प्रदर्शित कर अरब के अन्य देशों के साथ ही दक्षिणी अफ्रीकी देशों को भी निर्यात किया जा सकेगा। इससे भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच आर्थिक साझेदारी और भी मजबूत होगी। वैसे भी संयुक्त अरब अमीरात किसी भी आर्थिक क्षेत्र में भारत का प्रतिद्वंद्वी नहीं है अत: भारत द्वारा किया गया यह एक पहला ऐसा समझौता है जो कांप्लिमेंटरी अर्थव्यवस्था के साथ किया गया है अन्यथा भारत द्वारा अभी तक किए गए मुक्त व्यापार समझौते विनिर्माण क्षेत्र में मजबूत देशों के साथ किए गए हैं जैसे दक्षिण कोरिया, जापान या आसियान देशों के साथ हुआ है। भारत ने उक्त व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को मिलाकर अभी तक कुल 12 मुक्त व्यापार एवं क्षेत्रीय व्यापार समझौते विभिन्न देशों के साथ किए हुए हैं। यह मुक्त व्यापार समझौते भारत के विदेश व्यापार को रफ्तार देने में अहम भूमिका निभा रहे है। भारत ने पूर्व में श्रीलंका, नेपाल, दक्षिणी कोरिया, जापान, मलेशिया, मारिशस, अफगानिस्तान, चिली, मरकोसुर आदि देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते, व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) अथवा तरजीही व्यापार समझौते किए हैं। इसी प्रकार भारत ने कुछ क्षेत्रीय व्यापार समझौते भी किए हैं जैसे दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौता (एसएएफटीए), भारत एशिया एनएफटीए, एशिया पेसिफिक व्यापार समझौता, सार्क तरजीही व्यापार समझौता (एसएपीटीए), आदि। अब भारत द्वारा ब्रिटेन, अमेरिका एवं यूरोपीयन यूनियन देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्रता से सम्पन्न किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं, क्योंकि जिन अन्य देशों के साथ उक्त देशों के मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए जा चुके हैं उन देशों को उक्त देशों के साथ विदेशी व्यापार करने में वरीयता प्रदान की जाती है जिसके कारण भारतीय व्यापारियों को उक्त देशों के साथ विदेशी व्यापार करने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वर्ष 2015 के बाद से भारत एवं संयुक्त अरब अमीरात कई क्षेत्रों में मिलकर कार्य कर रहे हैं एवं इस दौरान इन दोनों देशों के बीच आपस में सामरिक भागीदारी भी बढ़ी है, चाहे वह सुरक्षा का क्षेत्र हो, चाहे वह समुद्रीय क्षेत्र हो एवं चाहे वह दोनों देशों के नागरिकों के आपसी रिश्ते का क्षेत्र हो। आज संयुक्त अरब अमीरात एक ऐसा अरब देश है जिससे भारत के बहुत मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं। हाल ही के समय में आर्थिक रिश्तों के मजबूत होने के साथ ही भारत और संयुक्त अरब अमीरात की आपस में राजनैतिक निकटता एवं सूझबूझ भी बढ़ी है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत का निर्यात बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में संयुक्त अरब अमीरात को भारत से 17 अरब डॉलर का निर्यात किया गया वहीं भारत ने 26 अरब डॉलर का आयात किया है। इस प्रकार इस समय भारत के लिए 9 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है। परंतु भारत एवं संयुक्त अरब अमीरात के बीच हाल ही में संपन्न किए गए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के बाद भारत से निर्यात को संयुक्त अरब अमीरात में जीरो ड्यूटी का लाभ मिलेगा इससे भारत से संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात अधिक तेज गति से बढ़ेंगे इससे भारत को अपने व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र एवं फार्मा उद्योग के लिए भी अब संयुक्त अरब अमीरात के द्वार खुल जाएंगे। विशेष रूप से फार्मा क्षेत्र को अपने उत्पाद संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात करने में बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता था क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात भारत से दवाईयों का आयात करने के पूर्व भारतीय फार्मा उत्पादक कम्पनियों का निरीक्षण करना चाहता था, परंतु अब संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अमेरिका के यूएसएफडीए द्वारा प्रदान की गई अनुमति के आधार पर भारतीय फार्मा उत्पादक कम्पनियों को संयुक्त अरब अमीरात में दवाईयों के निर्यात की अनुमति प्रदान कर दी जाएगी। साथ ही भारत से रत्नों, रक्षा उत्पादों, ग्रीन इनर्जी उत्पादों, मशीनरी आदि का निर्यात भी बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा। एक अनुमान के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात के साथ किए गए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के बाद आने वाले समय में भारत में 10 लाख रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे। उक्त वर्णित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के सम्पन्न होने के बाद भारत के लिए संयुक्त अरब अमीरात के साथ ही अब अरब खाड़ी के अन्य देशों यथा बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब एवं इराक के साथ भी विदेशी व्यापार बढ़ाने में मदद मिलेगी एवं इन देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते किए जा सकेंगे। वैसे भी अब अरब खाड़ी के देश भारत के साथ न केवल अपने विदेशी व्यापार को आगे बढ़ाना चाहते हैं बल्कि भारत में भारी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी करना चाहते हैं। क्योंकि, ये देश भी अब समझने लगे हैं कि आगे आने वाले समय में भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है अत: अब भारत से ये देश भी आर्थिक सम्बंध मजबूत करना चाहते हैं। अभी हाल ही में सऊदी अरब द्वारा भारतीय कम्पनी रिलायंस के साथ ही अन्य भारतीय कम्पनियों में भी भारी मात्रा में विदेशी निवेश करने की इच्छा व्यक्त की गई है। अरब खाड़ी के देशों में लगभग 130 लाख भारतीय निवास कर रहे हैं और इन समस्त देशों के नागरिकों तथा भारतीय नागरिकों का आपस में पहले से ही बहुत अच्छा समन्वय है। अरब खाड़ी के देशों की आय का मुख्य स्त्रोत पेट्रोलियम पदार्थों से है परंतु संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी निर्भरता पेट्रोलियम पदार्थों पर कम करते हुए अन्य आर्थिक क्षेत्रों पर ध्यान देना शुरू किया है जिसका परिणाम यह हुआ है कि आज संयुक्त अरब अमीरात के सकल घरेलू उत्पाद में पेट्रोलियम पदार्थों का योगदान केवल 21 प्रतिशत रह गया है अर्थात 79 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद अन्य आर्थिक क्षेत्रों से प्राप्त हो रहा है, जोकि अपने आप में बहुत बड़ा परिवर्तन है। अरब खाड़ी के ही एक अन्य देश बहरीन ने अपनी निर्भरता पेट्रोलियम पदार्थों पर बहुत कम कर ली है एवं इसी प्रकार के प्रयास सऊदी अरब द्वारा भी किए जा रहे हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों के चलते खाड़ी के देश अब भारत से अपने व्यापार को बढ़ाना चाहते हैं एवं इन देशों के बड़े बड़े फण्ड एवं घराने अपने निवेश को भारत की मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

Published / 2022-03-29 15:17:53
हिजाब पहनने पर अड़ने वाले को पहनने दीजिये, वे खुद बनेंगे मजाक

एबीएन डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। पैगंबर मोहम्मद के जमाने में श्रेष्ठी महिलाओं को दुष्कर्मियों से बचाने के लिए और चालू औरतों से अलग दिखाने के लिए हिजाब का चलन शुरू किया गया था। अब उसी परंपरा को डेढ़ हजार साल बाद दुनिया के सभी देशों की मुसलमान औरतों पर थोप देना कहां तक उचित है? कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्कूल-कालेजों में हिजाब पर प्रतिबंध को सही ठहरा दिया है। मेरी राय में हिजाब पहनना और हिजाब पर प्रतिबंध, दोनों ही गैर-जरूरी हैं। हमें उससे आगे की सोचना चाहिए। मुसलमान औरतें हिजाब पहनें, हिंदू चोटी-जनेऊ रखें, सिख पगड़ी-दाढ़ी-मूंछ रखें और ईसाई अपने गले में क्रास लटकाएं- ये निशानियां धर्म का अनिवार्य अंग कैसे हो सकती हैं? धर्म तो शाश्वत और सर्वकालिक होता है और इस तरह की ये बाहरी निशानियाँ देश-काल से बंधी होती हैं। आप जिस देश में जिस काल में रहते हैं, उसकी जरूरतों को देखते हुए इन बाहरी चीजों का प्रावधान कर दिया जाता है। इन्हें सार्वकालिक और सार्वदेशिक बना देना तो बड़ा ही हास्यास्पद है। यदि कनाडा की भयंकर ठंड में कोई पुरोहित सिर्फ धोती या लुंगी पहनकर पूजा-पाठ कराए या विवाह-संस्कार करवाए तो उसे ढेर होने से उसका परमात्मा भी नहीं बचा सकता। कनाडा में सिख पगड़ी पहनें तो वहां के मौसम में वह धक सकती है लेकिन अरब देशों में वह आरामदेह रहेगी क्या? इसी तरह पैगंबर मोहम्मद के जमाने में श्रेष्ठी महिलाओं को दुष्कर्मियों से बचाने के लिए और चालू औरतों से अलग दिखाने के लिए हिजाब का चलन शुरू किया गया था। अब उसी परंपरा को डेढ़ हजार साल बाद दुनिया के सभी देशों की मुसलमान औरतों पर थोप देना कहां तक उचित है? दुनिया के कई मुस्लिम और यूरोपीय देशों ने हिजाब पर प्रतिबंध लगा रखा है, क्योंकि चेहरे को छिपाने के पीछे दो गलत कारण काम करते हैं। एक तो अपराधियों को शै मिलती है और दूसरा सामूहिक अलगाव प्रकट होता है। सांप्रदायिकता पनपती है। मैं तो सोचता हूं कि हिंदू पर्दा और मुस्लिम हिजाब, दोनों ही औरतों के अधिकारों का हनन भी है। ऐसी असामयिक और अनावश्यक प्रथाओं का त्याग करवाने का अभियान धर्मध्वजियों को आगे होकर चलाना चाहिए। स्कूल-कालेजों में यदि विशेष वेश-भूषा का प्रावधान है तो उसे सबको मानना चाहिए लेकिन यदि कोई छात्रा हिजाब पहनकर कक्षा में आना चाहती है तो वह अपने आप को खुद मजाक का केंद्र बनाएगी। उसका हिजाब अपने आप उतर जाएगा। उसकी अक्ल पर पड़े हिजाब को आप अपने आप क्यों नहीं उतरने देते? तीन-चार हजार छात्र-छात्राओं के कालेज में पांच-छह लड़कियां हिजाब पहनकर आती रहें तो उससे क्या फर्क पड़ना है? यह हिजाबबाजी घोर सांप्रदायिकता, घोर अज्ञान और घोर पोंगापंथ के कारण भी हो सकती है। हमारी मुसलमान माँ-बहनें स्कूलों में ही नहीं, सर्वत्र इससे बचें, इसके लिए कानून से भी ज्यादा जिम्मेदारी है, हमारे मुल्ला मौलवियों की। वे यदि इस्लाम को आधुनिक बनाने और उसके बुनियादी सर्वहितकारी सिद्धांतों को मुसलमानों में लोकप्रिय करने का जिम्मा ले लें तो किसी कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

Published / 2022-03-29 12:26:08
मध्यम आय वर्ग की आमदनी में हुए नुकसान की हुई भरपाई

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (महेश व्यास)। भारत में जून 2021 से उपभोक्ताओं की धारणा लगातार मजबूत हो रही है। जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच उपभोक्ता धारणा सूचकांक (आईसीएस) 31.9 प्रतिशत ऊपर चढ़ा है। मार्च में समाप्त हुए पहले तीन सप्ताहों में सूचकांक में 8.2 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इस तरह कोविड महामारी की दूसरी लहर के बाद उपभोक्ताओं की धारणा को पहुंची चोट के बाद सूचकांक में शानदार तेजी आई है। दूसरी लहर के दौरान मार्च और जून 2021 के बीच उपभोक्ताओं की धारणा में 15.5 प्रतिशत की कमी आई थी। जून के बाद जारी तेजी ने नुकसान की भरपाई कर ली है। उपभोक्ता धारणा में तेजी वैसे परिवारों की वजह से आई है जिनकी आय में एक वर्ष पहले की तुलना में इजाफा हुआ है। उन परिवारों का भी योगदान रहा है जिन्हें लगता है कि आने वाले वर्ष में उनकी आय बढ़ जाएगी। उन परिवारों की संख्या में भी इजाफा हुआ है जिन्हें लगता है कि एक वर्ष पहले की तुलना में उपभोक्ता वस्तुएं (कंज्यूमर ड्यूरेबल्स) खरीदने का यह बेहतर समय है। मगर चिंता की एक बात यह रही है कि यह आशावाद देश के सभी परिवारों के विचार में एक समान रूप से परिलक्षित नहीं हुआ। लोग अल्प एवं दीर्घ अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच उपभोक्ताओं की धारणा गरीब परिवारों में अधिक सुधरी है। वास्तव में इन परिवारों में धारणा में सुधार का महत्त्व थोड़ा इसलिए फीका पड़ जाता है क्योंकि कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बीच गरीब परिवारों की धारणा पर सबसे अधिक चोट पड़ी थी। यानी में उनकी धारणा में सुधारा काफी निचले स्तर से हुआ है। सालाना 1 लाख रुपये से कम आय वाले परिवारों में उपभोक्ता धारणा 49.5 प्रतिशत मजबूत हुई। इससे पहले इसमें 28.7 प्रतिशत की गिरावट आई थी। वैसे तो यह एक शानदार सुधार है मगर भारत में कुल परिवारों की धारणा के लिहाज से यह बहुत मायने नहीं रखता है। इन परिवारों का अनुपात कम है और भारतीय उपभोक्ता बाजार में इनकी हिस्सेदारी छोटी है। महामारी से पहले 2019-20 में इन परिवारों के समूह की कुल परिवारों की संख्या में हिस्सेदारी 9.8 प्रतिशत और सभी परिवारों की कुल आय में हिस्सेदारी 3.1 प्रतिशत थी। 2020-21 में कोविड महामारी के दौरान इस समूह की हिस्सेदारी बढ़ गई क्योंकि इस दौरान वृहद पारिवारिक स्तर पर आर्थिक स्थिति बिगड़ गई थी। कुल परिवारों और उनकी आय में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर क्रमश: 16.6 प्रतिशत और 5.7 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2020-21 में इन अनुपातों में कोई खास बदलाव नहीं देखा गया। वर्ष 2021-22 में 1 लाख से 2 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवारों की संख्या घटती प्रतीत हो रही है। इससे पहले 2017-18 और 2020-21 में ऐसे परिवारों की हिस्सेदारी देश के कुल परिवारों में 44-45 प्रतिशत हुआ करती थी। मगर 2021-22 की पहली छमाही में उनकी हिस्सेदारी कम होकर 25 प्रतिशत रह गई। कुल आय में उनकी हिस्सेदारी भी 31 प्रतिशत से कम होकर 14 प्रतिशत रह गई। इस समूह की उपभोक्ता धारणा जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच 31 प्रतिशत तक बढ़ गई। ऐसा लग रहा है कि कई परिवार अब 1-2 लाख रुपये आय के दायरे से ऊंची आय वाले दायरे में आ रहे हैं। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि 2021-22 की पहली छमाही में इस दायरे में परिवारों की संख्या में कमी आई है मगर कम आय श्रेणी में आने वाले परिवारों की संख्या अपरिवर्तित रही है जबकि ऊंची आय श्रेणी में परिवारों की संख्या बढ़ी है। इस वर्ष की पहली छमाही में परिवारों की आय में सुधार के संकेत स्पष्ट थे। शेष महीनों के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। मगर उपभोक्ताओं की धारणा में लगतार सुधार से संकेत मिलते हैं कि पारिवारिक आय में 2021-22 की दूसरी छमाही में भी सुधार जारी रह सकता है। सालाना 2 लाख से 5 लाख आय वाले परिवारों की उपभोक्ता धारणा जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच 28.3 प्रतिशत बढ़ गई। यह आय दायरा भारतीय उपभोक्ता बाजार का सबसे महत्तवपूर्ण खंड बन गया है। देश में कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है और कुल परिवारों की आय में इनका हिस्सा 56 प्रतिशत है। हाल तक कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 33 प्रतिशत और कुल आय में 45 प्रतिशत हुआ करती थी। पूर्ण रूप से कहें तो उपभोक्ता धारणा सूचकांक इस आय समूह में दूसरे आय समूहों की तुलना में सबसे ऊंचे स्तर पर है। सालाना 5 लाख से 10 लाख रुपये अर्जित करने परिवारों में उपभोक्ता धारणा सूचकांक जून 2021 के बाद 8.1 प्रतिशत तक बढ़ गई। कोविड महामारी की दूसरी लहर में इस आय वर्ग में आने वाले परिवार प्रभावित नहीं हुए थे। उनकी धारणा स्थिर हो गई थी मगर दूसरे समूहों की तरह नीचे नहीं गई थी। ऐसे परिवारों का अनुपात अपेक्षाकृत छोटा है। सभी परिवारों में इनकी हिस्सेदारी केवल 7.1 प्रतिशत है मगर कुल परिवारों की आय में इनकी हिस्सेदारी 19.7 प्रतिशत है। भारत के कुल उपभोक्ता बाजार में सालाना 10 लाख से अधिक आय अर्जित करने वाले परिवारों की संख्या छोटी है। 2021-22 की पहली छमाही में देश के कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 0.9 प्रतिशत और कुल आय में हिस्सेदारी 5.2 प्रतिशत थी। दूसरी लहर में ऐसे परिवारों की उपभोक्ता धारणा में 3.9 प्रतिशत की कमी आई थी। तब से इनमें सुधार 1.2 प्रतिशत के साथ उत्साजनक नहीं रहा है। दिसंबर 2021 में इस समूह की उपभोक्ता धारणा शिखर पर पहुंच गई थी मगर जनवरी और फरवरी 2022 दोनों में इनमें गिरावट आई है। ऐसे समूह की आय का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा बचत मद में चला जाता है। ऐसा लगता है कि शेयर बाजार में गिरावट की वजह से इस समूह की धारणा पर असर हुआ है। मध्य-आय वर्ग वाले लोगों की आय में सुधार हो रहा है और यह बात उनकी मजबूत होती धारणा में भी परिलक्षित होती है।

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